व्योमवार्ता, VYOMESH CHITRAVANSH advocate
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
शनिवार, 5 सितंबर 2026
विकास की कसौटी पर पानी पानी होता बनारस...../व्योमवार्ता
* व्योमेश चित्रवंश
काशी मात्र एक नगर नही वरन शाश्वत और सनातन है, जिसे महाकवि गालिब ने 'चिराग-ए-दैर' यानी दुनिया का रोशनदान कहा था। बाबा विश्वनाथ की नगरी, विश्व की सांस्कृतिक राजधानी, अध्यात्म का केंद्र और एक प्राचीन जीवंत शहर की आज चिंता उसके सांस्कृतिक भव्यता से आगे बढ़कर, उसके भौगोलिक अस्तित्व और उसके वर्तमान संकट पर है। हर साल मानसून आते ही इस पावन नगरी की एक दूसरी और विचलित करने वाली तस्वीर सामने आती है। आज हमारा बनारस हर मानसून में विकास की कसौटी पर पानी-पानी क्यों हो जाता है?हर साल मानसून आते ही इस पावन नगरी की एक दूसरी और विचलित करने वाली तस्वीर ही सामने क्यूं आती है? गलियों और सड़कों का स्विमिंग पूल बन जाना, सीवर लाइनों का बैक-फ्लो मारना और वरुणा व गंगा नदियों के उफान से रिहाइशी इलाकों का डूब जाना यहाँ की नियति बन चुका है। जब हम 'स्मार्ट सिटी' की बात करते हैं, तो वाराणसी के संदर्भ में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या हमारी तकनीक और नीतियां प्रकृति के मिजाज को समझने में पूरी तरह विफल रही हैं?
वर्तमान में, पहाड़ों और स्थानीय इलाकों में हुई भारी मानसूनी बारिश के कारण गंगा का जलस्तर 70 मीटर के पार पहुंच चुका है, जिससे सभी 84 घाट पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। इस साल भी गंगा का जलस्तर चेतावनी बिंदु को पार कर चुका है। वरुणा नदी में बैक-फ्लो के कारण सैकड़ों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। मणिकर्णिका घाट पर शवदाह छतों पर करना पड़ रहा है और वरुणा के तटीय इलाकों के 16 से अधिक मोहल्लों में बाढ़ का पानी घुसने से 3,800 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। यह कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि हमारी दोषपूर्ण प्रशासनिक नीतियों और नागरिक गैर-जिम्मेदारी का एक "मानव-निर्मित" (मैन-मेड) संकट है।
यदि हम पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि वाराणसी की भौगोलिक स्थिति और ड्रेनेज क्षमता का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है. वाराणसी के हालिया इतिहास में 2013 और 2016 के दो साल सबसे विनाशकारी रहे। शोध बताते हैं कि वाराणसी का लगभग 32 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र फ्लड ज़ोन (बाढ़ प्रवण क्षेत्र) में आता है, जिससे सीधे तौर पर 8 लाख से अधिक की आबादी प्रभावित होती है। 2016 में गंगा का जलस्तर खतरे के निशान (71.26 मीटर) को पार कर 72.50 मीटर तक पहुंच गया था।2021 और 2022 में भी गंगा का जलस्तर 72 मीटर के करीब पहुंचा, जिससे मारुति नगर, सामनेघाट और कोनिया जैसे इलाकों में नावें चलानी पड़ी थीं।
प्राचीन इतिहास और पुराणों का संदर्भ लें तो ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में काशी को एक अद्भुत प्राकृतिक जल संवहन प्रणाली (नेचुरल ड्रेजिंग ग्रिड) वाले नगर के रूप में वर्णित किया गया है। स्कंदपुराण के काशी खंड में इस नगरी की जल-भौगोलिक सीमा को स्पष्ट करते हुए लिखा गया है: वरुणा च असी च द्वे नद्यौ सुरवन्दिते। तयोर्मध्ये च या काशी सा काशी सर्वमंगला॥ वरुणा और असी—ये दोनों देव-वंदित पवित्र नदियां हैं। इन दोनों नदियों के मध्य में जो 'काशी' बसी हुई है, वह सभी का मंगल करने वाली है ।
पौराणिक काल में काशी का भूगोल एक 'स्पंज सिटी' (वाटर सेंसिटिव सिटी ) जैसा था।शहर के भीतर दर्जनों तालाबों, कुंडों और झीलों का एक प्राकृतिक अंतःसम्बन्धित जाल था, जिसका वर्णन पुराणों में मिलता है: मत्स्योदरी च विख्याता मंदाकिनी तथापरा।सरोवराणि पुण्यानि काशीमध्ये स्थितानि वै॥ काशी के मध्य में मत्स्योदरी और मंदाकिनी जैसे अनेक पुण्यमयी सरोवर (तालाब) स्थित हैं । जब भी मानसून में गंगा उफान पर होती थी, तो अतिरिक्त पानी इन आंतरिक तालाबों में समा जाता था। यह न केवल बाढ़ को रोकता था, बल्कि भूजल स्तर को भी बनाए रखता था।
पद्म पुराण के अनुसार, शिव ने काशी को अपने त्रिशूल पर धारण किया है ('त्रिशूलं धृतवान् शंभुः...')। भौगोलिक दृष्टि से यह इस बात का प्रतीक है कि काशी का मुख्य हिस्सा ऊंचे कगार (जियोग्राफिकल एलिवेशन ) पर बसा था, जिससे गंगा की बाढ़ का पानी शहर में नहीं घुस पाता था। स्कंदपुराण के काशी खंड में भी अंकित है कि यह नगरी “वरुणा और असी नामक दो पवित्र जलधाराओं के बीच बसी काशी का भूगोल 'जल-संवेदनशील' (वाटर सेंसिटिव) था। अध्ययन बताते हैं कि “बनारस का प्राचीन ताना-बाना दर्जनों तालाबों, कुंडों और झीलों के एक प्राकृतिक तंत्र (स्पोंजी ड्रेनेज) से जुड़ा था।” जब भी मानसून में गंगा उफान पर होती थी, तो अतिरिक्त पानी इन आंतरिक तालाबों जैसे बेनियाबाग, लक्ष्मीकुंड, मत्स्योदरी गोदावरी, सप्तसागर, मंदाकिनी आदि में समा जाता था।
१८वीं शताब्दी में स्थानीय शासकों और नवाबों के समय, शहर की ढलान को व्यवस्थित करने के लिए एक विशाल भूमिगत इंजीनियरिंग का प्रयोग किया गया। इसके तहत 'शाही नाला' बनाया गया, जो आज भी शहर के मध्य से गुजरने वाला एक विशाल ईंटों का मुख्य नाला है। इसका मुख्य उद्देश्य भारी बारिश के दौरान शहर के अतिरिक्त पानी को तेजी से गंगा और वरुणा में गिराना था। इसी प्रकार 'हाथी नाला' भी एक बड़ी जल संवहन प्रणाली थी, जो इतनी चौड़ी थी कि इसके भीतर से पानी की विशाल मात्रा हाथी के वेग के समान बिना किसी रुकावट के गुजर सकती थी। इन नालों ने प्राकृतिक सरोवरों के पूरक के रूप में काम किया, जिससे शहर में कभी जल-जमाव नहीं होता था।
जनसंख्या बढ़ने के साथ प्राकृतिक जल संवहन प्रणाली पर दबाव बढ़ा, जिसके बाद अलग-अलग कालखंडों में कृत्रिम नालों और सीवर ग्रिड्स का विकास किया गया। १९वीं शताब्दी के अंत में विशेषकर इंजीनियर जेम्स प्रिंसेप के योगदान के बाद, अंग्रेजों ने वाराणसी में पहली बार संगठित पाइपलाइन आधारित सीवरेज और ड्रेनेज ग्रिड बिछाया। उन्होंने तत्कालीन २ लाख की आबादी के लिए भेलूपुर वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट की नींव रखी। अंग्रेजों ने 'शाही नाले' को मुख्य सीवर ट्रंक लाइन के रूप में तब्दील कर दिया, जो कि इसकी क्षमता से अधिक का बोझ था। शहर के कृत्रिम नालों और सीवर ग्रिड्स का विकास की योजनायें तो बनी पर जल संवहन प्रणाली मे मानव निर्मित
गलतियां यहीं से होनी प्रारंभ हुई। जैसा कि काशी के अध्येता महेश गोगटे अपनी पुस्तक “दि सैक्रेड वाटर्स आफ वाराणसी ” में लिखते हैं कि “औपनिवेशिक काल से ही बनारस को एक 'शुष्क शहर' (ड्राई सिटी) बनाने की भूल शुरू हुई, जिसके तहत प्राकृतिक जल निकायों को पाटकर जमीन और पानी को जबरन अलग किया गया।”
स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर पिछले चार दशकों में, गंगा की स्वच्छता और वाराणसी के सीवर ग्रिड को सुधारने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर बड़े पैमाने पर धन तो आवंटित किया पर वह सही ढंग से उपयोग होने के बजाय भ्रष्टाचार के खेल मे बंदरबांट हो गया।
गंगा एक्शन प्लान की शुरूआत 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बनारस से ही किया था जिसका उद्देश्य था नदी में गिरने वाले घरेलू सीवर को रोकना, सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाना और गंगा प्रदूषण को कम करना। इस के अंतर्गत दीनापुर में पहला बड़ा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हुआ। कुछ मुख्य नालों की टैपिंग शुरू हुई पर ड्रेनेज और सीवर लाइनों को अलग नहीं किया गया। आबादी बढ़ने के कारण प्लांट छोटे पड़ गए और गंगा में सिल्टेशन (गाद) की समस्या को नजरअंदाज किये जाने से समस्या का प्रभावी समाधान नही आ सका।
सन 2005 से 2014 के यूपीए कार्यकाल मे जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय अर्बन रिन्युअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) में वाराणसी के लिए ₹५००+ करोड़ से शहर के बुनियादी ढांचे के सुधार, सीवर लाइनों का विस्तार और पुराने नालों का आधुनिकीकरण के साथ शहर के बाहरी इलाकों (जैसे ट्रांस-वरुणा क्षेत्र) में आंशिक रूप से नई सीवर लाइनें बिछाई गईं। परंतु खराब कोऑर्डिनेशन के कारण योजना समय पर पूरी नहीं हुई। पुरानी काशी की तंग गलियों के ड्रेनेज में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ।
नरेन्द्र मोदी के वाराणसी से सांसद और देश के प्रधानमंत्री बनने पर नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरूआत हुई जिसका उद्देश्य गंगा का प्रदूषण कम करना, संरक्षण और पुनरुद्धार था। इसमें घाटों का नवीनीकरण, आधुनिक एसटीपी (सीवर ट्रीटमेण्ट प्लांट) का निर्माण और नालों की 100% टैपिंग जैसी योजनायें शामिल है।वाराणसी के 17 परियोजनाओं ₹1,469 करोड़ स्वीकृत किये गये जिसमे गोईढहा, दीनापुर (140एमएलडी) और रमना (50एमएलडी) जैसे अत्याधुनिक एसटीपी चालू हुए। ऊपरी इलाकों में पानी की शुद्धता बढ़ी और जलीय जीवों में सुधार हुआ परंतु ड्रेनेज ओवरफ्लो और 'बैक-फ्लो' की समस्या अब तक हल नहीं हुई। सीपीसीबी के अनुसार फेकल कोलीफॉर्म का स्तर अभी भी चिंताजनक है। नदी के तल की गाद निकाले बिना घाटों को कंक्रीट से पाटने के कारण जल-जमाव बढ़ गया।
हाल ही में किए गए रिमोट सेंसिंग और भू-स्थानिक अध्ययनों (जियोस्पैशल स्टडीज) ने वाराणसी के बाढ़ संकट को लेकर चौंकाने वाले वैज्ञानिक तथ्य सामने रखे हैं।काशी हिंदू विश्वविद्यालय और सर्वे ऑफ इंडिया के डेटा पर आधारित एक वैज्ञानिक शोध पत्र (फ्लड रिस्क एण्ड इंपैक्ट एनालिसिस आफ वाराणसी) के अनुसार, वाराणसी का लगभग 32 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र 'एक्टिव फ्लड ज़ोन' में तब्दील हो चुका है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि “1970के दशक के बाद से बाढ़ के मैदानों (फ्लडप्लेन्स) में अनियंत्रित शहरी विस्तार ने ही इस विभीषिका को तीव्र किया है।” गूगल अर्थ इंजन (जीईई) के द्वारा किये लिये गये सन 2017 से 2023 के बीच के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले एक नवीनतम वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि “फ्लड-प्रोन ज़ोन (बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों) में कंक्रीट के पक्के निर्माणों के कारण 8,19,472 लोग और 7,578हेक्टेयर क्षेत्र सीधे तौर पर गंभीर खतरे की जद में आ चुके हैं।”
इतिहास साक्षी है कि काशी का संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और प्रशासनिक भूलों की क्रमिक परिणति है। वैज्ञानिक और पर्यावरणविद आज वाराणसी को "इंजीनियर्ड कैटास्ट्रोफी" (मानव-निर्मित आपदा) का सटीक उदाहरण मान रहे हैं। इसके पीछे कई बड़े तकनीकी और नीतिगत दोष जिम्मेदार हैं।पिछले कुछ वर्षों में ही हजारों ट्रक मलबे और कंक्रीट को गंगा के तटीय क्षेत्रों में डंप किया गया है जिस तरह से घाटों के मूल स्वरूप को बदलकर 'कंक्रीट के जंगल' खड़े किए जा रहे हैं, उसने गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह बाधित कर दिया है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां गंगा को सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी। गंगा को बचाने के नाम पर नदी में रेत/बालू के खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से पहाड़ों से बहकर आने वाली लाखों टन गाद (सिल्ट) हर साल वाराणसी में गंगा की तलहटी में जमा हो रही है। उत्खनन न होने से नदी का तल (रिवरबेड) लगातार ऊंचा हो गया है। नदी गहरी न होने के कारण अब कम पानी आने पर भी जलस्तर तेजी से ऊपर (वर्टिकल राइज) उठता है और पानी सीधे घाटों व तटीय बस्तियों को डुबो देता है। गंगा के बीचों-बीच रेत के बड़े-बड़े टापू बन गए हैं, जिससे नदी की प्राकृतिक चौड़ाई और जल धारण क्षमता आधी रह गई है। पर्यावरणविदों और नदी-वैज्ञानिकों के अनुसार,यह भयानक तकनीकी दुष्प्रभाव पूरी तरह से हम मानव प्रजाति द्वारा प्राकृतिक व्यवस्था मे अवरोध उत्पन्न किये जाने से पैदा हुआ है।
इसी तरह वाराणसी को पहचान देने वाली वरूणा के पुनरूद्धार के नाम पर लगभग ₹201 करोड़ की लागत से बना 'वरुणा कॉरिडोर' वैज्ञानिक दूरदर्शिता के अभाव का सबसे बड़ा सुबूत है।
नदी तल की खुदाई के बिना पक्की दीवारें बना कर नदी के प्रवाह को जबर्दस्ती रोकने की कोशिश कहें या वरूणा के नाम पर सरकारी खजाने की लूट ने जहां वरूणा के स्वाभाविक प्रवाह को सीमित कर दिया वहीं बाढ़ की स्थिति मे जल प्रवाह को अनियंत्रित।आईआईटी के जल-विशेषज्ञों और विद्वानों का मानना है कि कॉरिडोर बनाते समय सबसे पहला काम वरुणा नदी की तलहटी की गहरी सिल्टिंग/ड्रेजिंग (सफाई और खुदाई) करना था, ताकि नदी की गहराई बढ़े पर प्रशासन ने गहराई बढ़ाने के बजाय नदी के प्राकृतिक ढलान और 'फ्लडप्लेन' को मिट्टी से पाट दिया और दोनों किनारों पर कंक्रीट की दीवारें (रिटेनिंग वाल) खड़ी करके नदी को एक संकरे नाले (चैनल) में तब्दील कर दिया।परिणाम स्वरूप अब मानसून में जैसे ही गंगा का बैक-वाटर (उल्टा पानी) वरुणा में आता है, गहराई न होने के कारण वरुणा का पानी तुरंत उफनकर दीवारों को लांघ जाता है और कोनिया, शैलपुत्री,सरैया, हुकुलगंज, हरमिटिया, सिकरौल जैसे इलाकों को जलमग्न कर देता है।
वाराणसी के इस हाल के लिए केवल भारी बारिश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। स्थानीय प्रशासन और योजनाकारों की कई ऐसी नीतियां हैं जिन्होंने इस समस्या को और गंभीर बनाया है।'कंक्रीट का जंगल' बनते शहर मे अनियोजित व अवैज्ञानिक निर्माण सहित विकास के नाम पर किए जा रहे बड़े प्रोजेक्ट्स पर हमेशा सवाल उठाए हैं। गंगा के ठीक किनारे बने बड़े पक्के निर्माणों (जैसे नमो घाट का आधुनिकीकरण या विश्वनाथ धाम जैसे तटीय कॉरिडोर्स) के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह और चौड़ाई प्रभावित हुई है। नदी के फ्लडप्लेन (बाढ़ क्षेत्र) को कंक्रीट से पाट देने के कारण पानी को फैलने की जगह नहीं मिलती। बनारस की ड्रेनेज व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी लगभग 200 साल पुराने 'शाही नाले' और ब्रिटिशकालीन ईंटों के ड्रेनेज पर निर्भर है। शहर की आबादी तो लाखों में बढ़ गई, लेकिन नालों की क्षमता वैसी ही रही। प्रशासन ने हाल ही में 13 पुराने वार्डों के सीवरेज बदलने के लिए ₹527 करोड़ का बजट स्वीकृत किया है, लेकिन यह कदम दशकों की देरी के बाद उठाया गया है। वरुणा नदी के सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर 'वरुणा कॉरिडोर' में प्राकृतिक ढलान को बनाए रखने के बजाय केवल किनारों पर पक्का निर्माण कर दिये जाने का नतीजा यह है कि आज वरुणा किनारे की रिहाइशी सोसायटियों की पहली मंजिलें पानी में डूबी हुई हैं।
वाराणसी विकास प्राधिकरण के नियमों के बावजूद बाढ़ प्रभावित निचले इलाकों (फ्लड प्रोन जोन) में धड़ल्ले से कॉलोनियां बढ़ती गई । जब बाढ़ आती है, तब अधिकारी "अवैध निर्माण सील करने" की चेतावनी देते हैं, लेकिन सूखे के दिनों में वही तंत्र आंखें मूंदकर निर्माण होने देता है।
ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। यदि प्रशासन की नीतियां दोषपूर्ण हैं, तो काशी के नागरिकों का व्यवहार भी इस संकट को बढ़ाने में बराबर का भागीदार है। हम बनारसियों द्वारा बनारस की गलियों और सड़कों पर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, रैपर्स और घरेलू कचरा खुले में फेंकना आम है। मानसून के दौरान यही 'फ्लोटिंग वेस्ट' (तैरता कचरा) बहकर गली-पिट्स और ड्रेनेज के मुहानों को पूरी तरह चोक (जाम) कर देता है। 15 मिनट की तेज बारिश में सड़कों के डूबने का सबसे बड़ा कारण यही नागरिक लापरवाही है। बनारस कभी तालाबों और कुंडों का शहर हुआ करता था (जैसे लक्ष्मीकुंड, बेनियाबाग, बेदब्यास,सुरज कुण्ड, सगरा तालाब, सोनिया पोखरा, सिकरौल पोखरा, लक्ष्मीकुंड, पितरकुण्डा जैसे अनेकों पोखरे बावली व कूप)। ये तालाब 'वॉटर बफर' का काम करते थे—यानी बारिश का अतिरिक्त पानी इनमें जमा हो जाता था। लेकिन जनता ने धीरे-धीरे इन तालाबों को पाटकर उन पर मकान और दुकानें खड़ी कर लीं। जब पानी के पास जाने की कोई जगह नहीं बची, तो उसने सड़कों और घरों का रुख कर लिया।सस्ते भूखंडों के लालच में नागरिकों ने सामनेघाट, नगवा और वरुणा के तटीय निचले इलाकों में बिना नक्शा पास कराए और बिना सुरक्षा मानकों के बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर लीं। आज वे परिवार अपनी जीवनभर की कमाई को पानी में डूबते देखने को विस्थापित हैं।
काशी को इस सालाना जल-समाधि से बचाने के लिए प्रशासन को अपनी नीतियों में "पारिस्थितिकीय सुधार" (इकोलाजिकल करेक्सन) करने होंगे। इसके लिये जरूरी है कि केवल बरसात मे जलजमाव व बाढ़ की समस्या होने तक ही नही वरन इसके लिये एक बृहद वार्षिक योजना तैयार कर के उस को कार्यान्वित किया जाये। पर्यावरण नियमों के दायरे में रहकर, गंगा के बीच में जमा हो चुके रेत के टीलों और सिल्ट को 'वैज्ञानिक ड्रेजिंग' के जरिए निकाला जाए, ताकि नदी का तल गहरा हो और उसकी जल-धारण क्षमता बढ़े। वरुणा नदी के तल की भारी खुदाई (डीप ड्रेजिंग) कराई जाए। कॉरिडोर के उन हिस्सों को री-डिजाइन किया जाए जो पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकते हैं।गंगा और वरुणा का जलस्तर बढ़ने पर सीवर का पानी वापस शहर में न आए (बैक फ्लो), इसके लिए सभी प्रमुख नालों के मुहाने पर आधुनिक मैकेनिकल फ्लड गेट्स और पानी को बाहर फेंकने के लिए हाई-कैपेसिटी ऑटोमैटिक पंपिंग स्टेशन्स चालू किए जाएं। विकास प्राधिकरण अपनी जिम्मेदारी के प्रति पूरी तरह ईमानदार हो कर एनजीटी (NGT) के नियमों के तहत नदियों के फ्लड-प्लेन (बाढ़ क्षेत्र) में किसी भी नए पक्के निर्माण को पूरी तरह प्रतिबंधित करे।शहर के पारंपरिक नालों को आधुनिक स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम से बदलने के साथ साथ नदियों के जलस्तर बढ़ने पर पानी को बाहर फेंकने के लिए बड़े और आधुनिक हाई-कैपेसिटी पंपिंग स्टेशन लगाए जाने चाहिये। नालियों में कचरा फंसने (फ्लोटिंग मैटेरियल्स) की समस्या को रोकने के लिए वार्ड स्तर पर कचरा प्रबंधन दुरुस्त करते हुये नालों के मुहाने पर आयरन मेश (लोहे की जालियां) लगानी होंगी। वरुणा और गंगा के किनारों (फ्लड जोन) पर किसी भी नए निर्माण को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इन क्षेत्रों में पेड़ लगाकर ग्रीन बफर जोन विकसित करना होगा, जो बाढ़ की तीव्रता को सोख सके।शहर के बाहरी इलाकों और बड़े होटलों, शिक्षण संस्थानों , बड़े परिसर वाले राजकीय कार्यालयों ,पार्कों में बड़े तालाबों वॉटर रिटेंशन पोंड्स या वाटर हार्वेस्टिंग पिट्स का पुनरुद्धार किया जाए, ताकि बारिश का अतिरिक्त पानी सीधे सड़कों पर आने के बजाय जमीन में समा सके।
वैदिक काल की प्राकृतिक जल संवहन प्रणाली से लेकर मुगलों के शाही नाले, अंग्रेजों के सीवर नेटवर्क और आज की अरबों रुपये की 'नमामि गंगे' योजना तक—काशी ने इंजीनियरिंग के कई दौर देखे हैं। वाराणसी के प्रशासन, विकास प्राधिकरण ही नही हम आम बनारसियों को भी यह ध्यान रखना होगा कि वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक सनातन संस्कृति की धरोहर है। इसे सिर्फ कंक्रीट और लाइटों से चमकाकर 'स्मार्ट' नहीं बनाया जा सकता। वाराणसी केवल कंक्रीट, सड़कों और आधुनिक लाइटों के ढांचे से 'स्मार्ट' नहीं बन सकती। असली स्मार्टनेस इस प्राचीन शहर के पारंपरिक भूगोल, इसकी सहायक नदियों (वरुणा और असी) और इसके प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का सम्मान करने में है। हमें ही इसके प्राचीन भूगोल, इसकी सहायक नदियों और इसकी प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का सम्मान करना होगा। जब तक प्रशासन दूरदर्शी और वैज्ञानिक नीतियां नहीं अपनाएगा और जब तक काशी की जनता नागरिक अनुशासन का पालन नहीं करेगी, तब तक हर मानसून में विकास की यह चमक पानी में बहती रहेगी।
शनिवार, 29 अगस्त 2026
खो रही है बनारस मे बनारसियत/ व्योमवार्ता
यह भी सच है कि विकास और आधुनिकता की दौड़ में जब कोई प्राचीन शहर अपनी रफ्तार बदलता है, तो उसकी कीमत अक्सर उसकी आत्मा को चुकानी पड़ती है। आज हमारा बनारस इसी चौराहे पर खड़ा है। बीते वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने जो करवट ली है, उसने हम सभी को एक गंभीर आत्मचिंतन के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा।आज जब हम बनारस की गलियों, घाटों और चौराहों से गुजरते हैं, तो मन में एक गंभीर बेतैनी पैदा होती है। बीते बारह वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने विकास की जो करवट ली है, उसने हमारे मन मस्तिष्क में एक गंभीर वैचारिक द्वंद्व को जन्म दिया है। यह द्वंद्व है भौतिक विकास की चकाचौंध और सांस्कृतिक पहचान के बिखराव के बीच का द्वंद्व।
आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का कायाकल्प हुआ है। आर्थिक और भौतिक दृष्टि से शहर ने वह ऊंचाइयां छुई हैं, जिसकी कल्पना आज से बीस साल पहले असंभव था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का भौतिक कायाकल्प अभूतपूर्व रहा है। आर्थिक और ढांचागत पैमानों पर शहर ने वह छलांग लगाई है, जिसकी कल्पना दो दशक पहले अकल्पनीय थी। शहर के चारों तरफ बिछा रिंग रोड का जाल, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, और फुलवरिया फोरलेन जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं ने बनारस को जाम के पुराने अभिशाप से काफी हद तक मुक्ति दिलाई है। कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा देश का पहला अर्बन रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की अत्याधुनिक परिवहन तकनीक से जोड़ता है। इस बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण से पर्यटन उद्योग में अप्रत्याशित उछाल आया है। बनारस के होटलों, होम-स्टे, नौका-व्यवसाय और हस्तशिल्प उद्योग में पूंजी का प्रवाह बढ़ा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नई संजीवनी मिली है।शहर के चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, फुलवरिया फोरलेन जैसी परियोजनाएं—इन सबने शहर की रीढ़ माने जाने वाले यातायात को एक नई सुगमता दी है। कैंट से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की आधुनिक तकनीक से जोड़ता है।
काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप ने पूरी दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर खींचा है।भौतिक और आर्थिक पैमानों पर यह एक अत्यंत सफल और विकसित शहर की तस्वीर है। लेकिन, आज हमें इस चमक के पीछे छिपे उस अंधेरे और सन्नाटे पर भी बात करनी होगी, जो इस विकास की कीमत के रूप में हमारा यह शहर चुका रहा है।
इस भौतिक बदलाव का सबसे प्रखर और प्रतीकात्मक केंद्र काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लिये सदियों पुरानी, संकरी और घुमावदार, लेकिन इतिहास और आत्मीयता से जीवंत रहने वाली 'विश्वनाथ गली' को जब उजाड़ा गया, तो केवल कंक्रीट की इमारतें औरवईंट पत्थरों के मकान नही ढहाये गये, बल्कि उसके साथ काशी का वह पारंपरिक समाजशास्त्र भी जमींदोज़ हो गया जो पीढ़ियों से अक्षुण्ण था। उस गली की दुकानों का केवल व्यावसायिक महत्व नहीं था, वे दुकानदार और वहाँ से गुजरने वाले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख के गवाह थे।पहले इस गली का एक अपना चरित्र था। यहाँ की दुकानों पर पीढ़ियों का परिचय था। संकरी गलियों से गुजरते हुए महादेव के भक्त जिस आत्मीयता का अनुभव करते थे, वह इस नए, विशाल और पत्थरों से बने भव्य प्रांगण में कहीं खो गई है। बनारस के भोले बाबा महादेव का नही बल्कि श्री काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर तो बन गया, लेकिन इसके साथ ही वह पारम्परिक ताना-बाना भी बिखर गया जो काशी की असल धड़कन था। अब भोर की पहली किरण के साथ गंगा स्नान कर, लोटे में जल लिए"हर हरमादेव शंभो, काशी विश्वनाथ गंगे " की टेर लगाते हुये बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ने वाले वे पारम्परिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले) ढूंढने से भी नहीं मिलते। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और वीआईपी संस्कृति के बीच काशी के स्थानीय भक्तों का सहज जुड़ाव कहीं पीछे छूट गया है।
इसमें दो राय नहीं कि इस परियोजना ने बाबा के दरबार को एक वैश्विक भव्यता, स्वच्छता और विशालता प्रदान की है। लेकिन इस भव्यता को हासिल करने के लिए जो कीमत चुकाई गई, वह बनारस की आत्मा का एक हिस्सा थी। यह काशीवासी के लिये सबसे बड़ी और कचोटने वाली तब्दीली काशी के परंपरा के विस्थापन के रूप में दिखती है। बनारस की सुबह का एक स्थापित नियम था—भोर की पहली किरण के साथ गंगा में स्नान करना, तांबे के लोटे में गंगाजल, फूल और बेलपत्र लेकर नंगे पैर बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ जाना। यह दर्शन किसी वीआईपी पास या कतार प्रबंधन का मोहताज नहीं था, यह भक्त और भगवान के बीच का एक सहज, अनौपचारिक और दैनिक पारिवारिक संवाद था।बाबा के दरबार के ये पारंपरिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले स्थानीय लोग) इस शहर की आत्मा थे। आज वे नेमी इस वीआईपी संस्कृति, सुरक्षा के कड़े घेरों और पर्यटकों की असीम और अभूतपूर्व भीड़, सुरक्षा के कड़े चक्रव्यूहों और कॉर्पोरेट कतारों के बीच खुद को शापित और उपेक्षित महसूस करते हैं।
भव्यता का मलबे और आत्मीयता का विस्थापन के नींव पर दर्शन और आस्था के भौतिक और दृश्यमान बदलाव का यह जो नया 'इवेंट मैनेजमेंट' स्वरूप उभरा है, उसने बनारस के मूल आध्यात्मिक एकांत को एक कोलाहलपूर्ण पर्यटन केंद्र में बदल दिया है। आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ की लहरों पर संगीत गूंज रहा है, और रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच 'सुबह-ए-बनारस' का वह पारंपरिक, आध्यात्मिक सन्नाटा कहीं खो गया है, जहाँ बैठकर कभी कबीर ने रूढ़ियों पर प्रहार किया था, तुलसीदास ने रामचरितमानस की चौपाइयाँ रची थीं और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने गंगा की लहरों को अपने शहनाई के सुर सौंपे थे , रत्नाकर ने अपनी लाविनी के साथ गंगालहरी गाते हुये गंगा मे स्वयं को तिरोहित कर दिया था। शंकराचार्य ने डोम के रूप मे शिव का साक्षात कर शिवोहम् शिवोहम का अस्तित्व स्वीकार किया। आज का बनारस 'हेरिटेज टूरिज्म' के शोरूम में सजे किसी महंगे शो-पीस जैसा होने लगा है, जिसे पर्यटक दूर से देख तो सकते हैं, पर उसके भीतर की तरलता को महसूस नहीं कर पाते। बाज़ारीकरण के दबाव के चलते जो दर्शन कभी एक सहज, आत्मीय और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था, वह अब एक 'इवेंट' (आयोजन) बन चुका है। आस्था का यह बाज़ारीकरण बनारस के मूल धार्मिक चरित्र पर एक गहरी चोट है।आजकल यह नया शब्द बहुत चलन में है—'हेरिटेज टूरिज्म' या 'सांस्कृतिक पर्यटन'। बनारस इसका सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि संस्कृति को 'बेचना' और संस्कृति को 'जीना'—दो अलग-अलग बातें हैं।
आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ चल रहे हैं, रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच घाटों की वह पारंपरिक शांति, सुबह-ए-बनारस का वह आध्यात्मिक एकांत, जहाँ बैठकर कभी कबीर, तुलसी और बिस्मिल्लाह खान ने अपनी साधना की थी, वह शोरूम की खिड़की में सजे किसी शो-पीस जैसा हो गया है। पर्यटक यहाँ 'बनारसियत' को देखने आ रहे हैं, लेकिन उन्हें जो परोसा जा रहा है, वह असली बनारस नहीं बल्कि उसका एक चमक-दमक वाला 'वर्शन' (संस्करण) है।
मूल बनारसी जो घाट पर घंटों बैठकर गंगा की लहरों को निहारते हुए जीवन के परम सत्य को पा लेता था, वह अब इस भीड़ और कमर्शियलाइजेशन (व्यावसायिकता) के कारण घाटों से दूर होता जा रहा है।
बनारस सिर्फ आलीशान इमारतों और चौड़ी सड़कों का नाम नहीं है; यह एक मिजाज है, एक जीने का सलीका है।बनारस की असली पहचान उसकी वास्तुकला से ज्यादा उसकी सामाजिक जीवनशैली में निहित थी। यहाँ की 'अल्मस्ती', 'फक्कड़पन' और 'मौज' दुनिया के किसी भी आधुनिक शहर के लिए एक पहेली जैसी थी। आज, शहर के बाहरी इलाकों से लेकर मुख्य भूभाग तक खड़ी हो रही बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली ऊंची इमारतें इस पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को निगल रही हैं। बनारस के पुराने मोहल्लों मे मंदिर, घर के बाहर का चौतरा केवल बैठने की जगह नहीं था, वह एक खुली संसद था। चबूतरा' केवल एक स्थापत्य (Architecture) नहीं था, वह एक खुली लोकतांत्रिक संसद था। वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर वर्ग—चाहे वह प्रोफेसर हो, सरकारी कर्मचारी हो, बुनकर हो या कोई आम रिक्शा चालक—बिना किसी औपचारिक झिझक के एक साथ बैठता था।वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर तबका बिना किसी भेदभाव ऊंचनीच के बैठता था।मोहल्ले के शास्त्री जी सुबह सुबह गंगा स्नान कर बाबा का दर्शन कर वहीं बैठते थे तो मुन्सीपाल्टी (म्यूनिसिपल बोर्ड) से मोहल्ले मे रोजाना झाड़ू मारने वाला स्वीपर भी। कंधे पर गमछा लपेटे, हाथ में सुरती (खैनी) मलते, बतकही करते हुये उंगली से सुंघनी मलते 'गप्पाजी' की मुद्रा में बैठे मोहल्ले से लेकर ब्रह्मांड का चिंतन करने वाले बनारसी वहाँ देश-दुनिया, राजनीति, धर्म और दर्शन समसामयिक राजनीति, धर्म, साहित्य और दर्शन पर ऐसी बेबाक और अचूक टिप्पणियाँ करते थे, जो बड़े-बड़े विचारकों और थिंक-टैंकों को हैरान कर दें। वह संवाद निश्छल था, उसमें कोई व्यावसायिक स्वार्थ नहीं था।यह 'गप्पाजी' और बतकही अपने आप मे एक मजबूत सूचना नेटवर्क था जो हर घर परिवार के सुख दुख हालचाल स्वास्थ्य समृद्धि लेन देन का प्लेटफार्म था। यह चबूतरा व्यवस्था पूरे मोहल्ले का संवाद तंत्र था। वहां अल्हड़पन, अकारण मुस्कुराहट और घाटों-गलियों में 'सुख' की तलाश होती थी।आज इन चबूतरों की जगह बहुमंजिला इमारतों की ऊंची, बंद दीवारों और लिफ्ट संस्कृति और बंद दरवाजों वाले एकांतवास ने ले ली है। आधुनिक अपार्टमेंटों ने लोगों को भौतिक रूप से पास पास तो ला दिया है, लेकिन उनके बीच की मानसिक और सामाजिक दूरियों को अनंत काल तक बढ़ा दिया है। अब मोहल्लों में वह सामूहिक ठहाका और अकारण मुस्कुराने की प्रवृत्ति गायब हो रही है। आज अपार्टमेंट की लिफ्ट संस्कृति ने उस जीवंत संवाद को समाप्त कर दिया है। अब चबूतरों पर वह सामूहिक ठहाका नहीं सुनाई देता। आधुनिक जीवन की आपाधापी, कॉरपोरेट नौकरियों के दबाव और ईएमआई (EMI) के तनाव ने बनारसी मिजाज की उस बेफिक्री को सोख लिया है, जो कभी इस शहर का ट्रेडमार्क हुआ करती थी।
बीते बारह वर्षों में काशी ने अभूतपूर्व आर्थिक और भौतिक विकास देखा है। चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का जाल, फुलवरिया फोरलेन, और आसमान को छूने को बेताब रोपवे जैसी आधुनिक यातायात सुविधाओं ने शहर की रफ्तार बढ़ा दी है। ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट वाली इमारतों ने बनारस के क्षितिज (स्काईलाइन) को बदल दिया है। लेकिन, इस कंक्रीट के चमकते जंगल के पीछे बनारस की वह सदियों पुरानी पहचान कहीं खो गई है, जिसे हम गर्व से 'बनारसियत' कहते थे।
लेकिन, अर्थशास्त्र के स्थापित नियम जहाँ तरक्की का जश्न मना रहे हैं, वहीं समाजशास्त्र और संस्कृति के मोर्चे पर एक बड़ा शून्य उभर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि भूगोल के इस तीव्र विस्तार में क्या हमारा इतिहास संकुचित नहीं हो रहा है? चौड़ी होती सड़कों के समानांतर क्या हमारे दिलों और सामाजिक संवाद की संकरी गलियां और संकुचित नहीं होती जा रही हैं? विकास का यह पहला कॉलम जितना चमकदार है, इसकी कीमत उतनी ही गंभीर है। यह सच है कि बुनियादी ढांचे के विकास से रोजगार बढ़ा है, पर्यटन को पंख लगे हैं और यातायात सुगम हुआ है। लेकिन क्या भौतिक समृद्धि के बदले अपनी सांस्कृतिक विरासत और आत्मीयता को खो देना सही है? आज का बनारस पर्यटकों के लिए तो आकर्षक हो गया है, पर मूल बनारसियों के लिए थोड़ा अजनबी सा होने लगा है।
हमारा उद्देश्य विकास का विरोध करना कतई नहीं है। सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, यातायात सुगम होना चाहिए, स्वास्थ्य और शिक्षा की आधुनिक सुविधाएं हर नागरिक को मिलनी चाहिए। यह समय की मांग है और इस प्रगति का स्वागत होना ही चाहिए।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी पहचान की कीमत पर ही होना चाहिए? क्या हम ऐसा आधुनिक शहर नहीं बना सकते जो अपनी जड़ों से भी जुड़ा रहे?
यूरोपीय देशों ने अपने प्राचीन शहरों (जैसे रोम, वेनिस या क्योटो) के ऐतिहासिक और पारंपरिक स्वरूप से बिना कोई छेड़छाड़ किए, उन्हें आधुनिक सुविधाओं से लैस किया है। उन्होंने अपनी पुरानी बसावट, गलियों और सामाजिक चरित्र को संरक्षित रखते हुए शहर के बाहर नया विकास किया।बनारस के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन' की आवश्यकता थी और आज भी है।यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, शानदार गाड़ियाँ होंगी, आलीशान अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी मिजाज, वह 'साझा संस्कृति', वह 'अल्हड़पन' और 'अपसंस्कृति से दूर रहने की फक्कड़ता' नहीं होगी, तो यकीन मानिए, वे एक बहुत अमीर शहर में तो रहेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे।
इस शहर को आधुनिक विकास की गति देने वाले नीति-नियंताओं तक यह आवाज पहुंचनी जरूरी है कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' जरूर बनाइये, लेकिन इसकी 'बनारसियत' की बलि चढ़ाकर नहीं। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के अनुभव और साधना से उपजी संस्कृतियां अगर एक बार मर गईं, तो उन्हें दोबारा जीवित करना असंभव होगा।बनारस की आत्मा को बचाना ही इस शहर के अस्तित्व को बचाना है।विकास जरूरी है, समय के साथ चलना भी अनिवार्य है। परंतु, यदि विकास की इस आंधी में काशी की अल्मस्ती, बनारसी पान की मिठास, घाटों की शांति और अपनों के बीच की वह 'गपशप' ही गायब हो जाएगी, तो यह शहर सिर्फ एक ढांचा बनकर रह जाएगा। हमें यह समझना होगा कि बनारस की ताकत इसके कंक्रीट में नहीं, इसकी 'बनारसियत' में है। यदि हम इसे नहीं बचा पाए, तो आने वाली पीढ़ियां एक समृद्ध शहर तो पाएंगी, लेकिन वह 'जीती-जागती काशी' खो चुकी होंगी।
यह सही है कि आज की आधुनिक जरूरत के लिहाज से सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, सीवेज सिस्टम आधुनिक होना चाहिए, रोपवे और हवाईअड्डे बनने चाहिए, क्योंकि यह समय की मांग है और नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के लिए आवश्यक है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान की बलि देकर ही संभव है? दुनिया के कई प्राचीन देशों (जैसे इटली का रोम, वेनिस या जापान का क्योटो) ने अपनी प्राचीन बसावट, संकरी गलियों और सामाजिक चरित्र को बिना छुए, शहर के बाहर नए उपनगरों का विकास किया और अपनी प्राचीन कोर-सिटी को एक जीवित संग्रहालय के रूप में संरक्षित रखा। काशी के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन और सतत विकास' (Sustainable Development) की आवश्यकता थी।
यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, आलीशान गाड़ियाँ और अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी आत्मीयता, वह साझा संस्कृति और बेफिक्री का अल्हड़पन नहीं होगा, तो वे एक समृद्ध शहर में तो सांस लेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे। नीति-नियंताओं और प्रबुद्ध समाज को यह सोचना होगा कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' बनाते-बनाते हम इसके 'बनारसियत' के प्राण न हर लें। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे और सड़कें कुछ महीनों में दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के साझा सांस्कृतिक अनुभवों से उपजी जीवनशैलियां अगर एक बार विलुप्त हो गईं, तो उन्हें किसी भी तकनीक से दोबारा जीवित करना असंभव होगा।
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काशी,कृष्ण पक्ष द्वितीया, भाद्र, संवत2083वि0
रविवार, 30 अगस्त 2026
रविवार, 23 अगस्त 2026
आधुनिक व्यवसायिक बयार मे बदलता बनारस.......
हमारा शहर बनारस. युगों-युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को शहर बनारस ऐसा भाया कि उन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों, मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या? तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता? बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री. मकान बनवाओ चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
दिक्कत शुरू हुई सन 2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो अनियोजित विकास के महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक, ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के होड़ देने पर विराम लगा," न तो मै यहां लाया गया हूं, न ही मुझे किसी ने भेजा है। मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है."
बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने अपने क्षेत्र का दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा. कभी उपेक्षित सा पड़ा बनारस बदलाव के राह पर चल पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने अपने संसदीय क्षेत्र के लिये बजट के नाम पर अवरोध बने आर्थिक और वित्तीय संसाधनों का पिटारा खोल दिया तो आज वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा होने लगी है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। इक्कीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में वाराणसी स्टेशन से काशी विद्यापीठ और सिगरा होते हुए रथयात्रा -महमूरगंज चौराहे तक पहुंचने में कम से कम 25-30 मिनट लगते थे. दूरी सिर्फ 4 किलोमीटर के आसपास ही थी, लेकिन जाम ऐसा कि पसीना छूट जाता. आप पोंछते रहिए. अगर बीएचयू जाना हो तो 45 मिनट का समय लगना आम बात थी. लेकिन पिछले कुछ साल में गंगा में बहुत पानी बह चुका है. बनारस के बाहर ही नही भीतरी सड़कों पर भी काफी परिवर्तन हुये है। अतिक्रमण से लगातार दुबली होती गई सड़के अब चौड़ी हो गई हैं। शहर के बाहर तेज रफ्तार से भागते ट्रकों के लिये रिंगरोड के अलावा शहर के अंदर फुलवरिया फोरलेन, बीएलडब्लू रविन्द्रपुरी भेलूपुर फोरलेन, मोहनसराय कैण्ट राजघाट फोरलेन ने पहले की स्थितियों को बदल दिया है।जिसने काशी को उन दिनों देखा था वे आज की काशी को देखकर स्वाभाविक रूप से अचंभित हो सकते हैं। उबड़-खाबड़ सड़कें. सड़कों के किनारे जगह-जगह बिजली के पोल और पोल पर लटके बेतरतीब तार. बिजली से लेकर टेलीफोन और केबल नेटवर्क के तार. तार नहीं जंजाल हो जैसे. यूपी में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, किसी ने बाबा विश्वनाथ की नगरी को संवारने के बारे में नहीं सोचा. किसी की सोच वोट बैंक से ऊपर उठ ही नहीं सकी.एक बार जब मोदीजी वाराणसी दौरे पर थे. तब उन्होंने भी इस ओर इशारा किया था- “जब काशी के लोगों ने 2014में विकास का संकल्प लिया था. कई लोगों को लगता था कि बनारस में कोई बदलाव नहीं हो पाएगा. लेकिन काशी के लोगों ने करके दिखा दिया. देश के लोग काशी के विकास से मंत्रमुग्ध हैं.”
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 14 में से 8 प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही रहे, लेकिन बाहर से यूपी आकर, वाराणसी से चुनकर लड़कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले नरेंद्र मोदी पहले ही हैं. जब नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में नामांकन के लिए वाराणसी पहुंचे थे, तब जो उन्होंने कहा था, वो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया था- “ना किसी ने मुझे यहां भेजा है, ना मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है.”
तब नरेंद्र मोदी ने काशी को क्योटो बनाने की बात कही थी. पता नहीं तब काशीवासियों को कितना यकीन या भरोसा हुआ होगा, कितने लोगों ने बातें बनाई होंगी, लेकिन पिछले वर्षों में काशी में जो काम हुए हैं, उनसे ये भरोसा अब यकीन में बदलने लगा है कि काशी का कायाकल्प हो सकता है और काफी हद तक पीएम मोदी ने करके दिखाया है. शुरूआत काशी विश्वनाथ धाम कारीडोर से करें तो नगर के ही नही नगर से लगे मंदिरों को भी पर्यटक स्थल के रूप मे सरकार ने विकसित किया है। सारनाथ शूल टंकेश्वर मार्कण्डेय महादेव कालभैरव पंचकोसी सहित बहुतेरे धार्मिक स्थलों पर कार्य प्रगति पर है। चूंकि संसदीय सीट देश के प्रधानमंत्री की है तो प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद दिलचस्पी दिखाते हैं. औसतन 21 दिनों में एक दौरा वाराणसी का करते हैं और लगातार विकास कार्यों की समीक्षा करते रहते हैं. वाराणसी के विकास के लिए अब तक हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं दी गई हैं. कुछ पर काम पूरा हो चुका है. कुछ पर काम जारी है और कुछ काम अभी पाइपालाइन में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं “पीएम जब भी काशी आते हैं, हमेशा सौगात लेकर आते हैं.” हम सभी जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने यूपी के राजनीतिक इतिहास मे पहली बार दो निरंतर पारी पूरा किया है. इन सालों में ही योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी के विकास उन्मुख परियोजनायों को लगातार हरी झण्डी देने के साथ प्रदेश सरकार से भी अनेकों सौगातें दी है. जो मूलभूत संरचनाओं के साथ शिक्षा चिकित्सा पर्यटन यातायात विकास से जुड़ी हुई हैं। राजातालाब मे वेयर हाऊस, गोदौलिया बेनियाबाग टाऊनहाल कचहरी मे मल्टीलेवल पार्किंग, ईबसों का पूरा जखीरा, मिर्जामुराद मे ई चार्जिं स्टेशन और ईबस टर्मिनल, बनारस लखनऊ, बनारस आजमगढ़, बनारस गाजीपुर मार्ग का फोरलेन सिक्सलेन चौड़ीकरण, रामनगर पड़ाव मार्ग का चौड़ीकरण, कचहरी सारनाथ संदहा मार्ग का चौड़ीकरण, आशापुर फ्लाईओवर, सारनाथ का सौन्दर्यीकरण व विकास,
पीएम मोदी ने काशीवासियों को संबोधित करते हुए रोप-वे के बारे में कहा, “बनारस के जाम से डरने वालों के लिए रोप-वे अच्छी चीज है. इसके बनने पर कैंट रेलवे स्टेशन और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बीच की दूरी कुछ मिनटों की ही रह जाएगी. गोदौलिया के जाम की दिक्कत भी बहुत हद तक घट जाएगी. जाम की वजह से बनारस घूमने से बचने वाले लोगों के लिए रोप-वे बनने के बाद घूमना आसान हो जाएगा.” आने वाले नवरात्रि से संचालित होने वाले ये रोपवे सड़क से 50 मीटर की ऊंचाई पर वाराणसी स्टेशन से गोदौलिया तक 3.8 किलोमीटर की यात्रा कराएगा. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कांप्लेक्स सिगरा में निर्मित वर्ल्ड क्लास इनडोर स्टेडियम में क्रिकेट, फुटबाल, एथलेटिक्स ट्रैक, चार लॉन टेनिस कोर्ट, बास्केटबाल कोर्ट, वॉलीबाल कोर्ट, दो कबड्डी कोर्ट ड्रेसिंग और कैफेटेरिया भी है. अनुमान है कि ओलंपिक में खेले जाने वाले 28 में से 24 खेल इस स्टेडियम में खेले जा सकेंगे.
शहर के सीवेज का गंदा पानी सीधे गंगा में मिलने से रोकने के लिए नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत बीएचयू के पास भगवानपुर में 55 एमएलडी शोधन क्षमता वाला ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है. शहर मे सीएनजी पंपों सहित घरों मे गैसपाईपलाईन लगावकरवपीएनजी आपूर्ति , मियावाकी वन, सीएनजी गाड़ीयों, ई वाहनों, घरेलू सोलर सिस्टम जैसी सुविधाओं के माध्यम से
वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा हो रही है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. पर्यटक बढ़ने से काशी में रोज़गार के अवसर भी बढ़े और बढ़ रहे हैं. विकास बनारस का हो तो फायदा आसपास के इलाकों को भी मिलता ही है. पूर्वांचल और बिहार के लोग भी लाभ पा रहे हैं. इन सबसे बनारस की व्यवसायिक गतिविधियां तो बढ़ी है । रोजगार का भी सृजन हुआ है पर वह अल्पकालिक और अस्थाई और अवसरकालिक है। पर्यटन के क्षेत्र मे देशी पर्यटकों की संख्या मे कई गुना बढ़ोत्तरी से होटल, लान, स्टेहोम, और पर्यटन सेवा संबंधी सेवियों बढ़ने से रोजगार बढ़ा है। पर यह दीर्घकालिक नही है। बनारस को जरूरत है बंगलोर हैदराबाद पुणे जैसे आधुनिक साईबर सेवा उद्योग केन्द्र के रूप मे विकसित करने की। आज बनारस यातायात बिजली सेवा परिवहन और आधुनिक संसाधनों से लैश वह मुकाम प्राप्त कर चुका है जिसे साइबरसिटी के रूप मे विकसित किया जा सके। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि बनारस मे विकास की एक मजबूत नींव तैयार हो चुकी है अब जरूरत है उसे पुख्ता करने की। पर बनारस के विकास के साथ शहर की भीड़ बढ़ती जा रही है। अगल बगल के ही नही बिहार झारखण्ड और मध्यप्रदेश से भी लोगों का माइग्रेशन बनारस मे तेजी से हो रहा है। नजीजा शहर मे बढ़ती सुविधायें भी भीड़ की जरूरत के हिसाब से कम दिख रही है। जगजीत सिंह की एक गजल है " हर तरफ हर कहीं बेशुमार आदमी, हर नये दिन नया इंतजार आदमी". आज बनारस की हालत वैसी होती जा रही है.
काशी, श्रावण शुक्ला एकादशी संवत 2087 वि0,
रविवार, 23 अगस्त,2026
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रविवार, 16 अगस्त 2026
काशी मे सूरज की पहली किरण......../ व्योमवार्ता
कभी काशी में उगते पहले सूरज को देखिये। राजघाट पुल के पार गंगा के किनारे से लाल रंग से नारंगी रंग में बदलते धीरे धीरे ऊपर उठते हुये। नमो घाट से भी पूरब आदिकेशव घाट के सामने थोड़ा तिरछे हो कर अपने पहले प्रकाश से आदि केशव मंदिर को आलोकित करते हुये। काशी में भगवान भाष्कर अपनी रोज की यात्रा वहीं से प्रारंभ करते है जहां भगवान विष्णु ने काशी में अपना प्रथम कदम रखा था । स्कंद पुराण के काशी खंड में आदि केशव मंदिर स्थापना का वर्णन मिलता है। यह काशी के अति प्राचीनतम् मंदिरों में से है जिसने पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के कई महत्वपूर्ण घटनाओं को देखा है। मिथकीय मान्यताओं के अनुसार मंदार पर्वत के दृढ़ तपस्या से प्रसन्न हो कर उसे भगवान शिव ने मंदराचल पर्वत पर स्वयं आ कर निवास करने का वरदान दिया और काशी स्थित सभी देवी देवताओं के साथ मंदराचल पर्वत पर चले गये। ब्रह्मा जी ने दोषरहित शासन के शर्त पर काशी के शासन व्यवस्था को संभालने हेतु राजा दिवोदास को सौंपा । दिवोदास इतने धर्मात्मा थे कि उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखमय व कंटकहीन जीवन व्यतीत करने लगी। कहीं से भी कोई भी दोष उनके शासन वावस्था में नहीं मिला। दिवोदास के कुशल शासन और लोकप्रियता से देवगण उनसे ईस्या करने लगे और बदनाम करने का प्रयास करने लगे। देवगण के अनेको प्रयासों के बावजूद भी राजा दिवोदास की कीर्ति में कोई आंच नहीं आई। वे अपने कठोर तपस्या एवं कुशल शासन व्यवस्था के बल पर अपनी प्रजा में लोकप्रिय बने रहे जिससे प्रजा पूर्वपूजित देवी देवताओं को भूलने लगी और देवदास की हो पूजा करने लगी। उन्होंने लगभग 80,00 वर्षों तक काशी पर शासन किया।
पर काशी के देवाधिदेव भगवान शिव काशी से विरह के कारण व्याकुल थे। कोई भी शीतलक उन्हें शांत नहीं कर पा रहा था। काशी से बहने वाली हवा भी उन्हें ठंडा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उनके शरीर पर चंदन का लेप लगाया गया, कोमल कमल की डंठले बांधी गई और भगवान शिव को शांत करने के लिए अनेक उपाय किए गए, लेकिन किसी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।बाहर से शांत दिखने के बावजूद, वह काशी से वियोग के कारण उत्पन्न सभी पीड़ा को मन ही मन सहन कर रहे थे। देवतागण यह सोच रहे थे कि पार्वती देवी के आगमन से भगवान शिव के मन मे सती देवी के वियोग का कष्ट भी दूर हो गया है। परन्तु महादेव शिव के लिये काशी से वियोग की अग्नि उससे कहीं अधिक तीव्र थी।
भगवान शिव की स्थिति को समझते हुए, पार्वती देवी ने काशी की महिमा का वर्णन किया और उनसे कहा कि उन्हें तुरंत काशी के लिए प्रस्थान करना चाहिए। यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और पार्वती देवी से प्रसन्न होकर उन्होंने आश्वासन दिया कि वे जल्द से जल्द काशी पहुँचने का प्रयास करेंगे। अब भगवान शिव राजा दिवोदास को काशी से हटाने का उपाय सोच रहे थे। पूरी काशी दिवोदासमय हो चुकी थी।उस समय उन्होंने योगिनियों का एक समूह देखा। पार्वती देवी से परामर्श करने के बाद, उन्होंने 64 योगिनियों के समूह को काशी भेजा। 64 योगिनियों को ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी थी या कोई ऐसा उपाय खोजना था जिससे राजा दिवोदास तंग आकर सिंहासन त्याग दें। योगिनियों ने भगवान शिव का आदेश सहर्ष स्वीकार किया और काशी के लिए रवाना हुई।ये अनियमित तरीकों से काशी में प्रवेश कर गईं और अपनी रहस्यमयी शक्तियों का उपयोग करते हुए विभिन्न रूप और गतिविधियों अपना लीं। एक योगिनी नर्तकी बन गई तो दूसरी हस्तरेखा शास्त्र में पारंगत हो गई। इस प्रकार, सभी योगिनियों ने भगवान शिव के मिशन को पूरा करने के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ या पेशे अपना लिए। लेकिन उनमें से कोई भी राजा दिवोदास में कोई दोष नहीं निकाल सकी।
अंततः उन्होंने हार तो मान ही ली बल्कि काशी शहर के आकर्षण में आकर वहीं रहने का फैसला किया। उन्हें वापस जाने और अपने गुरु को यह बताने से भी डर लग रहा था कि वे उनका मिशन पूरा नहीं कर पाई। योगिनियों के न लौटने पर भगवान शिव ने अपने सेवकों, गणों को काशी भेजा। लेकिन वे भी भगवान शिव को सूचना नहीं दे पाए। गण काशीवासियों को प्रभावित करने में असफल रहे। इसलिए, अपनी विफलता पर शोक करते हुए, उन्होंने काशी में ही रुककर शिवलिंग स्थापित करने और उनकी पूजा करने का निर्णय लिया। इस प्रकार, भगवान शिव ने सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा को भेजा। सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा को भी राजा दिवोदास में कोई दोष नहीं मिला और इसलिए उन्होंने काशी में ही रहने का निर्णय लिया। वास्तव में, भगवान ब्रह्मा पवित्र गंगा के तट पर अश्वमेध यज्ञ करना चाहते थे। लेकिन राजा दिवोदास ने दशाश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस प्रकार, दशाश्वमेध यज्ञ स्थल दशाश्वमेध घाट के नाम से जाना जाने लगा। चौसठ योगिनियों, गणों, सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा के अपने मिशन से वापस न लौटने से चिंतित होकर, भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश को बुलाया। उन्होंने गणेश को काशी जाकर राजा दिवोदास के शासन का अंत करने का उपाय खोजने का आदेश दिया। भगवान गणेश ने ही अपने पिता भगवान शिव के पक्ष में स्थिति को पलट का प्रयास किया।भगवान गणेश ने ज्योतिष के जानकार ब्राहम्ण का रूप धारण किया। वे विभिन्न घरों मे जाकर ज्योतिषीय भविष्यवाणी करते थे। वे राज्य मे एवं रानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गये। रानियां अप्रत्यक्ष रूप से राजा से
इस पुराने ब्राह्मण ज्योतिषी के बारे में बातें करने लगी। राजा के सामने और आप भी अपने निजी बातचीत में उनकी प्रशंसा करती रहती थीं।
एक बार रानी लीलावती ने राजा दिवोदास के समक्ष उस ब्राह्मण की प्रशंसा की और उनसे कहा कि वे उस ब्राह्मण से मिले। राजा दिवोदास ने इसकी अनुमति दे दी। रानी लीलावती ने अपनी चतुर सहेली को भेजा और ब्राह्मण को राजा के दरबार में बुलाया।भावपूर्ण बातचीत के बाद ब्राह्मण वापस लौटा और राजा उनसे बहुत प्रसन्न हुये। उन्होंने रानी लीलावती के समक्ष ब्राह्मण की खूब प्रशंसा की और अगले दिन सुबह उसे अपने महल में आमंत्रित किया।राजा दिवोदास ने एकांत में वृद्ध ब्राह्मण से पूछा कि उनके कल्याण के लिए कौन से कर्म लाभदायक हैं। राजा दिवोदास ने राजा के रूप में अनेक पुण्य कर्म किए थे, परन्तु उनका मन इन कर्मों में नहीं लगता था। वे उस ब्राह्मण से परम सत्य जानना चाहते थे, जिसे वे उच्च बुद्धि और ज्ञान का धनी मानते थे। वृद्ध ब्राह्मण ने राजा दिवोदास की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक सच्चे और धर्मात्मा राजा के रूप में वर्णित किया। उन्होंने राजा को सूचित किया कि उस दिन से शुरू होने वाले अठारहवें दिन उत्तर दिशा से एक ब्राह्मण आएगा और राजा को सलाह देगा। राजा को उस ब्राह्मण की सलाह का निःसंकोच पालन करना था। इसके बाद, भगवान गणेश अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए काशी में ही रहे।
जब भगवान गणेश मंदार पर्वत पर नहीं लौटे, तो भगवान शिव चिंतित हो गए और भगवान विष्णु से मिले, जिन्होंने उनकी सहायता करने का प्रस्ताव रखा। भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी के साथ काशी के लिए रवाना हुए। काशी पहुँचकर, भगवान विष्णु ने पवित्र गंगा और पवित्र वरुण नदी के संगम पर इसी घाट पर स्नान किया। तब से यह गंगा वरूणा संगम पदोदक तीर्थ के नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि भगवान विष्णु ने यहाँ अपने चरण कमलों को धोया था।लक्ष्मी देवी और गरुड़ के साथ, भगवान विष्णु ने यहाँ अपने दैनिक अनुष्ठान किए। उन्होंने अपनी एक प्रतिमा बनाई और स्थापित किया। काशी के उस क्षेत्र को, जहाँ भगवान विष्णु ने स्नान किया और अपनी प्रतिमा स्थापित की, श्वेतद्वीप के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास कई तीर्थ हैं, जिनमें महालक्ष्मी तीर्थ भी शामिल है, जहाँ देवी लक्ष्मी प्रतिदिन स्नान करती थीं। वहाँ उनकी प्रतिमा भी स्थापित है। भगवान विष्णु द्वारा तराशी गई प्रतिमा में प्रवेश करने के बाद, वे भगवान शिव के मिशन को पूरा करने के लिए आंशिक रूप से बाहर आए। भगवान विष्णु ने काशी के उत्तर में अपने निवास के लिए धर्मक्षेत्र नामक एक क्षेत्र की रचना की।
भगवान विष्णु ने पुण्यकीर्ति नामक एक साधु का रूप धारण किया, जो तीनों लोकों के लिए आकर्षण का स्रोत थे। लक्ष्मी देवी ने विज्ञानकौमुदी नामक एक अत्यंत सुंदर परिव्राजिका (स्त्री साध्वी) का रूप धारण किया। उनके प्रकट होने से संसार थम सा गया। गरुड़ ने एक अद्वितीय रूप धारण किया और विनायकीर्ति नाम से उनके शिष्य बन गए। शिष्य विनायकीर्ति अपने गुरु पुण्यकीर्ति के प्रति अत्यंत समर्पित थे, जिन्होंने उन्हें अहिंसा सहित धर्म के विभिन्न सिद्धांतों का ज्ञान दिया। काशी के लोगों ने पुण्यकीर्ति के उपदेशों के बारे में दूसरों से सुना और उनसे मिलने गए। वहीं, विज्ञानकौमुदी ने काशीवासियों से कहा कि वे केवल वही मानें जो वे देखते हैं और शरीर के सुख की ही तलाश करें। उन्होंने लोगों को भौतिक सुख की आवश्यकता और उसे प्राप्त करने के विभिन्न साधनों के बारे में बताया।
उसने कुछ लोगों को काला जादू भी सिखाया। इस तरह पुण्यकीर्ति और विज्ञानकौमुदी नागरिकों की भौतिक सुख की लालसा में उलझाकर उन्हें पापमय गतिविधियों में लिप्त करने में सफल रहीं। परिणामस्वरूप, राजा दिवोदास, जो अब अपने राज्य का संचालन नहीं करना चाहते थे, की शक्ति कम हो गई।
यह वृद्ध ब्राह्मण द्वारा बताई गई भविष्यवाणी के अनुसार दिन गिन रहा था। अठारहवें दिन, भगवान विष्णु पुण्यकीर्ति ब्राह्मण के रूप में राजा दिवोदास के द्वार पर प्रकट हुए। राजा ने पुण्यकीर्ति का बड़े आदर से स्वागत किया और उनकी पूजा की।
राजा ने पुण्यकीर्ति से सुख प्राप्ति के उपाय पूछे। उन्होंने राजा के रूप में अपनी उपलब्धियों का उल्लेख किया। पुण्यकीर्ति ने राजा की प्रशंसा करते हुए कहा कि राजा ने केवल एक ही पाप किया था। उन्होंने भगवान शिव को काशी से दूर रखा था।
अतः राजा को शिवलिंग स्थापित करना पड़ा और पूरी श्रद्धा से उसकी पूजा करनी पड़ी। राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पुण्यकीर्ति को कई बार प्रणाम किया और उनकी सलाह मानने के लिए सहमत हो गए।भगवान विष्णु चले गए और काशी में स्थायी निवास के लिए एक स्थान की तलाश करने लगे। उन्होंने पंचानद में श्री आदि केशव के रूप में स्थायी निवास करने का निर्णय लिया।
मान्यता यह है कि यहां प्रथम कदम रखने के साथ ही पवित्र गंगा एवं वरुणा के संगम स्थल पर भगवान विष्णु ने स्नान किया इस लिये यह पदोदक तीर्थ के नाम से जाना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार यहां की प्रतिमा स्वयं भगवान विष्णु द्वारा बनाई गई है। काशी में कुल 16 केशव मंदिर माने जाते है जिनमें यह आदिकालिक एवं सबसे प्रमुख है। स्कंद पुराण के काशी खण्डउत्तरार्द्ध के अध्याय 8 के 50वें श्लोक में यहां की महत्ता बताते हुये वर्णित है
आदित्य केशव: पूज्य आदि केशव पूर्वतः।
तस्य संदर्शनादेव मुच्यते चोच्च पातकै:।।
काशी के पूर्व भाग में पूजनीय आदित्य केशव और आदि केशव विराजमान है केवल उनके श्रद्धापूर्वक दर्शनमात्र से ही मनुष्य बड़े से बड़े और भयंकर पापों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
ऐतहासिक स्रोतों के अनुसार ग्याहरवीं सदी में गहड़वाल वंश के राजाओं ने इए पादोदक तीर्थ पर आदि केशव मंदिर व घाट का निर्माण कराया था जिसे सन1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक और 1196 में सिराबुद्दीन ने मंदिर का ध्वंश कर दिया एवं घाट तोड़वा दिया। लगभग छ: सौ वर्षों के बाद सन 1807 में महाराज ग्वालियर सिंधिंया के दीवान माधोजी ने मंदिर का पुनर्निमाण करवाया। अपने काशी प्रवास के दौरान बंगाल की नेटोर की रानी भवानी ने आदिकेशव घाट का निर्माण करवाया परन्तु कुछ वर्षों बाद क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण ग्वालियर नरेश के दीवान नरसिंह राव शितोले ने घाट का पुनर्निर्माण करवाया। इस मंदिर का स्वतंत्रता आंदोलन से भी संबंध बताया जाता है। कहते है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के समय शहर की भीड़भाड़ से दूर एकान्त में स्थित होने के कारण क्रान्तिकारियों के लिये यह काफी सुरक्षित स्थान था जहां वे मिल कर अपनी योजना बनाते और रहते। गंगा वरूणा के संगम, स्थानीय सहयोग एवं चारों तरफ काफी घने जंगल, जलमार्ग से बंगाल से लेकर दिल्ली पंजाब तक पहुंचने की सुगमता से यह मंदिर उनके लिये काफी उपयोगी था। परन्तु बाद में मुखबीरी के कारण यह स्थान अंग्रेजों की निगाह में आ गया और अंग्रेजी सेना ने पुजारियों को निस्कासित कर मंदिर पर कब्जा कर लिया और उसमें पुलिस चौकी बना दिया। दो साल बाद पुजारियों को मंदिर में देवार्चन की अनुमति मिली जो आज तक निर्वाध रूप से जारी है।
प्रायः मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि भगवान विष्णु ने काशी के आनंद कानन परिक्षेत्र को छोड़ कर एक छोर पर बसे शहर के पूरबी सीमा पर किनारे स्थित वाराणसी के अंतिम बिन्दु बरूणा गंगा के संगम स्थल से ही नगर में क्यों प्रवेश किया। सबकी अपनी मान्यताएं अलगअलग हो सकती है पर मैं जब गंगा घाट पर खड़े हो कर उगते सूरज से प्रकाशित हो रहे आदिकेशव घाट व मंदिर को देखता हूँ तो महसूस होता है कि सूरज की प्रथम किरण मन के मोह (चाहे वह अपने सर्वप्रिय राजा देवोदास के प्रति ही क्यों न हो) के अंधकार को मिटाने के लिये पूरब क्षितिज से प्रकट हो ज्ञान का प्रकाश लिये दिन चढ़ने के साथ शहर व पाचिम की ओर बढ़ती है जहां जीवन के शेष सोपान आपस में जुड़ते हुये संपूर्णता अथवा शून्यता की और ले जाते हैं। अतीत से मुक्त हो भविष्य का स्वागत करने। मेरे एक परिचित कहते है कि मनुष्य के चारो आश्रम उसके शरीर में नित्य प्रचालित रहते है। वह प्रातः उठ कर अपने नियमित दिनचर्या, कार्य की तैयारी करता है जो वानप्रस्थ है पुन: अपने कर्मयोग में लग जाता है दिन भर का यह कार्य गृहस्य आश्रम है। सायं अपने कार्यों की समीक्षा करते हुये परिवार के साथ समय व्यतीत करना और अपने अनुभव साझा करना वानप्रस्थ है और रात्रि में समस्त चेतना को विश्राम देते हुये सो जाना सन्यास । मुझे लगता है स्थान भी अपने वृत्ति में समय के साथ चारो आश्रमों को जीता है। पूरब में सूर्य की किरणों के पश्चिम की ओर शहर में बढ़ने के साथ साथ हम गंगा के किनारे इन चारो आश्रम की परिसीमा देखते है। आदि केशव से ओकारखंड तक और ओंकार खंड में प्रवेश करते ही शहर के उत्तरी किनारे में वाणिज्यिक गतिविधियाँ दिखने लगती है और विश्वेश्वरखंड से केदार खण्ड की ओर बढ़ते हुये वानप्रस्थ गतिविधियां, मंदिर, योग, ध्यान, पूजा। केदार खण्ड से आगे चलने पर महाश्मशान हरिश्चद घाट की यात्रा मोक्ष व सन्यास से जुड़ जाती है। यह जीवन यात्रा गंगा के प्रवाह के विपरीत पूरब से पश्चिम की ओर समय के अनुरूप चलती है। काशी की यह अनुभूति नितान्त व्यक्तिगत है। स्वयं की जीवन यात्रा है। जिसे हर कोई अपने अपने विचार और दृष्टि से विश्लेषण करने को स्वतंत्र है पर इन मान्यताओं से सबसे ऊपर जो मान्यता है वह काशी के अध्यात्म महत्ता विचार मिथक और दृढ़ विश्वास की जिसमे काशीवासी को अटूट विश्वास है और इस दृढ़ संकल्प के साथ कि उसके भोलेबाबा और मां अन्नपूर्णा उसकी मान्यताओं का मान बनाये रखेगें।
("काशी: इतिहास से परे" श्रृंखला का वक्तव्य)
काशी,श्रावण शुक्ल चतुर्थी, सं02083 विक्रमी, रविवार, 16अगस्त2027
रविवार, 9 अगस्त 2026
मै अक्षर लिखूं तुम बनारस समझना....../ व्योमवार्ता
रविवार, 28 जून 2026
व्योमवार्ता /मीडिया ,आचार संहिता व जबाबदेही...
समाज जिसमे हम रहते हैं ........
आज हम विश्वसनीयता के प्रश्न पर सबसे महत्वपूर्ण दहलीज पर खड़े हैं। सत्य, असत्य, विश्वास अविश्वास, पक्षपात, निष्पक्षता, न्याय-अन्याय, रहस्य- बरकत जैसे कई गंभीर प्रश्नों के प्रश्न पर अब हमारा समाज खासकर मुड़कर सोचने को बाध्य है। तथ्यों को अपने हित में देखने और अपने लाभ के पाले में खड़े होन की इस संकुचित दृष्टिकोण ने विश्वसनीयता पर ही संकट और प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सूचना विस्फोट और इंटरनेट के प्रसार ने अब व्यक्ति से लेकर शासन-प्रशासन, न्याय व्यवस्था तक को अपने दायरे में समेट लिया है जिससे मीडिया भी अछूता नहीं रह गया है। हालांकि यह भी सत्य है कि मीडिया भी कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारियों का पूरी तरह पालन करने में चूक रही है। टीआरपी की दौड़, प्रसार संख्या बढ़ाने, विज्ञापन-वितरण लेने के इस अंधे खेल से बार-बार मीडिया के ऊपर गंभीर सवाल उठते हैं। यह सच है कि लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस का कोई विकल्प नहीं है। यह लोगों के स्वर और सूचना प्रदान करने हेतु विशेष माध्यम होने की अपरिहार्य शर्त है जो लोकतंत्र में सामूहिक राय बनाने में लोगों की मदद करती है।
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इस उद्देश्य को ही दृष्टिगत रख भारतीय प्रेस परिषद के समय-समय पर पत्रकारिता के आचरण के मानक संबंधी दिशानिर्देशिका प्रकाशित करती है जिसमें के पत्रकारिता के सिद्धांत और आचार संहिता से लेकर विभिन्न मुद्दों पर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। यदि इन दिशा-निर्देशों का उचित ढंग से पालन हो तो पत्रकारिता लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका को शत-प्रतिशत निभा सकेगी। पत्रकारों का दायित्व है कि वे सत्य की रिपोर्टिंग करें और अपनी जानकारी की सत्यता की पुष्टि करें। उन्हें अपनी खबरों पर गहन शोध एवं तथ्यों न की पुष्टि करने के बाद ही तथ्यों को अपने पाठकों, दर्शकों के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। साथ ही समाचार और राय के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए। गलत या क अधूरी जानकारी जनता को गुमराह करती है और में पत्रकारिता पर विश्वास कम करती है। आज डिजिटल युग के इस समय में निष्पक्ष एवं तथ्यपूर्ण रिपोर्टिंग बेहद जरूरी है ताकि पाठक और दर्शक स्वयं निर्णय ले सकें। पत्रकारों का कर्तव्य है कि वे राजनीतिक, आर्थिक या व्यावसायिकं दबावों सहित बाहरी प्रभावों से अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें ताकि वे अनुचित प्रभाव से मुक्त रहकर उन लोगों की आवाज बनें जिनकी कोई आवाज नहीं है। आज के मीडिया में कभी-कभी अपने टीआरपी बढ़ाने और सबसे पहले न्यूज ब्रेक करने की होड़ कभी-कभी सनसनीखेजता की सीमा तक चली जाती है। इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों ने भी अपने निर्णयों में मीडिया को आगाह किया है। और रिपोर्टिंग से उत्पन्न होने वाले संभावित नुकसान पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में पत्रकारों को आवश्यकता पड़ने पर अपने स्रोतों की गोपनीयता और पहचान गुप्त रखने का सम्मान करना चाहिए। सूचना जुटाते समय उन्हें अनुचित हस्तक्षेप या उत्पीड़न से बचना चाहिए और सूचना देने वालों या जोखिम में पड़े व्यक्तियों की पहचान को रक्षा दी जानी चाहिए।
पत्रकारिता समाज के विविध दृष्टिकोणों और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। पत्रकारों को सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए रूढ़ियों से बचना चाहिए और अपनी रिपोर्टिंग में समावेशिता के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके द्वारा उठाए गए आवाज में विभिन्न समुदायों और हितधारकों का प्रतिनिधित्व हो। एक महत्वपूर्ण पत्रकारों को अपने काम के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और आलोचना के लिए तैयार रहते हुए अपने तरीकों में सुधार जारी रखना चाहिए।
पत्रकारिता एवं मीडिया की भूमिका इसलिए भी ज्यादा जवाबदेह और महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे जनता को सूचित करने और स्वस्थ बहस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे निजता का सम्मान करते हुए जवाबदेही निभाएँ और लोकतंत्र को मजबूत करें। वे एक अधिक समावेशी और जिम्मेदार मीडिया परिदृश्य में योगदान देते हैं।
(हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30मई 2026 को व्यक्त विचार) प्रेमचंद पथ अप्रैल-जून 2026 अंक मे प्रकाशित https://chitravansh.blogspot.com
गुरुवार, 28 मई 2026
#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं......
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
देव दीपावली ( बनारस पर कविता -10)
बनारस के गंगा घाट पर
रात है पूर्णिमा की
पर आज चांद भी उतर आया है लजा कर
छिपा है कहीं दीयों के रोशनी के कोने में
उसे आज अपनी रोशनी व चमक फीकी लग रही
घाट पर झिलमिलाते दीपों की कतारों से
केवल देवता ही नही, असुर गंधर्व,ऋषि भी
देख देख के प्रमुदित हो रहे चमकते प्रकाश को
कही उलाहना भी है उनके मन में चांद के प्रति
और कही प्रताड़ना भी चांद से
देखो आज बनारस के घाटों पर कितने चांद उतरे है
तुम्हे भ्रम है कि तुम अकेले रोशनी बिखेरते हो
पर निर्विकार बैठे है काशी पुराधिपति शिव
अपने विश्वनाथ धाम में
हमेशा की तरह सुख दुख पाप पुण्य से परे
अपने नन्दी के साथ अलमस्त, निर्विचार
उनके लिये जैसे त्रिपुरासुर का वध
सामान्य सी घटना हो
और अपने पुराधिपति पार्वतेपति
शंकर की तरह अलमस्त निर्विकार भाव से
देव दीपावली के दिये जला रहा काशी
आदि केशव से अरसी तलक
अपने उल्लास से.......
काशी, देवदीपावली,25.11.2025
मंगलवार, 7 अप्रैल 2026
बनारस की सुबह (बनारस पर कविता -9)
रविवार, 29 मार्च 2026
बनारस पर कविता (8)
नये साल पर.........
कुछ तो है अलग सा
इस शहर में
तभी तो कहते है
अलमस्त निर्विकार, अव्यक्त काशी
कुछ तो है
जब पूरी दुनिया पश्चिमी रंग में
रंग कर उसके चमक ने खोयी है
तो यहां विश्वनाथ धाम में
तीन से चार लाख की भीड़ खड़ी है
नये साल की शुभेच्छाओं के लिये
और आभार कहने बीते वर्ष की.
कुछ तो है
जब शहर का पारा गिर रहा है
शिमला, कुल्लू और मनाली जैसे
ऐसे मे नंगे पांव खुले सिर
चलते बैठे और भक्ति भाव मे
डूबे है ढेरों लोग
गंगा घाट से मंदिरों तक
कुछ तो है
हिल्टन, ताज, जैसे सप्ततारांकित
होटल और रेस्टोरेंट के बजाय
ठेले पर घुंघनी, चाट के लिये
सड़क पर खड़े लोग
कुछ तो है
इस शहर मे जहां
गलियों में मंहगी सस्ती कारें नही आती
मोटर बाईक और बाकी दिखावा भी नही
कुछ तो है
एक ही गली के रमेन्द्र पांडे और रामचरन नाई
मिलते है घाट पर जजमानी प्रतिद्वन्दिता मे
तो जुम्मन मियां और तूफानी सिंह
चाय लड़ाते है कल्लू सरदार के यहां
पान जमा के देश की राजनीतिक अड़ी
तजबीजते है छेदी पनवाड़ी के ठीहे पर
असलम के अजान को सुन के
उठते है दुर्गा पंडित हाजिरी लगाने
भोले बाबा के दरबार में
कुछ तो है
जो यहाँ काल भी आकर ठिठक जाता है
मरण भी जहाँ मंगल है, और हर कंकड़ शंकर है
जहाँ उत्सवों का शोर नहीं, रूह का सुकून है
जहाँ नया साल कैलेंडर से नहीं
गंगा की पहली लहर और डमरू की गूँज से शुरू होता है।
तभी तो कहते हैं—
दुनिया बदलती होगी अपनी रफ़्तार से
मगर मेरी काशी तो आज भी
उसी शिव-धुनी में मगन है,
उसी अल्हड़पन में ज़िंदा है..…..
(काशी, 01जनवरी 2026 , गुरूवार)
On the New Year: There is Something...
There is something distinct
About this city,
That is why they call it—
Carefree, detached, and the unmanifested Kashi.
There is something...
When the whole world, drenched in Western hues,
Has lost itself in superficial glitter,
Here, at the Vishwanath Dham,
A crowd of hundreds of thousands stands tall,
To offer greetings for the new year
And gratitude for the one that passed.
There is something...
When the city’s mercury drops
Like that of Shimla, Kullu, or Manali,
Even then, bare-footed and heads uncovered,
Countless souls walk, sit, and immerse themselves
In pure devotion—
From the banks of the Ganga to the temple doors.
There is something...
Instead of the seven-starred luxury
Of Hiltons and Taj hotels,
People stand on the streets
For a plate of ghughni and chaat at a roadside stall.
There is something...
In this city where
Expensive or cheap cars cannot enter the narrow lanes,
Where motorcycles and worldly vanity find no place.
In the same alley, Ramendra Pandey and Ramcharan the barber
Meet at the ghat, competing in their ancestral trade,
While Jumman Miyan and Toofani Singh
Clink their tea glasses at Kallu Sardar’s shop.
With a paan in their mouths, they deliberate
Over national politics at Chedi Panwari’s corner.
Hearing Aslam’s call to prayer (Azaan),
Durga Pandit wakes up to mark his attendance
In the court of Lord Shiva (Bhole Baba).
There is something...
Where even Time comes to a standstill,
Where death is a celebration, and every pebble is Shiva.
Where the new year doesn't begin with a calendar,
But with the first ripple of the Ganga and the resonance of the Damru.
That is why they say—
The world may change at its own pace,
But my Kashi remains forever lost
In that same divine rhythm,
Living in its own eternal, carefree spirit.......
(Kashi, 01January 2026,Thursday)