यह भी सच है कि विकास और आधुनिकता की दौड़ में जब कोई प्राचीन शहर अपनी रफ्तार बदलता है, तो उसकी कीमत अक्सर उसकी आत्मा को चुकानी पड़ती है। आज हमारा बनारस इसी चौराहे पर खड़ा है। बीते वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने जो करवट ली है, उसने हम सभी को एक गंभीर आत्मचिंतन के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा।आज जब हम बनारस की गलियों, घाटों और चौराहों से गुजरते हैं, तो मन में एक गंभीर बेतैनी पैदा होती है। बीते बारह वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने विकास की जो करवट ली है, उसने हमारे मन मस्तिष्क में एक गंभीर वैचारिक द्वंद्व को जन्म दिया है। यह द्वंद्व है भौतिक विकास की चकाचौंध और सांस्कृतिक पहचान के बिखराव के बीच का द्वंद्व।
आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का कायाकल्प हुआ है। आर्थिक और भौतिक दृष्टि से शहर ने वह ऊंचाइयां छुई हैं, जिसकी कल्पना आज से बीस साल पहले असंभव था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का भौतिक कायाकल्प अभूतपूर्व रहा है। आर्थिक और ढांचागत पैमानों पर शहर ने वह छलांग लगाई है, जिसकी कल्पना दो दशक पहले अकल्पनीय थी। शहर के चारों तरफ बिछा रिंग रोड का जाल, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, और फुलवरिया फोरलेन जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं ने बनारस को जाम के पुराने अभिशाप से काफी हद तक मुक्ति दिलाई है। कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा देश का पहला अर्बन रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की अत्याधुनिक परिवहन तकनीक से जोड़ता है। इस बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण से पर्यटन उद्योग में अप्रत्याशित उछाल आया है। बनारस के होटलों, होम-स्टे, नौका-व्यवसाय और हस्तशिल्प उद्योग में पूंजी का प्रवाह बढ़ा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नई संजीवनी मिली है।शहर के चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, फुलवरिया फोरलेन जैसी परियोजनाएं—इन सबने शहर की रीढ़ माने जाने वाले यातायात को एक नई सुगमता दी है। कैंट से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की आधुनिक तकनीक से जोड़ता है।
काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप ने पूरी दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर खींचा है।भौतिक और आर्थिक पैमानों पर यह एक अत्यंत सफल और विकसित शहर की तस्वीर है। लेकिन, आज हमें इस चमक के पीछे छिपे उस अंधेरे और सन्नाटे पर भी बात करनी होगी, जो इस विकास की कीमत के रूप में हमारा यह शहर चुका रहा है।
इस भौतिक बदलाव का सबसे प्रखर और प्रतीकात्मक केंद्र काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लिये सदियों पुरानी, संकरी और घुमावदार, लेकिन इतिहास और आत्मीयता से जीवंत रहने वाली 'विश्वनाथ गली' को जब उजाड़ा गया, तो केवल कंक्रीट की इमारतें औरवईंट पत्थरों के मकान नही ढहाये गये, बल्कि उसके साथ काशी का वह पारंपरिक समाजशास्त्र भी जमींदोज़ हो गया जो पीढ़ियों से अक्षुण्ण था। उस गली की दुकानों का केवल व्यावसायिक महत्व नहीं था, वे दुकानदार और वहाँ से गुजरने वाले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख के गवाह थे।पहले इस गली का एक अपना चरित्र था। यहाँ की दुकानों पर पीढ़ियों का परिचय था। संकरी गलियों से गुजरते हुए महादेव के भक्त जिस आत्मीयता का अनुभव करते थे, वह इस नए, विशाल और पत्थरों से बने भव्य प्रांगण में कहीं खो गई है। बनारस के भोले बाबा महादेव का नही बल्कि श्री काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर तो बन गया, लेकिन इसके साथ ही वह पारम्परिक ताना-बाना भी बिखर गया जो काशी की असल धड़कन था। अब भोर की पहली किरण के साथ गंगा स्नान कर, लोटे में जल लिए"हर हरमादेव शंभो, काशी विश्वनाथ गंगे " की टेर लगाते हुये बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ने वाले वे पारम्परिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले) ढूंढने से भी नहीं मिलते। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और वीआईपी संस्कृति के बीच काशी के स्थानीय भक्तों का सहज जुड़ाव कहीं पीछे छूट गया है।
इसमें दो राय नहीं कि इस परियोजना ने बाबा के दरबार को एक वैश्विक भव्यता, स्वच्छता और विशालता प्रदान की है। लेकिन इस भव्यता को हासिल करने के लिए जो कीमत चुकाई गई, वह बनारस की आत्मा का एक हिस्सा थी। यह काशीवासी के लिये सबसे बड़ी और कचोटने वाली तब्दीली काशी के परंपरा के विस्थापन के रूप में दिखती है। बनारस की सुबह का एक स्थापित नियम था—भोर की पहली किरण के साथ गंगा में स्नान करना, तांबे के लोटे में गंगाजल, फूल और बेलपत्र लेकर नंगे पैर बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ जाना। यह दर्शन किसी वीआईपी पास या कतार प्रबंधन का मोहताज नहीं था, यह भक्त और भगवान के बीच का एक सहज, अनौपचारिक और दैनिक पारिवारिक संवाद था।बाबा के दरबार के ये पारंपरिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले स्थानीय लोग) इस शहर की आत्मा थे। आज वे नेमी इस वीआईपी संस्कृति, सुरक्षा के कड़े घेरों और पर्यटकों की असीम और अभूतपूर्व भीड़, सुरक्षा के कड़े चक्रव्यूहों और कॉर्पोरेट कतारों के बीच खुद को शापित और उपेक्षित महसूस करते हैं।
भव्यता का मलबे और आत्मीयता का विस्थापन के नींव पर दर्शन और आस्था के भौतिक और दृश्यमान बदलाव का यह जो नया 'इवेंट मैनेजमेंट' स्वरूप उभरा है, उसने बनारस के मूल आध्यात्मिक एकांत को एक कोलाहलपूर्ण पर्यटन केंद्र में बदल दिया है। आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ की लहरों पर संगीत गूंज रहा है, और रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच 'सुबह-ए-बनारस' का वह पारंपरिक, आध्यात्मिक सन्नाटा कहीं खो गया है, जहाँ बैठकर कभी कबीर ने रूढ़ियों पर प्रहार किया था, तुलसीदास ने रामचरितमानस की चौपाइयाँ रची थीं और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने गंगा की लहरों को अपने शहनाई के सुर सौंपे थे , रत्नाकर ने अपनी लाविनी के साथ गंगालहरी गाते हुये गंगा मे स्वयं को तिरोहित कर दिया था। शंकराचार्य ने डोम के रूप मे शिव का साक्षात कर शिवोहम् शिवोहम का अस्तित्व स्वीकार किया। आज का बनारस 'हेरिटेज टूरिज्म' के शोरूम में सजे किसी महंगे शो-पीस जैसा होने लगा है, जिसे पर्यटक दूर से देख तो सकते हैं, पर उसके भीतर की तरलता को महसूस नहीं कर पाते। बाज़ारीकरण के दबाव के चलते जो दर्शन कभी एक सहज, आत्मीय और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था, वह अब एक 'इवेंट' (आयोजन) बन चुका है। आस्था का यह बाज़ारीकरण बनारस के मूल धार्मिक चरित्र पर एक गहरी चोट है।आजकल यह नया शब्द बहुत चलन में है—'हेरिटेज टूरिज्म' या 'सांस्कृतिक पर्यटन'। बनारस इसका सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि संस्कृति को 'बेचना' और संस्कृति को 'जीना'—दो अलग-अलग बातें हैं।
आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ चल रहे हैं, रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच घाटों की वह पारंपरिक शांति, सुबह-ए-बनारस का वह आध्यात्मिक एकांत, जहाँ बैठकर कभी कबीर, तुलसी और बिस्मिल्लाह खान ने अपनी साधना की थी, वह शोरूम की खिड़की में सजे किसी शो-पीस जैसा हो गया है। पर्यटक यहाँ 'बनारसियत' को देखने आ रहे हैं, लेकिन उन्हें जो परोसा जा रहा है, वह असली बनारस नहीं बल्कि उसका एक चमक-दमक वाला 'वर्शन' (संस्करण) है।
मूल बनारसी जो घाट पर घंटों बैठकर गंगा की लहरों को निहारते हुए जीवन के परम सत्य को पा लेता था, वह अब इस भीड़ और कमर्शियलाइजेशन (व्यावसायिकता) के कारण घाटों से दूर होता जा रहा है।
बनारस सिर्फ आलीशान इमारतों और चौड़ी सड़कों का नाम नहीं है; यह एक मिजाज है, एक जीने का सलीका है।बनारस की असली पहचान उसकी वास्तुकला से ज्यादा उसकी सामाजिक जीवनशैली में निहित थी। यहाँ की 'अल्मस्ती', 'फक्कड़पन' और 'मौज' दुनिया के किसी भी आधुनिक शहर के लिए एक पहेली जैसी थी। आज, शहर के बाहरी इलाकों से लेकर मुख्य भूभाग तक खड़ी हो रही बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली ऊंची इमारतें इस पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को निगल रही हैं। बनारस के पुराने मोहल्लों मे मंदिर, घर के बाहर का चौतरा केवल बैठने की जगह नहीं था, वह एक खुली संसद था। चबूतरा' केवल एक स्थापत्य (Architecture) नहीं था, वह एक खुली लोकतांत्रिक संसद था। वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर वर्ग—चाहे वह प्रोफेसर हो, सरकारी कर्मचारी हो, बुनकर हो या कोई आम रिक्शा चालक—बिना किसी औपचारिक झिझक के एक साथ बैठता था।वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर तबका बिना किसी भेदभाव ऊंचनीच के बैठता था।मोहल्ले के शास्त्री जी सुबह सुबह गंगा स्नान कर बाबा का दर्शन कर वहीं बैठते थे तो मुन्सीपाल्टी (म्यूनिसिपल बोर्ड) से मोहल्ले मे रोजाना झाड़ू मारने वाला स्वीपर भी। कंधे पर गमछा लपेटे, हाथ में सुरती (खैनी) मलते, बतकही करते हुये उंगली से सुंघनी मलते 'गप्पाजी' की मुद्रा में बैठे मोहल्ले से लेकर ब्रह्मांड का चिंतन करने वाले बनारसी वहाँ देश-दुनिया, राजनीति, धर्म और दर्शन समसामयिक राजनीति, धर्म, साहित्य और दर्शन पर ऐसी बेबाक और अचूक टिप्पणियाँ करते थे, जो बड़े-बड़े विचारकों और थिंक-टैंकों को हैरान कर दें। वह संवाद निश्छल था, उसमें कोई व्यावसायिक स्वार्थ नहीं था।यह 'गप्पाजी' और बतकही अपने आप मे एक मजबूत सूचना नेटवर्क था जो हर घर परिवार के सुख दुख हालचाल स्वास्थ्य समृद्धि लेन देन का प्लेटफार्म था। यह चबूतरा व्यवस्था पूरे मोहल्ले का संवाद तंत्र था। वहां अल्हड़पन, अकारण मुस्कुराहट और घाटों-गलियों में 'सुख' की तलाश होती थी।आज इन चबूतरों की जगह बहुमंजिला इमारतों की ऊंची, बंद दीवारों और लिफ्ट संस्कृति और बंद दरवाजों वाले एकांतवास ने ले ली है। आधुनिक अपार्टमेंटों ने लोगों को भौतिक रूप से पास पास तो ला दिया है, लेकिन उनके बीच की मानसिक और सामाजिक दूरियों को अनंत काल तक बढ़ा दिया है। अब मोहल्लों में वह सामूहिक ठहाका और अकारण मुस्कुराने की प्रवृत्ति गायब हो रही है। आज अपार्टमेंट की लिफ्ट संस्कृति ने उस जीवंत संवाद को समाप्त कर दिया है। अब चबूतरों पर वह सामूहिक ठहाका नहीं सुनाई देता। आधुनिक जीवन की आपाधापी, कॉरपोरेट नौकरियों के दबाव और ईएमआई (EMI) के तनाव ने बनारसी मिजाज की उस बेफिक्री को सोख लिया है, जो कभी इस शहर का ट्रेडमार्क हुआ करती थी।
बीते बारह वर्षों में काशी ने अभूतपूर्व आर्थिक और भौतिक विकास देखा है। चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का जाल, फुलवरिया फोरलेन, और आसमान को छूने को बेताब रोपवे जैसी आधुनिक यातायात सुविधाओं ने शहर की रफ्तार बढ़ा दी है। ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट वाली इमारतों ने बनारस के क्षितिज (स्काईलाइन) को बदल दिया है। लेकिन, इस कंक्रीट के चमकते जंगल के पीछे बनारस की वह सदियों पुरानी पहचान कहीं खो गई है, जिसे हम गर्व से 'बनारसियत' कहते थे।
लेकिन, अर्थशास्त्र के स्थापित नियम जहाँ तरक्की का जश्न मना रहे हैं, वहीं समाजशास्त्र और संस्कृति के मोर्चे पर एक बड़ा शून्य उभर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि भूगोल के इस तीव्र विस्तार में क्या हमारा इतिहास संकुचित नहीं हो रहा है? चौड़ी होती सड़कों के समानांतर क्या हमारे दिलों और सामाजिक संवाद की संकरी गलियां और संकुचित नहीं होती जा रही हैं? विकास का यह पहला कॉलम जितना चमकदार है, इसकी कीमत उतनी ही गंभीर है। यह सच है कि बुनियादी ढांचे के विकास से रोजगार बढ़ा है, पर्यटन को पंख लगे हैं और यातायात सुगम हुआ है। लेकिन क्या भौतिक समृद्धि के बदले अपनी सांस्कृतिक विरासत और आत्मीयता को खो देना सही है? आज का बनारस पर्यटकों के लिए तो आकर्षक हो गया है, पर मूल बनारसियों के लिए थोड़ा अजनबी सा होने लगा है।
हमारा उद्देश्य विकास का विरोध करना कतई नहीं है। सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, यातायात सुगम होना चाहिए, स्वास्थ्य और शिक्षा की आधुनिक सुविधाएं हर नागरिक को मिलनी चाहिए। यह समय की मांग है और इस प्रगति का स्वागत होना ही चाहिए।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी पहचान की कीमत पर ही होना चाहिए? क्या हम ऐसा आधुनिक शहर नहीं बना सकते जो अपनी जड़ों से भी जुड़ा रहे?
यूरोपीय देशों ने अपने प्राचीन शहरों (जैसे रोम, वेनिस या क्योटो) के ऐतिहासिक और पारंपरिक स्वरूप से बिना कोई छेड़छाड़ किए, उन्हें आधुनिक सुविधाओं से लैस किया है। उन्होंने अपनी पुरानी बसावट, गलियों और सामाजिक चरित्र को संरक्षित रखते हुए शहर के बाहर नया विकास किया।बनारस के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन' की आवश्यकता थी और आज भी है।यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, शानदार गाड़ियाँ होंगी, आलीशान अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी मिजाज, वह 'साझा संस्कृति', वह 'अल्हड़पन' और 'अपसंस्कृति से दूर रहने की फक्कड़ता' नहीं होगी, तो यकीन मानिए, वे एक बहुत अमीर शहर में तो रहेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे।
इस शहर को आधुनिक विकास की गति देने वाले नीति-नियंताओं तक यह आवाज पहुंचनी जरूरी है कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' जरूर बनाइये, लेकिन इसकी 'बनारसियत' की बलि चढ़ाकर नहीं। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के अनुभव और साधना से उपजी संस्कृतियां अगर एक बार मर गईं, तो उन्हें दोबारा जीवित करना असंभव होगा।बनारस की आत्मा को बचाना ही इस शहर के अस्तित्व को बचाना है।विकास जरूरी है, समय के साथ चलना भी अनिवार्य है। परंतु, यदि विकास की इस आंधी में काशी की अल्मस्ती, बनारसी पान की मिठास, घाटों की शांति और अपनों के बीच की वह 'गपशप' ही गायब हो जाएगी, तो यह शहर सिर्फ एक ढांचा बनकर रह जाएगा। हमें यह समझना होगा कि बनारस की ताकत इसके कंक्रीट में नहीं, इसकी 'बनारसियत' में है। यदि हम इसे नहीं बचा पाए, तो आने वाली पीढ़ियां एक समृद्ध शहर तो पाएंगी, लेकिन वह 'जीती-जागती काशी' खो चुकी होंगी।
यह सही है कि आज की आधुनिक जरूरत के लिहाज से सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, सीवेज सिस्टम आधुनिक होना चाहिए, रोपवे और हवाईअड्डे बनने चाहिए, क्योंकि यह समय की मांग है और नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के लिए आवश्यक है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान की बलि देकर ही संभव है? दुनिया के कई प्राचीन देशों (जैसे इटली का रोम, वेनिस या जापान का क्योटो) ने अपनी प्राचीन बसावट, संकरी गलियों और सामाजिक चरित्र को बिना छुए, शहर के बाहर नए उपनगरों का विकास किया और अपनी प्राचीन कोर-सिटी को एक जीवित संग्रहालय के रूप में संरक्षित रखा। काशी के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन और सतत विकास' (Sustainable Development) की आवश्यकता थी।
यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, आलीशान गाड़ियाँ और अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी आत्मीयता, वह साझा संस्कृति और बेफिक्री का अल्हड़पन नहीं होगा, तो वे एक समृद्ध शहर में तो सांस लेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे। नीति-नियंताओं और प्रबुद्ध समाज को यह सोचना होगा कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' बनाते-बनाते हम इसके 'बनारसियत' के प्राण न हर लें। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे और सड़कें कुछ महीनों में दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के साझा सांस्कृतिक अनुभवों से उपजी जीवनशैलियां अगर एक बार विलुप्त हो गईं, तो उन्हें किसी भी तकनीक से दोबारा जीवित करना असंभव होगा।
https://chitravansh.blogspot.com
काशी,कृष्ण पक्ष द्वितीया, भाद्र, संवत2083वि0
रविवार, 30 अगस्त 2026