रविवार, 8 जुलाई 2018

व्योमवार्ता / कैप्टन विक्रम बत्रा का बलिदान दिवस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

कैप्टन विक्रम वर्मा का बलिदान  दिवस /व्योमवार्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,  07जुलाई 2018,
             मैं या तो जीत का भारतीय तिरंगा लहराकर लौटूँगा या उसमें लिपटा हुआ आऊँगा, पर इतना निश्चित है कि मैं आऊँगा जरूर।'
       कैप्टन बत्रा ने अपने साथी को यह कहकर किनारे धकेल दिया कि तुम्हें अपने परिवार की देखभाल करनी है और अपने सीने पर गोलियाँ झेल गए।
कैप्टन बत्रा आज ही के दिन अर्थात 7 जुलाई, 1999 को कारगिल युद्ध में अपने देश के लिए लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। बेहद कठिन चुनौतियों और दुर्गम इलाके के बावजूद, विक्रम ने असाधारण व्यक्तिगत वीरता तथा नेतृत्व का परिचय देते हुए पॉइंट 5140 और 4875 पर फिर से कब्जा जमाया।
हिमालय की बर्फीली चोटियों पर लड़ी गयी दहकती कारगिल जंग के नामी योद्धा और आज राष्ट्रभक्त युवाओं के हीरो बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा का आज अर्थात 7 जुलाई को बलिदान दिवस है।
इस परमवीर का जन्म 9 सितंबर 1974 को देवभूमि हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। कारगिल विजय के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा की जांबाजी के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे। हम सभी देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले उस हीरो की जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं को जानना चाहते हैं। 1997 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से नौकरी की कॉल आई लेकिन उन्होंने यह नौकरी छोड़ लेफ्टिनेंट की नौकरी को चुना। पालमपुर में जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म दिया। उन्होंने दोनों का नाम लव-कुश रखा. लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल।
विक्रम का एडमिशन पहले डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में करवाया। पर सेना छावनी में स्कूल होने से सेना के अनुशासन को देख और पिता से देश प्रेम की कहानियां सुनने पर विक्रम में स्कूल के समय से ही देश प्रेम जाग उठा। विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। जुलाई, 1996 में उन्होंने भारतीय सेना अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। दिसंबर 1997 में शिक्षा समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली।
उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। 1 जून, 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को कैप्टन बना दिया गया।
इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून, 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। कारगिल वॉर में 13 जेएके राइफल्‍स के ऑफिसर कैप्‍टन विक्रम बत्रा के साथियों की मानें तो कैप्‍टन बत्रा युद्ध मैदान में रणनीति का एक ऐसा योद्धा था जो अपने दुश्‍मनों को अपनी चाल से मात दे सकता था। यह कैप्‍टन बत्रा की अगुवाई में उनकी डेल्‍टा कंपनी ने कारगिल वॉर के समय प्‍वाइंट 5140, प्‍वाइंट 4750 और प्‍वाइंट 4875 को दुश्‍मन के कब्‍जे से छुड़ाने में अहम भूमिका अदा की थी।
बत्रा 7 जुलाई 1999 को इस मिशन के शुरुआती घंटों में दुश्मन के जवाबी हमले के दौरान घायल हुए एक अधिकारी को बचाने के प्रयास में भारतीय सेना की एक टुकड़ी का कमान संभाले हुए थे।
ऐसा कहा जाता है कि इस बचाव कार्य के दौरान उन्होंने घायल अधिकारी को सुरक्षित पोज़िशन पर धकेलते हुए यह कहा था कि "तुम्हारे बच्चे हैं, तुम एक तरफ हट जाओ"। कैप्टन बत्रा को अपने मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए तो जाना ही जाता है। साथ ही युद्ध के दौरान उनके द्वारा दिया गया नारा "ये दिल मांगे मोर" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 19 जून, 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने दुश्मन के नाक के नीचे से 5140 प्वाइंट पर क़ब्ज़ा कायम करने में सफल हुई थी। 5140 प्वाइंट पर क़ब्ज़ा करने के बाद कैप्टन बत्रा ने स्वेच्छा से अगले मिशन के रूप में 4875 प्वाइंट पर भी क़ब्ज़ा करने निर्णय लिया था।
यह प्वाइंट समुद्र स्तर से 17,000 फुट की उँचाई पर और 80 डिग्री सीधी खड़ी चोटी पर है। आज ही के दिन अर्थात सात जुलाई 1999 को प्‍वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्‍मनों को कैप्‍टन बत्रा ने मार गिराया लेकिन इसके साथ ही तड़के अपने घायल साथियों को इलाज़ के लिए ले जाते समय दुश्मन की एक गोली इस वीर को लगी और ये सदा सदा के लिए अमर हो गये ..बलिदान के उपरान्त इन्हें योद्धा के सर्वोच्च मेडल परमवीर चक्र दिया गया।
आज शौर्य की उस महान हुंकार को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन करते हुए भारतीय सेना के इस परमवीर की गौरवगाथा को सदा सदा के लिए गाते रहने का संकल्प कृतज्ञ राष्ट्र  लेता है।
      विक्रम बत्रा अमर रहें .. जय हिन्द की सेना।
(बनारस, 07जुलाई,2018, रविवार)
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रविवार, 1 जुलाई 2018

व्योमवार्ता /तू बन जा गली बनारस की....:व्योमेश चित्रवंश की डायरी

तू बन जा गली बनारस की..../ व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 जून 2018

आपने बनारस की गलियों के बारे मे बहुत सुना होगा, पर इन गलियों मे रहने का आनन्द वहीं जान सकता है जो इनमे सुबह शाम डोलने का आदी हो, तभी तो कहा गया है कि तू बन जा गली बनारस की मै सुबह शाम डोलू तुझमें,यह एक सूफियाना अंदाज ही नही बनारस का भूगोल भी है, इतिहास भी और बनारस का आध्यात्म भी।  आज बनारस की कुछ मशहूर गलियों से रूबरू होते हैं..

1. विश्वनाथ गली
काशी नगरी के हृदय में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर स्थित है। इस मंदिर के प्रांगण में स्वयं भगवान शंकर ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ऐसी मान्यता है कि विश्वनाथ जी के दर्शन से सभी द्वाद्वश ज्योर्तिलिंगों के दर्शन का फल मिलता है। विश्वनाथ जी के नाम पर ही इस गली का नाम विश्वनाथ गली पड़ा। यह काशी की सबसे प्रसिद्ध गली है। यह गली, ज्ञानवापी, चौक से शुरू होकर विश्वनाथ मंदिर होते हुये दशाश्वमेध घाट तक जाती है। विश्वनाथ गली व्यावसायिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस गली में कपड़े, श्रृंगार के सामान तथा लकड़ी के बने खिलौने मिलते हैं जो पूरे भारत वर्ष में प्रसिद्ध हैं।

2. कचौड़ी गली-
यह गली विश्वनाथ गली के ठीक पीछे स्थित है। इस गली की विशेषता यह है कि यहाँ पर स्थित अधिकांश दुकानें कचौड़ी की हैं। इसी कारण गली का नाम कचौड़ी गली पड़ा। यहाँ दुकानें सुबह से ही खुल जाती हैं तथा बारह बजे रात तक खुली रहती हैं। दुकानदारों में ऐसी मान्यता है कि उनके दुकानों पर भगवान शिव के गण स्वयं कचौड़ी तथा मिठाई खाने आते हैं। यहाँ पर कचौड़ी खाने वालों की भीड़ सुबह सात बजे से शुरू हो जाती है जो कि रात तक जारी रहती है। यह गली भी विश्वनाथ गली की ही तरह घाट के पास निकलती है। इस गली में कचौड़ी के अलावा पौराणिक किताबों, ग्रन्थों तथा बही खातों की दुकानें भी हैं।

3. खोवा गली-
जैसा की नाम से ही प्रतीत हो रहा है कि “खोवा गली” अर्थात् इस गली में खोवा की बहुत बड़ी मण्डी लगती है। खोवा की इतनी बड़ी मण्डी शायद ही भारत के किसी शहर में लगती हो। इसी कारण से इस गली का नाम खोवा गली पड़ गया।

4. ठठेरी (बाजार) गली-
यह गली चौक क्षेत्र में स्थित है। इस गली में पहले ठठेरा लोग रहते थे जो बर्तन इत्यादि का निर्माण किया करते थे। आज भी इस गली में पीतल के बर्तन बनते और बिकते हैं। पीतल के बर्तन व उससे बने सामानों का सबसे बड़ा बाजार इस गली में है। गली में अन्दर जाकर भारत के युग निर्माता तथा प्रसिद्ध कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का निवास तथा उससे कुछ दूरी पर अग्रसेन महाजनी पाठशाला है।

5. दालमण्डी गली-
यह गली काशी के दो महत्वपूर्ण बाजार चौक तथा नई सड़क को आपस में जोड़ती है। इस गली में कपड़े-जूते-चप्पल तथा इलेक्ट्रानिक्स की दुकानें तथा श्रृंगार की वस्तुएँ थोक में मिलती हैं। राजाओं-महाराजाओं के समय में इस गली में नृत्यांगनायें रहा करती थीं जिनके यहाँ नृत्य, संगीत का आनन्द लेने के लिये नगर के धन्ना सेठ जाया करते थे। लखनऊ की प्रसिद्ध नृत्यांगना उमराव-जान लखनऊ छोड़कर दालमण्डी में बस गयीं थीं, उनका अन्तिम समय यहीं व्यतीत हुआ। काशी में ही उनकी कब्र आज भी स्थित है।

6. नारियल (बाजार) गली-
यह गली चौक थाना के ठीक पीछे है जो दालमण्डी गली में आकर मिलती है। इस गली में नारियल, विवाह से सम्बन्धित सामान बिकते हैं। नारियल की बड़ी मण्डी होने के कारण इस गली का नाम नारियल बाजार पड़ा।

7. घुंघरानी गली-
यह गली दालमण्डी से निकली है तथा दालमण्डी और काशी के मुख्य बाजार बाँसफाटक को आपस में जोड़ती है। इस गली में भी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानें हैं।

8. गोविन्दपुरा गली-
यह गली चौक क्षेत्र में है तथा चौक मजार से पहले अवस्थित है। इसमें सोने-चाँदी के आभूषण, रत्न इत्यादि की दुकानें हैं। यह गली चौक, नारियल बाजार, रेशम कटरा को आपस में जोड़ती है।

9. रेशम कटरा गली-
यह गली गोविन्दपुरा गली की मुख्य शाखा है। इसमें भी सोने-चाँदी के आभूषण की दुकाने हैं। यहाँ सोने-चाँदी के आभूषणों का निर्माण किया जाता है।

10. विन्ध्यवासिनी गली-
इस गली को विन्ध्याचल की गली भी कहा जाता है। इस गली में विन्ध्याचल माता का मंदिर है जो मिर्जापुर में स्थित विन्ध्याचल मंदिर की प्रतिमा का प्रतिरूप है। इस कारण मंदिर को विन्ध्वासिनी मंदिर कहा जाता है जिसके नाम पर इस गली का नाम विन्ध्यवासिनी गली पड़ा। यह गली काशीपुरा क्षेत्र से शुरू होती है तथा रेशम कटरा में जाकर मिलती है।

11. कालभैरव गली-
यह गली विश्वेश्वरगंज क्षेत्र में है। यह भैरोनाथ चौराहा से आरम्भ होकर कालभैरव मंदिर तक फैली है। कालभैरव जी काशी के कोतवाल हैं जो भगवान शंकर के प्रधान सेनापति हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी में कोई व्यक्ति तभी निवास कर सकता है जब कालभैरव जी की अनुमति मिलती है। कालभैरव जी के नाम पर इस गली का नाम कालभैरव गली पड़ा। यहाँ स्थित मोहल्ले का नाम भैरवनाथ है।

12. भूतही इमिली की गली- यह गली मैदागिनी क्षेत्र में स्थित टाउनहाल मैदान के पीछे है। यह मालवीय मार्केट से आरम्भ होकर भैरोनाथ क्षेत्र तक जाती है। कहा जाता है कि इस गली में इमली का पेड़ था जिस पर भूत तथा चुड़ैल निवास करती थी जिसकी वजह से लोग इधर से गुजरने में डरते थे। परन्तु अब ऐसी कोई बात नहीं है। किन्तु पहले जो नाम था वही आज भी है।

13. सप्तसागर गली-
यह गली मैदागिन क्षेत्र में है तथा टाउनहाल मैदान के गेट के ठीक सामने से शुरू होती है तथा नखास की ओर निकलती है। इस गली में पूर्वांचल की सबसे बड़ी दवा मण्डी है।

14. आसभैरव गली-
यह गली नीचीबाग क्षेत्र में है। आस-भैरव के मन्दिर के नाम पर इस गली का नाम आसभैरव गली पड़ा। इस गली में सिक्खों का पवित्र गुरुद्वारा स्थित है।

15. कर्णघंटा गली-
यह गली कर्णघंटा क्षेत्र में पड़ती है। कर्णघंटा से शुरू होकर रेशम कटरा तक जाती है। यहीं पर विन्ध्यवासिनी गली भी आकर मिलती है। कर्णघंटा क्षेत्र में छपाई व कागज सम्बन्धित सभी सामानों का बहुत बड़ा मार्केट है।

16. गोला दीनानाथ गली-
गोला दीनानाथ गली में पूर्वांचल की सबसे बड़ी मसाले की मण्डी है। यह कबीरचौरा क्षेत्र में स्थित है। इस मण्डी में भगवान दीनानाथ का मन्दिर होने से इसका नाम गोला दीनानाथ पड़ा तथा इस मण्डी में आने वाली सभी गलियों को गोला दीनानाथ की गली के नाम से जाना जाता है। इस मण्डी के चारों तरफ गलियाँ हैं।

17. गोपाल मंदिर की गली-
यह गली बुलानाला क्षेत्र से प्रारम्भ होकर गोपाल मंदिर तक जाती है। इस मन्दिर में गोपाल जी की अष्टधातु निर्मित प्रतिमा है। ऐसी मान्यता है कि इस प्रतिमा की पूजा महारानी कुन्ती करती थीं। यह प्रतिमा महारानी कुन्ती द्वारा स्थापित की गई है। जन्माष्टमी के समय इस मन्दिर तथा गली को दुल्हन की भाँति सजाया जाता है।

18. पत्थर गली-
काशी में पत्थर की गली दो क्षेत्र में है। एक जतनबर की पत्थर गली तथा दूसरी चौक क्षेत्र की पत्थर गली। चौक क्षेत्र की पत्थर गली में सभी मकान पत्थर के थे, इसलिये उसका नाम पत्थर गली पड़ा तथा जतनबर की पत्थर गली में पत्थर का गेट बना था जिसके कारण उसका नाम पत्थर गली पड़ा। अब पत्थर का गेट नहीं है।

19. हनुमान गली-
यह गली हनुमान घाट से प्रारम्भ होकर अस्सी तथा गोदौलिया मार्ग को आपस में जोड़ती है। हनुमान घाट के निर्माण के साथ ही इस गली का निर्माण हुआ। हनुमान घाट के नाम पर गली का नाम हनुमान गली पड़ा।

20. तुलसी गली-
यह गली अस्सी क्षेत्र में पड़ती है। गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर इस गली का नाम तुलसी गली पड़ा। गोस्वामी तुलसीदास जी की मृत्यु इसी गली में हुई थी।

21. गुदड़ी गली-
इस गली में “बड़ा गुदड़ जी” तथा “छोटा गूदड़ जी” के नाम के दो प्रसिद्ध अखाड़े थे। इनका निर्माण अट्टारहवीं शताब्दीं में हा था। ये अखाड़े आज भी वहाँ पर अवस्थित है। इन्हीं अखाड़ों के नाम पर ही इसका नाम गुदड़ी गली पड़ा। यह गली तुलसी गली से ही निकली है।

22. शिवाला गली-
यह गली शिवाला घाट से आरम्भ होती है तथा शिवाला घाट को मुख्य मार्ग से जोड़ती है। शिवाला घाट के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम शिवाला पड़ गया तथा इस गली का नाम शिवाला गली पड़ा।

23. खिड़की गली-
यह गली खिड़की घाट से प्रारम्भ होती है। खिड़की घाट का निर्माण बैजनाथ मिश्र ने करवाया था। यह घाट लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। अतः गली भी उतनी ही पुरानी है।

24. जुआड़ी गली-
ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध जुआड़ी नन्द दास ने जुए की एक दिन की कमाई से इसे बनवाया था। इसलिये इस गली का नाम जुआड़ी गली पड़ा। यह गली अब विलुप्त हो चुकी है।

25. ढुंढीराज गली-
यह गली चौक क्षेत्र के ज्ञानवापी से आरम्भ होती है तथा दण्डपाणि भैरव मन्दिर तक जाती है। इस गली में गणेश जी का मन्दिर है जो गणनाथ विनायक के नाम से जाने जाते है।

26. संकठा गली-
यह गली संकठा घाट से आरम्भ होती है। गली में संकठा देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है जिसका निर्माण गोहनाबाई ने करवाया था। संकठा देवी नाम पर ही गली का नाम संकठा गली पड़ा तथा घाट का नाम संकठा घाट पड़ा। संकठा देवी के मन्दिर के बगल में ही कात्यायनी देवी का भी मन्दिर है। यह गली विश्वनाथ गली से आकर मिलती है।

27. पशुपतेश्वर गली-
यह गली चौक क्षेत्र से आरम्भ होकर रामघाट तक जाती है। इस गली में पशुपतेश्वर महादेव का मन्दिर है। उन्हीं के नाम पर इस गली का नाम पशुपतेश्वर गली पड़ा।

28. पंचगंगा गली-
पंचगंगा घाट के नाम पर इस गली का नाम पंचगंगा गली पड़ा। ऐसी मान्यता है कि पंचगंगा घाट पर पाँच नदियों का संगम होता है। गंगा, जमुना, सरस्वती के अलावा दो नदियाँ “सुकिरणा” जो भगवान सूर्य की प्रतिमा से निकलती है तथा “धूतपापा” जो घाट पर ही जमीन से निकली है। पाँच नदियों के संगम के कारण इस घाट का नाम पंचगंगा घाट पड़ा। ऐसा पुराणों में वर्णित है कि स्वयं तीर्थराज प्रयाग गंगा दशहरा के दिन अपने पाप धोने इसी घाट पर आते हैं। यही गली पंचगंगा घाट से आरम्भ होकर ब्रह्माघाट, दुर्गाघाट, राजमन्दिर, गायघाट, त्रिलोचन घाट, प्रहलाद घाट की गलियों को आपस में जोड़ती है। यह गली बहुत बड़ी तथा प्रसिद्ध है।

29. चौरस्ता गली-
यह गली गायघाट से प्रारम्भ होती है और त्रिलोचन घाट, तेलियानाला होते हुये चौखम्भा तक जाती है। चौखम्भा में बीबी हटिया की पतली गली में मिलती है।

30. नेपाली गली-
सुप्रसिद्ध नेपाली मन्दिर के नाम पर ही इस गली का नाम नेपाली गली पड़ा। यह विश्वनाथ गली तथा ललिता घाट को आपस में जोड़ती है। नेपाली मन्दिर के नाम पर ही इस मोहल्ले का नाम नेपाली खपड़ा पड़ा।

31. सिद्धमाता गली-
यह गली मैदागिन क्षेत्र के गोलघर में स्थित है। यह गोलघर को बुलानाला मुख्य मार्ग से जोड़ती है। इस गली में सिद्धमाता देवी का मन्दिर है।

32. कामेश्वर महादेव गली-
यह गली मच्छोदरी पर बिड़ला हॉस्पिटल के सामने से प्रारम्भ होती है जो कामेश्वर महादेव मन्दिर तक जाती है।

33. त्रिलोचन महादेव गली-
यह गली गायघाट से प्रारम्भ होकर त्रिलोचन महादेव मन्दिर तक जाती है तथा कामेश्वर महादेव गली से आपस में मिलती है।

34. पाटन दरवाजा गली-
यह गली गायघाट से शुरू होकर बद्री नारायण घाट तक जाती है।

35. भार्गव भूषण प्रेस वाली गली-
मच्छोदरी स्थित भार्गव भूषण प्रेस को मच्छोदरी मुख्य मार्ग से जोड़ती है। इसलिए इस गली को भार्गव भूषण प्रेस वाली गली कहते हैं।

36. लट्ट गली-
यह गली जतनबर में स्थित है तथा गणेश गली को आपस में जोड़ती है।

37. नइचाबेन गली-
यह गली कोयला बाजार से प्रारम्भ होकर बहेलिया टोला तक जाती है।

38. नचनी कुआँ गली-
यह गली भी कोयला बाजार से प्रारम्भ होकर भदऊ चुँगी तक जाती है।

39. चित्रघंटा गली-
यह गली चौक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर रानी कुआँ तक जाती है तथा इस गली में चित्रघंटा माता का मन्दिर स्थित है।

40. गढ़वासी टोला गली-
यह गली चौखम्भा से प्रारम्भ होकर संकठा की गली में जाकर मिलती है।

41. भारद्वाजी टोला गली-
यह गली प्रहलाद घाट से प्रारम्भ होकर भदऊ चुँगी तक जाती है।

42. हाथी गली-
यह गली बीबी हटिया की गली से प्रारम्भ होकर दादुल चौक होते हुए ब्रह्मा घाट तक जाती है।

43. कातरा गली-
यह गली राजमन्दिर क्षेत्र में पड़ती है। यह अत्यन्त छोटी गली है इस गली में केवल 4 से 5 मकान ही पड़ते हैं। यह गली एक तरफ से बन्द है।

44. चौखम्भा गली-
यह गली चौखम्भा क्षेत्र से शुरू होकर ठठेरी बाजार की गली में आकर मिलती है।

45. सुग्गा गली-
सुग्गा गली ठठेरी बाजार से प्रारम्भ होकर रानी कुआँ तक जाती है। इस गली पर सिन्नी टुल्लु का पहला कारखाना था।

46. गोला गली-
ठठेरी बाजार स्थित भारतेन्दु भवन के पीछे की गली।
(बनारस, 30जून 2018, शनिवार)
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रविवार, 24 जून 2018

व्योमवार्ता/ काशी के इतिहास की वो तिथियां जिन्होंने बदल दिया बनारस को-

जानिए, काशी के इतिहास की वो तिथियां जिन्होंने बदल दिया बनारस को-

800 ई0पू0    राजघाट (वाराणसी) में प्राचीनतम बस्ती और मिट्टी के तटबंध के पुरावशेष
8वीं सदी ई0पू0     तेईसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का काशी में जन्म।
7वीं सदी ई0पू0 काशी-एक स्वतंत्र महाजनपद।
625 ई0पू0    काशी सारनाथ में सर्वप्रथम भगवान बुद्ध ने बौद्धधर्म का उपदेश दिया था।
405 ई0पू0    चीनी यात्री फाह्यान का काशी में  आगमन हुआ।
340 ई0पू0    सम्राट अशोक की वाराणसी-यात्रा। सारनाथ में अशोक-स्तंभ और धम्मेख तथा धर्मराजिक स्तूपों की स्थापना।
1 ई0 से 300 ई0   राजघाट के पुरावशेषों के आधार पर वाराणसी के इतिहास में समृद्धि का काल।
सन् 302  मणिकर्णिका घाट का निर्माण हुआ था
816 ई0    आदि जगदगुरू शंकराचार्य का काशी में आगमन हुआ।
सन् 580  पचगंगा घाट का निर्माण हुआ।
12वीं सदी काशी पर गहड़वालों का शासन। गहड़वाल नरेश गोविन्दचंद्र के राजपंडित दामोदर द्वारा तत्कालीन   लोकभाषा (कोसली) में उक्तिव्यक्ति प्रकरण की रचना। गोविंदचंद्र की रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में विहार     बनवाया। गहडवाल युग में काशी के   प्रधान देवता अविमुक्तेश्वर शिव की विश्वेश्वर में तब्दीली।
सन् 1193 काशीराज जयचंद की मृत्यु।
सन् 1194 कुतुबुद्दीन का काशी पर आक्रमण हुआ, जिसने विष्णु-मंदिर को तोड़कर ढाई कंगूरे की मस्जिद बनवा दी।
सन् 1194 व 1197  काशी पर शहाबुद्दीन और कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले। काशी की भारीलूट। गहडवालों का अंत।
सन् 1248 दूसरी बार मुहम्मद गोरी का आक्रमण हुआ।
सन् 1393 माघ शुक्ल पूर्णिमा को काशी में रविदास का जन्म हुआ।
सन् 1516 फरवरी माह में चैतन्य महाप्रभु का काशी में आगमन हुआ, जहाँ पर ठहरे थे वह स्थान चैतन्य वट के नाम से प्रसिद्ध है।

सन् 1526    बाबर ने इब्राहीम लोदी को पराजित   करने के बाद काशी पर भी आक्रमण किया।
सन् 1531 बनारस व सारनाथ में हुमायूं का डेरा।
सन् 1538 बनारस पर शेरशाह की चढ़ाई।
सन् 1553 सिख सम्प्रदाय के प्रथम गुरु श्री गुरूनानक देव जी का काशी आगमन हुआ और  काशी में कई वर्ष़ों तक        ठहरे थे। यह स्थान आज गुरुबाग के नाम से प्रसिद्ध है।
सन् 1565 काशी पर बादशाह अकबर का कब्जा।
सन् 1583-91  प्रथम अंग्रेज यात्री रॉल्फ फिच की वाराणसी-यात्रा।
सन् 1584 काशी में ज्ञानवापी स्थित प्राचीन विश्वेश्वर मन्दिर का निर्माण दिल्ली सम्राट अकबर के दरबारी राजा       टोडरमल के द्वारा हुआ।
सन् 1585 राजा टोडरमल और नारायण भट्ट की मदद से विश्वनाथ मंदिर का पुननिर्माण।
सन् 1600 राजा मान सिंह द्वारा काशी में मानमंदिर और घाट का निर्माण।
सन् 1623 सोमवंशी राजा वासुदेव के मंत्री नरेणु रावत के पुत्र श्री नारायण दास के दान से काशी में मणिकर्णिका घाट    स्थित चक्रपुष्करणी तीर्थ का निर्माण हुआ।
सन् 1642 विंदुमाधव मन्दिर ( प्रथम ) का निर्माण जयपुर के राजा जयसिंह द्वारा हुआ।
सन् 1656     दारा शिकोह की बनारस यात्रा।
सन् 1666   औरंगजेब की आगरा-कैद से भागकर छत्रपति शिवाजी कुछ दिन काशी में ठहरे।
सन् 1669   औरंगजेब के आदेश से विश्वनाथ मंदिर गिरा कर उसके स्थान पर ज्ञानवापी की मस्ज़िद उठा दी गई।   बिंदुमाधव का मन्दिर भी गिराकर वहां मस्जिद बनाई गई।
सन् 1669 औरंगजेब के शासन काल में उसकी आज्ञा से ज्ञानवापी का विश्वेश्वर मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1669 छत्रपति शिवाजी आगरे के किले से औरंगजेब को चकमा देकर कैद से निकल कर सीधे काशी आये। यहाँ    आकर पंचगंगा घाट पर स्नान किया।
सन् 1673 काशी में औरंगजेब द्वारा बेनी माधव का मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1699 आमेर के महाराज सवाई जयसिंह के द्वारा काशी में पंचगंगा घाट पर राम मन्दिर बनवाया था।
सन् 1714 गंगापुर ग्राम में कार्त्तिक कृष्ण पक्ष में काशीराज महाराज बलवन्त सिंह का जन्म हुआ।
सन् 1725 काशी राज्य की स्थापना।
सन् 1734 नारायण दीक्षित पाटणकर का वाराणसी आगमन; उन्होंने यहां कई घाट बनवाए।
सन् 1737 महाराजा जयसिंह नें मानमन्दिर वेधशाला का निर्माण कराया।
सन् 1740 बलवन्त सिंह के पिता श्री मनसाराम का देहावसान हो गया।
सन् 1741-42  गंगापुर में तत्कालीन काशीराज द्वारा दुर्ग का निर्माण कराया गया।
सन् 1737 सवाई जयसिंह द्वारा मानमंदिर- वेधशाला की स्थापना।
सन् 1747 महाराज बलवन्त सिंह ने चन्देल वंशी राजा को पराजित कर विजयगढ़ पर अधिकार किया।
सन् 1752 काशीराज बलवंत सिंह द्वारा रामनगर किले का निर्माण।
सन् 1754 महाराज बलवन्त सिंह ने पलिता दुर्ग पर विजय पाया।
सन् 1755 बंगाल, नागौर राज्य की रानी भवानी के द्वारा पंचक्रोशी स्थित कर्दमेश्वर महादेव के सरोवर का निर्माण हुआ।
सन् 1756 रानी भवानी ने भीमचण्डी के सरोवर का निर्माण करवाया।
सन् 1770 21 अगस्त का महाराज बलवन्त सिंह का स्वर्गवास हुआ।
सन् 1770 से 1781 तक काशी पर महाराज चेतसिंह का शासन था।
सन् 1777 महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का नवनिर्माण कराया।
सन् 1781 16 अगस्त को काशी में शिवाला घाट पर अंग्रेजी सेना से राजा चेतसिंह के सिपाहियों का संघर्ष हुआ। यह विद्रोह राजभक्त नागरिकों द्वारा मारे गये। 19 अगस्त, 1781 को काशी की देश भक्त जनता की क्रांति से भयभीत होकर वारनेहेस्टिंग्स जनाने वेश में नौका द्वारा चुनार भाग गया। दिसम्बर, सन् 1781 से 1794 तक काशी राज्य पर   महाराज महीप नारायण का राज्य था।
सन् 1785 काशी में महारानी अहिल्या बाई द्वारा विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण हुआ। सन् 1787-1795    जोनाथन डंकन बनारस के रेजिडेंट।
सन ~ 1787   काशी में प्रथम बार भूमि का बन्दोबस्त    मिस्टर डंकन साहब के द्वारा हुआ जो डंकन बन्दोबस्त के नाम से जाना जाता है।
सन् 1791 वाराणसी में संस्कृत पाठशाला (अब संस्कृत विश्व विद्यालय) का प्रस्ताव जोनाथन डंकन ने रखा था।
सन् 1794 काशी राजकीय संस्कृत विद्यालय (क्वींस कालेज) की स्थापना।
सन् 1802 बनारस की पहली पक्की एवं मुख्य सड़क दालमण्डी, राजादरवाजा, काशीपुरा, औसानगंज होते हुये जी.टी. रोड तक बनाई गई।
सन् 1814 बनारस में लार्ड हेस्टिंग्स का आगमन और दरबार।
सन् 1816 पश्चिम बंगाल के राजा जयनारायण द्वारा रेवड़ी तालाब मुहल्ले में अंग्रेजी भाषा के प्रथम विद्यालय ’जयनारायण हाईस्कूल’ (वर्तमान में यह इण्टर कालेज) की स्थापना।
सन् 1818 काशी के अस्सी मुहल्ले में रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
सन् 1820 वर्तमान न्यायालय भवन (कलेक्ट्री कचहरी) का निर्माण हुआ।
सन् 1822 जेम्स प्रिंसेप ने बनारस का सर्वेक्षण किया।सन् 1825 बाजीराव पेशवा द्वितीय ने कालभैरव मन्दिर का निर्माण कराया।
सन् 1827 फारसी शायर मिर्जा गालिब का काशी में आगमन, जो वर्तमान घुघरानी गली में ठहरे थे।
सन् 1828 ज्ञानवापी के खंडित सरोवर की रक्षा हेतु ग्वालियर की रानी बैजबाई ने एक कूप बनवाया।
सन् 1828-29  जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनारस की जनगणना; कुल आबादी-1,80,000
सन् 1830 विश्वेश्वरगंज स्थित गल्ला मण्डी (अनाज की सट्टी) का निर्माण हुआ।
सन् 1835 काशीराज महाराज ईश्वरी नारायण सिंह राज्य पर बैठे तथा 1889 में उनका स्वर्गवास हुआ।
सन् 1839 पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के   द्वारा काशी विश्वनाथ मन्दिर के कलश पर स्वर्ण-पत्र-चढ़ाया गया।
सन् 1845 बनारस का पहला सप्ताहिक समाचार पत्र ’बनारस’ प्रकाशित हुआ।
सन् 1853 वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन का निर्माण पूरा हुआ।
सन् 1866 काशी म्यूनिसिपल बोर्ड (नगर पालिका) की स्थापना हुई।
सन् 1867 काशी में प्रथम बार चुंगी (कर) लगी।
सन् 1869 22 अक्टूबर को काशी में स्वामी दयानन्द सरस्वती का आगमन हुआ। 17 नवम्बर सन् 1869 को दुर्गा कुण्ड पर राजा माधव सिंह बाग में विद्वानों से शाóार्थ हुआ।
सन् 1872 कमिश्नर सी.पी. कारमाइकल के नाम पर ज्ञानवापी में कारमाइकल लाइब्रेरी की स्थापना।
सन् 1875 कुमार विजयनगरम् श्री गजपति सिंह के द्वारा टाउनहाल का निर्माण हुआ।  जिसका उद्घाटन सन् 1876 में प्रिस ऑफ वेल्स के द्वारा हुआ।
सन् 1880-87  राजघाट पुल का निर्माण हुआ।
सन् 1882 नागरी प्रचारिणी सभा पुस्तकालय एवं बंग साहित्य पुस्तकालय की स्थापना।
सन् 1882 काशी में गंगा की अधिक बाढ़ हुई थी। कोदई-चौकी तक नावें चली थीं।
सन् 1885 काशी में कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई। इसकी प्रथम बैठक रामकली चौधरी के बाग में हुई थी। जिसके    सदस्य डॉ0 छन्नू लाल, बसीउद्दीन मुख्तार, मु0 माधोलाल, उपेन्द्रनाथ, वृन्दावन वकील थे।
सन् 1887 राजघाट स्थित गंगा पर रेल-सड़क पुल का उद्घाटन।
सन् 1888 काशी यात्रा के लिये स्वामी विवेकानन्द का आगमन हुआ।
सन् 1889 से 1931 तक काशी राज्य पर महाराज प्रभुनारायण सिंह का राज्य था
सन् 1890 भेलुपुर स्थित जल संस्थान का महारानी विक्टोरिया के पौत्र प्रिंस एलबर्ट विक्टर द्वारा शिलान्यास।
सन् 1891 सारनाथ में अनागारिक धर्मपाल द्वारा महाबोधि संस्था स्थापित हुई।
सन् 1892 14 नवम्बर को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर द्वारा भेलुपुर जल संस्थान का उद्घाटन।
सन् 1893 ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना।
सन् 1897 पादरी जानसन के द्वारा काशी में गिरजाघरों का निर्माण हुआ। प्रथम-सिगरा, दूसरा-गोदौलिया का।
सन् 1898 आर्यभाषा पुस्तकालय की स्थापना।
सन्  1904  तत्कालीन काशी नरेश की अध्यक्षता में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना के लिये पहली बैठक हुई।
सन् 1910 काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।
सन् 1910 सारनाथ संग्रहालय का निर्माण कराया गया।
सन् 1916 पं0 मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना।
सन् 1918 काशी में प्रथम सिनेमा घर का निर्माण बैजनाथ दास शाहपुरी द्वारा बांसफाटक पर मदन थियेटर के नाम से हुआ।
सन् 1920 काशी विद्यापीठ की स्थापना।
सन् 1920 महात्मा गांधी काशी में आये और तीन दिनों तक ठहरे।
सन् 1921 10 फरवरी को गांधी जी का पुनः काशी    आगमन हुआ। तीसरी बार 1921 में उन्होंने विद्यापीठ का शिलान्यास किया।
सन् 1925 26 दिसम्बर को काकोरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में वाराणसी में अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसमें काशी के राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दी गयी।
सन् 1928 वाराणसी मे बिजलीकरण।
सन् 1931 जून मे प्रथम बार नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का आगमन हुआ। दशाश्वमेध स्थित चितरंजन दास पार्क में अभिमन्यु दल द्वारा मानपत्र दिया गया। टाउनहाल के मैदान में नव जवान भारत सभा की ओर से एक सभा हुई।
सन् 1933-34  रिक्षे की सवारी की शुरुआत ‘दी रेस्टोंरेंट’ के मालिक बद्री बाबू नें की।
सन् 1934 13 जनवरी को काशी में भूकम्प आया।
सन् 1934 28 दिसम्बर को राजा बलदेव दास बिड़ला के दान से सारनाथ में एक धर्मशाला का निर्माण हुआ।
सन् 1937 ‘भारतमाता मन्दिर’ का महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटन।
सन् 1939 काशी राज्य में प्रजा की माँग पर काशी नरेश श्री महाराज आदित्य नारायण सिंह ने प्रजा परिषद की घोषणा की।
सन् 1940 राजघाट (वाराणसी) के उत्खनन की शुरूआत।
सन् 1948 15 अक्टूबर को बनारस राज्य का भारतीय संघ में विलय हुआ।
सन् 1956 बुद्ध-पूर्णिमा के दिन ‘बनारस’ को अधिकृत रूप से पुराना ‘वाराणसी’ नाम दिया गया।
सन् 1964 तुलसी मानस मन्दिर (दुर्गाकुण्ड के    पास) का निर्माण हुआ।
सन् 1986 काशी में हरिश्चन्द्र घाट पर प्रथम शवदाह गृह स्थापित किया गया।
2014 में काशी बनारस के सांसद नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनें।
(बनारस,24 जून 2018, रविवार)
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