काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....
*व्योमेश चित्रवंश
मोक्ष नगरी काशी के बारे में कहा जाता है कि यहां देह त्यागने वाली आत्मा को मोक्ष मिल जाता है। जिसकी मृत्यु काशी के बाहर होती है उसका महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से भी उसे मुक्ति मिल जाती है। काशी में एक तीर्थ ऐसा भी है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां प्रेत आत्माओं को मुक्ति मिलती है। यह तीर्थ पिशाच मोचन कुंड के नाम से विख्यात है। कुंड के महत्व के बारे में यहां के पुरोहितों का कहना है कि यह कुंड मां गंगा के पृथ्वी पर आने से पहले का है। और पितृ पक्ष में यहां प्रतों का मेला लगता है। साथ ही यहां पितरों के साथ ही प्रेत आत्माओं को भी मुक्ति मिलती है। इसके लिए यहां त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराए जाते है।
मृत्यु को भी उत्सव मानने वाले मोक्ष की नगरी काशी का पिशाच मोचन कुंड रहस्यमय पौराणिक स्थल कहा जाता है. यह कोई साधारण जलकुंड नहीं, बल्कि आत्माओं के उद्धार का केंद्र है. कहा जाता है कि जो आत्माएं अकाल मृत्यु का शिकार होती है या जो अधूरी इच्छाओं के साथ इस संसार से जाती हैं, वे भटकती रहती हैं. गीता में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा अजर है, अमर है. “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...” लेकिन अकाल मृत्यु होने वाले इंसान की आत्मा सालों भटकती रहती है. बाबा श्री काशी विश्वनाथ के त्रिशूल पर टिकी नगरी में भटकती आत्मा को भी यहां मोक्ष मिल जाता है. गरुण पुराण के काशी खंड में भी पिशाच मोचन कुंड का उल्लेख मिलता है, जहां पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है. मान्यता है कि यहां पर आत्माओं का उधार भी चुकाया जाता है
काशी खंड के अनुसार पिशाच कुंड को मूल रूप से “विमल तीर्थ व विमलोदक तीर्थ” के नाम से जाना जाता है। कपर्दि नामक एक शिव गण ने एक जल निकाय- “विमल तीर्थ” बनाया और इस स्थान पर शिव की पूजा की, जिससे कपर्दीश्वर महादेव अस्तित्व में आए। समय के साथ, यह स्थान तपस्या के लिए एक स्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया। भगवान कपर्दीश्वर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर, खोपड़ियों से सुसज्जित द्वार और ब्रह्म को समर्पित विभिन्न छोटे मंदिरों के साथ एक जलाशय का शांत वातावरण, आपको अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना के समय में स्वागत करता है, जो निषिद्ध अवस्था से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे काशी के हृदय में प्रवेश करके मोक्ष प्राप्त कर सके।कथा है कि एक बार एक पाशुपत ऋषि विमल तीर्थ के तट पर ध्यान कर रहे थे, अचानक एक पिशाच जो एक ब्राह्मण था, और अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण पिशाच (भूत) योनि को प्राप्त कर गया। पहले तो उसने ऋषि वाल्मीकि को डराने की कोशिश की लेकिन बहुत प्रयास के बाद, उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे मुक्ति मांगी। ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा। इस प्रकार पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली तब से पिशाच मोचन तीर्थ बिहार के गया के अतिरिक्त पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए एक प्रसिद्ध स्थान बन गया। हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पितृलोक में निवास करती है – स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का क्षेत्र, जो यम "मृत्यु के देवता" द्वारा शासित है। पूर्वजों की तीन पीढ़ियाँ पितृलोक में रहती हैं और पितृ पक्ष (भाद्रपद का चंद्र महीना) के दौरान पृथ्वी का दौरा करती हैं ताकि उन्हें अपने वंश से जल, तर्पण मिल सके। अगर उन्हें यह मिल जाता है, तो उन्हें मुक्ति मिल जाती है लेकिन अगर उन्हें तर्पण नहीं मिलता है, तो उन्हें पुनर्जन्म की सजा मिलती है। जब अगली पीढ़ी का व्यक्ति मर जाता है, तो पहली पीढ़ी स्वर्ग चली जाती है और कर्म और उपरोक्त कारण के आधार पर मोक्ष/पुनर्जन्म प्राप्त करती है। इसीलिए सह्रद कर्मकांड पूर्वजों की केवल तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है। यदि पितरों की परेशान आत्माएं पितृलोक में खुश नहीं हैं तो उनका प्रभाव पृथ्वी पर उनके प्रियजनों पर पड़ता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अनुष्ठानों की एक श्रृंखला में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा शामिल है, जिन्हें क्रमशः सफेद, पीले और काले कपड़े के मिट्टी के पानी के बर्तन- कलश द्वारा दर्शाया जाता है ताकि वे पूर्वजों को मुक्ति दे सकें। पितृपक्ष के महीने में पिशाच कुंड इन अनुष्ठानों के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है और दुनिया भर से लोग अपने प्रियजनों को मुक्ति दिलाने के लिए इस स्थान पर आते हैं। कुंड के आस-पास का पूरा इलाका सफेद कपड़े पहने और मुंडा सिर वाले लोगों की भारी भीड़ को देखता है जो ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गया के बाद पिशाच मोचन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ ऐसी पूजा की जा सकती है जो पूर्वजों के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है। गरुण पुराण में भी इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। इस जगह से जुड़ी किंवदंती के कारण यह जगह बहुत ही अजीबोगरीब माहौल देती है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अनगिनत कीलें लगी हुई हैं, कुछ पर सिक्के लगे हुए हैं और कई लोगों की तस्वीरें हैं, जिनकी शायद असामयिक मृत्यु हुई हो। एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि यह किसी परेशान आत्मा के लिए अंतिम उपाय है, हो सकता है कि यह अंधविश्वास हो या वास्तविकता, यह किसी की आस्था पर निर्भर करता है। मुख्य मंदिर परिसर एक कुंड के किनारे स्थित है, आप कपरदीश्वर महादेव के साथ-साथ कपरदी विनायक (मंदिर पंचक्रोशी यात्रा के अंतर्गत भी आता है) के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर के ठीक बगल में भगवान हनुमान और विष्णु के साथ ब्रह्म की एक छोटी सी जटिल मूर्ति की पूजा की जाती है। पास ही वाल्मीकि टीला पर पिशाचेश्वर महादेव और ऋषि वाल्मीकि का मंदिर है। कुंड के आसपास के क्षेत्र में पंडा/ब्राह्मण द्वारा संचालित कई छोटे मंदिर हैं, जिनके अपने-अपने ईष्टदेव हैं। पास में एक अखाड़ा है, यह एक शांतिपूर्ण परिसर है जिसमें छोटे मंदिर और चित्रकूट रामलीला के लिए समर्पित स्थान हैं, जिसे मेघा भगत “गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य” द्वारा शुरू किया गया था।
पिशाच मोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि यह रामा अवतार के पहले की बात है। जब पृथ्वी पर गंगा अवतरित नहीं हुई थी उससे पहले का यह सरोवर है। यह विमलोदत्त तीर्थ है। यहां पूरे भारत वर्ष से लोग आते है। जो भी प्रेत योनि से पीड़ित है उसे यहां मुक्ति मिल जाती है। वह कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि रामा अवतार के समय पिशाच नाम का एक ब्राम्हण था। जो दान नहीं देता था। वह सिर्फ लोगों से दान लिया करता था। और इतना दान ले लिया कि उसकी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी। एकबार जब वाल्मीकि जी कुंड पर पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण यहां पहुंचे और उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि महराज मेरी आत्मा को शांति नहीं मिल रही। मेरा भी कल्यण करें। जिसके बाद उन्होंने पिशाच ब्राम्हण को तालाब में नहाने के लिए बोला। पिचाश ब्राह्मण जैसे ही स्नान के लिए कुंड में उतरे तो पानी भागने लगा। वह एक कदम आगे बढ़ते तो पानी दो कदम पीछे भाग जाता। इसके बाद उन्होंने पानी गिलास में पानी लिया तो वो भी सूख गया।इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वाल्मीकि जी से आग्रह किया कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें। उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने उनसे कहा महाराज उपाय करें नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां भगवान शंकर और विष्णु जी की तपस्या करने को कहा। आखिर में शंकर उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और यहां आए और पिशाच ब्राम्हण से पूछा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे और उनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। साथ ही कुंड के महत्व से एक घटना और जुड़ी हुई है। बताते है कि शंकर जी के बाद गणेश जी यहां एक ज्ञानदस नामक प्रेत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए लेकर आए थे। वह बताते है कि ज्ञानदस को मुक्ति नहीं मिल रही थी। जिसके बाद उन्होंने भगवान गणेश कार्तिकेय जी से मुक्ति के लिए आग्रह किया। तो उन्होंने ज्ञानदस से कहा कि काशी में तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन जब ज्ञानदस काशी पहुंचे तो मां गंगा से उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। आखिर में मां गंगा से प्रार्थना करने के बाद कहा कि उत्तर दिशा में स्थित पिशाच मोचन कुंड पर जाओं वहां तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।तब से प्रेत आत्माओं की मुक्ति, पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पितृ पक्ष में लोग आते है। साथ ही मान्यता है कि पितृ पक्ष में यहा प्रेतों का मेला लगता है। तीर्थ पुरोहित बताते है कि यहां पितृरों, प्रेतों, आकाल मौत से मोक्ष व जो प्रेत परिवार की सुख शांति में बाधक बने हुए उनकी मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराऐ जाते हैं।
त्रिपिंडी श्राद्ध पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का पिंडदान हैं. इस पूजन में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है. मान्यता है कि पूर्वज की असंतुष्ट आत्मा आने वाली पीढ़ियों के सुख में बाधा डालती है. ऐसे में इन आत्माओं को शांत करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है.। “गरुण पुराण के काशीखंड में वर्णित है कि पवित्र गंगा नदी के धरती आगमन से पहले ही पिशाच मोचन कुंड का अस्तित्व था. कुंड के पास पीपल का एक पुराना वृक्ष है और इसी पर भटकती आत्माओं को बैठाया जाता है. उनका ऋण उतारने के लिए वृक्ष पर सिक्का भी बांधा जाता है. इस कर्म से पितरों के सभी उधार उतर जाते हैं और वे बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं. पिशाचमोचन कुंड का पीपल पेड़ मान्यता का साक्षी है। पेड़ में ठोंके गए असंख्य सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्मा का ठिकाना है।
मान्यता है कि किसी व्यक्ति की अकाल या असामयिक मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है. ऐसे में उन आत्माओं को मोक्ष पिशाच मोचन कुंड दिलाता है. कुंड का नामकरण के पीछे भी कथा है. पिशाच मोचन कुंड का नाम पिशाच नाम के व्यक्ति से पड़ा था, जिसने कई पाप किए थे. हालांकि, इसी जगह पर उसे मोक्ष मिला था. जिनके घर में अकाल मृत्यु होती है, उनके परिजन यहां पर विशेष पूजन, तर्पण करते हैं.। इस कुंड का वर्णन न केवल गरुड़ पुराण बल्कि स्कंद पुराण समेत कई शास्त्रों में मिलता है. यह स्थान सदियों से पितृ-स्मरण, त्रिपिंडी श्राद्ध तथा आत्मिक शांति और मनः चेतना से जुड़ी लोक-आस्थाओं का जीवंत केंद्र रहा है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और स्मृति के बीच संबंधों को समझने का एक अवसर भी है।
घर-परिवार के बुजुर्गों और पुरोहितों की परंपरागत मान्यता के अनुसार यह अनुष्ठान उन जन्मे, पूर्वजन्मे अथवा अजन्मे जीवनों की स्मृति और शांति के लिए किया जाता है, जिनकी उपस्थिति भले ही हमारे जीवन में प्रत्यक्ष न रही हो, लेकिन जिनसे जुड़ी कोई अधूरी कड़ी पीढ़ियों के भीतर कहीं न कहीं गहरे दुख का कारण बनी रह जाती है।
मैं नहीं जानता कि जीवन की हर कठिनाई का संबंध अदृश्य कारणों से होता है या नहीं। न ही मैं हर बात को भय, दोष या चमत्कार के चश्मे से देखता हूँ। लेकिन इतना अवश्य मानता हूँ कि मनुष्य केवल स्वयं कर्ता नहीं होता। वह अपने साथ स्मृतियों, संस्कारों, रिश्तों और अनेक अनकहे इतिहासों को भी साथ लेकर चलता है। कभी-कभी उन अनदेखे संबंधों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना भी एक आध्यात्मिक कर्म बन जाता है। शायद हमारे पूर्वजों ने त्रिपिंडी जैसे श्राद्धों के माध्यम से इसी आध्यात्मिक पक्ष को सहज करने के लिए शुरुआत किया हो..! हमारे लोक और धर्म में पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद के जीवन पर बहुत कुछ लिखा गया है। हमारे पुराणों और उपनिषद् सहित जितने भी आध्यात्मिक ग्रन्थों के टीका और भाष्य मिलते है उतना किसी धर्म में नहीं लिखा गया है..इस परा विज्ञान पर आपके तर्क और संशय के लिए बहुत जगह है..आप पढ़िए और डूब जाइए एक ऐसे संसार में जहाँ अपूर्णता और अतृप्ता के सारे सूत्र आपको पूर्ण तो नहीं करेंगे पर चेतना से जरूर भर देंगे.यह पिशाचमोचन भी आपके वैसे ही अनसुलझे तर्कों को नई दृष्टि देता है जैसा यहाँ आकर...यहां के शांत सरोवर के किनारे जब आप बैठ कर महसूस किया जा सकता है। तो यही विचार बार-बार मन में आता है वहाँ कोई भय का वातावरण नहीं, न ही ऐसा कुछ जिसमें रहस्य हो ..वहाँ सैकड़ों परिवार जो अपने दिवंगत प्रियजनों की स्मृतियों के साथ उन पिण्डों में अपने पूर्वजों का आह्वान करते हुए.. यहां मंत्रों की गूंज के साथ साथ वहां पूर्वजों की स्मृतियां भी गूंज रही थी, जल में चमकती धूप के बीच जो तरंग उठ रहे थे शायद उसमें हमारे पूर्वजों के आह्वान के बाद का विदा गीत की तरंगें थी जिसपर उन लोगों के चेहरे उभर और मिट रहे थे जो अपने भीतर किसी अधूरे भाव को शांत करने आए थे।
पिशाचमोचन के बारे में प्रचलित मान्यताएँ प्रेतत्व, पितृदोष और आत्माओं की शांति जैसे विषयों से जुड़ी हैं, लेकिन वहाँ बैठकर इसका एक दूसरा अर्थ भी दिखाई दिया। मुझे लगा कि शायद इस तीर्थ का वास्तविक महत्व किसी अदृश्य भय में नहीं, बल्कि स्मरण की उस संस्कृति में है जिसे भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों से सहेज कर रखा है। आधुनिक जीवन हमें वर्तमान में जीना सिखाता है, लेकिन भारतीय परंपरा हमें यह भी याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अपने पूर्वजों की निरंतरता हैं, अपने परिवार की कहानी का एक अध्याय हैं। संभवतः त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे संस्कार इसी गहरे बोध को अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं।
काशी की महिमा शायद इसी में है कि वह जीवन और मृत्यु को दो अलग-अलग छोरों की तरह नहीं देखती। यहाँ मृत्यु भी स्मरण का विषय है, करुणा का विषय है और अंततः शांति का विषय है। पिशाचमोचन इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की यात्रा केवल देह तक सीमित नहीं है। वह अपने पूर्वजों, अपने परिवार और उन असंख्य स्मृतियों से भी जुड़ा है जिन्होंने उसे गढ़ा है।
काशी, 25सितम्बर2026,शुक्रवार
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