बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला..... *व्योमेश चित्रवंश
पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास काशी में आतिथ्य की उपेक्षा से रुष्ट होकर गंगा के पूर्वी तट पर लोलार्क के आग्नेय कोण में स्थित तपोवन में नई काशी बनाने को उद्यत हुए तब शिवजी ने विनती कर उन्हें रोका तथा आदर के साथ काशीवास की अनुमति प्रदान की। तब से यह स्थान व्यासकाशी नाम से प्रतिष्ठित हुआ तथा कालांतर में रामनगर नाम से जाना गया। आजादी से पूर्व 200 वर्षों तक रामनगर काशी की राजधानी रही। काशी के इस पूर्व राजधानी में होने वाली रामनगर की रामलीला का पूरी दुनिया में अपना एक अलग ही महत्व है। यह रामलीला विश्व में होने वाली सभी रामलीलाओं से अलग एवं अद्वितीय है। विश्वप्रसिद्ध रामलीला रामनगर, जिसे रामायण के नाटकीय प्रस्तुति के रूप में जाना जाता है, यह भारत की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है।रामलीला और रामनगर इस तरह से एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं कि अक्सर ही लोग "रामलीला मंचन की वजह से इस नगर का नाम रामनगर पड़ा होगा " ऐसा मान लेते हैं।
रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग 230 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। वाराणसी में गंगा नदी के समीप स्थित रामनगर में आयोजित होने वाली रामलीला का आयोजन काशी नरेश द्वारा किया जाता है। यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित है। रामनगर की रामलीला का इतिहास बेहद समृद्ध और रोचक है परंतु इसकी शुरुआत कैसे हुई इसकी सटीक जानकारी किसी को भी नहीं पता है। आम जनमानस में रामनगर में रामलीला की शुरुआत को लेकर कई सारी कथा कहानियां प्रचलित है, परंतु इनमें से दो कथाएं लोगों के बीच सबसे अधिक प्रचलित है। जिसमें पहली कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है की रामलीला की शुरुआत रामनगर से थोड़ी दूर काशी मे होता था जिसका संचालन गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन उनके शिष्य मेधा भगत जी करते थे।उन्होंने आजीवन इस लीला को श्रद्धापूर्वक करवाया, परंतु वृद्धावस्था के कारण उन्होंने तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह से रामलीला को संरक्षण प्रदान करने एवं उसे रामनगर की ओर स्थानांतरित करने का आग्रह किया। परंतु उस समय युवराज बीमार चल रहे थे जिस कारण उस समय महाराज इस कार्य पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे थे। तब मेघा भगत ने कहा कि यदि आप यह कार्य कर लेंगे तो युवराज स्वतः ही स्वस्थ हो जाएंगे और अंत में यही हुआ महाराज ने जैसे ही रामलीला की स्वीकृति दी युवराज भी स्वस्थ हो गए और तभी से रामनगर में रामलीला की शुरुआत हो गई।
एक और ज्यादा प्रचलित दूसरी कथा है कि रामनगर से पहले यह रामलीला छोटा मिर्जापुर स्थित एक गांव में भोनू साहू और विट्ठल साहू नाम के दो साहूकार भाई करवाते थे। क्योंकि काशी के राजा श्री राम भक्त थे अतः उन्हें रामलीला देखना काफी प्रिय लगता था। वे प्रतिवर्ष नियमित रूप से प्रतिदिन रामलीला देखने जाया करते थे, एवं रामलीला में अपना सहयोग भी दिया करते थे। महाराज के सम्मान में रामलीला उनके आने के पश्चात ही शुरू की जाती थी। एक दिन महाराज को आने में थोड़ी देर हो गई, तो लोगों ने सोचा कि महाराज नहीं आएंगे एवं उस दिन धनुष यज्ञ की लीला बिना महाराज के ही करवा दी गई। महाराज लीला स्थल के लिये निकल पड़े थे परंतु रास्ते में ही उन्हें किसी से पता चला की रामलीला तो शुरू हो चुकी है, यह सुनकर उन्हें काफी दुख हुआ और वे बीच रास्ते से ही लौट आए। उन्होंने उसे दिन से रामलीला में जाना छोड़ दिया। परंतु रामलीला में न जाने के कारण वह काफी उदास भी रहते थे।एक दिन महारानी ने उनसे उनके उदासी का कारण पूछा जहां उन्होंने सारी बातें महारानी जी को बताई। इस पर महारानी जी ने उन्हें तंज कसते हुए कहा कि, जब बिट्ठल और भोनू बनिया होकर रामलीला करवा सकते हैं तो आप महाराज होकर क्यों नहीं करवा सकते? उन्होंने महाराज को रामनगर किले में ही रामलीला करवाने का प्रस्ताव दिया, जिससे महारानी भी रामलीला को देख सकती थी, और रामनगर के किले से शुरू हुई इस रामलीला का विस्तार धीरे-धीरे किले के बाहर तक होने लगा।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रामनगर की रामलीला पूर्णत: स्थान भाषा तिथि आदि के शोधोपरान्त प्रारंभ की गई थी एवं उसी शोध के निष्कर्ष व परंपरानुसार आज भी प्रचलित है।रामलीला के शोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी थे। विशुद्धानंद सरस्वती इन्हें अपना गुरु मानते थे। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर ईश्वरी नारायण सिंह ने इनसे मिलकर इनको अपना गुरु बना लिया। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरी नारायण सिंह ने हिंदी के उन्नायक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह और संत काष्ठ जिह्वा स्वामी जी का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त किया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल ,संवाद और मंचन का वैज्ञानिक, व्यावहारिक व यथोक्त ढंग से निर्धारण व शोधन किया। इन तीनों महानुभावों के अतिरिक्त स्वामी महादेव आश्रम, गायघाट के स्वामी जी, तुलसी दत्त झा, पंडित मथुरानाथ, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पंडित इत्यादि महानुभाव ने भी इस पुनीत कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान अर्पित किया। काष्ठ जिह्वा स्वामी द्वारा रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई हस्तलिखित पुस्तिका आज भी रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। इसकी प्रतिलिपि के सहारे वर्तमान व्यास - गण लीला का निर्देशन करते हैं । काष्ठजिह्वा स्वामी ने रामनगर में लीला स्थल का भी शोधन किया,एवं उन स्थलों का नामकरण रामायण के प्रसंगों पर किया जिससे यह स्थल वास्तविक रामयात्रा के स्थलों के समान हो गया। रामनगर की रामलीला का मंचन यथारूप विभिन्न शोधित स्थलों पर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर की परिधि में किया जाता है। प्रसंगानुसार अयोध्या ,जनकपुर ,पंचवटी ,लंका, चित्रकूट ,निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका ,रामबाग, पंपासर इत्यादि सभी स्थल निर्धारित किए गए हैं। रामचरितमानस के संवादों को भी काष्ठजिह्वा स्वामी ने शोधित किया था, जिसमें उनके द्वारा रचित पदों को भी संकलित किया गया। यह संवाद और अभिनय प्रशिक्षण के दौरान ही श्रीराम से छोटे अन्य पात्र स्वाभाविक बातचीत या हाव-भाव के दौरान श्रीराम को सम्मान देने लगते हैं।रामचरितमानस का शोधन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह रामनगर की रामलीला की विशिष्टता को भी दर्शाता है। यह शोधन रामलीला के पात्रों और दर्शकों के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करता है, जिससे लीला के दौरान होने वाली देवानुभूति का अनुभव होता है। रामनगर की रामलीला की एक विशेषता यह है कि इसे 31 दिनों तक विस्तारित किया जाता है। अधिकांश रामलीलाएं 10-15 दिनों में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन रामनगर की रामलीला में रामचरित मानस के हर प्रसंग को बहुत विस्तार से और बिना किसी जल्दबाजी के प्रस्तुत किया जाता है। इससे दर्शक भगवान राम के जीवन और उनके आदर्शों को अधिक गहराई से समझ सकते हैं।
यूं तो रामलीला मंचन की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी ) से होती है, किंतु इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला के महा अनुष्ठान के निमित्त पात्रों के चयन, प्रशिक्षण, रामलीला में प्रयुक्त औजारों - उपकरणों तथा मुखौटों व वस्त्रों इत्यादि की साज-सज्जा , प्रथम व द्वितीय गणेश पूजन आदि अनेक उपक्रमों के माध्यम से यह तैयारी महीनों पूर्व शुरू हो जाती है।यह रामलीला आज भी उसी पारंपरिक अंदाज में होती है, जैसे कि 230 साल पहले होती थी। रामनगर की रामलीला का मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। इसमें बिजली की रोशनी और लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि पेट्रोमेक्स (पंचलाईट) और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज़ के दम पर यह लीला प्रस्तुत की जाती है। रामनगर की रामलीला में विभिन्न स्थलों का मंचन होता है, जैसे कि अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग। रामनगर की रामलीला की तैयारी सावन महीने से ही शुरू हो जाती है और भादों में अनंत चतुर्दशी से लीला का प्रारंभ होता है। यह लीला आश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा को समाप्त होती है। रामलीला के दौरान परंपरा के अनुसार रोज़ाना ‘काशी नरेश’ भी हाथी पर सवार होकर आते हैं और उनके आने के बाद ही रामलीला शुरू होती है।
रामनगर की रामलीला में महिला पात्रों की भी भूमिका लड़के ही निभाते हैं। इस लीला में कुल 27 किरदार होते हैं और 12-14 बच्चे इसमें हिस्सा लेते हैं। रामलीला के दौरान रामचरितमानस की चौपाइयों का नारदी स्वर में दो रामायनी दल द्वारा पाठ होता है और लीला संवाद के साथ आगे बढ़ती है।
रामलीला स्थलों के अतिरिक्त रामलीला से संबंधित तिथियां एवं समय , रामलीला के व्यास एवं पात्रों की वंशानुगत परंपरा व समर्पण, रामलीला में रामायणी दल की महत्वपूर्ण भूमिका व निष्ठा, परंपरा व अनुशासन के अद्वितीय उदाहरण, रामलीला के साधु संत एवं नेमीजन, रामलीला का मंचीय पक्ष एवम् नेपथ्य इस महागाथा के बड़े अध्याय हैं। कहने को इतना कुछ है कि इसे एक निर्धारित लेख की सीमा में बांध पाना सर्वथा असंभव है।
संक्षेप में कहना चाहें तो , रामनगर की रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक साथ तमाम कारक हैं। लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक मंच पर प्रसंगानुसार चलायमान यह मंचन बहुत ही सहजता के साथ बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के तथा बिजली के बड़े रोशनी करने वाले उपकरणों के स्थान पर पुराने समय के पंचलाइट और मशाल की रोशनी में प्रत्येक दिन न्यूनतम दस हजार की भीड़ को मात्र राम लीला व्यास के "चुप रहो! सावधान!" स्वर के द्वारा अनुशासित किया जाता है। यह रामलीला की विशिष्टता के कुछ सहज उदाहरण हैं। इसी प्रकार की सहजता इस रामलीला की श्रेष्ठता है और यह सौम्य श्रेष्ठता ही इसकी विश्वप्रसिद्धि का निर्विवाद कारण है।
रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन आने वाले नेमी, साधु-संतों की समर्पित व अनुशासित टोलियां श्रद्धा और समर्पण के बड़े अध्याय हैं। यहां दर्शक मात्र दर्शक न होकर पात्रों और परिस्थितियों, मंचन व प्रसंग के अनुसार खुद भी रामलीला में भूमिका निभा रहा दिखाई देता है । नेमी अपने साथ एक लकड़ी का पीढ़ा, ताड़ पत्र का हांकने वाला पंखा, छोटी टार्च ले कंधे पर गमछा रखे दांये हाथ मे तुलसी कृत श्री रामचरितमानस का गुटका लिये रामलीला के संग संग अपनी पोथी से लीला के रामायणियों के संग सुर मिलाता हुआ स्वयं बिना किसी भूमिका के पात्र बन जाते है। पात्रों का पीढ़ी - दर- पीढ़ी समर्पण, नेमी - प्रेमी जनों का श्रद्धा और भक्ति भाव, रामलीला प्रसंगों का मौलिक मंचन, संवाद अदायगी, लीला मंचन में सूक्ष्म तत्वों का भी समावेश ; ऐसे अनेकानेक चित्र नए दर्शकों के लिए कौतूहल और नेमी जनों के लिए श्रद्धा के सागर हैं । एक माह तक चलने वाली इस अद्भुत रामलीला में न केवल मंच पर ही अपितु नेपथ्य में भी मजबूत भूमिका अदा करने वाले ऐसे तमाम चरित्र हैं जो कई पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं।
रामनगर की रामलीला की एक सबसे अनूठी विशेषता इसकी चलायमान प्रदर्शन शैली है। आमतौर पर जहाँ एक नाटकीय प्रस्तुति में दर्शक एक स्थान पर बैठे रहते हैं, यहाँ पर दर्शक अभिनेता के साथ-साथ, अलग-अलग स्थानों पर जाते हैं, जहाँ-जहाँ दृश्य बदलते हैं। यह एक प्रकार की तीर्थयात्रा की तरह होता है, जहाँ दर्शक अभिनेताओं के साथ चलते हैं और दिन में कई किलोमीटर तक का सफ़र तय करते हैं।
रामनगर के विभिन्न स्थान रामायण की कथा के प्रमुख स्थलों का प्रतीक होते हैं। जैसे कि अशोक वाटिका, जहाँ सीता को रावण ने बंदी बनाकर रखा था, रामनगर के एक सुंदर उद्यान में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि राम और रावण के बीच का युद्ध एक विशाल मैदान में होता है—जहाँ घोड़े और रथ का प्रयोग किया जाता है, जिससे दृश्य और भी सजीव लगते हैं।
रामनगर की गलियाँ, घाट और खुले मैदान पौराणिक स्थलों में तब्दील हो जाते हैं और अभिनेता रामायण की कथा को जीवंत कर देते हैं। इन परिवर्तित स्थानों के साथ दर्शकों को भगवान राम की दुनिया में ले जाया जाता है। इस पूरी प्रस्तुति में कोई कृत्रिम प्रकाश या आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग नहीं होता; इसकी जड़ें अपनी पुरानी शैली में बनी हुई हैं। मशालों और अभिनेता की प्रबल आवाज़ों से ही यह दर्शकों को बाँधकर रखता है।
इस पूरे अनुभव को और भी ख़ास बनाती है—काशी नरेश की उपस्थिति। काशी की पौराणिक मान्यताओं मे यह हरि हर का संयुक्त स्वरूप दर्शन है।काशी नरेश भगवान शिव के प्रतीकात्मक प्रतिनिधि के रूप में इस आयोजन की अध्यक्षता करते हैं। बोलिये राजा रामचंद्र की जय का उद्घोष करती भावविभोर जनता काशीनरेश को शिव स्वरूप अपने बीच पाते ही बनारस के परम्परागत हर हर महादेव का नारा लगाने से खुद को रोक नही पाती है। हर शाम, चाँदी के सिंहासन पर बैठकर काशी नरेश इस प्रदर्शन को देखते हैं, उनके साथ उनके दरबारी और पुजारी होते हैं। उनकी उपस्थिति इस आयोजन को एक दिव्य स्वीकृति प्रदान करती है, जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और भी बढ़ावा देती है।
सामुदायिक भागीदारी और परंपरा का संरक्षण
रामनगर की रामलीला की एक और विशिष्टता इसकी उच्च स्तर की सामुदायिक भागीदारी है। अधिकांश अभिनेता पेशेवर नहीं होते, बल्कि स्थानीय नागरिक होते हैं—किसान, दुकानदार और छात्र—जो अपनी भूमिका निभाने के लिए अपना समय और ऊर्जा समर्पित करते हैं। इन प्रतिभागियों में से कई ने अपनी भूमिकाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में पाई हैं और वे इसमें गर्व महसूस करते हैं। उनके लिए रामायण के किसी पात्र का अभिनय करना एक गहन आध्यात्मिक कार्य होता है, जो उन्हें अपने विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर के क़रीब लाता है।
यह सामुदायिक भागीदारी केवल अभिनेताओं तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि रामनगर के पूरे नगर में व्याप्त होती है।रामलीला में प्रदर्शन करने वाले कलाकार ज़्यादातर स्थानीय होते हैं और पेशेवर अभिनेता नहीं होते। ये लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते इसमें भाग लेते हैं। हालाँकि यह आयोजन वैश्विक स्तर पर सम्मानित है, लेकिन कलाकारों को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें आर्थिक रूप से बहुत कम सहयोग मिलता है, जबकि वे कठोर प्रशिक्षण और महीनों की तैयारी में लगे रहते हैं। इसके कारण नई पीढ़ी के बीच इस परंपरा को जारी रखने में रुचि कम होती जा रही है, क्योंकि इसमें न तो उन्हें कोई पेशेवर अवसर मिलता है और न ही उचित आर्थिक लाभ। स्थानीय कारीगर सेट तैयार करने और पोशाकें बनाने में मेहनत करते हैं, जबकि निवासी आगंतुकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था करते हैं। इस आयोजन के दौरान पूरा नगर एकजुट होकर इसे सफल बनाने में योगदान देता है, जिससे यह लोगों की सामूहिक सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का प्रतिबिंब बनता है।
तेज़ी से आधुनिक हो रही दुनिया में, रामनगर की रामलीला ने व्यवसायीकरण और तकनीकी उन्नति के दबावों का विरोध करते हुए अपनी प्राचीनता को बनाए रखा है। यह आज भी उसी पारंपरिक ढंग से आयोजित होती है, जैसे सदियों पहले होती थी, जिसने इसकी प्रामाणिकता और पवित्रता को बनाए रखा है। हर साल यहाँ आने वाले हज़ारों दर्शक, जिनमें विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं, इस आयोजन की स्थायी लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्त्व का प्रमाण हैं।
रामनगर, वाराणसी की रामलीला आज भी एक भव्य सांस्कृतिक आयोजन के रूप में प्रसिद्ध है, जो अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। हालाँकि आधुनिकता का असर दिखने लगा है, फिर भी यह आयोजन अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और हर साल दुनिया भर से बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता है।
रामनगर की रामलीला को यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिली है, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और सम्मान में वृद्धि हुई है। 31 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन वाराणसी के सांस्कृतिक आकर्षणों में से एक है, जहाँ पूरे रामनगर को एक विशाल मंच में तब्दील कर दिया जाता है। विभिन्न स्थानों पर रामायण के दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं और इसमें स्थानीय लोग बड़ी आस्था के साथ शामिल होते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामनगर की रामलीला को पर्याप्त सम्मान प्राप्त है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या कलाकारों और आयोजकों को पर्याप्त समर्थन मिल रहा है? आधुनिकता ने इसमें कुछ बदलाव जैसे ध्वनि प्रणाली और न्यूनतम प्रकाश व्यवस्था को शामिल किया है, लेकिन परंपरा का मूल स्वरूप जस-का-तस बना हुआ है। फिर भी, कलाकारों और आयोजकों की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि उनके योगदान को सही पहचान मिले और यह परंपरा बिना किसी कठिनाई के आगे बढ़ती रहे। इसे ख़ासकर वित्तीय सहयोग और संस्थागत समर्थन की ज़रूरत है ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर भविष्य में भी फलती-फूलती रहे।
कुल मिलाकर, रामलीला को लेकर आधुनिक और पारंपरिक पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कलाकारों की बेहतरी और इस आयोजन की दीर्घकालिकता को सुनिश्चित करने के लिए अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
रामनगर की रामलीला की एक और विशिष्टता इसकी उच्च स्तर की सामुदायिक भागीदारी है। अधिकांश अभिनेता पेशेवर नहीं होते, बल्कि स्थानीय नागरिक होते हैं—किसान, दुकानदार और छात्र—जो अपनी भूमिका निभाने के लिए अपना समय और ऊर्जा समर्पित करते हैं। इन प्रतिभागियों में से कई ने अपनी भूमिकाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में पाई हैं और वे इसमें गर्व महसूस करते हैं। उनके लिए रामायण के किसी पात्र का अभिनय करना एक गहन आध्यात्मिक कार्य होता है, जो उन्हें अपने विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर के क़रीब लाता है।
यह सामुदायिक भागीदारी केवल अभिनेताओं तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि रामनगर के पूरे नगर में व्याप्त होती है।रामलीला में प्रदर्शन करने वाले कलाकार ज़्यादातर स्थानीय होते हैं और पेशेवर अभिनेता नहीं होते। ये लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते इसमें भाग लेते हैं। हालाँकि यह आयोजन वैश्विक स्तर पर सम्मानित है, लेकिन कलाकारों को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें आर्थिक रूप से बहुत कम सहयोग मिलता है, जबकि वे कठोर प्रशिक्षण और महीनों की तैयारी में लगे रहते हैं। इसके कारण नई पीढ़ी के बीच इस परंपरा को जारी रखने में रुचि कम होती जा रही है, क्योंकि इसमें न तो उन्हें कोई पेशेवर अवसर मिलता है और न ही उचित आर्थिक लाभ। स्थानीय कारीगर सेट तैयार करने और पोशाकें बनाने में मेहनत करते हैं, जबकि निवासी आगंतुकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था करते हैं। इस आयोजन के दौरान पूरा नगर एकजुट होकर इसे सफल बनाने में योगदान देता है, जिससे यह लोगों की सामूहिक सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का प्रतिबिंब बनता है।
तेज़ी से आधुनिक हो रही दुनिया में, रामनगर की रामलीला ने व्यवसायीकरण और तकनीकी उन्नति के दबावों का विरोध करते हुए अपनी प्राचीनता को बनाए रखा है। यह आज भी उसी पारंपरिक ढंग से आयोजित होती है, जैसे सदियों पहले होती थी, जिसने इसकी प्रामाणिकता और पवित्रता को बनाए रखा है। हर साल यहाँ आने वाले हज़ारों दर्शक, जिनमें विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं, इस आयोजन की स्थायी लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्त्व का प्रमाण हैं।
रामनगर, वाराणसी की रामलीला आज भी एक भव्य सांस्कृतिक आयोजन के रूप में प्रसिद्ध है, जो अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। हालाँकि आधुनिकता का असर दिखने लगा है, फिर भी यह आयोजन अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और हर साल दुनिया भर से बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता है।
रामनगर की रामलीला को यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिली है, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और सम्मान में वृद्धि हुई है। 31 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन वाराणसी के सांस्कृतिक आकर्षणों में से एक है, जहाँ पूरे रामनगर को एक विशाल मंच में तब्दील कर दिया जाता है। विभिन्न स्थानों पर रामायण के दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं और इसमें स्थानीय लोग बड़ी आस्था के साथ शामिल होते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामनगर की रामलीला को पर्याप्त सम्मान प्राप्त है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या कलाकारों और आयोजकों को पर्याप्त समर्थन मिल रहा है? आधुनिकता ने इसमें कुछ बदलाव जैसे ध्वनि प्रणाली और न्यूनतम प्रकाश व्यवस्था को शामिल किया है, लेकिन परंपरा का मूल स्वरूप जस-का-तस बना हुआ है। फिर भी, कलाकारों और आयोजकों की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि उनके योगदान को सही पहचान मिले और यह परंपरा बिना किसी कठिनाई के आगे बढ़ती रहे। इसे ख़ासकर वित्तीय सहयोग और संस्थागत समर्थन की ज़रूरत है ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर भविष्य में भी फलती-फूलती रहे।
कुल मिलाकर, रामलीला को लेकर आधुनिक और पारंपरिक पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कलाकारों की बेहतरी और इस आयोजन की दीर्घकालिकता को सुनिश्चित करने के लिए अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
काशी, 20सितंबर2026, रविवार