शनिवार, 29 अगस्त 2026

खो रही है बनारस मे बनारसियत/ व्योमवार्ता

खो रही है बनारसियत......./ व्योमवार्ता                                                    खो रही है बनारसियत..........
                                                       
                                                                                                                                        .व्योमेश चित्रवंश            

दुनिया में दो तरह के शहर होते हैं। पहले वे शहर, जो दुनिया के नक्शे पर महज़ पत्थरों और सीमेंट, कंक्रीट, सड़कों और आर्किटेक्चरल डिजाईन से बनते हैं जिन्हें भूगोल तय करता है। दूसरे वे, जो इंसानी मिजाज, संस्कृति और इतिहास के ताने-बाने से बुने जाते हैं; जिन्हें समय भी नहीं बदल पाता। वे समय की छाती पर लिखे गए जीवित महाकाव्य होते हैं। काशी ऐसा ही एक महाकाव्य है। बल्कि बनारस इसी दूसरी श्रेणी के लिखे जीवित महाकाव्यों का सिरमौर रहा है। जिसके बारे में मार्क ट्वेन ने लिखा था कि यह शहर इतिहास, परंपरा और किंवदंतियों से भी पुराना है।बनारस महज़ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक 'अवस्था' है, एक 'मनःस्थिति' है, एक शाश्वत जीवंत अवस्था है,जिसे दुनिया 'बनारसियत' के नाम से जानती है। यह बनारसियत संकरी गलियों के मोड़ पर, घाटों की सीढ़ियों पर, सुबह की मखमली धूप में और यहाँ के लोगों के फक्कड़पन में सांस लेती रही है।
यह भी सच है कि विकास और आधुनिकता की दौड़ में जब कोई प्राचीन शहर अपनी रफ्तार बदलता है, तो उसकी कीमत अक्सर उसकी आत्मा को चुकानी पड़ती है। आज हमारा बनारस इसी चौराहे पर खड़ा है। बीते वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने जो करवट ली है, उसने हम सभी को एक गंभीर आत्मचिंतन के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा।आज जब हम बनारस की गलियों, घाटों और चौराहों से गुजरते हैं, तो मन में एक गंभीर बेतैनी पैदा होती है। बीते बारह वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने विकास की जो करवट ली है, उसने हमारे मन मस्तिष्क में एक गंभीर वैचारिक द्वंद्व को जन्म दिया है। यह द्वंद्व है भौतिक विकास की चकाचौंध और सांस्कृतिक पहचान के बिखराव के बीच का द्वंद्व।
         आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा  इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का कायाकल्प हुआ है। आर्थिक और भौतिक दृष्टि से शहर ने वह ऊंचाइयां छुई हैं, जिसकी कल्पना आज से बीस साल पहले असंभव था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का भौतिक कायाकल्प अभूतपूर्व रहा है। आर्थिक और ढांचागत पैमानों पर शहर ने वह छलांग लगाई है, जिसकी कल्पना दो दशक पहले अकल्पनीय थी। शहर के चारों तरफ बिछा रिंग रोड का जाल, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, और फुलवरिया फोरलेन जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं ने बनारस को जाम के पुराने अभिशाप से काफी हद तक मुक्ति दिलाई है। कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा देश का पहला अर्बन रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की अत्याधुनिक परिवहन तकनीक से जोड़ता है। इस बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण से पर्यटन उद्योग में अप्रत्याशित उछाल आया है। बनारस के होटलों, होम-स्टे, नौका-व्यवसाय और हस्तशिल्प उद्योग में पूंजी का प्रवाह बढ़ा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नई संजीवनी मिली है।शहर के चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, फुलवरिया फोरलेन जैसी परियोजनाएं—इन सबने शहर की रीढ़ माने जाने वाले यातायात को एक नई सुगमता दी है। कैंट से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की आधुनिक तकनीक से जोड़ता है।
काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप ने पूरी दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर खींचा है।भौतिक और आर्थिक पैमानों पर यह एक अत्यंत सफल और विकसित शहर की तस्वीर है। लेकिन, आज हमें इस चमक के पीछे छिपे उस अंधेरे और सन्नाटे पर भी बात करनी होगी, जो इस विकास की कीमत के रूप में हमारा यह शहर चुका रहा है।
इस भौतिक बदलाव का सबसे प्रखर और प्रतीकात्मक केंद्र काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लिये सदियों पुरानी, संकरी और घुमावदार, लेकिन इतिहास और आत्मीयता से जीवंत रहने वाली 'विश्वनाथ गली' को जब उजाड़ा गया, तो केवल कंक्रीट की इमारतें औरवईंट पत्थरों के मकान नही ढहाये गये, बल्कि उसके साथ काशी का वह पारंपरिक समाजशास्त्र भी जमींदोज़ हो गया जो पीढ़ियों से अक्षुण्ण था। उस गली की दुकानों का केवल व्यावसायिक महत्व नहीं था, वे दुकानदार और वहाँ से गुजरने वाले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख के गवाह थे।पहले इस गली का एक अपना चरित्र था। यहाँ की दुकानों पर पीढ़ियों का परिचय था। संकरी गलियों से गुजरते हुए महादेव के भक्त जिस आत्मीयता का अनुभव करते थे, वह इस नए, विशाल और पत्थरों से बने भव्य प्रांगण में कहीं खो गई है। बनारस के भोले बाबा महादेव का नही बल्कि श्री काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर तो बन गया, लेकिन इसके साथ ही वह पारम्परिक ताना-बाना भी बिखर गया जो काशी की असल धड़कन था। अब भोर की पहली किरण के साथ गंगा स्नान कर, लोटे में जल लिए"हर हरमादेव शंभो, काशी विश्वनाथ गंगे " की टेर लगाते हुये बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ने वाले वे पारम्परिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले) ढूंढने से भी नहीं मिलते। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और वीआईपी संस्कृति के बीच काशी के स्थानीय भक्तों का सहज जुड़ाव कहीं पीछे छूट गया है।
इसमें दो राय नहीं कि इस परियोजना ने बाबा के दरबार को एक वैश्विक भव्यता, स्वच्छता और विशालता प्रदान की है। लेकिन इस भव्यता को हासिल करने के लिए जो कीमत चुकाई गई, वह बनारस की आत्मा का एक हिस्सा थी। यह काशीवासी के लिये सबसे बड़ी और कचोटने वाली तब्दीली काशी के परंपरा के विस्थापन के रूप में दिखती है। बनारस की सुबह का एक स्थापित नियम था—भोर की पहली किरण के साथ गंगा में स्नान करना, तांबे के लोटे में गंगाजल, फूल और बेलपत्र लेकर नंगे पैर बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ जाना। यह दर्शन किसी वीआईपी पास या कतार प्रबंधन का मोहताज नहीं था, यह भक्त और भगवान के बीच का एक सहज, अनौपचारिक और दैनिक पारिवारिक संवाद था।बाबा के दरबार के ये पारंपरिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले स्थानीय लोग) इस शहर की आत्मा थे। आज वे नेमी इस वीआईपी संस्कृति, सुरक्षा के कड़े घेरों और पर्यटकों की असीम और अभूतपूर्व भीड़, सुरक्षा के कड़े चक्रव्यूहों और कॉर्पोरेट कतारों के बीच खुद को शापित और उपेक्षित महसूस करते हैं।
       भव्यता का मलबे और आत्मीयता का विस्थापन के नींव पर दर्शन और आस्था के भौतिक और दृश्यमान बदलाव का यह जो नया 'इवेंट मैनेजमेंट' स्वरूप उभरा है, उसने बनारस के मूल आध्यात्मिक एकांत को एक कोलाहलपूर्ण पर्यटन केंद्र में बदल दिया है। आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ की लहरों पर संगीत गूंज रहा है, और रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच 'सुबह-ए-बनारस' का वह पारंपरिक, आध्यात्मिक सन्नाटा कहीं खो गया है, जहाँ बैठकर कभी कबीर ने रूढ़ियों पर प्रहार किया था, तुलसीदास ने रामचरितमानस की चौपाइयाँ रची थीं और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने गंगा की लहरों को अपने शहनाई के सुर सौंपे थे , रत्नाकर ने अपनी लाविनी के साथ गंगालहरी गाते हुये गंगा मे स्वयं को तिरोहित कर दिया था। शंकराचार्य ने डोम के रूप मे शिव का साक्षात कर शिवोहम् शिवोहम का अस्तित्व स्वीकार किया। आज का बनारस 'हेरिटेज टूरिज्म' के शोरूम में सजे किसी महंगे शो-पीस जैसा होने लगा है, जिसे पर्यटक दूर से देख तो सकते हैं, पर उसके भीतर की तरलता को महसूस नहीं कर पाते। बाज़ारीकरण के दबाव के चलते जो दर्शन कभी एक सहज, आत्मीय और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था, वह अब एक 'इवेंट' (आयोजन) बन चुका है। आस्था का यह बाज़ारीकरण बनारस के मूल धार्मिक चरित्र पर एक गहरी चोट है।आजकल यह नया शब्द बहुत चलन में है—'हेरिटेज टूरिज्म' या 'सांस्कृतिक पर्यटन'। बनारस इसका सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि संस्कृति को 'बेचना' और संस्कृति को 'जीना'—दो अलग-अलग बातें हैं।
आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ चल रहे हैं, रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच घाटों की वह पारंपरिक शांति, सुबह-ए-बनारस का वह आध्यात्मिक एकांत, जहाँ बैठकर कभी कबीर, तुलसी और बिस्मिल्लाह खान ने अपनी साधना की थी, वह शोरूम की खिड़की में सजे किसी शो-पीस जैसा हो गया है। पर्यटक यहाँ 'बनारसियत' को देखने आ रहे हैं, लेकिन उन्हें जो परोसा जा रहा है, वह असली बनारस नहीं बल्कि उसका एक चमक-दमक वाला 'वर्शन' (संस्करण) है।
मूल बनारसी जो घाट पर घंटों बैठकर गंगा की लहरों को निहारते हुए जीवन के परम सत्य को पा लेता था, वह अब इस भीड़ और कमर्शियलाइजेशन (व्यावसायिकता) के कारण घाटों से दूर होता जा रहा है।
             बनारस सिर्फ आलीशान इमारतों और चौड़ी सड़कों का नाम नहीं है; यह एक मिजाज है, एक जीने का सलीका है।बनारस की असली पहचान उसकी वास्तुकला से ज्यादा उसकी सामाजिक जीवनशैली में निहित थी। यहाँ की 'अल्मस्ती', 'फक्कड़पन' और 'मौज' दुनिया के किसी भी आधुनिक शहर के लिए एक पहेली जैसी थी।  आज, शहर के बाहरी इलाकों से लेकर मुख्य भूभाग तक खड़ी हो रही बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली ऊंची इमारतें इस पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को निगल रही हैं। बनारस के पुराने मोहल्लों मे मंदिर, घर के बाहर का चौतरा केवल बैठने की जगह नहीं था, वह एक खुली संसद था।  चबूतरा' केवल एक स्थापत्य (Architecture) नहीं था, वह एक खुली लोकतांत्रिक संसद था। वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर वर्ग—चाहे वह प्रोफेसर हो, सरकारी कर्मचारी हो, बुनकर हो या कोई आम रिक्शा चालक—बिना किसी औपचारिक झिझक के एक साथ बैठता था।वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर तबका बिना किसी भेदभाव ऊंचनीच के बैठता था।मोहल्ले के शास्त्री जी सुबह सुबह गंगा स्नान कर बाबा का दर्शन कर वहीं बैठते थे तो मुन्सीपाल्टी (म्यूनिसिपल बोर्ड) से मोहल्ले मे रोजाना झाड़ू मारने वाला स्वीपर भी। कंधे पर गमछा लपेटे, हाथ में सुरती (खैनी) मलते, बतकही करते हुये उंगली से सुंघनी मलते 'गप्पाजी' की मुद्रा में बैठे मोहल्ले से लेकर ब्रह्मांड का चिंतन करने वाले बनारसी वहाँ देश-दुनिया, राजनीति, धर्म और दर्शन समसामयिक राजनीति, धर्म, साहित्य और दर्शन पर ऐसी बेबाक और अचूक टिप्पणियाँ करते थे, जो बड़े-बड़े विचारकों और  थिंक-टैंकों को हैरान कर दें। वह संवाद निश्छल था, उसमें कोई व्यावसायिक स्वार्थ नहीं था।यह 'गप्पाजी' और बतकही अपने आप मे एक मजबूत सूचना नेटवर्क था जो हर घर परिवार के सुख दुख हालचाल स्वास्थ्य समृद्धि लेन देन का प्लेटफार्म था। यह चबूतरा व्यवस्था पूरे मोहल्ले का संवाद तंत्र था। वहां अल्हड़पन, अकारण मुस्कुराहट और घाटों-गलियों में 'सुख' की तलाश होती थी।आज इन चबूतरों की जगह बहुमंजिला इमारतों की ऊंची, बंद दीवारों और लिफ्ट संस्कृति और बंद दरवाजों वाले एकांतवास ने ले ली है। आधुनिक अपार्टमेंटों ने लोगों को भौतिक रूप से पास पास तो ला दिया है, लेकिन उनके बीच की मानसिक और सामाजिक दूरियों को अनंत काल तक बढ़ा दिया है। अब मोहल्लों में वह सामूहिक ठहाका और अकारण मुस्कुराने की प्रवृत्ति गायब हो रही है। आज अपार्टमेंट की  लिफ्ट संस्कृति ने उस जीवंत संवाद को समाप्त कर दिया है। अब चबूतरों पर वह सामूहिक ठहाका नहीं सुनाई देता। आधुनिक जीवन की आपाधापी, कॉरपोरेट नौकरियों के दबाव और ईएमआई (EMI) के तनाव ने बनारसी मिजाज की उस बेफिक्री को सोख लिया है, जो कभी इस शहर का ट्रेडमार्क हुआ करती थी।
बीते बारह वर्षों में काशी ने अभूतपूर्व आर्थिक और भौतिक विकास देखा है। चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का जाल, फुलवरिया फोरलेन, और आसमान को छूने को बेताब रोपवे जैसी आधुनिक यातायात सुविधाओं ने शहर की रफ्तार बढ़ा दी है। ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट वाली इमारतों ने बनारस के क्षितिज (स्काईलाइन) को बदल दिया है। लेकिन, इस कंक्रीट के चमकते जंगल के पीछे बनारस की वह सदियों पुरानी पहचान कहीं खो गई है, जिसे हम गर्व से 'बनारसियत' कहते थे।
लेकिन, अर्थशास्त्र के स्थापित नियम जहाँ तरक्की का जश्न मना रहे हैं, वहीं समाजशास्त्र और संस्कृति के मोर्चे पर एक बड़ा शून्य उभर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि भूगोल के इस तीव्र विस्तार में क्या हमारा इतिहास संकुचित नहीं हो रहा है? चौड़ी होती सड़कों के समानांतर क्या हमारे दिलों और सामाजिक संवाद की संकरी गलियां और संकुचित नहीं होती जा रही हैं? विकास का यह पहला कॉलम जितना चमकदार है, इसकी कीमत उतनी ही गंभीर है। यह सच है कि बुनियादी ढांचे के विकास से रोजगार बढ़ा है, पर्यटन को पंख लगे हैं और यातायात सुगम हुआ है। लेकिन क्या भौतिक समृद्धि के बदले अपनी सांस्कृतिक विरासत और आत्मीयता को खो देना सही है? आज का बनारस पर्यटकों के लिए तो आकर्षक हो गया है, पर मूल बनारसियों के लिए थोड़ा अजनबी सा होने लगा है।
हमारा उद्देश्य विकास का विरोध करना कतई नहीं है। सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, यातायात सुगम होना चाहिए, स्वास्थ्य और शिक्षा की आधुनिक सुविधाएं हर नागरिक को मिलनी चाहिए। यह समय की मांग है और इस प्रगति का स्वागत होना ही चाहिए।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी पहचान की कीमत पर ही होना चाहिए? क्या हम ऐसा आधुनिक शहर नहीं बना सकते जो अपनी जड़ों से भी जुड़ा रहे?
यूरोपीय देशों ने अपने प्राचीन शहरों (जैसे रोम, वेनिस या क्योटो) के ऐतिहासिक और पारंपरिक स्वरूप से बिना कोई छेड़छाड़ किए, उन्हें आधुनिक सुविधाओं से लैस किया है। उन्होंने अपनी पुरानी बसावट, गलियों और सामाजिक चरित्र को संरक्षित रखते हुए शहर के बाहर नया विकास किया।बनारस के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन' की आवश्यकता थी और आज भी है।यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, शानदार गाड़ियाँ होंगी, आलीशान अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी मिजाज, वह 'साझा संस्कृति', वह 'अल्हड़पन' और 'अपसंस्कृति से दूर रहने की फक्कड़ता' नहीं होगी, तो यकीन मानिए, वे एक बहुत अमीर शहर में तो रहेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे।
इस शहर को आधुनिक विकास की गति  देने वाले नीति-नियंताओं तक यह आवाज पहुंचनी जरूरी है कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' जरूर बनाइये, लेकिन इसकी 'बनारसियत' की बलि चढ़ाकर नहीं। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के अनुभव और साधना से उपजी संस्कृतियां अगर एक बार मर गईं, तो उन्हें दोबारा जीवित करना असंभव होगा।बनारस की आत्मा को बचाना ही इस शहर के अस्तित्व को बचाना है।विकास जरूरी है, समय के साथ चलना भी अनिवार्य है। परंतु, यदि विकास की इस आंधी में काशी की अल्मस्ती, बनारसी पान की मिठास, घाटों की शांति और अपनों के बीच की वह 'गपशप' ही गायब हो जाएगी, तो यह शहर सिर्फ एक ढांचा बनकर रह जाएगा। हमें यह समझना होगा कि बनारस की ताकत इसके कंक्रीट में नहीं, इसकी 'बनारसियत' में है। यदि हम इसे नहीं बचा पाए, तो आने वाली पीढ़ियां एक समृद्ध शहर तो पाएंगी, लेकिन वह 'जीती-जागती काशी' खो चुकी होंगी।
यह सही है कि आज की आधुनिक जरूरत के लिहाज से सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, सीवेज सिस्टम आधुनिक होना चाहिए, रोपवे और हवाईअड्डे बनने चाहिए, क्योंकि यह समय की मांग है और नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के लिए आवश्यक है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान की बलि देकर ही संभव है? दुनिया के कई प्राचीन देशों (जैसे इटली का रोम, वेनिस या जापान का क्योटो) ने अपनी प्राचीन बसावट, संकरी गलियों और सामाजिक चरित्र को बिना छुए, शहर के बाहर नए उपनगरों का विकास किया और अपनी प्राचीन कोर-सिटी को एक जीवित संग्रहालय के रूप में संरक्षित रखा। काशी के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन और सतत विकास' (Sustainable Development) की आवश्यकता थी।
यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, आलीशान गाड़ियाँ और अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी आत्मीयता, वह साझा संस्कृति और बेफिक्री का अल्हड़पन नहीं होगा, तो वे एक समृद्ध शहर में तो सांस लेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे। नीति-नियंताओं और प्रबुद्ध समाज को यह सोचना होगा कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' बनाते-बनाते हम इसके 'बनारसियत' के प्राण न हर लें। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे और सड़कें कुछ महीनों में दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के साझा सांस्कृतिक अनुभवों से उपजी जीवनशैलियां अगर एक बार विलुप्त हो गईं, तो उन्हें किसी भी तकनीक से दोबारा जीवित करना असंभव होगा।
https://chitravansh.blogspot.com
काशी,कृष्ण पक्ष द्वितीया, भाद्र, संवत2083वि0
रविवार, 30 अगस्त 2026

रविवार, 23 अगस्त 2026

आधुनिक व्यवसायिक बयार मे बदलता बनारस.......

आधुनिक व्यवसायिक  व्यवसायिक बयार मे बदलता बनारस......

             हमारा शहर बनारस. युगों-युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को शहर बनारस ऐसा भाया कि उन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों, मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या? तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता? बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री. मकान बनवाओ चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
दिक्कत शुरू हुई सन 2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो अनियोजित विकास के महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक, ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के होड़ देने पर विराम लगा," न तो मै यहां लाया गया हूं, न ही मुझे किसी ने भेजा है। मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है."
बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने अपने क्षेत्र का दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा. कभी उपेक्षित सा पड़ा बनारस बदलाव के राह पर चल पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने अपने संसदीय क्षेत्र के लिये बजट के नाम पर अवरोध बने आर्थिक और वित्तीय संसाधनों का पिटारा खोल दिया तो आज वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा होने लगी है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। इक्कीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में वाराणसी स्टेशन से काशी विद्यापीठ और सिगरा होते हुए रथयात्रा -महमूरगंज चौराहे तक पहुंचने में कम से कम 25-30 मिनट लगते थे. दूरी सिर्फ 4 किलोमीटर के आसपास ही थी, लेकिन जाम ऐसा कि पसीना छूट जाता. आप पोंछते रहिए. अगर बीएचयू जाना हो तो 45 मिनट का समय लगना आम बात थी. लेकिन पिछले कुछ साल में गंगा में बहुत पानी बह चुका है. बनारस के बाहर ही नही भीतरी सड़कों पर भी काफी परिवर्तन हुये है। अतिक्रमण से लगातार दुबली होती गई सड़के अब चौड़ी हो गई हैं। शहर के बाहर तेज रफ्तार से भागते ट्रकों के लिये रिंगरोड के अलावा शहर के अंदर फुलवरिया फोरलेन, बीएलडब्लू रविन्द्रपुरी भेलूपुर फोरलेन, मोहनसराय कैण्ट राजघाट फोरलेन ने  पहले की स्थितियों को बदल दिया है।जिसने काशी को उन दिनों देखा था वे आज की काशी को देखकर स्वाभाविक रूप से अचंभित हो सकते हैं। उबड़-खाबड़ सड़कें. सड़कों के किनारे जगह-जगह बिजली के पोल और पोल पर लटके बेतरतीब तार. बिजली से लेकर टेलीफोन और केबल नेटवर्क के तार. तार नहीं जंजाल हो जैसे. यूपी में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, किसी ने बाबा विश्वनाथ की नगरी को संवारने के बारे में नहीं सोचा. किसी की सोच वोट बैंक से ऊपर उठ ही नहीं सकी.एक बार जब मोदीजी वाराणसी दौरे पर थे. तब उन्होंने भी इस ओर इशारा किया था- “जब काशी के लोगों ने 2014में  विकास का संकल्प लिया था. कई लोगों को लगता था कि बनारस में कोई बदलाव नहीं हो पाएगा. लेकिन काशी के लोगों ने करके दिखा दिया. देश के लोग काशी के विकास से मंत्रमुग्ध हैं.”
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 14 में से 8 प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही रहे, लेकिन बाहर से यूपी आकर, वाराणसी से चुनकर लड़कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले नरेंद्र मोदी पहले ही हैं. जब नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में नामांकन के लिए वाराणसी पहुंचे थे, तब जो उन्होंने कहा था, वो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया था- “ना किसी ने मुझे यहां भेजा है, ना मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है.”
तब नरेंद्र मोदी ने काशी को क्योटो बनाने की बात कही थी. पता नहीं तब काशीवासियों को कितना यकीन या भरोसा हुआ होगा, कितने लोगों ने बातें बनाई होंगी, लेकिन पिछले वर्षों में काशी में जो काम हुए हैं, उनसे ये भरोसा अब यकीन में बदलने लगा है कि काशी का कायाकल्प हो सकता है और काफी हद तक पीएम मोदी ने करके दिखाया है. शुरूआत काशी विश्वनाथ धाम कारीडोर से करें तो नगर के ही नही नगर से लगे मंदिरों को भी पर्यटक स्थल के रूप मे सरकार ने विकसित किया है। सारनाथ शूल टंकेश्वर मार्कण्डेय महादेव कालभैरव पंचकोसी सहित बहुतेरे धार्मिक स्थलों पर कार्य प्रगति पर है। चूंकि संसदीय सीट देश के प्रधानमंत्री की है तो प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद दिलचस्पी दिखाते हैं. औसतन 21 दिनों में एक दौरा वाराणसी का करते हैं और लगातार विकास कार्यों की समीक्षा करते रहते हैं. वाराणसी के विकास के लिए अब तक हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं दी गई हैं. कुछ पर काम पूरा हो चुका है. कुछ पर काम जारी है और कुछ काम अभी पाइपालाइन में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं “पीएम जब भी काशी आते हैं, हमेशा सौगात लेकर आते हैं.” हम सभी जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने  यूपी के राजनीतिक इतिहास मे पहली बार दो निरंतर पारी पूरा किया है. इन सालों में ही योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी के विकास उन्मुख परियोजनायों को लगातार हरी झण्डी देने के साथ प्रदेश सरकार से भी अनेकों  सौगातें दी है. जो मूलभूत संरचनाओं के साथ शिक्षा चिकित्सा पर्यटन यातायात विकास से जुड़ी हुई हैं। राजातालाब मे वेयर हाऊस, गोदौलिया बेनियाबाग टाऊनहाल कचहरी मे मल्टीलेवल पार्किंग, ईबसों का पूरा जखीरा, मिर्जामुराद मे ई चार्जिं स्टेशन और ईबस टर्मिनल, बनारस लखनऊ, बनारस आजमगढ़, बनारस गाजीपुर मार्ग का फोरलेन सिक्सलेन चौड़ीकरण, रामनगर पड़ाव मार्ग का चौड़ीकरण, कचहरी सारनाथ संदहा मार्ग का चौड़ीकरण, आशापुर फ्लाईओवर, सारनाथ का सौन्दर्यीकरण व विकास,
लालबहादुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का विस्तारीकरण, काशी रेलवे स्टेशन पर जल वायु सड़क मार्ग का समन्वित टर्मिनल, अंतर्राज्यीय नौपरिवहन, शहर के अंदर आने वाली सभी सड़कों का फोरलेन मे चौड़ीकरण, बनारस, वाराणसी और काशी रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण, देश के पहले शहरी रोप-वे के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी इसमें शामिल है. वर्तमान समय मे बनारस से कई अंतरराष्ट्रीय उड़ान के साथ साथ देश के लगभग सभी बड़े शहरों और राजधानियों के लिये वायु सेवा उपलब्ध है। वहीं  बनारस से रेलवे की अत्याधुनिक प्रीमियम रेल सेवा वंदे भारत सहित देश के हर कोने तक रेल कनेक्सन बन चुका है। चिकित्सा में बनारस का एम्स भले नही मिला पर बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान को लाइक एम्स इंस्टिट्यूट बनाये जाने के साथ ही नेशनल एजिंग जिरियाट्रिक सेन्टर, सुपर स्पेशियलिटी सेन्टर, रीजनल आई स्पेशियलिटी सेन्टर, देश के सबसे बड़े आपातकालीन केन्द्रों मे शामिल ट्रौमा सेन्टर लेवल 1, इंस्टिट्यूट आफ बोन मैरो ट्रांस्प्लांटेशन, 150 बेड की क्रिटिकल केयर यूनिट के साथ पावर ग्रिड आफ इंडिया के सीएसआर फण्ड से मरीजों के परिजनों के ठहरने के लिये 200 बेड का विश्राम सदन बना कर एम्स की भरपाई की कोशिश की गई है। इसके अतिरिक्त महामना कैंसर इंस्टिट्यूट, आरजे शंकर नेत्रालय, सद्गुरू नेत्र चिकित्सालय के अतिरिक्त सोवा रिग्पा मेडिकल कालेज, ईएसआईसी मेडिकल कालेज, सरस्वती शिवकिशन दमानी मेडिकल कालेज, होम्योपैथिक मेडिकल कालेज जैसे सरकारी और कुछ प्राईवेट मेडिकल कालेजों की स्थापना के साथ कबीरचौरा अस्पताल का आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण, राजकीय आयुर्वेदिक कालेज का उन्नयन होने  से आने वाले दिनों मे बनारस मेडिकल हब बनने की दिशा मे अग्रसर है। शिक्षा के क्षेत्र मे किये जाने वाले कार्य अपने प्रचार प्रसार से दूर अपने उद्देश्यपूर्ति मे लगे हुये हैं। सेन्ट्रल इंस्टिट्यूट आफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नॉलाजी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नेशनल इंस्टिट्यूट आफ फैशन टेक्नालॉजी, इंडियन इंस्टिट्यूट आफ जेम्स एण्ड ज्वेलरीज जैसे अत्याधुनिक  संस्थान जो केन्द्र सरकार ने स्थापित किया है उनकी तो चर्चा ही नही होती। रोप वे, रूद्राक्ष, दीनदयाल हस्तकला संकुल, संपूर्णानंद स्टेडियम, नमोघाट, निर्माणाधीन मण्डलीय कार्यालय भवन डमरू, निर्माणाधीन नगर निगम मुख्यालय त्रिशूल, काशी रेलवे स्टेशन पर जल भूतल और वायु परिवहन का समन्वित टर्मिनल , दालमण्डी सड़क चौड़ीकरण परियोजना बनारस के विकास की नई इबारत लिखने को तैयार हैं।
पीएम मोदी ने काशीवासियों को संबोधित करते हुए रोप-वे के बारे में कहा, “बनारस के जाम से डरने वालों के लिए रोप-वे अच्छी चीज है. इसके बनने पर कैंट रेलवे स्टेशन और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बीच की दूरी कुछ मिनटों की ही रह जाएगी. गोदौलिया के जाम की दिक्कत भी बहुत हद तक घट जाएगी. जाम की वजह से बनारस घूमने से बचने वाले लोगों के लिए रोप-वे बनने के बाद घूमना आसान हो जाएगा.” आने वाले नवरात्रि से संचालित होने वाले ये रोपवे सड़क से 50 मीटर की ऊंचाई पर वाराणसी स्टेशन से गोदौलिया तक 3.8 किलोमीटर की यात्रा कराएगा. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कांप्लेक्स सिगरा में निर्मित वर्ल्ड क्लास इनडोर स्टेडियम में क्रिकेट, फुटबाल, एथलेटिक्स ट्रैक, चार लॉन टेनिस कोर्ट, बास्केटबाल कोर्ट, वॉलीबाल कोर्ट, दो कबड्डी कोर्ट ड्रेसिंग और कैफेटेरिया भी है. अनुमान है कि ओलंपिक में खेले जाने वाले 28 में से 24 खेल इस स्टेडियम में खेले जा सकेंगे.
शहर के सीवेज का गंदा पानी सीधे गंगा में मिलने से रोकने के लिए नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत बीएचयू के पास भगवानपुर में 55 एमएलडी शोधन क्षमता वाला ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है. शहर मे सीएनजी पंपों सहित घरों मे गैसपाईपलाईन लगावकरवपीएनजी आपूर्ति , मियावाकी वन, सीएनजी गाड़ीयों, ई वाहनों, घरेलू सोलर सिस्टम जैसी सुविधाओं के माध्यम से 
नगर के पर्यावरण प्रबंधन  व उर्जा जरूरतों को पूरी करने  के प्रयास निरंतर जारी है। शहर के चारो दिशाओं मे रोडवेज स्टेशन, मोहनसराय मे ट्रांसपोर्ट नगर, शहर से लगे हुये रिंगरोड क्षेत्र मे टाउनशिप, राजघाट मे सिगनेचर ब्रिज और नया रेल कारीडोर, गंगा व वरूणा एलिवेटेड रोड  जैसी परियोजनायें आने वाले दिनों मे मूर्त रूप ले लेगी। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण परियोजना पर काम हो रहा है. वाराणसी के इसरवार गांव में एचपी के बॉटलिंग प्लांट को सीधे एलपीजी मिलेगी. गुजरात के कांडला बंदरगाह से मध्य प्रदेश होते हुए गोरखपुर तक पाइप लाइन केजीपीएल से एलपीजी की आपूर्ति परियोजना पर काम चल रहा है. बताते हैं कि यहां से वाराणसी समेत यूपी के 20 जिलों को LPG सिलेंडर की नॉन स्टॉप आपूर्ति होगी. इस बॉटलिंग प्लांट परियोजना का सीधा लाभ चंदौली, जौनपुर, गाजीपुर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र, आजमगढ़, बलिया, मऊ, अंबेडकर नगर, बांदा, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, रायबरेली, प्रयागराज, फतेहपुर, कौशांबी और चित्रकूट जिलों को मिलेगा.
स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोज़गार, पर्यटन और यातायात जैसे कई क्षेत्रों में काम जारी है. आरामदायक सफर के लिए कई योजनाओं पर काम चल रहा है. फ्लाईओवर, रिंग रोड, सड़कों का चौड़ीकरण देखने को मिल रहा है. प्रमुख संजीवनी के रूप में 325.59 करोड़ की शिवपुर फुलवरिया लहरतारा 4 लेन सड़क है. पर्यटन, रोजगार एवं सौंदर्यीकरण के अंतर्गत 72.63 करोड़ की लागत से सारनाथ बौद्ध सर्किट है, इसके साथ-साथ 39.20 करोड़ की लागत से पंचक्रोशी परिक्रमा यात्रा मार्ग भी है.
वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा हो रही है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. पर्यटक बढ़ने से काशी में रोज़गार के अवसर भी बढ़े और बढ़ रहे हैं. विकास बनारस का हो तो फायदा आसपास के इलाकों को भी मिलता ही है. पूर्वांचल और बिहार के लोग भी लाभ पा रहे हैं. इन सबसे बनारस की व्यवसायिक गतिविधियां तो बढ़ी है । रोजगार का भी सृजन हुआ है पर वह अल्पकालिक और अस्थाई और अवसरकालिक है। पर्यटन के क्षेत्र मे देशी पर्यटकों की संख्या मे कई गुना बढ़ोत्तरी से होटल, लान, स्टेहोम, और पर्यटन सेवा संबंधी सेवियों बढ़ने से रोजगार बढ़ा है। पर यह दीर्घकालिक नही है। बनारस को जरूरत है बंगलोर हैदराबाद पुणे जैसे आधुनिक साईबर सेवा उद्योग केन्द्र के रूप मे विकसित करने की। आज बनारस यातायात बिजली सेवा परिवहन और आधुनिक संसाधनों से लैश वह मुकाम प्राप्त कर चुका है जिसे साइबरसिटी के रूप मे विकसित किया जा सके। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि बनारस मे विकास की एक मजबूत नींव तैयार हो चुकी है अब जरूरत है उसे पुख्ता करने की। पर बनारस के विकास के साथ शहर की भीड़ बढ़ती जा रही है। अगल बगल के ही नही बिहार झारखण्ड और मध्यप्रदेश से भी लोगों का माइग्रेशन बनारस मे तेजी से हो रहा है। नजीजा शहर मे बढ़ती सुविधायें भी भीड़ की जरूरत के हिसाब से कम दिख रही है। जगजीत सिंह की एक गजल है " हर तरफ हर कहीं बेशुमार आदमी, हर नये दिन नया इंतजार आदमी". आज बनारस की हालत वैसी होती जा रही है.
साथ ही साथ यह भी शोचनीय है कि बनारस ने अपने इस विकास की क्या कीमत चुकाई है। बहुतेरे बनारसी यह मानते है कि बनारस के व्यवसायिकआधुनिकीकरण से बनारसियत मर रही है। बनारसियत को क्या नुकसान हुआ है? शहर ने अपने मूल स्वरूप और स्वभाव मे क्या बिखराव पाया है ? यह एक अलग सवाल है ,जिस पर हम आगे चर्चा करेगें।

काशी, श्रावण शुक्ला एकादशी संवत 2087 वि0,
रविवार, 23 अगस्त,2026
https://chitravansh.blogspot.com

रविवार, 16 अगस्त 2026

काशी मे सूरज की पहली किरण......../ व्योमवार्ता

काशी मे सूरज की पहली किरण....
                        कभी काशी में उगते पहले सूरज को देखिये। राजघाट पुल के पार गंगा के किनारे से लाल रंग से नारंगी रंग में बदलते धीरे धीरे ऊपर उठते हुये। नमो घाट से भी पूरब आदिकेशव घाट के सामने थोड़ा तिरछे हो कर अपने पहले प्रकाश से आदि केशव मंदिर को आलोकित करते हुये। काशी में भगवान भाष्कर अपनी रोज की यात्रा वहीं से प्रारंभ करते है जहां भगवान विष्णु ने काशी में अपना प्रथम कदम रखा था । स्कंद पुराण के काशी खंड में आदि केशव मंदिर स्थापना का वर्णन मिलता है। यह काशी के अति प्राचीनतम् मंदिरों में से है जिसने पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के कई महत्वपूर्ण घटनाओं को देखा है। मिथकीय मान्यताओं के अनुसार मंदार पर्वत के दृढ़ तपस्या से प्रसन्न हो कर उसे भगवान शिव ने मंदराचल पर्वत पर स्वयं आ कर निवास करने का वरदान दिया और काशी स्थित सभी देवी देवताओं के साथ मंदराचल पर्वत पर चले गये। ब्रह्‌मा जी ने दोषरहित शासन के शर्त पर काशी के शासन व्यवस्था को संभालने हेतु राजा दिवोदास को सौंपा । दिवोदास इतने धर्मात्मा थे कि उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखमय व कंटकहीन जीवन व्यतीत करने लगी। कहीं से भी कोई भी दोष उनके शासन वावस्था में नहीं मिला। दिवोदास के कुशल शासन और लोकप्रियता से देवगण उनसे ईस्या करने लगे और बदनाम करने का प्रयास करने लगे। देवगण के अनेको प्रयास‌ों के बावजू‌द भी राजा दिवोदास की कीर्ति में कोई आंच नहीं आई। वे अपने कठोर तपस्या एवं कुशल शासन व्यवस्था के बल पर अपनी प्रजा में लोकप्रिय बने रहे जिससे प्रजा पूर्वपूजित देवी देवताओं को भूलने लगी और देवदास की हो पूजा करने लगी। उन्होंने लगभग 80,00 वर्षों तक काशी पर शासन किया।
पर काशी के देवाधिदेव भगवान शिव काशी से विरह के कारण व्याकुल थे। कोई भी शीतलक उन्हें शांत नहीं कर पा रहा था। काशी से बहने वाली हवा भी उन्हें ठंडा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उनके शरीर पर चंदन का लेप लगाया गया, कोमल कमल की डंठले बांधी गई और भगवान शिव को शांत करने के लिए अनेक उपाय किए गए, लेकिन किसी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।बाहर से शांत दिखने के बावजूद, वह काशी से वियोग के कारण उत्पन्न सभी पीड़ा को मन ही मन सहन कर रहे थे। देवतागण यह सोच रहे थे कि पार्वती देवी के आगमन से भगवान शिव के मन मे सती देवी के वियोग का कष्ट भी दूर हो गया है। परन्तु महादेव शिव के लिये काशी से वियोग की अग्नि उससे कहीं अधिक तीव्र थी।
भगवान शिव की स्थिति को समझते हुए, पार्वती देवी ने काशी की महिमा का वर्णन किया और उनसे कहा कि उन्हें तुरंत काशी के लिए प्रस्थान करना चाहिए। यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और पार्वती देवी से प्रसन्न होकर उन्होंने आश्वासन दिया कि वे जल्द से जल्द काशी पहुँचने का प्रयास करेंगे। अब भगवान शिव राजा दिवोदास को काशी से हटाने का उपाय सोच रहे थे। पूरी काशी दिवोदासमय हो चुकी थी।उस समय उन्होंने योगिनियों का एक समूह देखा। पार्वती देवी से परामर्श करने के बाद, उन्होंने 64 योगिनियों के समूह को काशी भेजा। 64 योगिनियों को ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी थी या कोई ऐसा उपाय खोजना था जिससे राजा दिवोदास तंग आकर सिंहासन त्याग दें। योगिनियों ने भगवान शिव का आदेश सहर्ष स्वीकार किया और काशी के लिए रवाना हुई।ये अनियमित तरीकों से काशी में प्रवेश कर गईं और अपनी रहस्यमयी शक्तियों का उपयोग करते हुए विभिन्न रूप और गतिविधियों अपना लीं। एक योगिनी नर्तकी बन गई तो दूसरी हस्तरेखा शास्त्र में पारंगत हो गई। इस प्रकार, सभी योगिनियों ने भगवान शिव के मिशन को पूरा करने के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ या पेशे अपना लिए। लेकिन उनमें से कोई भी राजा दिवोदास में कोई दोष नहीं निकाल सकी।
अंततः उन्होंने हार तो मान ही ली बल्कि काशी शहर के आकर्षण में आकर वहीं रहने का फैसला किया। उन्हें वापस जाने और अपने गुरु को यह बताने से भी डर लग रहा था कि वे उनका मिशन पूरा नहीं कर पाई। योगिनियों के न लौटने पर भगवान शिव ने अपने सेवकों, गणों को काशी भेजा। लेकिन वे भी भगवान शिव को सूचना नहीं दे पाए। गण काशीवासियों को प्रभावित करने में असफल रहे। इसलिए, अपनी विफलता पर शोक करते हुए, उन्होंने काशी में ही रुककर शिवलिंग स्थापित करने और उनकी पूजा करने का निर्णय लिया। इस प्रकार, भगवान शिव ने सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा को भेजा। सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा को भी राजा दिवोदास में कोई दोष नहीं मिला और इसलिए उन्होंने काशी में ही रहने का निर्णय लिया। वास्तव में, भगवान ब्रह्मा पवित्र गंगा के तट पर अश्वमेध यज्ञ करना चाहते थे। लेकिन राजा दिवोदास ने दशाश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस प्रकार, दशाश्वमेध यज्ञ स्थल दशाश्वमेध घाट के नाम से जाना जाने लगा। चौसठ योगिनियों, गणों, सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा के अपने मिशन से वापस न लौटने से चिंतित होकर, भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश को बुलाया। उन्होंने गणेश को काशी जाकर राजा दिवोदास के शासन का अंत करने का उपाय खोजने का आदेश दिया। भगवान गणेश ने ही अपने पिता भगवान शिव के पक्ष में स्थिति को पलट का प्रयास किया।भगवान गणेश ने ज्योतिष के जानकार ब्राहम्ण का रूप धारण किया। वे विभिन्न घरों मे जाकर ज्योतिषीय भविष्यवाणी करते थे। वे राज्य मे एवं रानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गये। रानियां अप्रत्यक्ष रूप से राजा से
इस पुराने ब्राह्मण ज्योतिषी के बारे में बातें करने लगी। राजा के सामने और आप भी अपने निजी बातचीत में उनकी प्रशंसा करती रहती थीं।
एक बार रानी लीलावती ने राजा दिवोदास के समक्ष उस ब्राह्मण की प्रशंसा की और उनसे कहा कि वे उस ब्राह्मण से मिले। राजा दिवोदास ने इसकी अनुमति दे दी। रानी लीलावती ने अपनी चतुर सहेली को भेजा और ब्राह्मण को राजा के दरबार में बुलाया।भावपूर्ण बातचीत के बाद ब्राह्मण वापस लौटा और राजा उनसे बहुत प्रसन्न हुये। उन्होंने रानी लीलावती के समक्ष ब्राह्मण की खूब प्रशंसा की और अगले दिन सुबह उसे अपने महल में आमंत्रित किया।राजा दिवोदास ने एकांत में वृद्ध ब्राह्मण से पूछा कि उनके कल्याण के लिए कौन से कर्म लाभदायक हैं। राजा दिवोदास ने राजा के रूप में अनेक पुण्य कर्म किए थे, परन्तु उनका मन इन कर्मों में नहीं लगता था। वे उस ब्राह्मण से परम सत्य जानना चाहते थे, जिसे वे उच्च बुद्धि और ज्ञान का धनी मानते थे। वृद्ध ब्राह्मण ने राजा दिवोदास की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक सच्चे और धर्मात्मा राजा के रूप में वर्णित किया। उन्होंने राजा को सूचित किया कि उस दिन से शुरू होने वाले अठारहवें दिन उत्तर दिशा से एक ब्राह्मण आएगा और राजा को सलाह देगा। राजा को उस ब्राह्मण की सलाह का निःसंकोच पालन करना था। इसके बाद, भगवान गणेश अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए काशी में ही रहे।
जब भगवान गणेश मंदार पर्वत पर नहीं लौटे, तो भगवान शिव चिंतित हो गए और भगवान विष्णु से मिले, जिन्होंने उनकी सहायता करने का प्रस्ताव रखा। भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी के साथ काशी के लिए रवाना हुए। काशी पहुँचकर, भगवान विष्णु ने पवित्र गंगा और पवित्र वरुण नदी के संगम पर इसी घाट पर स्नान किया। तब से यह गंगा वरूणा संगम पदोदक तीर्थ के नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि भगवान विष्णु ने यहाँ अपने चरण कमलों को धोया था।लक्ष्मी देवी और गरुड़ के साथ, भगवान विष्णु ने यहाँ अपने दैनिक अनुष्ठान किए। उन्होंने अपनी एक प्रतिमा बनाई और स्थापित किया। काशी के उस क्षेत्र को, जहाँ भगवान विष्णु ने स्नान किया और अपनी प्रतिमा स्थापित की, श्वेतद्वीप के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास कई तीर्थ हैं, जिनमें महालक्ष्मी तीर्थ भी शामिल है, जहाँ देवी लक्ष्मी प्रतिदिन स्नान करती थीं। वहाँ उनकी प्रतिमा भी स्थापित है। भगवान विष्णु द्वारा तराशी गई प्रतिमा में प्रवेश करने के बाद, वे भगवान शिव के मिशन को पूरा करने के लिए आंशिक रूप से बाहर आए। भगवान विष्णु ने काशी के उत्तर में अपने निवास के लिए धर्मक्षेत्र नामक एक क्षेत्र की रचना की।
भगवान विष्णु ने पुण्यकीर्ति नामक एक साधु का रूप धारण किया, जो तीनों लोकों के लिए आकर्षण का स्रोत थे। लक्ष्मी देवी ने विज्ञानकौमुदी नामक एक अत्यंत सुंदर परिव्राजिका (स्त्री साध्वी) का रूप धारण किया। उनके प्रकट होने से संसार थम सा गया। गरुड़ ने एक अद्वितीय रूप धारण किया और विनायकीर्ति नाम से उनके शिष्य बन गए। शिष्य विनायकीर्ति अपने गुरु पुण्यकीर्ति के प्रति अत्यंत समर्पित थे, जिन्होंने उन्हें अहिंसा सहित धर्म के विभिन्न सिद्धांतों का ज्ञान दिया। काशी के लोगों ने पुण्यकीर्ति के उपदेशों के बारे में दूसरों से सुना और उनसे मिलने गए। वहीं, विज्ञानकौमुदी ने काशीवासियों से कहा कि वे केवल वही मानें जो वे देखते हैं और शरीर के सुख की ही तलाश करें। उन्होंने लोगों को भौतिक सुख की आवश्यकता और उसे प्राप्त करने के विभिन्न साधनों के बारे में बताया।
उसने कुछ लोगों को काला जादू भी सिखाया। इस तरह पुण्यकीर्ति और विज्ञानकौमुदी नागरिकों की भौतिक सुख की लालसा में उलझाकर उन्हें पापमय गतिविधियों में लिप्त करने में सफल रहीं। परिणामस्वरूप, राजा दिवोदास, जो अब अपने राज्य का संचालन नहीं करना चाहते थे, की शक्ति कम हो गई।
यह वृद्ध ब्राह्मण द्वारा बताई गई भविष्यवाणी के अनुसार दिन गिन रहा था। अठारहवें दिन, भगवान विष्णु पुण्यकीर्ति ब्राह्मण के रूप में राजा दिवोदास के द्वार पर प्रकट हुए। राजा ने पुण्यकीर्ति का बड़े आदर से स्वागत किया और उनकी पूजा की।
राजा ने पुण्यकीर्ति से सुख प्राप्ति के उपाय पूछे। उन्होंने राजा के रूप में अपनी उपलब्धियों का उल्लेख किया। पुण्यकीर्ति ने राजा की प्रशंसा करते हुए कहा कि राजा ने केवल एक ही पाप किया था। उन्होंने भगवान शिव को काशी से दूर रखा था।
           अतः राजा को शिवलिंग स्थापित करना पड़ा और पूरी श्रद्धा से उसकी पूजा करनी पड़ी। राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पुण्यकीर्ति को कई बार प्रणाम किया और उनकी सलाह मानने के लिए सहमत हो गए।भगवान विष्णु चले गए और काशी में स्थायी निवास के लिए एक स्थान की तलाश करने लगे। उन्होंने पंचानद में श्री आदि केशव के रूप में स्थायी निवास करने का निर्णय लिया।
              मान्यता यह है कि यहां प्रथम कदम रखने के साथ ही पवित्र गंगा एवं वरुणा के संगम स्थल पर भगवान विष्णु ने स्नान किया इस लिये यह पदोदक तीर्थ के नाम से जाना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार यहां की प्रतिमा स्वयं भगवान विष्णु द्वारा बनाई गई है। काशी में कुल 16 केशव मंदिर माने जाते है जिनमें यह आदिकालिक एवं सबसे प्रमुख है। स्कंद पुराण के काशी खण्डउत्तरार्द्ध के अध्याय 8 के 50वें श्लोक में यहां की महत्ता बताते हुये वर्णित है
आदित्य केशव: पूज्य आदि केशव पूर्वतः।
तस्य संदर्शनादेव मुच्यते चोच्च पातकै:।।
काशी के पूर्व भाग में  पूजनीय आदित्य केशव और आदि केशव विराजमान है केवल उनके श्रद्धापूर्वक दर्शनमात्र से ही मनुष्य बड़े से बड़े और भयंकर पापों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
          ऐतहासिक स्रोतों के अनुसार ग्याहरवीं सदी में गह‌ड़वाल वंश के राजाओं ने इए पादोदक तीर्थ पर आदि केशव मंदिर व घाट का निर्माण कराया था जिसे सन1194 में कुतुबु‌द्दीन ऐबक और 1196 में सिराबुद्दीन ने मंदिर का ध्वंश कर दिया एवं घाट तोड़वा दिया। लगभग छ: सौ वर्षों के बाद सन 1807 में  महाराज ग्वालियर सिंधिंया के दीवान माधोजी ने मंदिर का पुनर्निमाण करवाया। अपने काशी प्रवास के दौरान बंगाल की नेटोर की रानी भवानी ने आदिकेशव घाट का निर्माण करवाया परन्तु कुछ वर्षों बाद क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण ग्वालियर नरेश के दीवान नरसिंह राव शितोले ने घाट का पुनर्निर्माण करवाया। इस मंदिर का स्वतंत्रता आंदोलन से भी संबंध बताया जाता है। कहते है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के समय शहर की भीड़‌भाड़ से दूर एकान्त में स्थित होने के कारण क्रान्तिकारियों के लिये यह काफी सुरक्षित स्थान था जहां वे मिल कर अपनी योजना बनाते और रहते। गंगा वरूणा के संगम, स्थानीय सह‌योग एवं चारों तरफ काफी घने जंगल, जलमार्ग से बंगाल से लेकर दिल्ली पंजाब तक पहुंचने की सुगमता से यह मंदिर उनके लिये काफी उपयोगी था। परन्तु बाद में मुखबीरी के कारण यह स्थान अंग्रेजों की निगाह में आ गया और अंग्रेजी सेना ने पुजारियों को निस्कासित कर मंदिर पर कब्जा कर लिया और उसमें पुलिस चौकी बना दिया। दो साल बाद पुजारियों को मंदिर में देवार्चन की अनुमति मिली जो आज तक निर्वाध रूप से जारी है।
प्रायः मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि भगवान विष्णु ने काशी के आनंद कानन परिक्षेत्र को छोड़ कर एक छोर पर बसे शहर के पूरबी सीमा पर किनारे स्थित वाराणसी के अंतिम बिन्दु बरूणा गंगा के संगम स्थल से ही नगर में क्यों प्रवेश किया। सबकी अपनी मान्यताएं अलगअलग हो सकती है पर मैं जब गंगा घाट पर खड़े हो कर उगते सूरज से प्रकाशित हो रहे आदिकेशव घाट व मंदिर को देखता हूँ तो महसूस होता है कि सूरज की प्रथम किरण मन के मोह (चाहे वह अपने सर्वप्रिय राजा देवोदास के प्रति ही क्यों न हो) के अंधकार को मिटाने के लिये पूरब क्षितिज से प्रकट हो ज्ञान का प्रकाश लिये दिन चढ़ने के साथ शहर व पाचिम की ओर बढ़ती है जहां जीवन के शेष सोपान आपस में जुड़ते हुये संपूर्णता अथवा शून्यता की और ले जाते हैं। अतीत से मुक्त हो भविष्य का स्वागत करने। मेरे एक परिचित कहते है कि मनुष्य के चारो आश्रम उसके शरीर में नित्य प्रचालित रहते है। वह प्रातः उठ कर अपने नियमित दिनचर्या, कार्य की तैयारी करता है जो वानप्रस्थ है पुन: अपने कर्मयोग में लग जाता है दिन भर का यह कार्य गृहस्य आश्रम है। सायं अपने कार्यों की समीक्षा करते हुये परिवार के साथ समय व्यतीत करना और अपने अनुभव साझा करना वानप्रस्थ है और रात्रि में समस्त चेतना को विश्राम देते हुये सो जाना सन्यास । मुझे लगता है स्थान भी अपने वृत्ति में समय के साथ चारो आश्रमों को जीता है। पूरब में सूर्य की किरणों के पश्चिम की ओर शहर में बढ़ने के साथ साथ हम गंगा के किनारे इन चारो आश्रम की परिसीमा देखते है। आदि केशव से ओकारखंड तक और ओंकार खंड में प्रवेश करते ही शहर के उत्तरी किनारे में वाणिज्यिक गतिविधियाँ दिखने लगती है और विश्वेश्वरखंड से केदार खण्ड की ओर बढ़ते हुये वानप्रस्थ गतिविधियां, मंदिर, योग, ध्यान, पूजा। केदार खण्ड से आगे चलने पर महाश्मशान हरिश्चद घाट की यात्रा मोक्ष व सन्यास से जुड़ जाती है। यह जीवन यात्रा गंगा के प्रवाह के विपरीत पूरब से पश्चिम की ओर समय के अनुरूप चलती है। काशी की यह अनुभूति नितान्त व्यक्तिगत है। स्वयं की जीवन यात्रा है। जिसे हर कोई अपने अपने विचार और दृष्टि से विश्लेषण करने को स्वतंत्र है पर इन मान्यताओं से सबसे ऊपर जो मान्यता है वह काशी के अध्यात्म महत्ता विचार मिथक और दृढ़ विश्वास की जिसमे काशीवासी को अटूट विश्वास है और इस दृढ़ संकल्प के साथ कि उसके भोलेबाबा और मां अन्नपूर्णा उसकी मान्यताओं का मान बनाये रखेगें।
("काशी: इतिहास से परे" श्रृंखला का वक्तव्य)
काशी,श्रावण शुक्ल चतुर्थी, सं02083 विक्रमी, रविवार, 16अगस्त2027
https://chitravansh.blogspot.com

रविवार, 9 अगस्त 2026

मै अक्षर लिखूं तुम बनारस समझना....../ व्योमवार्ता

मैं अक्षर लिखूं तुम बनारस समझना......

आखिर क्या है बनारस? एक भीड़ भाड़ भरा जागता, शोर मचाता शहर? मंदिरों के घंटे घड़ियाल और कुछ समझ मे कुछ समझ में न आने वाले आरती, मंत्रों, प्रार्थनाओं का शहर ? अपने अस्तित्व को खोजती अस्सी (जिसे कोई नाला कहता है तो कोई नदी) और अस्तित्व से जूझती वरुणा नदी का शहर ? नमो घाट पर प्रणाम की मुद्रा में बने स्कल्पचर के नीचे पिकनिक मनाते और न्याय घाट से आगे चलने एकाकी हो जाने वाले हजूम का शहर ? सारनाथ के शांति वाले स्तू‌पों खण्ड‌हरों के बाहर सवारी के लिये शोर मचाते आटो टोटो वालों का शहर? काशी विश्वनाथ धाम परिसर में शिव की आस्था में घंटो घंटों पंक्तिबद्ध खड़े ज्ञानबापी मस्जिद को देख अपने 'शिव' को मुक्ति के लिये मन में प्रार्थना करते आस्थावानों का शहर ?
बनारस के इतने रूप है कि बनारस के लिये एक रुप देना संभव ही नहीं। मुझसे प्रायः पूछा जाता है कि आखिर क्या है बनारस ? और मैं हर बार बनारस के बारे में बताते हुये स्वयं संशयग्रस्त हो जाता हूं कि बनारस के विषय में मैंने यह तो बताया ही नहीं। सब कुछ बता कर के भी बहुत कुछ छूट जाता है। क्योंकि बनारस बताने का विषयवस्तु या शहर नहीं है वह महसूस करने का शहर है। बनारस को जानने के लिये खुद को 'बनारस' होना होगा। बनारस और बनारसी होने में मूलभूत अंतर है। बनारसी होने की एक सीमा रेखा है पर बनारस होना एक निरंतर गतिमान प्रक्रिया है जो अनादि से चल कर अनन्त तक निरंतर जीवन्त यात्रा है एक Living Organism के समान ।
                   कभीं कभी मै सोचता हूं कि अस्सी घाट पर बैठे बैठे बाबा तुलसीदास ने जब लिखा होगा 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' तो शायद उनके मन मे भगवान राम के प्रति अटूट निष्ठा भक्ति भाव के साथ काशी भी रही होगी तभी तो वे चित्रकूट के समीप राजापुर से चल कर अपने प्रिय भगवान श्री रामचंद्र की अयोध्या पहुँचने के मध्य शिवनगरी काशी में ही धूनी लगा बैठे,  
'उमा कहऊ मैं अनुभव अपना, सच हरि भजन जगत सब सपना' 
तो काशी में ऐसा क्या है जिसे विशेष तौर पर चिन्हांकित किया जा सके। इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास बस एक ही है कि काशी स्वयं में चिन्हांकित है वह काया भी है, माया भी है, मोक्ष भी है, काम भी है, अर्थ भी है और भाव भी है। काशी को देखने के लिये यदि भौतिक चक्षु की आवश्यकता है तो उसे साक्षात अनुभूति करने के लिये श्रद्धा चाहिये। काशी को 'काशी' बन कर ही अनुभूत किया जा सकता है।
 'सोई जानई जेहि देहु जनाई, जानत तुन्हहि तुम्हई होई जाई' 
वाले भाव से । काशी, बनारस, वाराणसी, आनंदकानन, मृगदाव सभी एक होते हुये भी सब अपने में एक है ।जो इतिहास से परे है, स्वयं में इतिहास है। सब की अपनी एक कहानी है अपना एक मिथक है अपना एक विश्वास है। पूरे शहर का ही नहीं, मोहल्लों का भी, घाटों का भी, मंदिरों का भी जो एक सम्मुचय हो कर भी एकक है। यह इतिहास बनारस वालो के मान्यताओं, आस्थाओं से बड़ा नहीं है। हो भी नहीं सकता तभी तो मार्क ट्‌वेन ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये "Banaras is older then history".
                 वाराणसी में तीन समानान्तर धारायें चलती है। एक पौराणिक एक ऐतहासिक, एक सांस्कृतिक। यहां के मंदिर, मोहल्ले, गलीयों घाटों ही नही पुराने भवनों,वृक्षों और पत्थरों का अपना तीन अलग अलग कथानक है, जो भूगोल से परे है। उनके पौराणिक मध्यकालीन और आधुनिक संदर्भ है। रामायण महाभारत से ले कर मुगल कालीन इतिहास और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका अपना महत्व है परन्तु इन सबसे उपर  काशीवासियों की अपनी मान्यतायें है जिनके आगे ये सभी इतिहास,संस्कृति, भूगोल ढह जाते है। काशीवासी अपने मान्यताओं पर कोई आक्षेप बर्दास्त भी नहीं करता क्योंकि उसके लिये उसकी अपनी मान्यतायें ही सच है और इस सच से बड़ा कुछ भी नहीं। एक दो जिज्ञासुओं ने यह जानना चाहा कि ऐसा क्यों है? पर मुझे यह स्वीकारने मे कोई परहेज नही है कि मेरे पास भी इन मान्यताओं से इतर कोई उत्तर नहीं है। कभी इसी मै सोचता हूँ कि सभवतः ऐसा इसलिये है कि बनारस में कोई ईश्वर, भगवान या देवता नहीं है। निःसंदेह आप को मेरी यह सोच विचित्र लग सकती है पर सच यही है क्योंकि काशी-वासियों का ईश्वर भगवान या देवता से रिश्ता या संबंध ईष्ट भगवान और भक्त का है ही नहीं। उसके लिये मंदिर में विराजमान मूर्तियाँ, प्रतीक भगवान नहीं है बल्कि वे उसके परिवार के बड़े, बुजुर्ग जिम्मेदार और सबका ध्यान रखने वाले सदस्य है। काशीवासी के लिये भगवान शिव परम महादेव नहीं है बाल्कि उसके बाबा है। देवी पार्वती महादेवी नही है बल्कि उसकी माई है। उन बाबा और माई से काशीवासी कुछ पाने की लालसा नहीं रखता न ही कोई मांग या कामना करता है क्योंकि उसकी यह दृढ़- मान्यता है कि उसके लालन पालन और ईच्छा पूर्ति की जिम्मेदारी बाबा और माई की है और वे इसे अपनी जिम्मेदारी मान कर करते रहेगें। जिन्हें पूरा होना ही है। काशीवासी अपने साथ साथ बाबा व माई का हाल चाल भी लेते चलता है " का हो बाबा ?" तो बाबा के दरबार में जा कर उन्हें ही चैलेंज करता है कि आप से कुछ हो चाहे न हो माई सब भला करेगी। 'बाबा बाबा सब कहे, माई कहे न कोय। बाबा के दरबार में माई करै सो होय" और काशीवासी के इस दृढ़ विश्वास के स्रोत बाबा को देखिये वे भले स्वयं अधनंगे, कमर में मृगछाला पहने, भष्माभूत लपेटे अडभंगी से अपने में मस्त है, कहीं खुले आकाश के नीचे, कभी नदी तट पर धूनी जमाये, कहीं किसी पेड़ के नीचे। पर काशी वालों का विश्वास है कि उनके भोले बाबा ही सर्व लोक समस्त वैभव, धन संपदा के स्वामी है। वे स्वयं पूर्ण है इस लिये शून्य है। उनके  लिये भौतिकता की सीमायें समाप्त हो आध्यात्मिकता में समाहित हो गयी है। 
'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णत पूर्णमुदच्यते, 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवाविशिष्टते।' 
और सच मानिये बाबा ने आज तक अपने काशीवासियों का विश्वास नहीं तोड़ा है अपितु वे काशी वासियों को भरोसा दिलाते है कि मैं तो हूँ ही तुम क्यों चिंता करते हो? बाबा अपने परिजन काशीवासियों का जीवन भर ध्यान तो रखते ही हैं जीवन के बाद भी उन्हें नहीं छोड़ते। मृत्यु के पश्चात स्वयं वे शव के कान में तारक मंत्र बोल उसे आगामी जीवन यात्रा, मोक्ष के लिये भयमुक्त करते हैं। इसी लिये काशी में उन्होंने श्मसानों में भी श्मशानेश्वर महादेव के रूप में अपना शिविर कार्यालय खोल रखा है। काशीवासी अपने इसी विश्वास से लबालब रहता है उसे अपने बाबा पर विश्वास है
 'सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्। 
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥'
 काशीवासी का विश्वास है  कि उनके बाबा घर परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य है उन्हें अपने परिवार के सभी सद‌स्यों से प्यार है। उनका दुलार परिवार के समस्त जन पर है चाहे वह लायक हो, नालायक हो, कम कमाता हो ज्यादा कमाता हो, घर की गृहलक्ष्मी हो या अशक्त बृद्ध हो, नन्हा नासमझ बालक हो या संपूर्ण परिवार का देखरेख करने वाला मुखिया। वे तो बस भाव देखते है। उनके लिये दूध, गंगाजल,सर्वप्रिय व्यंजन, नैवेद्य, शहद, घृत, सुगंधित फूल माला, श्रृंगार प्रसाधन उतना ही प्रिय है जितना पास में कुछ न होने पर सामान्य जल,बगल में अकारण, अनिच्छित उग गये धतूरे के पौधों का कटील विषैला फल, और मदार का फूल। सामान्य जल से लेकर दूध दही शहद और धतूरे से ले कर नैवेद्य तक समस्त अर्पित भाव में प्रसन्न रहने वाले बाबा अपने काशीवासियों को आश्वस्त करते है कि समय के साथ संतुष्ट रहना सीखो यही सुखमय जीवन है। इसलिये काशीवासी हर स्थिति में संतुष्ट रहता है। उसे सांसारिक भोग विलास से बहुत लेना देना नहीं। उसे बहुत फर्क नही पड़ता बिजली है कि नहीं, पानी है कि नहीं।बैंक बैलेंस है कि नही। वह तंग गलियों में रह कर भी एक गमछा लपेटे उसी भाव से जीवन जीने का आदी है जिस भाव से सिक्स लेन और आठ लेन बाली सड़‌कों पर तेज भागती लक्जरी गाड़ियों में , ब्रांडेड कपड़ों में, एसी कमरों में।
विषयान्तर से हट कर पुनः काशी पर आते है। फिर काशी में अन्य देवी देवता और देवालय क्यों है इसके पीछे भी एक मान्यता है कि एक बार काशीनरेश देवोदास के तप के फलस्वरुप काशीपुरपति महादेव शंकर को काशी छोड़ कर जाना पड़ा महादेव काशी छोड़ कर चले तो गये पर काशी बिना बेचैन रहने लगे उनकी उद्धिग्नता को देख कर समस्त देवी देवता, भैरव, योगिनी, कपालिनी काशी में आ कर बारी बारी से देवोदास को काशी से बाहर भेजकर भगवान शिव को पुनः काशी वापसी का प्रयास करने लगे पर यहां आने के बाद वे काशी के महात्म्य से आकर्षित हो कर यहीं बस गये। कालान्तर में जब महादेव शिव पुनः काशी आये तो उन्होंने इन समस्त देवी देवताओं भूत, भैरव, योगिनी आदित्य, चंद्र,विनायक, कपालिनी को अपने स्थान बना कर बसने की अनुमति दे ही। तब से शायद ही कोई देवता देवी व अन्य पूजितगण ऐसे बचे हो जिनका मंदिर वाराणसी में न हो? यह मान्यता कितनी सच है यह एक अलग विषय है पर वर्तमान सच यह है कि काशी के हर आयाम में हर गली, नुक्कड़, मोहल्ले घाट पर मंदिर है और हर मंदिर का अपना महत्व है। इसके अतिरिक्त काशीवासियों ने अपने अपने घरों में अपने देवता के किये अलग मंदिर बना रखा है। कहते है काशी के हर कण में शंकर है उसके पीछे संभवतः यह मान्यता हो कि काशी के किसी क्षण और स्थान की शंकर बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती।
 काशी की जीवन शैली, व्यापार, विचार सभी ऐसे विषय है जो अपने में अलगंठ है वे परम्परागत हो कर भी परंपरा से परे हैं। वे  विज्ञान के सिद्धांत से निरंतर अछूते रह कर भी अपने परंपराओं, कार्यों से वैज्ञानिक है। उनकी अपनी मान्यताये है अपना विचार है। व्याक्ति ही नहीं मोहल्लो का अपना इतिहास, पौराणिक संदर्भ और मान्यतायें है। काशी कथा 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता  के समान चलती रहेगी। काशी को कलम या शब्द (वाणी) के सीमा में बाधा नहीं जा सकता। काशी एक विचार है और विचार सदैव गतिशील होते है। यह विचार निरन्तर प्रगतिशील रहे । बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा की कृपा चलती रहे। काशी स्वयं प्रकाशित होती रहे। 
काशी, 9अगस्त 2026, रविवार
कृष्ण एकादशी,श्रावण, संवत2083वि0
("बनारस इतिहास से परे" श्रृंखला मे वक्तव्य)
https://chitravansh.blogspot.com/2026/08/blog-post.html



रविवार, 28 जून 2026

व्योमवार्ता /मीडिया ,आचार संहिता व जबाबदेही...

समाज जिसमे हम रहते हैं ........

आज हम विश्वसनीयता के प्रश्न पर सबसे महत्वपूर्ण दहलीज पर खड़े हैं। सत्य, असत्य, विश्वास अविश्वास, पक्षपात, निष्पक्षता, न्याय-अन्याय, रहस्य- बरकत जैसे कई गंभीर प्रश्नों के प्रश्न पर अब हमारा समाज खासकर मुड़कर सोचने को बाध्य है। तथ्यों को अपने हित में देखने और अपने लाभ के पाले में खड़े होन की इस संकुचित दृष्टिकोण ने विश्वसनीयता पर ही संकट और प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सूचना विस्फोट और इंटरनेट के प्रसार ने अब व्यक्ति से लेकर शासन-प्रशासन, न्याय व्यवस्था तक को अपने दायरे में समेट लिया है जिससे मीडिया भी अछूता नहीं रह गया है। हालांकि यह भी सत्य है कि मीडिया भी कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारियों का पूरी तरह पालन करने में चूक रही है। टीआरपी की दौड़, प्रसार संख्या बढ़ाने, विज्ञापन-वितरण लेने के इस अंधे खेल से बार-बार मीडिया के ऊपर गंभीर सवाल उठते हैं। यह सच है कि लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस का कोई विकल्प नहीं है। यह लोगों के स्वर और सूचना प्रदान करने हेतु विशेष माध्यम होने की अपरिहार्य शर्त है जो लोकतंत्र में सामूहिक राय बनाने में लोगों की मदद करती है।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य यह है कि जनहित के विषयों पर न्याय संगत, यथार्थ, निष्पक्ष, सटीक तथा शालीन विधि से समाचारों, विचारों, टीकाओं तथा जानकारी देकर लोगों की सेवा की जाए। इस प्रयोजन के लिए प्रेस से आशा की जाती है कि वह विश्व स्तर में मान्यता प्राप्त व्यावसायिक और नैतिक मानकों के अनुरूप आचरण करें। भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रंजन प्रसाद देसाई ने वर्ष 2022 में 'पत्रकारिता के आचरण' के संदर्भ में कहा है कि आज प्रेस ने अपने तकनीकी विकास के कारण समाज और शासन में सर्वोच्च महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है। मीडिया जिन विधियों में ग्रहण है, के साथ ही समय के साथ-साथ नए विज्ञान में काफी बदलाव हुए हैं। इन दिनों मीडिया दैनिक के रूप में काम करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी कारण से तथ्यों की समय पर रिपोर्ट करने के लिए पत्रकार अत्यधिक दबाव में काम कर रहे हैं और किसी वारदात की सबसे पहले रिपोर्ट (न्यूज ब्रेक) करने की होड़ अक्सर प्रेस और मीडिया की आचरण को प्रभावित करती है। मीडिया में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए मीडिया की विश्वसनीयता आवश्यक है। इसलिए प्रेस को अपने पेशे में नैतिक पत्रकारिता के मार्ग पर चलने की जरूरत है।

इस उद्देश्य को ही दृष्टिगत रख भारतीय प्रेस परिषद के समय-समय पर पत्रकारिता के आचरण के मानक संबंधी दिशानिर्देशिका प्रकाशित करती है जिसमें के पत्रकारिता के सिद्धांत और आचार संहिता से लेकर विभिन्न मुद्दों पर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। यदि इन दिशा-निर्देशों का उचित ढंग से पालन हो तो पत्रकारिता लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका को शत-प्रतिशत निभा सकेगी। पत्रकारों का दायित्व है कि वे सत्य की रिपोर्टिंग करें और अपनी जानकारी की सत्यता की पुष्टि करें। उन्हें अपनी खबरों पर गहन शोध एवं तथ्यों न की पुष्टि करने के बाद ही तथ्यों को अपने पाठकों, दर्शकों के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। साथ ही समाचार और राय के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए। गलत या क अधूरी जानकारी जनता को गुमराह करती है और में पत्रकारिता पर विश्वास कम करती है। आज डिजिटल युग के इस समय में निष्पक्ष एवं तथ्यपूर्ण रिपोर्टिंग बेहद जरूरी है ताकि पाठक और दर्शक स्वयं निर्णय ले सकें। पत्रकारों का कर्तव्य है कि वे राजनीतिक, आर्थिक या व्यावसायिकं दबावों सहित बाहरी प्रभावों से अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें ताकि वे अनुचित प्रभाव से मुक्त रहकर उन लोगों की आवाज बनें जिनकी कोई आवाज नहीं है। आज के मीडिया में कभी-कभी अपने टीआरपी बढ़ाने और सबसे पहले न्यूज ब्रेक करने की होड़ कभी-कभी सनसनीखेजता की सीमा तक चली जाती है। इस संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों ने भी अपने निर्णयों में मीडिया को आगाह किया है। और रिपोर्टिंग से उत्पन्न होने वाले संभावित नुकसान पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में पत्रकारों को आवश्यकता पड़ने पर अपने स्रोतों की गोपनीयता और पहचान गुप्त रखने का सम्मान करना चाहिए। सूचना जुटाते समय उन्हें अनुचित हस्तक्षेप या उत्पीड़न से बचना चाहिए और सूचना देने वालों या जोखिम में पड़े व्यक्तियों की पहचान को रक्षा दी जानी चाहिए।

पत्रकारिता समाज के विविध दृष्टिकोणों और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। पत्रकारों को सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए रूढ़ियों से बचना चाहिए और अपनी रिपोर्टिंग में समावेशिता के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके द्वारा उठाए गए आवाज में विभिन्न समुदायों और हितधारकों का प्रतिनिधित्व हो। एक महत्वपूर्ण पत्रकारों को अपने काम के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और आलोचना के लिए तैयार रहते हुए अपने तरीकों में सुधार जारी रखना चाहिए।

पत्रकारिता एवं मीडिया की भूमिका इसलिए भी ज्यादा जवाबदेह और महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे जनता को सूचित करने और स्वस्थ बहस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे निजता का सम्मान करते हुए जवाबदेही निभाएँ और लोकतंत्र को मजबूत करें। वे एक अधिक समावेशी और जिम्मेदार मीडिया परिदृश्य में योगदान देते हैं।

(हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30मई 2026 को व्यक्त विचार) प्रेमचंद पथ अप्रैल-जून 2026 अंक मे प्रकाशित https://chitravansh.blogspot.com

गुरुवार, 28 मई 2026

#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं......

#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं......

  *भविष्य की एक ज्वलंत समस्या*
क्या आने वाला समय कुवांरेपन का युग होगा?      

             एक हालिया अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार अगले छ:वर्षो में विश्व की लगभग 45% लड़कियां अविवाहित रह जाएंगी।
यह रिपोर्ट 1 फरवरी 2025 को प्रकाशित लोकमत अखबार में छपी थी, जो मार्गन स्टेनली संस्था द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्धयन पर आधारित हैं।।
*सर्वेक्षण में पाये गए प्रमुख कारण:-*
१.आज की लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है और करियर को प्राथमिकता दे रही हैं।
२.वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और किसी पर निर्भर रहना नहीं चाहती।
३.उन्हें स्वतंत्रता प्रिय है और वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेना चाहती हैं।
४.विवाह, मातृत्व और पारिवारिक बंधनों को वे अक्सर अपनी प्रगति में बाधा मानने लगी हैं।
५.यदि यह प्रवृति बनी रही तो पारंपरिक परिवार प्रणाली और सामाजिक संरचना बिखर सकती हैं।
६.जनसंख्या में गिरावट, कुंवारे लड़को की संख्या में वृद्धि और वृद्धावस्था में अकेलेपन की समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
७.प्रश्न यह भी उठता है प्रगति, पद और पैसा किस काम आएंगे, जब जीवन के अंत में साथ देने वाला कोई न होगा?
*कई माता पिता लड़कियों के रिश्ते तो ढूंढ रहे हैं, पर स्वयं लड़की को विवाह में रूचि नहीं होती।जिसके कारण हर रिश्ता नकारा जा रहा है।*
*समाज के एक बड़े वर्ग को इस बदलाव की गंभीरता का अभी मालूम नहीं है,इसलिए यह आवश्यक है कि हम समय रहते चेते।*
*लड़कियों के विवाह के लिए उपयुक्त आयु 23 से 26 वर्ष के बीच हो यदि हो पाएं तो ओर भी जल्दी, इसके लिए सामूहिक स्तर पर जागरूकता ओर पहल जरूरी है।*
*यह विषय किसी के विरोध में नहीं, बल्कि भविष्य की स्थरिता और संतुलन की चिंता के तहत उठाया गया है, समाज, परिवार और व्यक्तिगत जीवन तीनों को संतुलित रखना ही सच्ची प्रगति हैं।*

*हम सबको इस पर विचार अवश्य करना चाहिए*
👉🏿   जब बच्चों का विवाह
    20 साल में होता था, तो 
   एक सदी में 5 पीढ़ियाँ होती थीं.
👉🏿 जब बच्चों का विवाह
     25 साल में होता था, तो 
    एक सदी में 4 पीढ़ियाँ होती थीं.
👉🏿 अब बच्चों का विवाह
    30 साल में होता है, तो 
   एक सदी में 3 पीढ़ियाँ होती हैं.

👉🏿  सोचने वाली बात है.
        *क्या हमारा समाज अगली सदी तक जीवित रहेगा ?
     आज एक अजीब सा अंधेरा फैल रहा है.🏚️    गली-मोहल्ले वीरान हैं, आस-पास के घर खाली हैं.
आज घरों में बच्चों की आवाज कम ,पति-पत्नी की आवाज ज्यादा सुनाई देती है.
★  लड़कियाँ 30-35 साल तक कुंवारी हैं.
★  लड़के 35 साल के बाद भी कुँवारें घूम रहे हैं.
★  देर से शादी ..फिर सम्बंध विच्छेद (तलाक)व  टूटते परिवार  ... दुखी माँ-बाप.....माता-पिता अकेले..पूरी पीढ़ी खालीपन अनुभव करती है.

🤷🏻‍♀️   क्या हम इसे "पढ़ा-लिखा समाज" कहें या 
"स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाला समाज" ?
💁🏻‍♂️  यह तो जनसंख्या कम करने की एक खामोश साज़िश है.
★ अगर 50 जोड़ों में सिर्फ़ एक बच्चा हो?
      तो अगली पीढ़ी में सिर्फ़ नाममात्र के बच्चे होंगे.
👉  अगर ऐसा ही चलता रहा, तो तीसरी पीढ़ी लगभग गायब हो जाएगी.
👉 मोहल्ले,गलियाँ खाली पड़ी हैं.सब लोग रोड पर हैं. जीवन का आधा समय तो रोड पर ही बीत जाता है.
★  गाँव के गाँव खत्म हो रहे हैं.
★ शहरों में ऊँची इमारतें हैं, लेकिन संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त हो गयी है.
👉  नई बहुएं "सिर्फ़ एक ही बच्चा" चाहती हैं.
    
🤷🏻‍♀️  क्या यही समाज है ?
क्या यही हमारे पुरखों की  विरासत है ?

👉   सच तो यह है, कि ....बच्चे अब प्यार की निशानी नहीं रहे..... बल्कि बच्चे पैदा करना ...एक मजबूरी सी है.

⚖️   सबसे बड़ी गलती — लड़की के पिता की है,
        वही पिता जिसने 20-22 साल की उम्र में विवाह करके परिवार बसाया था.
....अब वही पिता 30 साल की उम्र तक अपनी बेटी का विवाह न करके बहादुरी दिखा रहे हैं.

👉  परिणाम ????
लड़के लड़कियाँ डिप्रेशन में जा रहे हैं.

👉  आज बच्चों का सही समय पर विवाह नहीं हो रहा है, और न सही समय पर कोई नौकरी मिल रही है.

👉  समाज धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है.

👉   इसी कारण बच्चे समाज के साथ नहीं अकेले रहना पसंद करते हैं...... यानी एकल परिवार..यहाँ तक कि बच्चे भी नहीं चाहिए.

★  देर से शादी करना
★  देर से बच्चा करना, फिर एक बच्चे के बाद 
   मेडिकल और लालन-पालन का बहाना करना.
💁🏻‍♀️  यह आम बात हो गई है. हजारों जवान लड़के लड़कियाँ उम्र के कारण कुंवारे घूम रहे हैं.
     
👉 समाज के समझदार लोग चुप्पी साधे हुए हैं.
★  विवाह, परिवार, बच्चे – इन सब को बोझ समझा जा रहा है.
🎈 विवाह ... कोई दुनियावी बंधन नहीं यह घर परिवार और समाज का स्तम्भ है.
🎈 प्रजाति, सभ्यता और संस्कार को आगे बढ़ाने का एक तरीका है.
💥 अब हम सब को समझने का  समय आ गया है.

🫵   बच्चों को ‘हद से ज्यादा' आजादी दे कर हमने उनकी समझ छीन ली.
★ विवाह टलता रहा.....और जब हुआ....तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
 🤔 फिर वही अकेलापन

🫵  लड़के लड़कियों के लिये विवाह की सही उम्र
🔹  लड़कों के लिए 25 साल से पहले
🔸 लड़कियों की  20 साल से पहले.

🚩 वर्ना इतिहास लिखेगा ...
  “वह हिंदू समाज, जिसने चुपचाप स्वयं को खत्म कर लिया.” 
 सोचो और समझदारी दिखाओ.
अपने बच्चों का विवाह समय पर कीजिये.

 🙏क्योंकि ... परिवार नहीं बचा, तो समाज को भी देर सवेर ध्वस्त होते देर नहीं लगनी है.

  यही कारण है ...डेविड सेलबॉर्न और बिल वार्नर जैसे लेखक यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं , कि  ★   इस्लाम के मज़बूत फैमिली सिस्टम की वजह से ही... देर सवेर ... अधिकांश देश *◆  इस्लाम से हार जायेंगे. ◆*
★ भारत में भी हिन्दू परिवार परम्परा का पतन होना प्रारम्भ हो चुका है.
*रक्त के 5 रिश्ते  समाप्त होने की कगार पर हैं.
  ताऊ, चाचा, बुआ, मामा, मौसी जैसे रिश्ते आने वाले समय में  देखने-सुनने को नहीं मिलने वाले हैं.

  इसे इस तरह  👇🏽समझा जा सकता है-
    पुत्र       पुत्री
     2         1        (मौसी X)
     1         2      (चाचा, ताऊ X)
     1         1   (चाचा, ताऊ, मौसी X)
     1         0          X
     0         1          X
  परिणाम
     0         0

★सिंगल चाइल्ड फैमिली को उनका निर्णय तीसरी पीढ़ी याने जिनके आप ... दादा-दादी होंगे बुरी तरह प्रभावित करेगा. जिस दादा को मूल से अधिक ब्याज प्यारा होता है ....उसका तो ....मूलधन भी समाप्त हो जाएगा.
🤔 इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है.

 👉इसलिए दम्पत्ति को सिंगल चाइल्ड के निर्णय पर गंभीरता से विचार करना होगा.
🤷🏻‍♀️ यह घटती आबादी के आँकड़े बोल रहे हैं.
💁🏻‍♂️ यह विश्लेषण सरकारी आँकड़ों के अध्ययन से आ रहा है.
 आपका पौत्र या प्रपौत्र इस संसार में अकेला खड़ा होगा......उसे अपने रक्त के रिश्ते की आवश्यकता होगी तो .......इस पूरे ब्रह्मांड में उसका अपना...... कोई नहीं होगा.

👉🤔यह अत्यंत सोचनीय विषय है.
 ये न केवल हमारे बच्चों को एकाकी जीवन जीने को मजबूर करेगा बल्कि हमारी हिंदू परिवार सभ्यता को ही नष्ट कर देगा.

👉हम जो हिन्दू एकता की बात करते हैं ये तो सभ्यता ही समाप्त हो जाएगी....और इन सबके लिए हमारी वर्तमान पीढ़ी उत्तरदायी होगी.

★अगर आप इस विषय को गंभीर समझते हैं तो 
 इस समस्या पर विचार करें, घर परिवार में, पति पत्नी के बीच, रिश्तेदारों में, दोस्तो में एवं विभिन्न बैठकों एवं आयोजनों में  इस विषय पर मंत्रणा करें.
 अपनी सभ्यता, संस्कार और पीढ़ियों को बचाये.
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

देव दीपावली ( बनारस पर कविता -10)

देव दीपावली

उत्तर आये है सारे देवगण
बनारस के गंगा घाट पर
रात है पूर्णिमा की
पर आज चांद भी उतर आया है लजा कर
छिपा है कहीं दीयों के रोशनी के कोने में
उसे आज अपनी रोशनी व चमक फीकी लग रही
घाट पर झिलमिलाते दीपों की कतारों से
केवल देवता ही नही, असुर गंधर्व,ऋषि भी
देख देख के प्रमुदित हो रहे चमकते प्रकाश को
कही उलाहना भी है उनके मन में चांद के प्रति
और कही प्रताड़ना भी चांद से
देखो आज बनारस के घाटों पर कितने चांद उतरे है
तुम्हे भ्रम है कि तुम अकेले रोशनी बिखेरते हो
पर निर्विकार बैठे है काशी पुराधिपति शिव
अपने विश्वनाथ धाम में
हमेशा की तरह सुख दुख पाप पुण्य से परे
अपने नन्दी के साथ अलमस्त, निर्विचार
उनके लिये जैसे त्रिपुरासुर का वध
सामान्य सी घटना हो
और अपने पुराधिपति पार्वतेपति
शंकर की तरह अलमस्त निर्विकार भाव से
देव दीपावली के दिये जला रहा काशी
आदि केशव से अरसी तलक
अपने उल्लास से.......

काशी, देवदीपावली,25.11.2025
 http://chitravansh.blogspot.com

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

बनारस की सुबह (बनारस पर कविता -9)

बनारस की सुबह
 शुरु होती है मोहल्लेवार
अपने अपने समय व अपने तरीके से
ब्रहममुहुर्त से लेकर नौ बजे तक
जब सूरज लाल से पीला होने लगता है 
आरिकेशव से शूलटंकेश्वर तक 
कैथी से कंदवा तक 
हर मोहल्ले और गांव की 
सुबह ए बनारस की अलग-अलग 
परिभाषा है, परम्परा और प्रयोग भी 
बल्कि यह प्रयोग तो एकल है 
हर बनारसी के अपने अपने मिजाज
और मर्जी से, 
राधेश्याम चचा चाची के संग 
दशाश्वमेय पर नहा उगते सूरज को 
अर्ध्य देते है 
तो उनका बेटा महीप निकल जाता है
सुबह के साढ़े चार बजे जिम में 
बिटिया भावना शामिल होती है 
सुबह ए बनारस अस्सी घाट के योग में 
अपनी दुलारी भाली निशा के संग 
जो सुन कर ही वहां
पूरा करती है अपने विवाह पूर्व 
संगीत का शौक
अस्सी पर सुबह ए बनारस के सांस्कृतिक मंच 
पर हो रहे कार्यक्रम की श्रोता बन कर 
चेतगंज का दिलीपवा चार बजे ही 
हौंकाता है अपनी भट्‌ठी, अखबार के इंतजार संग
क्योंकि साढे चार बजे तक आने लगते है 
उसके नेमी ग्राहक जो चाय पीने के साथ
सूचना सूत्र है पूरे मोहल्लेऔर बनारस के
मैदागिन चौमुहानी पर निकलने लगती है 
गरमा गरम कचौड़ियां
औ भग्गू हलवाई व्यस्त है जलेबी छानते 
अपने लेफ्ट राईट मुन्नवा औ पप्पू आ को ललकारने में
कचहरी गोलघर पर मची है अफरा तफरी
अखबार के हाकरों मे बंडल बनाने में 
मिथतेश महराज नहा धो टाईट हो 
सजानें सवारनें में व्यस्त है महावीरजी को
क्योंकि भोरहरी से लगता है रेला नेमी भक्तों का
रब्बन मियां के दोनों पैरों मे 
होती है दो अलग-अलग चप्पलें अकसर 
फज्र के वक्त मस्जिद पहुंचने की जल्दी में
जबकि वे अजान सुनते ही कोशिश करते हैं 
उठ के तैयार होने की, कि कोई रकात छुट न जाये 
भोनू सरदार नवाजने लगते है गालियों से 
अपने जवान हो रहे लड़के सुरेश को 
जो भैस गाय को सानी पानी के समय 
चादर मे मुंह ढांपे मोबाईल चला रहा है
भोज‌ूबीर सुंदरपुर गुलजार होने लगता है 
सुबह की सैर के बाद सट्ची में 
ताजी सब्जी खरीदने वालों से
पाण्डेपुर चौमुहानी की दूध सट्टी 
अर्दलीबजार की लेबर सट्टी 
से लेकर हर मोहल्ले की होती है 
अपनी अपनी सुबह अपने बनारस में, 
उस सुबह ए बनारस के नजारे से अलग 
जो घाट किनार गंगा जी में होती है 
अस्सी से राजघाट तक......

http://chitravansh.blogspot.com 
काशी10.01.2026

रविवार, 29 मार्च 2026

बनारस पर कविता (8)

नये साल पर.........

कुछ तो है अलग सा
इस शहर में
तभी तो कहते है
अलमस्त निर्विकार, अव्यक्त काशी
कुछ तो है
जब पूरी दुनिया पश्चिमी रंग में
रंग कर उसके चमक ने खोयी है
तो यहां विश्वनाथ धाम में
तीन से चार लाख की भीड़ खड़ी है
नये साल की शुभेच्छाओं के लिये
और आभार कहने बीते वर्ष की.
कुछ तो है
जब शहर का पारा गिर रहा है
शिमला, कुल्लू और मनाली जैसे
ऐसे मे नंगे पांव खुले सिर
चलते बैठे और भक्ति भाव मे
डूबे है ढेरों लोग
गंगा घाट से मंदिरों तक
कुछ तो है
हिल्टन, ताज, जैसे सप्ततारांकित
होटल और रेस्टोरेंट के बजाय
ठेले पर घुंघनी, चाट के लिये
सड़क पर खड़े लोग
कुछ तो है
इस शहर मे जहां
गलियों में मंहगी सस्ती कारें नही आती
मोटर बाईक और बाकी दिखावा भी नही
कुछ तो है
एक ही गली के रमेन्द्र पांडे और रामचरन नाई
मिलते है घाट पर जजमानी प्रतिद्वन्दिता मे
तो जुम्मन मियां और तूफानी सिंह
चाय लड़ाते है कल्लू सरदार के यहां
पान जमा के देश की राजनीतिक अड़ी
तजबीजते है छेदी पनवाड़ी के ठीहे पर
असलम के अजान को सुन के
उठते है दुर्गा पंडित  हाजिरी लगाने
भोले बाबा के दरबार में
कुछ तो है
जो यहाँ काल भी आकर ठिठक जाता है
मरण भी जहाँ मंगल है, और हर कंकड़ शंकर है
जहाँ उत्सवों का शोर नहीं, रूह का सुकून है
जहाँ नया साल कैलेंडर से नहीं
गंगा की पहली लहर और डमरू की गूँज से शुरू होता है।
तभी तो कहते हैं—
दुनिया बदलती होगी अपनी रफ़्तार से
मगर मेरी काशी तो आज भी
उसी शिव-धुनी में मगन है,
उसी अल्हड़पन में ज़िंदा है..…..

(काशी, 01जनवरी 2026 , गुरूवार)

On the New Year: There is Something...

There is something distinct

About this city,

That is why they call it—

Carefree, detached, and the unmanifested Kashi.

There is something...

When the whole world, drenched in Western hues,

Has lost itself in superficial glitter,

Here, at the Vishwanath Dham,

A crowd of hundreds of thousands stands tall,

To offer greetings for the new year

And gratitude for the one that passed.

There is something...

When the city’s mercury drops

Like that of Shimla, Kullu, or Manali,

Even then, bare-footed and heads uncovered,

Countless souls walk, sit, and immerse themselves

In pure devotion—

From the banks of the Ganga to the temple doors.

There is something...

Instead of the seven-starred luxury

Of Hiltons and Taj hotels,

People stand on the streets

For a plate of ghughni and chaat at a roadside stall.

There is something...

In this city where

Expensive or cheap cars cannot enter the narrow lanes,

Where motorcycles and worldly vanity find no place.

In the same alley, Ramendra Pandey and Ramcharan the barber

Meet at the ghat, competing in their ancestral trade,

While Jumman Miyan and Toofani Singh

Clink their tea glasses at Kallu Sardar’s shop.

With a paan in their mouths, they deliberate

Over national politics at Chedi Panwari’s corner.

Hearing Aslam’s call to prayer (Azaan),

Durga Pandit wakes up to mark his attendance

In the court of Lord Shiva (Bhole Baba).

There is something...

Where even Time comes to a standstill,

Where death is a celebration, and every pebble is Shiva.

Where the new year doesn't begin with a calendar,

But with the first ripple of the Ganga and the resonance of the Damru.

That is why they say—

The world may change at its own pace,

But my Kashi remains forever lost

In that same divine rhythm,

Living in its own eternal, carefree spirit.......


(Kashi, 01January 2026,Thursday)

रविवार, 16 नवंबर 2025

बनारस पर कविता (7)


बनारस
बुलाता है बार बार
हर तीज त्योहार पर
प्रयोगकर्मी बनारस, उत्सवधर्मी बनारस
परंपरावादी बनारस, अपने रंग में डू‌बा बनारस
अपने इतिहास संस्कृति पर
इतराता आधुनिक बनारस
जहां महादेव ईस्ट व भगवान नही
वे बावा है, बहुतअपने से हर किसी के
सर्व सिद्धि देवी अन्नपूर्णा देखती है
हर काशीवासी को माई बन कर
वह बनारस, जो रामनगर की लीला में
साथ साथ चलता है अपने प्रभु के संग
अयोध्या के राजमहल से जनकपुर की फुलवारी
चित्रकूट व पंचवटी से लंका फिर अयोध्या तक
वह बनारस जो प्याले का मेला को जीता है
तो नागनथैया में ग्वाल वन कान्हा के संग
कंदुक क्रीड़ा का सहभागी होता है
अस्सी से रथ को खींच खींच कर
रथयात्रा में अपने कान्हा को नानखटाई खिलाता है सारनाथ के मृगदाव में महीनो मेला देखता बनारस
दौड़ पड़ता है अपने रामजी को कान्हे पर लेने
नाटीइमली, जब वह लौटते है
चौदह साल बनवास के बाद अपनी अयोध्या में
दशहरे के आखिरी तीन दिनों
दुर्गामय होने वाला बनारस
गुलाब बाड़ी के केवड़ा फुहारों से
मसाने में होली व बुढ़‌वा मंगल में
जीवन व मृत्यु को उत्सव मनाता बनारस
नक्कटैया में अपने विरोध के स्वांग से शुरु
विश्वनाथ का बराती बन शिव बरात ही नही
सब को अपने ठेगें ये रख फगुआ पर
गरियाता, मौज मस्ती करता बनारस,
अमौसा जूतियाँ सोरहिया, ललहीछठ से
परदोस, एकादशी ही नही हर रोज
अपने मस्ती में जीता, अपने में रमता
तीन वार तेरह त्योहार मनाता बनारस
वह बनारस बुलाता है
छठ फगुआ अमऊसा पर
अपने अपनों को
जो दूर दराज गये है
कमाने पेट के खातिर
नहीं आ पाते छुट्‌टी,
भीड़ और रिजर्वेशन के कारण
पर ने नही बिलग हो पाते
अपनी माटी और बनारसियत से
याद कर कर के अपने बनारस को
जो हर तीज त्योहार पर बुलाता है
उन्हें बार बार, हर बार
हर तीज त्यौहार .....

- व्योमेश चित्रवंश
22.10.2025



शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

बरसात में मेरे शहर का पानी पानी होना.... (बनारस पर कवितायें)

बरसात में मेरे शहर का पानी पानी होना....

सावन बरस रहा है 
बनारस भी भींग रहा है
केवल भींग ही नही रहा 
बल्कि पानी पानी हो गया है
अस्सी से गोदौलिया तक
रविन्द्रपुरी से भदैनी तक
ट्रौमा सेण्टर और बीएचयू  ही नहीं
अंधरापुल पाणेपुर भोजूबीर भी
सावन के पानी मे नहा कर
खुद पानी पानी हो रहे हैं
इस साल भी गंगा भी उफनाई है
सावन मे ही
गंगा के पलट प्रवाह से 
वरूणा भी
अखबार बताते हैं यह बाढ़
बैराज के छूटे पानी से है
पर अपना बनारस तो 
हर बरस भींगता है
पानी पानी हो जाता है
पर इस पानी का असर 
उन पर नही पड़ता 
जिनके कारण पूरा शहर 
हर बार पानी पानी हो जाता है
क्योंकि इस पानी के बढ़ने से पहले ही
उन की ऑखों का पानी सूख चुका है....

-व्योमेश चित्रवंश, 18072025

रविवार, 31 अगस्त 2025

बनारस बाढ़ में.....(बनारस पर कविताएँ-6)

बनारस पर कविताएँ(6)

बनारस बाढ़ में,
अखबारों में छपी है ढेर सारी तस्वीरें
खबरों सहित
घुटने और कमर तक पानी में,
नाव से बस्ती राहत सामग्री
बाढ़ शिविरों में मुस्कराते
समाजसेवी व राजनेता
टूट गये है गंगाघाटें के
आपस के संपर्क और संबंध
ऊपर की ओर सरक औ सिमट गये है
सुबहे बनारस और गंगा आरती स्थल
पहुंच गई है वरुणा उन इलाकों में
जिन्हे वह बहुत पहले छोड़ आई थी
बहुत सी आँखों मे सवाल दिखते है
डूब क्षेत्र में घर बनाने को किसने कहा था
तब नगर निगम और विकास प्राधिकरण कहाँ थे
क्यों परेशान होते हैं लोग हर साल
सब कुछ जान बूझ कर भी
पर मै देख रहा हूं
घर के आंगन मे आये बाढ़ के पानी में
अपनी देहरी पर आरती करती
घाट के ठीक ऊपर रहने वाली
मां गंगा और काशी की आस्थावान
बुढी माई को
जिसके लिये बाढ़ विभिषिका नही
गंगा मैया का शुभागमन है
उसके छोटे से पुराने घर में
बाढ़ के इन दोनो दृश्यों को देख
मै हैरान परेशान हूं
सच और सत के मध्य
रेखा परिभाषित करने में
आस्था और विभिषिका
दो रुप है सोच के
शिव के उग्र व कल्याण के
प्रश्न हम से है
उत्तर भी हमी से
काशी के विविध रंग में
हमारी समस्याओ और
हमारी आस्था के.....

-व्योमेश चित्रवंश; ३०अगस्त २०२५

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा..


बरसात में मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा


ऊफनती गंगा का प्रचण्ड वेग
दूर दूर तक असीमित अपरिमित जलधार
सामनेघाट से राजघाट तक
गंगा की सूनी पड़ी गोंद
बिना नाव,बिना पक्षियों बिना पतंगों के
जैसे मां ने बरज दिया हो
खुद के पास आने से
उफनते मटमैले जल में
रत्नेश्वर महादेव मंदिर का कलस
दे रहा है साक्षी उसके होने का
बाकी सब तो गंगा के मटमैले पानी मे
खो गये है सीढीयां मढ़ी घाट और चबूतरे
मणिकर्णिका महाश्मसान डूबा है बाढ़ मे
साथ में विश्वनाथ धाम का जलासेन पथ
और गंगाद्वार भी
अंतिम संस्कार में जल रही
और कतार मे पड़ी  अहर्निश चितायें
मोक्ष को कामना में
श्मसानेश्वर महादेव से लगे ऊँचे छत पर एक दूसरे को धकियाती, देखती, इंतजार में अपनी बारी का,
यह प्रतीक्षा धरा पर कभी नही थी
न ही किसी ने प्रतीक्षा करना चाहा था
यहां आने का
पर आज वह निर्जीव,आत्माहीन शव भी व्याकुल है स्वयं की प्रतीक्षा पर,
उसे दिखती है औरो की व्याकुलता
जो सशरीर सआत्मा सजीव आये है
उसे अंतिम यात्रा पर पहुंचाने
पर व्याकुल है स्वयं की वापसी हेतु
अपने घरों को
गंगा की बाढ़ तो एक बहाना है
इस सच्चाई से मुंह मोड़ने का
कि अंत मे सबको यही आना है ..….

-व्योमेश,26अगस्त 2025

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

क्वीन्स कालेज का नाम प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज हो..../व्योमवार्ता, 29062025

 क्वीन्स कालेज का नाम प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज हो....

  वाराणसी  जनपद के जाने माने राजकीय क्वीन्स इण्टर कालेज का शुभारंभ 1791ई० मे गवर्नमेंट संस्कृत कालेज के रूप मे हुआ था । आरंभ में उसकी स्थापना मैदागिन मोहल्ले के किराये के कमरों में हुई थी। बाद में काशीनरेश द्वारा चौकाघाट मौजा में दान में संस्कृत कालेज को जमीन प्राप्र हुई और इस पर अपना भवन बना | सन 1857 में ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरया के राज्याभिषेक होने के साथ ही इस गवर्नमेंट संस्कृत कालेज का नामकरण भी क्वींस  कालेज हो गया। आरंभ में यह कलकत्ता विश्वविधालय से सम्बद्ध था | 1827 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर इसकी सम्बद्धता वहां से हो गई । सन 1918 में हर्टोंग कमीशन की रिपोर्ट के सिफारिस से क्वीन्स कालेज में वीए और एमए की पढ़ाई यहां बंद हो गई और यहां पर सिर्फ इण्टर तक की कक्षायें चलने लगी। सन 1957 में क्वीन्स कालेज से जुड़े संस्कृत विद्यालय को विश्वविधालय (वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय) का दर्जा मिलने के बाद मुख्य भवन संस्कृत विश्वविद्यालय को मिल गया और क्वीन्स कालेज अपने छात्रावास प्रांगण (वर्तमान प्रांगण) में स्थानान्तरित हो गया। जहाँ सन 1969 में कालेज का नया भवन तैयार हुआ। और वर्तमान में राजकीय क्वीन्स इंटर कालेज के नाम से संचालित है।
नगर ही नही पूर्वांचल के प्राचीन माध्यामिक विद्यालयों में राजकीय क्वीन्स कालेज का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। इस कालेज में हिन्दी के प्रख्यात लेखक उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी ने शिक्षा प्राप्त किया था। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभ रहे है एवं इन्हे साहित्य संसार की महत्वपूर्ण हासेयों में से एक माना जाता है। प्रेमचंद जी का जीवन परिचय एक प्रेरणादायक साहित्यिक यात्रा है। 31जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही मे मुंशी अजायब राय और पाता आनन्दी देवी के परिवार में जन्में धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ प्रेमचंद जी ने अपनी पढ़ाई गांव अगल बगल के विद्यालय से प्रारंभ करने के बाद क्वीन्स कालेज से हाईस्कूल व इण्टर किया था। उनके जीवन में क्वीन्स कालेज का बहुत बड़ा योगदान रहा है। क्वीन्स कालेज ने उन्हे जीवन में विद्यालयीय शिक्षा के साथ ही व्यवहारिक जीवन की शिक्षा भी दिया। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी क्वीन्स कालेज से ही हुई थी। जो उनके प्रारंभिक कहानियों और उपन्यास सेवा सदन कर्मभूमि अन्य में परिलक्षित होता है। वर्तमान समय में सांस्कृतिक अभिनवीकरण व भारतीय मूल्यों व प्रतीकों को पुनर्स्थापना की जा रही है ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि दो सदियों से अंग्रेजी दासता के प्रतीक रहे क्वीन्स कालेज के नाम पर चलने वाले इस महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान का नाम भी परिवर्तित कर अपने महान छात्र के नाम पर प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज किया जाये।                 अब समय आ गया है कि वाराणसी एवं वाराणसी के धरोहरों के प्रति संकल्पित और समर्पित लोग एवं संस्थाये अपने माटी के सपूत प्रेमचंद जी के नाम पर करने के लिये एकजूट हो और यह प्रेमचंद जयंती पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

-व्योमेश चित्रवंश,एडवोकेट
29.06.2025
(लेखक चित्रगुप्त सभा काशी के उपाध्यक्ष एवं प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र लमही के सलाहकार संरक्षक हैं)

शनिवार, 28 जून 2025

गोदौलिया ....(बनारस पर व्योमेश की कविता)28जून2025

गोदौलिया ....

मैं खड़ा हूँ
गोदौलिया चौराहे पर
ढूंढ़ रहा हूं प्राचीन गोदावरी तीर्थ
वह कहीं नहीं दिखता
दिखता तो गोदौलिया भी नहीं
बल्कि वहाँ है, स्टील प्लेट्स और पाईप के ढेर
पैदल बेशुमार भीड़
चौराहे के तीन तीन ओर
टोटो का रेला
जो बढ़ा रहे है अनिच्छित चिड़‌चिड़े जाम को
बाबा बताते थे है गोदौलिया
गाडविला से बना है
चौराहे के सेंट थामस चर्च के नाम पर
प्रिंसेप ने ढूढ़ा था
शाही नाला और घोड़ा नाला यही कहीं
सुबह इसी चौराहे से, गमछा कांधे पर डाले
हर हर महादेव गंगे, काशी विश्वनाथ शंभो
अलख जगाते जाते थे श्रद्धालु नेमीगण
बाद में दोनो चौराहों के किनारे
बैठा दिये गये नंदी जमी से पंद्रह फीट ऊपर
दोनो गोदौलिया के तीन किनारे खुदे पड़े हैं
निर्माणाधीन स्टेशन के लिये,
जो बनेगें नंदी की तरह पचासों फीट ऊपर
चलने वाले वाले हवाई झलुआ टोटो के लिये
जिन्हे अखबारी भाषा मे रोप वे कहते हैं
बड़े बड़े होटल दिखने लगे है
ग्लोसाईन औ डिस्प्ले मानीटर वाले
सुंदर आकर्षक शोरुम भी
पर नही दिखता वह पुराना गोदौलिया
जो शहर का हृदयस्थल कहा जाता था
नही दिखती, गमछा टांगे अलमस्त
दुनिया को अपने ठेगें पे रखे चाय लड़ाती
पान घुलाती वो बनारसी फक्कड़ रहीसियत
जो कभी मेरे शहर के पहचान थी
अब दिखते है देर सारे पर्यटक, तीर्थयात्री
पैदल चलता सड़क के दोनो लेन में,
सब दिखता है पर नही दिखता
इसी भीड़ मे खो गया बनारसीपन
खुदाई, रोपवे, ग्लोसाईन टूरिज्म वाले चौराहे में
मेरे शहर की पहचान, गोदौलिया की तरह...

-व्योमेश चित्रवंश
28.06.2025

रविवार, 15 जून 2025

गंगा की सीढ़ीयॉं.......(कविता) 14जून 2025

गंगा की सीढ़ीयॉं......

ये गंगा की सीढ़ीयॉं
शहर से बस नदी की ओर
नही ले आती हैं
वे ले आती है
कोलाहल से शांति कीओर
भौतिकता से आध्यात्म की ओर
स्व से शिव को ओर
सांसरिकता से बैराग्य की ओर
इन्ही सीढ़ीयों पर
शिव ने शंकर को बताया था
द्वैत अद्वैत से परे ब्रहम को,
तुलसी ने लिखा था रामायण
रामानंद ने दिया था कबीर को
रामनाम का गुरूमंत्र
इन्ही सीढीयों पर
बुलाया था जगन्नाथ ने
अपनी लवंगी के लिये
माँ गंगा को
और गंगा चढ़ती आयी थी
इन्ही सीढ़ीयों पर
अपन पुत्र रत्नाकर के
निश्छल प्रेम का साक्ष्य देने
इन्ही सीढीयों पर
रैदास ने किया था आवाहन
अपनी कठौती में मां गंगा का
नजीर ने देखा था
इन्ही सीढ़ीयों पर
सुबह ए बनारस को
गंगा में नहाते हुये
ख्वाहिश कर जीने मरने की
गंगा में बजू कर कर के
इन सीढ़ीयों पर
हरिश्चन्द्र ने नहीं छोड़ा सत्य को
छोड़ दिया सारे संबंधों को
राजपाट, पत्नी पुत्र सर्वस्व काे
क्योंकि ये केवल सीढ़ीयां नहीं
बॉहे है मॉ गंगा की गोंद की
वह मॉं है हमारी प्रकृति मॉं
स्रोत है सत्य,श्रद्धा,निर्मल
पवित्र मोक्ष और कल्याण की
ये सीढीयॉ उतारती है
हमारे अंतर का अहंकार
मिटाती है तम और क्लेश,
हिमालय की उंचाई से
चल कर सागर मे समाते हुये,
बताती है सच्चाई
स्वयं को समाहित कर
अथाह सागर में विलीन होने की
तभी वह श्रद्धा पात्र होती है
हम सबके लिये
तभी केशव को भरोसा है
एकमात्र अपने मॉं गंगा पर
हे भागीरथी
हम दोष भरे,
पर भरोसे यही है कि भरोस तुम्हारे
नाम लिए कितने तर जात,
प्रणाम किए सुरलोक सिधारे।

-व्योमेश चित्रवंश
काशी, 14जून2025 रविवार