सोमवार, 14 जनवरी 2019

व्योमवार्ता/ स्वामी विवेकानंद की जाति? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १४ जनवरी,२०१९ सोमवार

व्योमवार्ता/ स्वामी विवेकानंद की जाति? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १४ जनवरी,२०१९ सोमवार
आज एक मित्र ने जिज्ञासा की कि स्वामी विवेकानंद किस जाति से थे क्योंकि अभी दो दिन पहले अर्दली बाजार स्थित एलटी कालेज मे हुये एक समारोह मे कुछ ब्राह्मण साथियों ने स्वामी जी को ब्राह्मण बताते हुये एक महिला वक्ता की इस बात पर आलोचना की थी कि उसने स्वामी जी को कायस्थ बतलाया था।
यूँ तो स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवनकाल मे ही समस्त जाति बंधन से ऊपर उठ कर स्वयं को राष्ट्र व श्री रामकृष्ण परमहंस की सेवा व मिशन के प्रति समर्पित कर दिया था। परंतु स्वयं को सर्वदा से उत्कृष्ट मान रहे समाज के कुछेक लोग स्वामी जी को भी अपने दायरे मे ही बांधे रखना चाहते हैं। मैने अपने मित्र के जिज्ञासा समाधान हेतु उनके अमेरिका मे दिये गये साक्षात्कार का निम्न अंश प्रस्तुत किया तब जा कर उन्हे अपने मन के उत्तर को संतोष मिला।

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी जाति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:

“ मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता शेष क्या रहेगा? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चन्द्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं। हम केवल बाबू बनने के लिये नहीं, अपितु हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिये पैदा हुए हैं। ”
                                                                           —स्वामी विवेकानन्द
(बनारस, १४ जनवरी २०१९, सोमवार)
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व्योमवार्ता / सनातन धर्म की वैज्ञानिकता बाणस्तंभ: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 14 जनवरी 2019, सोमवार (अजेयप्रकाश श्योपुर सांगानेर द्वारा साझा किया हुआ प्राचीन वैज्ञानिक अद्भुत सत्य )

व्योमवार्ता /सनातन धर्म की वैज्ञानिकता : बाणस्तंभ
व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १४जनवरी,२०१९
             क्या आप 1500 वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं?
        ‘इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है की हम आश्चर्य में पड जाते हैं!
पहले हम स्वयं से पूछते हैं
यह कैसे संभव है?
डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था इस पर कीसी को जल्दी विश्वास ही नहीं होता!
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है!
12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ!
एक वैभवशाली सुंदर शिवलिंग!
इतना समृध्द की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए उसे लूटा गया!
सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था!
लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है!
न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है!
इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है!
यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता है!
यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा!
यह एक दिशादर्शक स्तंभ है जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है इस बाणस्तंभ पर लिखा है -
‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत
अबाधित ज्योतिरमार्ग’
इसका अर्थ यह हुआ-‘इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है।’ अर्थात ‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है!
जब मैंने पहली बार इस स्तंभ के बारे में पढ़ा और यह शिलालेख पढ़ा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए!
यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था?
कैसे संभव है?
और यदि यह सच हैं तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं!
संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं की ‘सोमनाथ मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक (अर्थात अंटार्टिका तक) एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है'!
क्या यह सच है?
आज के इस तंत्र विज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है लेकिन उतना आसान नहीं!
गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है! वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं)नहीं आता है!
अर्थात हम पूर्ण रूप से मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है!
किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है अगर मान कर भी चलते हैं की सन 600 ई० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव है यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहां से आया?
अच्छा दक्षिण ध्रुव ज्ञात था यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी भूखंड नहीं आता है यह ‘मैपिंग’ किसने किया?
कैसे किया?
सब कुछ अद्भुत!!
इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है इसका ज्ञान था!
इतना ही नहीं पृथ्वी का दक्षिण ध्रुव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था!
यह कैसे संभव हुआ?
इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था?
अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था?
नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं) कहते है!
यह प्राचीन शास्त्र है ईसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे!परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है!
हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है!
इनका कालखंड ईसा पूर्व 611 से 546 वर्ष था किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था!
उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है!
इसलिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण ध्रुव दिखने का कोई कारण ही नहीं था!
आज की दुनिया के वास्तविक रूप के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन 1490 के आसपास तैयार किया था!
ऐसा माना जाता हैं की कोलंबस और वास्कोडिगामा ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था।
‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था!
‘एनेक्सिमेंडर’ इनसा पूर्व 600 वर्ष पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था!
‘एरिस्टोटल’ (ईसा पूर्व 384– ईसा पूर्व 322) ने भी पृथ्वी को गोल माना था!
लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था जिसके प्रमाण भी मिलते है!
इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन 500 के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास 4967 योजन हैं!
(अर्थात नए मापदंडों के अनुसार 39668 किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया!
आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास 40068 किलोमीटर माना गया है!
इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र 0.26% का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया?
सन 2008 में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की ईसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष भारत में नकशा शास्त्र अत्यंत विकसित था! नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे!
भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण एशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा,सुमात्रा, यवनद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे!
सन 1955 में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं!
इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन उस समय के भारतियों को था यह निश्चित है!
लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है!
ऐसा बाद में खोज निकाला या दक्षिण ध्रुव से भारत के पश्चिम तट पर बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया?
उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में
(‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग’)
जिसका उल्लेख किया गया है वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है?
यह आज भी प्रश्न ही है!
क्योंकि सुदूर दक्षिण में जाने वाले मार्ग का उत्तर काल के थपेड़ों में कहीं लुप्त हो गया है!
(अजेय प्रकाश श्योपुर सांगानेर द्वारा साझा किया हुआ अद्भुत तथ्य)
बनारस, १४जनवरी २०१९, सोमवार
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सोमवार, 31 दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/ वर्ष 2018 का आखिरी दिन / व्योमेश चित्रवंश की डायरी : 31दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/ वर्ष 2018 का आखिरी दिन / व्योमेश चित्रवंश की डायरी : 31दिसंबर 2018

2018 के आखिरी दिन.......
धन्यवाद्....!!
उन लोगो का जो मुझसे नफरत करते है क्यों की उन्होंने मुझे मजबूत बनाया.....
धन्यवाद् !!
उन लोगो का जो मुझसे प्यार करते है क्यों की उन्होंने मेरा दिल बड़ा कर दिया.....
धन्यवाद् !!
उन लोगो का जो मेरे लिए परेशान हुए.....
और मुझे बताया की दरअसल वो मेरा बहुत ख्याल रखते है...
धन्यवाद् !!
उन लोगो का जिन्होंने मुझे अपना बना के छोड़ दिया और मुझे एहसास दिलाया की दुनिया में हर चीज आखिरी नही होती....
धन्यवाद् !!
उन लोगो का जो मेरी जिंदगी में शामिल हुए और बना दिया ऐसा जैसा मैंने सोचा भी नही था.....
धन्यवाद् !!
मेरे भगवान का जिन्होंने मुझे इन सभी हालातो का सामना करने की हिम्मत दी।
आपको व आपके पूरे परिवार व आपके सभी शुभ चिंतकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं ।
नववर्ष 2019 मंगलमय हो
(बनारस, 31 दिसंबर 2018, सोमवार )
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गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/ गण के तंत्र का उत्सव रामसमुझ की छब्बीस जनवरी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 दिसम्बर 2018

व्योमवार्ता/ गण के तंत्र का उत्सव रामसमुझ की छब्बीस जनवरी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 दिसम्बर 2018

                     रामसमुझ की नींद रोज की तरह आज भी पॉच बजे सुबह खुल गई, अब नींद खुल गई तो वह नहा निपट के खाली भी हो गया। अभी सुरज देवता नही उगे थे। रामसमुझ को नहा धो के बैठा देख उसकी पत्नी परभौतिया ने जले चूल्हे पर चार गो मोटी मोटी हथुई रोटी सेक मसालेदार आलूदम और गरम गरम काली चाय के साथ उसके आगे कलेवा रख दिया।कलेवा देने के बाद परभवतिया रोज की तरह ऑख पोछते, नाक सुकड़ते रामसमुझ के सामने बैठ गई। यह परभौतिया का रोज का नियम था, इसमे कोई शिकवा शिकायत या मजबूरी की बात नही बल्कि रोज सुबह सुबह चुल्हे को फूंकने व धूये के  तीखेपन का असर है। परभौतिया कई बार टी वी पर सुनी थी कि सरकार और मोदी जी सबको गैस कनेक्शन बॉट रहे है पर अभी तक उसे कोई कनेक्शन नहीं मिला। ऐसा नहीं है कि परभवतिया व रामसमुझ ने इसके लिये प्रयास नहीं किया पर गैस एजेंसी वालो ने बताया कि कनेक्शन उनके आधार कार्ड पर लिखे पता पर ही मिलेगा। अब परभवतिया का घर तो यहॉ है नही, वह तो बिहार मे है कोसी नदी के किनारे सड़क से दो कोस अंदर जाने पर। यहाँ तो वह उसी बिल्डर के अधूरी बनी बिल्डिंग के कंपाउंड मे किनारे बने टेम्परवारी ईंट की झोपड़ी मे रहती है जिसमे पहले वह व रामसमुझ दोनो काम किया करते थे। पता नहीं क्यों बीच मे ही बिल्डिंग का काम बंद हो गया लेकिन बिल्डर के मेठ ने उन दोनो को और लेबरो के साथ पॉच सो रूपये महीने पर उन्हे रहने दिया था।एक बार रामसमुझ ने मेठ से पूछा भी था कि काम क्यों बंद हो गया तो मेठ ने बताया कि नोटबंदी से सब कुछ ठप्प हो गया है परभवतिया आज तक नही समझ पाई कि अगर नोटबंदी हो चुकी है तो रोज दिखने वाले नोट कहॉ से आते है। बल्कि अब तो हरे पीले बैगनी बादामी कत्थई रंग के रिकम रिकम के नोट दिखते है उसे। पिछले बार जब एकांउट मैडम जी ने उसे पगार दिया था तो वह तो पहचान ही नही पाई थी हरे रंग के पचास कत्थई रंग के सौ और पीले रंग के दो सौ रूपये के नोट को। मैडम जी ने ही उसे पहचनवाया था । एकाउंट मैडम जी ने उसे एगो छोटका चूल्हा मुंह वाला सिलेण्डर दिया है पर वो भी न भरवाने से खाली पड़ा है। तो आधार न होने के काऱण परभवतिया को कनेक्शन नही मिला गैस का, और वह आज भी ईंटे वाले चुल्हे पर ही अपना रोटी कलेवा तैयार कर लेती है। परभवतिया की भी दिनचर्या बड़ी टाईट है वह रामसमुझ से भी पहिले उठ के मुँहअंधेरे ही थोड़ी दूर पर से गुजर रही रेलवे लाईन के किनारे फरचंगा हो आती है। शुरू शुरू मे तो परभवतिया को बड़ा अजीब लगता था जब वह लाईन किनारे घुटने मे सिर गाड़े बैठी रहती और कोई रेलगाड़ी उधर से गुजरती पर अब वह आदती हो गई है । मेलगाड़ी आये या मालगाड़ी कौन सा उसमै बैठने वाले पसिंजर परभवतिया को पहचानते है,और गर पहचानते भी होगें तो परभवतिया अपना मुँह थोड़ा सा और नीचे झुका लेती है कि उसे कोई देख ही न सके। साल डेढ़ साल पहिले बड़ी दिक्कत हो गई थी कोई नया लड़का कलेट्टर आया था वह सबेरे सबेरे खुले मे फरचंगा हेने वालों को सीटी बजा के पकड़वाता था। सुन सुन कर परभवतिया को कई दिन तक खुलाशा ही नही हुआ था। लेकिन यही अच्छा रहा कि रेलवे लाईन किनारे कोई सीटी बजाने वाला नही आया बाद मे सुना कि उस लड़के कलेट्टर की यहॉ से बदली हो गई।
अरे हम भी कहॉ की बात करने लगे , बात परभवतिया के दिनचर्या की हो रही थी, तो परभवतिया जब तक रेलवे लाईन से वापस आती है तब तक हाते मे लगे सरकारी नल का पानी आना शुरू हो जाता है, बस चटपट वहीं पर राखी से रात के बर्तन मॉजने के बाद चुल्हे की मुलायम राखी से ही दंत मॉज कर नहाने के बाद परभवतिया झोपड़े मे आती है और चूल्हा मे आगी दे कलेवा तैयार करने को रख देती है। परभवतिया को कभी कोई आसकत नही लगता अपने इस सबेरे के नेम मे।हॉ कभी कभार जब सरकारी नल मे पानी नही आता तब सरकारी नल की ही तरह परभवतिया को भी अपना नियम तोड़ना पड़ता है क्योंकि तब पानी के लिये बिल्डिंग के समर्सेबुल पंप का बाट देखना पड़ता है, और वह बिल्डिंग का चौकीदार तभी चलाता है जब बिल्डिंग के सारे लोग एक साथ पानी लेने आयें। अब ऐसे मे नहाया तो जा नही सकता तब परभवतिया बिना नहाये धोये अपने काम मे लग जाती है। कामधाम का मतलब रामसमुझ को कलेवा खिला के काम पे भेजना  फिर अपना कलेवा जल्दी से निपटा कर बगल वाले अपाटमिंट मे झाडू पोछा, बरतन करने जाना। कुल चार घरों मे झाड़ू पोछा बर्तन करती है परभवतिया। एकाउंट मैडम के यहॉ, उनके साहब वीडीए मे एकांउंटेन है, प्रोफेसर मैडम के यहॉ,वकील साहेब के यहॉ और वो बलकटी मैडम के यहॉ जिनके साहेब पानी वाले जहाज पे रहते हैं, सबसे बढ़िया वही मैडम है, खूब सुंदर भी है और अभी नई उमर की भी।अकसर परभवतिया को अपने पुराने कपड़े लत्ते और सामान देती है और कुछ नया बनाती है तो वो भी। उनके यहॉ काम भी कम ही होता है गिन के तीन मुर्गी, उस पर भी अकसर खाने पीने की चीजे मोबाइल कर के मंगा लेती है दूर दूर से भी, जब उनके पति आते है तो अकसर खाना पीना बाहर, परभवतिया को आराम ही आराम, लेकिन वकिलाईन मैडम को ले लो ,बाप रे हमेशा नकचढ़ी और रोज न रोज घर पर दोस्तों को बुला कर पार्टी करती रहती है। एक तो खुद कहीं बाहर जाती नही बल्कि उसके यहॉ लोग ही आते रहते है, अब लोग आयेगें तो बरतन निकलेगा और परभवतिया का काम बढ़ेगा। बस गर्मियों मे छुट्टी मनाने बाहर जायेगी तो सौ ठो हुकुम बजा के, परभावती रोज शाम को लाईट जला देना, किचन मे ऱोज झाड़ू लगा देना। सौ तरह के नखरे इन बड़े लोगों के होते है लेकिन परभावती सब कुछ कर लेती है बिना शिकायत, बिना बोले। आखिर उसकी कमाई तो झीरा है हर महीना मिल जाती है नही तो रामसमुझ के लेबराना का क्या भरोसा , कभी बरसात से बंद तो कभी काम न मिलने से। कभी कभी दस दिन भी बैठना ही पड़ जाता है। रामसमुझ और परभवतिया को चार लड़कियॉ है, लड़के के इंतजार मे एक के बाद एक करते हुये जब चार की लाईन लग गई तो मेडवाईफ बहिन जी के कहने पर परभवतिया ने आपरेशन करवा लिया तीन हजार रूपया  मिला था उस वक्त । चारों को उन दोनो ने सास ससुर के पास बिहार छोड़ दिया है  दो पढ़ने जाती है दो दर्जा आठ पास कर के घर का काम धाम देखती है अपने बब्बा आजी के पास। इन्ही की शादी की चिन्ता लगी रहती है परभवतिया को। इसलिये वह दोनो की कमाई से बचा के चार हजार रूपये अपने ससुर को भेज देती है , पॉच सौ रूपये कोठरी का भाड़ा चौकीदार के हाथ पर हर महीने के दो तारीख को रखना पड़ता है, उस भाड़े मे बिजली का एक लट्टू, छोटी वाली टीवी, एक फर्राटा पंखा, मोबाइल चार्जिंग और बाहर वाले नल का खर्चा शामिल है। दो ढाई हजार के आसपास राशन, कोईला, लकड़ी मे लग जाते है। गॉव से ससुर या कोई और दवा ईलाज घूमनेे या मिलने आ गया तो हजार पॉच सौ खातिरदारी लग जाते है पर इसी बहाने मटन मुर्गा आ जाता है । उस दिन रामसमुझ नूरी या मसालेदार सीसी ले आता है तो महीने मे एकाध दिन जश्न हो जाता है।
हम फिर लाईन से भटक गये। बात रामसमुझ से शुरू हुई थी और हम परभवतिया के लपेटे मे उलझ गये। हॉ, तो कल रामसमुझ के ठीकेदार ने कहा था कि कल छब्बीस जनवरी है काम नही होगा। अब छब्बीस जनवरी कोई हिन्दू मुस्लिम तीज त्योहार तो है नही जो काम बंद करना पड़े पर ठीकेदार ने बताया कि यह राष्ट्रीय त्यौहार है काम होता दिखा तो लेबर विभाग वाले उस पर फाईन ठोंक देंगे, तब रामसमुझ के समझ मे आया कि ठीकेदार अपने को बचाने के लिये काम बंद कर रहा है।
  आज कल रामसमुझ कचहरी मे काम कर रहा है, बहुत ऊँची बिल्डिंग बन रही है कचहरी मे, ठीकेदार बता रहा था कि मोदी जी बनवा रहे है, वे यहॉ से जीते है इसलिये। कोई बनवाये रामसमुझ को क्या? उसे तो बस काम से मतलब है। इधर तीन महीने से वह इसी बिल्डिंग मे काम कर रहा है। दिन भर भीड़ भाड़ रहती है यहॉ . लगता है सारा बनारस यही आ गया हो। अनगिनत काला कोट पहने वकील साहब लोग तो फटे कुर्ता लुंगी धोती से लेकर नये चमकते सूट टाई मे लोग, नई नई शरमाती अपने दुल्हे का हाथ थामे शादीसुदा लड़कियॉ तो उनसे ज्यादा तेजी दिखाती इधर उधर भागती महिलायें। मोटरसाइकिल की तो कोई गिनती ही नही और चारो तरफ लगी कार मोटर, किसी भी ओर से सीधे घुसने की गुंजाइश ही नही। वकील से लेकर पुलिस वाले, फेरी वाले, खोमचे वाले, फल वाले सभी तो दिखते है कचहरी में।इन तीन चार महीनो से कचहरी के कई रंग देखे है रामसमुझ ने।रोते कलपते लोगों को, ठहाके लगाते लेगों को। घर से कुर्ते की जेब मे अखबार के टुकड़े मे लपेटी रोटी को आचार के साथ खा कर सरकारी नल पर पानी पीते लोगों को और कचहरी के दुकानों मे बैठ एक के बाद मालपुये उड़ाते लोगों को। कभी अपनी धोती की गॉठ से मुड़े तुड़े नोटों को निकाल कर देते और वकील साहब के पैरों को छूती निराश ऑखे तो अटैची से नयी नोटों की गड्डियों को वकील साहेब के मेज पर पटकती सपने बुन रही ऑखो को। अभी पिछले महीने ही तो कचहरी मे वकील साहब लोगो का 'एलेकसन' था। बाप रे बाप , क्या क्या रूप और किस किस दशा मे  देखा था वकीलसाहब लोगों का रामसमुझ ने। अब ये सब बातें रामसमुझ परभवतिया को बताता है तो वह समझ नही पाती । समझ तो रामसमुझ भी नही पाता पर वह अचरज करता है इन सब चीजों को देख कर।
आजकल रामसमुझ बिल्डिंग के ऑठवी मंजिल पर काम कर रहा है। ठीकेदार ने चारो तरफ हरा तिरपाल लटकवा दिया है ऊपर से नीचे तलक ताकि कोई ईंट पत्थर का टुकड़ा नीचे न गिर सके। ठीकेदार साहेब कहते है कि वकीलो से कौन उलझे? कुछ हो गया तो नाहक बवाल कर देगें ये लोग। उन्होने सारे लेबरों से भी वकीलों से बात चीत करने से मना कर रखा है बल्कि कोशिश ये करते है कि दिन का काम कचहरी चलने के दौरान भीतर भीतर ही हो। रामसमुझ कभी कभी इस बिल्डिंग से पूरे बनारस को देखता है। टीवी टावर से लेकर कैण्ट स्टेशन का उपर वाला चक्का, बड़े बड़े एपाटमिन्ट, रजिस्ट्री आफिस , शिवपुर वाली बिल्डिंग सब छोटे छोटे दिखते है , तब उसे लगता  कि वह बहुत  ऊँचा हो गया है, बड़ा आदमी।
बहरहाल कलेवा करने के बाद थोड़ी देर रामसमुझ ईधर उधर करता रहा। परभवतिया ने कहा भी कि घर मे रह के टीवी देखे दिल्ली से प्रोग्राम आयेगा पर परभवतिया तो काम पर चली जायेगी फिर वह अकेला क्या टीवी देखेगा। परभवतिया को छब्बीस जनवरी की छुट्टी क्यो नही है, क्या उसके एपाटमिंट मे लेबर विभाग वाले नही छापा डालते। आखिर मन नही मानता वह अपना गमछा कानो पर बॉध निकल पड़ता है। आज की सुबह थोड़ी सी अलग सी है। सड़क के किनारे खड़े बच्चे आज बिना स्कूल का बस्ता लिये चमकती ड्रेसो मे अपने स्कूल की गाड़ियों का इंतजार कर रहे हैं। कई गो टैम्पो वाले अपने टैम्पो पर भी झंडा लगाये हैं कई ने आगे सीसे पर मेरा भारत महान भी लिख रखा है चूने से। ये टैम्पो वालों की ही जिन्दगी मस्त होती है, रामसमुझ सोचता है, नये साल संक्रान्ति होली दीवाली पर टैम्पो को सजा के घूमाते है खूब जोर जोर गाना बजा के। रेलवे फाटक पर सब्जी वालो की भीड़ वैसे ही है। आज गाहक कुछ ज्यादा ही दिख रहे है फुरसत से सब्जी खरीदते हुये।आज छब्बीस जनवरी जो है, इनकी भी छुट्टी ही होगी, लेबर विभाग के छापे का डर। ये बड़े लोग भी किसी से डरते तो है, ये ख्याल आते ही रामसमुझ का मन खुश हो जाता है।फाटक के बॉये हाथ वाला बड़ा कटरा किसी मंत्री जी का है, जब यह बन रहा था तब रामसमुझ ने इसमे भी लेबरई किया था। अंदर शादी का मैदान भी है इसमे। ये मंत्री जी लोगो के ऊपर क्या नोटबंदी नही होती, बरबस ही रामसमुझ के मन मे सवाल उठता है। चलते चलते वह बाईपास आ जाता है, वाह आज बाईपास पचमुहानी के गोलंबर मे भी बड़ा सा झंडा लहरा रहा है।बगल के स्कूल की सारी बसे सड़क किनारे खड़ी है, ये रोज ऐसे ही खड़ी रहती है, पता नही क्यों इनका चालान नही होता? बाकी तो सड़क पर गाड़ी खड़ी करते ही पुलिस वाले चालान कर देते है। सुना है कोई बड़े अफसर है विशनाथ मंदिल के, उन्ही का स्कूल है यह। फिर पुलिस वाले क्यों चालान करेगें।उत्तर तरफ नया वाला पीला पुल है,इसे भी हाल मे मोदी जी ने बनवाया । रातो रात पुल कैसे सड़क के ऊपर टंग गया यह रामसमुझ के लिये अचरज की बात है। वह बहुत दिनो से इस पर चढ़ कर नीचे आती जाती गाड़ियों को देखना चाहता था। आज खलिहर है तो ये भी कर लेते है। रामसमुझ लपक कर पीले पुल पर चढ़ जाता है , हल्के कोहरे मे सूरज अभी तक नही निकले हैं। उत्तर की ओर दूर तक जाती सड़क पर आती जाती सीधी लाईन मे गाड़ियॉ, बीच मे जलते लाईट के खंभो के बीच खजूर के छोटे छोटे पेड़ अच्छे लग रहे हैं। अरे ये क्या ? सब्जी लाद कर आ रही छोटे हाथी को चौकी के सिपाही ने रोक के किनारे खड़ा करा दिया है। और किसी बात पर झेंझ कर रहा है।ऊपर से सब दिख रहा है, काश रामसमुझ के पास कैमरा वाला मोबाईल होता तो वह आज सिपाही राम की पूरी रामकहानी खेंच लेता। काफी देर तक हाथ पैर जोड़ने के बाद छोटा हाथी का ड्राईवर पहले पचास रूपये फिर सौ रूपये सिपाही को देता है तब बेचारा अपनी सब्जी लदी गाड़ी को ले के जा पाता है। उसके लिये कोई छब्बीस जनवरी नही है न ही सिपाही जी के लिये।उसके ख्यालो को  हल्की गड़गड़ाहट तोड़ती है। ऊपर एक हवाई जहाज पूरूब ओर चला जा रहा है, जब से मोदी जी बनारस से परधानमंत्री हुए है तब से बनारस मे हवाईजहाज खूब आ गये हैं। वह पुल से ऊतर कर पचकोसी पकड़ कर यूपी कालेज  गेट होते हुये भोजूबीर आता है। वहॉ टैम्पो स्टैण्ड पर ही टैम्पो वाले छब्बीस जनवरी मना रहे है,  आपस मे हंसी मजाक ठिठोली करते। रामसमुझ वही चाय पीने राजा उदेप्रताप की मूर्ति के नीचे खड़ा हो जाता है तभी एक स्कूटी पर आये साहब उसे बुलाते है "ऐ सुनो काम करोगे?" "लेकिन साहब, आज तो छब्बीस जनवरी है।"
"अरे यार कौन सा तुम्हे संविधान लिखना है, कुछ कमाना है तो बताओ, दस मिनट का काम है ,सौ रूपये दूगॉ।" रामसमुझ को लगता है छुट्टी मे कुछ मिल ही तो रहा है चलो कर लेते है। काम पूछने पर पता चलता है कि साहब के मर चुके कुत्ते की लाश को लाद कर बरना नदी मे फेंकना है। मामला दो सौ रूपये से चलते चलते डेढ़ सौ रूपये मे तय हुआ । एक बार तो रामसमुझ को लगा कि नहाने धोने के बाद मरे कुत्ते को उठाना सही नही है फिर सोचा कि छुट्टी के दिन दस मिनट के काम के लिये डेढ़ सौ रूपये कमाने मे कोई बुराई नहीं । दिन दूपहरी घर चल कर फिर से नहा लेगा। वह साहेब के साथ चल देता है। साहब के आलीशान घर मे सीढ़ी के नीचे पड़े कुत्ते की लाश को मेमसाहेब के दिये सफेद कपड़े मे लपेट बोरे मे भर लेता है। मेम साहेब लगातार रो रही है। जब रामसमुझ कुत्ते की लाश को साहेब के कार की डिग्गी मे रख कर जोर से डिग्गी का दरवाजा बंद करता है तो मेमसाहेब चीख पड़ती है"संभाल के, ब्रूनो को चोट लग जायेगी।" हक्का बक्का रामसमुझ देखता है कि ब्रूनो कौन है।साहब रामसमुझ की परेशानी समझ जाते है और फफक कर रोती मेमसाहेब को संभालते हुए अंदर ले जाते है। रामसमुझ सकुचाता सा साहेब की गाड़ी मे बैठ जाता है और बरूना पुल से बॉये कार उतार कर इंकमटैक्स के पिछवाड़े साइड मे खाली जगह देख कर डिग्गी से कुत्ते की लाश उठा कर नदी मे फेंक देता है। नदी मे पानी न होने से बोरा बस वैसे ही उतरा गया। साहेब ने हाथ जोड़ कर अपने ब्रूनो को प्रणाम किया और वापस चल दिये।कचहरी पर आ कर रामसमुझ वहीं उतर गया अपना डेढ़ सौ रूपया ले के।वह बार बार कभी खुद को कुकुरगंध मे सना महसूस करता है कभी ब्रूनो की किस्मत पर सोचने लगा कि मरने के बाद भी कार से खुद साहेब उसे ले के प्रवाहित करने गये।यही किस्मत है जो साली बार बार बड़े लेगो को ही मिलती है। उसका दिमाग भन्ना गया था और भोजूबीर तक आते आते उसके कदम देशी ठीके के तरफ घूम गये। ठीका बाहर से बंद है पर रामसमुझ को मालूम है कि छुट्टी मे भी ठीका के पीछे की खिड़की खुली रहती है। दो नमकीन भुजिया पाऊच दो सीसी नूरी ले के वह वापस कोठरी की ओर चल दिया। अभी घर पर परभवतिया नही आयी है। वह तब तक नल पर जा कर नहा धो के फारिग हो जाता है। अभी भी परभवतिया नही आई । वह कोठरी के दरवाजे पर बैठा परभवतिया के काम वाले एपाटमिंट की ओर नजर डालता है और एक पाऊच व एक नूरी खोल लेता है। परभवतिया के एपाटमिंट पर बड़ा सा झंडा लहरा है । रामसमुझ भी जोश मे खड़ा हो जाता है, उसके हाथ खुद बखुद सलामी के मुद्रा मे आ जाते है और उसे पिराईमरी स्कूल मे याद कराया गया गाना याद आ जाता है "जनगन मन अधिनायक जय हे........।
  (बनारस, २७ दिसम्बर २०१८, गुरूवार)
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