रविवार, 29 मार्च 2026

बनारस पर कविता (8)

नये साल पर.........

कुछ तो है अलग सा
इस शहर में
तभी तो कहते है
अलमस्त निर्विकार, अव्यक्त काशी
कुछ तो है
जब पूरी दुनिया पश्चिमी रंग में
रंग कर उसके चमक ने खोयी है
तो यहां विश्वनाथ धाम में
तीन से चार लाख की भीड़ खड़ी है
नये साल की शुभेच्छाओं के लिये
और आभार कहने बीते वर्ष की.
कुछ तो है
जब शहर का पारा गिर रहा है
शिमला, कुल्लू और मनाली जैसे
ऐसे मे नंगे पांव खुले सिर
चलते बैठे और भक्ति भाव मे
डूबे है ढेरों लोग
गंगा घाट से मंदिरों तक
कुछ तो है
हिल्टन, ताज, जैसे सप्ततारांकित
होटल और रेस्टोरेंट के बजाय
ठेले पर घुंघनी, चाट के लिये
सड़क पर खड़े लोग
कुछ तो है
इस शहर मे जहां
गलियों में मंहगी सस्ती कारें नही आती
मोटर बाईक और बाकी दिखावा भी नही
कुछ तो है
एक ही गली के रमेन्द्र पांडे और रामचरन नाई
मिलते है घाट पर जजमानी प्रतिद्वन्दिता मे
तो जुम्मन मियां और तूफानी सिंह
चाय लड़ाते है कल्लू सरदार के यहां
पान जमा के देश की राजनीतिक अड़ी
तजबीजते है छेदी पनवाड़ी के ठीहे पर
असलम के अजान को सुन के
उठते है दुर्गा पंडित  हाजिरी लगाने
भोले बाबा के दरबार में
कुछ तो है
जो यहाँ काल भी आकर ठिठक जाता है
मरण भी जहाँ मंगल है, और हर कंकड़ शंकर है
जहाँ उत्सवों का शोर नहीं, रूह का सुकून है
जहाँ नया साल कैलेंडर से नहीं
गंगा की पहली लहर और डमरू की गूँज से शुरू होता है।
तभी तो कहते हैं—
दुनिया बदलती होगी अपनी रफ़्तार से
मगर मेरी काशी तो आज भी
उसी शिव-धुनी में मगन है,
उसी अल्हड़पन में ज़िंदा है..…..

(काशी, 01जनवरी 2026 , गुरूवार)

On the New Year: There is Something...

There is something distinct

About this city,

That is why they call it—

Carefree, detached, and the unmanifested Kashi.

There is something...

When the whole world, drenched in Western hues,

Has lost itself in superficial glitter,

Here, at the Vishwanath Dham,

A crowd of hundreds of thousands stands tall,

To offer greetings for the new year

And gratitude for the one that passed.

There is something...

When the city’s mercury drops

Like that of Shimla, Kullu, or Manali,

Even then, bare-footed and heads uncovered,

Countless souls walk, sit, and immerse themselves

In pure devotion—

From the banks of the Ganga to the temple doors.

There is something...

Instead of the seven-starred luxury

Of Hiltons and Taj hotels,

People stand on the streets

For a plate of ghughni and chaat at a roadside stall.

There is something...

In this city where

Expensive or cheap cars cannot enter the narrow lanes,

Where motorcycles and worldly vanity find no place.

In the same alley, Ramendra Pandey and Ramcharan the barber

Meet at the ghat, competing in their ancestral trade,

While Jumman Miyan and Toofani Singh

Clink their tea glasses at Kallu Sardar’s shop.

With a paan in their mouths, they deliberate

Over national politics at Chedi Panwari’s corner.

Hearing Aslam’s call to prayer (Azaan),

Durga Pandit wakes up to mark his attendance

In the court of Lord Shiva (Bhole Baba).

There is something...

Where even Time comes to a standstill,

Where death is a celebration, and every pebble is Shiva.

Where the new year doesn't begin with a calendar,

But with the first ripple of the Ganga and the resonance of the Damru.

That is why they say—

The world may change at its own pace,

But my Kashi remains forever lost

In that same divine rhythm,

Living in its own eternal, carefree spirit.......


(Kashi, 01January 2026,Thursday)

रविवार, 16 नवंबर 2025

बनारस पर कविता (7)


बनारस
बुलाता है बार बार
हर तीज त्योहार पर
प्रयोगकर्मी बनारस, उत्सवधर्मी बनारस
परंपरावादी बनारस, अपने रंग में डू‌बा बनारस
अपने इतिहास संस्कृति पर
इतराता आधुनिक बनारस
जहां महादेव ईस्ट व भगवान नही
वे बावा है, बहुतअपने से हर किसी के
सर्व सिद्धि देवी अन्नपूर्णा देखती है
हर काशीवासी को माई बन कर
वह बनारस, जो रामनगर की लीला में
साथ साथ चलता है अपने प्रभु के संग
अयोध्या के राजमहल से जनकपुर की फुलवारी
चित्रकूट व पंचवटी से लंका फिर अयोध्या तक
वह बनारस जो प्याले का मेला को जीता है
तो नागनथैया में ग्वाल वन कान्हा के संग
कंदुक क्रीड़ा का सहभागी होता है
अस्सी से रथ को खींच खींच कर
रथयात्रा में अपने कान्हा को नानखटाई खिलाता है सारनाथ के मृगदाव में महीनो मेला देखता बनारस
दौड़ पड़ता है अपने रामजी को कान्हे पर लेने
नाटीइमली, जब वह लौटते है
चौदह साल बनवास के बाद अपनी अयोध्या में
दशहरे के आखिरी तीन दिनों
दुर्गामय होने वाला बनारस
गुलाब बाड़ी के केवड़ा फुहारों से
मसाने में होली व बुढ़‌वा मंगल में
जीवन व मृत्यु को उत्सव मनाता बनारस
नक्कटैया में अपने विरोध के स्वांग से शुरु
विश्वनाथ का बराती बन शिव बरात ही नही
सब को अपने ठेगें ये रख फगुआ पर
गरियाता, मौज मस्ती करता बनारस,
अमौसा जूतियाँ सोरहिया, ललहीछठ से
परदोस, एकादशी ही नही हर रोज
अपने मस्ती में जीता, अपने में रमता
तीन वार तेरह त्योहार मनाता बनारस
वह बनारस बुलाता है
छठ फगुआ अमऊसा पर
अपने अपनों को
जो दूर दराज गये है
कमाने पेट के खातिर
नहीं आ पाते छुट्‌टी,
भीड़ और रिजर्वेशन के कारण
पर ने नही बिलग हो पाते
अपनी माटी और बनारसियत से
याद कर कर के अपने बनारस को
जो हर तीज त्योहार पर बुलाता है
उन्हें बार बार, हर बार
हर तीज त्यौहार .....

- व्योमेश चित्रवंश
22.10.2025



शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

बरसात में मेरे शहर का पानी पानी होना.... (बनारस पर कवितायें)

बरसात में मेरे शहर का पानी पानी होना....

सावन बरस रहा है 
बनारस भी भींग रहा है
केवल भींग ही नही रहा 
बल्कि पानी पानी हो गया है
अस्सी से गोदौलिया तक
रविन्द्रपुरी से भदैनी तक
ट्रौमा सेण्टर और बीएचयू  ही नहीं
अंधरापुल पाणेपुर भोजूबीर भी
सावन के पानी मे नहा कर
खुद पानी पानी हो रहे हैं
इस साल भी गंगा भी उफनाई है
सावन मे ही
गंगा के पलट प्रवाह से 
वरूणा भी
अखबार बताते हैं यह बाढ़
बैराज के छूटे पानी से है
पर अपना बनारस तो 
हर बरस भींगता है
पानी पानी हो जाता है
पर इस पानी का असर 
उन पर नही पड़ता 
जिनके कारण पूरा शहर 
हर बार पानी पानी हो जाता है
क्योंकि इस पानी के बढ़ने से पहले ही
उन की ऑखों का पानी सूख चुका है....

-व्योमेश चित्रवंश, 18072025

रविवार, 31 अगस्त 2025

बनारस बाढ़ में.....(बनारस पर कविताएँ-6)

बनारस पर कविताएँ(6)

बनारस बाढ़ में,
अखबारों में छपी है ढेर सारी तस्वीरें
खबरों सहित
घुटने और कमर तक पानी में,
नाव से बस्ती राहत सामग्री
बाढ़ शिविरों में मुस्कराते
समाजसेवी व राजनेता
टूट गये है गंगाघाटें के
आपस के संपर्क और संबंध
ऊपर की ओर सरक औ सिमट गये है
सुबहे बनारस और गंगा आरती स्थल
पहुंच गई है वरुणा उन इलाकों में
जिन्हे वह बहुत पहले छोड़ आई थी
बहुत सी आँखों मे सवाल दिखते है
डूब क्षेत्र में घर बनाने को किसने कहा था
तब नगर निगम और विकास प्राधिकरण कहाँ थे
क्यों परेशान होते हैं लोग हर साल
सब कुछ जान बूझ कर भी
पर मै देख रहा हूं
घर के आंगन मे आये बाढ़ के पानी में
अपनी देहरी पर आरती करती
घाट के ठीक ऊपर रहने वाली
मां गंगा और काशी की आस्थावान
बुढी माई को
जिसके लिये बाढ़ विभिषिका नही
गंगा मैया का शुभागमन है
उसके छोटे से पुराने घर में
बाढ़ के इन दोनो दृश्यों को देख
मै हैरान परेशान हूं
सच और सत के मध्य
रेखा परिभाषित करने में
आस्था और विभिषिका
दो रुप है सोच के
शिव के उग्र व कल्याण के
प्रश्न हम से है
उत्तर भी हमी से
काशी के विविध रंग में
हमारी समस्याओ और
हमारी आस्था के.....

-व्योमेश चित्रवंश; ३०अगस्त २०२५

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा..


बरसात में मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा


ऊफनती गंगा का प्रचण्ड वेग
दूर दूर तक असीमित अपरिमित जलधार
सामनेघाट से राजघाट तक
गंगा की सूनी पड़ी गोंद
बिना नाव,बिना पक्षियों बिना पतंगों के
जैसे मां ने बरज दिया हो
खुद के पास आने से
उफनते मटमैले जल में
रत्नेश्वर महादेव मंदिर का कलस
दे रहा है साक्षी उसके होने का
बाकी सब तो गंगा के मटमैले पानी मे
खो गये है सीढीयां मढ़ी घाट और चबूतरे
मणिकर्णिका महाश्मसान डूबा है बाढ़ मे
साथ में विश्वनाथ धाम का जलासेन पथ
और गंगाद्वार भी
अंतिम संस्कार में जल रही
और कतार मे पड़ी  अहर्निश चितायें
मोक्ष को कामना में
श्मसानेश्वर महादेव से लगे ऊँचे छत पर एक दूसरे को धकियाती, देखती, इंतजार में अपनी बारी का,
यह प्रतीक्षा धरा पर कभी नही थी
न ही किसी ने प्रतीक्षा करना चाहा था
यहां आने का
पर आज वह निर्जीव,आत्माहीन शव भी व्याकुल है स्वयं की प्रतीक्षा पर,
उसे दिखती है औरो की व्याकुलता
जो सशरीर सआत्मा सजीव आये है
उसे अंतिम यात्रा पर पहुंचाने
पर व्याकुल है स्वयं की वापसी हेतु
अपने घरों को
गंगा की बाढ़ तो एक बहाना है
इस सच्चाई से मुंह मोड़ने का
कि अंत मे सबको यही आना है ..….

-व्योमेश,26अगस्त 2025

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

क्वीन्स कालेज का नाम प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज हो..../व्योमवार्ता, 29062025

 क्वीन्स कालेज का नाम प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज हो....

  वाराणसी  जनपद के जाने माने राजकीय क्वीन्स इण्टर कालेज का शुभारंभ 1791ई० मे गवर्नमेंट संस्कृत कालेज के रूप मे हुआ था । आरंभ में उसकी स्थापना मैदागिन मोहल्ले के किराये के कमरों में हुई थी। बाद में काशीनरेश द्वारा चौकाघाट मौजा में दान में संस्कृत कालेज को जमीन प्राप्र हुई और इस पर अपना भवन बना | सन 1857 में ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरया के राज्याभिषेक होने के साथ ही इस गवर्नमेंट संस्कृत कालेज का नामकरण भी क्वींस  कालेज हो गया। आरंभ में यह कलकत्ता विश्वविधालय से सम्बद्ध था | 1827 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर इसकी सम्बद्धता वहां से हो गई । सन 1918 में हर्टोंग कमीशन की रिपोर्ट के सिफारिस से क्वीन्स कालेज में वीए और एमए की पढ़ाई यहां बंद हो गई और यहां पर सिर्फ इण्टर तक की कक्षायें चलने लगी। सन 1957 में क्वीन्स कालेज से जुड़े संस्कृत विद्यालय को विश्वविधालय (वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय) का दर्जा मिलने के बाद मुख्य भवन संस्कृत विश्वविद्यालय को मिल गया और क्वीन्स कालेज अपने छात्रावास प्रांगण (वर्तमान प्रांगण) में स्थानान्तरित हो गया। जहाँ सन 1969 में कालेज का नया भवन तैयार हुआ। और वर्तमान में राजकीय क्वीन्स इंटर कालेज के नाम से संचालित है।
नगर ही नही पूर्वांचल के प्राचीन माध्यामिक विद्यालयों में राजकीय क्वीन्स कालेज का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। इस कालेज में हिन्दी के प्रख्यात लेखक उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी ने शिक्षा प्राप्त किया था। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभ रहे है एवं इन्हे साहित्य संसार की महत्वपूर्ण हासेयों में से एक माना जाता है। प्रेमचंद जी का जीवन परिचय एक प्रेरणादायक साहित्यिक यात्रा है। 31जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही मे मुंशी अजायब राय और पाता आनन्दी देवी के परिवार में जन्में धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ प्रेमचंद जी ने अपनी पढ़ाई गांव अगल बगल के विद्यालय से प्रारंभ करने के बाद क्वीन्स कालेज से हाईस्कूल व इण्टर किया था। उनके जीवन में क्वीन्स कालेज का बहुत बड़ा योगदान रहा है। क्वीन्स कालेज ने उन्हे जीवन में विद्यालयीय शिक्षा के साथ ही व्यवहारिक जीवन की शिक्षा भी दिया। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी क्वीन्स कालेज से ही हुई थी। जो उनके प्रारंभिक कहानियों और उपन्यास सेवा सदन कर्मभूमि अन्य में परिलक्षित होता है। वर्तमान समय में सांस्कृतिक अभिनवीकरण व भारतीय मूल्यों व प्रतीकों को पुनर्स्थापना की जा रही है ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि दो सदियों से अंग्रेजी दासता के प्रतीक रहे क्वीन्स कालेज के नाम पर चलने वाले इस महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान का नाम भी परिवर्तित कर अपने महान छात्र के नाम पर प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज किया जाये।                 अब समय आ गया है कि वाराणसी एवं वाराणसी के धरोहरों के प्रति संकल्पित और समर्पित लोग एवं संस्थाये अपने माटी के सपूत प्रेमचंद जी के नाम पर करने के लिये एकजूट हो और यह प्रेमचंद जयंती पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

-व्योमेश चित्रवंश,एडवोकेट
29.06.2025
(लेखक चित्रगुप्त सभा काशी के उपाध्यक्ष एवं प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र लमही के सलाहकार संरक्षक हैं)

शनिवार, 28 जून 2025

गोदौलिया ....(बनारस पर व्योमेश की कविता)28जून2025

गोदौलिया ....

मैं खड़ा हूँ
गोदौलिया चौराहे पर
ढूंढ़ रहा हूं प्राचीन गोदावरी तीर्थ
वह कहीं नहीं दिखता
दिखता तो गोदौलिया भी नहीं
बल्कि वहाँ है, स्टील प्लेट्स और पाईप के ढेर
पैदल बेशुमार भीड़
चौराहे के तीन तीन ओर
टोटो का रेला
जो बढ़ा रहे है अनिच्छित चिड़‌चिड़े जाम को
बाबा बताते थे है गोदौलिया
गाडविला से बना है
चौराहे के सेंट थामस चर्च के नाम पर
प्रिंसेप ने ढूढ़ा था
शाही नाला और घोड़ा नाला यही कहीं
सुबह इसी चौराहे से, गमछा कांधे पर डाले
हर हर महादेव गंगे, काशी विश्वनाथ शंभो
अलख जगाते जाते थे श्रद्धालु नेमीगण
बाद में दोनो चौराहों के किनारे
बैठा दिये गये नंदी जमी से पंद्रह फीट ऊपर
दोनो गोदौलिया के तीन किनारे खुदे पड़े हैं
निर्माणाधीन स्टेशन के लिये,
जो बनेगें नंदी की तरह पचासों फीट ऊपर
चलने वाले वाले हवाई झलुआ टोटो के लिये
जिन्हे अखबारी भाषा मे रोप वे कहते हैं
बड़े बड़े होटल दिखने लगे है
ग्लोसाईन औ डिस्प्ले मानीटर वाले
सुंदर आकर्षक शोरुम भी
पर नही दिखता वह पुराना गोदौलिया
जो शहर का हृदयस्थल कहा जाता था
नही दिखती, गमछा टांगे अलमस्त
दुनिया को अपने ठेगें पे रखे चाय लड़ाती
पान घुलाती वो बनारसी फक्कड़ रहीसियत
जो कभी मेरे शहर के पहचान थी
अब दिखते है देर सारे पर्यटक, तीर्थयात्री
पैदल चलता सड़क के दोनो लेन में,
सब दिखता है पर नही दिखता
इसी भीड़ मे खो गया बनारसीपन
खुदाई, रोपवे, ग्लोसाईन टूरिज्म वाले चौराहे में
मेरे शहर की पहचान, गोदौलिया की तरह...

-व्योमेश चित्रवंश
28.06.2025

रविवार, 15 जून 2025

गंगा की सीढ़ीयॉं.......(कविता) 14जून 2025

गंगा की सीढ़ीयॉं......

ये गंगा की सीढ़ीयॉं
शहर से बस नदी की ओर
नही ले आती हैं
वे ले आती है
कोलाहल से शांति कीओर
भौतिकता से आध्यात्म की ओर
स्व से शिव को ओर
सांसरिकता से बैराग्य की ओर
इन्ही सीढ़ीयों पर
शिव ने शंकर को बताया था
द्वैत अद्वैत से परे ब्रहम को,
तुलसी ने लिखा था रामायण
रामानंद ने दिया था कबीर को
रामनाम का गुरूमंत्र
इन्ही सीढीयों पर
बुलाया था जगन्नाथ ने
अपनी लवंगी के लिये
माँ गंगा को
और गंगा चढ़ती आयी थी
इन्ही सीढ़ीयों पर
अपन पुत्र रत्नाकर के
निश्छल प्रेम का साक्ष्य देने
इन्ही सीढीयों पर
रैदास ने किया था आवाहन
अपनी कठौती में मां गंगा का
नजीर ने देखा था
इन्ही सीढ़ीयों पर
सुबह ए बनारस को
गंगा में नहाते हुये
ख्वाहिश कर जीने मरने की
गंगा में बजू कर कर के
इन सीढ़ीयों पर
हरिश्चन्द्र ने नहीं छोड़ा सत्य को
छोड़ दिया सारे संबंधों को
राजपाट, पत्नी पुत्र सर्वस्व काे
क्योंकि ये केवल सीढ़ीयां नहीं
बॉहे है मॉ गंगा की गोंद की
वह मॉं है हमारी प्रकृति मॉं
स्रोत है सत्य,श्रद्धा,निर्मल
पवित्र मोक्ष और कल्याण की
ये सीढीयॉ उतारती है
हमारे अंतर का अहंकार
मिटाती है तम और क्लेश,
हिमालय की उंचाई से
चल कर सागर मे समाते हुये,
बताती है सच्चाई
स्वयं को समाहित कर
अथाह सागर में विलीन होने की
तभी वह श्रद्धा पात्र होती है
हम सबके लिये
तभी केशव को भरोसा है
एकमात्र अपने मॉं गंगा पर
हे भागीरथी
हम दोष भरे,
पर भरोसे यही है कि भरोस तुम्हारे
नाम लिए कितने तर जात,
प्रणाम किए सुरलोक सिधारे।

-व्योमेश चित्रवंश
काशी, 14जून2025 रविवार

मंगलवार, 10 जून 2025

काशीवासी.....

 काशीवासी ?.....

स्वयं में लीन
काशी के स्वभाव में रमा
शिव और शक्ति को
मन मे जपते
चलता है
शहर से गंगा की ओर
भौतिकता से वैराग्य की दिशा में
स्वयं से स्व की ओर
गंगाघाट की सीढ़ीयों से उतरते
सधे कदमों से रस्ते नापता
अंतर में शिव व गंगा को लिये
हर हर महादेव शंभों
काशी विश्वनाथ गंगे,
मन बुद्धि अहकार से परे
भूत को भूल, भविष्य से मुक्त
मात्र वर्तमान को जीता
अपना सर्वस्व दुःख चिन्ता, भार
शिव को समर्पित कर
स्वयं शिवमय होता हुआ
शिव के शरण में
वह काशीवासी,
फक्कड मस्त अड़भंगीग
कुछ अधिक पाने के चाह से दूर
कुछ खोने का डर से मुक्त
मृत्यु से भय नही
जीवन में कुछ चाह नही
वह स्वयं मे शंकर बन
सब कुछ छोड़ कर
अपने महादेव पर,
भोले बाबा से भी अधिक
विश्वास है उसे अपनी मां अन्नपूर्णा पर
तभी तो अलख जगाता है
वो विश्व के नाथ विश्वेश्वर के दरवार में,
बाबा बाबा सब कहे माई कहे न कोय
बाबा के दरबार में माई करें सो होय,
वह जानता है कि
मां बिना पिता की पूर्णता नही
प्रकृति बिना पुरुष सिद्ध नही
जीव बिना आत्मा संपूर्ण नही
इसी लिये वह सहज है सरल है
पर जटिल और अबूझ
अपने आराध्य महादेव के समान
वही तो काशीवासी है।

-व्योमेश,
10जून2025, मंगलवार

बुधवार, 4 जून 2025

व्योमवार्ता/ गंगा दशहरा

गंगा दशहरा

गंगा दशहरा हिन्दू‌ओं का एक प्रमुख त्यौहार है जो प्रत्येक वर्ष हिन्दू पंचांग के ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा नदी के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। यह हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो गंगा नदी ही पूजा के लिये समर्पित है। इस शुभ अवसर पर हम भारतवासी गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति करते हुये उन्हें सम्मान और आदर देते है। मां गंगा के भक्त नदी के किनारे एकत्र होते हैं। गंगा नदी में स्नान करते हैं और पूर्ण पवित्रता एवं रीति रिवाज से उनका पूजन कर आशीर्वाद की कामना करते है। माना जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह त्यौहार गंगा को संराक्षत और सुरक्षित रखने के महत्व को भी दर्शाता है जो हिन्दू धर्म में अध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व रखती है। सृष्टि के निर्माता ब्र‌ह्मा जी के कमंडल से राजा भगीरथ द्वारा देवी गंगा को धरती पर अवतरण दिवस को गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। पौराणिक क‌थाओं के अनुसार पृथ्वी पर अवतार से पहले गंगा नदी स्वर्ग का हिस्सा थी। एक बार महाराज सगर ने अपने राजधानी अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने ईष्यावश यज्ञ के प्रतीक अश्व का अपहरण कर लिया और उसे ले जा कर समुंदर के किनारे महर्षि कपिल के आश्रम में बांध दिया। अश्व का गायब होना यज्ञ में विघ्न के समान था। इसे यद्य में विघ्न के साथ हो अपशकुन और आने वाले अनिष्ट के रूप में मानते हुये राजा सगर की समस्त प्रजा राजकुमार अंशुमान के नेतृत्व में हर कहीं यज्ञ के अश्व को दूढ़‌ने लगी। महर्षि कपिल के आश्रम पहुँचने पर लोगों ने देखा कि वहीं एक कोने में यज्ञ का अश्व बंधा हुआ है और आश्रम के यज्ञशाला में महर्षि कपिल अपने साधना में समाधिस्थ थे। अश्व को देखते ही दूढ़ रही प्रजा एवं सैनिक महर्षि कपिल को ही अश्व चुराने का आरोपी मानते हुये उन्हें चोर चोर चिल्लाने लगी जिससे महर्षि कपिल की समाधि दूर गई एवं उन्होने बिना सोचे समझे स्वयं पर आरोप लगाने वालों को अपने क्रोधाग्नि व श्राप से भस्म कर दिया। जब इस बात की जानकारी महाराजा सगर को हुई तो उन्होंने महर्षि कपिल से क्षमा मांगते हुये अपने भस्म हो चुके प्रजा एवं सैनिकों के मुक्ति का मार्ग पूछा। महर्षि कपिल ने उन्हें बताया कि यदि स्वर्ग से गंगा नदी धरती पर आ कर इस स्थान से प्रवाहित हो तो भस्म चिता बन चुके प्रजा और सैनिकों को मुक्ति मिल सकेगी। राजा सगर फिर उनके पुत्र राजा दिलीप ने गंगा को धरती पर बुलाने के लिये अथक तपस्था किया पर उन्हें सफलता नहीं मिली। दिलीप के पश्चात उनके पुत्र भगीरथ ने अपनी घोर तपस्या से ब्रहमा को प्रसन्न किया एवं उनसे वरदान के रूप में गंगा को पृथ्वी पर उतारने की मांग किया। ब्रह्मा जी ने भगीरथ को वरदान में गंगा को धरती पर भेजने का वरदान देते हुये कहा कि गंगा के वेग को धरती पर संभालने की क्षमता केवल शंकर भगवान के पास है। यदि वे तैयार हो तो गंगा धरती पर उतर सकती है। इसके पश्चात भगीरथ ने शंकर भगवान से तप कर के गंगा के वेग को धारण करने को कहा। जिसके परिणाम स्वरुप गंगा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन धरती पर अवतरित हुई। शिव जी जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की वादियों में कल कल निनाद करते हुवे मैदान को अपने जल से सिंचित करते हुये महर्षि कपिल के आश्रम में राजा सगर के सैनिकों एवं प्रजाओं को मुक्ति दिलाते हुये सागर में समाहित हो गई।
इस प्रकार महाराज भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण कर बड़े भाग्यशाली हुये। उन्होने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों युगों तक बहने वाली गंगा की अविरल धारा महाराज भगीरथ के कठोर तप एवं साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणिमात्र को जीवन-दान ही नहीं देती. मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व में गंगा की महिमा गाई जाती है।
गंगा दशहरा के दिन गंगा जी में स्नान किया जाता है यदि कोई श्रद्धालु गंगातट तक नही पहुंच पाता तब वह अपने घर के पास ही किसी नदी या तालाब में श्रद्धापूर्वक गंगा मां का ध्यान करते हुये स्नान करते हैं। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी हस्त नक्षत्र में होने के कारण यह तिथि: फोर पापों को नष्ट करने वाली मानी गई है। कहते हैं कि हस्त नक्षत्र में बुधवार के दिन गंगावतरण हुआ था। इसलिये यह तिथि अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। लाखो करोणों श्रद्धालु दूर दूर से आ कर गंगा की पवित्र धारा में स्नान करते है। हरिद्वार, प्रयाग, काशी पटना गंगासागर के साथ ही अन्य शहरों में गंगा तट पर गंगा दशहरा के मेले लगते है जहां लोग दान में कोई भी वस्तु दस की संख्या में दान देते हैं। गरीबो को भोजन कराने और उन्हें आम दान करने की परंपरा अभी भी बहुत से गंगातटीय क्षेत्रों में मनायी जाती है।
काशी में गंगा दशहरा के दिन दशाश्वमेध घाट में दस बार डुबकी मार के स्नान करके शंकर भगवान को दस की संख्या में गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन कर के रात्रि को जागरण करने से अनन्न फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा पूजन का भी विशिष्ठ महत्व है। इस दिन विधि विधान से गंगा जी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ, दस सेर गेंहू और दस आम दस ब्राह‌मणों को दान देने व दशहरा स्त्रोत्र का पाठ किया जाता है।
गंगा दशहरा धार्मिक पर्व होने के साथ साथ ह‌मारे भारतीय संस्कृति का भी प्रतीक है। गंगा दशहरा के माध्यम से हम अपने प्रकृति प्रदत्त उपहारों जल स्रोत गंगा नदी को मां मानते हुये उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते है एवं अपनी संस्कृति की महत्वपूर्ण अंग गंगा नदी के पुण्यता पवित्रता एवं स्वच्छता के प्रति संकल्पित होते है क्योंकि गंगा हमारे लिये मात्र एक नदी ही नही हमारीजीवनदायिनी मां है तभी तो हम गंगा को विश्वरूप मान कर प्रार्थना करते हैं-
ॐ नमो गंगाये, विश्वरुपिणे नारायण्यै नमो नमः।
(गंगा दशहरा ५जून २०२५ के अवसर पर आकाशवाणी वाराणसी पर प्रसारित वार्ता का अंश)
-व्योमेश चित्रवंश,एडवोकेट
हमारी वरूणा अभियान के संयोजक

शुक्रवार, 30 मई 2025

व्योमवार्ता/ मेरे शहर में नवतपा.......


मेरे शहर में नवतपा........
                            -डॉ०व्योमेश चित्रवंश, एडवोकेट

                मेरा शहर इस समय गरमी के नवतपा के ताप से लरज रहा है। सूरज से बरसते अंगारे और धरती से निकलती तपिश के साथ पारे ने ऊपर और ऊपर चढ़ने की होड़ लगा रखी है वहीं न बर्दास्त होने वाली ऊमस गरमी से बचने की ठांव खोज रही है। कितना अजीब है नदियों के नाम पर बसा गंगा के खूबसूरत घाटों वाला यह शहर आज खुद में हैरान व परेशान है। परेशान भी क्यों न हो? शहर को नाम देने वाली नदियाँ या तो विलुप्त हो चुकी या विलुप्त होने के कगार पर है और गंगा के घाट? आह! जब कल गंगा ही नहीं रहेगी तो ये घाट क्या करेगें? मुझे याद नहीं कहाँ लेकिन कहीं सुना था कि एक बार माँ पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा था कि बनारस की उम्र क्या और कितनी होगी तो अवधूत भगवान शंकर ने कहा था कि "यह आदि काल से भी पहले अनादि काल से बसी है यानि मानव सभ्यता के आदिम इतिहास काशी से जुड़ते है और जब तक सुरसर गामिनी भगीरथ नन्दिनी गंगा बनारस के घाट पर रहेगी तब तक काशी अक्षुण्ण रहेगी।" तो क्या गंगा के घाटों को छोड़ने के साथ ही मेरा शहर ? और कहीं अन्दर तक मन को हिला देती है यह भयानक कल्पना। याद आता है, चना चबेना गंगा जल ज्यों पुरवै करतार, काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार। अब तो न गंगा में गंगा जल रह गया, न ही सबके लिये मुअस्सर 'विश्वनाथ दरबार'। अब तो दोनों ही सरकारी निगहबानी में दिल्ली और लखनऊ के इशारों पर मिलते हैं। माँ गंगा और भगवान विश्वनाथ के सरकारीकरण से अपने शहर की स्थिति उतनी नहीं खराब हुई जितनी हम बनारसियों के नव भौतिकवादी सोच और 'तोर से बढ़कर मोर' वाली अपसंस्कृति ने अपने शहर का नुकसान किया। शहर बढ़ता गया और हमारी सोच का दायरा सिकुड़ता गया। कभी लंगड़े आम व बरगद और वरूण के पेड़ों और लकड़ी के खिलौने के लिए मशहूर बनारस में पेड़ों की छाँव अब गिने चुने उदाहरण बनकर रह गयी। मेरे घर की नींव पड़ोस के घर से नीची न रहे क्योंकि ऊँचे नाक का सवाल है। इस 'नाक' के सवाल ने बरसाती पानी के रास्तों को सीवर जाम, नाली जाम के भुलभुलैया में उलझा दिया तो पड़ोसी के दो हाथ के बदले हमारी चार हाथ ऊँची सड़क की जमीन की सोच ने इस शहर को एक नई समस्या अतिक्रमण के नाम से दी। नदी तालाब पोखरों का तो पता ही नहीं, कुयें क्या हम इन आलीशान मकानों के बेसमेन्ट में मोमबत्ती जलाकर ढूढ़ेगें? ऊपर से तुर्रा यह कि तालाब, पौखरों, नदियों के सेहत का ख्याल रखने वाला वाराणसी विकास (उचित लगे तो विनाश भी पढ़ सकते है) प्राधिकरण खुद ही मानसिक रूप से बीमार होने की दशा में है। कितने तालाब, पोखरे पाट डाले गये यह कार्य उसके लिए "आरुषि हत्या काण्ड की तरह किसी मर्डर मिस्ट्री, फाइनल रिपोर्ट, क्लोजर रिपोर्ट, रिइनवेस्टिगेशन से कम नहीं है और तो और दो तीन को तो वी०डी०ए० ने खुद ही पाट कर अपने फ्लैट खड़े कर दिये। शहर के जमींन मकान और योजनाओं का लेखा-जोखा रखने वाले तहसील, नगर निगम और वी०डी०ए० के पास अपना कोई प्रामाणिक आधार ही नहीं है जिस पर वे अतिक्रमणकारियों के खिलाफ ताल ठोंक सके। कम से कम वरूणा नदी और पोखरों के बारे में तो मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही सिद्ध करता है। 
          हमारे सासंद मोदी जी ने प्रधानमंत्री के रूप मे इस शहर के विकास के लिये धन का पिटारा खोल दिया तो बनारस के भूगोल इतिहास और संस्कृति से पूरी तरह अनजान हुक्मरानों ने जिन विकास योजनाओं को बनारस की धरती पर उतारा वह यहां के परिस्थितियों के बिलकुल प्रतिकूल थी। सड़कें चौड़ी होने के बावजूद सहज सरल व अतिक्रमणमुक्त नही हो सकी। यातायात प्रबंधन बेहतर करने के प्रयोग ने बनारस को क्योटो सिटी जैसे बनाने के बजाय टोटो सिटी बना दिया। गोदौलिया चौक मैदागिन गोलघर से ले कर पूरा पक्का महाल जो इस शहर की पहचान पान, ठीहा, अड़भंगीपन, बनारसियत, मंदिर ,नेमी, नाश्ता और व्यापार के लिये ही जाना जाता था वहां अब केवल भीड़ का रेला दिखता है। हर साल पौधारोपड़ कर शहर को हराभरा बनाने के बड़े बड़े दावे तो किये गये पर सच यह है कि आज शहर मे पेड़ों की छांव कहां मिल सकती है इस पर भी काफी मगजमारी करनी पड़ेगी। हम पिछले दो वर्षों से शहर को नाम देने वाली वरूणा नदी के किनारे घने जंगल के अस्तित्व में रहे वरूण वृक्ष की तलाश कर रहे हैं। बहुत सारे पुराण कथाओं मे वरूणा का नामकरण इन्ही वरूण वृक्ष के कारण बताया गया है पर हमारी तलाश अभी मुकम्मल नही हुई है। कल सोशल मीडिया पर इसी चर्चा मे एक आयुर्वेद के ज्ञाता हमं वरूण वृक्ष के लाभ और सेहत के लिये उसके उपयोग के बारे मे बताने लगे पर सेहत मे वरूण के लाभ की चर्चा तो तब होगी जब वरूण मिल पायेगा। कुल मिला जुला कर बनारस का आम शहरी धीरे धीरे निराश हो रहा है। यहां की बनारसियत, अक्खड़मिजाजी, मस्तमौलापन, मिजाज अब कम हो रहा है जो बनारस की पहचान रही है। शहर खुद को कहीं न कहीं अंदर से नासाज़ महसूस कर रहा है लब्बोलुआब यह है कि शहर की सेहत ठीक नहीं है। 
इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक अगर कहीं मानसून आ गया तो आम शहरी की चिन्ता यही है कि गर्मी की तपिश तो कम हो जायेगी लेकिन जलनिकासी के व्यवस्था बिना नाले बने सड़कों से घर कैसे पहुँचेगें? इसी से तो बरसात चाहते हुए मन में एक दबी सी चाहत है कि दो चार दिन और मानसून टल जाये तो शायद...।
अपनी ही नही सारे शहर की बात कहें तो एक शेर याद आता है-
सीने में जलन, आँखों में तूफान सा क्यूँ है। 
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है।
(लेखक विधि व्यवसायी एवं हमारी वरूणा अभियान के संयोजक है)
काशी, 30मई2025, शुक्रवार
http://chitravansh.blogspot.in

बुधवार, 28 मई 2025

बनारस इस पार और उस पार......(कविता)

बनारस इस पार और उस पार...

 देखता हूँ
तरना रेलवे ओवर बृज के
नीचे उतरने वाले फ्लाईओवर से
बदलते बनारस को
मेट्रो सिटी के लुक में
फिल्मों के रीलों में चलती जैसे
ओवरबृज के पार
दिखती बहुमंजिली इमारतें
उन पर चमकतें ग्लोसाईन बोर्ड
नहीं पता चलता
हम इ‌मारत की तरफ है
या उसके दूसरी ओर
पुल के ऊपर आ कर
संशय दूर होता है
कि हम इमारत के ओर हैं
यानि इसी पार
पर पीछे देखने पर
हम फिर उस पार हो जाते है
एक भ्रम और संशय को जीते
बनारस के मर्म और अध्यात्म के जैसे
जीवन के इस पार
भौतिकता, सांसारिकता, स्वार्थ और अहम
और उस पार
आत्मा के चरम पर, शरीर से परे
सिर्फ आत्मा अघोर शून्य और शिव
वह ऊँचा ओवरबृज
दूर कर देता है मन व जीवन के संशय को
बनारस को महसूस करने जैसे
वैसे भी इस शहर को समझने के लिये
बनना पड़‌ता है कबीर
चढ़ना होता है मन की ऊंचाइ‌यों पर
तब हम देख पाते है
बनारस को मन की आखों से
जान पाते है बनारस को
जीवन के इस पार
और उस पार के सच को
जो बनारस दिखाता है
रेलवे ओवरबृज की ऊंचाइयों जैसे
इस पार और उस पार का बनारस
प्रकृति और पुरुष के मध्य का बनारस...

- व्योमेश चित्रवंश
28मई2025 बुधवार

रविवार, 25 मई 2025

व्योमवार्ता/ मित्रता (कविता)

मित्रता.......

मात्र एक शब्द नही,
एक अहसास है,
जिसे बस महसूस किया जा सकता है,
ठीक वैसे हो जैसे सांसों में गर्मी को,
बर्फ में पानी को,
गुड़ में मिठास को,
हम अंतर तक अनुभूति करके भी
शब्द नही दे सकते जैसे,
आपस की बद‌मासियाँ, नादानिया
फिर नाराज होने पर भी एक हो जाना,
यही तो है,
जो पद सम्मान, धन, मान से परे है,
जहां हम दिल से जुड़ते हैं,
समुन्दर की लहरों की तरह,
एक दूसरे को धकियाते,
हटाते जगह बनाते,
इस पार से उस पार जाते पर,
एक दूसरे से कभी अलग नही हो पाते
पानी के अनगिनत बनते बिगड़ते धाराओं में, क्योंकि हम सब भी जल धाराये हैं
मित्रता के संमुदर में,

-व्योमेश
काशी,09.05-2025

शनिवार, 29 मार्च 2025

व्योमवार्ता/ नये साल की पहली सुबह...../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1जनवरी 2023

नये साल की पहली सुबह/व्योमेश चित्रवंश की डायरी..

नये साल की पहली सुबह
ढेर सारे कुंहासे और धुंध से भरी
नही दिख रहे कोहरे से
सड़क पर चहलकदमी करते लोग
वे बच्चे भी नही
नये साल पर खुशियाँ मनाने वाले
आटो वाला टोपी पर मफलर बांधे
मुंह से धूंआ फेकते
कर रहा है सवारियों का इंतजार
धुले धुलाये आटो पर तिरंगा झण्डा संग
गैस वाला गुब्बारा लगाये
चूने से लिख कर 
हैप्पी न्यू ईयर 2023
चौराहे के एक कोने पर 
उजाड़ होते चितवन के नीचे 
जल रहे लकड़ी के बोटे के पास
खड़े बीट के सिपाहियों के संग
सिमटे सुकड़े बैठे है
काले भूरे कलुआ औ भूरा
उन्हे इंतजार है नुक्कड़ की दुकान पर
जलेबी कचौड़ी छनने और 
उसके फेंके हुये दोनो का
अखबार का बंडल बांधे 
निकल चुके है हाकर
मंदिर की सेवा करने वाले पंडितजी भी.
दोनो को जल्दी है खबरे पहुंचाने की
नेकी की दीवार के पास 
सोया पड़ा है मन्तोषवा
फिर कहीं से दारू पी कर
सब कुछ वैसे ही है
जैसे कल था
न कोरोना का खौफ
न कोई हड़बड़ी
घरों मे रजाई मे दुबके 
रविवार मना रहे लोगों को 
अब नही इंतजार है किसी 
बिग ब्रेकिंग का
सब कुछ सामान्य सा
हर कोई आराम से
चल रहा है
साल बदल रहा है
हम नही......
- #व्योमेश_चित्रवंश
(काशी,1जनवरी 2022, पौष शुक्ल दशमी सं०2079वि०)
#व्योमवार्ता




शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

जिनको नही पता है उनके लिये /भाई निरंजन सिंह के फेसबुक वाल से...

जिनको नहीं पता उनके लिए
जवाहरलाल नेहरू की अदूरदर्शी और मूर्खताओं की सज़ा, जो हम आज तक भुगत रहे हैं।
१. कोको आइसलैंड: 1950 में नेहरू ने भारत का 'कोको द्वीप समूह' (Google Map location 14.100000, 93.365000) बर्मा को गिफ्ट दे दिया। यह द्वीप समूह कोलकाता से 900 KM दूर समंदर में है। बाद में बर्मा ने यह द्वीप समूह चीन को दे दिया, जहाँ से आज चीन भारत पर नजर रखता है।
२. काबू वैली मणिपुर: नेहरू ने 13 जनवरी 1954 को भारत के मणिपुर प्रांत की काबू वैली मित्रता के तौर पर बर्मा को दी। काबू वैली का क्षेत्रफल लगभह 11,000 वर्ग किमी है और कहते हैं कि यह कश्मीर से भी अधिक खूबसरत है।
आज बर्मा ने काबू वैली का कुछ हिस्सा चीन को दे रखा है। चीन यहां से भी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देता है।
३. भारत नेपाल विलय: 1952 में नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन विक्रम शाह ने नेपाल के भारत में विलय का प्रस्ताव नेहरू के सामने रखा।
लेकिन नेहरू ने ये कहकर उनकी बात टाल दी कि इस विलय से दोनों देशों को फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा होगा। यही नहीं, इससे नेपाल का पर्यटन भी खत्म हो जाएगा। 
जबकि असल वजह ये थी की नेपाल जम्मू कश्मीर की तरह विशेष अधिकार के तहत अपनी हिन्दू राष्ट्र की पहचान को बनाये रखना चहता था जो की नेहरू को मंजूर नही थी
४. सुरक्षा परिषद स्थायी सीट: नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा दिया था, जिसमें भारत को सुरक्षा परिषद (United Nations) में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने को कहा गया था। नेहरू ने इसकी जगह चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दे डाली। चीन आज पाकिस्तान का हम दर्द बना हुआ है। वह पाक को बचाने के लिए भारत के कई प्रस्तावों को सुरक्षा परिषद में नामंजूर कर चुका है। 
हाल ही उसने आतंकी मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के भारतीत प्रस्ताव को कई बार वीटो किया है।
५. जवाहरलाल नेहरू और लेडी मांउटबेटन: लेडी माउंटबेटन की बेटी पामेला ने अपनी किताब में लिखा है कि नेहरू और लेडी माउन्टबेटन के बीच अंतरंग संबंध थे। लॉर्ड माउंटबेटन भी दोनों को अकेला छोड़ देते थे। लोग मानते हैं कि ऐसा कर लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू से अनेक राजनैतिक निर्णय करवाए थे जिनमें कश्मीर में युद्ध विराम व सयुंक्त राष्ट्र के हस्ताक्षेप का निर्णय भी शामिल है।
६. पंचशील समझौता: नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। 1954 में उन्होंने चीन के साथ पंचशील समझौता किया और तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता दे दी। 1962 में इसी चीन ने भारत पर हमला किया और चीन की सेना इसी तिब्बत से भारत की सीमा में दाखिल हुई।
८. 1962 भारत चीन युद्ध: चीनी सेना ने 1962 में भारत को हराया था। हार के कारणों को जानने के लिए भारत सरकार ने ले. जनरल हेंडरसन और कमान्डेंट ब्रिगेडियर भगत के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी।
दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था।
रिपोर्ट के अनुसार चीनी सेना जब अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम तक अंदर घुस आई थी, तब भी नेहरू ने हिंदी चीनी भाई भाई का नारा लगाते हुए भारतीय सेना को चीन के खिलाफ एक्शन लेने से रोके रखा। परिणाम स्वरूप हमारे कश्मीर का लगभग 14000 वर्ग किमी भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया।
इसमें कैलाश पर्वत, मानसरोवर और अन्य तीर्थ स्थान आते हैं।
भारत का सही इतिहास जानना आपका हक़ है।
(6फरवरी2025)
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देश के ऊपर सरस्वती का अभिशाप लादने का भयंकर काण्ड / भाई निरंजन सिंह के फेसबुक वाल से......

2005 में वाजपेयी सरकार के जाते ही देश के ऊपर सरस्वती का अभिशाप लादने का भयंकर कांड हुआ था। मूल में जो कारण थे:-
1. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने यह चिंता जताई थी कि भारतीय छात्र ज्ञान-विज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, इन्हें रोकना बहुत जरूरी है।
2. सोनिया गाँधी के राज में ईसाई मिशनरियों द्वारा मतांतरण का वातावरण बनाना।
3. छात्रों को भारतीय मूल्यों, स्वावलम्बन, परोपकार इत्यादि से विमुख करना, इसका साधन बनाया स्कूल में मध्याह्न भोजन। इससे छात्र भिखमंगे हो गए, अध्यापक भ्रष्ट हो गए। 
अभिभावकों के लिए मनरेगा जैसी मुफ्तखोरी की योजना लायी गयी।
इसके लिए सोनिया गाँधी की एक सलाहकार समिति बनाई गई जिसे कैबिनेट से भी अधिक पॉवर था, उसके सभी सदस्य नक्सली, राष्ट्र विरोधी, गैर हिन्दू और सनातन संस्कृति से अतिशय घृणा करने वाले थे। इन्हीं में से एक हर्षमंदर भी था।
शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह के इशारे पर हर्षमन्दर के नेतृत्व में एक कुख्यात वामपंथी मंडली ने NCERT के माध्यम से निम्न कार्य किये:-
1. सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का पुनर्लेखन किया गया (#पाठ्यक्रम_का_दूषण) जिसमें कक्षा 1 से अंग्रेजी की अनिवार्यता, गौरव प्रसंग वाले सभी लेख, तथ्य, पाठ, चित्र हटाकर हीनत्व संचार की सामग्रियाँ सम्मिलित की गई। सती, महिला अत्याचार, बालकों के यौन सुख का अधिकार, ब्राह्मणों द्वारा सभी सुविधाएं मुफ्त में लेना, हिन्दी साहित्य में उर्दू शायरों को स्थान, कला क्षेत्र में विदेशी और मुस्लिम विद्वानों की उपलब्धियाँ बढ़चढ़कर उभारी गई।
2. इंग्लिश मीडियम छोड़कर अन्य सभी पुस्तकें बहुत जटिल भाषा में लिखी गई, मानविकी विषय में इतने जटिल #तकनीकी_शब्द प्रतिस्थापित किये गए कि स्वयं शिक्षक भी उन्हें समझ नहीं पाएं। बड़े कम्पीटिशन एग्जाम में इनसे रिलेटेड ही प्रश्न पूछे गए जिससे छात्र इनमें डूब जाएं। उन दिनों यह जुमला स्थापित हुआ कि प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए NCERT का पाठ्यक्रम बहुत ही उपयोगी है।
3. विज्ञान और गणित में सरल से कठिन क्रम को फॉलो नहीं किया गया। अभ्यास और प्रश्नावलियाँ कम कर दिए गए। वैदिक गणित हटा दी गई। वे बातें शामिल की गई जिनका कोई उपयोग नहीं था और छात्रों पर अनावश्यक बोझ डाला गया। औसत, प्रतिशत, अनुपात, समय दूरी के पाठ बिल्कुल हटा दिए या सांकेतिक विलय किया गया। उद्देश्य यही था कि दसवीं करने के बावजूद छात्र व्यवहार में कुछ भी न सीखें।
पुस्तकों के नाम ऐसे रखे गए कि कोई इश्यू न बने जैसे इतिहास की पुस्तक का नाम "भारतीय इतिहास के कुछ अध्याय" इसमें चुन चुनकर बाते रखी गई या निकाली गई।
हिन्दी कक्षा 12 विषय में 20 पाठों में जो सामग्री है उसकी लिस्ट देखिये:-
2 मुस्लिम चित्रकारों की आत्मकथा/कथा
2 उर्दू कविताएं
2 अनुवाद लेख
2 अनुवाद कविताएं
1 अनुदित कहानी
शेष में हिन्दी के वे लेखक जो जेएनयू ब्रांड हैं।
4. उत्तीर्ण होना बहुत सरल कर दिया गया, लगभग मुफ्त में। ग्रेडिंग पद्धति और "छात्रों पर दबाव" के बहाने नाम लिखाओ, पास हो जाओ शैली का अनुसरण किया गया।
5. आरम्भ से ही ऐसे तत्व उभारे गये जिसमें यह साबित हो कि देश ईसाइयों का है, हिन्दू तो कोई है ही नहीं, सब महिला, दलित, आदिवासी या मुस्लिम हैं। 
इतिहास के महत्त्वपूर्ण पाठ हटाकर बहुत छिछली बाते हाइलाइट की गई। 
मोपला नरसंहार के गुंडों को स्वतंत्रता सेनानी बताया गया। 
हिन्दू लड़की मुस्लिम लड़के को पत्र लिख रही है। हिन्दू परिवार अपनी कन्याओं का शोषण कर रहे हैं। गरीब ने दारू पिया क्योंकि उसकी भी इज्जत है।
6. दलितवाद और फेमिनिज्म को उभारा गया। इसी का परिणाम था, मात्र 10 वर्ष बाद लगभग सभी दलित जातियाँ प्रचंड हिन्दू विरोधी हो गईं और ईसाईकरण के लिए मार्ग खुल गया। आज भी यही चल रहा है।
(7 फरवरी 2025)
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रविवार, 2 फ़रवरी 2025

हां, मैने कुंभ देखा है......

हां मैने कुंभ देखा है
गंगा यमुना के संगम पर 
जहां सरस्वती भी है ज्ञान, भक्ति, श्रद्धा के 
अदृश्य अंतर में, 
आपस में संगम कर मिलते हुये 
उस प्रयागराज में
हां मैंने कुंभ देखा है 

रवि को मकर राशि में
माघ के ठण्ड में प्रवेश करते हुये 
सभी ऋषि महर्षि मनीषी के संग
आमजन को कल्प वास करते हुये
आस्था के ज्वार भाटा को
उल्टे नदी तट पर विचरते हुये
हां मैंने कुंभ देखा है 

समस्त आनंद मंगल मूल वाली 
दु:ख हरणी सुखदायिनी गंगा को
अकालमृत्यु और यमदंड को त्रासती
समस्त प्रदूषण के गरल पीती 
यमुना को
अपनी गरिमा को गंभीरता देती
अदृश्य सरस्वती को 
त्रिवेणी तट पर,

हां मैने कुंभ देखा है
काशी से प्रयागराज के पथ पर 
चलते जन सैलाब के श्रद्धा में
अयोध्या-चित्रकूट के मध्य
प्रयाग राज के रज को माथे पर चढ़ाते
अंदावा से फाफामऊ तक 
नैनी से अरैल नागवासुकी तक 
रसूलाबाद से किला के द्वार तक
इहलोक में एक दुबकी लगा 
परलोक के शुभ की इच्छा लिये
श्रद्धा से नत 
जन जन के विश्वास में

हां मैंने कुम्भ देखा है 
महामंडलेश्वरो के आखाड़े में 
जगद्गुरूओं के धर्मपताकाओं में
घाटों पर खुले आसमां के नीचे 
ठंड शीत को जीतते श्रद्वालुओं में
खोया पाया केन्द्रों मे 
और कुंभ के माटी मे रमे लोगों मे

हां मैंने कुम्भ देखा है 
कुंभ स्नान की अनुभूति को
श्रद्धा की अपार चाह में 
स्नान के पूर्व पश्चात 
थकते पैरों के बावजूद 
पुण्य कमाने की खुशी मे
बीस-तीस किलोमीटर के न थकने वाले 
नंगे पाँवों से यात्रा में 

हां मैंने कुंभ देखा है 

हे मन तुम फिर आना
अगले अर्द्धकुंभ, कुंभ
और महाकुंभ में
इस श्रद्धा के महातट पर
अंतर की शांति को खोजने 
प्रयागराज आकर
प्रकृति मां गंगा यमुना को यह बताने 
कि आज भी प्रकृति हमारी आस्था है
उस आस्था का दर्शन कर 
हम अपने अंतर के सरस्वती को 
पा सकते हैं
जो ईश्वर रूपी परमात्मा का स्वरूप है।
(२फरवरी२०२५ वसंत पंचमी)
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मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

व्योमवार्ता/ दो जीबी डाटा के फेर में....

दो जीबी डाटा के फेर में....

आजकल शरीर मल्टी विटामिन और मिनरल्स की कमी से जूझने के बाद भी उतना कमजोर नहीं दिखता, जितना दो जीबी डॉटा खत्म हो जाने के बाद दिखता है।
बड़े से बड़े बब्बर शेर के मुँह से अगर 2GB डॉटा छीन लिया जाए तो उसे सियार बन जाने में दो मिनट की देर नहीं लगती है।
कल की बात है। मुम्बई का जाम सदा की तरह धैर्य का इम्तहान ले रहा था। ज़िंदगी अंधेरी में विरार जैसा फील कर रही थी। तभी धीरे से आकर एक चौदह साल के लड़के ने कहा, "भइया दीजिये न..!"
मैनें कहा, "छुट्टे नही हैं।"
उसने खिसियाकर कहा, "भीख नहीं मांग रहा, हॉटस्पॉट ऑन कर दीजिये, इनको जीपे करना है।"
मैं चौंक गया। मोबाइल डॉटा हैकर्स पर पढ़े हुए तमाम आर्टिकल याद आने लगे। मैंने कहा, "सॉरी भाई, नहीं दे सकता।"
लड़का याचना की मुद्रा में आ गया, उसने कहा, "आप मुझे पहचानते नहीं? मैं ठाकुर सैलून…! जहां आप बाल कटवाते हैं, मेरे ही भइया हैं, जो आपसे 'भोजपुरी गानों में ढोढ़ी का आर्थिक योगदान' जैसे बिषय पर चर्चा करते हैं, उन्हीं का छोटा भाई हूँ...!"
मेरे मुंह से निकला... "ए मरदे पहिले न बतावेला।"
मैनें तत्काल प्रभाव से हॉटस्पॉट ऑन कर दिया। फिर तो मेरी नज़र उन भाई साहब पर अटक गई, जिनको पेमेंट किया जाना था।
एक झटके में वो लूटे हुए रईस लग रहे थे। दूसरे झटके में बेरोजगार इंजीनियर। आँखें और बाल मिलकर बता रहे थे कि वो अप्रकाशित लेखक हैं।
लेकिन पैंट शर्ट की सिकुड़न में एक अंतहीन उदासी थी, जो बता रही थी कि वो किसी कारपोरेट खिड़की से उड़ाए गए कबूतर हैं, जिसका पर काट दिया गया है।
तब तक अचानक मेरी नज़र उनके जूते पर अटक गई और मेरे तोते उड़ गया।
इससे पहले कि वो ये कहें कि अपनी अगली फिल्म में एक रोल मेरा भी रखिएगा राइटर साहब... मैंने जान पहचान का प्रोग्राम ही कैंसिल कर दिया और हॉटस्पॉट ऑफ करते हुए उस लड़के के कान में कहा, "मार्केट में एक नया गाना आया है... भइया को बता देना।"
"कौन सा?"
"ढोढ़ीये पर ले लs...लोन राजा जी..."
लड़का एक कातिल हँसी हंसा। का भइया, "आपो ग़जबे मजाक करते हैं..!"
मैंने कहा "गाना बढ़िया है औऱ तुम्हारे भैया चाहें तो लोन लेकर बगल में एक और सैलून खोल सकते हैं।"
लड़का मुस्कराया और चला गया...
लेकिन दोस्तों, इससे भी ज्यादा बड़ी दुर्घटना मैंने अभी अभी दैनिक जागरण के एकदम कोने में पढ़ी है।
ख़बर कुछ ऐसी है कि एक बहू तंग आकर थाने पहुँच गई है।
उसने थानेदार से जाकर कहा है कि "दरोगा जी, मेरी सास मंगधोवनी, मुझे जीने नहीं देगी... एफआईआर लिखिए।"
दरोगा जी ने पूछा , "सास तुमसे झगड़ा करती है?"
"नहीं दरोगा जी.."
"मारती है?"
"न न.."
"तो क्या खाना-पीना नहीं देती?"
"नही, वो बात भी नहीं है?"
"तब क्या दहेज मांग रही है?"
"नहीं दरोगा जी..!"
"तो फिर क्या बात है बताओ...!"
"मैं किचन में काम करती रह जाती हूँ..."
" तो क्या ज़बरदस्ती काम करवाती है ?"
"नहीं, दरोगा जी, मेरा दो जीबी डॉटा खत्म कर देती है... तंग आ गई हूं इस सास से।"
दरोगा जी ने अपना हॉटस्पॉट ऑन करके कहा....
"लो, बहन, कम्बख़्त बीबी ने बस 100mb ही छोड़ा हैं... तुम दो चार रिल्स विल्स देखो, पानी वानी पियो.. मैं अभी आता हूँ.."
आगे की खबर अख़बार वाले जालिमों ने नहीं दी है। शायद पत्रकार का डॉटा खत्म हो चुका होगा।
लेकिन दोस्तों.. मैं आज अपनी न जाने कब होने वाली सास की कसम खाकर कहता हूँ, ये खबर पढ़कर मेरी सांस अटक गई है।
दोनों हाथ प्रार्थना में जुड़ गए है.. "हे ईश्वर ! अब कल्कि अवतार लो.. तुम बहू को ऐसी सास न दो.. पति को ऐसी पत्नी न दो, किसी भाई को ऐसा भाई न दो... किसी मंटूआ को ऐसी पिंकिया न दो, जो अपना दो जीबी खत्म करने के बाद दूसरों के दो जीबी का कत्ल कर दे।"
ये हमारे समय का सबसे बड़ा अत्याचार है।
अगर सरकार सुन रही हो तो मेरी उससे दरख्वास्त है कि इंडिया बहुत आगे जा चुका है। दो जून की रोटी के लिए आटा की लड़ाई, अब दो जीबी डॉटा की लड़ाई बन चुकी है।
अब राशन कार्ड में गेंहू,चावल और चीनी मुफ्त करने से काम नहीं चलेगा.. उसके साथ हर महीने 60GB डॉटा भी मुफ्त करें... वरना लोग भूखों मर जाएंगे।  😉
(व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के सिलेबस से  अनाम लेखक की रचना चोरित व चेपित। शीर्षक मैने दे दिया है।😃)
http://chitravansh.blogspot.in

गुरुवार, 7 नवंबर 2024

नाटी इमली का भरतमिलाप / व्योमवार्ता

नाटी इमली का भरतमिलाप

सन 1868 अक्टूबर का महीना।बाढ़ व वर्षा के पानी से 
वरूणा नदी अभी भी पूरे उफान पर है। इसी के किनारे काशी की संस्कृतिप्रेमी जनता रामलीला देखने भारी संख्या में उपस्थित है। आज की लीला में सीता हरण के पश्चात उनकी खोज में हनुमान को समुद्र लंघन कर लंका जाना है और सीता के बारे में पता करना है। हनुमान को जामवन्त आदि के साथ श्री राम विदा कर रहे हैं। सम्पूर्ण लीला प्रेमी लीला के संवाद और भाव में डूब रहे है तभी एक ओर कोलाहाल होता है पता चला कि अंग्रेज पादरी फादर मैककर्सन, अंग्रेज कलेक्टर व अन्य अधिकारियों के साथ वहां आ पहुँचे हैं। संवाद अदायगी बन्द हो जाती है। उपस्थित लीला प्रेमियों में एक भय मिश्रित कानाफूसी प्रारम्भ हो जाती है। तभी फादर मैकफर्सन आज की लीला के बारे में जानकारी लेते हैं और व्यंग पूर्वक भारतीय संस्कृति पर कटाक्ष करते है "रामायन का हनुमान तो पूरा "सी" लांघ गया था तुम्हारा हनुमान क्या वरूणा लांघेगा? इसी झोंक में मदिरा के नशे में चूर अंग्रेज कलेक्टर धमकी भरा आदेश देता है कि "अगर तुम्हारा हनुमान यह छोटी सी नदी नहीं क्रास करेगा तो कल से रामलीला ढकोसला बन्द।"
       फिर क्या था पादरी और कलेक्टर व्यंग और धमकी भरे लहजे से हनुमान बने पात्र का खून खौल उठा। परतन्त्रता की बेबसी और हनुमान की गरिमा के आवेश से उसका चेहरा लाल हो उठा। उन्होंने भगवान का ध्यान किया और कुछ करने को ठानते हुये लीला के रामचन्द्र जी से वरूणा पार करने की अनुमति माँगी। "एवमस्तु" सुनते ही हनुमान के स्वरूप ने "बोलों राजा रामचन्द्र की जै" का विकट हुंकार किया और एक ही छलांग में  वरूणा पार कर गये। पलक झपकते ही यह घटना घट गयी। उपस्थित भीड़ ठगी सी रह गयी। एक क्षण बाद उसको काल का बोध हुआ तो सभी लोग "पवनपुत्र महावीर जी की जय, राजा रामचन्द्र की जै" का उद्घोष करते हुये वरूणा के उस पार दौड़ पड़े जहाँ वीर हनुमान वरूणा लांघने के बाद गिरे थे और वही आराम कर रहे थे। उनको भक्त लोग वहाँ से उठाकर ले आये। बताते है कि हनुमान स्वरूप बने टेकराम जी नाटी इमली के भरत मिलाप लीला तक जीवित रहे। भरत मिलाप में उन्हें अपने ईष्टदेव श्री राम जी की झांकी में देवत्व के दर्शन हुये और वे स्वर्गवासी हो प्रभु चरणों में समर्पित हो गये। इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार ने रामलीला को सरकारी मान्यता प्रदान करते हुये सरकारी साधन सहित विशेष व्यवस्था की। जिस मुकुट को पहने टेकराम जी ने नदी पार किया था वह आज सुरक्षित रखा हुआ है जिसकी पूजा होती है। यह मुकुट हमारे आस्था और विश्वास के साथ-साथ हमारे पुरुषों के पौरूष और निष्ठा का प्रतीक है।
यह घटना नाटी इमली के भरत मिलाप के महत्व को स्थापित करती है। नाटी इमली का भरत मिलाप विजयादशमी के दूसरे दिन एकादशी को होता है जो वाराणसी का सबसे मेला है। नाटी इमली की इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरी लीला में संवाद नहीं होता केवल झांकिया होती है। साथ ही साथ यह लीला " विश्व के सबसे छोटी झांकी का सबसे बड़ा मेला" है जिसमें राम-भरत का संवादहीन भावपूर्ण मिलन एक मिनट से भी कम कुछ सेकेन्ड का होता है और लीला देखने वालों की भीड़ पाँच लाख से अधिक की होती है।
नाटी इमली के भरत मिलाप की शुरूआत "मेघा भगत" ने किया था। अब तक प्राप्त जानकारियों से मेघा भगत को ही काशी में रामलीला का "आदि प्रवर्तक" माना जाता है हालांकि बहुत से लोग गोस्वामी तुलसीदास को वाराणसी में रामलीला के प्रवर्तक रूप में मानते है पर यह सर्वमान्य है कि चित्रकूट की राम लीला मेघा भगत ने प्रारम्भ किया। मेघा भगत का वास्तविक नाम नारायण दास था। वे गोस्वामी तुलसीदास के अनन्य भक्त व सेवक थे। जब संवत 1680 में गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महा प्रयाण की भविष्यवाणी करते हुये श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया की तिथि बताया तो मेघा भगत व्याकुल हो उठे और गोस्वामी जी की मृत्यु पूर्व ही आत्महत्या को प्रस्तुत हो गये। गोस्वामी तुलसीदास ने इन्हें बहुत समझाते हुये हनुमान जी की शरण में समर्पित होने का आदेश दिया और नियत तिथि पर गोलोकवासी हो गये। गोस्वामी जी के मृत्योपरान्त उनके आदेशानुसार हनुमान के शरण में जाने के बावजूद भगत जी का व्याकुलता कम नहीं हुई और उन्होंने अन्नजल त्याग दिया। एक रात्रि भगत जी को महाबीर हनुमान जी ने अयोध्या जाने का आदेश दिया और भगत जी रात्रि में ही वर्षा ऋतु का व दुर्गम मार्ग का परवाह न करते हुये अयोध्या चल दिये। अयोध्या में उन्होंने सरयू स्नान कर वहीं पर ध्यान लगाया ही था कि दो सुन्दर बालक खेलते हुये वहाँ आये और अपना धनुष बाण मेघा भगत के पास यह कहते हुये रख गये कि "बाबा हमारा धनुष बाण रखो हम आकर ले लेगें।" सबेरा बीता, दोपहर और संध्या के पश्चात रात हो गयी । भगत इन्तजार करते रहे पर वे दोनों बालक नहीं आये। रास्ते के थकान और दिन भर के बैठे भगत को हल्की सी झपकी आयी और झपकी में ही उन्हें यह सुनाई पड़ा कि " कलियुग में प्रत्यक्ष दर्शन दुर्लभ है, तुम काशी जाकर लीला का आयोजन करो। वही भरत मिलाप में तुम्हें दर्शन मिलेगा।" अपने इष्टदेव के इस परोक्ष आदेश पर मेघा भगत तुरन्त काशी लौट पड़े और वही दोनों धनुष-बाण "निधि" के रूप में रखकर चित्रकूट की रामलीला का आयोजन किया जिसका भरत मिलाप लीला नाटी इमली पर होता है। मेघा भगत रामलीला प्रारम्भ करवाने के बाद भरत मिलाप तक जीवित रहे और भरत मिलाप में राम भरत मिलन के स्वरूप में प्रभु दर्शन पाकर स्वर्गवासी हुये।
वाराणसी में मेघा भगत द्वारा प्रवर्तित इस रामलीला का बहुत महत्व है। पहले रामनगर के बाद गंगा इस पार की काशी में सबसे अधिक भीड़ इसी लीला में होती थी परन्तु अब औपनिवेशिक सभ्यता और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से वह भीड़ केवल नेमियों की रह गयी है। इसके बावजूद भरत मिलाप में आज भी विशाल भीड देखकर लीला के महत्व का अन्दाज लगाया जा सकता है। चित्रकूट की इस रामलीला में भरत मिलाप के अतिरिक्त दो और लीलाएं "शबरी मंगल" और गिरि सुमेर की झांकी" तथा विजया दशमी बहुत ही प्रसिद्ध हैं। इनमें से शबरी मंगल और गिरिसुमेर की झांकी पिशाचमोचन पोखरे के पास रमाकान्त नगर कालोनी के बगल में होती है और विजया दशमी चौकाघाट वरूणा नदी के किनारे होती है। पूर्व में विजया दशमी के दिन रावण वध के पश्चात भगवान राम का विमान काशी के प्रतिष्ठित रईस अपने पारम्परिक वेशभूषा में उठाते थे। गुजराती, मारवाडी और राजस्थानी रईसों द्वारा अपने-अपने देशज वस्त्रों में भगवान का विमान और उसके पीछे दर्शकों की अनगिनत भीड़ पूरे लीला को एक अलग ही छवि प्रदान करते थे। भाव विभोर दर्शकों द्वारा "बोलो राजारामचन्द्र जी की जय" का हुंकार काशी वासियों के उत्सव प्रेम का प्रतीक था। पर अब वह बात नहीं रह गयी है।
भरत मिलाप की लीला में परम्परागत रूप से आज भी काशी के यादव बन्धु अपनी विशेष वेशभूषा धोती, गंजी, साफा और बनारसी गावटी के गमछे में राम भरत मिलन के पश्चात चारों भाईयों का विमान कन्धे पर उठाते हैं। सर्वत्र फैले विशाल दर्शकों की भीड़ में जब विमान लहराते हुये, चलता है तो यह आभास होता है कि विमान स्वयं भीड़ के ऊपर से चला आ रहा है। काशी नरेश स्वयं शिव के प्रतिनिधि के रूप में भरत मिलाप के प्रत्यक्षदर्शी बनते हैं और शिव की पुरातन नगरी में विष्णु के अवतार राम का लीला रूपी अयोध्या में वापसी पर स्वागत करते हैं। इस मिलन और विमान यात्रा में "हर-हर महादेव" और राजा रामचन्द्र की जय' का समान हुंकार काशी वासियों के धार्मिक सहिस्णुता को प्रदर्शित करता है। पूर्व में स्वर्गीय महाराजा डाक्टर विभूति नारायण सिंह हमेशा भरत मिलाप पर उपस्थित रहते थे। अब वर्तमान काशी नरेश महाराजा अनन्त नारायण सिंह ने उस परम्परा को बनाये रखे काशी वासियों के प्रति अपने प्रेम का परिचय दिया है।
अब न तुलसीदास है न मेघा भगत न ही टेकारामा बस उनकी यश कीर्तियां है, जो काशी वासियों के राम लीला प्रेम में दिखती हैं। आवश्यकता है भरत मिलाप को पर्यटक यात्रा में स्थान दिलाने की और आर्थिक सहयोग की जिससे काशी वासियों में अपनी परम्परा कायम रहे।

(यह  लेख थर्टीडेज मासिक पत्रिका के प्रवेशांक अक्टूबर 2008मे प्रकाशित हो चुका है।)

बनारस मे पियरिया पोखरी वाली पीताम्बरा काली माँ /व्योमवार्ता

चौकाघाट आयरन ब्रिज से संस्कृत विश्वविद्यालय और तेलियाबाग की तरफ से जाने वाली सड़क के दायी पटरी पर एक छोटा सा मुहल्ला है पियरिया पोखरी। कभी यहाँ पियरिया की पोखरी हुआ करती थी, पर अब कंक्रीटों के जंगल में वह कहीं गुम हो गयी है। वहाँ दिखती है, टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ और ढ़ेर सारे लोग। इन्हीं गलियों की भूल-भूलैया में एक छोटे से मकान में छोटा सा मंदिर है, पीताम्बरा व खप्पर वाली काली माँ का मंदिर। इस छोटे से मंदिर में श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ है। मंदिर के कमरे में बैठने की क्या खड़े होने की भी जगह नहीं बची है। मंदिर के पुजारी बाबा के पुत्र रामजी भाई साथ में लगा हुआ, अपने घर का ड्राइंग रूप खोलकर श्रद्धालुओं को वहाँ बैठने के लिए कहते हैं। पर पाँच मिनट के अन्दर स्थिति पूर्ववत। भीड़ बिल्कुल अनुशासित, किसी को कोई जल्दी नहीं, हर कोई अपने पास खड़े व्यक्ति से दर्शन करने का अनुरोध करते हुए, माँ के दरबार में रखे रजिस्टर में अर्जी लिखने के लिए कहते हैं।
यह छोटा सा मंदिर सिद्धपीठ है। माँ बंगलामुखी पीताम्बरा का यहाँ आशुतोष भगवान चन्द्रमौलिश्वर महादेव शंकर एवं खप्पर वाली काली माँ विराजमान है। इस मंदिर का इतिहास भी इतना ही विचित्र और जीवन्त है। बताते हैं मन्दिर के अधिष्ठाता श्री पीताम्बरा बाबा। वे बताते हैं कि 40-45 वर्ष पूर्व जब मैं क्वींस कालेज में कक्षा 6 में पढ़ता था, तो प्रायः मुझे अकेले होने पर खप्पर वाली काली माँ नजर आती थीं। लाल- लाल आँखों वाली, हाथ में कटार लिए और गले में नरमुण्डों की माला डाले। ऐसा आभास होता था कि माँ मुझसे कुछ कहना चाहती है परन्तु मैं बालपन के कारण काफी भयभीत हो जाता था और यह आभास होते ही भागने का प्रयास करता था। जब यह प्रवृत्ति बढ़ने लगी तो मैं यह प्रयास करने लगा कि मैं अकेले न रहूँ। उसी समय एक बार अपनी बहन को विदाई कराके जंघई रेलवे स्टेशन से आ रहा था कि एकाएक तबियत बहुत खराब हो गई। डाक्टरों को दिखाया पर कोई लाभ नहीं मिला। स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि कई बार लोगों ने मृत जानकर जमीन पर उतार दिया। उसी रुग्णावस्था में मुझे सम्भवतः हनुमान और माँ काली के दर्शनों का अनुमान हुआ। माँ काली का स्वरूप तो वही था जिससे मैं बार-बार भयभीत हो जाता था परन्तु माँ के चेहरे पर मेरे लिए दया थी, करुणा थी और ममत्व था, जैसे कह रही हो, 'अरे पगले ! तू मुझसे भयभीत हो भाग रहा है। आपनी माँ से! बता आखिर, माँ को छोड़कर कहाँ जायेगा ?
माँ काली का आदेश होने के पश्चात् बाबा पंचगंगा घाट पर शिव स्तुति करने लगे। साथ-साथ श्मशान काली माँ, तारा माँ, मशान बाबा की धूनी जमाई। तुलसी घाट पर बैठ माँ की समस्त क्रियाओं से पूजन किया। इस कठोर साधना के वर्षों के परिणाम स्वरूप वहीं माँ के भक्त बालक का प्रति अभ्युदय पीताम्बरा बाबा के रूप में हुआ। पियरिया पोखरी स्थित घर पर शिवजी के अखण्ड जप सोमवार व्रत और माँ काली के असीम कृपा से घर का पूरा स्थान ही खप्पर वाली सिद्धपीठ के रूप में प्रतिष्ठापित हो गया। फिर तो माँ के भक्ति में यह लगन लगी कि सोते जागते दिन रात नींद में भी केवल शिव और काली का जाप। ऐसे में पत्नी बीमारी से अस्पताल में जीवन के लिए संघर्षरत थी और बाबा नाम जप रहें थे। उसी अवस्था में बाबा को आभास हुआ कि माँ ने आदेश दिया कि मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ। आओ मुझे ले चलो। आप उसी अवस्था में चाँदपुर चल पड़े। वहाँ पहुँचे तो देखा कि माँ काली का एक भव्य प्रतिमा और प्रतिमाओं से भिन्न बिल्कुल वैसे ही जैसे दर्शनों में आभास होता था। ममत्व एवं करुणा से भरी हुई रौद्र रूप से भिन्न माँ की प्रतिमा जैसे कह रही हो, तुम आ गये, चलो मैं तुम्हारी ही बाट जोह रही हूँ। परन्तु मूर्तिकार ने उस प्रतिमा को देने से मना कर दिया। बिलकुल भी टस से मस होने को तैयार नहीं। सीधे कह दिया कि 'आप कोई अन्य मूर्ति ले लें, यह बिल्कुल नहीं दूंगा।'
बाबा ने माँ से गुहार लगाई 'हे माँ जब तुझे नहीं चलना था तो मुझे बुलाया क्यूँ ?' अंततः माँ ने अपने पुत्र की गुहार सुनी और शाम के समय मूर्तिकार माँ की वहीं मूर्ति देने को तैयार हो गया। आखिर 6 बजे बाबा जी माँ काली की अपनी वांछित मूर्ति लेकर घर पहुँचे तो घर वाले खुशी एवं आश्चर्य में पड़ गये कि माँ को कहाँ विराजमान किया जाये? माँ की प्रतिमा आने के साथ अस्पताल से खबर आई कि पत्नी की हालत खतरे से बाहर है। अंततः माँ की प्रतिमा पूजास्थल पर लगाई गयी तब से लेकर आज तक माँ की पूजा अनवरत जारी है। वर्तमान समय में खप्पर वाली काली माँ का मंदिर सिद्धपीठ बन चुका है जहाँ केवल हिन्दू जन ही नहीं वरन सभी धर्मों के लोग आकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। यहाँ आ रहे भक्तों को माँ के दर्शनों का तुरन्त लाभ मिलता है। वर्तमान मंदिर में चन्द्रमौलिश्वर भगवान शंकर की पारद लिंग, पीताम्बरा माँ की प्रतिमा काली माँ के साथ भव्य रूप से प्रतिष्ठापित है। मान्यता है कि 21 रविवार को माँ का दर्शन करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है।
( पीतांबरा माँ काली पर यह लेख मासिक पत्रिका थर्टी डेज के प्रवेशांक अक्टूबर 2008 में पूर्व मे प्रकाशित हो चुका है)

रविवार, 27 अक्टूबर 2024

व्योमवार्ता/ मन का आंगन कुछ कहता है......

आस्था अनास्था, जय-पराजय, विश्वास-अविश्वास और अंधेरे-उजाले के द्वन्द्व के बीच एक दीप है जो जलाना है गहन विश्वास को समेटे। चौतरफा अविश्वास भय आतंक और अभाव के अंधेरे ने आज समूचे विश्व के चौखट को घेरे रखा है। चाहे व्यक्ति हो या राष्ट्र सभी अपने अपने समस्याओं और अन्तर्विरोधों से जूझ रहे है। अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, यूक्रेन ,रूस ,ईरान इजराईल, चीन ,ताईवान से लेकर अमेरिका,इंग्लैण्ड और अपने भारत तक सबकी समस्याओं का कारण भले ही अलग हो पर मानव समाज के लिये त्रासदीपूर्ण ही है। मन और मानवता जब विवेक और विजय की भाँति साफ सुथरा आँगन और संजीदा माहौल चाहती हो तो ऐसे अंधेरे में आस्था और विश्वास का दीप कैसे जलाया जाय? यह प्रश्न हमारे समक्ष महती बन खड़ा है। हम दीपावली पर दीपदान कर दीपक जला प्रकाशोत्सव मना लेते हैं और आतिशबाजी के कानफाडू शोर और झूठी शुभकामनाओं के आड़ में सालभर के दुख-दर्द को एक छुट्टी के दिन में तब्दील कर सो जाते हैं पर क्या यह प्रकाश हमारे मानस में फैले अन्धकार को दूर कर सकेगा? पूरे प्रकाश वर्ष को यदि अपने सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कारों के आइने में देखें तो दीपोत्सव हमारे लिये आशा और विश्वास की किरण लेकर नैराश्य और जीवन के मद, मोह, से ग्रसित अन्धकार को दूर करने के लिये आता है। परन्तु होता यह है कि हममें से बहुतेरे लोग प्रकाश वर्ष के आड़ में वे समस्त कार्य करना चाहते हैं जिनकों दूर करने के लिये प्रकाश पर्व की कल्पना की गयी थी।
वास्तविकता यह है कि दीवाली का प्रकाश आज हमारे समाज के उन अंधेरों को दूर करने में निश्चित ही असफल रहा है जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये दीपावली जैसे प्रकाश पर्व की कल्पना की गयी थी। भारत के अधिकांशतः पर्व एवं त्यौहारों को देखा जाय तो वे सिर्फ एक 'मिथक ही नहीं वरन वैज्ञानिक और सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति भी करते हैं। चाहे ये होली हो या दीवाली, मकर संक्रान्ति हो या लोहरी, ओणम् हो या वीहू हर त्यौहारों के पीछे सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक परिवेश दृष्टिगत होते हैं परन्तु आज की वास्तविकता यह है कि ये सभी त्यौहार महज औपचारिकताएं बन गये हैं।
सृष्टि जब कभी बनी थी, अन्धेरा ही अन्धेरा था, फिर प्रकाश आया अन्धकार के पीछे। प्रकाश का साक्षात्कार करने वाली सृष्टि खुली। उजाला ही अंधरे का अगला कदम है। हमें उजाले के सुखद आशा हेतु अंधियारे के अस्तित्व को स्वीकार करना ही होगा बल्कि होना तो यह चाहिये कि हम स्वयं प्रकाश के वाहक बने। पर आज स्थिति दूसरी है हम प्रकाश चाहते तो हैं पर अंधेरे से नहीं लड़ना चाहते। अपने को उजाले का वाहक और उपासक समझना, जताना हम सब को अच्छा लगता है। यह स्वाभाविक है और सही भी है। किसी हद तक उजाला है ही ऐसी प्यारी वस्तु और अनमोल चीज जिसे हम सभी चाहते हैं और पूजते हैं। उजाला हमारे जगने का, चैतन्य और जागरण का स्त्रोत है। पूर्व दिशा में उजाला फूटने के साथ या उससे तनिक आगे पीछे हम जागते है और अपनी चहचहाहट शुरू करते हैं। रात की बोझिल नींद से जगी हमारी आँखों को सुबह के सुनहरे उजालें में धुली दुनिया अजब सुन्दर लगती है। हर पुरानी ठहरी हुई चीज भी नयी लगती है क्योंकि नव प्रकाश के चलते हमारी सोच, हमारी दृष्टि नयी लगती है। फिर हम अपनें कार्यक्रम में व्यस्त हो जाते हैं और उजाले के रथ को अस्ताचल होने के साथ ही हम पुनः निद्रा की शरण में खो जाते हैं क्योंकि हमारा विश्वास बना है कि रात बीतने के साथ ही अंधेरे का साम्राज्य पुनः ध्वस्तहो जायेगा और आने वाला नव प्रभात नयी आशा का संचार करने आयेगा।
अंधेरे को हम उजाले में बदलने को हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं क्योंकि उजाला अभयता का परिचायक है। अन्धेरा यह आंशका जगाता है कि कहीं कोई शत्रु अंधेरे का प्रश्रय लेकर हम, पर आक्रमण न कर बैठें। इसीलिए अधेरा ढलते ही हम प्रकाश के कृत्रिम स्त्रोतों का सहारा लेते हैं। जीवन में जो कुछ भी शुभ है. सुखद है. रपूणीग है। उन सब का सम्मिलित रूप है, उजाला, प्रकाश। इसीलिए शुभ कार्यों में सूर्य या अग्नि को साक्षी मानने का रिवाज कई धर्मों में है। हम मांगलिक अवसरों पर दीया और स भोमबत्ती जलाते हैं। और आनन्दोत्सव में रोशनी और है आतिशबाजी करते हैं। यह सच है कि उजाला जीवन के के मौलिकता का स्वरूप देता है पर जब यही उजाला दुराग्रही और आक्रामक हो उठता है तब क्या वह कम अनर्थ करता है? धर्म हो या राजनीति, जब कोई समुदाय वर्ग या दल जिद ठान लेता है कि हमारा उजाला ही एक मात्र उजाला है, सिर्फ वही मुक्तिवान है कबाकी सभी उजालें बेकार हैं, तुम चाहो या न चाहो, हम तुम्हें अपने उजाले के जरिये मुक्ति दिलवा कर ही मानेगें, ऐसी स्थिति में यह उजाला मृत्यु का दूत ही बनकर आता है, जीवन का नहीं। मृत्यु से भी अधिक मारक इस उजाले का तांडव मानव इतिहास ने बार-बार देखा है। इस तरह अगर उजाले के उपकार अनगिनत है तो अंधेरे का उपहार भी कम नहीं है। ऐसा नहीं है कि अंधेरा हलाहल विष है तो प्रकाश स्वर्ण मंजूषा में रखा अमृत है। बल्कि यह दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। उजाले का नमन करने हेतु हमें अंधेरे को भी नमन करना ही होगा। आज का महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि दीपावली का शुभ प्रकाश किसके लिये है? कौन है जो इस प्रकाश से अपने देश के और समाज में व्याप्त अन्धकार को दूर करना चाहता है? सब अपने-अपने मोहजाल में भटक गये हैं। सबने अपने-अपने स्वार्थ के अंधेरे का वरण कर लिया है। विदेशों की भौतिक जिन्दगी का आकर्षण हमने बटोर लिया है लेकिन वहाँ की कार्य करने की लगन हमनें नहीं सीखी। सुविधाओं के लिये लालायित रहते हैं पर काम करना नहीं चाहते। दरअसल हमारे सामाज में यह अहसास ही नहीं रहा है कि हमनें आजादी किस कीमत पर पायी? इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि भारत युद्ध की घनी छाया में कभी नहीं रहा। इसलिये आजादी और संघर्ष का मूल्य वह नहीं जान पा रहा है। आज की मानसिकता को देखकर लगता है कि आजादी के लिये किसी ने बलिदान नहीं किया बल्कि वह अपने आप मिल गयी। यह मानसिकता राष्ट्र और लोकतन्त्र दोनों के लिये ठीक नहीं हैं। लोकतन्त्र में लोग अपना भविष्य तय करते हैं पर अब ऐसा लगने लगा है कि लोग अपने भविष्य को मेहनत से नहीं बल्कि खैरात में पाना चाहते हैं। इस तरह देखा जाय तो आज की स्पर्धा से सामान्य लोग पिछड़ जायेगें। अन्धेरा घना होता जा रहा है। ऐसे में हमें स्वयं मनसा वाचा कर्मणा उजाले का वाहक बनना होगा। तभी हम दीपोत्सव की कल्पना को साकार कर सकेगें और उजाले को नमन भी....

व्योमेश चित्रवंश

सोमवार, 26 अगस्त 2024

व्योमवार्ता/ऊमस भरे दिन मेरे शहर में 05जुलाई2024

मेरे शहर में,
मेरा शहर इस समय गर्मी के ताप से लरज रहा है। सूरज से बरसते अंगारे और धरती से निकलती तपिश के साथ पारे ने ऊपर और ऊपर चढ़ने की होड़ लगा रखी है। कितना अजीब है नदियों के नाम पर बसा गंगा के खूबसूरत घाटों वाला यह शहर आज खुद में हैरान व परेशान है। परेशान भी क्यों न हो? शहर को नाम देने वाली नदियों या तो विलुप्त हो चुकी या विलुप्त होने के कगार पर है और गंगा के घाट? आह ! जब कल गंगा ही नही रहेगी तो ये घाट क्या करेगे? मुझे याद नहीं कहाँ लेकिन कहीं सुना था कि एक बार माँ पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा था कि बनारस की उम्र क्या और कितनी होगी तो अवधूत भगवान शंकर ने कहा था कि "यह आदि काल से भी पहले अनादि काल से बसी है यानि मानव सभ्यता के आदिम इतिहास काशी से जुड़ते है और जब तक सुरसर गामिनी भगीरथ नन्दिनी गंगा बनारस के घाट पर रहेगी तब तक काशी अक्षुण्ण रहेगी।" तो क्या गंगा के घाटों को छोड़ने के साथ ही मेरा शहर......? और कहीं अन्दर तक मन को हिला देती है यह भयानक कल्पना याद आता है, चना चबेना गंगा जल ज्यों पुरवै करतार, काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार। अब तो न गंगा में 'गंगा जल' रह गया, न ही सबके लिये मुअस्सर 'विश्वनाथ दरबार। अब तो दोनों ही सरकारी निगहवानी में दिल्ली और लखनऊ के इशारों पर मिलते हैं। माँ गंगा और भगवान विश्वनाथ के सरकारीकरण से अपने शहर की स्थिति उतनी नहीं खराब हुई जितनी हम बनारसियों के नव भौतिकवादी सोच और तोर से बढ़कर मोर वाली अपसंस्कृति ने अपने शहर का नुकसान किया। शहर बढ़ता गया और हमारी सोच का दायरा सिकुड़ता गया। कभी लंगड़े आम व बरगद के पेड़ों और लकड़ी के खिलौने के लिए मशहूर बनारस में पेड़ों की छाँव अब गिने चुने उदाहरण बनकर रह गयी। 'मेरे घर की नींव पड़ोस के घर से नीची न रहे क्योंकि ऊँचे नाक का सवाल है।' इस 'नाँक' के सवाल ने बरसाती पानी के रास्तों को सीवर जाम, नाली जाम के भुलभुलैया में उलझा दिया तो पड़ोसी के दो हाथ के बदले हमारी चार हाथ सड़क की जमीन की सोच ने इस शहर को एक नई समस्या अतिक्रमण के नाम से दी। तालाब पोखरों का तो पता ही नहीं, कुयें क्या हम इन आलीशान मकानों के बेसमेन्ट में मोमबत्ती जलाकर ढूंढ़ेगें? ऊपर से तुर्रा यह कि तालाब, पोखरों, नदियों के सेहत का ख्याल रखने वाला वाराणसी विकास (उचित लगे तो विनाश भी पढ़ सकते है) प्राधिकरण खुद ही मानसिक रूप से बीमार होने की दशा में है। कितने तालाब, पोखरे पाट डाले गये यह कार्य उसके लिए "आरूषि हत्या काण्ड" की तरह किसी मर्डर मिस्ट्री, फाइनल रिपोर्ट, क्लोजर रिपोर्ट, रिइनवेस्टिगेशन से कम नही है और तो और दो तीन को तो वी०डी०ए० ने खुद ही पाट कर अपने फ्लैट खड़े कर दिये। शहर के जमींन मकान और योजनाओं का लेखा-जोखा रखने वाले तहसील, नगर निगम और वी०डी०ए० के पास अपना कोई प्रामाणिक आधार ही नहीं है जिस पर वे अतिक्रमणकारियों के खिलाफ ताल ठोंक सके। कम से कम वरूणा नदी और सिकरौल पोखरे के बारे में तो मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही सिद्ध करता है।
कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन लब्बोलुआब यह है कि शहर की सेहत ठीक नही है। इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक अगर कहीं मानसून आ गया तो आम शहरी की चिन्ता यही है कि गर्मी की तपिश तो कम हो जायेगी लेकिन नाले बने गडढ़ेदार सड़कों से घर कैसे पहुँचेगें? इसी से तो बरसात चाहते हुए मन में एक दबी सी चाहत है कि दो चार दिन और मानसून टल जाये तो शायद..
अपनी ही नहीं सारे शहर की बात कहें तो एक शेर याद आता है- 
सीने में जलन, आँखों में तूफान सा क्यूँ है।
 इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है।

शनिवार, 24 अगस्त 2024

बनारस मे नाश्ता यानि चौचक चकाचक चपंत व्यवस्था



बनारस की कुछ मशहूर नाश्ते की दुकान है 

1.मैदागिन वाली दुकान पर प्रकाश सरदार की दूध की क्वालिटी सबसे उम्दा है
2.भरत मिलाप नाटी इमली का कचौड़ी परिवार कचौड़ी और चने की घुघरी,आलुदम, छोला की क्वालिटी के लिए मशहूर है ।
3.पांडेयपुर चौराहे पर आजादी के पहले से ही रम्मन भंडार गुलाब जामुन की दुकान मशहूर है।
4. चेतगंज चौराहे के पास शिवनाथ मिष्ठान भंडार की मसालेदार खस्ता कचौड़ी व छोला जलेबी मशहूर है ।
5 . लक्सा की पनारू वीर बाबा जलपान गृह की कचौड़ी जलेबी मशहूर है ।
6. वरुणा ब्रिज बाजार में 1958 से स्थित रानू दादा का टोस्ट कटलेट टी स्टाल
7. गिरजाघर चौराहे पर सुबह 4 बजे ही लगने वाली संजय कनोजिया की इडली की दुकान
8- राम भण्डार, ठठेरी बाज़ार की कचौड़ी- जलेबी
9- लक्ष्मी चाय, चौक का मलाई टोस्ट
10- विश्वनाथ चाट, विश्वनाथ गली का गोलगप्पा
11- सोराकुवां की हींग वाली छोटी कचौड़ी
12- मार्कण्डेय, चौखंबा की मलइयो
13- कल्लू, चौक का समोसा-काला चना, गाजर का हलवा और मटर चूड़ा
14- सिगरा का बाटी चोखा
15- दीना चाट, राजा दरवाजा का टमाटर और टिक्की
16- मोछू, चौक की झालमुड़ी
17- लक्ष्मण, भारतेंदु भवन की मलइयो
18- रसवंती, ठठेरी बाज़ार की मलाई गिलौरी
19- मधुर मिलन, सिगरा का लौंगलता
20-बाबा स्लाइस जगत गंज का ब्रेड पकौड़ा,
21-बंगाल स्वीट हाउस भिखारीपुर का रसगुल्ला
22-रामनगर की लस्सी,
23-पिपलानी कटरा पर ठेले वाले का आलूदम
24-यूपी कालेज भोजूबीर का लाल पेड़ा
25-केशव ताम्बूल भंडार रविदासगेट का पान
26-मडुवाडीह थाने के पास स्पेशल गुलाब जामुन
27-लहुराबीर पर कुल्हड़ वाली काफी
28-संकट मोचन मंदिर जाने वाले मार्ग पर स्थित 18 वर्ष पुराना बनारसी चाट कॉर्नर
29- देढ़सी पुल विश्वनाथ गली में श्री कुंजू साव का फलाहारी मिष्ठान भंडार
30-पहाड़िया चौराहे पर शाम 5:00 बजे से बबलू उर्फ राजकुमार गुप्ता के ठेले पर क्रिस्पी वेज कटलेट खाने की भीड़ लगती है ।
30-रामनगर चौक स्थित शिवनाथ यानी घिसियावन साव की 12:00 से 3:00 बजे तक खुलने वाली शुद्ध देसी घी की सोन पापड़ी वाली दुकान
31-जंगम बाड़ी में 1965 से ही चल रही बाबा यानी बिज्जू यादव की पकौड़ी वाली दुकान। इस दुकान पर बैगन, गोभी, लौकी ,आलू , केला, शिमला मिर्च और ब्रेड पकौड़ा भी मिलता है
32-गोदौलिया स्थित 60 वर्ष पुराना काशी चाट भण्डार। जहां देसी घी से सारे व्यंजन जैसे कुल 16 तरह की चाट,पानी पूरी ,दही पूरी ,आलू टिक्की, टमाटर चाट, पापड़ी चाट,चूड़ा मटर, गर्मा गर्म गुलाब जामुन, कुल्फी फालूदा और गाजर के हलवे के लोग कुछ ज्यादा ही मुरीद हैं ।
33 - कबीरचौरा स्थित गोपी ब्रदर्स की गरमा गरम रसभरी केसरिया इमरती की दुकान
34- कोतवालपुरा में भुल्लन चा ( बैजनाथ पटेल) की 150 साल पुरानी पं की दुकान
35- नीचीबाग के नारायण कटरा में चंद्रमोहन पाठक की शिवम ठंडई के नाम की दुकान
36- विश्वनाथ गली में बिज्जू का सांभर इडली , सांभर वड़ा ,दही बड़ा , मसाला डोसा 
37- पहले सरस्वती फाटक पे एक यादव जी की दूध की मिठाइयों की दुकान होती थी जो अब शायद Corridor बन जाने के कारण कहीं अन्यत्र चली गई है 
38.राजेंद्र प्रसाद घाट पे रात 11 से 2 बजे तक बिकने वाली चाय और लेमन tea. ऐसी चाय आपने जिंदगी में न पी होगी 
39. अस्सी पे पप्पू की अड़ी पे चाय के साथ चर्चा...
40. गोदौलिया चौराहे पे देर शाम बिकने वाला बेहद करारा तीखा घुघनी चना 

बुधवार, 19 जून 2024

व्योमवार्ता/ समाज जिसमे हम रहते हैं...../जरूरत परिवार संस्था को बचाने की...

जरूरत 'परिवार' संस्था को बचाने की-

            क्या आपको आशा साहनी, विजयपति सिंघानिया और सुरेन्द्र दास याद हैं? नाम कुछ सुना हुआ लग रहा है पर सही-सही याद नहीं आ रहा है। आज कुछ ऐसी ही स्थिति परिवार नामक संस्था की है। परिवार की प्रवधारणा हमारे मन मस्तिष्क में है पर हम उसके वास्तविक महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। चलिए, पहले आपकी उत्सुकता भरी उलझन दूर करते हुए इन तीनों के बारे में बताते हैं। वर्ष 2018 में इन तीनों व्यक्तियों के साथ घटित घटनाओं ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया था। शायद आप भी विचलित होते हुए हो, पर जीवन की रोजमर्रा की आपधापी में दो-चार दिन के बाद ये तीनों घटनायें विस्मृत हो गयी। आशा साहनी उम्र 63 वर्ष, मुम्बई के अभिजात्य इलाके के एक हाउसिंग सोसाइटी के फ्लैट में रहती थी, उसी सोसाइटी में उनका एक और फ्लैट भी था। दोनों फ्लैटों की कीमत आज की तारीख में लगभग 8 करोड़ रूपये से अधिक होगी। वर्ष 2013 में पति की मृत्यु के बाद वह अकेले ही रहती थी क्योंकि एकमात्र पुत्र रितूराज साहनी अमेरिका में बहुराष्ट्रीय कम्पनी में डालर की मोटी गड्डी वाली नौकरी करता था। अप्रैल 2016 में आशा ने अपने पुत्र रितूराज को फोन पर बताया था कि उसे अकेलापन सताता है, अकेले रहने में डर लगता है इसलिए वह उसे ले चले क्योंकि वह अकेली नही रहना चाहती। बेटे ने माँ की बात सुनकर फिर फोन पर बात करने का आश्वासन दिया। अप्रैल 2016 के पश्चात माँ के बारे में सोचने की फुरसत बेटे रितूराज को अगस्त 2018 में 6 तारीख को मिली, जब वह कम्पनी में काम से मुम्बई आया। फ्लैट अन्दर से बन्द था। पड़ोसियों ने बताया कि उन्होंने पिछले सात-आठ महीनों से फ्लैट को कभी खुलते नहीं देखा। बार-बार घण्टी बजाने पर जब दरवाजा नहीं खुला और बेटे रितूराज ने फ्लैट का दरवाजा तोड़वाया तो माँ आशा साहनी बेड पर बैठी मिली। कपड़ों के भीतर सिर्फ हड्डियों के ढाँचे में, उसके मॉस व चमड़े गलकर अलग हो गये थे जिन्हें चींटियों ने खा डाला था। कंकाल रूपी मॉ के बैठने की स्थिति देखकर लग रहा था कि उसकी आँखे दरवाजे पर ही टिकी थी बेटे के इंतजार में। पर क्या बेटा समय पर आकर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर पाया?
                    दूसरी घटना रेमण्ड ग्रुप ऑफ इण्डस्ट्रिज के मालिक 80 वर्षीय विजयपति सिंघानिया की है। देश के नामी उद्योगपतियों में शामिल विजयपति सिंघानिया बारह हजार करोड़ के औद्योगिक साम्राज्य के स्वामी होने के साथ-साथ बेहद जिन्दादिल और अपने शौक को पूरा करने वाले खुशनसीब इंसानों में शुमार हुआ करते थे। एक अच्छे पायलट होने के साथ सामाजिक क्रिया कलापों एवं साहसिक कारनामों में दखल जैसे कार्यों के चलते वे पद्मविभूषण सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। एक जमानें में मुंबई की सबसे ऊँची 36 मंजिली ईमारत में जे.के. हाउस में रहने वाले विजयपति आज किराये के कमरे में रहने के साथ-साथ पैसे पैसे को मोहताज हैं। उन्होंने अपने इकलौते पुत्र गौतम सिंघानिया पर व्यापार, सम्पत्ति, घर सब कुछ हड़पने का आरोप लगाया है।
          सुरेन्द्र दास बलिया के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकले आईआईटी खड्गपुर से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में बीटेक थे। उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा को उत्तीर्ण कर अपने गाँव का प्रथम आईपीएस बनने का गौरव प्राप्त किया। आईपीएस बनने के बाद उन्होंने पेशे से चिकित्सक डॉ० रवीना से मैट्रिमोनियल साईट पर परिचित होकर अन्तर्जातीय विवाह किया। विवाह के एक वर्ष बाद ही पारिवारिक उलझनों के चलते साथ-सुथरी छवि वाले मात्र तीस वर्ष के ईमानदार आईपीएस सुरेन्द्र दास ने जहर खाकर सितम्बर 2018 में आत्महत्या कर लिया। ये तीनों घटनायें तीन विभिन्न परिस्थिति, परिवेश और अलग-अलग स्थानों की हैं जिनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। आर्थिक व सामाजिक ताने-बाने में भी ये तीनों घटनाएं उच्च, मध्यम व टप्रवर मध्य वर्ग से हैं परन्तु ध्यानपूर्वक देखा जाये तो तीनों ही घटनाओं के पीछे व्यक्ति की हताश मनोवृत्ति है जो उसे स्वयं से अन्दर ही अन्दर जूझते हुए कमजोर करती है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह महसूस होता है कि इस कमजोरी का मुख्य कारण आत्मबल का अभाव या कमी है जिसकी भरपाई परिवार संस्था से की जाती है। हमारे समाज में दिनोदिन परिवार के ताने-बाने के कमजोर होने या नष्ट होने से इस तरह की घटनायें हो रही हैं और होती रहेंगी। बात आशा साहनी के बेटे के जीवन शैली से करें तो कारण ज्यादा स्पष्ट होंगे। वर्ष 2013 में अपने पिता के मृत्यु के पश्चात क्या रितूराज यह जानता नहीं था कि मुंबई जैसे महानगर में उसकी बूढ़ी माँ अकेले रह रही है। क्या वर्ष अप्रैल, 2016 में माँ के डर व अकेलेपन की बात फोन पर सुनने के बाद भी वह अपनी 60 वर्षीय मॉ के दर्द को नहीं समझ पाया? और तो और, अन्तिम बार अप्रैल, 2016 में बूढ़ी माँ का फोन मिलने के बाद उसे अपनी माँ को फोन करने और हाल-चाल जानने में उसे दो साल से भी ज्यादा वक्त में समय ही नही मिल सका? क्या मुंबई जैसे शहर में अपना बचपन और जवानी के आठ-दस वर्ष बिताने वाले रितूराज का पूरे शहर में कोई रिश्तेदार, दोस्त, परिजन ऐसा नहीं था जिससे वह उन सवा दो वर्षों के अन्तराल में माँ का हाल पता कर सके? बात विजयपति सिंघानिया की करें तब भी ऐसे ही ढेरों सवाल उठते हैं। क्या कारण थे कि बाप विजयपति की बनाई हुई सारी सम्पत्ति से इकलौते बेटे गौतम ने उन्हें बेदखल करते हुए कौड़ी-कौड़ी का मोहताज बना दिया? क्या गौतम को समझाने, बताने वाला उसके परिवार, रिश्तेदार, नातेदार में ऐसा कोई नहीं जो उसे पिता के महत्व को बता सके? क्या विजयपति का कोई परिचित, दोस्त, परिजन और रिश्तेदार नहीं जो उन्हें सूकून की छाया और दोनों वक्त दो रोटी दे सके? सुरेन्द्र दास का प्रकरण तो हासिये से और परे हो जाता है। स्व० सुरेन्द्र के ससुर जो चिकित्सा विभाग में निदेशक स्तर के अधिकारी हैं, उनका आरोप है कि सुरेन्द्र के परिवार वाले उसे पैसा कमाने की मशीन समझते थे और पैसे के लिए हमेशा परेशान करते थे। जबकि सुरेन्द्र केम माँ और भाई का कहना है कि सुरेन्द्र की पत्नी सुरेन्द्र को अपने घेरे में लेकर उसे सुरेन्द्र के मौलिक परिवार से अलग-थलग कर दी थी और पिछले महीनों से उसे मॉ से बात भी नहीं करने देती थी जिससे वह काफी परेशान होकर आत्महत्या करने को मजबूर हो गया। 
सच क्या है? 
इस बारे में सिर्फ कयास लगाया जा सकता है परन्तु इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि आदमियत के रिश्तों में फर्क पड़ता जा रहा है। परिवार की अवधारणा सिमट कर न्यूक्लियस फैमिली हम दो हमारे दो से और संकीर्ण हो हम दो हमारे एक से होते हुए अब एकाकी पर केन्द्रित होकर रह गया है। ये अहसास कि दुनिया में मेरा कोई नहीं है, किसी को मेरी जरूरत नहीं है। मैं कुछ भी होने की वजह नहीं हूँ। इससे बड़ी बदनसीबी किसी भी इन्सान और इंसानी समाज के लिए कुछ भी नहीं। एक शायर की पंक्तियों याद आ रही है-
'इक जमाना था कि 
सब एक जगह रहते थे 
और अब कोई कहीं, 
कोई कहीं रहता है 
पहले तो हर बात पर 
रूसवाई का डर लगता था 
अब कोई भी टोकने वाला नहीं, 
मेरे परिवार में। 
यह टोकना ही परिवार का अपनापन था जो पूरे परिवार को सामूहिक बन्धन व जिम्मेदारियों में जकड़ा रहता था। तब हर सदस्य घर के बाकी लोगों के साथ अपनी खुशियों ही नहीं, दुःख और परेशानियाँ भी बॉटता था। सबकी लाठी एक का बोझ बनकर थे, परेशानी कब हवा में कपूर बन खत्म हो जाती थी, एहसास भी नहीं होता था। भारतीय परिवेश से दूर आगस्त कांटे ने परिवार के लिए कहा है कि परिवार समाज की आधारभूत इकाई है. जहाँ अच्छा परिवार समाज के लिए वरदान है, वहीं बुरा परिवार एक अभिशाप से कम नहीं है। प्लेटों ने भी परिवार को जीवन की बुनियादी पहलू की प्रथम पाठशाला कहा है। भारतीय परिवेश में तो परिवार के कई मायने हुआ करते थे। एक जन्मना परिवार जहाँ बच्चा जन्म लेकर नाम पाने के साथ-साथ मॉ, पिता, चाचा, बुआ, ताई, दादा-दादी, भैया-बहना के रिश्ते पाता था, वहीं गुरूकुल में जाने पर उसका एक समवयस्क परिवार मिलता था जिसे गोत्र के नाम से जाना जाता था। गुरू और आश्रम के द्वारा दिये हुए गोत्र परिवार से एक अलग सामाजिक संरचना बनती थी। इन दोनों से ऊपर गाँव के रिश्ते जिसमें ढेर सारे मुँहबोले रिश्तों का परिवार होता था। 
उस जमाने में परिवार में कितने ही लोग रहते थे, परिवार हँसता, खेलता था और एक दूसरे से एकदम जुड़ा रहता था, पैसे कम होते थे पर उसमें भी बड़ी बरक्कत होती थी। घर में कोई खुशी की बात होती थी तो बाहर वालों को बुलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी, पर आज परिवार कितने छोटे हो गये हैं और टूटते जा रह हैं, हमारे रिश्ते बिखरते जा रहे हैं। रिश्तों में वो मिठास नहीं रह गयी है। एलपीजी (लिबरलाईजेशन, प्राइवेटाईजेशन, ग्लोबनाईजेशन) के अवधारणा के बाद सदी के आखिरी दशक से भौतिकता के प्रति अंधी दौड़, शहरों में पलायन और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ने संयुक्त परिवार को समाप्त कर रिश्तों में दरारें डाल एकल परिवार की भूमिका को समाज में सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया। समाज की व्यक्तिवादी सोच ने दादी-दादा, चाचा-चाची, बुआ, मौसी और मामा के रिश्ते ही खत्म कर दिये। घर के दरवाजे छोटे होते थे पर घर बड़े और घर की दहलीज के अंदर रहने वाले बड़े मन व सोच के होते थे उनके मन मे एक दूसरे के प्रति अपनापन और अपार स्नेह था। आज घर छोटे हो गये बस दरवाजे बड़़े हो गये परन्तु  उनके भीतर रहने वालों की सोच संकीर्ण और छोटी हो गई। आज परिवार के टूटन के साथ गांव हटते गये और हमने गांव की सरहद पर ही संस्कार भी छोड़ दिया। खरीदी गयी शिक्षा व्यवस्था ने नारी पुरूष समानता के नाम पर संस्कार विहीन व्यक्तिवादी अधिकार के ऐसे बीज रोप दिये कि उनकी जड़ व भविष्य विहीन लहलहाती फसल परिवार न्यायालयों में विवाह विच्छेद से लेकर गुजारे भत्ते की मुकदमों में दिख रही है। एक दरवाजे की हवेली से निकले परिवारों ने शहरी अपार्टमेण्ट के कई दरवाजे वाले फ्लैट में रिहाईस तो बना लिया पर पूरे गाँव को जानने व पहचान वाले व्यक्ति के समक्ष आज अपने पड़ोसी से पहचान का प्रश्न ही उठा रहा। आज के दिखावा भरे जीवन में सहजता नही हैं। फेसबुक पर पाँच हजार फ्रेण्ड्स लिस्ट वाले बन्दे के पास वास्तविक जीवन में पाँच सही मित्र हो, यह सम्भावना भी सवाल खड़ी करती है। आज का एकल परिवार
स्वयं में एक बिडम्बना है। यहाँ बच्चों को तो छोड़िये, बड़ों पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं है। परिवार में यदि अनुशासन नहीं तो परिवार को बिखरते देर नहीं लगती। बढ़ते पारिवारिक झगडे, तलाक, बच्चों को उद्दण्डतापूर्ण व्यवहार, इसका ज्वलन्त उदाहरण है। 
अब बच्चों में दादा-दादी का दुलार भरा संरक्षण, स्नेहसिक्त उलाहना और परियों की कहानियों में रूचि नहीं होने के साथ-साथ दिली लगाव भी उत्पन्न नहीं हो पाता क्योंकि एकल परिवार के संचालक उनके आधुनिक माता-पिता अपने बूढ़े माँ-बाप (बच्चों के दादा-दादी) को अपने साथ रखने में असमर्थ हैं, जो साथ हैं वे भी तिरस्कृत हैं। बच्चा वही सीखेगा जो देखेगा। दूसरों पर दोषारोपण करना ठीक नहीं, न ही यह समस्या का समाधान है। मोबाईल, सोशल मीडिया, ओटीटी पर परोसे जाने वाले फूहड़ मनोरंजन और डीटीएच चैनल्स ने आज की सामाजिक सामंजस्यता को समाप्त कर दिया है। मोबाईल पर रोज बात करने वालों को आपस में मिले सालोंसाल बीत जाते हैं। दिन भर कानों में लगे मोबाईल और खाली वक्त मोबाईल पर घूमती उंगलियों ने हमें खुद से ही कितना दूर कर दिया है इसका अहसास हमें होने लगा है। मोबाईल के निजी जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप से परिवार की आपसी बातचीत बन्द कर दिया है। सच कहें तो 
एक अरसा हुआ 
अहसासों को बातों में भींगा देखे, 
कम्बख्त इस मोबाईल ने 
अल्फाजों का वजूद खत्म कर डाला।'
         एक वाक्य में कहें तो परिवार वट वृक्ष की तरह है जो समस्याओं व तनाव के तपती झुलसती धूप से हमें समाधान रूपी राहत देता है। एकल परिवार क्षणिक वर्तमान के लिए सुखद तो हो सकता है, पर लम्बी यात्रा के लिए हमें सहयोग व संबल लेने परिवार को ही अपनाना होगा। हमें परिवार की महत्ता स्वीकार करना ही होगा और एकाकी जीवन व अकेलेपन के प्रश्नों के उत्तर हमें खुद तलाशना होगा। झाँकना होगा अपने अन्तर्मन में टटोलना होगा स्वयं को, क्योंकि समाज एवं स्वयं की इस स्थिति के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। प्रतिस्पर्धा एवं दिखावे की अंधी दौड़ में पड़कर हम सिर्फ अपना स्वार्थ हल कर रहे हैं। भूला बैठे है अपनी प्राथमिकताओं को। नकार रहे हैं उन मूलभूत दायित्वों को जो एक संस्कारिक परिवार एवं समाज की आवश्यकता ही नही आधारशिला है।
सम्बन्धों में जुड़ाव विश्वास आपसी समझ बनाये रखने के लिए कुछ त्याग करने पड़ेंगे। इस बदलते परिदृश्य में नई पीढ़ी को गर्त में जाने से बचाने के लिए उनमें चारित्रिक सृदृढ़ता लाने के लिए माता-पिता को अपने एकाकी सोच में बदलाव लाना होगा। उन्हें अपने पिछली पीढ़ी और परिवार को समय, प्यार एवं भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करनी होगी। उनके समक्ष दम तोड़ रहे रिश्तों को, सम्बन्धों को मान, सम्मान, आदर देना होगा और सबसे बढ़कर 'मैं' की भावना से हटकर 'हम' की भावना का विकास करना होगा। तभी शायद हम आने वाले दिनों में 'परिवार' संस्था को बचाने व स्वयं को सुदृढ़ करने में सफल होंगे। क्योंकि हमारे जीवन का यह बड़ा सच है कि परिवार और मिट्टी का मटका दोनों एक जैसे होते हैं। इसकी कीमत बस बनाने वालों को पता होती है, तोड़ने वालों को नही।
#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं....

(अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस (15मई) समारोह मे उद्बोधित विचार)
नोट: यह उदबोधन वाराणसी के हिन्दी मासिक पत्रिका कर्मपथ के परिवार विशेषांक मे प्रकाशित हो चुका है।
http://chitravansh.blogspot.in

मंगलवार, 18 जून 2024

नवगीत के प्रणेता डाॅ०शंभुनाथ सिंह की जयन्ती पर विशेष

स्वतंत्रता संग्राम और डॉ०शंभुनाथ सिंह

स्वतंत्रता संग्राम में काशी का अप्रतिम योगदान रहा है। राजा चेतसिंह और वारेन हेस्टिंग्स घटना से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक वाराणसी कान्तिकारी गतिविधियों का गढ़ रहा है। न केवल कान्तिकारी विचार धारा के लोग बल्कि उदारवादी और गांवीवादियों ने भी वाराणसी को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया। 'आज, 'संसार, 'अग्रगामी', 'रणमेरी' से लेकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, अभिमन्यु पुस्तकालय, सरस्वती सदन पुस्तकालय इन गतिविधियों के केन्द्र थे। जहां एक ओर आजाद, सान्याल जैसे कान्तिकारी पुलिस की आंखो में धूल झोंक कर अपनी गतिविधियों को अन्जाम दे रहे थे, वहीं काशी विद्यापीठ के छात्र एवं अध्यापक गांधीजी के रास्तों पर चल कर तिरंगे की लडाई लड रहे थे, ठीक उसी समय काशी की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परम्परा के अनेक साहित्यकारों, संस्कृति एवं शिक्षाविदों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान दिया। आज स्वतंत्रता की स्वर्ण जयन्ती वर्ष में जब स्वाधीनता सेनानियों के रूप में केवल राजनैतिक कार्यकर्ताओं को ही सम्मानित किया जा रहा है, वहीं यह अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि राष्ट्र वाराणसी के उन अमर स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करें जिन्होंने अपने कार्यों से स्वतंत्रता हेतु सतत् प्रयास किए। किन्तु ऐसे लोगों ने कभी भी स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का दावा प्रस्तुत नहीं किया और न ही इस अवसर को भुनाने की कोशिश की, बल्कि निस्वार्थ भाव से अपनी साधना में रत रहे। शायद यही कारण है कि आज आजादी की 50 वी साल गिरह पर हम उनके योगदान को भूल चुके है।
ऐसे ही स्वतंत्रता आन्दोलन कारियों में 'समय की शिला -जैसे अमर गीत के रचनाकार डा० शम्भुनाथ सिंह पर जी भी थे। बहुत से लोग शायद ही इस तथ्य पर विश्वास करें कि हिन्दी साहित्य के नवगीत विवा के उन्नायक और मधुर गीतों के रचनाकार ने आजादी आन्दोलन में सड़क मी काटा एवं रेलवे लाइन उखाड़ने की योजना बनाई। मृदुभाषी, व्यवहार के धनी और कोमल हृदय डा० शम्भुनाथ सिंह जी में देशभक्ति की भावना कितनी बलवती थी. उसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां वे श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल जैसे कान्तिकारी के सहायक थे, वहीं गांधी जी को अपनी कविता भेंट करने के लिए सरदार बल्लभभाई पटेल से उलझ पड़े थे। घटनाओं को बताते हुए स्मृतियों 1 के पुंलिके में खो जाते है समाजवादी चिन्तक, वरिष्ठ अधिवक्ता और कवि श्री सागर सिंह जी जो डा० शम्भुनाथ सिंह के अनन्यतम मित्रों में रहे है।
हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, संस्कृतिविद् एवं समाजसेवी डा०शम्भुनाथ सिंह का जन्म 17 जून 1916 को देवरिया जनपद के ग्राम रावतपार अमेठिया में हुआ था। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा बिहार के सिवान जिले के अन्तर्गत ग्राम रामगढ़ तथा माध्यमिक शिक्षा देवरिया जनपद के मझौली राज में सम्पन्न हुयी। मिडिल स्कूल में अध्ययन करते समय ही बालक शम्भुनाथ के मन में राष्ट्रीयता एवं - देशभक्ति की प्रवृत्ति का जन्म हुआ। सन् 1930 में गांधी जी उत्तर  प्रदेश दौरे के सिलसिले में देवरिया जिले का दौरा करते समय भाटपार रानी नामक स्थान पर आये। वहां पर गांधी जी के दर्शन और उनके भाषण सुनने के लिए ये अपने स्कूल से ही गये। अपार भीड़ में एक ऊंचे मंच पर गांधी जी बाबा राघव दास जी के साथ आये। बालक शम्भुनाथ ने सर्वप्रथम गांधी जी का भाषण वहीं सुना, उनके भाषण का आप पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होने उसीसमय से खद्दर पहनने का व्रत ले लिया, जिसका पालन वे जीवन पर्यन्त करते रहे। गांधी जी के सत्याग्रह के अन्तर्गत समी जगह नमक कानून तोड़ा जा रहा था, इन्होने भी अपनी कक्षा के भागीरथी नामक छात्र के साथ नमक बनाने का प्रयोग किया। एक दिन दोनों पढ़ाई छोड़ कर देवरिया भाग गये और सत्याग्रही शिविर में प्रविष्ट होना चाहा, किन्तु कम उम्र होने के कारण इन्हें शिविर में प्रवेश नहीं मिला। उसी वर्ष 1930 में के जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती कमला नेहरू तवा डा० राजेन्द्र प्रसाद का बिहार के मैरवा नामक स्थान पर आगमन हुआ। इन राष्ट्रीय नेताओं के भाषण से आपकी राष्ट्रीयता की भावना और बलवती हुयी। हालांकि उनके परिवार के लोग आमिष भोजी थे, पर गांधी जी के अहिंसा प्रेरणा से उन्होंने उसी समय मांस खाना छोड़ दिया।

सन् 1930-31 में सत्याग्रह आन्दोलन के शिथिल होने पर महात्मा गांधी ने हरिजनोद्वार पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इस सम्बन्ध में वे पूरे देश का भ्रमण करते हुए सन् 1934 में वाराणसी आये और तीन दिनों तक काशी विद्यापीठ में ठहरे। इस अवसर पर गांधी जी को मेंट करने के लिए शम्भुनाथ जी ने हरिजन' शीर्षक नामक एक कविता लिखी और उसे छपवाकर शीशे में मढ़वाया। काशी विद्यापीठ में नित्य संध्या समय गांधीजी की प्रथर्याना समा होती थी, जिसमें वे हरिजनोद्धार के लिए चंदा मांगते थे। लोग पैसों के अलावा अपने आभूषण, घड़ी आदि वस्तुएं उन्हें दान करते थे जिसे वे सभा में ही नीलाम कर देते थे। एक दिन प्रार्थना सभा में गांधी जी एक चौकी पर बैठे हुए थे और उनके पीछे तथा बगल में अन्य कई नेता विराजमान थे। शम्भूनाथ जी अपनी भेंट लेकर मंच के पास तक पहुंचे किन्तु गांधीजी तक पहुंचना बहुत कठिन था। गांधी जी के बगल में सरदार बल्लभ भाई पटेल बैठे थे और यदि कोई कुछ दान देना चाहता था तो उसे वहीं ले लेते थे। फेम में मढ़ी हुई कविता को भी सरदार पटेल ने लेना चाहा, किन्तु शम्भुनाथ जी ने कहा मैं इस कविता को स्वयं अपने हाथ से गांधी जी को भेंट करूंगा। सरदार पटेल ने उन्हे ऐसा करने से रोका किन्तु तब तक शम्भुनाथ जी उन्हे फटकारते हुए मंच पर पहुंचकर महात्मा जी के चरणों में समर्पित कर दिया। थोड़ी देर बाद जब गांधी जी ने भेंट की गई -वस्तुओं की नीलामी प्रारम्भ की तो सबसे अधिक बोली 50/ रू० लगाकर श्री शिवप्रसाद गुप्त जी ने उस कविता को अपने पास सहेज लिया।
जब शम्भूनाथ जी उदय प्रताप कालेज की दसवी कक्षा में पढ़ रहे थे उसी समय ब्रिटिश आर्मी के रिटायर्ड कैप्टन ए.डब्ल्यू. लांग वहा प्रिंसिपल होकर आये। प्रिसिपल कैप्टन लांग का छात्रों के साथ व्यवहार अत्यन्त बर्बर था. जिससे छात्र बहुत असन्तुष्ट थे। प्रिसिंपल महोदय ये छात्रों की परीक्षाओं से एक माह पूर्व होने वाले अभ्यासावकाश को समाप्त कर देने की घोषणा की। इस पर सभी छात्रों ने शम्भूनाथ जी के नेतृत्व मे यह निर्णय लिया कि इस तानाशाही निर्णय के विरूद्ध हड़ताल की जाय। अन्ततोगत्वा हडताल हुयी, जिससे अंग्रेज प्रिंसिपल को अपने निर्णय से डिगना पड़ा और छात्रों को अवकाश मिला। जब हाईस्कूल परीक्षा समाप्त हुयी तो विदाई समारोह में प्रिसिंपल एवं उनके पिट्दू अध्यापकों के भाषण में छात्रों ने "शर्म-शर्म" की आवाज लगाई, परिणामतः उन अध्यापकों ने चिढ़े हुऐ प्रिसिंपल से यह शिकायत की कि यह बेइज्जती शम्भूनाथ के उकसावे पर हुयी है, बस क्या था? प्रिसिंपल ने छात्रावास में जाकर चिल्लाकर पूछा कि 'शम्भुनाथ कौन है?" उस समय छात्रावास के विद्यार्थी मेंस में भोजन कर रहे थे। हाथ धोकर शम्भुनाथ जी ने कहा की "मैं हूं।" इस पर प्रिसिंपल ने उन्हे बिना कारण बताये मारना शुरू कर दिया। प्रिंसिपल के इस कूर व्यवहार को इन्होने भी उसी भाषा में उत्तर दिया। इतने में छात्र इकट्ठे हो गये और अंग्रेजों के खिलाफ उनके जोश ने जोर मारा और फिर प्रिंसिपल की खूब पिटाई हुयी। प्रिसिंपल की पिटाई की घटना दूसरे दिन अखबारों में छपी और लोगों ने इस घटना की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शोध छात्र श्री रामप्रवेश शुक्ल अपने शोध कार्य 'हिन्दी साहित्य के इतिहास में 'डॉ० शम्भुनाथ सिंह का योगदान' में लिखते हैं कि जब शम्भुनाथ जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी०ए० के छात्र थे, उसी समय दैनिक पत्र 'भारत' में मुशी ईश्वर चन्द्र ने यह विज्ञापन निकलवाया कि एक सवर्ण छात्र की आवश्यकता हो जो गंगा तट पर स्थित 'हरिजन आश्रम में हरिजन छात्रों के साथ रहे और उनके साथ मिल कर आश्रम का कार्य करे, उसके निवास और भोजन की व्यवस्था आश्रम की ओर से होगी। विज्ञापन पढ़कर शम्भूनाथ जी मुंशी जी से मिलकर आश्रम में रहने लगे, जहां इन्हें चमार, पासी, ६ कि गोबी, मुसहर आदि हरिजन छात्रों के साथ रहना और उनके साथ मिलकर भोजन बनाना, बर्तन साफ करना, झाडू लगाना आदि कार्य करना पड़ता था। सबको अपनी जूठी का थाली स्वयं साफ करनी पड़ती थी। यह आप पर गांधी जी के हरिजन सेवा का प्रभाव था।
बी०ए० करने के पश्चात् जब आप बनारस आये तो इनके कर्तव्य मार्ग के समक्ष दो प्रश्न थे, जहां एक ओर शम्भुनाथ जी एम०ए० करना चाहते थे वहीं देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय हाथ बंटाना चाहते थे। इनके अभिन्न मित्र श्री सागर सिंह ने उसी समय इनका परिचय प्रसिद्ध कान्तिकारी वि नेता श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल से कराया, जो उस समय अपने कान्तिकारी जीवन के अनुभव लिख रहे थे और उन्हे एक हिन्दी लेखक की आवश्यकता थी। श्री सान्याल ने शम्भूनाथ जी को उसकार्य पर नियुक्त कर लिया। कुछ समय बाद सान्याल जी के संपादकत्व में 'अग्रगामी' नामक दैनिक पत्र निकला और सान्याल जी ने इन्हें 'अग्रगामी' का सहायक सम्पादक नियुक्त कर लिया। सान्याल जी इन्हे अपना प्रधान सम्पादक बनाना चाहते थे। अतः उन्होंने आपको 'आज' कार्यालय में जाकर सम्पादन कार्य सीखने की सलाह दी। शम्भुनाथ जी ने मुंशी कालिका प्रसाद के साथ बैठ कर अंग्रेजी समाचारों का हिन्दी में अनुवाद करने, शीर्षक लगाने और प्रूफ देखने का काम सीखा। इसके एक मास बाद वे 'अग्रगामी' के समाचार सम्पादक बना दिया गये।
जुलाई सन् 1942 में जब उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एम०ए० द्वितीय वर्ष में दाखिला लिया तोउसके अगले ही महीने में 9 अगस्त को देश में 'अंग्रेजो! भारत छोड़ो' आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। गांधी जी ने यह घोषणा की कि इस बार आन्दोलन समाप्त नहीं होगा, कार्यकर्ताओं को करो या मरो का संकल्प लेकर जो करना चाहें वह करें। यह अनुमति पाकर देश भर में रेल पटरियां उखाड़ी जाने लगीं, सड़कें काटी जाने लगी, पुल तोड़े जाने लगे, कचहरियों, थानों और जेलों पर कांग्रेस का झण्डा फहराने लगा। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भी कान्ति की चिन्गारी फैल गयी। समाजवादी छात्र नेता श्री राजनारायण के नेतृत्व में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों का बहुत बड़ा जुलूस कचहरी की ओर बढ़ा। शम्भुनाथ सिंह जी भी अपने मित्र साहित्यकार श्री गंगारत्न पाण्डेय तथा प्रसिद्ध गीतकार श्री मोती बी०ए० के साथ जुलूस में शमिल थे। कचहरी में छात्रों ने कांग्रेस का झण्डा फहरा दिया। पुलिस बौखला उठी, लाठी चार्ज हुआ और छात्र तितर-बितर हो गये। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अनिश्चित काल के लिए बन्द कर दिया गया और बके सेना ने वहां घेरा खाल दिया। शम्भुनाथ जी अपने मित्र सागर सिंह बडू के साथ बबुरी स्थित उनके गांव खरहुआ चले गये। लेकिन मित्रों ठी की गतिविधियां वहां भी बन्द नहीं हुयी। 10 अगस्त को उन्होंने बबुरी जी बाजार में जनसमा में भाषण दिया कि 'हमें आज से यह मान लेना चाहिए कि भारत में अंग्रेजी राज्य समाप्त हो गया अब यहां हमारे देश जो की जनता का राज होगा। इसके लिए आवश्यक है कि सड़कों को और काट दिया जाय, ताकि ब्रितानी सरकार की पुलिस एवं सेना की ना गाडियां न आने पावे। उन्होने सागर सिंह के साथ मुगलसराय से त्र बबुरी जाने वाली सड़क को गांव के लोगों के साथ मिलकर काट री दिया। इन लोगों का लक्ष्य यह था कि चन्दौली थाने को फूंक दिया ने जाय और रेलवे लाइन उखाड़ दिया जाय। परन्तु उसी समय अपनी कोमाता की मृत्यु के कारण इन्हे अपनी यह योजना छोड़कर अपने गाव जाना पड़ा। गाव से लौटने के बाद आपने यह महसूस किया कि एक पत्रकार के रूप में वे स्वाधीनता आन्दोलन में अधिक सक्रिय ढंग से भागीदारी कर सकेंगे। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने पं० - कमलापति त्रिपाठी के सम्पादकत्व में 'आज' के सम्पादकीय विभाग में साप्ताहिक सम्पादक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। बाद में वे स्वतंत्रता प्राप्ति तक 'आज, उदयप्रताप कालेज की पत्रिका 'क्षत्रिय मित्र तथा अपने अग्रज एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ० स्वामीनाथ  सिंह द्वारा प्रकाशित 'नया हिन्दुस्तान' का सम्पादन करते रहे। स्वतंत्रता के पश्चात आपने अपने को पूर्णतः साहित्य एवं अध्यापन - कार्य से सम्बद्ध कर लिया एवं आचार्य नरेन्द्रदेव के निर्देश पर काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य करने लगे।
             इस प्रकार देखा जाय तो डॉ० शम्भुनाथ सिंह स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय योगदान देकर भी कभी स्वतंत्रता पश्चात स्वतंत्रता संनानी के रूप में स्वयं के परिचय के आग्रही नहीं रहे। न ही उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में किसी सुविधा का उपभोग करना पसन्द किया। काशी के सांस्कृतिक परिवेश को देखते हुए स्वतंत्रता आन्दोलन में डॉ० शम्भुनाथ सिंह जैसे साहित्यकार के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के इस स्वर्ण जयन्ती वर्ष में इस महान साहित्यकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके द्वारा अपनी आजन्म हिन्दी सेवा के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से प्राप्त पुरस्कार राशि द्वारा स्थापित आचार्य नरेन्द्रदेव संग्रहालय एवं तिलक पुस्तकालय, जो वर्तमान में डॉ० शम्भुनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन के अन्तर्गत कार्यरत है, को राज्य एवं केन्द्र सरकारें उचित संरक्षण एवं सहयोग प्रदान करें, जिससे हम अपने राष्ट्र की महान प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों तथा विरासत की रक्षा कर सकें।
वाराणसी,16 जून 2024