मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

व्योमवार्ता : एक बेमतलब की कहानी, अध्ययन नही अधिकार चाहिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

अध्ययन नही अधिकार चाहिये : एक बेमतलब की कहानी; व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 10अप्रैल 2018, मंगलवार
             आज सुबह सुबह टीवी चैनलों पर बिहार मे भारतबंद के सफलता के समाचार आने शुरू हो गये है, यह बंदी किसके द्वारा क्यों आयोजित है इसकी अधिकृत जानकारी किसी को नही है, कोई चैनल इसे आरक्षण का विरोध बता रहा है तो कोई 2 अप्रैल की प्रतिक्रिया, पर विरोध और रोमांच का माहौल बनाने मे कोई पीछे नही. मै आज तक समाचार स्वतंत्रता के ऑड़ मे ये समाचार चैनल्स अपनी कौन सी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हैंं. सुबह सुबह ही बगल वाले इमजीनियर साहब आ गये, गॉव से ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर साहब ने सुप्रिम कोर्ट के आदेश के विरोध पर चर्चा यह कह कर शुरू की कि जब हम सुप्रिम कोर्ट के आदेश मे भी सरकार के प्रति अपनी बेमतलब की खींझ निकालेगें तो देश के भविष्य का क्या होगा. उनके जाने के बाद बहुत देर तक मै कानून के परिप्रेक्ष्य मे आज के बंदी और एससी एसटी एक्ट मे सुप्रिम कोर्ट के दियो गये विधिनिर्देश को तौलता रहा, फिर लगा ये सारी चर्चा ही आज के निरंकुश व प्रतिशोधित राजनीति के समय बेमानी है, ऐसे मे मन मे एक कहानी बनने लगी, वो बेमतलब ही सही पर कुछ वाजिब व मतलब भरे  सवाल उठाती है. 
         गॉव के प्राईमरी स्कूल में छठी के छात्र छेदी ने चार नवा छत्तीस की जगह बत्तीस कहकर जैसे ही बत्तीसी दिखाई, गुरुजी ने छड़ी उठाई और मारने वाले ही थे कि छेदी ने कहा, "खबरदार अगर मुझे मारा तो ? मै गिनती नही जानता मगर आरटीई और अनुसूचित जाति जनजाति दलित उत्पीडन अधिनियम की धाराएँ अच्छी तरह जानता हूँ. मेरे नेता चच्चा ने मुझे आप बड़ी जातियों के अत्याचार की बातें और उनसे निपटना मुझे अच्छे से बताया है , अब मुझे भी गणित मे नही, हिंदी मे समझाना आता है."
गुरुजी चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की तरह जड़वत हो गए. जो कल तक बोल नही पाता था, वो आज आँखें दिखा रहा है! जिसके बाप को मैने पीट पीट के पढ़ा लिखा के आदमी बना दिया, उसका बेटा आज मेरे पूरे जीवन के अध्यापन को चैलेंज कर रहा है.
          शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक भी उधर आ धमके. कई दिनों से उनका कार्यालय से निकलना ही नही हुआ था. वे हमेशा विवादों से दूर रहना पसंद करते थे. इसी कारण से उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी बंद कर दिया था. आते ही उन्होंने छडी को तोड़ कर बाहर फेंका और बोले  "सरकार का आदेश नही पढ़ा? प्रताड़ना का केस दर्ज हो सकता है. रिटायरमेंट नजदीक है, निलंबन की मार पड़ गई तो पेंशन के फजीते पड़ जाएँगे. बच्चे न पढ़े न सही, पर प्रेम से पढ़ाओ. उनसे निवेदन करो. अगर कही शिकायत कर दी तो ?"
          बेचारे गुरुजी पसीने पसीने हो गए. मानो हर बूँद से प्रायस्चित टपक रहा हो! इधर छेदी "गुरुजी हाय हाय" और बाकी बच्चे भी उसके साथ हो लिए.
        प्रधानाध्यापक ने छेदी को एक कोने मे ले जाकर कहा, "मुझसे कहो क्या चाहिए?"
छेदी बोला, "जब तक गुरुजी मुझसे माफी नही माँग लेते है, हम विद्यालय का बहिष्कार करेंगे. बताए की शिकायत पेटी कहाँ है?"
        समस्त स्टाफ आश्चर्यचकित और भय का वातावरण हो चुका था. छात्र जान चुके थे की उत्तीर्ण होना उनका कानूनी अधिकार है.
बड़े सर ने छेदी से कहा की मैं उनकी तरफ से माफी माँगता हूँ, पर छेदी बोला, "आप क्यों मांगोगे ? जिसने किया वही माफी माँगे. मेरा अपमान हुआ है."
         आज गुरुजी के सामने बहुत बड़ा संकट था. जिस छेदी के बाप तक को उन्होंने दंड, दृढ़ता और अनुशासन से पढ़ाया था, आज उनकी ये तीनों शक्तिया परास्त हो चुकी थी. वे इतने भयभीत हो चुके थे की एकांत मे छेदी के पैर तक छूने को तैयार थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से गुरूता के ग्राफ को गिराना नही चाहते थे. छडी के संग उनका मनोबल ही नही, परंपरा और प्रणाली भी टूट चुकी थी. सारी व्यवस्था नियम कानून एक्सपायर हो चुके थे. कानून क्या कहता है, अब ये बच्चो से सिखना पढ़ेगा!
     पाठ्यक्रम मे अधिकारों का वर्णन था, कर्तव्यों का पता नही था. अंतिम पड़ाव पर गुरु द्रोण स्वयं चक्रव्यूह मे फँस जाएँगे!
           वे प्रण कर चुके थे की कल से बच्चे जैसा कहेंगे, वैसा ही वे करेंगे. तभी बड़े सर उनके पास आकर बोले, "मै आपको समझ रहा हूँ. वह मान गया है और अंदर आ रहा है. उससे माफी माँग लो, समय की यही जरूरत है."
        छेदी अंदर आकर टेबल पर बैठ गया और हवा के तेज झोंके ने शर्मिन्दा होकर द्वार बंद कर दिए.
    कलम को चाहिए कि यही थम जाए. कई बार मौन की भाषा संवादों पर भारी पड़ जाती है
(बनारस, 10 अप्रैल 2018, मंगलवार)
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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

मेरे बच्चे अब बड़े हो गये हैं ; व्योमेश चित्रवंश की कवितायें

मेरे बच्चे अब बड़े हो गये हैं : व्योमेश चित्रवंश की कवितायें, 06 अप्रैल, 2018, गुरूवार

बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट  के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फ़रमायशें हैं
घर मे एक बेमतलब का शोर कहीं खो गया है,
हर कोई एक गंभीरता सा ओढ़े है,
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

सुबह अख़बार के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ फ़ोटो में सिमट गयी हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं

पलक झपकते जीवन का स्वर्ण काल बीत गया
पता ही नही कि हाथ से रेत कब फिसल चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को उड़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन कहीं खो गया है

अब तो रोज सुबह शाम मेरी सेहत पूँछते हैं
डाक्टर से बातें करते है, टेस्ट कराते हैं,
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके  झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं ,दिलासा देते हैं
बताते है कि उनके फैमिली हेल्थ इंश्योरेंस
मे हम भी कवर होते है.
वे बिजी हो कर भी हमारे लिये समय गढ़ते है,
मेरे बच्चे अब बड़े हो गये हैं.

अब नही होती किताब कापी की फरमाइसें
न ही जिद कि छुट्टियों मे कहीं घूम आयें,
अब उन्हे नही रहता मतलब हमारे हिसाबों से
वे खुद व्यस्त है नेटबैंकिंग मैसेन्जर के जालों मे ,
वे मैनेज करते हैं हमारे हेल्थ, मोटर इंश्योरेंस को बिल, क्लेम से लेकर फ्लाईट, ट्रेन ,होटल को,
उनकी हमारे लिये जिम्मेदारियॉ देख,
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं
मेरे बच्चे अब बहुत बड़े हो गए  हैं
(बनारस, 06 अप्रैल 2018, गुरूवार)
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व्योमवार्ता ; बैकफुट से फ्रंटफुट के बीच भारत की पाक अरब देशों के लिये विदेशनीति...

बैकफुट से फ्रंटफुट के बीच भारत की पाक अरब देशों के लिये विदेशनीति
व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 6अप्रैल 2018, शुक्रवार
          इस देश को सबसे बड़ा नुक्सान दो प्रधानमंत्री के काल में हुआ - जिसमे पहला नाम है इंद्र कुमार गुजराल ..
इंद्र कुमार गुजराल - पैदाइशी कम्युनिष्ट जो कांग्रेस में गया और फिर जनता दल में .. 1996 में जब देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे तब कम्युनिष्टों की पसंद IK Gujral को विदेश मंत्री बनाया और तबसे ही इसने भारत के विदेश मामलों को ख़राब करना चालू कर दिया .. इसके काल में भारत पाकिस्तान से आगे की सोच ही नहीं पाया .. फिर जब ये प्रधानमंत्री बना तो इसने पाकिस्तान के साथ उस समझौते को किया जिसमे लिखा था कि भारत अपने सारे केमिकल हथियार ख़त्म कर देगा .. जबकि इसके PM बनने के पहले भारत कहता आया था कि उसके पास केमिकल हथियार हैं ही नहीं .. मतलब इस गुजराल ने विश्व में ये साबित करवाया की भारत झूठ बोलता रहा है .. एक और काम जो इसने किया वो ये कि इसने भारत के PMO से ख़ुफ़िया विभाग और RAW का पाकिस्तान डेस्क खत्म कर दिया .. August 1997 में अमेरिका में पाकिस्तान के PM से मुलाकात होते ही वहीँ से इसने आदेश किया की इसके भारत लौटने तक RAW का पाकिस्तान डेस्क ख़त्म होना चाहिए ... इसके बाद इस दौरान भारत के पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी, कुवैत, यमन, UAE आदि जगहों पर स्थित १०० के ऊपर एजेंट मारे गए .. एक हफ्ते में सारा खुफिया विभाग ध्वस्त हो गया और RAW नेस्तनाबूद हो गई .. पूरा का पूरा ख़ुफ़िया ढाँचा नेस्तनाबूद हो गया पाकिस्तान से लेकर फिलिस्तीन तक ....
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उसका नतीजा ये हुआ कि भारत को OIC इलाके में उसके खिलाफ हो रहे षडयंत्रो का पता ही नहीं चलता था ... भारत में 1997 से लेकर 2001 तक का समय बेहद कठिन रहा, भारत बिना किसी ख़ुफ़िया जानकारी के रहा और कोई ऐसा महीना नहीं गया जब भारत में बम विस्फोट से लेकर सीमा पर छिटपुट आतंकी हमले न हुए .. 1998 में वाजपेयी सरकार आई और 1999 में कारगिल हुआ, ख़ुफ़िया फेलियर पर खूब कोसा गया सरकार को लेकिन कम्युनिष्ट मीडिया ने गुजराल डोक्टराइन नामक उस बेहूदे कागज़ के पुलिन्दे को गोल कर गई जिसको उसको लेकर कम्युनिष्टों को अभी मुहब्बत है क्योंकि उसमे भारत की नाकामी है ...भारत के ख़ुफ़िया विभाग को ख़त्म करके और RAW को नेस्तनाबूक करके, उसके लोगिस्टिक को बर्बाद और एजेंटों के खात्मे के बाद हाल बहुत खराब हो गया ... Indian Airline का हाईजैक होकर कंधार जाना, संसद भवन हमला, कोइम्बटूर हमला, अक्षरधाम, लाल किला हमला आदि होता गया और भारत सरकार पूरे 3 वर्ष तक कुछ जान ही नहीं पाई ख़ुफ़िया से ... अटल सरकार ने आने के कुछ महीने में ही फिर से RAW का पाकिस्तान डेस्क और इंटेलिजेंस का OIC विंग चालू किया था जिसको भारत में ही खड़ा करने में 2002 तक का समय लग गया .. फिर उसका विदेशों में एजेंट बनाना आदि करते करते 2004 में अटल सरकार चली गई ... लोगों को अक्सर कारगिल और IC814 के हाईजैक को लेकर अटल सरकार पर हमला करते पाया जाता है लेकिन गुजराल के कारनामे ने भारत का जो नुक्सान कराया उस पर कभी बात ही नहीं हुई ....
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पेट्रोल डीज़ल, आलू - मटर - टमाटर के भाव, IT के स्लैब में बदलाव और एरियर को अपना सबसे बड़ा समस्या समझने वाली जनता को पता ही नहीं कि देश को असुरक्षा के किस दल दल में धकेल दिया गया था ... समय रहते अटल सरकार ने कदम उठाया लेकिन ध्वस्त करना आसान है, खड़ा करना मुश्किल - वो भी ख़ुफ़िया जैसा विभाग जिसमे कई वर्ष लगते हैं एक एजेंट खोजने में ...
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अगले है हमारे ईमानदार प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ... जिन पर कोई छीटा नहीं पड़ता .. ये अगर दिल्ली के नज़फगढ़ नाले में कूद के निकलें तो भी गंगोत्री में नहाए जैसे साफ़ निकलते हैं .... इन्होने गुजराल जैसा तो नहीं किया और RAW तथा intelligence तो टच नहीं किया लेकिन पाकिस्तान और भारत के कम्युनिष्टों के बनाए भंवरजाल और जालसाज़ी को खूब ढील दिया .. इन्होने intelligence और सुरक्षा विभाग को इस लायक न छोड़ा की देश में मुंबई का हमला से लेकर अनेकों शहरों, ट्रेनों में बम विस्फोट को न पहले जान पाए और न रोक पाए ....
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2007 - 2008 के आस पास पाकिस्तान के लाहौर में एक घटना घटी ... पाठ्यपुस्तकों में भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु तथा सुखदेव के लिए लिखा गया कि "भगत सिंह और उसके दो काफिर साथियों ने पडोसी देश के आज़ादी के लिए काम किया, उस देश के लिए जो हमारा दुश्मन है और जिसकी आज़ादी की लड़ाई से हमें कोई सरोकार नहीं, हम उनके बारे में क्यों पढ़े ... ये उनके हीरो हैं, हमारे हीरो हमारे खुद के देश में हैं जिनको हम पढ़ेंगे ... " .. इस तरह के मामले की शुरुवात होंने के खिलाफ मोर्चा खोला पाकिस्तान के मशहूर columnist और लेखक हसन निसार ने ... हसन निसार खुले मंचों पर भगत सिंह को पाकिस्तान देश की आज़ादी का सिपाही और हीरो घोषित करने लगे ... उन्होंने लाहौर चौक का नाम भी भगत सिंह चौक रखने का मांग रखा ..... इस सबके बीच ये बात चलाई गई कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि दोनों देश के लोगों में कोई संवाद नहीं है .. दोनों देश के लोगों के बीच संवाद बढ़ना चाहिए .. इस संवाद को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान के अखबार The Jung और भारत के Times of India ने आपस में मिल कर कार्यक्रम चालू किया ... गायक, कलाकार, खिलाड़ी लोगों का आना - जाना, मुशायरों का आयोजन ... सब चालू किया ... बस यहीं पर पाकिस्तान ने भारत के अंदर बहुत अंदर तक घुसपैठ कर लिया ... पाकिस्तान से जो आते थे वो सब ISI की निगरानी में उनके सिखाए, उन पर निगाह रखने वाले, और सीधे ISI एजेंट उनके मैनेजर आदि के रूप में खूब आए .. भारत के intelligence और RAW को इनके दूर रहने का आदेश मनमोहन सरकार ने दिया .. सरकार ख़ुफ़िया विभाग से पाकिस्तान की तरफ से आने वाले लोगों की लिस्ट से लेकर कार्यक्रम आदि सब छिपा के रखती थी ... उधर से आए ये ISI के एजेंट यानी "अमन की आशा" गिरोह पूरे भारत की रेकी करते, अपने स्लीपर सेल बनाते और निकल जाते और फिर पीछे से भारत में मुम्बई हमला, कई अलग अलग शहरों में बम ब्लास्ट, कश्मीर में बेरोक टोक हमले कराते रहते .. कश्मीर में तैनात सेना पर इल्जाम लगा के जेल में डालना आदि जैसे कारनामे मनमोहन सरकार ने अंजाम दिए इसी कम्युनिष्टों के "अमन की आशा गैंग के निर्देश पर ... भारत की अधिकतर मूर्ख जनता इन अमन की आशा वालों के जाल में फंसी हुई नुसरत फतह अली आदि के गीतों पर झूमती ... जबकि उसका खरीदा हर एक CD /DVD का पैसा पाकिस्तान परस्ती और उसके अपने ही सेना के खून बहाने में लगता ..

इधर से जो जाते थे उनको पाकिस्तानी पश्तून - कश्मीरी - अफगानी - उक्रैन की लड़कियां, महँगी शराब .. महँगी घडिया आदि देकर अपने ओर रखते थे .. अय्याशी के गर्त में डूबे इन अन्धों और लालची अमन की आशा वाले लोगों ने इस कांसेप्ट के कारण खूब पलीता लगाया देश को ... इस गैंग को प्रायोजित करने का काम भी मनमोहन सरकार ने किया है ... पाकिस्तान में हुए भगत सिंह वाली घटना के बाद ही भगत सिंह को आतंकवादी बताने वाले कम्युनिष्टों ने उनको अपना हीरो बनाकर पेश करना चालू किया .. कम्युनिष्टों के पाकिस्तानी मिलीभगत से किए जा रहे इस जालसाज़ी को बाद में खोलेंगे ...
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इधर 4 साल से अमन की आशा गैंग का धंधा बंद है .. कश्मीर में आतंकी मारे जा रहे हैं .. देश में गड़बड़ी फैलाने से पहले स्लीपर सेल वाले दबोच लिए जा रहे हैं .. पत्थरबाज बक्शे नहीं जा रहे हैं .. मनमोहन सरकार द्वारा फंसाए गए सारे सेना के अफसर आदि न्यायालय से बरी किए जा रहे हैं ... पाकिस्तान और म्यांमार सीमा पार करके आतंकियों के खिलाफ सेना सर्जिकल स्ट्राइक कर रही है ... पाकिस्तानी गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दे रहा है .. कुछ हफ्ते पहले पाकिस्तानी मीडिया मोदी सरकार आने के बाद अपने 1600 के ऊपर सैनिक मारे जाने का दावा करके कृन्दन कर रही थी ... भारत अपनी सुरक्षा के लिए फ्रंट फुट पर खेल रहा हैं .. अभी भारत को ऐसे ही करना चाहिए ... यूँ ही नहीं पाकिस्तान से लेकर चीन मीडिया में रोज एक प्रोग्राम मोदी पर होता ही है ..
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(बनारस, 6अप्रैल 2018,शुक्रवार)
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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

व्योमवार्ता : अंधे के दिखाये शहर के रस्ते पर.....

अंधो के दिखाये शहर के रस्ते पर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 03 अप्रैल 2018,मंगलवार
सुबह के अखबार की बाकी खबरें ऱात मे पढ़ रहा हूँ, कल की घटना को लेकर नाना प्रकार के दृष्टिकोण, पर सभी सच से कोसों दूर, मुद्दो से हट कर मुद्दा विहीन राजनीति, अपने ही लोगों को भरमाने की कोशिश, तथ्य कोझुठलाते अपने अपने सत्य, राजनीति किस अंधे  मोड़ तक ले आयी है हमें,
                  ढेरो बड़े बड़े भरमाते वादों के पीछे के सच को सोच कर कुढ़न भी हो रही है व गुस्सा भी आ रहा है पर क्या फायदा? आज हमारे समाज को अंधो के दिखाये शहर के रस्ते पर चलने की आदत पड़ गई है. आप भी सोचिये इस सच को झुठलाने की राजनीति.
           9 महिलाओं सहित 299 सदस्यों वाली संविधान सभा के अध्यक्ष बाबू राजेंद्र प्रसाद थे । कुल 23 कमेटियां थीं । इन में एक ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष भीमराव रामजी आंबेडकर थे । सिर्फ़ ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन संविधान निर्माता का दर्जा कैसे पा गया , मैं आज तक नहीं समझ पाया । जगह-जगह संविधान हाथ में लिए मूर्तियां लग गईं । तो राजेंद्र प्रसाद सहित बाकी सैकड़ो सदस्य क्या घास छिल रहे थे । अगर कायस्थों में थोड़ी महत्वाकांक्षा जाग जाए और कि वह भी बाबू राजेंद्र प्रसाद का संविधान कहने लग जाएं तब क्या होगा ? आख़िर वह संविधान सभा के अध्यक्ष रहे थे । जब की आंबेडकर सिर्फ़ ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष । दिलचस्प यह कि संविधान सभा के पहले अध्यक्ष सच्चिदानंद सिनहा भी कायस्थ थे । फिर अच्छा-बुरा यह भारत का संविधान है , किसी आंबेडकर का संविधान नहीं । और वह लोग अंबेडकर का नाम सब से ज़्यादा लेते हैं जिन को उन के पूरे नाम में रामजी का जुड़ जाना ऐसे दुखता है गोया कलेजे में कांटा चुभ गया हो । भीमराव रामजी आंबेडकर लिखते ही कितनों के प्राण सूख गए । तब जब कि संविधान पर तमाम दस्तखत के साथ आंबेडकर के भी दस्तखत हैं । भीमराव रामजी आंबेडकर । महाराष्ट में परंपरा है कि मूल नाम के बाद पिता का नाम भी लिखा जाता है । रामजी आंबेडकर के पिता का नाम है । लेकिन यह कमीनी राजनीति है जो भारत के संविधान को आंबेडकर का संविधान कहने की निर्लज्ज मूर्खता की जाती है और सारी कुटिल राजनीतिक पार्टियां और ज़िम्मेदार लोग ख़ामोश रहते हैं । ऐसे ही आंबेडकर के नाम में रामजी नाम भाजपा सिर्फ़ दलितों का वोट जाल में फंसाने के लिए जोड़ती है और बाक़ी पार्टियां यह सही होते हुए भी ऐसे भड़क जाती हैं गोया लाल कपड़ा देख कर सांड़ ! बाकी आंबेडकर को बेचने वाले दुकानदारों की तो बात ही निराली है । गोया अंबेडकर की दुकान खोल कर वह आंबेडकर को बेचने के लिए ही पैदा हुए हैं । कि बड़ी-बड़ी कारपोरेट कंपनियों के मैनेजिंग डायरेक्टर और चेयरमैन पानी मांगें ।
(बनारस,03 अप्रैल 2018, मंगलवार)
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गुरुवार, 29 मार्च 2018

व्योमवार्ता ; स्वामी दयानंद को पढ़ते हुये...... ; व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 19मार्च 2018, सोमवार

स्वामी दयानंद को पढ़ते हुये.......
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             वैदिक समाज व्यवस्था को वैदिक वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। वर्ण का अर्थ चुनना या चयन करना होता है। ब्राह्मण आदि श्रेष्ठ वर्णों का चयन मनुष्य को अपने गुण, कर्म व स्वभाव सहित अपनी योग्यता के अनुसार ही करना होता है । सभी मनुष्य विद्यालय जाते हैं । एक कक्षा में औसत तीस से पचास विद्यार्थी पढ़ते हैं । स्कूल के अध्यापक कक्षा के सभी बच्चों को समान रूप से पढ़ाते हैं परन्तु जब परीक्षा होती है तो कोई 99 प्रतिशत अंक लाता है, कुछ लोग उससे कुछ कम, कुछ 40 से 60 प्रतिशत के मध्य लाते हैं और कुछ 40 से भी कम प्रतिशत अंक लाते हैं । इससे यह ज्ञात होता है कि सभी बच्चों व विद्यार्थियों में समान योग्यता नहीं होती । जिन बच्चों को परिवार में अच्छी सुविधायें मिलती हैं उनमें भी किसी की अध्ययन में अधिक रूचि होती है और किसी की नहीं होती । हमलोगों द्वारा अपने साथ पढ़ने वाले सुखी व समृद्ध परिवारों के बच्चों के अपेक्षा गरीब परिवार के बच्चों से भी कम अंक व उन्हें कक्षा में असफल होते देखा जा सकता है । इससे अनुमान होता है कि एक समान आयु के सभी बच्चों की शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक योग्यता समान नहीं होती । हमसब यह भी जानते हैं कि समाज में सभी मनुष्यों का विद्वान होना सम्भव नहीं है । यदि हो भी जायें तो भी समाज चलेगा नहीं । समाज में विद्वानों की आवश्यकता है भले ही वह शारीरिक दृष्टि से शक्तिहीन ही हों, वहीं समाज को बलशाली व अल्प ज्ञानी लोगों की आवश्यकता भी होती है जो छोटे मोटे श्रम, कृषि, सेवा, घर की सफाई, रसोई आदि अनेक प्रकार के काम कर सकें ।
             वैदिक समाज व्यवस्था में मनुष्यों का वर्गीकरण उनके ज्ञान, गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार किया जाता रहा है और इसी को वर्ण व्यवस्था कहते हैं, जैसा कि ऊपर समझाया गया है । वैदिक व्यवस्था इस बात को भी स्वीकार करती है कि सभी बच्चों को अनिवार्य, निःशुल्क व समान शिक्षा बिना किसी भेदभाव से दी जाये । सभी मनुष्यों को विद्या प्राप्त करने का उतना ही अधिकार है जितना किसी राजपुरुष या अन्य साधन सम्पन्न व्यक्ति को ।
      प्राचीन काल में गुरुकुलों में शिक्षा पूरी होने पर स्नातक बने युवाओं का वर्ण निर्धारण किया जाता था । विद्या व आचरण में श्रेष्ठ को ब्राह्मण की संज्ञा होती थी, बलवान व अन्याय दूर करने के कार्यों में रूचि रखने वाले पठित व विद्वान मनुष्यों की क्षत्रिय संज्ञा होती थी । वैश्य उन युवाओं का वर्ण निर्धारित होता था जिन्होंने अन्यों के समान ज्ञान प्राप्त किया हो परन्तु उनकी रूचि वाणिज्य, व्यापार, गोपालन, कृषि आदि कार्यों में हो। इसके साथ ही जो बालक व युवा अपनी कमियों के कारण विद्या प्राप्त नहीं कर पाते थे उन्हें शूद्र संज्ञा से पुकारा जाता था । यह वर्ण गुरुकुलों के आचार्यों व राजव्यवस्था से निर्धारित होते थे ।  शिक्षा पूरी करने पर जिस प्रकार स्नातक व स्नात्कोत्तर के प्रमाण पत्र मिलते हैं, जिनसे स्नातक की योग्यता का ज्ञान होता है, उसी प्रकार आचार्य आदि से प्राप्त वर्ण से भी मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव का ज्ञान होता था । वैदिक काल व महाभारत से कुछ सौ वर्ष पूर्व तक चारों वर्ण परस्पर सहृदयता व प्रेम से मिलकर एक साथ रहते थे । चारों वर्णों में परस्पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था । महाभारत युद्ध के समय यह व्यवस्था कुछ कुछ क्षीण होने लगी थी जो बाद में ध्वस्त प्रायः हो गयी और एक नई व्यवस्था जिसे जन्मना जाति व्यवस्था कह सकते हैं, समाज में प्रचलित हो गई । यह जाति व्यवस्था वैदिक वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप कहा जा सकता है ।
           ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में वर्णव्यवस्था की चर्चा की है । वह कहते हैं कि विवाह वर्णानुक्रम से होने चाहियें और वर्णव्यवस्था भी गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार होनी चाहिये। यह बता दें कि ऋषि दयानन्द ने जन्मना जातीय व्यवस्था को अपने साहित्य में कहीं पर भी स्वीकार नहीं किया है। वह सर्वत्र वर्णव्यवस्था की बात ही करते हैं। वह कहते हैं कि जब तक सब ऋषि-मुनि राजा महाराज आर्य लोग ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के ही स्वयंवर विवाह करते थे तब तक इस देश की सदा उन्नति होती थी। जब से यह ब्रह्मचर्य से विद्या का न पढ़ना, बाल्यावस्था में पराधीन अर्थात् माता पिता के आधीन विवाह होने लगा, तब से क्रमशः आर्यावर्त देश की हानि होती चली आई है । इससे इस दुष्ट काम (माता-पिता द्वारा अपनी सन्तानों के विवाह का निर्धारण जिसमें वर्ण अर्थात् गुर्ण, कर्म व स्वभाव की उपेक्षा होती है) को छोड़ के सज्जन लोग अपने वर्ण की कन्या व वर से स्वयंवर विवाह किया करें । आज का समाज ऋषि दयानन्द के विचारों को अपना रहा है । आजकल सन्तानें जो विवाह करती हैं उन्हें स्वयंवर विवाह कहा जा सकता है क्योंकि उसका निर्धारण व चयन सन्तानों के अधिकार में होता है। सन्तान भी अपने समाज व अपने से श्रेष्ठ युवक व युवती से विवाह करना चाहते हैं । समाज में विगत 50-60 वर्षों से यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है जो स्वागतयोग्य है। इससे जन्मना जाति व्यवस्था कुछ सीमा तक ध्वस्त हो रही है ऐसा अनुमान होता है ।
            वैदिक वर्णव्यवस्था में वर्ण परिवर्तन हुआ करता था, इसका संकेत व प्रमाण भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत किया है। वह प्रश्नोत्तर शैली में प्रश्न करते है कि क्या जिसके माता-पिता ब्राह्मण हों वह ब्राह्मणी अथवा ब्राह्मण होता है और जिसके माता-पिता अन्य वर्णस्थ हों उनका सन्तान कभी ब्राह्मण हो सकता है ? .... इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं कि हां बहुत से  (शूद्र आदि अन्य वर्णों के लोग ब्राह्मण) हो गये, होते हैं और होंगे भी। जैसे छान्दोग्य उपनिषद में जाबाल ऋषि अज्ञातकुल, महाभारत में विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण और मातंग ऋषि चाण्डाल कुल से ब्राह्मण हो गये थे। अब भी जो उत्तम विद्या स्वभाव वाला है वही ब्राह्मण के योग्य और मूर्ख शूद्र के योग्य होता है और वैसा ही आगे भी होगा। इसके बाद ऋषि दयानन्द ने मनुस्मृति के श्लोक को उद्धृत कर बताया है कि अध्ययन करने व कराने से, विचार करने कराने, नानाविध होम के अनुष्ठान, सम्पूर्ण वेदों को शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, स्वरोच्चारणसहित पढ़ने पढ़ाने, पौर्णमासी, इष्टि (अमावस्या व पूर्णिमा) आदि के करने, विधिपूर्वक धर्म से सन्तानोत्पत्ति, ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ, अग्निष्टोमादि यज्ञ, विद्वानों का संग व सत्कार, सत्यभाषण, परोपकारादि सत्कर्म और सम्पूर्ण शिल्पविद्यादि पढ़के दुष्टाचार छोड़ श्रेष्ठाचार में वर्त्तने से यह मानव शरीर ब्राह्मण का किया जाता है अर्थात् अन्य वर्ण के मनुष्य का शरीर इन उपायों से ब्राह्मण का हो जाता है ।
     ऋषि दयानन्द ने जन्मना वर्ण व्यवस्था व रज वीर्य के संयोग से वर्णाश्रम व्यवस्था मानने का खण्डन करते हुए एक प्रबल तर्क दिया है। वह लिखते हैं कि जो कोई रज वीर्य के योग से वर्णाश्रम-व्यवस्था माने और गुण कर्मों के योग से न माने तो उससे पूछना चाहिये कि जो कोई अपने वर्ण को छोड़ नीच, अन्त्यज अथवा क्रिश्चियन, मुसलमान हो गया हो उस को भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते? यहां यही कहोगे कि उस ने ब्राह्मण के कर्म छोड़ दिये इसलिये वह ब्राह्मण नहीं है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो ब्राह्मणादि उत्तम कर्म करते हैं वे ही ब्राह्मणादि और जो जन्म से निन्दित कुल का व्यक्ति भी उत्तम वर्ण के गुण, कर्म, स्वभाव वाला होवे तो उसको भी उत्तम वर्ण में और जो उत्तम वर्णस्थ होके नीच काम करे तो उसको नीच वर्ण में गिनना अवश्य चाहिये । ऋषि दयानन्द ने आपस्तम्ब ऋषि के सूत्र का उल्लेख कर उसका तात्पर्य बताते हुए कहा है कि उनके अनुसार धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जावे कि जिस-जिस के योग्य होवे ।
             शूद्र के कर्तव्यों का उल्लेख कर ऋषि दयानन्द जी लिखते हैं कि शूद्र सब सेवाओं (श्रमिक के कामों) में चतुर, पाक विद्या में निपुण, अति प्रेम से द्विजों की सेवा (सहयोग) और उन्हीं से अपनी उपजीविका करे और द्विज लोग इसके खान, पान, वस्त्र, निवास, विवाहादि में जो कुछ व्यय हो सब कुछ देवें अथवा मासिक (वेतन) कर देवें । चारों वर्ण परस्पर प्रीति, उपकार, सज्जनता, सुख, दुःख, हानि, लाभ में ऐकमत्य रहकर राज्य और प्रजा की उन्नति में तन, मन, धन का व्यय करते रहें ।
        वेद से लेकर दर्शन, उपनिषद सभी प्रमुख ग्रन्थों में मानव समाज में भेदभाव, शोषण, अन्याय आदि का कहीं उल्लेख नहीं है। यजुर्वेद का एक मन्त्र चारों वर्णों एवं इतर सभी मनुष्यों को वेदाध्ययन का अधिकार देते हैं। वेदाध्ययन का अर्थ है कि ब्राह्मण आदि उच्च वर्ण को धारण करने का अधिकार देते हैं। हमने वर्णव्यवस्था विषयक कुछ बातें ही यहां प्रस्तुत की हैं । पाठकों को इसके लिए सत्यार्थप्रकाश का चतुर्थ समुल्लास पढ़ना चाहिये । वर्तमान आर्य व हिन्दू समाज में जन्मना जाति व्यवस्था के लिए वेद, मनुस्मृति आदि कारण नहीं अपितु मनुष्यों की अविद्या व स्वार्थ आदि की प्रवृत्ति कारण है।
      स्वार्थी लोगों ने मनुस्मृति में अपने आशय के प्रक्षेप भी किये हैं। बुद्धिमान लोगों का काम सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना होता है। वर्तमान में भी ऐसा ही किया जाना चाहिये । वर्तमान में पं. राजवीर शास्त्री जी , लाला दीपचन्द आर्य जी एवं डा. सुरेन्द्र कुमार जी के पुरुषार्थ से मनुस्मृति का शुद्ध संस्करण उपलब्ध है। इससे सभी लोग लाभ उठा सकते हैं ।
        आज का युग ज्ञान का युग है । संविधान ने सबको उन्नति के समान अवसर दिये हैं। आर्थिक कारणों से बहुत से लोग अपनी सन्तानों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते । वैदिक काल में यह अव्यवस्था नहीं थी । कृष्ण जी व निर्धन सुदामा जी एक साथ एक ही गुरु से निःशुल्क पढ़े थे। ऐसा कोई प्रमाण भी नहीं है कि वैदिक काल में किसी प्रतिभा से युक्त बालक को अध्ययन की सुविधा न प्राप्त हुई हो । अतः लोगों को वेद और मनुस्मृति के विषय में अपने पूर्वाग्रहयुक्त विचारों का त्याग कर आर्यसमाज से मिलकर देश व समाज की उन्नति में सहयोग करना चाहिये ........
    क्योंकि सबकी उन्नति में ही देश की उन्नति व व्यक्ति की निजी उन्नति भी सम्मिलित है। यदि देश व समाज कमजोर होगा तो हमारी निजी उन्नति किसी काम की नहीं होगी ?......
स्वामी दयानंद जी ने आर्य समाज के नियम मे कहा था "प्रत्येक मनुष्य को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।" यदि हम इस सच को स्वीकार  कर लें तो हमारी स्वयं की ही नही हमारे लोगों की भी काफी समस्याओं का समाधान हो जायेगा।
(बनारस, दयानंद जयंती, चैत्र प्रतिपदा, सं0 2075 वि0)
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