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शनिवार, 29 मार्च 2025

व्योमवार्ता/ नये साल की पहली सुबह...../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1जनवरी 2023

नये साल की पहली सुबह/व्योमेश चित्रवंश की डायरी..

नये साल की पहली सुबह
ढेर सारे कुंहासे और धुंध से भरी
नही दिख रहे कोहरे से
सड़क पर चहलकदमी करते लोग
वे बच्चे भी नही
नये साल पर खुशियाँ मनाने वाले
आटो वाला टोपी पर मफलर बांधे
मुंह से धूंआ फेकते
कर रहा है सवारियों का इंतजार
धुले धुलाये आटो पर तिरंगा झण्डा संग
गैस वाला गुब्बारा लगाये
चूने से लिख कर 
हैप्पी न्यू ईयर 2023
चौराहे के एक कोने पर 
उजाड़ होते चितवन के नीचे 
जल रहे लकड़ी के बोटे के पास
खड़े बीट के सिपाहियों के संग
सिमटे सुकड़े बैठे है
काले भूरे कलुआ औ भूरा
उन्हे इंतजार है नुक्कड़ की दुकान पर
जलेबी कचौड़ी छनने और 
उसके फेंके हुये दोनो का
अखबार का बंडल बांधे 
निकल चुके है हाकर
मंदिर की सेवा करने वाले पंडितजी भी.
दोनो को जल्दी है खबरे पहुंचाने की
नेकी की दीवार के पास 
सोया पड़ा है मन्तोषवा
फिर कहीं से दारू पी कर
सब कुछ वैसे ही है
जैसे कल था
न कोरोना का खौफ
न कोई हड़बड़ी
घरों मे रजाई मे दुबके 
रविवार मना रहे लोगों को 
अब नही इंतजार है किसी 
बिग ब्रेकिंग का
सब कुछ सामान्य सा
हर कोई आराम से
चल रहा है
साल बदल रहा है
हम नही......
- #व्योमेश_चित्रवंश
(काशी,1जनवरी 2022, पौष शुक्ल दशमी सं०2079वि०)
#व्योमवार्ता




मंगलवार, 10 जनवरी 2023

व्योमवार्ता/ भारतीय इतिहास के नाम पर क्या परोसा गया....../व्योमेश चित्रवंश की डायरी,10जनवरी2023

🚩 *एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 ncert की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं!*  
       👉 जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में  लिखा है कि "आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयां मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयां मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थी।"
स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में है वे कोई नई नहीं है, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।
ऐसे ही वे आगे लिखते हैं "युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख देते थे, शेष जनता में बांट दिया जाता था।" यहां भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।
आगे एक जगह लिखा है "पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।"
आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है "खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।"
तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, उसने ncert में आरटीआई डाली कि इन बातों का आधार क्या है? आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।
जानकर आश्चर्य होगा कि ncert ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि ncert हमें इनका जवाब नहीं दे रही। कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और ncert को जवाब देने के लिए कहा। तब ncert ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।
ऋग्वेद में इंद्र को एक यौद्धा बताया गया है और उसमें आये #नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।
इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो  जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है?
संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है।
इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया?
तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।
कोर्ट -"और जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बांट लेते थे, उसका आधार क्या है?"
जेएनयू -"चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बांट रहे हैं।"
अब जेएनयू और ncert के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें!!
Ncert आगे कक्षा 11की हिस्ट्री में लिखती हैं "गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर #कुछ_खास_नहीं_कर_सका।
यहां ncert के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।
सच्चाई यह है कि ncert के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दुधर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।
सोनिया गांधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही है, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।
और हां, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि है। वे यूट्यूब पर हैं।
http://chitravansh.blogspot.com
(काशी,10जनवरी 2023,मंगलवार)
#नीरज_अत्री
#व्योमवार्ता

मंगलवार, 28 जून 2022

व्योम वार्ता / वे चिट्ठीयां.........

वे चिट्ठियाँ.......

वो चिट्ठियाँ कहाँ खो गईं,
जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे,
कुशलता की कामना से शुरू होते थे,
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे…
और बीच में लिखी होती थी जिन्दगी..
नन्हें के आने की खबर,
माँ की तबीयत का दर्दं,
और पैसे भेजने का अनुनय,
अपनी गाय गौरी व कुत्ते शेरू के हाल
फसलों के खराब होने की वजह।
कितना कुछ सिमट जाता था,
एक नीले से कागज में,
जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती,
और अकेले में आँखों से आँसू बहाती।
माँ की आस थीं ये चिट्ठियाँ,
पिता का सम्बल थीं ये चिट्ठियाँ,
बच्चों का भविष्य थीं ये चिट्ठियाँ,
और गाँव का गौरव थीं ये चिट्ठियाँ…
डाकिया चिट्ठी लाएगा
कोई बाँच कर सुनाएगा
देख-देख कर चिट्ठी को,
कई-कई बार छू कर चिठ्ठी को,
अनपढ़ भी अपनों के
एहसासों को पढ़ लेते थे
अब नही आती वे चिट्ठीयां,
न ही रहता है डाकिये भैया का इंतजार
जो सिर्फ चिट्ढी ही नही लाते थे 
बल्कि ले आते थे रिश्तों की गरमाहट
मन की ढेरों संवेदनायें
और चिट्ठियों के संग ढेर सारी खुशियाँ
अपनों संग बीतने वाली सुख दुख की आशंकायें

अब तो स्क्रीन पर अँगूठा दौड़ता है,
और अक्सर ही दिल तोड़ता है,
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो,
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है,
सब कुछ सिमट गया छै इंच में,
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में,
जज्बात सिमट गए मैसेजों में,
चूल्हे सिमट गए गैसों में,
और इंसान सिमट गया पैसों में...!!
(वाराणसी,28जून2022,मंगलवार)
http://chitravansh.blogspot.com

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

व्योमवार्ता /काँन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझे..

कान्वेंट शब्द के मायने.

                सोशल मीडिया भी अकसर महत्वपूर्ण जानकारियां व सूचनायें दे जाता है। आज ऐसे ही यह छोटा सा लेख फेसबुक पर किसी ने लगाया था। पढ़ कर जिज्ञासा हुई तो गुगल बाबा और विकीपिडिया से तथ्यों का सत्यापन किया। मेरा यह दावा नही है कि गुगल और विकिपीडिया पर तथ्य प्रामाणिक ही होगें पर तथ्यों के ऐतिहासिक संदर्भ उन्हे गलत भी नही सिद्ध करते। बहरहाल फेसबुक पर मिली पोस्ट ज्यों की त्यों रख रहा हूं  इसमे कोई तथ्यपरक जानकारी द्वारा सार्थक परिमार्जन, परिवर्द्धन, संशोधन होने पर संभवतः तथ्यों मे ज्ञानवृद्धि ही होगी।
    ‘काँन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।
ब्रिटेन में एक कानून था *लिव इन रिलेशनशिप* बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना। जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।
अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज _अवैध हैं उनके लिए काँन्वेंट बने।
                     उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है ना ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज। इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन् 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था। परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।
जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वो लिखता है कि:
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा।
इनको अपने मुहावरे नहीं मालुम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा। अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा?
लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”। दुनियाँ में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।
भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं। आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल, माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल। अब इन मूर्खो को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना?
दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजो का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने वो सभी चीजो को पोषित और संचित किया। और हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलामी सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।
(काशी,18मार्च2022,होली)
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#व्योमवार्ता
#कान्वेण्ट की #हकीकत
#गुलामी_मानसिकता

रविवार, 11 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ आर्य सनातनी ही भारत के मूल निवासी है़ंं

व्योमवार्ता/आर्य(सनातनी) ही भारत के मूल निवासी है/ व्योमेश चित्रवंश की डायरी 11जुलाई2021

     नये नये नेता बने एक मित्र कभी कभी हमसे #राजनीतिक_बहस करना चाहते हैं।आजकल के राजनीतिक गणित के जमाने के हिसाब से खुद को #नवबौद्ध कहते है। नेता है तो अब तक चल रहे सभी स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाना लाजमी है।सत्ता के विरोध मे है तो भारतीय जनता पार्टी के साथ साथ #भारतीय_संस्कृति, #भारतीय_इतिहास के विरोघ मे बोलना व #कम्यूनिष्ट_विचारधारा का समर्थन करना उनका राजनीतिक घर्म व कर्तव्य बन गया  है । कल बहस कर रहे थे कि केवल #आदिम_जनजातिया़ ही #भारतीय है बाकी सभी बाहरी है। #आर्य बाहर से आये। मै आज तक ये नही समझ पाया कि ये कथित नेता, नवबौद्ध , #धर्मांतरित_ईसाई, पांच सात पीढ़ी #इस्लाम बने कतिपय लोग कैसे यहां के आर्य #मूल_निवासियो़ से स्वयं  को पृथक कर किस #डीएनए_विश्लेषण के आधार पर  अपने को मूल #आदिम_भारतीय बताते हैं?
         बहरहाल इस तरह के  लोगों से मैं प्राय: सुना करता हूं कि आर्य बाहर से आये । पर ये लोग #रोमिलाथापर, #ईरफानहबीब, #मैक्समूलर के #स्वविरोधाभाषी व #भ्रामक सिद्धान्तो को भी स्पष्ट नही कर पाते। मैं आज उनसे एक बेहद व्यवहारिक बात पूछना चाहता हूँ।
                  #सिकंदर बाहर से आया, राजा #पुरु से युद्ध हुआ । #मुहम्मद_बिन_कासिम आया, राजा #दाहिर से युद्ध हुआ । मुहम्मद #गौरी आया, #पृथ्वीराज से युद्ध हुआ । #बाबर आया, #राणासांगा से युद्ध हुआ । #अकबर से #महाराणाप्रताप का युद्ध हुआ और अकबर से ही रानी #दुर्गावती का भी युद्ध हुआ । #औरंगजेब से #शिवाजी का युद्ध हुआ ।
  अब #अंग्रेजों पर आते हैं ।
अंग्रेजों से रानी #लक्ष्मीबाई का युद्ध हुआ । अंग्रेजों से #तात्याटोपे का युद्ध हुआ । अंग्रेजों से #नानासाहेब का युद्ध हुआ । उसके बाद बहुत से क्रांतिकारी हैं जो हमसब जानते होंगे ।
सवाल ये है कि
अगर आर्य बाहर से आये ! तो कौन सा #आर्य राजा या #हमलावर आया?
    किसी एक का नाम बता दीजिए, उससे जिसने युद्ध किया होगा उसका भी नाम बता दीजिए।
या फिर !
#झूठी_अफवाह, फैलाना बन्द करिए।
     #आर्यों को विदेशी बताना, अंग्रेजो और #वामपंथी_लेखको का षड्यंत्र था । आर्यों के विदेशी होने की झूठी बाते #NCERT की किताबों में इस देश की आर्य(हिंदू)जाति को बतायी जाती है, पढ़ाई जाती है और इस देश के युवा बिना सोचे समझे उसी को सच मान बैठते हैं ।
          इस देश में सैकड़ों ऐसी #खुदाई हो चुकी हैं जिनसे साफ हो चुका है कि आर्य #विदेशी नहीं, इसी देश के #मूल_निवासी हैं । #हड़प्पा और #मोहनजोदड़ो की श्रेष्ठ #सभ्यता भी आर्यो द्वारा ही बसाई गयी हैं । विश्वास ना हो तो #राखीगढ़ी में जो खुदाईयाँ हुई हैं,  उन्हे देखिये।उनसे साफ हो चुका है कि आर्य (सनातनी) भारत के ही मूलनिवासी हैं ।
#व्योमवार्ता
(काशी, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा, सं०२०७८वि० तदनुसार 11जुलाई 2021, रविवार)
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सोमवार, 3 अगस्त 2020

व्योमवार्ता/ यादें यूपी कालेज की...(७)

यादें यूपी कालेज की...(७) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, ३अगस्त २०२०

 छात्रसंघ चुनाव हो चुका था, हम लोग गोरखपुर विश्वविद्यालय के नियमानुसार दोसाला से तीन साला बीए के पार्ट 1 मे तकनीकी रूप से डाल दिये गये थे पर व्यवहारिक रूप से ढेर सारी परेशानियॉ, उहापोह, सिलेबस की दिक्कतें चल रही थी। लगभग सात आठ महीना पुराने सिलेबस को पढ़ने के बाद दो ढाई महीने मे नये सिलेबस को पढ कर परीक्षा देना खड़े पहाड़ पर चढ़ने जैसा था। हम लोगों के साथ कक्षा कर रहे ओल्ड स्टूडेंट के लिये और भी मुश्किल था, उनका बीए दो साल के बजाय अब चार साल मे पूरा होने वाला था। इसमे कई ऐसे भी थे जिनका नया नया विवाह हुआ था और उनकी पत्नी विद्यापीठ या कानपुर, फैजाबाद जैसे विश्वविद्यालय से बीए पढ़ रही थी, उन बेचारों को लग रहा था कि जब तक वे बीए करेगें तब उनकी पत्नी बीए पास कर एमए भी कर लेगी। पति बीए पत्नी एमए भारतीय पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार मे तब यह डूब मरने की बात थी। ओल्ड स्टूडेंट्स वे होते थे जिन्हे परीक्षा मे असफल होने पर कालेज के नियमानुसार निकाल दिया जाता। वे अगले साल पुन: वही परीक्षा व्यक्तिगत परीक्षार्थी के  रूप मे देते और पास होने पर अगले साल फिर से प्रवेश ले नियमित छात्र बन जाते। ऐसे छात्रो को गुरूजन उनके आग्रह पर नियमित छात्रो के साथ कक्षाएँ करने की अनुमति दे देते थे। बीए तीनसाला कोर्स को न लागू करने के लिये आपस मे विचार कर हम लोगों ने एक प्रार्थना पत्र अपने प्रिंसपल डॉ०ओ पी एस सेंगर को देने का निश्चय किया। सेंगर साहब द्वारा लाईब्रेरी वाले प्रकरण मे निर्णय से मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ था। जब हम अपना एप्लीकेशन ले कर प्रिंसपल साहेब के पास गये तो नियम कानून के पक्के सेंगर साहब ने  इसे यूनिवर्सिटी का विशेषाधिकार बताते हुये हम लोगों की बातें सुनने से ही स्पष्ट इंकार कर दिया। नीचे आने पर  ओल्ड स्टूडेंट्स ने राय दिया कि हम लोगों को डीएम को पत्रक देना चाहिये वहॉ से वह मुख्यमंत्री राज्यपाल तक चला जायेगा और सत्र पुन: दोसाला हो जायेगा। उन लोगों ने कई जगहों का नाम लेकर उदाहरण दिया कि ऐसा फलॉ ढेकॉ जगहो पर हो चुका है। उनके अनुभव व उदाहरण से प्रभावित हो कर हमने तुरंत प्रिंसपल का नाम काट कर उस पर जिलाधिकारी वाराणसी लिखा और कचहरी चल पड़े। शुरूआत मे कालेज गेट से निकलते समय हम लोग लगभग १५०-६० रहे होगें पर कचहरी पहुंचते पहुंचते १५-१६ रह गये थे। डीएम आफिस के सामने नीम के चबूतरे पर बैठे हम लोग डीएम साहब की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी एक वकील साहब आ कर हम लोगों से हमारे जुटने का कारण व समस्या पूछने लगे। उन्होने हम लोगों का पूरा सहयोग देने की बात कहते हुये बड़े गर्व से बताया कि वे भी यू पी कालेज के छात्र रहे हैं। पर वकील साहब का सपोर्ट हम लोगो के लिये कुछ ज्यादा ही भारी पड़ा। हुआ यूं कि उन्होने रोज कचहरी मे अड़ी जमाने वाले संकठा सर और गणेश सर को जा कर हम लोगों की तारीफ करते हुये सारी बात बताई तो वे दोनो लोग वास्तविकता जानने वहीं डीएम साहब के आफिस के सामने नीम वाले चबूतरे पर ही चले आये। तब तक मेरे साथ वालो की संख्या १५-१६ से ५-६ हो गई थी। जब संकठा सर हमारे पास आये और सारी बात समझा तो   बस एक ही वाक्य मे उन्होने हमे  वापस जाने का निर्णय सुना दिया। हम लोग कुछ कहने को सोचे पर उनके गंभीर चेहरे पर बड़ी बड़ी ऑखों मे दिख रहे नाराजगी से हमे लग गया कि हम लोगों से कुछ गलती हो गई है। दूसरे दिन सुबह संकठा सर की प्रिंसिपल्स आफ इकोनामिक्स की  पूरी क्लास नैतिकता,सिद्धान्त, सदाचार, शिकषकों के मान सम्मान,विद्यालय के गौरव और यूनिवर्सिटी के नियम कानून पर ही चलती रही और हम सिर झुका कर सुनते रहे। मजा यह कि इस पूरे प्रकरण के रायदेहिन्दान ओल्ड स्टूडेंट्स मौका और वारदात दोनो से गायब रहे।
जनवरी के घोर कुहरे भरी ठण्ड मे एक दिन जब हम सुबह ७ बजे  ठिठुरते हुये इकोनामिक्स के क्लास मे पहुंचे तो सारे डेस्कों पर "नगीना" छपे हुये छोटे छोटे पोस्टर लगे हुये थे। तब लहुराबीर के प्रकाश सिनेमा मे रिषी कपूर और श्रीदेवी की ब्लाकब्लस्टर फिल्म नगीना चल रही थी जिसे हमारे क्लास के कुछ सहपाठियों ने सामूहिक रूप से देखा था। यह नगीना काण्ड उस वर्ष काफी चर्चित रहा। संकठा सर के क्लास मे आने से पहले ही हम लोगों ने फटाफट उन छोटे पोस्टरों को उखाड़ कर फेंक दिया कि पुन: एक दिन की कक्षा मे अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों की बलि सदाचार और शिष्टाचार की भेंट न चढ़ जाये।
उसी साल की एक और शरारत,फीस की अगली किस्त जमा करनी थी, तभी शुल्कमु्क्ति के लिये आवेदन निकला। सबकी देखा देखी हमने भी फार्म भर दिया। लालच यह था कि फीस के पैसे बच जायेगें तो वह अपना होगा। साप्ताहिक सिनेमा देखने वाले कार्यक्रम जारी रखने मे उससे आसानी रहेगी। हम लोग हर बुधवार को कालेज के बाद १२से ३ वाला शो देखने जाया करते। एक साईकिल पर दोहरी ताकि स्टैंड का पैसा बचे और अमेरिकन स्टाईल मे टिकट। अमेरिकन स्टाईल मे एक लड़के को सभी अपने अपने हिस्से का पैसा दे देते थे और वह एक साथ सबका टिकट लेता था। लौटते रास्ते मे एक समोसा और लौंगलता का पैसा अलग से।  हालॉकि घर से फीस का पूरा पैसा मिल चुका था पर दोस्तों के सोहबत मे फीसमाफी का फार्म भरने की बात घर पर हमने नही बताया। फीसमाफी के लिये इंटरव्यू होता था जिसमे छात्र से उसके पिछले अंक, पारिवारिक स्थिति, चाल चरित्र आदि पर विचार कर फीस माफ की जाती थी, एक बार फीसमाफी के बाद बाकी के साल भी माफी बनी रहती। इंटरव्यू लेने वाले गुलाब सिंह सर थे। वे हमारे अर्थशास्त्र के शिक्षक होने के नाते अच्छे तरह जानते पहचानते थे। जब उन्होने फार्म मे मेरे गॉव का नाम देखा तो गॉव सहित परिवार और बाबा चाचा के बारे मे पूछने लगे। असलियत पता चली कि वे मेरे क्षेत्र के ही रहने वाले थे और मेरे पूरे परिवार को जानते थे, तो उन्होने सीधे कह दिया कि "तुम्हे फीसमाफी की जरूरत नही है, तुम पूरी फीस दे सकते हो।" अब यह मेरे लिये झटका था क्योंकि मेरे अधिकांश मित्रों की फीसमाफी हो चुकी थी। मैने कोई चारा न देख आखिरी अस्त्र दागा, " सर , फीस तो घर से आ गई थी, पर वह हमने खर्च कर दिया है। ऐसे मे फीस माफी नही हुई तो मुझे आप से उधार लेना पड़ेगा।" गुलाब सर ने मुझे नीचे से ऊपर दो बार देखा फिर मुस्कराते हुये बोले, "ठीक है, इस बार माफ कर दे रहा हूँ पर अगली बार ऐसा नही करूगॉ।"
मै खुशी खुशी इंटरव्यू वाले कमरे से बाहर आया और  इस फीसमाफी की खुशी मे बुधवार  के साप्ताहिक सिनेमा के अतिरिक्त शुक्रवार को  हमने अपने पैसे से नान अमेरिकन स्टाईल मे "मेरा हक" दोस्तों के साथ देखा और समोसा लौंगलता तो सिनेमा के पैकेज मे शामिल था ही।

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शनिवार, 1 अगस्त 2020

व्योमवार्ता/ ट्वेल्थ फेल, एक अच्छा व रोचक उपन्यास 

व्योमवार्ता/ ट्वेल्थ फेल, एक अच्छा व रोचक उपन्यास : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,1जुलाई 2020

शनिवारीय लाकडाऊन मे आज अनुराग शर्मा की ट्वेल्थ फेल पढा। आईपीएस मनोज शर्मा पर आधारित “12th Fail Book”- ट्वेल्थ फेल उपन्यास” मे कैसे एक 12 वी फ़ैल पुलिस सेवा में आईपीएस अधिकारी बना की कहानी बेहद रोचक ढंग से लिखी गई है । बुंदेलखण्ड के मुरैना के जौरा कस्बे के परिवेश और भाषा से शुरू हुई कहानी यूपीएससी मे बैठे साक्षात्कारमण्डल के सदस्यों के हमारे गॉवो के प्रति नजरिये का बेहतरीन चित्रण है।
                जब हम छोटे होते हैं, तबसे ही हमसे डाक्टर, इंजीनियर और पायलट बनने की उम्मीद की जाने लगती है। और हमारे घर के सभी लोग हमारे बड़े और समृद्ध इंसान होने की कामना करने लगते हैं।यही बात हमारे मन मस्तिष्क में भी बैठ जाती है। और हम भी बड़े होकर डाक्टर इंजीनियर कलेक्टर पाईलट आईएएस पीसीएस बनने का इरादा कर लेते हैं। और बड़ा आदमी बनने के सपने मन मे  बना लेते  हैं। और जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं। हमारे सपनो का सफर कठिन होता जाता है।
ऐसे ही संघर्ष की कहानी हम आपको आज बताने जा रहे हैं। यह कहानी मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के IPS मनोज शर्मा की है। वर्तमान में मनोज शर्मा मुंबई पुलिस में एडिशनल कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं।उनके जीवन के संघर्ष पर लिखा गया यह उपन्यास ट्वेल्थ फेल पठनीय है।
(बनारस, 1जुलाई 2020)
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शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की.....(५) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

संस्थापन समारोह का अखिल भारतीय कविसम्मेलन
व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की (५) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १७ जुलाई २०२०

           तीन दिन बाद समापन समारोह मे २५ नवंबर की रात मे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होना था। तब इस तरह के समारोहों के लिये कालेज गेस्ट हाऊस , द्वितीय छात्रावास और पुराने लाईब्रेरी भवन के बीच बड़े मैदान मे विशाल पाण्डाल लगाया जाता था।  आज भी कार्यक्रम निम्मित बना पक्का चबूतरा वहॉ मौजूद है।  पूरा पण्डाल खचाखच भर जाता था न सिर्फ छात्रों से बल्कि कालेज के अगल बगल १-२ किलो मीटर मे रहने वाले परिवारों से, महिला बच्चों के साथ लोग कालेज के कार्यक्रमों को देखने को आते थे और कवि सम्मेलन के दिन तो पूछो मत, लगता था पूरे बनारस की भीड़ इकट्ठी हो गई हो। मेरे ख्याल से वरूणा पार का यह तब का सबसे बड़ा साहित्यिक समारोह होता था। उसी पाण्डाल मे बने मंच से हमें पहली बार डॉ० गोपाल दास नीरज, डॉ० शंभुनाथ सिंह, भूषण त्यागी, सूड़ फैजाबादी, कैलाश गौतम, श्री कृष्ण तिवारी के साथ चकाचक बनारसी को सुनने का मौका मिला। गीतकार पं० श्रीकृष्ण तिवारी जी मंच संचालन कर रहे थे। जिन कवियों का हमने अब तक मात्र नाम सुना था वे हम लोगों के सामने मंच पर साक्षात विराजमान थे।इसी मंच पर हमने डॉ०शंभुनाथ सिंह के गांभीर्यपूर्ण स्वरों मे

"देश है हम मगर राजधानी नही
हम बदलते हुए भी न बदले कभी
लड़खड़ाए कभी और सँभले कभी
हम हज़ारों बरस से जिसे जी रहे
ज़िन्दगी वह नई या पुरानी नहीं ।
हम न जड़-बन्धनों को सहन कर सके,
दास बनकर नहीं अनुकरण कर सके,
बह रहा जो हमारी रगों में अभी
वह ग़रम ख़ून है लाल पानी नहीं ।

और
"समय की शिला पर मधुर चित्र कितने,
किसी ने बनाये किसी ने मिटाये ,
किसी ने लिखी ऑसूओं की कहानी,
किसी ने पढा सिर्फ़ दो बूं पानी।
इसी मे गये बीत दिन जिंदगी के,
गयी धुल जवानी, गयी मिट निशानी
.....शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

तथा डॉ० गोपाल दास नीरज की थरथराती आवाज में

"स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।"

और
दीप को अपना बनाने को पतंगा जल रहा है,
बूंद बनने को समुन्दर का हिमालय गल रहा है,
प्यार पाने को धरा का मेघ है व्याकुल गगन में,
चूमने को मृत्यु निशि-दिन श्वास-पंथी चल रहा है,
है न कोई भी अकेला राह पर गतिमय इसी से
मैं तुम्हारी आग में तन मन जलाना चाहता हूं।
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं॥

सुना। हमारे कला संकाय के डीन डॉ० विश्वनाथ प्रसाद ने भी अपनी कविता पढ़ी थी, "जीभ पर ताले दिये, चुप थे नही अच्छा किया, चीखते तुम भी सड़क पर आ गये अच्छा किया"। भूषण त्यागी, हलचल मिर्जापुरी, सूंड़ फैजाबादी, राजशेखर, कमल नयन मधुकर , सावित्री गौड़ की कवितायें तो मुझे अब याद नही है पर पं० हरिराम द्विवेदी के भोजपूरी गीत "

कविता के रस होला सँझिया बिहनवाँ
गउवाँ के गितियन में बसैला परनवाँ
गीतन से करैलें सिंगार हो ,
बाबा मोर आवैं बखरिया॥" 

और कैलाश गौतम की "गॉव गया था गॉव से भागा" के बाद "अमवसा क मेला" की कुछ पंक्तियॉ आज भी याद आते ही मन मुस्करा उठता है,

"एही में चम्पा-चमेली भेंटइली.
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली.
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें,
दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें.
असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अबतक पठवलू.
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं,
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं.
हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानऽ
हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानऽ.
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की.
मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो.
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै."

शायद उसी साल डॉ० बुधिनाथ मिश्र भी आये थे, यह तो पक्का याद नही, पर उनकी कविता

"एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो!
सपनों की ओस गूँथती कुश की नोक है
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
इस अँधेर में कैसे नेह का निबाह हो।

वाली कविता पंक्ति मुझे आज भी याद है। इन कविताओं ने मेरे साहित्यिक रूचि की नींव रखी जो मुझे बरबस ही हिन्दी साहित्य की ओर खींचती गई और भविष्य मे मेरे जीवन मे साहित्य से कोई सरोकार न होते हुये भी बड़ी काम की साबित हुई। कवि गोष्ठी की मनभावन लहरों मे जब श्रोतागण पूरे तरह डूब उतरा रहे थे तो इन श्रोताओं मे पीछे बैठे छात्र श्रोताओं का अपना अलग अंदाज था जो मेरे लिये अप्रत्याशित, नवीन और मजेदार था। जब किसी कवि की सराहना करती होती तो पीछे के छात्र श्रोताओं से एक स्वर मे काशी की पहचान वाला बाबा भोलेनाथ का स्वर उठता " हर हर महाााा देव " और इस लपेटें मे कभी कभार नये, छोटे, कम चर्चित मझोले कवि आ जाते तो पीछे से बनारस की पहचान शंख घोष मे कोरस होता " भाग भाग ......के" थोड़ी देर की देखा देखी के बाद हम नये छात्र श्रोता भी इस कोरस मे अपना योगदान देने लगे। जब कई छोटे मंझोले कविगण बनारसी शंखघोष के बहाव मे नही चल पाये तो संचालक पं० श्रीकृष्ण तिवारी जी द्वारा काशिका के मशहूर हास्यकवि चकाचक बनारसी को इस शोर को शांत कराने के लिये बुलाया गया। चकाचक जी ने आते ही पहले काशिका बोली मे छात्रों से संवादसंबंध स्थापित किया और फिर  अपनी हँस हँस कर लोटपोट करा देने वाली रचना सुनाई,

बदरी के बदरा पिछयउलेस,
सावन आयल काऽ।
खटिया चौथी टांग उठेउलस,
सावन आयल काऽ।
मेहराये के डर से माई लगल छिपावै अमहर,
भईया के बहका फुसला के भउजी भागल नइहर,
सांझै छनी सोहारी दादा तोड़ लियइलन कटहर,
बाऊ छनलन ललका दारू बनके बड़का खेतिहर,
बुढ़िया दादी कजरी गईलेस,
सावन आयल काऽ।
गुद्दड़ क चौउथी मेहररूआ मेंहदी सुरूक लियाईल,
सास क ओकरे कानी अंगुरी सड़-सड़ के बस्साइल,
झिंगुरी के घर भुअरी बिल्ली तिसरे बार बियाइल,
रामभजन क नई पतोहिया झूलै के ललचाईल,
धनुई फिर गोदना गोदवउलेस,
सावन आयल काऽ।
चमरउटी कऽ उलटल पोखरी मचल हौऽ छूआछूत,
खेलत हौऽ धरमू पंडित कऽ बेवा धईलेस भूत,
ननकू के ननका के मुंह पर मकरी देहलस मूत,
छींकत हौ जमिदार क बिटिया गईल खुले में सूत,
पटवारी के दमा सतउलेस,
सावन आयल काऽ।
सांझ के अहिराने में गड़गड़ गड़गड़ बजल नगाड़ा,
कलुआ गनगनायके नचलेस लगल किजइसे जाड़ा,
ओकरे साथे अन्हऊ पंडित नचलन तिरछा आड़ा,
लोटा लेके दउड़त हंउवन उखड़ल ओनकर नाड़ा,
उन्हें गांव भर दवा बतउलेस,
सावन आयल काऽ।
मुखिया के बखरी पर भर-भर चीलम उड़ल खमीरा,
उनके पिछवारे मेघा के लपक के धईलेस कीरा,
एक कोठरी में मुखियाइन के उठल कमर में पीरा,
लगत हौऽ राजा कजरी होई बाजल ढोल मजीरा,
पुरुवा भक दे गैस बुझउलेस,
सावन आयल काऽ।
अभी हम लोग हँसते और हर हर महादेव का हुंकारा भरते कुर्सी पर सीधे भी नही हुये थे कि  चकाचक चचा ने माहौल का रूख पहचान प्रासंगिक कविता सुनाया

जवन पटाका मारब सरऊ मुंह से फेकबा प्रान
तब  तू होश मे अईबा बच्चू जगजीत सिंह चौहान

बाद मे श्रोताओं के मॉग पर उनकी ई राजा काशी हौ वाली कविता का पाठ तो होना ही था।

मचर मचर पुरवटवा बोले,सरर सरर फगुनहटी |
चरर चरर चमरौधा बोले,झलके लाल लंगोटी |
- ई राजा काशी हौ
ठहर ठहर के पान घुलाव,बगली दाब बंसौटी |
लहर लहर के राग अलाप,छान छान के बूटी |
-ई राजा काशी हौ
लहर लहर केशरिया छानब,ई तन अइसे छूटी |
लाख सुरहतिंन घेरैं बाकी ,बँधले रहब लंगोटी |
-ई राजा काशी हौ
चना चबेना गंगाजल हौ,गमछा अउर लंगोटी |
संतोषी जिउ मिलिहें तोके खा खा नून और रोटी |
-ई राजा काशी हौ

चकाचक जी के हर छंद के बाद 'ई राजा' बोलते ही श्रोताओं की भीड़ साथ देती "काशी हौ"। किसी स्थानीय कवि के लिये श्रोताओं का यह उन्माद अद्भुत था। चकाचक जी जब बैठने को हुये तो भीड़ उन्हे बैठाने को तैयार नही थी और उन्हे अपनी एक और कविता का पाठ करना ही पड़ा,

"का रे तेजुवा खोल केवाड़ी,आयल हौ जजमान चकाचक //
तीरथ बरत करै वाला हौ,चौचक में रूपया वाला हौ
तनी दाब के खींच रे सरवा,सुच्चामाल गले वाला हौ
सौ पचास क आपन गोटी,सच्चे में बैठे वाला हौ
और देख भड़के न पावे,हफ्तन से ठाले ठाला हौ
आज लगत हौ की खुश हउवन,अपनन पर भगवान चकाचक //
एहरओहर मतदेख होजजमान,भनाभन बढ़ते आव
बाबा क दरबार इहाँ हौ,बत्तीस गंडा इहाँ चढ़ाव
माई क भण्डार इहाँ हौ,सोरह गंडा इहाँ चढ़ाव
छोट मोट देवी देवतन पर,पंचपंच गंडा रक्खत आव
अब त बस हमही रह गइली ,दस क पत्ती एहर बढ़ाव
,बाबा के छाया में अइला,होई हो कल्याण चकाचक //
देख रे ऊ यात्री भटकल हौ,बढ़के तनी बोलाव
मेहररुआ टौटेक हौ,अपने कोठरी में ठहराव
यात्री के तू रगड़ के बूटी,विधी से आज छनाव
रगड़ के बीया चार धतूरा क ओम्मन घोरवाव
छनते सरवा गिर जाई तब,मेहररुआ हथियाव
काशी में त होत रहेला,तन मन धन क दान चकाचक //
का रे तेजुवा खोल केवाड़ी,आयल हौ जजमान चकाचक //...
       बाद के वर्षों मे चकाचक बनारसी मेरे रिश्तेदार निकले और उनसे रम्मन चाचा वाला संबंध जीवन पर्यन्त बना रहा।इसी तरह पं० हरिराम द्विवेदी से आकाशवाणी मे बना चचा भतीजा वाला संबंध और डॉ० शंभुनाथ सिंह जी से स्नेहिल दुलार पाने का सौभाग्य भी मिला। ऊपर से कठोर व सख्त दिखने वाले और अंदर से स्नेह और आशीष उड़ेलने वाले नारियल सदृश व्यक्तित्व के धनी डॉ० शंभुनाथ सिंह जी कब राजू भैया @rajeev के बाबूजी के साथ मेरे लिये भी बाबूजी बन गये पता ही नही चला। बाद के वर्षों मे राजीव भैया ने उनकी स्मृति में साहित्य, समाज और पुरातत्व के लिये समर्पित वाराणसी के प्रतिष्ठित डॉ०शंभुनाथ सिंह रिसर्च फाउण्डेशन से हमें जोड़ा जो आज तक बरकरार है और राजीव भैया आज भी मेरे बड़े भाई की भूमिका मे सदैव मेरे लिये उपलब्ध रहते है।
यह सारी उपलब्धियॉ यूपी कालेज की ही देन है जो मुझ अकिंचन को संभवतः कहीं और प्राप्त होना संभव नही थी।
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क्रमश: ......
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