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मंगलवार, 28 जून 2022

व्योम वार्ता / वे चिट्ठीयां.........

वे चिट्ठियाँ.......

वो चिट्ठियाँ कहाँ खो गईं,
जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे,
कुशलता की कामना से शुरू होते थे,
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे…
और बीच में लिखी होती थी जिन्दगी..
नन्हें के आने की खबर,
माँ की तबीयत का दर्दं,
और पैसे भेजने का अनुनय,
अपनी गाय गौरी व कुत्ते शेरू के हाल
फसलों के खराब होने की वजह।
कितना कुछ सिमट जाता था,
एक नीले से कागज में,
जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती,
और अकेले में आँखों से आँसू बहाती।
माँ की आस थीं ये चिट्ठियाँ,
पिता का सम्बल थीं ये चिट्ठियाँ,
बच्चों का भविष्य थीं ये चिट्ठियाँ,
और गाँव का गौरव थीं ये चिट्ठियाँ…
डाकिया चिट्ठी लाएगा
कोई बाँच कर सुनाएगा
देख-देख कर चिट्ठी को,
कई-कई बार छू कर चिठ्ठी को,
अनपढ़ भी अपनों के
एहसासों को पढ़ लेते थे
अब नही आती वे चिट्ठीयां,
न ही रहता है डाकिये भैया का इंतजार
जो सिर्फ चिट्ढी ही नही लाते थे 
बल्कि ले आते थे रिश्तों की गरमाहट
मन की ढेरों संवेदनायें
और चिट्ठियों के संग ढेर सारी खुशियाँ
अपनों संग बीतने वाली सुख दुख की आशंकायें

अब तो स्क्रीन पर अँगूठा दौड़ता है,
और अक्सर ही दिल तोड़ता है,
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो,
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है,
सब कुछ सिमट गया छै इंच में,
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में,
जज्बात सिमट गए मैसेजों में,
चूल्हे सिमट गए गैसों में,
और इंसान सिमट गया पैसों में...!!
(वाराणसी,28जून2022,मंगलवार)
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गुरुवार, 4 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती

#व्योमवार्ता/ यह सड़क मेरे गांव को नही जाती / व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 4मार्च 2021


कल सायं प्रख्यात हिन्दी समीक्षक,लेखक और गुरूवर डाॅ०राम सुधार सिंह सर Ram Sudhar Singh ने फोन कर यह सड़क मेरे गांव को नही जाती के लिये यह कहते हुये बधाई दिया कि "अभी तुम्हारी किताब पढ़ के उठा हूँ,आज से पहले ग्रामीण जीवन पर इससे सुंदर व भावप्रधान संस्मरण मैने नही पढ़ा था।" लगे हाथ मैने सर से समीक्षा की माँग कर डाली तो सर ने आश्वस्त किया है कि हफ्ते दस दिन मे वे लिख देगें।

राम सुधार सर के समीक्षा की प्रतीक्षा की हमारी उत्सुकता इसलिये महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे मेरे शुरूआती लेखन को ऊंगली पकड़ कर सिखाने और सुधारने वालों मे से हैं। विश्वास है कि सर की समीक्षा फिर कुछ नया सिखलायेगी।
🙏आपके स्नेह से अभिभूत हूँ सर🙏
(बनारस,4 मार्च 2021, गुरूवार)
#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती
#व्योमवार्ता



शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/ न्याय दिलाने वालों का वर्तमान संघर्ष : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24 अप्रैल 2020

न्याय दिलाने वालों का वर्तमान संघर्ष

                                                                      *व्योमेश चित्रवंश

          कोरोना संकट से देश को लाकडाऊन हुये एक महीने से ऊपर हो गया है, पर देश की अदालतों मे यह लाकडाऊन उससे भी दो तीन दिन पहले ही शुरू हो गया था यदि हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहॉ की अदालतें कमोबेस होली की छुट्टियों से ही लाकडाऊन का दंश झेलने लगी थी। होली की छुट्टी के बाद 14 व 15 मार्च को दूसरे शनिवार व रविवार का अवकाश था।16 मार्च को प्रदेश बार कौंसिल के आह्वान पर अधिवक्तागण न्यायिक सेवा से विरत रहे। 17 मार्च से उच्च न्यायालय के आदेश से केवल अत्यावश्यक मामलों , स्टे व जमानत पर सुनवाई किये जाने के आदेश के साथ ही न्यायिक प्रक्रिया मे किसी भी कागजात का आदान प्रदान, पत्रावलियों पर हस्ताक्षर आदि बंद कर दिये गये और 23 मार्च की आधी रात से पूरे देश मे लाकडाऊन के चलते अदालतों के ताले बंद कर दिये गये। तब से यह व्यवस्था फिलहाल 27अप्रैल तक जारी है और उम्मीद है कि अभी कम से कम 3 मई तक, और आवश्यकतानुसार आगे भी अदालतों मे यह लाकडाऊन जारी रहेगा। कोरोना से बचाव के लिये यह आवश्यक भी था क्योंकि न्यायालय परिसर किसी जनपद का वह महत्वपूर्ण और सबसे भीड़ भाड़ वाला स्थान है जहॉ पूरे जनपद से विभिन्न वर्ग के लोग विभिन्न स्थानों से विभिन्न प्रकार से आते है ऐसे मे संक्रमण की सबसे ज्यादा संभावनाएं वहॉ मिल सकती है। परन्तु इस लाकडाऊन ने न्यायालयों पर आधारित सेवा से आय उपाार्जन करने वालों के समक्ष घोर अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है । यह संकट मात्र आर्थिक नही वरन मनोवैज्ञानिक व सामाजिक भी है, साथ ही साथ इसके सांस्कृतिक पहलू भी है जो हमारे समावेशी आश्रित जीवन व्यस्था पर प्रभाव डाल सकते हैं। यह एक व्यापक सोच का विषय है।
            अदालतों मे काम कर रहे सेवारत सरकारी या न्यायिक कर्मचारियों के अतिरिक्त शेष सभी रोज कमाओ रोज खाओ वाली आय व्यय व्यवस्था पर निर्भर है। इनमे प्रशिक्षु से लेकर वरिष्ठ अधिवक्तागण, उनके मुंशी के अतिरिक्त कचहरी मे टाईप , फोटोस्टेट करने वाले, स्टांप वेन्डर, फोटोग्राफर, स्टेशनरी विक्रेता, मुहर बनाने वाले, चाय पान फल विक्रेता, कोट बैण्ड बेचने वाले, किताब बेचने वाले, साईकिल स्टैण्ड चलाने वाले, मोबाईल रिचार्ज करने वाले, जमीन व बाकी चीजों के दलाल सभी शामिल है। इसके अलावा भी इन न्यायिक परिसरों पर अपने पेट के लिये आश्रित एक वर्ग और है जो कचहरी का हिस्सा न होते हुये भी कचहरी से रोजी रोटी पाता है। इनमें घूम घूम के जूता पालिस करने वालों से लेकर परिसर के किसी कोने मे बैठ कर जादू मदारी दिखाने वाले, घूम घूम कर सामान बेचने वाले, भीखमंगे, और कुछ भी नही कर के केवल चौकी चौकी घूम कर सलाम कर सौ पचास रूपये पाने वाले भी है। एक महत्वपूर्ण वर्ग आउटसाईडर के संख्या को भी इसी मे सम्मिलित करने की जरूरत है जो न्यायालयों के बाबूओं से लेकर, रिकार्डरूम, डीएम कार्यालयों लगायत तहसील के लेखपालों के अवैधानिक सहायकों के रूप मे लिखने पढ़ने से लेकर फील्ड ड्यूटी तक के सभी कार्य करती है। आज की तारीख मे यह संपूर्ण व्यवस्था व लोग हाँथ पर हाँथ धरे बैठे हुये है। दुर्भाग्य यह है कि यह पूरा वर्ग असंगठित है जिसमे मात्र अधिवक्ताओं व स्टांपवेंडरों को छोड़ न तो किसी का पंजीकरण न है न संगठन। ईमानदारी से अपने कौशल व मेहनत से काम करने वाले ये ज्यादातर लोग समाज के उस वर्ग से है जिनके पास न तो राशन कार्ड है न ही कोई सरकारी सुविधा वाली व्यवस्था। ऐसे मे रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाला यह वर्ग अपने जीवन के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। अब उनके ऑखों के सपने भी मरने लगे है। आर्थिक वर्ष के शुरूआत मे ही यह बुरा दौर उनके लिये तब आया है जब उन्हे अपने आने वाले भविष्य के लिये अपने बच्चों के लिये नये सत्र मे प्रवेश लेना था। नये यूनिफार्म बनवाना था, नयी किताब कापी खरीदनी थी नये सपने देखने थे पर अब ये अब सूनी ऑखों के सपने है। वह स्वयं के अंतस से ही जूझ रहा है। आर्थिक तंगी के साथ वह मानसिक रूप से परेशान है जिससे निकलने का रास्ता वह नही ढूढ़ पा रहा है ।
      इस पूरी व्यवस्था के सबसे बड़े अंग और व्यवस्था की धूरी अधिवक्ता वर्ग की भी स्थिति बहुत अच्छी नही है। अपने अपने घर परिवार मे बैठे अधिवक्ता आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं । आलमारी मे जमा मुकदमों की पत्रावलियॉ और हैंगर मे लटके कोट आज उन्हे बोझ लग रहे है जो उनके पारिवारिक बोझ को हल्का करने मे अक्षम हो गये हैं। 'वकील साहब' का सम्मान बचाने के लिये वह स्वयं के  प्रति खुद को बेचारा अनुभव कर रहा है। उसकी मुश्किल यह है कि वह अपनी व्यक्तिगत दुश्वारियों को खुल कर किसी से कह भी नही सकता। सरकार इस वर्ग से अधिवक्ता कल्याण के नाम पर शुल्क, कोर्ट फीस, सहयोग राशि लेती तो है पर इस वर्ग पर वह उन्ही की राशि को खर्च नही करना चाहती। अधिवक्ता अधिनियम के  अन्तर्गत भी इस तरह के किसी आकस्मिक संकट के लिये कोई विशेष प्रावधान नही है और स्थानीय बार संघ आपसी राजनीति और स्वयं के विरोधाभासों मे इस तरह उलझे है कि उनसे किसी तरह की सहायता की उम्मीद ही बेमानी है। दुर्भाग्य यह है कि राजनीति मे शुरू से दबदबा व दखलन्दाजी रखने वाले  इस व्यवसाय के प्रतिनिधि जो वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था मे असरदार व अच्छे पदों पर है वे भी अपने लोगों के प्रति उदासीन है। अधिवक्ता वर्ग के साथ एक और बड़ी समस्या है समाज मे उनके प्रति अविश्वास, इसी कारण बैंक एवं वित्तीय संस्थान उन्हे ऋण आदि देने से कतराते है ।उनके लिये स्वयं की कोई सहकारी संस्था नही है जो वक्त बेवक्त उन्हे आवश्यक वित्तीय सहायता कर सके। और तो और उनके व परिजनों के  स्वास्थ्य और चिकित्सा हेतु भी सरकारी अथवा गैरसरकारी रूप से कोई योजनाएं नही है।
                       विधि व्यवसाय बेहद गलैमरस होने के बावजूद बहुत कठिन तपस्या एवं त्याग वाला व्यवसाय है । दूसरो को न्याय दिलाने के लिये प्रतिदिन संघर्ष करने वाला अधिवक्ता समाज स्वयं को स्थापित करने के लिये जो संघर्ष करता है वह पेशापर्यन्त चलता रहता है। कनिष्ठ अधिवक्ता से वरिष्ठ अधिवक्ता तक चलने वाले संघर्ष से इतर आज इस संकट से सभी अधिवक्ता समान रूप से जूझ रहे हैं।वर्तमान समय मे मुकदमों के प्रस्तुतीकरण को देखा जाय तो न्यायालय मे चलने वाले साठ प्रतिशत मुकदमे कचहरी के बीस प्रतिशत वरिष्ठ अधिवक्ताओं के डायरियों मे हैं। शेष चालीस प्रतिशत मुकदमें बाकी अधिवक्ताओं के पास है ऐसी स्थिति मे चालीस प्रतिशत अधिवक्ता लगभग सदैव कार्य के अभाव मे रहते है। इनमे भी कनिष्ठ अधिवक्ताओं के लिये बड़ी विषम स्थिति होती है। यह भी देखा जा रहा है कि पिछले दशक मे विधि संस्थाओं के भारी संख्या मे बिना गुणवत्ता के पनपने से पेशे के प्रति अगंभीर अधिवक्ताओं का भी इस पेशे मे प्रवेश हुआ है। इसके लिये भारतीय एवं प्रादेशिक विधिज्ञ परिषद को विचार करना होगा पर फिलहाल वह विचारणीय तथ्य नही है।
                                  आज की समस्या यह है कि समाज मे इस सम्मानित व रसूखदार व्यवसाय की अंदरूनी समस्याओं का समाधान किस तरह हो, कुछ स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ एवं सक्षम अधिवक्तागण इस आपदा मे सहयोग देने के लिये अपने स्तर से प्रयास कर रहे है पर वह नाकाफी है ।अधिवक्ता की गरिमा,आत्मसम्मान एवं आत्मस्वाभिमान भी उन्हे इस तरह के सहायता लेने मे आड़े लग रहे है। वे अपने  संठनों अपने विधिज्ञ परिषदों व सरकार से अवश्य सहयोग की प्रत्याशा मे है जो उनके स्वाभिमान का सम्मान करते हुये एक उचित सहायता वृत्ति देकर उन्हे इस आर्थिक संकट से उबार सके। यह संकट मात्र आर्थिक ही नही , आने वाले निकट भविष्य मे आर्थिक अनिश्चितता के प्रति भी उन्हे डरा रहा है। निश्चित ही अदालते खुलने पर उन्हे व्यवस्थित होने मे थोड़ा समय लगेगा ओर मुकदमे लड़ रहे मुवक्किल जो स्वयं आर्थिक संकट और नकदी मुद्रा का अभाव झेल रहे है वे अधिवक्ताओं को उनका विधिक शुल्क पर्याप्त रूप से दे पायेगें ऐसी संभावना दूर दूर तक दिखाई नही देती। यह स्थिति तब तक चलती रहेगी जब तक जनसामान्य मे नकदी मुद्रा सामान्य तौर पर प्रसारित व प्रचालित न  होने लगे। जिस तरह से सारे कारोबार उद्योगधंधे बंद पड़े है उससे अभी इस तरह के सुचालित नकदी  मुद्रा के प्रसार की संभावनाएं दूर दिख रही है। संतोष इस बात का है कि कृषि क्षेत्र के कार्य चल रहे है जिससे आने वाले दिनों मे उद्योग व सेवा की गति  को त्वरा दिया जा सकता है। सरकार भी जब संगठित से लेकर असंगठित क्षेत्रों पर ध्यान देते हुये उनके लिये विशेष पैकेज एवं अवसर दे रही है ऐसे मे उसे अधिवक्ताओं एवं उनसे जुड़े कर्मचारियों एवं आश्रित कर्मियों पर ध्यान देना होगा ताकि समाज को न्याय दिलाने वाला यह वर्ग अपने स्वाभिमान को बरकरार रखते हुये अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
(बनारस, 24 अप्रैल 2020, शुक्रवार)
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शनिवार, 18 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / भूख का ईमान (लघुकथा) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17अप्रैल 2020

लघुकथा/

                        भूख का ईमान

                                               -व्योमेश चित्रवंश

"आज तुम्हारे तरफ तो सामान बॉटने वाली गाड़ी गई थी ?" बर्तन मॉजने वाली के आते ही मेरी पत्नी ने उत्सुकता जताई।

"जी भाभी, सबको राशन का पैकेट दिया था।"

"तुम्हे मिला?" पत्नी ने पूछा।

"नही, हमें नही मिला भाभी, जिन लोगो के पास राशन नही था , पूछ कर उनको दे रहे थे।"

         कल सुबह जब मेरी पत्नी ने बताया था कि अपनी बर्तन करने वाली के पास खाना बनाने के लिये कुछ भी नही है तो मैने अपने मित्र मुसीर भाई से कहवा कर उसके लिये एक किट राशन सामग्री की व्यवस्था करवाया था।

" तुम्हे भी बता देना था कि तुम्हारे पास नही है, ले कर रखी रहती। काम आता। " पत्नी ने उसे ज्ञान देते हुये कहा।

" कैसे कह देते भाभी, ये तो झूठ होता न, फिर और लोगों को भी तो जरूरत है, वे इस बंदी में कैसे राशन पायेगें जब हम लोग झूठ बोल कर दो दो तीन पाकेट रख लेगें।" वो बहुत सरलता से बोली।

       हम और पत्नी उसकी इमानदारी सुन एक दूसरे का मुँह देख रहे थे और वह हमारे भावों से बेखबर चुपचाप बर्तन धोने में व्यस्त थी।

(बनारस, 17अप्रैल 2020, शुक्रवार)

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शनिवार, 11 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / लाकडाऊन मे एक जिम्मेदार कानूनपसंद नजरबंद शहरी की डायरी

व्योमवार्ता/ लाकडाऊन में एक जिम्मेदार कानूनपसंद नजरबंद शहरी की डायरी

लाकडाऊन की जीवनचर्या
(दि० 10अप्रैल 2020,शुक्रवार)

पूर्वाह्न ७.३० बजे, चाय, नित्यक्रिया,
सोशल मीडिया पर ज्ञान प्राप्त किया
८.०० ध्यान,पूजन
८.३० अखबार,
९.०० रामायण साथ मे प्राणायाम
१०.०० भोजन, एक झपकी
११.००व्योमकेश बख्शी
१२.०० मध्याह्न महाभारत
अपराह्न १ से २बजे
अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़े
एक दो किताबें और पलटे
२से ४ लेखन
४ से ६ कुछ इधर उधर किये, चाय, टीवी समाचार
६ से ७ मित्रों से मोबाईल पर वार्ता,
७ से ८ महाभारत, साथ मे भोजन
८से ९ छत पर टहले
९ से १० रामायण
१० से १०.१५ तक चाणक्य की प्रतीक्षा
१०.१५ से १०.३० तक दूरदर्शन को चाणक्य का समय बदलने पर गरियाये और टि्वट कर शिकायत
१०.३०से ११ टीवी समाचार
११ से ११.३० सोशल मीडिया पर ज्ञान बॉटे
११.३० से पूर्वाह्न १.४४ तक यूट्यूब पर पुरानी फिल्म "एक रूका हुआ फैसला" देखे।
१.४४ से२बजे तक कल के बारे मे टाईमपास प्रोग्राम सोचते हुये सो गये।

एक नजरबंद कैदी के लिये इससे बेहतर  कोई अन्य कार्यक्रम हो या सुधार की गुंजाईस हो तो सुझाईयेगा।🙏
(बनारस, ११अप्रैल २०२०,शनिवार)
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#Vyomvarta

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / पीएम-केयर्स और प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष मे सानता एवं अंतर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

व्योमवार्ता/ क्या है PM-CARES और PMNRF? जानिए दोनों के बीच की समानताएं और अंतर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 6अप्रैल 2020
                 पीएम केयर के घोषणा होते ही मोदी विरोध मे अनायास व अनर्गल सवाल उठाने वालों ने यह सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष के रहने पर पीएम केयर की क्या जरूरत थी ? प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क ने Apr 03, 2020 को अपने एक लेख मे दोनो के अंतर को बताने का प्रयास किया है।
                   पूरा विश्व कोरोना वायरस के महामारी से जूझ रहा है। भारत भी इस महामारी से बचने के लिए कई उपाय किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से PM-CARES में दान देने की भी अपील की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब PM-CARES की बात की है तो अब इसको लेकर चर्चा यह है कि आखिर इस PM-CARES की क्या आवश्यकता है जबकि पहले से ही प्रधानमंत्री राहत कोष है। लोग प्रधानमंत्री राहत कोष में क्यों ना दान करें? PM-CARES में क्यों दान करें? आज हम आपको PM-CARES और PMNRF के बारे में बताएंगे और यह भी बताएंगे कि आखिर इन दोनों के बीच क्या अंतर है?
               सबसे पहले बात प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) की करते हैं। यह राहत कोष से 1948 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य भारत के विभाजन के दौरान और उसके ठीक बाद पाकिस्तान से विस्थापित लोगों को सहायता करना था। प्रधानमंत्री राहत कोष के संसाधनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से बाढ़, तूफान या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में मारे गए लोगों और उनके परिवार वालों की मदद के लिए किया जाता है। इसके अलावा दुर्घटनाओं और दंगों से भी पीड़ितों को तत्काल मदद के लिए प्रधानमंत्री राहत कोष का इस्तेमाल किया जाता है। प्रधानमंत्री राहत कोष का इस्तेमाल चिकित्सीय उपचार प्रदान करने के लिए भी किया जाता है। फंड में पूरी तरह से सार्वजनिक योगदान होता है और इसे कोई बजटीय समर्थन नहीं मिलता है। फंड के कॉर्पस को विभिन्न रूपों में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों और अन्य एजेंसियों के साथ निवेश किया जाता है। संवितरण प्रधान मंत्री के ही अनुमोदन से किए जाते हैं।
          प्रधानमंत्री राहत कोष के बारे में एक बात गौर करने वाली है कि यह संसद द्वारा गठित नहीं किया गया है। विभाजन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि विस्थापितों के मदद के लिए सरकार प्रयास कर रही है परंतु यह पर्याप्त नहीं है और इसीलिए इनकी मदद के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है। इसी के तहत एक राष्ट्रीय कोष की स्थापना की गई। खास बात यह भी है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का गठन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था हालांकि इसके प्रबंध समिति ने हमेशा कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को शामिल किया गया है। हम यह बताते हैं कि जब फंड को बनाया गया था तो कौन-कौन से लोग इसके प्रबंध समिति में शामिल थे।
i) प्रधान मंत्री
ii) भारत की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष।
iii) उप प्रधान मंत्री।
iv) वित्त मंत्री।
v) टाटा ट्रस्टीज़ का एक प्रतिनिधि।
vi) फिक्की द्वारा चुने जाने वाले उद्योग और वाणिज्य का प्रतिनिधि।
           हालांकि बाद में समय-समय पर इसमें नए सदस्यों को जोड़ा गया है। 1985 में एक ऐसा समय आया जब इस फंड प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री को सौंप दिया गया। प्रधानमंत्री को यह भी अधिकार दिया गया कि वह जिसे चाहे उसे फंड का सचिव बना सकते हैं जिस पर फंड के बैंक खातों को संचालित करने का अधिकार होगा। यानि कि यह फंड पूरे तरीके से PMO के द्वारा संचालित किया जाने लगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह निर्णय तब लिया गया था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री होने के नाते इस फंड के प्रभारी थे।
                   अब बात PM-CARES की करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना महामारी से लड़ने के लिए सार्वजनिक योगदान के लिए PM-CARES फंड का गठन किया है। इसके तहत मिलने वाले दान को कोरोना वायरस से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इस फंड के अन्य सदस्यों में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री को शामिल किया गया है। इसके अलावा विज्ञान, स्वास्थ्य, कानून और सार्वजनिक क्षेत्रों में अच्छे काम करने वाले लोगों को भी इसके सदस्य के रूप में नियुक्ति की गई है। इस फंड के गठन के साथ ही प्रसिद्ध हस्तियों के साथ-साथ आम लोगों ने भी लाखों की संख्या में अपने योगदान किए हैं। हालांकि एक सवाल बार-बार उठता रहा कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष होने के बावजूद भी पीएम के अंत की शुरुआत क्यों की गई? एक पत्रिका ने दावा किया है कि पीएम के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक है। अतः यह कहना भी गलत नहीं होगा कि PM-CARES प्रधानमंत्री राहत कोष की तुलना में अधिक पारदर्शी है। PM-CARES में सलाहकार बोर्ड की स्थापना का भी प्रावधान है जिसमें चिकित्सा व्यवसाई और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों, शिक्षाविदों, अर्थशास्त्रियों और वकीलों को रखा जा सकता है।
                  PM-CARES को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। कांग्रेस जहां इसे पारदर्शी नहीं बता रही है वहीं भाजपा का कहना है कि कांग्रेस इससे इसलिए नाखुश है क्योंकि इसमें कांग्रेस अध्यक्ष के लिए कोई जगह नहीं है।
साभार: प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
(बनारस,6अप्रैल 2020, सोमवार)
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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का तीसरा दिन और तंत्र विद्या

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का तीसरा दिन और तंत्र विद्या : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,27मार्च 2020

             तंत्र शास्त्र के संबंध मे सामान्य जन ही नही प्रबुद्ध जनमामस मे भी अनेक प्रकार की भ्रांतिया है। 'तांत्रिक' शब्द का उच्चारण होते ही मनमानस मे भय आतंक का एक घृणायोग्य चित्र उभरता है जो वास्तविकता से एकदम विपरीत है। वास्तविकता यह है ति तंत्र शब्द संस्कृत धातु 'तन्' से बना है जिसका अर्थ है बढ़ाना, विस्तार करना, तानना। तंत्र का शाब्दिक अर्थ व्यवस्था भी है। मै कौन हूँ? कहॉ से आया हूँ? मेरी नीयति क्या है? मानव व्यवस्था तथा ब्रह्माण्ड के अस्तित्व का रहस्य क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्ति हेतु की गई साधना ही तंत्र है। तंत्र का आध्यात्मिक उद्देश्य जाति धर्म उम्र लिंग आदि के भेदभाव से परे साधक अथवा साधिका को कलुषशून्य बना कर उसके तन मन का शुद्धिकरण कर उसे आध्यात्मिकीकरण की ओर ले जाना है। जहॉ साधक समस्त  बंधन मायामोह से मुक्त हो सब मे आदिशक्ति का प्रतिबिंब देखते हुये स्व से साक्षात्कार करता है। तंत्र का विशेष गुण उसकी साधना मे निहित है। वह न तो उपासना है न प्रार्थना। वह देवी के समक्ष निवेदन याचना या पश्चाताप भी नही है । वह साधना पुरूष एवं प्रकृति का मिलन है, ऐसी साधना जो देह मे पुरूष तत्व को मातृतत्व से मिलाती है।
तंत्रशास्त्र के यथार्थ ,उद्देश्य उसके उदभव  विकास इतिहास सिद्धांत साधना पद्धति एवं विभिन्न तांत्रिक संप्रदायों की ठोस एवं प्रामाणिक जानकारी देती है पं०दुर्गा प्रसाद शुक्ल की पुस्तक " तंत्र विद्या का यथार्थ " जिसे आज हमने नवरात्रि के तीसरे दिन और कोरौना के देशव्यापी लाकडाऊन के चौथे दिन पढ़ा। पं० दुर्गा प्रसाद शुक्ल कादिम्बिनी पत्रिका के उपसंपादक रह चुके है और कादिम्बिनी के दीपावली पर निकलने वाले "यंत्र मंत्र तंत्र विशेषांक " के सर्वेसर्वा भी। इनके संपादित कई विशेषांक आज भी मौजूद है।
    दो वर्ष पूर्व क्रय की गई यह पुस्तक आज हमें सामने दिख गई तो नवरात्रि के अंतराल मे इसे पढ़ भी लिया और पढ़ने के बाद तंत्र विद्या के श्वेत पहलू से प्रथम बार साक्षात्कार हुआ। पं० दुर्गा प्रसाद जी ने स्वयं के अध्ययन व अनुभव से संक्षिप्त परन्तु सरल व सारगर्भित शब्दों मे  तंत्र शास्र के सिद्धान्त और साधना , साधना पद्धति के साथ साथ कौल मत, शैव मत व मातृका मत , चार्वाक दर्शन का स्पष्ट परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त आम्नाय का सिद्धान्त, दसो महाविद्या, तीनों भाव, कमलदल ,चक्रानुष्ठान, पंचमकार, षटचक्र  के साथ साथ श्री चक्र,कुंडलिनी शक्ति , बौद्ध तंत्र, ताओ, रसायन व मनोविज्ञान  के  तंत्रशास्त्र मे अस्तित्व व औचित्य का यथार्थ अनुशीलन किया है। एक गूढ़ व नीरस विषय होने के बावजूद बेहद रोचक ढंग से बिवा लाग लपेट के लिखी हुई यह पुस्तक हमारे मन मे तंत्र शास्त्र को लेकर बनी गुत्थियों को निर्भय ढंग से खोलने मे सक्षम रही है। नवरात्रि के साधना काल मे इस पुस्तक को पढ़ना एक आनंददायक अनुभव रहा।
(बनारस, 27 मार्च 2020, शुक्रवार)
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गुरुवार, 26 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020 गुरूवार

                       नवरात्रि के दूसरे दिन व कोरोनावाईरस के लाकडाऊन के तीसरे दिन  घर मे पड़े पड़े हमने अशोक के. बैंकर की लिखी किताब “दशराजन” पढ़ा। इस किताब ने मुझे उतना प्रभावित नही किया,हॉलाकि रोचक लेखन,कहानी और पात्र.अशोक के. बैंकर ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस पूरी कहानी को पेश किया है. इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमारे प्राचीन इतिहास का अंश है,ये कहानी ऋगवेद से ली गयी है.
      ये कहानी है ३४०० ई. पू. की,जहां एक कबीले के राजा ने अपनी प्रजा और कबीले की रक्षा के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ दस राजाओं और उनकी विशाल सेना का सामना किया था. उस वक़्त कबीले के मुखिया सुदास के पास कोई बाहरी मदद नहीं थी बल्कि उसे एक योजनाबद्ध तरीके से घेरा गया था.अपने पांच नदियों वाले कबीले की रक्षा के लिए सुदास ने हर संभव रणनीति का प्रयोग किया और अपने कबीले की रक्षा की. ये पांच नदियों वाला कबीला आज पंजाब के नाम से जाना जाता है.

केवल एक दिन में सभी आक्रमणकारियों के अंत के साथ ख़त्म हुए इस युद्ध को अशोक के. बैंकर ने बखूबी उतारा है.अघोषित युद्ध,एक साथ आक्रमण और सुदास की रणनीति,उसके सहायकों का साथ,गुरु का साथ से लेकर युद्ध की एक-एक घटना का इतना अच्छा वर्णन है कि आपके सामने पूरा चित्र उतर आता है.नायक सुदास अपने कबीले के हर इंसान यहाँ तक की पशु से भी प्रेम करता है,अपमान की स्थिति में भी संयम बनाये रखता है..शायद यही कारण हो सकता है कि खुद को विशाल शत्रु सेना से घिरा हुआ पाने के बाद भी वो समर्पण की बजाय सामना करने का निर्णय लेता है.
      ललस संभवतः प्राच्य इतिहास के बारे मे ज्यादा जानकारी न होने व रोचक अनुवाद न होने के कारण कथानक थोड़ा  धीमा व ऊबाऊ लगी। इतिहास मे कल्पना को शामिल करते हुये आजकल पुरा संस्कृति व इतिहास पर जो उपन्यास लेखन किया जा रहा है उनके लेखकों मे  अशोक के बैंकर का प्रमुख स्थान है उन्होंने प्रयास भी किया है कि ऐतिहासिक उपन्यासों की भॉति संवाद वर्णन और विवरणात्मक संबंध से वह ऐतिहासिक कालखण्ड व पात्र पाठक के मन मानस मे सजीव हो सके। संभवतः बहुत से पाठकों के लिये लेखक का यह प्रयास अद्वितीय व अद्भुत रहा हो और उनको बांधने मे सक्षम रहा हो । हमारे भारत का इतिहास न जाने ऐसी कितनी कही और कितनी अनकही कहानियों को समेटे खड़ा है, जो हमारे लिये ढेर सारी कल्पनाये , मिथक,  व संबंधों के तालमेल का मिश्रण लिये लेखन का बढ़िया मसाला व गारा चूना बन सकता है। दशराजन इसी तालमेल का सुंदर उदाहरण कहा जा सकता है। जो समय बिताने के लिये उपयोगी माना जा सकता है।
        बहरहाल, एक बार पुन: धन्यवाद मित्र राजीव अष्ठाना Rajeeva Kumar Asthana को, इस लाकडाऊन के वर्तमान कालखण्ड मे सोशल डिस्टेंशिंग आईसोलेशन के तीसरे दिन के लिये अपने लाईब्रेरी से पुस्तक भेंजने के लिये।
(बनारस,२६मार्च २०२०, गुरूवार)
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