व्योमवार्ता, VYOMESH CHITRAVANSH advocate
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
मंगलवार, 26 अगस्त 2025
मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा..
बरसात में मणिकर्णिका पर प्रतीक्षा
ऊफनती गंगा का प्रचण्ड वेग
दूर दूर तक असीमित अपरिमित जलधार
सामनेघाट से राजघाट तक
गंगा की सूनी पड़ी गोंद
बिना नाव,बिना पक्षियों बिना पतंगों के
जैसे मां ने बरज दिया हो
खुद के पास आने से
उफनते मटमैले जल में
रत्नेश्वर महादेव मंदिर का कलस
दे रहा है साक्षी उसके होने का
बाकी सब तो गंगा के मटमैले पानी मे
खो गये है सीढीयां मढ़ी घाट और चबूतरे
मणिकर्णिका महाश्मसान डूबा है बाढ़ मे
साथ में विश्वनाथ धाम का जलासेन पथ
और गंगाद्वार भी
अंतिम संस्कार में जल रही
और कतार मे पड़ी अहर्निश चितायें
मोक्ष को कामना में
श्मसानेश्वर महादेव से लगे ऊँचे छत पर एक दूसरे को धकियाती, देखती, इंतजार में अपनी बारी का,
यह प्रतीक्षा धरा पर कभी नही थी
न ही किसी ने प्रतीक्षा करना चाहा था
यहां आने का
पर आज वह निर्जीव,आत्माहीन शव भी व्याकुल है स्वयं की प्रतीक्षा पर,
उसे दिखती है औरो की व्याकुलता
जो सशरीर सआत्मा सजीव आये है
उसे अंतिम यात्रा पर पहुंचाने
पर व्याकुल है स्वयं की वापसी हेतु
अपने घरों को
गंगा की बाढ़ तो एक बहाना है
इस सच्चाई से मुंह मोड़ने का
कि अंत मे सबको यही आना है ..….
-व्योमेश,26अगस्त 2025
मंगलवार, 15 जुलाई 2025
क्वीन्स कालेज का नाम प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज हो..../व्योमवार्ता, 29062025
नगर ही नही पूर्वांचल के प्राचीन माध्यामिक विद्यालयों में राजकीय क्वीन्स कालेज का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। इस कालेज में हिन्दी के प्रख्यात लेखक उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी ने शिक्षा प्राप्त किया था। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभ रहे है एवं इन्हे साहित्य संसार की महत्वपूर्ण हासेयों में से एक माना जाता है। प्रेमचंद जी का जीवन परिचय एक प्रेरणादायक साहित्यिक यात्रा है। 31जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही मे मुंशी अजायब राय और पाता आनन्दी देवी के परिवार में जन्में धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ प्रेमचंद जी ने अपनी पढ़ाई गांव अगल बगल के विद्यालय से प्रारंभ करने के बाद क्वीन्स कालेज से हाईस्कूल व इण्टर किया था। उनके जीवन में क्वीन्स कालेज का बहुत बड़ा योगदान रहा है। क्वीन्स कालेज ने उन्हे जीवन में विद्यालयीय शिक्षा के साथ ही व्यवहारिक जीवन की शिक्षा भी दिया। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी क्वीन्स कालेज से ही हुई थी। जो उनके प्रारंभिक कहानियों और उपन्यास सेवा सदन कर्मभूमि अन्य में परिलक्षित होता है। वर्तमान समय में सांस्कृतिक अभिनवीकरण व भारतीय मूल्यों व प्रतीकों को पुनर्स्थापना की जा रही है ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि दो सदियों से अंग्रेजी दासता के प्रतीक रहे क्वीन्स कालेज के नाम पर चलने वाले इस महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान का नाम भी परिवर्तित कर अपने महान छात्र के नाम पर प्रेमचंद राजकीय इण्टर कालेज किया जाये। अब समय आ गया है कि वाराणसी एवं वाराणसी के धरोहरों के प्रति संकल्पित और समर्पित लोग एवं संस्थाये अपने माटी के सपूत प्रेमचंद जी के नाम पर करने के लिये एकजूट हो और यह प्रेमचंद जयंती पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-व्योमेश चित्रवंश,एडवोकेट
29.06.2025
(लेखक चित्रगुप्त सभा काशी के उपाध्यक्ष एवं प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र लमही के सलाहकार संरक्षक हैं)
शनिवार, 28 जून 2025
गोदौलिया ....(बनारस पर व्योमेश की कविता)28जून2025
मैं खड़ा हूँ
गोदौलिया चौराहे पर
ढूंढ़ रहा हूं प्राचीन गोदावरी तीर्थ
वह कहीं नहीं दिखता
दिखता तो गोदौलिया भी नहीं
बल्कि वहाँ है, स्टील प्लेट्स और पाईप के ढेर
पैदल बेशुमार भीड़
चौराहे के तीन तीन ओर
टोटो का रेला
जो बढ़ा रहे है अनिच्छित चिड़चिड़े जाम को
बाबा बताते थे है गोदौलिया
गाडविला से बना है
चौराहे के सेंट थामस चर्च के नाम पर
प्रिंसेप ने ढूढ़ा था
शाही नाला और घोड़ा नाला यही कहीं
सुबह इसी चौराहे से, गमछा कांधे पर डाले
हर हर महादेव गंगे, काशी विश्वनाथ शंभो
अलख जगाते जाते थे श्रद्धालु नेमीगण
बाद में दोनो चौराहों के किनारे
बैठा दिये गये नंदी जमी से पंद्रह फीट ऊपर
दोनो गोदौलिया के तीन किनारे खुदे पड़े हैं
निर्माणाधीन स्टेशन के लिये,
जो बनेगें नंदी की तरह पचासों फीट ऊपर
चलने वाले वाले हवाई झलुआ टोटो के लिये
जिन्हे अखबारी भाषा मे रोप वे कहते हैं
बड़े बड़े होटल दिखने लगे है
ग्लोसाईन औ डिस्प्ले मानीटर वाले
सुंदर आकर्षक शोरुम भी
पर नही दिखता वह पुराना गोदौलिया
जो शहर का हृदयस्थल कहा जाता था
नही दिखती, गमछा टांगे अलमस्त
दुनिया को अपने ठेगें पे रखे चाय लड़ाती
पान घुलाती वो बनारसी फक्कड़ रहीसियत
जो कभी मेरे शहर के पहचान थी
अब दिखते है देर सारे पर्यटक, तीर्थयात्री
पैदल चलता सड़क के दोनो लेन में,
सब दिखता है पर नही दिखता
इसी भीड़ मे खो गया बनारसीपन
खुदाई, रोपवे, ग्लोसाईन टूरिज्म वाले चौराहे में
मेरे शहर की पहचान, गोदौलिया की तरह...
-व्योमेश चित्रवंश
28.06.2025
रविवार, 15 जून 2025
गंगा की सीढ़ीयॉं.......(कविता) 14जून 2025
शहर से बस नदी की ओर
नही ले आती हैं
वे ले आती है
कोलाहल से शांति कीओर
भौतिकता से आध्यात्म की ओर
स्व से शिव को ओर
सांसरिकता से बैराग्य की ओर
इन्ही सीढ़ीयों पर
शिव ने शंकर को बताया था
द्वैत अद्वैत से परे ब्रहम को,
तुलसी ने लिखा था रामायण
रामानंद ने दिया था कबीर को
रामनाम का गुरूमंत्र
इन्ही सीढीयों पर
बुलाया था जगन्नाथ ने
अपनी लवंगी के लिये
माँ गंगा को
और गंगा चढ़ती आयी थी
इन्ही सीढ़ीयों पर
अपन पुत्र रत्नाकर के
निश्छल प्रेम का साक्ष्य देने
इन्ही सीढीयों पर
रैदास ने किया था आवाहन
अपनी कठौती में मां गंगा का
नजीर ने देखा था
इन्ही सीढ़ीयों पर
सुबह ए बनारस को
गंगा में नहाते हुये
ख्वाहिश कर जीने मरने की
गंगा में बजू कर कर के
इन सीढ़ीयों पर
हरिश्चन्द्र ने नहीं छोड़ा सत्य को
छोड़ दिया सारे संबंधों को
राजपाट, पत्नी पुत्र सर्वस्व काे
क्योंकि ये केवल सीढ़ीयां नहीं
बॉहे है मॉ गंगा की गोंद की
वह मॉं है हमारी प्रकृति मॉं
स्रोत है सत्य,श्रद्धा,निर्मल
पवित्र मोक्ष और कल्याण की
ये सीढीयॉ उतारती है
हमारे अंतर का अहंकार
मिटाती है तम और क्लेश,
हिमालय की उंचाई से
चल कर सागर मे समाते हुये,
बताती है सच्चाई
स्वयं को समाहित कर
अथाह सागर में विलीन होने की
तभी वह श्रद्धा पात्र होती है
हम सबके लिये
तभी केशव को भरोसा है
एकमात्र अपने मॉं गंगा पर
हे भागीरथी
हम दोष भरे,
पर भरोसे यही है कि भरोस तुम्हारे
नाम लिए कितने तर जात,
प्रणाम किए सुरलोक सिधारे।
मंगलवार, 10 जून 2025
काशीवासी.....
स्वयं में लीन
काशी के स्वभाव में रमा
शिव और शक्ति को
मन मे जपते
चलता है
शहर से गंगा की ओर
भौतिकता से वैराग्य की दिशा में
स्वयं से स्व की ओर
गंगाघाट की सीढ़ीयों से उतरते
सधे कदमों से रस्ते नापता
अंतर में शिव व गंगा को लिये
हर हर महादेव शंभों
काशी विश्वनाथ गंगे,
मन बुद्धि अहकार से परे
भूत को भूल, भविष्य से मुक्त
मात्र वर्तमान को जीता
अपना सर्वस्व दुःख चिन्ता, भार
शिव को समर्पित कर
स्वयं शिवमय होता हुआ
शिव के शरण में
वह काशीवासी,
फक्कड मस्त अड़भंगीग
कुछ अधिक पाने के चाह से दूर
कुछ खोने का डर से मुक्त
मृत्यु से भय नही
जीवन में कुछ चाह नही
वह स्वयं मे शंकर बन
सब कुछ छोड़ कर
अपने महादेव पर,
भोले बाबा से भी अधिक
विश्वास है उसे अपनी मां अन्नपूर्णा पर
तभी तो अलख जगाता है
वो विश्व के नाथ विश्वेश्वर के दरवार में,
बाबा बाबा सब कहे माई कहे न कोय
बाबा के दरबार में माई करें सो होय,
वह जानता है कि
मां बिना पिता की पूर्णता नही
प्रकृति बिना पुरुष सिद्ध नही
जीव बिना आत्मा संपूर्ण नही
इसी लिये वह सहज है सरल है
पर जटिल और अबूझ
अपने आराध्य महादेव के समान
वही तो काशीवासी है।
-व्योमेश,
10जून2025, मंगलवार
बुधवार, 4 जून 2025
व्योमवार्ता/ गंगा दशहरा
गंगा दशहरा हिन्दूओं का एक प्रमुख त्यौहार है जो प्रत्येक वर्ष हिन्दू पंचांग के ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा नदी के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। यह हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो गंगा नदी ही पूजा के लिये समर्पित है। इस शुभ अवसर पर हम भारतवासी गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति करते हुये उन्हें सम्मान और आदर देते है। मां गंगा के भक्त नदी के किनारे एकत्र होते हैं। गंगा नदी में स्नान करते हैं और पूर्ण पवित्रता एवं रीति रिवाज से उनका पूजन कर आशीर्वाद की कामना करते है। माना जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह त्यौहार गंगा को संराक्षत और सुरक्षित रखने के महत्व को भी दर्शाता है जो हिन्दू धर्म में अध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व रखती है। सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी के कमंडल से राजा भगीरथ द्वारा देवी गंगा को धरती पर अवतरण दिवस को गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी पर अवतार से पहले गंगा नदी स्वर्ग का हिस्सा थी। एक बार महाराज सगर ने अपने राजधानी अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने ईष्यावश यज्ञ के प्रतीक अश्व का अपहरण कर लिया और उसे ले जा कर समुंदर के किनारे महर्षि कपिल के आश्रम में बांध दिया। अश्व का गायब होना यज्ञ में विघ्न के समान था। इसे यद्य में विघ्न के साथ हो अपशकुन और आने वाले अनिष्ट के रूप में मानते हुये राजा सगर की समस्त प्रजा राजकुमार अंशुमान के नेतृत्व में हर कहीं यज्ञ के अश्व को दूढ़ने लगी। महर्षि कपिल के आश्रम पहुँचने पर लोगों ने देखा कि वहीं एक कोने में यज्ञ का अश्व बंधा हुआ है और आश्रम के यज्ञशाला में महर्षि कपिल अपने साधना में समाधिस्थ थे। अश्व को देखते ही दूढ़ रही प्रजा एवं सैनिक महर्षि कपिल को ही अश्व चुराने का आरोपी मानते हुये उन्हें चोर चोर चिल्लाने लगी जिससे महर्षि कपिल की समाधि दूर गई एवं उन्होने बिना सोचे समझे स्वयं पर आरोप लगाने वालों को अपने क्रोधाग्नि व श्राप से भस्म कर दिया। जब इस बात की जानकारी महाराजा सगर को हुई तो उन्होंने महर्षि कपिल से क्षमा मांगते हुये अपने भस्म हो चुके प्रजा एवं सैनिकों के मुक्ति का मार्ग पूछा। महर्षि कपिल ने उन्हें बताया कि यदि स्वर्ग से गंगा नदी धरती पर आ कर इस स्थान से प्रवाहित हो तो भस्म चिता बन चुके प्रजा और सैनिकों को मुक्ति मिल सकेगी। राजा सगर फिर उनके पुत्र राजा दिलीप ने गंगा को धरती पर बुलाने के लिये अथक तपस्था किया पर उन्हें सफलता नहीं मिली। दिलीप के पश्चात उनके पुत्र भगीरथ ने अपनी घोर तपस्या से ब्रहमा को प्रसन्न किया एवं उनसे वरदान के रूप में गंगा को पृथ्वी पर उतारने की मांग किया। ब्रह्मा जी ने भगीरथ को वरदान में गंगा को धरती पर भेजने का वरदान देते हुये कहा कि गंगा के वेग को धरती पर संभालने की क्षमता केवल शंकर भगवान के पास है। यदि वे तैयार हो तो गंगा धरती पर उतर सकती है। इसके पश्चात भगीरथ ने शंकर भगवान से तप कर के गंगा के वेग को धारण करने को कहा। जिसके परिणाम स्वरुप गंगा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन धरती पर अवतरित हुई। शिव जी जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की वादियों में कल कल निनाद करते हुवे मैदान को अपने जल से सिंचित करते हुये महर्षि कपिल के आश्रम में राजा सगर के सैनिकों एवं प्रजाओं को मुक्ति दिलाते हुये सागर में समाहित हो गई।
इस प्रकार महाराज भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण कर बड़े भाग्यशाली हुये। उन्होने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों युगों तक बहने वाली गंगा की अविरल धारा महाराज भगीरथ के कठोर तप एवं साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणिमात्र को जीवन-दान ही नहीं देती. मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व में गंगा की महिमा गाई जाती है।
गंगा दशहरा के दिन गंगा जी में स्नान किया जाता है यदि कोई श्रद्धालु गंगातट तक नही पहुंच पाता तब वह अपने घर के पास ही किसी नदी या तालाब में श्रद्धापूर्वक गंगा मां का ध्यान करते हुये स्नान करते हैं। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी हस्त नक्षत्र में होने के कारण यह तिथि: फोर पापों को नष्ट करने वाली मानी गई है। कहते हैं कि हस्त नक्षत्र में बुधवार के दिन गंगावतरण हुआ था। इसलिये यह तिथि अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। लाखो करोणों श्रद्धालु दूर दूर से आ कर गंगा की पवित्र धारा में स्नान करते है। हरिद्वार, प्रयाग, काशी पटना गंगासागर के साथ ही अन्य शहरों में गंगा तट पर गंगा दशहरा के मेले लगते है जहां लोग दान में कोई भी वस्तु दस की संख्या में दान देते हैं। गरीबो को भोजन कराने और उन्हें आम दान करने की परंपरा अभी भी बहुत से गंगातटीय क्षेत्रों में मनायी जाती है।
काशी में गंगा दशहरा के दिन दशाश्वमेध घाट में दस बार डुबकी मार के स्नान करके शंकर भगवान को दस की संख्या में गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन कर के रात्रि को जागरण करने से अनन्न फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा पूजन का भी विशिष्ठ महत्व है। इस दिन विधि विधान से गंगा जी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ, दस सेर गेंहू और दस आम दस ब्राहमणों को दान देने व दशहरा स्त्रोत्र का पाठ किया जाता है।
गंगा दशहरा धार्मिक पर्व होने के साथ साथ हमारे भारतीय संस्कृति का भी प्रतीक है। गंगा दशहरा के माध्यम से हम अपने प्रकृति प्रदत्त उपहारों जल स्रोत गंगा नदी को मां मानते हुये उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते है एवं अपनी संस्कृति की महत्वपूर्ण अंग गंगा नदी के पुण्यता पवित्रता एवं स्वच्छता के प्रति संकल्पित होते है क्योंकि गंगा हमारे लिये मात्र एक नदी ही नही हमारीजीवनदायिनी मां है तभी तो हम गंगा को विश्वरूप मान कर प्रार्थना करते हैं-
ॐ नमो गंगाये, विश्वरुपिणे नारायण्यै नमो नमः।
शुक्रवार, 30 मई 2025
व्योमवार्ता/ मेरे शहर में नवतपा.......
बुधवार, 28 मई 2025
बनारस इस पार और उस पार......(कविता)
तरना रेलवे ओवर बृज के
नीचे उतरने वाले फ्लाईओवर से
बदलते बनारस को
मेट्रो सिटी के लुक में
फिल्मों के रीलों में चलती जैसे
ओवरबृज के पार
दिखती बहुमंजिली इमारतें
उन पर चमकतें ग्लोसाईन बोर्ड
नहीं पता चलता
हम इमारत की तरफ है
या उसके दूसरी ओर
पुल के ऊपर आ कर
संशय दूर होता है
कि हम इमारत के ओर हैं
यानि इसी पार
पर पीछे देखने पर
हम फिर उस पार हो जाते है
एक भ्रम और संशय को जीते
बनारस के मर्म और अध्यात्म के जैसे
जीवन के इस पार
भौतिकता, सांसारिकता, स्वार्थ और अहम
और उस पार
आत्मा के चरम पर, शरीर से परे
सिर्फ आत्मा अघोर शून्य और शिव
वह ऊँचा ओवरबृज
दूर कर देता है मन व जीवन के संशय को
बनारस को महसूस करने जैसे
वैसे भी इस शहर को समझने के लिये
बनना पड़ता है कबीर
चढ़ना होता है मन की ऊंचाइयों पर
तब हम देख पाते है
बनारस को मन की आखों से
जान पाते है बनारस को
जीवन के इस पार
और उस पार के सच को
जो बनारस दिखाता है
रेलवे ओवरबृज की ऊंचाइयों जैसे
इस पार और उस पार का बनारस
प्रकृति और पुरुष के मध्य का बनारस...
- व्योमेश चित्रवंश
28मई2025 बुधवार
रविवार, 25 मई 2025
व्योमवार्ता/ मित्रता (कविता)
मात्र एक शब्द नही,
एक अहसास है,
जिसे बस महसूस किया जा सकता है,
ठीक वैसे हो जैसे सांसों में गर्मी को,
बर्फ में पानी को,
गुड़ में मिठास को,
हम अंतर तक अनुभूति करके भी
शब्द नही दे सकते जैसे,
आपस की बदमासियाँ, नादानिया
फिर नाराज होने पर भी एक हो जाना,
यही तो है,
जो पद सम्मान, धन, मान से परे है,
जहां हम दिल से जुड़ते हैं,
समुन्दर की लहरों की तरह,
एक दूसरे को धकियाते,
हटाते जगह बनाते,
इस पार से उस पार जाते पर,
एक दूसरे से कभी अलग नही हो पाते
पानी के अनगिनत बनते बिगड़ते धाराओं में, क्योंकि हम सब भी जल धाराये हैं
मित्रता के संमुदर में,
-व्योमेश
काशी,09.05-2025
शनिवार, 29 मार्च 2025
व्योमवार्ता/ नये साल की पहली सुबह...../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1जनवरी 2023
शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025
जिनको नही पता है उनके लिये /भाई निरंजन सिंह के फेसबुक वाल से...
देश के ऊपर सरस्वती का अभिशाप लादने का भयंकर काण्ड / भाई निरंजन सिंह के फेसबुक वाल से......
रविवार, 2 फ़रवरी 2025
हां, मैने कुंभ देखा है......
मंगलवार, 31 दिसंबर 2024
व्योमवार्ता/ दो जीबी डाटा के फेर में....
दो जीबी डाटा के फेर में....
आजकल शरीर मल्टी विटामिन और मिनरल्स की कमी से जूझने के बाद भी उतना कमजोर नहीं दिखता, जितना दो जीबी डॉटा खत्म हो जाने के बाद दिखता है।
बड़े से बड़े बब्बर शेर के मुँह से अगर 2GB डॉटा छीन लिया जाए तो उसे सियार बन जाने में दो मिनट की देर नहीं लगती है।
कल की बात है। मुम्बई का जाम सदा की तरह धैर्य का इम्तहान ले रहा था। ज़िंदगी अंधेरी में विरार जैसा फील कर रही थी। तभी धीरे से आकर एक चौदह साल के लड़के ने कहा, "भइया दीजिये न..!"
मैनें कहा, "छुट्टे नही हैं।"
उसने खिसियाकर कहा, "भीख नहीं मांग रहा, हॉटस्पॉट ऑन कर दीजिये, इनको जीपे करना है।"
मैं चौंक गया। मोबाइल डॉटा हैकर्स पर पढ़े हुए तमाम आर्टिकल याद आने लगे। मैंने कहा, "सॉरी भाई, नहीं दे सकता।"
लड़का याचना की मुद्रा में आ गया, उसने कहा, "आप मुझे पहचानते नहीं? मैं ठाकुर सैलून…! जहां आप बाल कटवाते हैं, मेरे ही भइया हैं, जो आपसे 'भोजपुरी गानों में ढोढ़ी का आर्थिक योगदान' जैसे बिषय पर चर्चा करते हैं, उन्हीं का छोटा भाई हूँ...!"
मेरे मुंह से निकला... "ए मरदे पहिले न बतावेला।"
मैनें तत्काल प्रभाव से हॉटस्पॉट ऑन कर दिया। फिर तो मेरी नज़र उन भाई साहब पर अटक गई, जिनको पेमेंट किया जाना था।
एक झटके में वो लूटे हुए रईस लग रहे थे। दूसरे झटके में बेरोजगार इंजीनियर। आँखें और बाल मिलकर बता रहे थे कि वो अप्रकाशित लेखक हैं।
लेकिन पैंट शर्ट की सिकुड़न में एक अंतहीन उदासी थी, जो बता रही थी कि वो किसी कारपोरेट खिड़की से उड़ाए गए कबूतर हैं, जिसका पर काट दिया गया है।
तब तक अचानक मेरी नज़र उनके जूते पर अटक गई और मेरे तोते उड़ गया।
इससे पहले कि वो ये कहें कि अपनी अगली फिल्म में एक रोल मेरा भी रखिएगा राइटर साहब... मैंने जान पहचान का प्रोग्राम ही कैंसिल कर दिया और हॉटस्पॉट ऑफ करते हुए उस लड़के के कान में कहा, "मार्केट में एक नया गाना आया है... भइया को बता देना।"
"कौन सा?"
"ढोढ़ीये पर ले लs...लोन राजा जी..."
लड़का एक कातिल हँसी हंसा। का भइया, "आपो ग़जबे मजाक करते हैं..!"
मैंने कहा "गाना बढ़िया है औऱ तुम्हारे भैया चाहें तो लोन लेकर बगल में एक और सैलून खोल सकते हैं।"
लड़का मुस्कराया और चला गया...
लेकिन दोस्तों, इससे भी ज्यादा बड़ी दुर्घटना मैंने अभी अभी दैनिक जागरण के एकदम कोने में पढ़ी है।
ख़बर कुछ ऐसी है कि एक बहू तंग आकर थाने पहुँच गई है।
उसने थानेदार से जाकर कहा है कि "दरोगा जी, मेरी सास मंगधोवनी, मुझे जीने नहीं देगी... एफआईआर लिखिए।"
दरोगा जी ने पूछा , "सास तुमसे झगड़ा करती है?"
"नहीं दरोगा जी.."
"मारती है?"
"न न.."
"तो क्या खाना-पीना नहीं देती?"
"नही, वो बात भी नहीं है?"
"तब क्या दहेज मांग रही है?"
"नहीं दरोगा जी..!"
"तो फिर क्या बात है बताओ...!"
"मैं किचन में काम करती रह जाती हूँ..."
" तो क्या ज़बरदस्ती काम करवाती है ?"
"नहीं, दरोगा जी, मेरा दो जीबी डॉटा खत्म कर देती है... तंग आ गई हूं इस सास से।"
दरोगा जी ने अपना हॉटस्पॉट ऑन करके कहा....
"लो, बहन, कम्बख़्त बीबी ने बस 100mb ही छोड़ा हैं... तुम दो चार रिल्स विल्स देखो, पानी वानी पियो.. मैं अभी आता हूँ.."
आगे की खबर अख़बार वाले जालिमों ने नहीं दी है। शायद पत्रकार का डॉटा खत्म हो चुका होगा।
लेकिन दोस्तों.. मैं आज अपनी न जाने कब होने वाली सास की कसम खाकर कहता हूँ, ये खबर पढ़कर मेरी सांस अटक गई है।
दोनों हाथ प्रार्थना में जुड़ गए है.. "हे ईश्वर ! अब कल्कि अवतार लो.. तुम बहू को ऐसी सास न दो.. पति को ऐसी पत्नी न दो, किसी भाई को ऐसा भाई न दो... किसी मंटूआ को ऐसी पिंकिया न दो, जो अपना दो जीबी खत्म करने के बाद दूसरों के दो जीबी का कत्ल कर दे।"
ये हमारे समय का सबसे बड़ा अत्याचार है।
अगर सरकार सुन रही हो तो मेरी उससे दरख्वास्त है कि इंडिया बहुत आगे जा चुका है। दो जून की रोटी के लिए आटा की लड़ाई, अब दो जीबी डॉटा की लड़ाई बन चुकी है।
अब राशन कार्ड में गेंहू,चावल और चीनी मुफ्त करने से काम नहीं चलेगा.. उसके साथ हर महीने 60GB डॉटा भी मुफ्त करें... वरना लोग भूखों मर जाएंगे। 😉
(व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के सिलेबस से अनाम लेखक की रचना चोरित व चेपित। शीर्षक मैने दे दिया है।😃)
http://chitravansh.blogspot.in
गुरुवार, 7 नवंबर 2024
नाटी इमली का भरतमिलाप / व्योमवार्ता
बनारस मे पियरिया पोखरी वाली पीताम्बरा काली माँ /व्योमवार्ता
रविवार, 27 अक्टूबर 2024
व्योमवार्ता/ मन का आंगन कुछ कहता है......
सोमवार, 26 अगस्त 2024
व्योमवार्ता/ऊमस भरे दिन मेरे शहर में 05जुलाई2024
मेरा शहर इस समय गर्मी के ताप से लरज रहा है। सूरज से बरसते अंगारे और धरती से निकलती तपिश के साथ पारे ने ऊपर और ऊपर चढ़ने की होड़ लगा रखी है। कितना अजीब है नदियों के नाम पर बसा गंगा के खूबसूरत घाटों वाला यह शहर आज खुद में हैरान व परेशान है। परेशान भी क्यों न हो? शहर को नाम देने वाली नदियों या तो विलुप्त हो चुकी या विलुप्त होने के कगार पर है और गंगा के घाट? आह ! जब कल गंगा ही नही रहेगी तो ये घाट क्या करेगे? मुझे याद नहीं कहाँ लेकिन कहीं सुना था कि एक बार माँ पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा था कि बनारस की उम्र क्या और कितनी होगी तो अवधूत भगवान शंकर ने कहा था कि "यह आदि काल से भी पहले अनादि काल से बसी है यानि मानव सभ्यता के आदिम इतिहास काशी से जुड़ते है और जब तक सुरसर गामिनी भगीरथ नन्दिनी गंगा बनारस के घाट पर रहेगी तब तक काशी अक्षुण्ण रहेगी।" तो क्या गंगा के घाटों को छोड़ने के साथ ही मेरा शहर......? और कहीं अन्दर तक मन को हिला देती है यह भयानक कल्पना याद आता है, चना चबेना गंगा जल ज्यों पुरवै करतार, काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार। अब तो न गंगा में 'गंगा जल' रह गया, न ही सबके लिये मुअस्सर 'विश्वनाथ दरबार। अब तो दोनों ही सरकारी निगहवानी में दिल्ली और लखनऊ के इशारों पर मिलते हैं। माँ गंगा और भगवान विश्वनाथ के सरकारीकरण से अपने शहर की स्थिति उतनी नहीं खराब हुई जितनी हम बनारसियों के नव भौतिकवादी सोच और तोर से बढ़कर मोर वाली अपसंस्कृति ने अपने शहर का नुकसान किया। शहर बढ़ता गया और हमारी सोच का दायरा सिकुड़ता गया। कभी लंगड़े आम व बरगद के पेड़ों और लकड़ी के खिलौने के लिए मशहूर बनारस में पेड़ों की छाँव अब गिने चुने उदाहरण बनकर रह गयी। 'मेरे घर की नींव पड़ोस के घर से नीची न रहे क्योंकि ऊँचे नाक का सवाल है।' इस 'नाँक' के सवाल ने बरसाती पानी के रास्तों को सीवर जाम, नाली जाम के भुलभुलैया में उलझा दिया तो पड़ोसी के दो हाथ के बदले हमारी चार हाथ सड़क की जमीन की सोच ने इस शहर को एक नई समस्या अतिक्रमण के नाम से दी। तालाब पोखरों का तो पता ही नहीं, कुयें क्या हम इन आलीशान मकानों के बेसमेन्ट में मोमबत्ती जलाकर ढूंढ़ेगें? ऊपर से तुर्रा यह कि तालाब, पोखरों, नदियों के सेहत का ख्याल रखने वाला वाराणसी विकास (उचित लगे तो विनाश भी पढ़ सकते है) प्राधिकरण खुद ही मानसिक रूप से बीमार होने की दशा में है। कितने तालाब, पोखरे पाट डाले गये यह कार्य उसके लिए "आरूषि हत्या काण्ड" की तरह किसी मर्डर मिस्ट्री, फाइनल रिपोर्ट, क्लोजर रिपोर्ट, रिइनवेस्टिगेशन से कम नही है और तो और दो तीन को तो वी०डी०ए० ने खुद ही पाट कर अपने फ्लैट खड़े कर दिये। शहर के जमींन मकान और योजनाओं का लेखा-जोखा रखने वाले तहसील, नगर निगम और वी०डी०ए० के पास अपना कोई प्रामाणिक आधार ही नहीं है जिस पर वे अतिक्रमणकारियों के खिलाफ ताल ठोंक सके। कम से कम वरूणा नदी और सिकरौल पोखरे के बारे में तो मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही सिद्ध करता है।
कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन लब्बोलुआब यह है कि शहर की सेहत ठीक नही है। इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक अगर कहीं मानसून आ गया तो आम शहरी की चिन्ता यही है कि गर्मी की तपिश तो कम हो जायेगी लेकिन नाले बने गडढ़ेदार सड़कों से घर कैसे पहुँचेगें? इसी से तो बरसात चाहते हुए मन में एक दबी सी चाहत है कि दो चार दिन और मानसून टल जाये तो शायद..
अपनी ही नहीं सारे शहर की बात कहें तो एक शेर याद आता है-
शनिवार, 24 अगस्त 2024
बनारस मे नाश्ता यानि चौचक चकाचक चपंत व्यवस्था
बुधवार, 19 जून 2024
व्योमवार्ता/ समाज जिसमे हम रहते हैं...../जरूरत परिवार संस्था को बचाने की...
मंगलवार, 18 जून 2024
नवगीत के प्रणेता डाॅ०शंभुनाथ सिंह की जयन्ती पर विशेष
गुरुवार, 30 मई 2024
महावीर स्वामी
सत्य अहिंसा के प्रेरणास्तंभ भगवान महावीर जैन धर्म के चौबीसवै तीर्थकर के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें महावीर वर्द्धमान भी कहते है। तीर्थकर का अर्थ सर्वोच्च उपदेशक होता है जो समाज को अपने उपदेशों एवं जीवन चरित्र व कार्यों के माध्यम से एक सही दिशा दिखाये। महावीर स्वामी का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में 540 ईसा पूर्व में कुण्डग्राम वैशाली में हुआ था । तत्कालीन महाजनपद वैशाली वर्तमान बिहार प्रदेश में स्थित था। उनकी माता का नाम प्रियकारणी त्रिशला व पिता का नाम सिद्धार्थ था। मान्यताओं के अनुसार महावीर के माता पिता तेइसवे तीर्थकर पार्श्वनाथ जी के अनुयायी थे। जब महावीर का जन्म होने वाला था उसके पूर्व से ही इंद्र ने यह जानकर कि प्रियकारिणी त्रिशला के गर्भ से महान आत्मा का जन्म होने वाला है, प्रियकारिणी त्रिशला की सेवा के लिये षटकुमारी देवियों को भेजा। रानी त्रिशला ने स्वप्न में ऐरावत हाथी और अनेकों शुभ चिन्ह देखे जिससे यह अनुमान लगाया कि नये तीर्थकर इस पावन धरा पर पुनर्जन्म लेने वाले है। चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन वर्द्धमान का जन्म हुआ। महावीर के जन्म वर्ष में कृषि व्यापार, उद्योग में जबदस्त लाभ हुआ। लोगों को आत्मिक, भौतिक व शारीरिक सुख शान्ति का अनुभव हुआ। इस लिये उनके जन्म पर पूरे राज्य में उत्सव मनाये गये और बालक को विभिन्न नामों से विभूषित किया गया। कुलगुरु सोधमेन्द्र ने उनका नाम नगर में उत्साह व वृद्धि को ध्यान में रख कर 'वर्द्धमान' रखा तो ऋद्धिधारी मुनियों ने उन्हें 'सन्मति' कह कर पुकारा। संगमदेव ने उनके अपरिमित साहस की परीक्षा ले कर 'महावीर नाम से अभिहित किया।
बचपन से ही महावीर सांसारिक क्रिया कलापों के बजाय आध्यात्मिक एवं आत्मिक शांति, ध्यान जैसे कार्यों में अधिक समय बीताते थे। तीस वर्ष की आयु में उन्होंने अपने परिजनों से अनुमति ले कर सभी सांसारिक सम्पतियों, सुख सुविधाओं को त्याग दिया और आध्यात्मिक जागृति की खोज में घर छोड़ कर तपस्या करने लगे। साढ़े बारह वर्षों तक गहन ध्यान और कठोर तपस्या के पश्चात उन्हें सर्वज्ञता की प्राप्ति हुई। सर्वग्यता का अर्थ शुद्ध एवं केवल ज्ञान होने से इसे कैवल्यता प्राप्ति भी कहते हैं। कैवल्य प्राप्ति के पश्चात 'वर्द्धमान' जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर के रूप में जाने जाने लगे और 'महावीर जैन' के रूप में प्रतिष्ठित हुये। महावीर जैन का अर्थ है वह महावीर जिसने स्वयं हो जान लिया और सर्वस्व को जीत लिया। इसके पश्वात महावीर समाज में अहिंसा सत्य अपरिग्रह की शिक्षा देने लगे। महावीर ने सिखाया कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय अर्थात चोरी न करना, ब्रह्मचर्य अर्थात शुद्धता एवं अपरिग्रह अर्थात किसी से लगाव व मोह का न होना आध्यात्मिक मुक्ति के लिये आवश्यक है। उन्होंने अनेकांतवाद अर्थात बहुपक्षीय वास्तविकता के सिद्धान्तों की शिक्षा दी। महावीर की शिक्षाओं को उनके प्रमुख शिष्य इंद्रभूति गौतम ने जैन आगम के रूप में संकलित किया था। माना जाता है कि जैन भिक्षुओं द्वारा मौखिक रूप से संप्रेषित ये ग्रंथ ईषा की पहली शताब्दी तक आते आते काफी हद तक विलुप्त हो गये।
महावीर ने जीवन चर्चा के लिये सर्वजन हेतु एक आचार संहिता बनाई जिसमें किसी भी जीवित प्राणी अथवा कीट की हिंसा न करना, किसी भी वस्तु को किसी के दिये बिना स्वीकार न करना, मिथ्या भाषण अर्थात झूठ नहीं बोलना आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना, मात्र शारीरिक आवरण के वस्त्रों के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का संचय न करना प्रमुख है।
जैन ग्रंथों एवं जैन दर्शन में प्रतिपादित है कि भगवान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक नहीं है। वे प्रवर्तमान काल के चौबीसवे तीर्थकर है जिन्होंने आत्मजय की साधना को अपने ही पुरुषार्थ एवं चारित्र्य से सिद्ध करने की विचारणा को लोकोन्मुख बना कर भारतीय साधना परम्परा में कीर्तिमान स्थापित किया। महावीर ने धर्म के क्षेत्र में मंगल क्रांति संपन्न करते हुये उद्घोष किया कि आँख मूंद कर किसी का अनुकरण या अनुशरण मत करो। धर्म दिखावा नहीं है, धर्म रूढ़ि नहीं है, धर्म प्रदर्शन नहीं है एवं धर्म किसी के प्रति घृणा एवं द्वेषभाव भी नहीं है। महावीर ने धर्म को कर्म काण्डों, अंधविश्वासों, पुरोहितों के शोषण तथा भाग्यवाद की अकर्मण्यता की जंजीरों के जाल से बाहर निकाल धर्मो के आपसी भेदों के विरुद्ध आवाज उठाया। महावीर ने घोषणा किया कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। धर्म एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान है जिसमें आत्मा का शुद्धिकरण होता है। धर्म न कहीं गाँव में होता है और न कहीं जंगल में बल्कि वह तो अन्तरात्मा में होता है। साधना की सिद्धि परम- शक्ति का अवतार बन कर जन्म लेने में अथवा साधना के बाद परमात्मा में विलीन होने में नहीं है बाल्के वह तो बहिरात्मा के अन्तरात्मा की प्रक्रिया से गुजरकर स्वयं परमात्मा हो जाने में है।
जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार तपश्या को अवधि पूर्ण कर कैवल्य प्राप्ति के पश्चात लगभग तीस वर्षों तक महावीर धर्म का प्रचार करते रहे और उनका निर्वाण 527 ईषा पूर्व नालन्दा जिले के पावापुरी में हुआ।
महावीर स्वामी के अनेक नाम है जिनमें अर्हत, जिन, निर्ग्रथ, महावीर, अतिवीर प्रमुख है। मान्यता है कि 'जिन' नाम से ही उनके अनुयायियों ने धर्म का नाम जैन धर्म रखा। जैन धर्म में अहिंसा तथा कर्मो की पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। भगवान महावीर अहिंसा और अपरिग्रह को साक्षात मूर्ति थे। वे सभी के साथ समान भाव रखते थे और किसी को भूल कर भी कोई दुख नहीं देना चाहते थे। भगवान महावीर के अनुयायी उनके नाम का स्मरण श्रद्धा और भक्ति से लेते हैं। उनका यह मानना है कि महावीर स्वामी ने इस जगत को न केवल मुक्ति का संदेश दिया अपित मुक्ति की सरल व सच्ची राह भी बताई। भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु अहिंसा धर्म का उपदेश दिया। पूरे भारत में भगवान महावीर के उपदेशों का पालन करते हुये श्रद्धापूर्वक उनका जन्मदिन महावीर जयंती के रूप में मनाता है।
(दिगंबर जैन मंदिर धर्मशाला मे महावीर जयंती पर उद्बोधन,जिसका प्रसारण #आकाशवाणी वाराणसी द्वारा दिनांक 21अप्रैल 2024 को सायं 5 बजे हुआ।)