अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
शनिवार, 29 मार्च 2025
व्योमवार्ता/ नये साल की पहली सुबह...../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1जनवरी 2023
सोमवार, 20 जुलाई 2020
व्योमवार्ता/ आज की सुबह नीरज जी के नाम
आज रिमझिम बारिस की सुबह चित्रांश गोपाल दास नीरज जी के नाम
आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा,
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा।
मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का,
मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का,
लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण,
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।
खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में,
मैंने भर-भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में,
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया,
जैसे मैं जी लिया किसी से,क्या इस तरह जिया जाएगा।
काजल और कटाक्षों पर तो, रीझ रही थी दुनिया सारी,
मैंने किंतु बरसने वाली, आँखों की आरती उतारी,
रंग उड़ गए सब सतरंगी, तार-तार हर साँस हो गई,
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो, ज़्यादा नहीं सिया जाएगा।
जब भी कोई सपना टूटा, मेरी आँख वहाँ बरसी है,
तड़पा हूँ मैं जब भी कोई, मछली पानी को तरसी है,
गीत दर्द का पहला बेटा, दुख है उसका खेल-नखिलौना,
कविता तब मीरा होगी जब,हँसकर ज़हर पिया जाएगा।
--डॉ० गोपाल दास नीरज
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20 जुलाई 2020
(बिष साथ बिष बिष😢)
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020
व्योमवार्ता/ वे विरोध मे हैं....... (कविता): व्योमेश चित्रवंश की कोरोना लाकडाऊन मे लिखी कविता, 3अप्रैल 2020
व्योमवार्ता/
वे विरोध में हैं.............
(कोरोना लाकडाऊन मे लिखी कवितायें)
वे विरोध मे हैं,
क्योंकि विरोध उनका सत्ता से है,
क्योंकि विरोध उनका मोदी से है,
उनका काम है विरोध करना,
क्योंकि विरोध करना उनकी फितरत है,
भले ही वह उनके हित मे न हो,
भले ही वह काम उनके लिए ही हो,
भले ही वह मुल्क और कौम के लिये हो,
परउन्हे विरोध करना है,
क्यों? शायद वे खुद भी नही जानते,
अपने विरोध का मौजूं कारण,
वे कहते है निजाम बदनीयत है,
पर कैसे? उन्ह खुद भी नही मालूम,
क्योंकि उन्हे जान कर भी कुछ नही करना है,
बस विरोध की बातें करनी है उन्हे,
क्यों? वे जानना भी नही चाहते,
उन्हें खुद की नीयति का भी नही पता,
पर वे खुश है विरोध कर,
अंधकूप मे बने रहने में,
बस विरोध करना है,
इसलिये वे विरोध में हैं......
(बनारस,3अप्रैल 2020, शुक्रवार) http://chitravansh.blogspot.in
मंगलवार, 21 अगस्त 2018
व्योमवार्ता/ जीवन के अर्द्घवृत्त पर...... : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 9मई 2018, सोमवार
जीवन में अर्द्धवृत्त पर
खड़ा पुरूष ,कैसा होता है
थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के पास,
खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद,
जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे,
जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ,
अनुभव की पूंजी हाथ में लिए,
परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में,
जो उसे नहीं मिल पाया था,
बस बहे जा रहा है समय की धारा में,
बीवी और प्यारे से बच्चों में
पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा,
रात को घर आता है, सुकून की तलाश में,
लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे ?
दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे,
पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था,
नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए,
लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए,
अब वो क्या कहे बच्चों से,
कि जेब में पैसे थोड़े कम थे,
कभी प्यार से, कभी डांट कर,
समझा देता है उनको,
एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है
आँख के कोने में,
लेकिन दिखती नहीं बच्चों को,
उस दिन दिखेगी उन्हें,
जब वो खुद, बन जाएंगे माँ बाप
अपने बच्चों के,
खाने की थाली में दो रोटी के साथ,
परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं,
कभी, यह कह कर
तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है,
कुछ कहते ही नहीं,
कभी, शिकायती स्वर
हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को,
कभी प्यार से बात भी कर लिया करो,
कभी, उलाहना
लड़की सयानी हो रही है,
तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता,
तो कभी जिम्मेदारी का एहसास,
लड़का हाथ से निकला जा रहा है,
तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है,
पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें,
शिकवे शिकायतें दुनिया भर की,
सबको पानी के घूंट के साथ,
गले के नीचे उतार लेता है,
जिसने एक बार हलाहल पान किया,
वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया,
यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है,
जिंदा रहने की चाह में,
फिर लेटते ही बिस्तर पर,
मर जाता है एक रात के लिए,
क्योंकि,
क्योंकि उसे
सुबह फिर जिंदा होना है,
काम पर जाना है,
कमा कर लाना है,
ताकि घर चल सके,
....ताकि घर चल सके
.....ताकि घर चल सके।।।।
(बनारस, 9मई 2018, बुधवार)
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शुक्रवार, 12 सितंबर 2008
व्योमेश की कविताये: आज इस ख्वाब को सच में....
हम गरीबो का भी एक देव बनाया जाए.
देव ऐसा जो चडावे पे न बिक जाए
बस्तिया छोड़ कें महलो में ना वो बस जाये
हम उसक सुने, उससे कहे अपने गम
मन का दुःख दर्द जिसे जा के सुनाया जाए।
उसका मन्दिर मरमरका ना हो कच्चा हो
वह कुछ और भले हो ना मगर सच्चा हो
सोने चंडी की नही, मूरत तो भी क्या है गम
खेत की माटी से उसकी मूरत को बनाया जाए।
हम गरीबो की रोटी में जो खुश हो ले
हमारे टूटे हुए बर्तन में जो पानी पी ले
हमारे टूटे हुए झोपडी में सो जाए जो
ऐसे ही देव को मन्दिर में बसाया जाए।
जो हर शाम हर मेहनतकश को रोटी दे दे
दिन के थके हारे को रातो को एक छत दे दे
और कुछ न दे तो वो हमको सलामत रखे
अपने उस देव से बस ये ही मनाया जाए।