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शनिवार, 29 मार्च 2025

व्योमवार्ता/ नये साल की पहली सुबह...../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1जनवरी 2023

नये साल की पहली सुबह/व्योमेश चित्रवंश की डायरी..

नये साल की पहली सुबह
ढेर सारे कुंहासे और धुंध से भरी
नही दिख रहे कोहरे से
सड़क पर चहलकदमी करते लोग
वे बच्चे भी नही
नये साल पर खुशियाँ मनाने वाले
आटो वाला टोपी पर मफलर बांधे
मुंह से धूंआ फेकते
कर रहा है सवारियों का इंतजार
धुले धुलाये आटो पर तिरंगा झण्डा संग
गैस वाला गुब्बारा लगाये
चूने से लिख कर 
हैप्पी न्यू ईयर 2023
चौराहे के एक कोने पर 
उजाड़ होते चितवन के नीचे 
जल रहे लकड़ी के बोटे के पास
खड़े बीट के सिपाहियों के संग
सिमटे सुकड़े बैठे है
काले भूरे कलुआ औ भूरा
उन्हे इंतजार है नुक्कड़ की दुकान पर
जलेबी कचौड़ी छनने और 
उसके फेंके हुये दोनो का
अखबार का बंडल बांधे 
निकल चुके है हाकर
मंदिर की सेवा करने वाले पंडितजी भी.
दोनो को जल्दी है खबरे पहुंचाने की
नेकी की दीवार के पास 
सोया पड़ा है मन्तोषवा
फिर कहीं से दारू पी कर
सब कुछ वैसे ही है
जैसे कल था
न कोरोना का खौफ
न कोई हड़बड़ी
घरों मे रजाई मे दुबके 
रविवार मना रहे लोगों को 
अब नही इंतजार है किसी 
बिग ब्रेकिंग का
सब कुछ सामान्य सा
हर कोई आराम से
चल रहा है
साल बदल रहा है
हम नही......
- #व्योमेश_चित्रवंश
(काशी,1जनवरी 2022, पौष शुक्ल दशमी सं०2079वि०)
#व्योमवार्ता




मंगलवार, 10 जनवरी 2023

व्योमवार्ता/ भारतीय इतिहास के नाम पर क्या परोसा गया....../व्योमेश चित्रवंश की डायरी,10जनवरी2023

🚩 *एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 ncert की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं!*  
       👉 जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में  लिखा है कि "आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयां मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयां मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थी।"
स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में है वे कोई नई नहीं है, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।
ऐसे ही वे आगे लिखते हैं "युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख देते थे, शेष जनता में बांट दिया जाता था।" यहां भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।
आगे एक जगह लिखा है "पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।"
आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है "खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।"
तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, उसने ncert में आरटीआई डाली कि इन बातों का आधार क्या है? आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।
जानकर आश्चर्य होगा कि ncert ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि ncert हमें इनका जवाब नहीं दे रही। कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और ncert को जवाब देने के लिए कहा। तब ncert ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।
ऋग्वेद में इंद्र को एक यौद्धा बताया गया है और उसमें आये #नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।
इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो  जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है?
संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है।
इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया?
तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।
कोर्ट -"और जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बांट लेते थे, उसका आधार क्या है?"
जेएनयू -"चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बांट रहे हैं।"
अब जेएनयू और ncert के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें!!
Ncert आगे कक्षा 11की हिस्ट्री में लिखती हैं "गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर #कुछ_खास_नहीं_कर_सका।
यहां ncert के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।
सच्चाई यह है कि ncert के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दुधर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।
सोनिया गांधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही है, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।
और हां, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि है। वे यूट्यूब पर हैं।
http://chitravansh.blogspot.com
(काशी,10जनवरी 2023,मंगलवार)
#नीरज_अत्री
#व्योमवार्ता

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

व्योमवार्ता /काँन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझे..

कान्वेंट शब्द के मायने.

                सोशल मीडिया भी अकसर महत्वपूर्ण जानकारियां व सूचनायें दे जाता है। आज ऐसे ही यह छोटा सा लेख फेसबुक पर किसी ने लगाया था। पढ़ कर जिज्ञासा हुई तो गुगल बाबा और विकीपिडिया से तथ्यों का सत्यापन किया। मेरा यह दावा नही है कि गुगल और विकिपीडिया पर तथ्य प्रामाणिक ही होगें पर तथ्यों के ऐतिहासिक संदर्भ उन्हे गलत भी नही सिद्ध करते। बहरहाल फेसबुक पर मिली पोस्ट ज्यों की त्यों रख रहा हूं  इसमे कोई तथ्यपरक जानकारी द्वारा सार्थक परिमार्जन, परिवर्द्धन, संशोधन होने पर संभवतः तथ्यों मे ज्ञानवृद्धि ही होगी।
    ‘काँन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।
ब्रिटेन में एक कानून था *लिव इन रिलेशनशिप* बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना। जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।
अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज _अवैध हैं उनके लिए काँन्वेंट बने।
                     उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है ना ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज। इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन् 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था। परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।
जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वो लिखता है कि:
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा।
इनको अपने मुहावरे नहीं मालुम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा। अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा?
लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”। दुनियाँ में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।
भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं। आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल, माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल। अब इन मूर्खो को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना?
दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजो का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने वो सभी चीजो को पोषित और संचित किया। और हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलामी सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।
(काशी,18मार्च2022,होली)
http://chitravansh.blogspot.com
#व्योमवार्ता
#कान्वेण्ट की #हकीकत
#गुलामी_मानसिकता

सोमवार, 13 सितंबर 2021

व्योमवार्ता/धरती के भगवान (भाग-8)

व्योमवार्ता/धरती के भगवान (भाग-8) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13सितंबर2021

            आज चर्चा उन चिकित्सकों की जो आज भी चिकित्सा धर्म के प्रति अपने समर्पण से वास्तव मे धरती के भगवान कहे जा सकते  हैं। ये नव दधिचि बिना प्रचार प्रसार के अपने मरीजों की सेवा करते हुये हिप्पोक्रित्ज के शपथ को आज भी अपने जीवनर्या  मे शामिल किये हैं। ऐसे ही एक युवा और समर्पित चिकित्सक है काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान मे मेडिसिन के प्रोफेसर डा० दीपक गौतम। डा० दीपक मेडिसिन विभाग के लगभग सभी ओपीडी मे अपनी सेवा दे चुके है चाहे वह किशोर चिकित्सा हो या जरायु चिकित्सा या माडर्न जनरल मेडिसिन, पर हर विभाग से दूसरे विभाग मे जाने के बाद भी उनके पुराने मरीजों की फेहरिस्त उनसे जुड़ी ही रहती है। डा० गौतम के बार बार विभाग बदलने के पीछे संस्थान की अंदरूनी राजनीति भी हो सकती है पर इससे उनके चिकित्सा धर्म पर कोई साईड इफेक्ट नही पड़ता। अपने चैम्बर मे भीड़ भरे पर  तनाव मुक्त माहौल मे  सबसे मुस्करा कर सबकी समस्यायें सुनते सबको सामान्य भाव से सबको समझाते रहते है। कोई तनाव नही कोई उलझन नही चेहरे पर एक आत्मसंतोष व मन मे सेवा भाव ही सामने बैठे मरीज के मन मे आत्मविश्वास भर देता है।
                 डॉ०दीपक गौतम के सेवा भाव का कायल मै पांच साल पहले हुआ। मेरी माँ के पाटस्पाईन के सर्जरी के बाद उन्हे मेडिसिन वार्ड मे भरती करना पड़ा था। डा० दीपक गौतम जी के देखरेख मे उन्हे प्राईवेट वार्ड मे भरती कराया गया। जो लोग बीएचयू हास्पीटल से परिचित होगें उन्हे मालूम होगा कि सर सुन्दर लाल अस्पताल का प्राईवेट वार्ड अस्पताल के बिलकुल किनारे है ठीक आईएमएस के सामने। मेडिसिन वार्ड से प्राईवेट वार्ड की अच्छी खासी दूरी। मिलने वाले और परिचितजन पूछते थे कि यहां प्राईवेट वार्ड मे क्यों भरती करा दिये यहां तो डाक्टर आते ही नही है।वार्ड से ही चले जाते है। यह सुन कर हम भी पहले दिन काफी परेशान हुये पर यह परेशानी मेरे लिये मात्र इसलिये नही खड़ी हुई क्योंकि मेरी माँ की चिकित्सा डॉ०दीपक गौतम कर रहे थे। दिन भर मे कम से कम चार बार स्वयं आने और हर दो घंटे पर अपने रेजिडेंट डाक्टरों को भेजने मे उनसे किसी दिन कोताही या लापरवाही हुई हो याद नही। ऐसा नही ये सिर्फ मेरी माँ के साथ हुआ हो बल्कि अपने हर मरीज के बारे मे उनकी जिम्मेदारी और फीडबैक लेना डा० दीपक गौतम का स्वभाव है।
       मॉ के डिस्चार्ज होने के दो महीने के बाद एक बार उनकी रिपोर्ट लेकर डा० दीपक गौतम जी को दिखाना था। मै कचहरी से होकर अपने मित्र सूर्यभान जी के साथ समय से निकलने के बावजूद  शहर के जाम मे उलझ कर जब तक उनके ओपीडी पहुंचा। ओपीडी बंद हो चुके काफी देर चुकी थी और वे निकल चुके थे। मैने उनके मोबाइल नंबर पर  एक बार संपर्क करने का प्रयास यह सोच कर किया कि संभवतः संस्थान मे मिल जायें तो मुझे फिर से पूरे शहर का चक्कर काट कर आना नही पड़ेगा। मोबाइल मिलते ही उन्होने बताया कि वे तो आवास पर पहुँच चुके है। मैने कोई बात नही कहते हुये फोन काट दिया। तभी पुन: उनका कालबैक आया "आप कहां पर है और कहां जाना है? " मेरे बताने पर कि अब हास्पीटल से निकल रहा हूँ, उन्होने पूछा कि "किधर से आप जायेगें।आप बृजइंक्लेव मेरे आवास पर आ सकते है तो आपको दूबारा नही आना होगा।" आश्चर्य यह कि तब तक मै उनके लिये एक अननोन नंबर ही था, जिसे वे शायद पहचानते भी नही थे। जब मै उनके बताये लेन मे बृजइंक्लेव पहुंचा तो वे लेन मे खड़े मेरा इंतजार कर रहे थे।उन्होने न सिर्फ रिपोर्ट देख कर दवाओं मे परिवर्तन किया बल्कि घर मे अकेले रहने होने के बावजूद स्वयं चाय बना कर भी हम लोगों को पिलाये।मेरे धन्यवाद देने पर वे और विनम्र हो गये, "अरे ये तो मेरा काम ही है। आपको केवल इसके लिये दूबारा इतनी दूर से आना पड़ता। "
     रास्ते मे लौटते समय हम और सूर्यभान जी यही बात कर रहे थे कि आज के चिकित्सा स्वार्थ के धंधे मे यह चिकित्सा धर्म बिरले ही देखने को मिलता है।ऐसा अनुभव मात्र हमारे साथ ही नही औरों के साथ भी हुआ है। जो भी डा० दीपक गौतम के यहां गया उनका कायल बन कर ही लौटा। यहीं कारण है कि उनके मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है और अपने मरीजों की सेवा  मे ही अपना सुख पाने वाले डॉ०दीपक गौतम के प्रशंसको का सूकून भी।
       आज भी ऐसे ही डाक्टरों से चिकित्सा धर्म की प्रतिष्ठा बनी हुई है जो आधुनिक दधिचि, चरक और सुश्रुत के रूप मे सेवा भाव मे लगे हुये है। धन्यवाद #डॉ०दीपक_गौतम।
#धरती_के_भगवान
#व्योमवार्ता
#मानवगिद्ध
काशी, 13सितंबर 2021,सोमवार


सोमवार, 17 अगस्त 2020

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती...(२) पूर्वपीठिका

पूर्वपीठिका/

मेरे गॉव को जाने वाली सड़क
                                                                              यह कोई पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम नही था पर परिवार खानदान के लोगों मे यह इच्छा कई वर्ष से चल रही
थी।  समस्या यह थी कि सबको एक संग कैसे लाया जाय। अब हमारा खानदान गॉव से निकल कर महानगरों के रास्ते मुंबई, दिल्ली, पूने, लखनऊ होते हुये सात संमुदर पार सिंगापुर तक जा बसा था।पिछले दो ढाई दशक दशकों से खानदानी तनातनी नें परिवारों के मध्यएक अबूझ सा मौन अंतराल बना दिया था ऐसे मे किसी सामूहिक कार्यक्रम के लिये सबको एकराय कर एकमंच पर ले आना तराजू के एक पलड़े पर मेढक तौलने के समान था। पर इसे संयोग ही कहें कि बात चल निकली तो परिवार के ही रेलवे से अगले छमाही मे अवकाशप्राप्त करने वाले चाचा ने जजमान बनने के लिये हामी भरते हुये गया महायज्ञ कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने को कहा। अब सवाल यह था कि कार्यक्रम का अगुआ कौन बने?क्योंकि इसमे अगुआ की भूमिका ही संयोजक की थी जो गॉव से लेकर शहर तक ही नही बल्कि देश विदेश मे रहने वाले सबके साथ सामंजस्य बैठा सके।उसे सर्वमान्य होने के साथ साथ गॉव से संपर्क मे रहना भी आवश्यक था। इस तरह यह जिम्मेदारी मुझे दे दी गई। सारी व्यवस्थाओं को करने मे मै पिछले दो तीन महीने तक लगभग हर रविवार को गॉव जा कर गया महायज्ञ की व्यवस्थाओं को करता रहा चौकी से लेकर यज्ञ पूजा तक, मजदूर से लेकर हलवाई तक। गॉव पर रहने वाले हमारे खानदानी पटिदार रविकान्त मास्टर स्थानीय स्तर पर हमेसा मेरे लिये खड़े पैर सहयोगी बने रहे। टेन्ट,बुफे , चाय ,नास्ता, बिस्तर ,पूजा,  निमंत्रण ,आवागमन ,बिजली पानी के इंतजामात मे ही हमे यह महसूस होने लगा था कि अब गॉव पहले जैसा नही रहा। पर रविवार को जाकर दो घंटे मे वापस आ जाने पर इसके पीछे के कारण को समझना आसान नही था ।फिर दो महीने बाद 23 सितंबर आया जब गया जाने के पहले सप्ताह भर चलने वाले भागवत् कथा के लिये पूरा खानदान तीस चालीस बरस बाद एक साथ जमा होना था गॉव पर, सबके मन मे उत्साह था। मै खुद लगभग पचीस सालों बाद अपने गॉव रात रूकने और दस दिन वहॉ रूकने जा रहा था।पचीस  या शायद उससे भी ज्यादे, याद नही । हम अपने गॉव जा रहे
थे। अपना गाॅव जो अब भी मेरे मन में हमेशा जीता है, अकसर अकेले रहने पर चुभता है, पुचकारता है, गुदगुदी करता है। कभी आँखें नम हो जाती है और कभी अकेले में अनायास ही मुस्करा देता हॅू। मेरे द्वारा बार-बार बताये गये किस्से कहानियों का मेरा पुत्र कभी अचरज भी निगाहों से सुनता है, कभी न विश्वास करने वाले मन से गुनता है। इधर काफी दिनों से उसकी जिद थी कि हम भी देखें गाॅव कैसा होता है? वह क्या वैसा ही होता है जैसा रामायण, दूरदर्शन और बाकी सीरियलों में दिखाते है या जैसा आप बताते है। पत्नी और पुत्र भी साथ थे । मै उसे अपने गॉव के बारे मे बताता चल रहा था।
शहर पार करते ही मोदी जी की कृपा से बने शानदार फोरलेन हाइवे पर बाईस किमी कब बीत गये पता ही नही चला।मेरा मन कार की गति से भी तेज अतीत की टेढ़े-मेढ़े चलचित्र वाले रास्ते पर भाग रहा था। जब पिण्डरा बाजार से पहले बाबतपुर एयरपोर्ट से आगे बढ़ते ही अब दायी ओर निकलती सड़क पिण्डरा बाजार फूलपुर को चली जाती है। पहले यही मूल सड़क हुआ करती थी जो लखनऊ से आते हुए जौनपुर को त्रिलोचन महादेव से पार करती हुई डिग्घी पर अब करखियाॅव एग्रो पार्क में बनारस की सीमा में प्रवेश करती थी और फूलपुर मीरासाहब पिण्डरा, कैथोली होते हुए
बाबतपुर एयरपोर्ट के बगल राष्ट्रीय राजमार्ग 56 बनाती थी। पर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन एनडीए वाले मोदीसरकार में जब सड़कों का चौड़ीकरण होना प्रारम्भ हुआ तो बनारस लखनऊ राजमार्ग को भीड़भाड़ वाले बाजारों से बाहर सुगमयातायात योजनान्तर्गत इसे पिण्डरा, फूलपुर और त्रिलोचन बाजार के बाहर-बाहर पश्चिम की ओर से निकाल दिया गया तो पुरानी वाली मुख्य सड़क से जाते है हमारे गाॅव। मुख्य हाईवे छोड़ते ही उबड़-खाबड़ उखड़ी हुई सड़क ने पुनः गाॅवों के प्रति प्रशासनिक व्यवस्था के उदासीनता से मन खिन्न कर दिया। पिण्डरा बाजार की भीड़भाड़
अभी भी वैसी ही है जैसे पहले हुआ करती थी। हाॅ भीड़ में थोड़ा शहरीपन का प्रभाव दिखने लगा है। पिण्डरा बाजार के बाद नेशनल इण्टर कालेज से आगे पेट्रोल पम्प के पास से बायी ओंर अन्दर जनपद की नई तहसील पिण्डरा बन गयी है। पहले वहाॅ जमापुर नर्सरी हुआ करती थी जहाॅ से कई बार पौधे खरीद कर हमने गाॅव पर लगाया था और उनमें से ज्यादातर आज पेड़ बन गये है। कठिराॅव वाला मोड़ पार करते ही मीराशाह का बगीचा और पोखरा अभी भी वैसे ही है। शान्त निर्जन भूतहा जैसे। मेरा मन पुरानी यादों की तरफ फिर भागने लगता है। नाद नदी पार कर फूलपुर थाने से शुरू होता है फूलपुर बाजार। इसी फूलपुर से पूरब दिशा में एक सड़क निकलती है जो जाकर सिन्धोरा में बनारस केराकत रोड़ में मिल जाती है। दूसरी सड़क पर रेलवे लाईन को डाॅकने के बाद आगे एक और सड़क निकलती है जो सीधे मेरे गाॅव को जाती है।
मैं, फूलपुर बाजार की देर सारी बातें याद करता हुआ कार पूरब वाली सड़क पर मोड़ देता हॅू। अब यह मोड़ काफी भीड़ भरा हो गया। मुख्य सड़क के पश्चिम पटरी पर खुले नये बैंक के ठीक सामने से निकल रही सड़क पर ढेर सारे टैम्पो खड़े है जो अब सुबह के सात बजे से रात के सात आठ बजे तक फूलपुर सिन्धोरा के बीच चलते रहते हैं। टैम्पों को रिजर्व कर भाड़े पर उसे अन्दर के गाॅवों में भी ले जाया जा सकता है। मोड़ पर ही कई बड़े-बड़े मार्गदर्शक बोर्ड भी लगे हुए हे। नवोदय विद्यालय खालिसपुर रेलवे स्टेशन से लेकर पावर हाउस तक के। मोड़ पर दो-तीन मिठाई की दुकाने भी खुल गयी है और उन्हीं दुकानों की आड़ में उत्तर पटरी पर भारत सरकार की विशिष्ठ परियोजना का सामुदायिक स्वास्थ्य मातृ शिशु कल्याण केन्द्र जो अब स्वास्थ्य सेवाओं के देने के बदले में सार्वजनिक मूत्रालय के रूप में ज्यादा प्रयुक्त होता है। बाजार से सड़क पर आगे बढ़ते ही कंजड़ों की बस्ती है जहाॅ उनके परिवार की महिलाएं आज भी अपने
परम्परागत व्यवसाय कच्ची शराब उतारती है। सड़क से निकलते समय सड़ते हुए महुआ की महक और बीच-बीच में छोटी-छोटी मड़ईयों में सूअर के गोस्त की दुकानों से सिमटी सड़क। अच्छाई यही है कि यहाॅ सड़क पर बस सही लोग
रूकते है जो उन दुकानों के अथवा दुकानों के पीछे चलने वाले ठर्रा के ग्राहक है। अब फूलपुर से सिन्धोरा वाली रोड भी भर गयी है। सन् 1985 में राजीव गाॅधी के सत्ता से पहले यह रोड नही हुआ करती थी बल्कि कच्ची सड़क थी जो बरसात में कीचड़ और गर्मियों में कंकड़ पत्थर सिटकी रहित सफेद रेहटा से चमकती रहती थी। उजाड़ बीरान में किसी विधवा के खाली माॅग की तरफ। बाजार से निकलने के बाद एक किमी वाले पत्थर के पास ही बायीं तरफ अम्बेडकर जी की एक चबूतरे पर विद्यमान है और उनके चारों तरफ बने छोटे-छोटे कमरों के बीच से बने रास्ते पर एक नीला बोर्ड
लगा है भारतीय संविधान के निर्माता बोधिसत्व भारतरत्न बाबासाहब डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर आदिप्राथमिक बेसिक पाठशाला फूलपुर। जहाॅ तक मुझे जानकारी है यह सरकारी बेसिक प्राइमरी स्कूल है पर कब इसका नाम भारतीय संविधान के निर्माता बोधिसत्व भारतरत्न बाबा भीमराव अम्बेडकर के नाम पर हो गया। यह शायद शिक्षा विभाग केअधिकारी भी नही बता पायें। कभी-कभी मैं सोचता हॅू कि यह विडम्बना ही है कि मूर्तिपूजा के विरोध में प्रवर्तित किये गये बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध की मूर्ति विश्व में सर्वाधिक है। ठीक उसी तरह उनके अनुयायी भीमराव अम्बेडकर के साथ भी यही बिडम्बना दुहराई गयी। शायद ही भारत का कोई गाॅव बचा हो जहाॅ बाबा साहब अम्बेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कह कर उनकी मूर्ति स्थापित न की गयी हो। इस जातिगत राजनीति में हम इतने स्वार्थवादी हो गयी है कि अपने संविधान को भी बाबा साहब अम्बेडकर का संविधान कहकर छद्म तथ्यों वाले
इतिहास को प्रश्रय देते जा रहे हैं।
मेरा ध्यान रेलगाड़ी के लम्बे हार्न की आवाज से पुनः सड़क पर चला जाता है। सामने रेलवे फाटक बन्द है और धड़धड़ाते हुए एक एक्सप्रेस रेलगाड़ी बिना खालिसपुर स्टेशन पर रूके निकल जाती है। अब इस रेल लाईन का भी विद्युतीकरण हो गया है। हाबड़ा से पंजाब मेन लाईन की शुरूआत सन् 1872 ई0 में हुई थी।बनारस से लखनऊ मेन लाइन जफराबाद तक शुरू से ही डबल ट्रैक में विछाई गयी थी और समुद्रतल से लगभग 82
मीटर उचाई पर इस रेलवे ट्रैक पर शुरूआत से ही खालिसपुर (केएस एफ) स्टेशन बनाया गया था। भौगोलिक लिहाज से बनारस जनपद के उत्तरी छोर का आखिरी रेलवे मुकान और सामाजिक व वास्तविक दृष्टि से लगभग 50 वर्ग किमी के क्षेत्र में अकेले यातायात व परिवहन का सहारा था यह खालिसपुर रेलवे स्टेशन। स्टेशन भवन अंग्रेजी व पाश्चात्य शैली में बना है जो शायद 1872 का ही बना हो। पहले कोयले वाले इंजन फिर डीजल इंजन और अब बिजली से चालित रेलगाड़ियों का इतिहास समेट रखा है। खालिसपुर स्टेशन के इस पुराने भवन ने अंग्रेजों के जमाने की लाल पगड़ी
वाली पुलिस से लेकर भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग भी इस गुंबदवाले चन्द्राकार छत के जेहन में ताजा है। रेलवेफाटक पार करते ही बायी ओर कंक्रीट स्लीपर प्लान्ट है। सन् 1980 में जब पंडित कमलापति त्रिपाठी जब बनारस से सांसद बने थे तो रेलमन्त्री के रूप में उन्होंने यह तोहफा दिया था। इस विकास से भूले विसरे धूल धूसरित इलाके को। पर रेलवे के अफसरान की लापरवाही कहे या इस इलाके का दुर्भाग्य यह प्लान्ट अब बन्द हो चुका है। यहाॅ काम कर रहे मजदूरों, कर्मचारियों को अब कहीं और स्थानान्तरित कर दिया गया है। यहाॅ बचे है फैक्ट्री के चलने के समय के बने रेलवे के वीरान क्वाटर्स बन्द पड़ी फैक्टरी पर लगा बड़ा सा ताला और यहाॅ के बेरोजगारी भरी दुर्भाग्य। फैक्टरी के बनने और चलने का पश्चातवर्ती प्रभाव यह पड़ा कि कभी उजाड़ खण्ड में बियादान में डेढ़ दो किलोमीटर से दिखाई देने वाले खालिसपुर रेलवे स्टेशन और रेलवे सिग्नल ट्रैक पर चलने वाली रेलवे गाड़ियां अब यहाॅ बाजार रूपी दुकानों के मध्य स्थित होने से नजर नही आती। फाटक के दोनों तरफ कुल मिलाकर सौ दुकाने चलती फिरती घूमती टहलती भीड़ का माहौल को कस्बानुमा बनाती है। अब तो भारतीय स्टेट बैंक की नई शाखा भी खुल गयी है जो बताने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण है कि देष का विकास चल कर इस पिछड़े तिरस्कृत इलाके तक पहुॅच गया है। जहाॅ लोगों की जेब और
बैंक के काउन्टरों में आपसी तालमेल का एक रिश्ता बनकर आम जन को बचत एवं पॅूजी के महत्व को बताता है।बचत न रहने पर ऋण भी दिये जाते है जिसकी ईन्द्रजालिक व्यवस्था बैंक अधिकारी ऋणी एवं बीच का माध्यम दलाल वर्ग वखूबी से सम्पादित करता है। इसी सड़क पर फूलपुर से लगभग साढे चार किलोमीटर आगे चलने पर पंचवटी की पर्णकुटी जैसा वातावरण सूखे वीरान सड़क पर रेगिस्तान के बीच हरियाली के मिलने जैसा ही है। गाॅव देवजी का यह छोटा सा हरा भरा छायादार क्षेत्र पनवरिया के नाम से जाना जाता है। बताते है कि पहले यहाॅ देशी पान की खेती होती थी। पोखरे के किनारे लगे बसवांर के आड़ में सरपत की छोटी छोटी टाटियां बनाकर पान की खेती करते थे यहाॅ के बरई लोग। बस पनवरिया से बाये हाथ उतर जाती है हमारे गाॅव की सड़क। मैं मुड़ते हुए अगल-बगल के खेतों को पहचानने लगता हॅू। पचास मीटर थोड़ा सा आगे सिन्धोरा रोड पर नया-नया पेट्रोल पम्प खुल गया है। हमें याद आता है कि कैसे पन्द्रह साल पहले तक पेट्रोल डीजल के लिए हमारा गाॅव पिण्डरा बाजार या सिन्धोरा मरूई बाजार के पेट्रोल पम्पों पर आश्रित था। पन्द्रह वर्ष पूर्व जब गाजीपुर के पूर्व सांसद मनोज सिन्हा का पेट्रोल पम्प थाना
फूलपुर के बगल में खुला तो हमारे गाॅव के लोग बहुत खुश हुए थे और अब तो यह पेट्रोल पम्प लगभग गॅाव में खुल गया। मोड़ पर ही मुर्गा की कुछ दुकाने भी खुल गयी है। हाल में ही कोई बता रहा था कि अब बगल वाले गाॅव के बाजार में देशी दारू का ठीका भी खुल गया है। यह भी एक शोध का विषय है कि जैसे-जैसे इस देश में महगाई बढ़ती गयी उससे भी तेज गति से यहा शराब और मुर्गे मांस मछली की दुकाने खुली ही नही बथ्लक खुली फली भी और बार-बार मद्य निषेध विभाग द्वारा शराब मुक्ति और नशामुक्ति के लाख प्रयासों के बावजूद आबकारी विभाग किस तरह अपने लक्ष्य को हर वर्ष बढ़ाकर प्राप्त करने में सफल रहता है।
अपनी इस सोच पर खुद ही मुस्कराता हुआ मैं चारे वाली फैक्टरी के बगल से होता हुआ सड़क पर खुली रमजान मियां की नई दुकान से होते हुए गाॅव में घुस गया। वहाॅ भी गाॅव में घुसते ही बाये तरफ अम्बेडकर बाबा का नया मन्दिर बन गया है। संविधान बाये हाथ में थामे दूसरे हाथ को उठाये गौतम बुद्ध के मूर्ति पूजा विरोधी बौद्ध धर्म के अनुयायी डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर। मेरे गाॅव के अंबेडकर अनुयायियों ने मूर्ति व अपूर्ण मन्दिर के आस-पास गाॅव सभा की इस बंजर भूमि पर सात
आठ पेड़ लगा दिये हैं। चलो कम से कम इसी बहाने थोड़ी हरियाली तो हैं। मैने सड़क पर लगे पत्थर को देखा नदोय 1 किलोमीटर। सड़क सीधे गाॅव में चली गयी। हाॅ मेरे गाॅव में जाने वाली सड़क है ।यही सड़क मेरे गाॅव को चली जाती है।
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष ।

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष । व्योमेश चित्रवंश की डायरी,2४ मार्च २०२०, मंगलवार

अपनी मनपसंद दो किताबो को कल देर रात दुबारा पढ कर समाप्त किया। डेल कार्नेगी की किताब पिछली सदी मे 1993 मे खरीद कर पढ़ने के बाद आलमारी में रखी शोभायमान बन गई थी, हालॉकि उसके सिद्धान्त आज भी मेरे व्यवहार मे है। जबकि स्यालकोट सागा 2016 मे आते ही खरीद कर दो दिन तक लगातार पढ़ते हुये मिले रोमांच भरे एहसास के बाद कई लोगों को पढ़वाने के बाद रख दिया था।
जब सब कुछ लाकडाऊन है ऐसे मे खुद को व्यस्त रहने  का मेरे लिये एकमात्र तरीका किताबें पढ़ना ही है। आज  बड़े भाई मित्र राजीवअस्थाना Rajeeva Kumar Asthana वकील साहब ने के एम मुंशी की भगवान परशुराम और अशोक के बैंकर की दशाराजम भेजवाया है। उम्मीद है कि दो दिन की टाईम की खुराकी इससे पूरी हो जायेगी। और कल से नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हो जायेगा तो सोशल मीडिया से कट कर थोड़ा और समय मिलने पर यह खुराकी बढ़ भी सकती है।
कोरोना को भगाना है, कहीं नही जाना है।
घर मे रहना है, किताबें पढ़ना है।😊😊
(बनारस, 24मार्च2020, मंगलवार, 8.00बजे प्रात:)
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना  ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

                  पिछले सप्ताह अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के मित्र ओम प्रकाश राय यायावर का उपन्यास काशी टेल पढ़ा। इस किताब को पढ़ने की काफी दिनों से ईच्छा रहने के बावजूद किन्ही न किन्ही कारणों से यह पढ़ने से छूट जा रही थी। हालॉकि ओम प्रकाश जी ने भी इसके लिये एक बार उलाहना दे डाला, सो अबकी बार किताब उठाई तो पूरा पढ़ने के बाद ही दूसरे काम हाथ मे लिया। फिर किताब के बारे मे सोचते हुये लिखने मे देर हो गई। बहरहाल आज इस काम को भी पूरा करने का मन मिजाज बना के बैठा हूँ। ओम प्रकाश राय बिहार से बनारस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने आये तो औरों की तरह हमारी सर्व विद्या की राजधानी ने दोनो बॉहें फैलाये इन्हे स्वीकार कर लिया अभी वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे ही उच्च अध्ययनरत हैं।बनारस टेल इसी बीएचयू के शिक्षा संकाय की कथा है जिसमे बड़े बेबाकी से आज कल बीएड करने वाले छात्रों के मनस्थिति व परिस्थिति को दिखाते हुये यात्रा करती है, बिहार से  आये निहाल पाणे के साथ, तो रामनगर की आईपीएस मुस्लिम पिता व हिन्दू मॉ की पुत्री सदफ के साथ कमच्छा से गोदौलिया तक, रामनगर सामनेघाट से लंका तक, रेवड़ी तालाब के जय नारायण इंटर कालेज के खाली बीरान मैदान से दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर  चढ़ते उतरते ,बीएचयू की अमराईयों मे टहलते हुये सेण्ट्रल आफिस तक।
कभी सिविलसर्विस और पीसीएस के रिजल्ट मे अपना बड़ा सा घेरा बनाने वाले आक्सफोर्ड आफ ईस्ट के शहर कहे जाने वाले ईलाहाबाद अब प्रयागराज मे पीसीएस की तैयारी करने वाला बिहारी निम्न मध्यवर्गीय आय वाले परिवार का लड़का निहाल पाण्डेय, अपने पिता की उलाहनाओं से अाजिज आकर एक सिक्योर्ड नैकरी मास्टरी के  लिये बीएड करने  बीएचयू  आ जाता है। वहॉ उसकी मुलाकात उच्च आयवर्गीय मुस्लिम परिवार की सदफ से होती है। पहली मुलाकात के बाद दोनो के बीच दोस्ती से थोड़ा बढ़ कर मधुर रिश्ता बन जाता है। चंचल शोख सदफ के संगत मे अपने मे सिमटे रहने वाला निहाल भरपूर कालेज जीवन के दोस्ती का लुत्फ उठाने लगते है। इस दोस्ती ईश्क मोहब्बत के साथ साथ हास्टल जीवन की चुहलबाजिया, बदमासियॉ और बिन्दास अंदाज किताब की रोचकता को जीवन्त करते हैं। कहानी मे ठहराव आता है तो कहानी हाथ से फिसलती जान पड़ती है पर फिर से बिहार के अपने गॉव मे स्कूली शिक्षा मे अलख जगाने की कोशिश कर रहे निहाल पाणे बाबा कहानी के छोर को थाम लेते है।
कुल मिला कर ओम प्रकाश राय ने कथा को रोचक बनाने मे कोई कसर नही छोड़ा है और जो लोग बनारस, पश्चिम बिहार के भूगोल, और संस्कृति से परिचित है उनके लिये कहानी से जुड़ाव व अपनापन लगना स्वाभाविक है। बनारस टेल बेहतरीन कोशिश है इधर आये बनारस , बीएचयू, बिहार से जुड़े उपन्यासों की कड़ी में।
(बनारस, 18फरवरी,2020, मंगलवार)
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सोमवार, 1 जुलाई 2019

व्योमवार्ता/ जून 2019 में पढ़ी गई किताबें : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30जून 2019

व्योमवार्ता / जून 2019 में पढ़ी किताबें :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30जून 2019

       आज जून 2019 के आखिरी रात डायरी के इस पृष्ठ को लिखते हुये खुशी महसूस कर रहा हूँ। अप्रैल तक अपने पढ़ने की आदत छूटने से मन मे एक बेचैनी महसूस कर रहा था सोशल मीडिया और मोबाईल ने पढ़ने की आदत को समाप्त तो नही पर बहुत कम कर दिया था, लिहाजा पिछले जन्मदिन को यह संकल्प लिया कि प्रत्येक सप्ताह एक किताब अवश्य पढ़ूगॉ। मई मे लिया गया  यह संकल्प इस माह भी आशुतोष अवढर दानी की कृपा से सफलतापूर्वक संपूर्ण हुआ। प्रभु की कृपा हैऔर खुद को बहुत संतोष अनुभव हो रहा है।
इस महीने कुल चार किताबें हमने पढ़ा जिनमे से तीन तो वर्ष भर पूर्व से खरीदने के बाद आलमारी की शोभा बनी हुई थी। आश्विन संघी की the rozabal line , प्रभात बांधुल्या की बनारस वाला ईश्क, आशुतोष राणा की मौन मुस्कान की मार और शारदेन्दु बंधोपाध्याय की व्योमकेश बख्शी की रहस्यमयी कहानियॉ जाने कब से आलमारी से ताकते हुये हमारा इंतजार कर रही थी।
                     दि रोजाबल लाईन वर्ष 2015 मे दशहरे की छुट्टीयों मे दिल्ली रहने के दौरान लिया था, पचास साठ पेज पढ़े भी फिर किताब धरा गई तो उसका नंबर ही नही आया, हालॉकि उसके बाद आश्विन सांघी की आई किताबों कृष्णा की, चाणक्या चैंट, प्राईवेट इंडिया,दि स्यालकोट सागा, 13 स्टेप्स टू ब्लडी गुडलक को हमने आनलाईन मंगा कर पढ़ लिया था, पर रोजाबल लाईन बेचारी बेकसूर होते हुये भी मेरे पुस्तक संग्रह मे आश्विन सांघी के प्रथम पुस्तक व स्वयं उनकी लिखी हुई प्रथम पुस्तक हो कर भी हसरतों से हमे देखा करती थी। आखिरकार जून के संकल्प मे यह पढ़ ली गई। अकसर हमे आश्चर्य होता है आश्विन सांघी के लेखन क्षमता पर कि वह एक सफल व्यापारी होते हुये भी कैस विभिन्न विषयों की विविधताओं को समेटे इतनी जबर्दस्त रचनायें कर लेते है, उनके लेखन मे विज्ञान धर्म इतिहास मिथक अध्यात्म राजनीति का अद्भुत सामंजस्य रहस्य व रोमांचक कल्पनाओं से जुड़ा रहता है कि आप पूरी किताब पढ़ते समय यह तय ही नही कर पाते कि हम उपन्यास पढ़ रहे है कि विशेष शोधपरक तथ्य। रोजाबल लाईन की कहानी ईसा से २००० वर्ष पूर्व से प्रारंभ हो सन २०१२ तक के कालखण्ड के बिखरे मिथकों को ले कर पिरोई गई है जिसमे गौतम बुद्ध से लेकर जीसस क्राईस्ट और मोहम्मद से होते हुये ओसामा बिन लादेन तक के पात्रों को समेटते हुये रहस्य, षडयंत्र, अपऱाध का तानाबाना है, शुरूआती पृष्ठों मे बिखरे कालखण्ड के मिथक समेटने मे परेशानी होती है पर बाद मे किताब आपको पूरी तरह बॉधने मे सफल रहती है और अपने सवाल कि क्या जीसस भारत आये थे और भारत मे ही उनकी मृत्यु काश्मीर मे हुई थी। कश्मीर का रोजाबल दरगाह किसी मुस्लिम धर्मावलंबी की नही बल्कि जीसस क्राईस्ट की कब्र है । यह स्थापित करने मे लगभग सफल रहती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है किताब के साथ दिये गये संदर्भ सूची जिसमे प्रमाण सहित २०९ संदर्भों का उल्लेख है, वे कहानी को अपने प्रामाणिकता व मूल तक पहुँचाने मे सहायक है। एक और बात जो इस किताब के बारे मे याद रखने लायक है वह यह कि प्रचलित धारा व मान्यताओं के विपरीत लिखे इस कथानक को आश्विन संघी भी पहली बार प्रकाशित करते समय अपने नाम से छपवाने की हिम्मत नही कर सके थे और द रोज़ाबाल लाइन, 2007 में एक छद्‌मनाम शॉन हेगिन्स से स्वयं प्रकाशित करवाया था। इस सिद्धांत पर आधारित यह धर्म शास्त्रीय थ्रिलार कि जीज़स की मृत्यु कश्मीर में हुई थी, बाद में उनके अपने नाम से 2008 में वैस्टलैंड से प्रकाशित हुआ और वैस्टसैलर बन गया और कई महीनों तक राष्ट्रीय वैस्टसैलर सूचियों में बना रहा।
अश्विन व्यवसाय से उद्यमी हैं लेकिन रोमांच विधा में ऐतिहासिक उपन्यास लिखना अश्विन का जुनून और शौक़ है। सांघी ने कैथीड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल, मुंबई, और सेंट ज़ेवियर कॉलेज, मुंबई से शिक्षा प्राप्त की थी और येल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की और क्रिएटिव राइटिंग में पीएचडी किया है।
अश्विन के लेखन व रोजाबल लाईन के बारे समीक्षकों के विचार देखें तो  अश्विन हम सब को विभिन्न दशकों में दुनिया की सैर पर ले जाते हैं तो धर्म, इतिहास और राजनीति के प्रति सांघी का रुझान स्पष्ट झलकता है। तुलनात्मक धर्म, ख़तरनाक रहस्यों और रोमांचकारी कथानक का मेल एक रहस्यपूर्ण उपन्यास रचता है। हमारे लिए रोज़ाबाल वंशावली जो सर्वश्रेष्ठ प्रतिफल समेटे है, वह है आश्चर्यों का ख़ाज़ाना जो इसमें भरा है, जिस प्रकार से इतिहास प्रस्तुत किया जाता है... आनंददायक, हैरान कर देने वाली साधारण बातों के रूप में। इस तरह सांघी आतंकवादी हमलों, गुप्त समाजों, मारे गए प्रोफ़ेसरों, संभ्रमित पादरियों और आकर्षक घातक महिलाओं का ज़बर्दस्त मिश्रण परोसते हैं। एक पंक्ति मे कहें तो रोज़ाबाल वंशावली वह वाक़ई मज़ेदार सवाल पूछती है—अगर ऐसा होता तो?”
           प्रभात बांधुल्या की बनारस वाला ईश्क किताब का शीर्षक देख कर पढ़ने को जी किया। हमने यह स्वीकार करने मे कभी गुरेज नही किया कि बनारस हमारी कमजोरी है। बनारस वाला ईश्क गया से बीएचयू पढ़ने आये एक युवा युगल की इश्किया किस्सागोई है, जिसे मसालेदार और चटकदार बनाने के लिये उसमे छात्र राजनीति का छौंका लगाया गया है। बिहार के मगधी टच जुड़े डायलॉग अच्छे लगते है और प्रेमकहानी को ईश्क प्यार और मोहब्बत के रूमानी लहरों से बिड़ला हास्टल, छित्तूपुर, लंका तक की सैर कराते है । कहानी बनारस से बाहर निकलते ही ठहर सी जाती है जब ठकुराईन के रोड हादसे मे मरने के साथ ही जैसे रूक जाती है। हॉलाकि प्रभात कहानी को खींच कर क्लाईमेक्स तक पहुँचाने की कोशिस करते है और कुछ हद तक कामयाब भी रहे है पर कहानी मे वह जान नही आ पाती है । कुल मिला जुला कर  छात्र जीवन के ईश्क प्रेम व मोहब्बत पर अच्छा उपन्यास है जो पढ़ने के बाद निराश नही करता।
          अभिनेता आशुतोष राणा की लिखी मौन मुस्कान की मार  को पढ़ने की प्रेरणा मेरी छात्र जीवन की छोटी बहन प्रज्ञा मोहले ने दी। प्रज्ञा जबलपुर से है और आशुतोष जी की पड़ोसन व फैन है। प्रज्ञा स्वयं भी साहित्यिक अध्यासु है और हिन्दी साहित्य मे बीएचयू से डाक्टरेट है, यह अलग बात है कि अब वह साहित्यिक क्षेत्र के बजाय जबलपुर के सांस्कृतिक गतिविधियाें मे अधिक क्रियाशील है। बहरहाल बात मौन मुस्कान के मार की। आशुतोष के साहित्यिक प्रतिभा के हम सभी तब से कायल है जब हमने उनकी कविता "हे भारत के राम जगो, मै तुम्हे जगाने आया हूँ " पहली बार सुनी थी। आशुतोष हिन्दी फिल्मों के उन अभिनेताओं मे से है जो मजे हुये विशुद्ध कलाकार है और साहित्यिक व सांस्कृतिक जागरूकता उनके रगों मे बसी है। हमे नही मालूम कि आशुतोष की इससे पहले भी कोई किताब आई थी कि नही पर मौन मुस्कान की मार एक सधी हुई लेखनी का परिणाम लगती है। आशुतोष ने  अपने अगल बगल के पात्रों को अपने शहर के बुंदेलखंडी बोली मे चुटीले व्यंग्यो को पिरो कर अपने मौन मुस्कान की मार को तेज धार दी है जो पढ़ने वाले को बुंदेलखंड की दुनिया मे ले जा कर गुदगुदाती है, और घटना से संबंधित कथानक व पात्रों को अपने आस पास के लोगों मे और अपने जीवन व परिवेश मे खोजने के लिये मजबूर करती है। अपनी बात से शुरू भूमिका से ही आशुतोष का प्रभाव परिलक्षित हने लगता है जो भक्क जी महराज, विष्पाद गुधौलिया, बीसीपी उर्फ भग्गू पटेल, रामरवा लपटा महाराज, यश व राज का चक्कर, मौन मुस्कान की मार  और शार्टकट कटशार्ट तक की कहानियॉ हमे अपने स्थानीय छोटे शहरों के परिवेश से जोड़ती है जहॉ एक सहसंबधता का रिश्ता आज भी दिखता है । इन व्यंग्य रचनाओं को पढ़ते हुये हम अगर भाषा बदल दे तो वह हमे अपनी और बनारस, कानपुर, गोरखपुर जैसो अपने शहरो की अपनी सी कहानी दिखती है। पढ़ के मजा आया कि अपने अास पास के लोगो से जुड़ी छोटे छोटे संस्मरणों को इतना शानदार स्वस्थ व्यंग्य का रूप दिया जा सकता है। निश्चित ही मौन मुस्कान की मार पढ़ने के बाद आशुतोष की आने वाली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी।
       शारदेन्दु बंद्योपाध्याय की व्योमकेश बख्शी की रहस्यमय कहानियॉ  हम सबलके लिये नई नही है। दूरदर्शन पर अपने शुरूआती दिनो मे हमने इस भारतीय जासूसी धारावाहिक को देखा था, एक ऐसा जासूस जो स्वयं को जासूस कहने के बजाय सत्यान्वेषी कहलाना पसंद करता था और उसका किरदार किसी पश्चिमी डिटेक्टिव पात्रो की नकल  न हो कर मूल भारतीय चरित्र था। व्योमकेश की एक दो कहानियॉ अभी तक याद हने के बावजूद जब व्योमकेश बख्शी की रहस्यमय कहाँनियॉ  नजरो के सामे पड़ी तो उसे पढ़ने का लोभ संवरण नही कर पाया। कुल १३० पृष्ठों मे ५ कहानियॉ सत्यान्वेषी, ग्रामोफोन पिन, तरनतुला का जहर , वसीयत का जंजाल, विपदा का संहार कुछ मंहगी लगती है पर आज भी एक बैठकी मे पूरी किताब पढ़ लेने का मोह बनाये रखती है। आज हमारे देश मे ऐसे साफ सुथरे रहस्य रोमांच से भरे आकर्षक कथानक वाले उपन्यासों की कमी खलती है।
कमी तो पढ़ने वालो की भी खलती है , हम अभी हाल मे ही इसी ख्याल को लफ्जों मे कह बैठे " आलमारी की किताबें हसरतों से देखती है हमें, बदल रहे है शौक अब जमाने के।"
(बनारस, 30 जून 2019, रविवार)
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