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रविवार, 31 अगस्त 2025

बनारस बाढ़ में.....(बनारस पर कविताएँ-6)

बनारस पर कविताएँ(6)

बनारस बाढ़ में,
अखबारों में छपी है ढेर सारी तस्वीरें
खबरों सहित
घुटने और कमर तक पानी में,
नाव से बस्ती राहत सामग्री
बाढ़ शिविरों में मुस्कराते
समाजसेवी व राजनेता
टूट गये है गंगाघाटें के
आपस के संपर्क और संबंध
ऊपर की ओर सरक औ सिमट गये है
सुबहे बनारस और गंगा आरती स्थल
पहुंच गई है वरुणा उन इलाकों में
जिन्हे वह बहुत पहले छोड़ आई थी
बहुत सी आँखों मे सवाल दिखते है
डूब क्षेत्र में घर बनाने को किसने कहा था
तब नगर निगम और विकास प्राधिकरण कहाँ थे
क्यों परेशान होते हैं लोग हर साल
सब कुछ जान बूझ कर भी
पर मै देख रहा हूं
घर के आंगन मे आये बाढ़ के पानी में
अपनी देहरी पर आरती करती
घाट के ठीक ऊपर रहने वाली
मां गंगा और काशी की आस्थावान
बुढी माई को
जिसके लिये बाढ़ विभिषिका नही
गंगा मैया का शुभागमन है
उसके छोटे से पुराने घर में
बाढ़ के इन दोनो दृश्यों को देख
मै हैरान परेशान हूं
सच और सत के मध्य
रेखा परिभाषित करने में
आस्था और विभिषिका
दो रुप है सोच के
शिव के उग्र व कल्याण के
प्रश्न हम से है
उत्तर भी हमी से
काशी के विविध रंग में
हमारी समस्याओ और
हमारी आस्था के.....

-व्योमेश चित्रवंश; ३०अगस्त २०२५

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

काशी विश्वनाथधाम का स्थापना संघर्ष

ये कहानी है अहल्या बाई होल्कर और श्रीकाशी विश्वनाथ की….. इसी कहानी में मोदी और श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के विरोध का रहस्य छिपा है……..

विरोध केवल मोदी का ही नहीं हो रहा है और विरोध पहली बार ही हो रहा है ऐसा भी नहीं है।विरोध तो श्रीमंत मल्हार राव होल्कर और मातोश्री अहल्याबाई होल्कर का भी हुआ था। 

बुरा लग सकता है लेकिन आज लिखना आवश्यक है: 1735 में बाजीराव पेशवा की माँ राधाबाई तीर्थयात्रा पर काशी आईं।उनके लौटने के पश्चात ‘काशी के कलंक’ को मिटा देने के संकल्प के साथ पेशवा बाज़ीराव के सेनापति मल्हार राव होल्कर 1742 में गंगा के मैदानों में आगे बढ़ रहे थे। उस समय पेशवाओं की विजय पताका चहुँओर लहरा रही थी।काशी विश्वनाथ के मन्दिर की मुक्ति सुनिश्चित थी। 27 जून 1742 को मल्हार राव होल्कर जौनपुर तक आ चुके थे। उस समय काशी के कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोग उनके पास पहुँच गए और कहा कि “आप तो मस्जिद को तोड़ देंगे लेकिन आप के चले जाने के बाद मुसलमानों से हमारी रक्षा कौन करेगा।” इस तरह बाबा की मुक्ति के बजाय स्वयं की सुरक्षा को ऊपर रखने वाले काशी के कुछ धूर्तों ने उन्हें वापस लौटा दिया। बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की पुनर्स्थापना होती होती रह गई। मल्हार राव होल्कर लौट तो गए लेकिन उनके मन में कसक बनी रही। वही कसक और पीड़ा श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर से उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर को स्थानान्तरित हुई।

अहल्याबाई के लिए उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ही प्रेरणा थे क्योंकि अहल्याबाई का जन्म किसी राजघराने में नहीं हुआ था। उनके पिता एक गाँव के सरपंच मात्र थे। एक दिन कुमारिका अहल्या मंदिर में सेवा कर रही थी। भजन गाती और गरीबों को भोजन कराती अहल्याबाई के उच्च कोटि के संस्कारों को मालवा के अधिपति मल्हारराव होल्कर ने देखा। उसी समय उन्होंने तय कर लिया कि अहल्य ही उनके बेटे खाण्डेराव की पत्नी बनेंगी। वर्ष 1733 में अहल्याबाई का विवाह खाण्डेराव होल्कर से हो गया। अहल्याबाई की आयु 8 वर्ष थी। खाण्डेराव अहल्याबाई से 2 साल बड़े थे।

सन 1754 में एक युद्ध के दौरान खाण्डेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। अहल्याबाई के जीवन में अंधेरा छा गया। अहल्याबाई सती हो जाना चाहती थी किन्तु मल्हार राव ने अहल्याबाई को न केवल सती होने से रोका बल्कि मानसिक तौर पर उन्हें मजबूत भी किया। शासन सञ्चालन के सूत्रों का प्रशिक्षण देकर मालवा का शासन सम्भालने के लिए तैयार किया। 1766 में मल्हार राव के मृत्योपरांत अहल्याबाई होल्कर ने मालवा का शासन अपने हाथों में ले लिया।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर महारानी अहल्याबाई होल्कर की अमूल्य कीर्ति है। काशी के लिए अहल्याबाई होल्कर का क्या योगदान है। इसे इतिहास का अवलोकन किए बिना नहीं समझा जा सकता।

आनन्दवन काशी को पहला आघात 1194 में लगा था। जब मोहम्मद गोरी के सिपहसलार क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ समेत यहाँ के प्रमुख मंदिरों को तोड़ दिया। बाद के कालखण्डों में हुसैन शाह सिरकी (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) ने काशी विश्वनाथ और काशी के अन्य प्रमुख मंदिरों को तोड़ा। बार-बार काशी पर इस्लामिक हमलावर आघात करते रहे लेकिन शिवनगरी काशी पुनः पुनः हिन्दुत्व के अमृततत्व से सँवरती रही।

अकबर के कालखण्ड में काशी के जगतप्रसिद्ध धर्मगुरु पण्डित नारायण भट्ट की प्रेरणा से राजा टोडरमल ने 1585 में पुनः काशी विश्वनाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। हालाँकि इसमें अकबर का कोई योगदान नहीं था। यह बात इसलिए लिखनी पड़ रही है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने एक लेख में लिखा था और अभी फिर से लिखा है कि विश्वनाथ मंदिर के लिए अकबर ने धन दिया था।यह सच नहीं है। इसी मन्दिर को औरंगज़ेब के 18 अप्रेल 1669 के फ़रमान से तोड़ दिया गया। मन्दिर के ध्वस्त अवशेषों से ही उसी स्थान पर वर्तमान मस्जिद खड़ी कर दी गयी। पीछे की तरफ मन्दिर का कुछ हिस्सा छोड़ दिया गया ताकि इसे देख कर ग्लानि से हिन्दु रोते रहें।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर ध्वस्त कर दिया गया था लेकिन 1669 से ही भग्नावशेष एवं स्थान की पूजा चलती रही। मुक्ति के विभिन्न प्रयास भी चलते रहे। 

मंदिर का पुनर्निर्माण और भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा करना समस्त राजा महाराजाओं और संतों के सामने प्रश्नचिह्न बना हुआ था। काशी के तीर्थपुरोहितों की बहियों से ऐसा ज्ञात होता है कि 1676 ई. में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी आए थे। इन दोनों राजाओं ने मंदिर निर्माण की पहल तो की लेकिन सफल नहीं हो पाये। उन्होंने विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित अवश्य किया। इसी क्रम में मराठों के मंत्री नाना फड़नवीस के प्रयास भी असफल रहे। 1750 में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह ने परिसर की पूरी ज़मीन ख़रीद कर विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की योजना बनायी जो कि परवान नहीं चढ़ सकी। 7 अगस्त 1770 को महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था।यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

इतने असफल प्रयासों के पश्चात अहल्याबाई होलकर को सफलता प्राप्त हुई। अहल्याबाई ने वह करके दिखा दिया जिसे समस्त हिन्दू राजा 111 वर्षों में नहीं कर सके थे। अहल्याबाई के प्रयासों से 1777 से प्रारंभ होकर 1781 ई. में वर्तमान मंदिर का निर्माण मूल स्थान से दक्षिण की दिशा में थोड़ा हटकर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ।

महारानी अहल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के साथ-साथ जो भी धार्मिक स्थल भग्नावस्था में थे, उन सभी को शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ पुर्नस्थापित करवाया। वहाँ पूजा-पाठ नित्य होता रहे, इसकी व्यवस्था भी राजकीय कोष से करवायी।

किन्तु काशी ने उस समय भी महारानी का साथ नहीं दिया था। शिवलिंग की प्रतिष्ठा के लिए महारानी को माहेश्वर से पण्डितों बुलवाना पड़ा था। मन्दिर के लिए नित्य पुजारी को लेकर भी समस्या आयी। काशी का कोई ब्राह्मण पुजारी के पद पर कार्य करने को तैयार नहीं था। इसलिए काशी विश्वनाथ का पहला पुजारी तारापुर के एक भूमिहार ब्राह्मण को बनाया गया। ये प्रमाण आज भी इन्दौर के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं। 

मल्हार राव को मार्ग से भटकाने वाले और अहल्याबाई का साथ न देने वालों धूर्तों के वंशज आज भी काशी में ही हैं। यही लोग वर्तमान में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का विरोध कर रहे हैं। 

294 वर्षों के बाद नरेन्द्र मोदी ने अहल्याबाईके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ा कर उन्हें सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है। नए परिसर में मातोश्री की प्रतिमा स्थापित कर उनकी कीर्ति को सदैव के लिए अक्षय कर दिया है। तीन हज़ार वर्गफीट में सिमटा मन्दिर आज पाँच लाख वर्ग फ़ीट के भव्य परिसर में विस्तार ले चुका है। काशी की छाती पर खड़ा हुआ ‘कलंक’ एक कोने में सिमट चुका है। विश्व के नाथ को गलियों में सिमटा देख कर हृदय में ग्लानि लिए सदियों से रोता हिन्दू आज धाम के विस्तारीकरण से प्रफुल्लित है।गजवा-ए-हिंद का सपना देखने वाले मुग़लों के वंशजों को भी अब विश्वनाथ धाम के दरवाज़े से ही प्रवेश लेना होगा। नरेन्द्र मोदी अपना कार्य कर चुके। अब बचे हुए कार्य को पूरा करने की ज़िम्मेदारी हिन्दू समाज के कन्धों पर है।
(बनारस, 16दिसंबर 2021, गुरूवार)
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गुरुवार, 26 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020 गुरूवार

                       नवरात्रि के दूसरे दिन व कोरोनावाईरस के लाकडाऊन के तीसरे दिन  घर मे पड़े पड़े हमने अशोक के. बैंकर की लिखी किताब “दशराजन” पढ़ा। इस किताब ने मुझे उतना प्रभावित नही किया,हॉलाकि रोचक लेखन,कहानी और पात्र.अशोक के. बैंकर ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस पूरी कहानी को पेश किया है. इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमारे प्राचीन इतिहास का अंश है,ये कहानी ऋगवेद से ली गयी है.
      ये कहानी है ३४०० ई. पू. की,जहां एक कबीले के राजा ने अपनी प्रजा और कबीले की रक्षा के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ दस राजाओं और उनकी विशाल सेना का सामना किया था. उस वक़्त कबीले के मुखिया सुदास के पास कोई बाहरी मदद नहीं थी बल्कि उसे एक योजनाबद्ध तरीके से घेरा गया था.अपने पांच नदियों वाले कबीले की रक्षा के लिए सुदास ने हर संभव रणनीति का प्रयोग किया और अपने कबीले की रक्षा की. ये पांच नदियों वाला कबीला आज पंजाब के नाम से जाना जाता है.

केवल एक दिन में सभी आक्रमणकारियों के अंत के साथ ख़त्म हुए इस युद्ध को अशोक के. बैंकर ने बखूबी उतारा है.अघोषित युद्ध,एक साथ आक्रमण और सुदास की रणनीति,उसके सहायकों का साथ,गुरु का साथ से लेकर युद्ध की एक-एक घटना का इतना अच्छा वर्णन है कि आपके सामने पूरा चित्र उतर आता है.नायक सुदास अपने कबीले के हर इंसान यहाँ तक की पशु से भी प्रेम करता है,अपमान की स्थिति में भी संयम बनाये रखता है..शायद यही कारण हो सकता है कि खुद को विशाल शत्रु सेना से घिरा हुआ पाने के बाद भी वो समर्पण की बजाय सामना करने का निर्णय लेता है.
      ललस संभवतः प्राच्य इतिहास के बारे मे ज्यादा जानकारी न होने व रोचक अनुवाद न होने के कारण कथानक थोड़ा  धीमा व ऊबाऊ लगी। इतिहास मे कल्पना को शामिल करते हुये आजकल पुरा संस्कृति व इतिहास पर जो उपन्यास लेखन किया जा रहा है उनके लेखकों मे  अशोक के बैंकर का प्रमुख स्थान है उन्होंने प्रयास भी किया है कि ऐतिहासिक उपन्यासों की भॉति संवाद वर्णन और विवरणात्मक संबंध से वह ऐतिहासिक कालखण्ड व पात्र पाठक के मन मानस मे सजीव हो सके। संभवतः बहुत से पाठकों के लिये लेखक का यह प्रयास अद्वितीय व अद्भुत रहा हो और उनको बांधने मे सक्षम रहा हो । हमारे भारत का इतिहास न जाने ऐसी कितनी कही और कितनी अनकही कहानियों को समेटे खड़ा है, जो हमारे लिये ढेर सारी कल्पनाये , मिथक,  व संबंधों के तालमेल का मिश्रण लिये लेखन का बढ़िया मसाला व गारा चूना बन सकता है। दशराजन इसी तालमेल का सुंदर उदाहरण कहा जा सकता है। जो समय बिताने के लिये उपयोगी माना जा सकता है।
        बहरहाल, एक बार पुन: धन्यवाद मित्र राजीव अष्ठाना Rajeeva Kumar Asthana को, इस लाकडाऊन के वर्तमान कालखण्ड मे सोशल डिस्टेंशिंग आईसोलेशन के तीसरे दिन के लिये अपने लाईब्रेरी से पुस्तक भेंजने के लिये।
(बनारस,२६मार्च २०२०, गुरूवार)
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व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

           बासंतिक नवरात्रि संवत २०७७ वि० के पहले दिन 25मार्च 2020 बुधवार, विश्वव्यापी महामारी कोरोना के चलते देशव्यापी लाकडाऊन मे आज कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की सुप्रसिद्ध कृति भगवान परशुराम को पढ़ कर बस अभी समाप्त किया। ईषा से लगभग १५५० वर्ष पूर्व के कथानक मे आर्यावर्त मे आर्य धर्म के संस्थापन संवर्धन , शुद्धिकरण ,व्यापकता और संस्कार-संस्थापन के पृष्ठभूमि मे हमारे पौराणिक युगपुरूष कालजयी महानायक भगवान परशुराम के व्यक्तित्व पर आधारित यह उपन्यास पौराणिक इतिहास का बोध कराता है। आर्य संस्कृति के ऊषाकाल मे सरस्वती और हपद्वति नदियों के बीच फैले आर्यावर्त मे यदु और पुरू, भरत औरतुत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थी और वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरूषों के आश्रमों मे गुंजरित दिव्य ऋचाये, आर्यधर्म का नियमन व संस्थापन कर रही थी परन्तु दूसरी ओर संपूर्ण आर्यावर्त, नर्मदा से लेकर मथुरा तक अनूप प्रदेश मे शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोहममर्षक अत्याचारों से त्रस्त था।ऐसे मे युवा भार्गव परशुराम हैहयराज  की प्रचंडता को चुनौती देते हुये अपनी आर्यनिष्ठ तेजस्विता, संगठन क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के द्वारा  आर्य संस्कृति के ध्वस्त करने के उसके सपनों को ध्वस्त करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के एक वर्ष पूर्व अप्रैल १९४६ मे प्रकाशित प्रशिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद श्री के एम मुंशी की यह पुस्तक पढ़ते हुये आज भी अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती है।
हमे तो इस कोरोना लाकडाऊन पीरियेड मे इस पुस्तक को पढ़ते हुये धर्म, कर्तव्य, साहस और रणनीति के संदर्भ मे कई कई बार आजकल के दौर मे सड़क पर न निकलने, स्वयं को नियंत्रित करने व अदृश्य कोरोना वाइरस से प्रतिरोध करने की अपनी सरकार की नीतियों को समीचीन व्याख्या व नई परिभाषा मिल रही थी। धन्यवाद मित्र राजीव अस्थाना Rajeeva Kumar Asthana जी को एक अच्छी पुस्तक पढवाने के लिये।
(बनारस,26मार्च 2020,गुरूवार,12.37पूर्वाह्न)
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष ।

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष । व्योमेश चित्रवंश की डायरी,2४ मार्च २०२०, मंगलवार

अपनी मनपसंद दो किताबो को कल देर रात दुबारा पढ कर समाप्त किया। डेल कार्नेगी की किताब पिछली सदी मे 1993 मे खरीद कर पढ़ने के बाद आलमारी में रखी शोभायमान बन गई थी, हालॉकि उसके सिद्धान्त आज भी मेरे व्यवहार मे है। जबकि स्यालकोट सागा 2016 मे आते ही खरीद कर दो दिन तक लगातार पढ़ते हुये मिले रोमांच भरे एहसास के बाद कई लोगों को पढ़वाने के बाद रख दिया था।
जब सब कुछ लाकडाऊन है ऐसे मे खुद को व्यस्त रहने  का मेरे लिये एकमात्र तरीका किताबें पढ़ना ही है। आज  बड़े भाई मित्र राजीवअस्थाना Rajeeva Kumar Asthana वकील साहब ने के एम मुंशी की भगवान परशुराम और अशोक के बैंकर की दशाराजम भेजवाया है। उम्मीद है कि दो दिन की टाईम की खुराकी इससे पूरी हो जायेगी। और कल से नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हो जायेगा तो सोशल मीडिया से कट कर थोड़ा और समय मिलने पर यह खुराकी बढ़ भी सकती है।
कोरोना को भगाना है, कहीं नही जाना है।
घर मे रहना है, किताबें पढ़ना है।😊😊
(बनारस, 24मार्च2020, मंगलवार, 8.00बजे प्रात:)
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शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 फरवरी 2020
       बहुमुखी प्रतिभा की धनी , भरतनाट्यम  कलाकार अपनी छोटी बहन जैसी प्रतिभा श्रीवास्तव की उपन्यासिका The Peaceful Chaos पढ़ने को मिली। आज के भौतिकवादी भागते दौड़ते माहौल और तुरत फुरत रिश्तो को कैश करा लेने वाले माहौल मे कालेज जीवन के रूमानी प्यार पर बेहद मर्मस्पर्शी लिहाज से कहानी को पिरोया है प्रतिभा ने। यह उनकी पहली किताब है, पर स्टोरी प्लाट का चयन, साफ सुथरे शब्दों का प्रयोग और प्रेमकहानी मे निस्वार्थ भावनात्मक दोस्ती को आधार पर लिखी कहानी प्रतिभा के अंदर छुपे गंभीर लेखक का परिचय कराती है। हालॉकि एक झूठे बहाने को ले कर शुरू हुये कहानी जो अंत मे उसे दूसरे पक्ष के सच मे बदल देती है पर थोड़ी और मेहनत की जरूरत थी, मुझे लगता है कि यदि लेखिका ने इसे उपन्यासिका बनाने के बजाय घटनाओं को विस्तार देते हुये उसे उपन्यास का रूप दिया होती तो संभवतः ज्यादा सफल होती। जतिन और आशी के दोस्ती की यह कहानी उनके आपसी मोहब्बत के एहसास के साथ ही परिस्थितिवश समाप्त हो जाती है, बल्कि मै कहूँ कि समाप्त कर दी गई तो गलत नही होगा। पर जिन बुनियादी सवालातों को लेकर इस प्रेमकहानी का अंत बताया गया वह मेरे गले के नीचे सामान्यत: नही उतरती। एक कालेज मे पढ़ने वाले आज के मोबाईल जमाने मे जाति को न जानने का सवाल, फिर कहानी के पीक प्वाइंट पर आशी के बाबा दादी के महत्वपूर्ण भूमिका के बाद उनका एकाएक कहानी से ओझल हो जाना, रेल भगदड़ मे गुम होने वाली पढ़ी लिखी कालेज गर्ल का बलात्कार के पश्चात अस्पताल मे रहने के दौरान कोई पहचान नही होना, गुमशुदगी की एफआईआर के बावजूद पूरी कहानी से पुलिस कीकोई भूमिका मही होना,आशी का गुमनामी मे  गॉव जा कर वापस आ जाना और अस्पताल मे कहानी का अंत कहीं न कहीं मन मे  सवाल खड़े करते है। लगता है कि जल्दबाजी और पहली बार के लेखकीय उत्साह में सब कुछ बड़ी तेजी से समेट दिया है लेखिका ने।
उपन्यासिका के अंत मे प्रतिभा ने कुछ वाजिब सवाल उठाये है आज के समाज यानि हमसे और आपसे, जो मौजूं ही नही जरूरी है जिन पर हमे सौचना होगा, अगर अभी तक नही सोचा तो सोचना पड़ेगा नही तो यूँ ही जतिन और आशी जैसे सरल और साफगोई से जीने वाले लोग सामाजिक बंधनों के इस अबूझ आत्मघाती चक्की मे पीसे जाते रहेगें।
नवोदित लेखिका के रूप मे प्रतिभा सराहना व बधाई की पात्र है, मनोवैज्ञानिक व भावनात्मक तरीके से उनकी उपन्यासिका पठनीय व प्रशंसनीय है।
(बनारस, शिवरात्रि, 21 फरवरी 2020, शुक्रवार)
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना  ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

                  पिछले सप्ताह अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के मित्र ओम प्रकाश राय यायावर का उपन्यास काशी टेल पढ़ा। इस किताब को पढ़ने की काफी दिनों से ईच्छा रहने के बावजूद किन्ही न किन्ही कारणों से यह पढ़ने से छूट जा रही थी। हालॉकि ओम प्रकाश जी ने भी इसके लिये एक बार उलाहना दे डाला, सो अबकी बार किताब उठाई तो पूरा पढ़ने के बाद ही दूसरे काम हाथ मे लिया। फिर किताब के बारे मे सोचते हुये लिखने मे देर हो गई। बहरहाल आज इस काम को भी पूरा करने का मन मिजाज बना के बैठा हूँ। ओम प्रकाश राय बिहार से बनारस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने आये तो औरों की तरह हमारी सर्व विद्या की राजधानी ने दोनो बॉहें फैलाये इन्हे स्वीकार कर लिया अभी वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे ही उच्च अध्ययनरत हैं।बनारस टेल इसी बीएचयू के शिक्षा संकाय की कथा है जिसमे बड़े बेबाकी से आज कल बीएड करने वाले छात्रों के मनस्थिति व परिस्थिति को दिखाते हुये यात्रा करती है, बिहार से  आये निहाल पाणे के साथ, तो रामनगर की आईपीएस मुस्लिम पिता व हिन्दू मॉ की पुत्री सदफ के साथ कमच्छा से गोदौलिया तक, रामनगर सामनेघाट से लंका तक, रेवड़ी तालाब के जय नारायण इंटर कालेज के खाली बीरान मैदान से दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर  चढ़ते उतरते ,बीएचयू की अमराईयों मे टहलते हुये सेण्ट्रल आफिस तक।
कभी सिविलसर्विस और पीसीएस के रिजल्ट मे अपना बड़ा सा घेरा बनाने वाले आक्सफोर्ड आफ ईस्ट के शहर कहे जाने वाले ईलाहाबाद अब प्रयागराज मे पीसीएस की तैयारी करने वाला बिहारी निम्न मध्यवर्गीय आय वाले परिवार का लड़का निहाल पाण्डेय, अपने पिता की उलाहनाओं से अाजिज आकर एक सिक्योर्ड नैकरी मास्टरी के  लिये बीएड करने  बीएचयू  आ जाता है। वहॉ उसकी मुलाकात उच्च आयवर्गीय मुस्लिम परिवार की सदफ से होती है। पहली मुलाकात के बाद दोनो के बीच दोस्ती से थोड़ा बढ़ कर मधुर रिश्ता बन जाता है। चंचल शोख सदफ के संगत मे अपने मे सिमटे रहने वाला निहाल भरपूर कालेज जीवन के दोस्ती का लुत्फ उठाने लगते है। इस दोस्ती ईश्क मोहब्बत के साथ साथ हास्टल जीवन की चुहलबाजिया, बदमासियॉ और बिन्दास अंदाज किताब की रोचकता को जीवन्त करते हैं। कहानी मे ठहराव आता है तो कहानी हाथ से फिसलती जान पड़ती है पर फिर से बिहार के अपने गॉव मे स्कूली शिक्षा मे अलख जगाने की कोशिश कर रहे निहाल पाणे बाबा कहानी के छोर को थाम लेते है।
कुल मिला कर ओम प्रकाश राय ने कथा को रोचक बनाने मे कोई कसर नही छोड़ा है और जो लोग बनारस, पश्चिम बिहार के भूगोल, और संस्कृति से परिचित है उनके लिये कहानी से जुड़ाव व अपनापन लगना स्वाभाविक है। बनारस टेल बेहतरीन कोशिश है इधर आये बनारस , बीएचयू, बिहार से जुड़े उपन्यासों की कड़ी में।
(बनारस, 18फरवरी,2020, मंगलवार)
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मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम और हमारे विधायक जी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11 फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम और हमारे विधायक जी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11 फरवरी 2020

#मेराघर बनारस शहर उत्तरी मे है,

#बिजली का भारीभरकम बिल हम भरते है पर विधायक जी ने खंभो पर स्विच तार लटकवा के स्ट्रीट लाईट के लिये पिछले तीन साल से आश्वासन देते रहे पर आज तक उन खंभो पर स्ट्रीट लाईट नही लगी। विधायक जी क कहने पर नगर निगम द्वारा यह बताया गया कि बजट आने पर खंभो पर बिजली के लट्टू भी टंग जायेगें पर लट्टू को टंगने को कौन कहे उन खंभो के अंधेरे तलेे दो बेजुबान पशुओं एक साड़ व एक भैंस की मृत्यु हो गई, कमाल है कि कि अखिलेश सरकार के आखिरी समय मे कम हुआ बजट आज तक नही आ सका।

#पानी अभी भी हमारे यहॉ सुबह शाम मल्टीकलर मे आता है कभी पीला, कभी मटमैला, कभी हल्की लालिमा लिये हुये,और कभी कभी तो वह सुगंधित तो कभी दुर्गंधित। शिकायत नगरनिगम की चौकी से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक मेरे मोहल्ले वालों ने किया। पर आज भी हम लोग मल्टीकलर्ड और गंधयुक्त पानी पेयजल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। जबकि विधायक जी का यह दूसरा कार्यकाल है।

#सीवर के बारे मे कहना ही क्या? इसे अखिलेश सरकार की महानता कहे कि सरकारी पैसे की बर्बादी। आज तक वरूणापार वाले समझ ही नही पाये कि सीवर उनके लिये बन रहा है या वे सीवर के लिये ही बने हैं। सीवर की टूटी फूटी पाईप तो डाल दी गई पर उसे मेन लाईन से जोड़ा ही नही गया। जोड़ते भी कैसे जब अब तक यही तय नही हो पाया कि मेनलाईन का डाऊनफ्लो कहॉ होगा? हर दिन किसी न किसी सड़क पर लाल पीले फाईबर के बैरिकेट खड़े कर लाल पीले ग्लो साईन कलर वाले कपड़े पहने दो चार आदमी क्या काम करते है , मुझे नही लगता होगा कि उन्हे भी पता होगा। विधायक जी पिछले कार्यकाल मे तो सारा ठीकरा  सपा सरकार और उसकी नीतियों व ठीकेदारी मे भागीदारी सिस्टम को कोसा करते थे। इस कार्यकाल मे वे सीवर जैसी समस्या पर बोलना अपने सम्मान के विरूद्ध समझने लगे और मंत्री बनने के बाद तो क्षेत्र मे सीवर समस्या कहीं उनके एजेण्डे मे दूर दूर तक नही हैं।

#सड़क के मामले मे वरूणापार हमेशा से बद किस्मत रहा। अखिलेश के जमाने मे  किसी वीवीआईपी मूवमेंट के ठीक पहले चटपट छर्री डाल काला कर के अपनी भूमिका पूरी कर ली जाती थी। भला हो मोदी जी का, जो प्रवासी भापतीय सम्मेलन और टीएफसी के नाम पर कुछ सड़को को चलने फिरने व देखने लायक बना दिया। पर आज सीवर, बिजली,पानी के नाम पर ज्यादातर सड़के खुदी हुई हैं।

#सबकासाथसबकाविकास को अपना आधारवाक्य बीजेपी भले मानती हो पर हमारे विधायक, सारी! मंत्री जी नही मानते। उनके द्वारा जो भी कार्य कराये जा रहे है वह सबके लिये नही बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये होती है। नवलपुर मे तुलसीविहार, शिवपुर मे दुर्गा विहार जैसी कालोनियॉ इसी तरह की उदाहरण है। शायद मंत्री जी को भरोसा हो कि बाकी जगहों के वोट तो उनकी थाती है जो मजबूरन कहीं भटक कर कहीं नही जाने वाले।

यह बातें मै बार बार क्यों सोच कहा हूँ पता नहीं, क्योंकि मुझे अपने विधायक , सारी! मंत्री जी से अब कोई उम्मीद नही है, क्योंकि अब तक हम लिखत पढ़त मौखिक रूप से उनसे कई कई बार आश्वासन पा कर निराश हो चुके हैं। पर शायद #दिल्ली के चुनाव परिणामों को देख कर मै बार बार अपने क्षेत्र के #भाजपा विधायक जी की तुलना पुन: जीते हुये प्रत्याशियों से जाने क्यों करने लगा हूँ।
(बनारस, ११फरवरी २०२०, मंगलवार)
#मेराघर बनारस शहर उत्तरी मे है,

#बिजली का भारीभरकम बिल हम भरते है पर विधायक जी ने खंभो पर स्विच तार लटकवा के स्ट्रीट लाईट के लिये पिछले तीन साल से आश्वासन देते रहे पर आज तक उन खंभो पर स्ट्रीट लाईट नही लगी। विधायक जी क कहने पर नगर निगम द्वारा यह बताया गया कि बजट आने पर खंभो पर बिजली के लट्टू भी टंग जायेगें पर लट्टू को टंगने को कौन कहे उन खंभो के अंधेरे तलेे दो बेजुबान पशुओं एक साड़ व एक भैंस की मृत्यु हो गई, कमाल है कि कि अखिलेश सरकार के आखिरी समय मे कम हुआ बजट आज तक नही आ सका।

#पानी अभी भी हमारे यहॉ सुबह शाम मल्टीकलर मे आता है कभी पीला, कभी मटमैला, कभी हल्की लालिमा लिये हुये,और कभी कभी तो वह सुगंधित तो कभी दुर्गंधित। शिकायत नगरनिगम की चौकी से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक मेरे मोहल्ले वालों ने किया। पर आज भी हम लोग मल्टीकलर्ड और गंधयुक्त पानी पेयजल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। जबकि विधायक जी का यह दूसरा कार्यकाल है।

#सीवर के बारे मे कहना ही क्या? इसे अखिलेश सरकार की महानता कहे कि सरकारी पैसे की बर्बादी। आज तक वरूणापार वाले समझ ही नही पाये कि सीवर उनके लिये बन रहा है या वे सीवर के लिये ही बने हैं। सीवर की टूटी फूटी पाईप तो डाल दी गई पर उसे मेन लाईन से जोड़ा ही नही गया। जोड़ते भी कैसे जब अब तक यही तय नही हो पाया कि मेनलाईन का डाऊनफ्लो कहॉ होगा? हर दिन किसी न किसी सड़क पर लाल पीले फाईबर के बैरिकेट खड़े कर लाल पीले ग्लो साईन कलर वाले कपड़े पहने दो चार आदमी क्या काम करते है , मुझे नही लगता होगा कि उन्हे भी पता होगा। विधायक जी पिछले कार्यकाल मे तो सारा ठीकरा  सपा सरकार और उसकी नीतियों व ठीकेदारी मे भागीदारी सिस्टम को कोसा करते थे। इस कार्यकाल मे वे सीवर जैसी समस्या पर बोलना अपने सम्मान के विरूद्ध समझने लगे और मंत्री बनने के बाद तो क्षेत्र मे सीवर समस्या कहीं उनके एजेण्डे मे दूर दूर तक नही हैं।

#सड़क के मामले मे वरूणापार हमेशा से बद किस्मत रहा। अखिलेश के जमाने मे  किसी वीवीआईपी मूवमेंट के ठीक पहले चटपट छर्री डाल काला कर के अपनी भूमिका पूरी कर ली जाती थी। भला हो मोदी जी का, जो प्रवासी भापतीय सम्मेलन और टीएफसी के नाम पर कुछ सड़को को चलने फिरने व देखने लायक बना दिया। पर आज सीवर, बिजली,पानी के नाम पर ज्यादातर सड़के खुदी हुई हैं।

#सबकासाथसबकाविकास को अपना आधारवाक्य बीजेपी भले मानती हो पर हमारे विधायक, सारी! मंत्री जी नही मानते। उनके द्वारा जो भी कार्य कराये जा रहे है वह सबके लिये नही बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये होती है। नवलपुर मे तुलसीविहार, शिवपुर मे दुर्गा विहार जैसी कालोनियॉ इसी तरह की उदाहरण है। शायद मंत्री जी को भरोसा हो कि बाकी जगहों के वोट तो उनकी थाती है जो मजबूरन कहीं भटक कर कहीं नही जाने वाले।

यह बातें मै बार बार क्यों सोच कहा हूँ पता नहीं, क्योंकि मुझे अपने विधायक , सारी! मंत्री जी से अब कोई उम्मीद नही है, क्योंकि अब तक हम लिखत पढ़त मौखिक रूप से उनसे कई कई बार आश्वासन पा कर निराश हो चुके हैं। पर शायद #दिल्ली के चुनाव परिणामों को देख कर मै बार बार अपने क्षेत्र के #भाजपा विधायक जी की तुलना पुन: जीते हुये प्रत्याशियों से जाने क्यों करने लगा हूँ।
(बनारस, ११फरवरी २०२०, मंगलवार)
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शनिवार, 15 जून 2019

व्योमवार्ता/गोस्वामी तुलसी दास का अखाड़ा संकट मोचन मंदिर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15जून 2019

व्योमवार्ता/तुलसी दास का अखाड़ा संकटमोचन मंदिर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15जून 2019, शनिवार
                बनारस का संकट मोचन मंदिर अपने श्रद्धालुओं के लिये एक आस्था व विश्वास का जीवन्त केन्द्र है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि किसी भी प्रकार का संकट  हो महाबली हनुमानजी उसको दूर कर देते है। मन मे  बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो की गुहारी लगाते भक्तजन संकटमोचन बाबा को एक भगवान के रूप मे कम अपना संरक्षक अपने बल के रूप मे ज्यादा मानते हैं। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसी दास ने संकट मोचन मंदिर को अॉखाड़े के रूप मे स्थापित किया था और अखाड़े के महन्त की यह परंपरा लगातार चलती ई रही है। यहॉ के अखाड़े के पीठ प्रमुख अर्थात महन्त अपने जीवन निर्वाह के लिये मंदिर पर निर्भर नही रहते बल्कि वे अपने गुण, विद्वता व कौशल से अपना व अपने परिवार का खर्च चलाते है। इसी कारण यहॉ के महन्त संगीत, विज्ञान, तकनीकी जैसे विषयों से जुड़े रहे हैं। वर्तमान महन्त प्रो० विश्वम्भर नाथ मिश्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर है।
                संकटमोचन मंदिर का इतिहास विलक्षण घटनाओं से भरा पड़ा है उन्ही मे एक घटना यहॉ के महंत स्वामीनाथ द्वारा विश्व प्रशिद्ध पहलवान राममूर्ति को कुश्ती मे पटकनी देने से है जो गोस्वामी तुलसी दास के अखाड़े संकटमोचन मंदिर की महत्ता बताती है। घटना का जिक्र आप बनारसी हैं सोशल मीडिया मंच से लिया गया है।
                           90 वर्षीय शिव पहलवान बताते हैं “भइया दस जिला में महन्त स्वामीनाथ जइसन लड़वैया कोई नाहीं रहल।का जाँघ रहल, सीना और बाँह को कटाव…….ओह! पूछ मत………….”। तब बनारस में एक बहुत जबर्दस्त दंगल हुआ था। महन्त स्वामीनाथ बनाम राममृर्ति पहलवान का। राममूर्ति पहलवान तब देश के प्रमुख पहलवान थे। उनके लड़ने की हिम्मत जुटाना बहुत कठिन था।
              राममूर्ति बनारस में आये और उन्होंने चुनौती दी। सारे बनारसी पहलवानों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी थी। लेकिन बनारस की आन-बान-शान की खातिर महन्त स्वामीनाथ जी ने चुनौती को स्वीकारा। पूरे बनारस में तहलका मच गया। स्वामीनाथ जी के पिता तुलसीराम जी ने पुत्र की नादानी पर सिर पकड़ लिया। कुश्ती के चौबीस घंटे पूर्व वे संकट मोचन जी में हनुमान जी के सामने फाँसी का फन्दा गले में डालकर खड़े हो गये और हनुमान जी से बोले- “अगर हार भइल तो फाँसी लगालेब। तुलसी दास जी के अखाड़े के अपने जीअत न हारे देब”।
              स्वामीनाथ जी ने बड़ी जीवंतता से रिआज किया। तुलसी मन्दिर स्थित ‘गुफा के हनुमान जी’ की एक पैर पर खड़े होकर 48 घंटे आराधना की। मुकाबले के दिन पूरा बनारस उमड़ पड़ा था। प्रश्न यह था कि “बनारस को इज्ज्त बची की नाहीं।” राममूर्ति पहलवान शेर की तरह अखाड़े में घूम रहे थे। महन्त स्वामीनाथ जी जैसे ही अखाड़े में उतरे दर्शकों की साँसे टंग गईं। उस्ताद ने मुकाबला शुरू होने की आज्ञा दी एक सेकेण्ड के लिए दोनों ने ताकत आजमाइश की। अभी राममूर्ति अपने को स्थापित करते कि महन्त जी ने ‘धोबिया पाट’ मारा और देश का सिरमौर चारो खाने चित्त हो गया। काशी के लोगों ने महन्त जी को फूलों से लाद दिया। राममूर्ति दुबारा लड़ने की मिन्नत करते रहे, लेकिन जुलूस बनारस की सड़कों पर घूम रहा था। तुलसीराम जी फाँसी का फन्दा हटाकर हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े, खुशी से घंटो रोते रहे। आखिर रोते क्यों न! हनुमान जी ने पूरे बनारस की लाज रख ली थी। कहते हैं कि वह कुश्ती स्वामीनाथ जी ने नहीं, हनुमान जी ने स्वयं लड़ी थी। 95 वर्षीय छोटी गैबी के मल्लू गुरू बताते हैं कि “वइसन दंगल बनारस में कब्बौ नाहीं भइल”। स्वामीनाथ जी ने बनारस की नाम रख ली थी। शिव पहलवान बताते हैं कि तब स्वामीनाथ जी की कुश्ती में तूती बोलती थी। उन्होंने भीमभवानी को भी पटका था, जो राममूर्ति का प्रधान शिष्य था। तभी से अखाड़ा स्वामीनाथ बड़ा सिद्ध अखाड़ों में गिना जाता है।
(बनारस, 15 जून 2019, शनिवार)
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