बुधवार, 26 अगस्त 2020

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती (भाग -१९)

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती (भाग -१९)

सिन्धूर की होली उर्फ डाकू मान सिंह .........

हर साल की तरह इस साल भी अगस्त का महीना बीतते-बीतते सालाना ड्रामें को लेकर सुगबुगाहट होने लगी थी। नन्हें चच्चा नये ड्रामें की स्क्रिप्ट की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे। लगे हाथ उन्होंने बनारस जाकर गोकुल आर्ट्स से सम्पर्क कर वहाॅ से भी नाटक के नये स्क्रिप्ट उठाने की कोशिश की पर वह स्क्रिप्ट उन्हें कुछ खास जमी नही क्योंकि उसका प्लाट अपने गाॅव में खेले जाने वाले ड्रामा को सूट नही करता था। नन्हें चच्चा परेशान थे नये ड्रामे के स्क्रिप्ट के लिए और उधर घर पर चाची परेशान थी नन्हें चच्चा के ड्रामें के प्रति दीवानगी को लेकर।
यह हमारे गाॅव का सालाना जलसा था। जो दशमी से लेकर दीवाली की छुट्टियों के बीच खेला जाता था। हमारे गाॅव में रामलीला, रासलीला जैसे आयोजन नही होने के कारण गाॅव के लोगों को अपनी सांस्कृतिक प्रतिभा दिखाने और अपने अन्दर के कलाकार को सबके सामने लाने का यही एक अवसर मिलता था इसलिए पूरे गाॅव में इसको लेकर एक अलग, अनकहा, अनछुपा सा रोमांचक अहसास होता। ड्रामा होने तक यह पूरा अहसास अपने आप एक नाटक बन जाता। ड्रामें के प्रबन्धन में बड़ी भूमिका निभाने वाले नन्हें चच्चा मेरे परिवार के ही थेेेे। रिश्ते में वे हमारे बाबा लगते थे। मेरे अपने बब्बा के चचेरे भाई। पर सबका सुनकर मैं भी उन्हें चच्चा ही कहता था। वैसे वे प्राइमरी स्कूल में मास्टर थे, अखिलेश नारायण लाल। गाॅव से महज तीन गाॅव छोड़कर चारों गाॅव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते थे। इन तीन चार गाॅवों में लगभग सभी लोग नन्हें चच्चा को जानते थे और इन सभी गाॅवों में ड्रामा होता था तो नन्हे चच्चा का प्रयास रहता कि हमारे यहाॅ का ड्रामा उन सभी से अच्छा हो। यह ड्रामें का अघोषित दंगल पूरे सालभर चर्चा का विषय रहता इसलिए हम सबकी कोशिश रहती कि ड्रामें में कोई कमी न रह जाये पर मुश्किल यह थी कि ड्रामें में हर साल कोई न कोई कमी रह ही जाती थी। हम लोगों के ड्रामें का सबसे बड़ा कम्पटीशन हिरामनपुर वालों से होता। हिरामनपुर केवल हमारा पड़ोसी गाॅव ही नही था बल्कि उससे हम लोगों के गाॅव की पहचान जुड़ी हुई थी क्योंकि वह हमारा पोस्ट आफिस गाॅव, न्यायपंचायत गाॅव, मीडिल स्कूल और साधन सहकारी समिति वाला गाॅव था। अपने इस सारी विशेषताओं के अनुरूप हिरामनपुर में हम अड़ोस-पड़ोस के गाॅव वालों के लिए एक बाजार भी लगता था। जहाॅ दवाई की दुकान, हलुवाई की दुकान, दो-तीन जनरल स्टोर, चायपान के साथ एक साइकिल बनाने की दुकान थी। यह बाजार गाॅव के बीच से निकलने वाले नहर के किनारे पुल पर लगता था जिसके चारों तरह हिरामनपुर गाॅव के पुरवे गाॅव, बाजार, नवपुरवा और सरैया थे। शाम को नहर के पुल पर सौ पचास लोग जुट जाते और बाजार बन जाता। उस शाम के बाजार को अगल-बगल के ड्रामें के छीछालेदर करने का स्वयंभू अधिकार प्राप्त था यही हमारे ड्रामें के कर्ताधर्ताओं के लिये चिन्ता की बात होती थी कि कहीं हम किसी और के ड्रामें से उन्नीस न हो और विशेषकर हिरामनपुर से तो विलकुल ही नही।
अन्ततः बड़ी मेहनत से ड्रामें की स्क्रिप्ट फाईनल हुआ और ड्रामा के लिए मुख्य रूप से कर्ता धर्ता लोगाें की टीम ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी। इनमें नन्हें चच्चा तो थे ही उनके साथ वैद जी, शर्मा जी, लल्लन चच्चा, फौजदार बड़का बाबू, डा0 हीरालाल, गुलाम अली, नन्दलाल मुंशी, सोमारू मास्टर साहब जैसे लोग थे। कुल मिला जुलाकर यह टीम पूरी तरह संवैधानिक थी। आरक्षण, वर्ग, जाति, क्षेत्र, व्यवसाय के सभी मानदण्डों को पूरी करती हुई। इसमें गाॅव के सभी जाति, वर्गो के साथ पुरवाॅ का प्रतिनिधित्व शामिल था। ड्रामें को लेकर रोज रात आठ बजे से परधान जी के बैठका में मीटिंग चलती जो रात के दस साढे दस बजे तक चलती और जब नन्हें चच्चा मीटिंग से अपने घर पर आते तो चाची घर पर अगल ड्रामा मचाती। पर क्या मजाक ‘दि ग्रेट इण्डियन ड्रामा अकबर अनारकली’ के राजा मास्टर के तरह नन्हें चच्चा भी ड्रामें के अपने संकल्प से जरा सा भी डिग जाये। एक ही आॅगन रहने का फायदा हमें यह मिलता कि बिना ग्रीन रूम में एण्ट्री लिये हम ड्रामें के नेपथ्य की सारी बाते पता चल जाती। बहरहाल ड्रामा स्क्रिप्ट के लिहाज से पात्रों का चयन किया गया। गाॅव के ड्रामें में महिला पात्रों की भूमिका भी थी। हमारे गाॅव में महिला पात्रों की भूमिका भी  सन् 1933 के देविकारानी के भारतीय हिरोईन होने के पहले वाले दौर के समान, पुरूष लोग ही निभाते थे। गाॅव के किशोरों में से जो नौजवान बनने की देहरी पर खड़े होते थे उन्हीं में से ड्रामें की हिरोईन का रोल करने के लिए पात्र चयन होता था। इन हीरोईन बने लड़कों की मुसीबत सालभर तक यह होती थी कि आपसी झगड़े में कभी कभार उनके महिला पात्र के नाम से संबोधन कर बाकी लड़के चिढ़ाते रहते थे। इसलिए महिला पात्रों के चयन में गोपनीयता बरकरार रखने की कोशिश की जाती थी सिफ ड्रामें से जुड़े लोगों को ही उनके पात्रों की जानकारी होती थी। सिर्फ ड्रामा में कम्प्टीशन चॅूकि हीरामनपुर वालों से था। इसलिए इस बात की पूरी व्यवस्था थी कि ड्रामें की गोपनीयता बनी रहे। उनका ड्रामा हम लोगों के ड्रामें से एक हफ्ता पहले था वैसे प्रयास उन लोगों का भी था कि अगर उन्हें हमारे ड्रामें की तारीख का पता चल जाये तो वो लोग अपना ड्रामा हम लोगों के बाद रख लेें लेकिन हमारे गाॅव वाले गोपनीयता बनाये रखने में कामयाब रहे। विशेषकर हम हिरामनपुर मीडिल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे। हम लोगों ने हिरामनपुर वालाें के लड़कों के साथ पढ़ते रहते खेलते हुए भी उन्हें यह भनक तक लगने नही दिया कि हमारे यहाॅ कब और कौन-सा ड्रामा खेला जा रहा है। फिर एक दिन हमने अपने मीडिल स्कूल के साइंस रूम के पीछे दीवार पर गेरूआ से लिखे हुए सार्वजनिक घोषणा देखा-‘‘भाइयों और बहनों, प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी ग्राम हिरामनपुर जूनियर हाईस्कूल के मैदान में दिनांक 13 अक्टूबर 1979 शनिवार को ऐतिहासिक नाटक ‘‘सुहाग का बलिदान उर्फ कोतवाल जोरावर खाॅ’’ ड्रामा खेला जायेगा। आप उस ड्रामें में उपस्थित होकर मनोरंजन करें और आनन्द लें। उस दिन हम लोग स्कूल में पढ़ने के बाद साइंस रूम का यह सन्देश लिये लगभग भागते दौड़ते हुए वापस गाॅव आये और अगले पाॅच मिनट में पूरे गाॅव में यह खबर फैल गयी कि हिरामपुर वालों का ड्रामा तेरह तारीख को है। देखते ही देखते पूरा गाॅव ही गाॅव के सम्मान के लिए अपने अपने ढंग से ड्रामे में सहयोग करने के लिए क्रियाशील हो गया।
रात ड्रामें में रिहर्सल में ड्रामा कर्ता धर्ता टीम ने रणनीति बनाई। दूसरे दिन सुबह से ही गाॅव में घर घर से ड्रामें के लिये चन्दा उतरने लगा। रमजान मोलवी की दुकान से एक रूलदार बीस पन्नहवा कापी और नटराज की लाल कालीधारी वाली एचबी पेंसिल खरीद कर उस पर लाइन वार घर के मुखिया का नाम और दिये गये चन्दे को सलीके में लिखकर वसूलने के काम का मोर्चा शर्मा जी ने सम्भाला तो चैकी बांस टाटपट्टी जुटाने का काम लल्लन चच्चा ने। फौदार बड़का बाबू और नन्हकू चच्चा के साथ कैलाश बब्बा नदोई माई के पास अपने दालान के सामने के मैदान के साफ सफाई में लग गये। नन्हें चच्चा डाक्टर हीरालाल और शिवप्रकाश के साथ बनारस चले गये। मेकअप और पर्दा के लिए मण्डली करने। तो जटाई चच्चा फूलपुर जा कर लाउडस्पीकर और जनरेटर करने। इतनी तेजी और सामूहिक सहभागिता तो अब राजनीतिक दलों के इलेक्शन की तैयारियों में भी नही दिखती। हम लड़को को भी टास्क दे दिया गया कि दूसरे गाॅव के लड़कों को अपने ड्रामें के बारे में बताकर उन्हें देखने के लिए निमन्त्रित करने का। साथ ही साथ जगह-जगह ड्रामें के बारे में दीवार पर लिखकर सूचनाएं देने का। हम लोगों के साथ पढ़ने वालों में उमेश और मुन्नीलाल की रायटिंग सबसे सुन्दर थी एकदम चुनकर लिखते थे दोनों लोग। ऐसे ही मौके पर हम अपनी रायटिंग को लेकर खुश होते थे कि यदि मेरी राइटिंग बनती तो मुझे भी लिखना ही पड़ता। अच्छा है मैं कभी-कभी अपना लिखा हुआ खुद ही नही पढ़ पाता था तो दूसरे क्या पढ़ेंगे। उमेश और मुन्नीलाल  एक टुकड़ा लकड़ी का जला हुआ कोयला, एक ढोका दुद्धी और एक ढोका गेरू लेकर अपने बस्ते में रखते और साथ सुथरा दीवार देख वहाॅ अपने ड्रामें के बारे में लिखते ‘‘ सिन्धूर की होली उर्फ डाकू मान सिंह’’ आपके लिए ग्राम नदोय में दिनांक 20-10-1979 शनिवार को ड्रामा खेला जा रहा है। ऐसा ऐतिहासिक ड्रामा आपने पहले नही देखा होगा। अपने और अपने परिवार के साथ देखने अवश्य आइए और ड्रामें का आनन्द उठाइए। धन्यवाद। साइन्स रूम के दीवार पर जहाॅ हिरामनपुर वालों ने अपने ड्रामें का प्रचार किया था वही उसी दीवार पर बगल में थोड़ा ऊपर हटकर हम लोगों ने भी अपने ड्रामें की सूचना लिख दिया। यह साइंस रूम भी कमाल का था निरल्ले में बनी हुई सफेद ऊॅची एक मंजिला एक बड़े कमरे व एक बरामदे वाला भवन। मीडिल स्कूल के अंग के रूप में। मीडिल स्कूल खूब लम्बे-चैड़े मैदान में फैला हुआ था। मैदान के एकदम दक्षिण खाली जगह में साइंस रूम से एकदम उत्तर में मिट्टी की दीवारों वाली और खपरैल से छाये अंग्रेजी अक्षर ई के आकार में बने कुछ छः-सात कमरे। उनके सामने दो तीन नीम का पेड़। सामने एक सीमेन्टेड टूटे हुए जगत वाला कूॅआ जिसके पश्चिम में स्कूल के बगल में जाती हुई सड़क के किनारे लगे हुए फूल पौधे और एक सीध में आठ-दस सीधे यूकेलीपटस के पेड़। साइंस रूम से मीडिल स्कूल के कच्चे क्लास रूम के बीच की दूरी सौ मीटर से कम नही रही होगी और बीचोबीच एक बड़ा सा पाकड़ का पेड़ था जिसकी छाया और चबूतरे का उपयोग प्राइमरी स्कूल से लेकर मीडिल स्कूल वाले अपने अपने जरूरत के अनुसार करते थे। साइन्स रूम किसी सरकारी प्लान में बना था और उसे देखकर लगता था कि उस पर सफेदी भी तभी की हुई होगी जब वह बना होगा। फिर भी वह सफेद दिखता था क्योंकि उसके आस-पास लगभग दो तीन सौ मीटर कोई मकान नही होने से वह अकेले सफेद दिखाई देता और उसके पीछे की दीवार अक्सर इसी तरह के ड्रामें की सूचना, अस्पताल, बीमारी आदि की सूचनाओं को लिखने के लिए काम आती थी। गेरू और कोयला से लिखी ये सूचना हर साल बरसात के पानी से मिट जाती थी अगले साल पुनः नई सूचना प्रदर्शित करने के लिए।
खैर कैलेण्डर के हिसाब से पहले तेरह अक्टूबर आना था तो वह ही पहले आया। हम लोग तेरह अक्टूबर शनिवार की रात हिरामनपुर ड्रामा देखने गये। हिरामनपुर का ड्रामा देखने हमारे गाॅव के लोग जरूर जाते थे क्योंकि तभी पता चलता था कि हम उनके टक्कर में कितने बीस है। मेरी माई (दादी) के ढेरों विरोध के वावजूद मैने उन्हें बहला-फुसलाकर हिरामनपुर जाने की अनुमति ले लिया और गाॅव के जत्थे के साथ पहुॅच गये ।हम मीडिल स्कूल के मैदान में। ड्रामा शुरू होने के पहले आरती होती थी। ड्रामें में महिला बने पुरूष पात्रों ने भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारी- ‘‘आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की, गले में वैजयन्ती माला , बजावे मुरली मधुरबाला..........। अभी आरती शुरू हुई थी कि सबसे आगे बैठे हम लोगों ने कृष्ण भगवान को पहचान लिया-अरे यह तो साथ वाला कमलेश है। मुह पर रामराज पोते और सिर पर मुकुट मोरपंखी लगाये भी कमलेश साफ पहचान में आ रहा था। तभी मेरे बगल में खड़े राजू ने आरती करने वाली को पहचानकर आवाज लगायी कि इ नीली वाली साड़ी वाला अरविन्द। दर्जा आठ वाला। अब हम लोगों ने अरविन्द और कमलेश को आवाज देना शुरू किया। जब तक हम लोगों को व्यवस्था में लगे लोग चुप कराते तब तक हम लोगों पर अरविन्द और कमलेश की निगाह पड़ चुकी थी और कहना न होगा कि वे हम लोगों को देखकर असहज हो चुके थे। और आरती को थोड़ी शीघ्रता होने की साथ ही कुछ अनियमितता नजर आने लगी। मेरे गाॅव के लोग खुश थे कि हमने आरती में ही उन्हें हतोत्साहित कर दिया है पर जैसे-जैसे ड्रामें का पर्दा उठने के बाद ड्रामा आगे बढ़ता गया। मेरे गाॅव के लोगों के चेहरे पर हवाईया उड़ने लगी। हुआ ये था कि हिरामनपुर वालों ने भी अपने ड्रामें के लिए वही स्क्रिप्ट लिया था जो हमारे नन्हें चच्चा ने। हिरामनपुर से वापस लौटने के बाद सबका मन मिजाज बिगड़ा हुआ था। ड्रामें से जुड़े लोग एक सुर में हिरामनपुर वालों को पानी पी-पी के कोसते हुए गाली दे रहे थे। सभी का यह मानना था कि हिरामनपुर वालों ने हम लोगों के साथ धोखा किया है। उन्होंने ड्रामें का नाम बदल कर बहुत गलत किया जिसके लिए डीह बाबा उन्हें कभी माफ नही करेगें। मैं आज तक यह नही समझ पाया कि हिरामनपुर वालों के धोखे के पीछे सच क्या था? क्योंकि अव्वलन तो हम लोगों ने उन्हें अपने ड्रामें के बारे में बताया ही नही था। दोयम कि उनका ड्रामा हम लोगों के ड्रामें से एक हफ्ता पहले था और तीयम कि ड्रामें का नाम तो हम लोगों ने भी बदला था क्योंकि ओरिजिनल स्क्रिप्ट तो इन दोनों के बजाय तीसरे नाम से थी। पर इसमें समझने जैसी कोई बात नही थी। सभी हिरामनपुर वालों से नाराज थे तो हमारा नाराज होना भी बनता था। मुश्किल ये थी कि ड्रामे को खेलने में कुल जुमा छः दिन भी ही बचे थे। तारीख में कोई परिवर्तन होना सम्भव नही था। लाउडस्पीकर, जनरेटर, ड्रामा कम्पनी सबको बयाना दिया जा चुका था। जगह-जगह दीवारों पर कोयलें और गेरू से शनिवार बीस तारीख को ड्रामा होने की घोषणा भी लिखी जा चुकी थी। ऐसे में एक मात्र विकल्प यह था कि हम लोगों के पास ड्रामा करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नही।
बहरहाल रविवार से लेकर शुक्रवार तक का दिन काटते हुए शनिवार भी आ पहुॅचा। शनिवार सुबह से भी हम लोग ड्रामा व्यवस्था में लग गये। व्यवस्था में लगने से ज्यादा यह दिखाना महत्वपूर्ण था कि हम व्यवस्था में लगे हुए है। लल्लन चच्चा के दिशा निर्देशों के अनुसार हम लोग फलाने-ढेकाने के यहाॅ से चौकी तख्त ला-लाकर नदोई माई के पास रख दिये। हर चौकी के तले में चाक से मालिक का नाम लिखकर। बाॅस बल्ली भी किनारे जुटा लिये गये। पूरा गाॅव अफरा-तफरी में लगा हुआ था। तभी बारह साढे़ बारह बजे तक छोटे लाल एण्ड सन्स ड्रामा कम्पनी वाले भी तीन चार बड़े बक्से और सन्दूक में ड्रामें का पर्दा, डोरी, ड्रेस, तलवार बन्दूक भरकर उसे लालता की बैलगाड़ी पर लादे हुए आ गये। उन्हें फूलपुर से ले आने के लिए ही गाॅव के दो लड़के साइकिल से सुबह से ही फूलपुर बाजार में जाकर महादेव साव की दुकान पर बैठे हुए थे। ड्रामा कम्पनी में दो बूढ़े और दो जवान मास्टर थे। उन सबके आते ही नन्हें चाचा आगे बढ़कर उन लोगों की व्यवस्था कैलाश बब्बा के दालान में किये और हम लोगों को हिदायत दिया कि मास्टरजी लोगों को कोई तकलीफ न होने पाये। मंगरू नाउ दालान के बारह अहरा सुलगा कर ड्रामा कम्पनी के मास्टर लोगों के भोजन पानी की व्यवस्था में लग गये और मास्टर लोग ड्रामें के स्टेज की व्यवस्था में। शाम 6 बजे तक बाॅस बल्ली पर रस्सीयों से बाॅध कर स्टेज खड़ा हो गया। मास्टर लोगों ने उसे तीन चार बार डोरी से खींच कर पर्दा खुलने और बन्द होने का रिहर्सल किया और तब तक हम लोगों ने उसमें फुलपुर के सेठ जी द्वारा लटकायें गये कई माइको का हैलो-हैलो करके माईक टेस्टिंग कर लिया। हम लोग सुबह से मौका-ए-ड्रामा पर बदस्तूर बने रह कर स्टेज, पर्दा, तम्बू, माईक, लाईट, जनरेटर की टेस्टिंग को देखते रहे इस गर्व से भरे एहसास को प्रदर्शित करने के साथ कि हम लड़के भी इस ड्रामा की व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
शाम सात बजे से स्टेज के सामने लगे तम्बे कनात में भीड़ लगनी शुरू हो गयी। व्यवस्था में लगे रहने के बावजूद हम लोगों को ड्रामा देखने के लिए अपनी जगह की भी व्यवस्था करनी थी। इसलिए घर से स्कूल ले जाने वाला बोरा जिस पर स्याही से मोटा-मोटा हमने अपने नाम लिख रखा था, विछाकर हमने अपने लिए एक सही जगह छेंक लिया। घर पर आकर जल्दी-जल्दी खाना खाने बजाय खाना मूॅह में ठूसा और भाग कर अपनी छेंकी हुई जगह पर बैठ गये। रात के आठ के बजाय साढ़े आठ बजे अलियार बब्बा स्टेट पर आये। अलियार बब्बा भी पहले मिलिटरी में थे, मेडिकल कोर में, सन पैसठ वाली लड़ाई शुरू हुई तो लड़ाई शुरू होने से पहले ही उनका मन मिलिटरी से उचट गया और वे मिलिटरी छोड़ के आये तो फिर वापस नहीं गये। अब शहर के किसी स्कूल में गवर्मेन्ट स्कीम में पढ़ाते थे। राजदूत फटफटइया से आया जाया करते। रोज फटफटईया से शहर जाने के कारण उनको शहर की और सारे ताजे तरीन बदलाव की अच्छी जानकारी रहती थी। बहुतेरे लोग उन्हें डाक्टर साहब भी कहते थे। डाक्टर साहब और वैद जी दोनों में समानता यह थी कि दोनों लोग अपनी पहले की नौकरी छोड़ चुके थे। तब मुझे यही लगता था कि ड्रामें में एनाउन्सर बनने के लिए शायद पहली योग्यता नौकरी छोड़ना है।
भाईयों और बहनों, आज इस शुभघड़ी में इस शुभ प्रांगण में आपके शुभआगमन के लिए हार्दिक स्वागत, वन्दन, अभिनन्दन....। अलियार बब्बा ने ड्रामें की औपचारिक शुरूआत किया। फिर आरती शुरू हुई। हिरामनपुर वालों से बढ़िया से बढ़िया करने के चक्कर में सारा जोर शुरू से ही लगा दिया गया था। शर्मा जी और नन्हें चच्चा की आइडिया के अनुसार जटाई चच्चा शंकर भगवान बने। छोटे लाल एण्ड कम्पनी के ड्रामा मास्टर ने उनको जटा जूट पहनाकर रंग दिया था। नंगे बदन कमर में मृगछाला वाला कपड़ा बाॅधे और हाथ में गले में डिजाईन बनाये जटाई चच्चा साक्षात शंकर भगवान ही लग रहे थे। ड्रामा मास्टर ने गले में रबर का नाग भी डाल दिया। क्या फन काढ़ करके बैठा था। कितना भी उसका फन नीचे झुकाओं फिर वह टाईट होकर फन काढ़े जैसा हो जाता था। तभी पर्दे के पीछे से उस नये कलाकार का एण्टी हुई जिसमे बारे में केवल तब के फिल्मकार ही सोच सकते थे। वह एण्ट्री थी जटाई चच्चा के उजरके बर्धा की जिसे अभी-अभी सहदेव लेकर स्टेज के पीछे आये थे। पर्दा खुलते ही स्टेज पर अपने नन्दी बैल के साथ महादेव शंकर की छवि हम लोगों के सामने थी। जटाई चच्चा और उनके बरधा की आरती होनी शुरू हुई। नन्हें चच्चा और हीरा डाक्टर माईक पर गा रहे थे- ‘‘नमामिशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदं स्वरूपं..........।’’ क्या मजाक कि जटाई चच्चा और उनका बरधा दोनो जरा सा इधर-उधर हुये हो। एकदम निश्चल मूर्ति की तरह। दर्शक तो बैल को भी मूर्ति ही मान लेते पर उसने अपने मुंडी को दो तीन बार हिलाकर अपने जीवन्त होने का प्रमाण दे दिया। आरती खत्म होते ही इतनी तालियाॅ बजी कि लगा कि हीरामनपुर वाले तो कभी सोच भी नही सकते।
ड्रामा शुरू हुआ। निश्चित ही हमारे यहाॅ के कलाकारों का मेकअप बढ़िया था। पाॅत्रों के पीछे के चेहरों को पहचानना मुश्किल था। उनसे रोल भी अच्छे से हो रहा था। पर्दे के दोनों साईड में खड़े नन्हें चच्चा और विजई सिंह कलाकारों को सुविधा के लिए प्राम्पटिंग कर रहे थे पर मुश्किल यह थी कि तीन चैथाई दर्शकों ने यह ड्रामा मात्र एक हफ्ता पहले देखा गया था और उसके ज्यादातर डायलाॅग उन्हें अभी तक याद थे। अब कलाकार के बोलने से पहले ही दर्शक उसका डायलाॅग बोल देते थे। दर्शकों और कलाकारों के बीच आगे-पीछे चल रहे डायलाॅगों के साथ ड्रामा का किसी तरह समापन हुआ। सालभर लोग हिरामनपुर और हमारे गाॅव के ड्रामें की परस्पर तुलना करते हुए मूल्यांकन करते रहे और नन्हें चच्चा स्क्रिप्ट के चयन में काफी सावधानी के बावजूद हो गयी इस असावधानी पर खीझते रहे। चच्चा और चाची के बीच ड्रामें के चक्कर को लेकर चल रहा ड्रामा अभी भी जारी था।
नदोई माई के बगल वाले मैदान में अब मकान बन गये है। वह पुराना पकड़ी का पेड भी नही रहा और कैलाश बब्बा का दालान भी नही। ड्रामें के कई जिम्मेंदार और कलाकार अब नही है। नये कलाकार और जिम्मेदार आयेे भी नही। जिस ड्रामा, रामलीला और इस तरह के कार्यक्रमों से गाॅव के लड़कों में सार्वजनिक वक्तव्यता का प्रथम अभ्यास होता था वह खुद अतीत का हिस्सा बन गयी है। अब मेरे गाॅव के लड़के गाॅव की सड़क से निकल कर बोलने के लिए स्पोकेन इंग्लिश इंटरव्यू कोचिंग और स्टेज डिप्लोमा, ड्रामा डिप्लोमा के लिए पैसा जमा कर अनुशासित कथाओं में जाते है पर वह गाॅव का ड्रामा जो उन्हें सामूहिक नेतृत्व सामूहिक वक्तव्यता और आत्म मनोबल बढ़ाता था। वह कटे पकड़ी के उन्हीं सूखे पत्तों के समान समाप्त हो चुका है।
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती....(१२)/ कुछ तीत कुछ तात कुछ गईले पे रात

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती....(१२)

कुछ तीत कुछ तात कुछ गईले पे रात......

तब बनारस बहुत बड़ा जनपद था। छोटे बब्बा हमसे पूछते कि बनारस की चैहद्दी और हम एकदम सटीक बताते उत्तर में जौनपुर, दक्षिण में मिर्जापुर, पूरब में गाजीपुर और बिहार राज्य, पश्चिम में इलाहाबाद जनपद। छोटे बब्बा का अगला सवाल तैयार रहता कि बनारस जनपद में कुल कितनी तहसील है और उससे भी पहले हमारा जबाब चकिया, चन्दौली, भदोही और वाराणसी। तीसरा सवाल भी हाजिर बनारस कमिश्नरी में कुल कितने जिले है- पाॅच वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर और बलिया।’’ अब हम वहाॅ से भागना चाहते क्योंकि हमें मालूम था कि अब छोटे बब्बा सामान्य ज्ञान के बाद गणित का सवाल पूछना शुरू करेंगे। छोटे बब्बा के सवाल हम लोगों के पाठ्यक्रम से सम्बन्धित रहते हुए भी अकसर पाठयक्रम के बाहर के रहते जैसे -कै नवा मुॅह चुम्मी क चुम्मा। उन्हीं से सुना हुआ जबाब हम बताते: सात नवा मुह चुम्मी का चुम्मा। अच्छा अब ई बताओं कि- कै नवईया चुल्ही में लकड़ी, ऊबते हुए हम रटा रटाया जबाब देते- एक नवईया चुल्ही में लकड़ी। अब छोटे बब्बा के अगले सवाल के पहले हम मौका देख खिसक लिये। छोटे बब्बा के सवालों का सामना अक्सर हमें गर्मी के छुट्टियों में करना पड़ता। जब स्कूल बन्द, कापी किताबों से कुछ दिन फुरसत ऐसे में छोटे बब्बा के सवाल हमारे लिए किसी हैण्ड ग्रेनेड या बम के गोले से कम नही होते क्योंकि तब हम भले ही तन से घर पर हो पर हमारा मन गाॅव के बाहर वाले तालाब पर रहता था। हम ही क्या पूरे गाॅव का ही मन वहीं रहता था उन दिनों और सबकी उपस्थिति भी। छोटे बब्बा बताते थे कि हमारे गाॅव का तालाब बनारस जनपद में दूसरा सबसे बड़ा तालाब था पहला कहीं चन्दौली तहसील में था। कहाॅ? यह उन्हें भी पता नही था पर इस बात को वे दावे के साथ कहते थे कि हमारा तालाब बनारस का दूसरे नम्बर पर है। यह तालाब केवल हमारे गाॅव का नही था यह हमारे गाॅव और गजोखर गाॅव का संयुक्त खाता था। दोनों गाॅवों के उत्तर में इस सिरे उस सिरे तक। साल भर में छः माह पानी से भरा हुआ और छः माह सूखा वीरान। तालाब के किनारे-किनारे वाले हिस्से से गाॅव वाले मिट्टी निकाला करते थे अपने-अपने जरूरतों के हिसाब से कभी घर बनवाने के लिए कभी अपने घर का दुआर पौसारा उॅचा करने के लिए। इससे किनारों में गड्ढ़े बनकर पोखरे बन गये थे। उनमें लगभग दस ग्यारह महीने पानी भरा रहता। वैशाख और जेठ का महीना आते आते वह भी सूख जाता और यदि नही सूखता तो हम लोग सूखा देते और उसे सुखाकर उसमें से मछली मार लेते थे। वैस यह तालाब हम लोगों के लिये सिर्फ मछली मारने के अलावा और भी बहुत सारे काम आता था।
हमारा क्षेत्र अपने जनपद बनारस के उत्तरी सीमावर्ती अंचल में आता है। उपज के नाम पर क्षेत्र का कृषि उत्पादन भगवान भरोसे ही  था। कारण पिण्डरा से लेकर फूलपुर और जौनपुर के सोहनी तक तिकोना क्षेत्र कृषि उपयोग से बंजर माना जाता था। इस इलाके में धूल नही बल्कि रेह होती थी। कभी एक फसल तो कभी-कभी दो फसल। गर्मी की दुपहरी में दूर दूर तक सफेद रेह ऐसे चमकती जैसे सूरज के धूप में सूखने के लिए सफेद मटमैली चादर बिछा रखी हो। बीच-बीच में कहीं-कहीं नीम, महुआ, बबूल या आम के पेड़ इस बात के प्रमाण थे कि इन बंजरों में भी पानी मिल जाता है। पर आश्चर्यजनक रूप से पानी के मामले में हमारा इलाका बहुत समृद्ध था। तपती गर्मियों में पानी बाइस साढे़ बाइस हाथ पर और बरसात में छः-सात हाथ पर मिल जाता था। पानी भी मीठा गन्धरहित, दोषरहित। उसके पीछे का मुख्य कारण था कि हमारा यह तालाब। तालाब में पूरे इलाके का बरसाती पानी नाली और नालों के माध्यम से आकर इकट्ठा होता और बरसात के बाद अगल-बगल के खेती खलिहान के लिए इन्हीं माध्यम से पानी निकाल भी लिया जाता। तालाब में पानी आने का मुख्य स्रोत शारदा सहायक नहर परियोजना के खण्ड 36 की एक छोटी सी नहर थी जो त्रिलोचन महादेव से थानागद्दी वाले माइनर से निकल कर हमारे तालाब को पानी देती थी। तालाब के चारों तरफ मिट्टी का कच्चा बन्धा था जिस पर अड़ोस-पड़ोस के रहने वाले लोगों ने सुविधानुसार पेड़ भी लगा दिये थे। तालाब से पानी निकालने के लिए पूरबी बन्धी पर बनी एक छोटी सी झरना पुलिया थी जिससे बन्धे से ओवर फ्लो हो रहा पानी नहर से होते हुए आगे कहीं जाकर नाद नदी में मिल जाता था।
साल के छः महीनों में सूखे तालाब में हमारे गाॅव सहित  आस-पास के गाॅव के लोग भी ताल का प्रयोग प्राकृतिक निपटान करने के लिए करते। दो-तीन लोग साथ में होकर बतकुच्चन करते-करते ताल में चले गये और निरल्ले में फरचंगा होकर आ गये। इसी बहाने सुबह शाम का तीन चार किलोमीटर टहलना भी हो गया और बतकुच्चन के साथ दिव्य निपटान भी। दिन में गाय गोरू को ताल में छोड़ दिये और अपने बन्धे पर किसी पेड़ के नीचे बैठ दोस्तों के साथ ताश के पत्ते की बाजी जम गयी। मौला बुआ ताल में से ही बरसात में उगी हुई नेरूई को काट कर रख लेती भरसाई में ईधन के लिए और निपटान करके आते समय लगे हाथ लोग बाग मिट्टी का सूखा चक्का हाथ में लेकर चले आते घर के नीम आम का चबूतरा बनाने के लिए। कुल मिलाकर यह तालाब हमारे लिये बहुउद्देशीय लाभ के काम में आता था पर हम लोगों का तालाब से सबसे ज्यादा जुड़ाव की कारण था मछलियाॅ। जो ताल के साथ ही अपने अस्तित्व को बरकरार रखती। हम लोगों के पास जब खेलने को कुछ भी नही होता तो हम इन मछलियों को अपना खेल बना लेते। तालाब में मछलियां कहा से आती इस विषय पर हम बच्चा पार्टी में बहुत ढेर सारे विचार थे। भोनू का मानना था कि मछलियां बरसात में आकाश से बरसती है तो राजू के मत से मछलियाॅ पानी सूखने के साथ और नीचे पाताल में चली जाती और पानी भरने के साथ ऊपर आ जाती। मैं आकाश और पाताल दोनों धारणाओं से अलग शारदा सहायक नहर के पानी को मछलियों के आने का स्रोत मानता तो अजय और उमेश बताते है कि नहर के मुॅह पर बड़े-बड़े जाल से लेकर छोटी-छोटी मच्छरदानियां लगी है ऐसे में नहर से मछली तो दूर से कोई किरौना भी नही आ सकता। कुल मिलाकर तालाब में मछली के आने के बिन्दु पर हम कभी एकमत न होते हुए भी इस बात पर सहमत थे कि तालाब में मछलियां रहती है और हर साल आती रहती है वैसे इस बात का हमें आश्चर्य भी होता था कि जब हम हर साल एक-एक मछली को ढूढ़कर निकाल लेते है तो फिर अगले साल मछली कैसे आ जाती है? और ऐसे में भोनू और राजू की आकाश व पाताल वाली थ्योरी सत्यता के काफी नजदीक लगती हुई भी हमें गले से नही उतरती।
मछली मारने का हमारा क्रम पानी बरसने और पानी जमा होने के साथ ही जुलाई में शुरू हो जाता। जुलाई में बरसात होते ही तालाब की ओर बहने वाले नाली, नालों से लेकर धान की क्यारियों तक मछलियां तैरती नजर आने लगती। मछलियां छोटी होती थी सिधरी, चेल्हवा, सौरी, पुठिया और झींगा छिछले पानी मे भी तैरते मिल जाती थी। कार्प जाति की सिधरी हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करती। झूण्ड में एक साथ चलने वाली सिधरियां बहुत आसानी से मिल जाती थी। हम लोग सिधरी मारने के दो-तीन तरीके प्रयोग में लाते थे। छोटे-2 गड्ढ़े होने की स्थिति में एक सूती कपड़ा गमछा लेकर दो लोग पानी की तली तक हाथ जमा कर पूरे पानी को छान लेते थे ऐसे में काफी सिधरी के साथ घोंघा, सेवार भी छन जाते थे जिसे बाद में छाॅटना पड़ता था। दूसरा सबसे आसान तरीका था पहरा का ,जो सनई व सुखे सरई से बना अंग्रेजी अक्षर ‘वी’ के आकार की एक फ्रेमदार बुनाई होती थी। इसे पानी बहने वाले नाले, बाहे पर मेड़ बना दिया जाता था जिसमें पानी के साथ सिधरी, चेल्हवां, झींगा व अन्य मछलियां बहकर आती और पानी छनने के बाद उसी में रहते हुए फ्रेम के गहरे गड्ढे में गिर जाती थीं और दो-तीन घण्टे के बाद डेढ़-दो किलो मछलियां आराम से इकट्ठा हो जाती थी। पर बड़े लोग यह दोनों तरीका हम पर छोड़ देते थे क्योंकि उन्हें बड़ी मछलियों से मतलब था। मछली मारने का आनन्द ही कुछ और था जिसमें बरसात के समय रिमझिम-रिमझिम पड़ती पानी के फुहार के समय मछलियां और अधिक पानी के बहाव के साथ भागती नजर आती और मछली मारने वालों के मन में छल-छल, कल-कल की आवाज पर और अधिक आनन्द और चाहत बनी रहती। बड़ी मछलियों के मारने के भी कई तरीके थे वह मछली मारने वालों की संख्या और पानी की गति पर निर्भर करता था सबसे प्रचलित तरीका था फैसला लगाने का। फैसला एक छोटा जाल होता था जिसे बहते हुए पानी में लगाया जाता था। फैसला लगाने वालों में नन्हें चच्चा, लल्लन चच्चा, कैलाश बब्बा, शर्मा जी, नन्दलाल और भरवटी तथा मियानी टोला के लोग रहते थे। जाल लगाने के लिए जब बरसात में ताल मारने के बाद नहर से पानी निकलने लगता तो एकाध किलोमीटर आगे गाॅव से बाहर नहर को दोनों ओर से बाधकर बीच में मोटे मजबूत बाॅस के सहारे से जाल लगाकर रातभर मछली मारने की रखवाली की जाती और अगली सुबह जाल निकाला जाता तो उसमें कभी-कभी पचास किलो तक मछलियां निकलती। जब घोर बरसात बन्द हो जाती और पानी थोड़ा स्थिर हो जाता था तब ‘अखना’ लगाया जाता था। अखना सितम्बर माह के आखिर में लगना शुरू होता था तो वह नवरात्रि आने तक चलता रहता। अखना में भी कम से कम तीन चार लोगों की जरूरत होती थी। अखना बाधना बड़े धैर्य और कला का काम होता। अखना रात में बाॅधा जाता और उसकी रखवाली भी रात में करनी पड़ती क्योंकि कभी-कभी अखना पार्टी में न शामिल होने वाले भी जलन और चिढ़ के कारण अखना में पानी को खोल देते थे ऐसे में अखना बाॅधने की सारी मेहनत बर्बाद हो जाती। अखना विशेषकर पानी भरे खेतों में या तालाब के ऊपरी हिस्सों में मेड़ों पर लगाया जाता। मेड़ को चौड़ा बनाकर उसे बीच में एक गड्ढ़ा तीन बाई दो का बनाकर उसके बीच का पानी निकाल देते थे और उसकी मेड़ को चिकना करके लेबल पानी के बराबर कर देते थे। रात में मछलियां मेड़ को डाॅक कर दूसरे तरफ पार जाने के धोखे में उस गड्ढे में आ जाती थी और पानी न रहने से उसी में रात भर रह जाती थी। सुबह रखवाली करने वाले पानी में उतर कर उन मछलियों को बीन लाते थे। पर अखना में खतरा यह होता है कि अखना कहीं से खुल गया या पानी रिसने लगा तो उसमें पानी भर जाता और एक भी मछली नही मिलती। हमारे गाॅव में लगे अखना में से दस में से चार अखना का यही हश्र होता था। कभी कोई चुपके-छिपके से बधे पानी को खोल देते और कभी वह खुद कमजोर होकर टूट जाता। गेड़ान जब पानी स्थिर तथा कम हो जाता तब बाँधा जाता। गेड़ान में पानी कम होने पर दो मेड़ों के बीच की एरिया सील कर उसमें पानी निकाल देते और उसके कीचड़ में घुसी हुई मछलियों को पकड़ लेते। गेड़ान में मिलने वाली मछलियां बड़ी प्रजाति की होती जिसमें रोहू, पहिना, भांगुर, बाम रहती। इस तरह से हमारे गांव में जुलाई के बरसात से ही मछली मारना प्रारम्भ हो जाता और ताल में पानी रहने तक चलता रहता। हमसे कद काठी और उम्र में बड़े पर हमारे साथी सुरेश चच्चा और हम ने मछली मारने की श्रमहीन पद्धति पर भरोसा किया और हम और वह इस अभियान में पार्टनर बने। हम लोग मिट्टी की एक गगरी की पेदी में सरसो की खली पोत कर अखना वाले स्थान पर अच्छे ढंग से गड्ढा बनाकर अपनी गगरी गाड़ देते उसका मुॅह जल स्तर के बराबर रख देते और रात में खली की महक से मछलियां कूद कर उसमें आ जाती और हम दोनों का काम उन डेढ़-दो किलो सौरी गोईजी और टेंगरा में मजे में चल जाता। कभी-कभी तो ऐसा भी होता कि अखना वालों का अखना टूट जाता पर हम लोगों का गगरी वाला प्रोग्राम बहुत सफल रहता। फिर एक दिन ऐसा हुआ कि हम लोगों ने गगरी लगाना छोड़ दिया। उस रात में हम लोग अखना वालों के साथ उनके मेड़ पर अपनी गगरी फिक्स करके चले आये। सुबह खुशी-खुशी जाकर हम लोग अपनी गगरी उठाकर बाहर लाये और गगरी थोड़ी भारी दिख रही थी तो हम बहुत खुश हुए कि आज मछली ज्यादा फॅसी है। पर जब हम लोग गगरी के मुॅह को बाॅधे हुए बंधे पर ले आये और उसे हमलोगों ने पलटा तो गगरी छोड़ कर सुरेश चच्चा आगे भागे और मैं उनके पीछे-पीछे भागा। पीछे पलट कर हम लोगों ने यह भी देखने की कोशिश की कि गगरी सही सलामत है या हम लोगों ने उसे भी पटक कर फोड़ दिया। इस बार हम लोगों की गगरी में मछली के बदले में एक बड़ा सा डेड़हा सांप घुस गया था। वह गगरी में कूॅद कर आयी बाकी मछलियों को भोजन कर मोटा बना गगरी में बैठा था। गगरी में चिकनाई होने के कारण वह बाहर नही निकल कर जैसे सुबह हम लोगों की ही प्रतीक्षा कर रहा था। इस घटना के बाद से हमने मछली मारना बन्द कर दिया। क्योंकि तीन साल पहले भी एक अन्य मछली वाली घटना में ही मेरी काफी लानत मलानत हो चुकी थी। उस बार के प्रकरण में मैं अकेला नायक खलनायक, सहनायक सभी था। तब ये हुआ था कि दोपहर में मैं शौच करने के लिए तालाब पर गया था। शौचोपरान्त मैंने देखा कि तालाब के किनारे बने एक बहुत छोटे से गड़ढे में दो-तीन सौरी मछलियां घुस आयी है। गर्मी का दिन स्कूल की छुट्टी, सूनसान बन्धा और हाथ में पकड़ में आने लायक मछलियां। संयोग ऐसा था कि मैं मन को रोकने के बजाय गड्ढे की मेड़ बाॅध कर हथेलियों से पानी निकालकर तीनों सौरी मछलियों को पकड़ लिया और जेब में दबाये घर आया और पक्के बन रहे घर के आॅगन में एक किनारे भॅूसे की गाॅठ को इकट्ठा करके उन्हें भुनने के लिए आग जला दिया। आग जलते ही आग बढ़ते-बढ़ते भूसे की ढेर की तरफ बढ़ चली। शुरू में तो मैंने आग को बुझाने की कोशिश किया फिर स्थिति नियन्त्रण से बाहर होते देख वहाॅ से खिसकने में ही भलाई समझी। पाॅच सात मिनट बाद ही पूरा गाॅव मेरे दरवाजे पर हाथ में बाल्टी गगरा लिये आग बुझाने के लिए आ पहुॅचा। अगल-बगल के सभी कुयें हैण्ड पाइप से पानी खींच खाॅच कर पानी से आग पर काबू पाया गया और आग बूझ गयी। इस अबूझ पहेली पर सभी लोग चर्चा करते रहे कि आखिर आॅगन में रखे भूसे की ढेर में आग कैसे लगी? यह पहेली अबूझ ही रह जाती अगर मैं भूसे की आॅग बूझने के डेढ़-दो घण्टे बाद अपनी भूनी हुई मछलियों को खोजने की कोशिश में न पकड़ा जाता।
अक्टूबर में शारदीय नवरात्रि के शुरूआत होने के साथ ही बासन्तिक नवरात्रि तक मछली मारने वाले कार्यक्रम लगभग बन्द ही रहता। दो चार लोग जो कटिया लगा कर मछली मारते बस वे ही तालाब के किनारे मिलते। दोनों नवरात्रियों के बीच का यह अन्तराल हम लोगों के लिए भी बहुत व्यस्तता भरा रहता। खेलने से लेकर पढ़ने तक। और इस बीच ठण्डक बढ़ जाने से भी बड़े लोग खेतीबारी नौकरी में ही लगे रहते। बस छूड़ी महराज अपनी कटिया संभाले दोपहर को तालाब पर मछली मारते मिल जाते। वे बारहोमासी मछली भोजक थे। कभी-कभी उनकी देखा-देखी  गाॅव के निखिद्दी, मोईन आदि भी कटियां लगाते थे। हमने भी कटिया लगाने में हाथ अजमाया पर उतना धैर्य और गम्भीरता मुझमें कभी नही थी तो हम कटियामारी में कभी सफल नही रहें।
वासन्तिक नवरात्र के दस बीस दिन बाद स्कूल एकबेलवा हो जाता था और तालाब भी सूख जाता था। पानी किनारे-किनारे के गड्ढों में जमा हो जाता था अपने साथ अच्छी खासी मछलियों को लिये हुए। दिन निश्चित कर प्रधान जी की ओर से मछली मारने का एलान होता। पूरा गाॅव इकट्ठा होता और मछली मारने का घरवार चन्दा इकट्ठा होता। मई के पहले दूसरे सप्ताह में बारी-बारी से गड्ढों की मछलियां निकाली जाती। मछली मारने वालों के हिस्से लगने के बाद बची मछलियां पूरे गाॅव में बाॅट दी जाती। पूरा गाॅव हफ्तो मछली के महक से ही महकता रहता। हम बच्चा पार्टी की तो खूब चाॅदी रहती। सुबह शाम खाने के लिए मछली और दिन दुपहरी से शाम तक बन्धे पर मछली मराते हुए दृश्य को देखना। छोटे बब्बा खुद तो शाकाहारी थे पर हम लोेगों को गाॅव की मछली बटाई के हिस्से में कोई बेइमानी न हो जाये इसके लिए वे बहुत सावधान रहते कि हम लोगों को वे खुद हिस्सा लगने और बाॅटने के समय हम लोगों के साथ रहते, बच्चा समझ कर कोई टेनी न मार दे। उनके कम पढ़े लिखे होने के बावजूद बहुत ढेर सारी कहावते याद थी उन्हें में एक कहावत वे मछली मारने वाले दिनों में रोज बताते कि रोटी से बोटी, शुरूआ से भात, कुछ तीत कुछ तात, कुछ गइले पे रात। अर्थात् मछली खाने का नियम यह है कि मछली के पकौड़े यानि सूखी मछली से रोटी खाना चाहिए और उसके करी से चावल। यह दोनों तब खूब स्वादिष्ट लगते है जब वे थोड़े तीखे और मसालेदार हो और खाने का समय रात में हो।
अब छोटे बब्बा भी नही रहे। तालाब का स्वरूप भी बदल गया है। गजोखर वाले भू-भाग में नवोदय विद्यालय खुल गया है और वहाॅ भी झील जैसे पर्यटकस्थल बनाने की योजना चल रही है। तालाब में उपरी व छिछले भागाें में वन विभाग ने जंगल लगा दिया है। गाॅव के लोग बताते है कि उन जंगलों में सेंहुवार, घड़रोज, मोर, खरहा बहुत हो गये है। मछलियां कम हो गयी है। शायद न भी कम हुई हो पर गाॅव के लड़के अब पहरा, फैसला, अखना, गेड़ान नही जानते। कटिया भी अब शायद ही कही-कहीं दिखती है। नितिन बता रहा है कि अब मछली मारने की कोई डुगडुगी नही पिटाई जाती। जिसका जब मन हो वह जाकर मछली मारता है। अब गाॅव में मछली की महक का संयोग भी नही मिलता। जो लोग सालभर तक एक बेला का भोजन बिना मछली के करते ही नही थे उन्होंने भी बाजार से सब्जी खरीद कर खाना खाने की आदत में शामिल कर लिया है और गाॅव के बच्चे जो मछली मारने को मनोरंजन व खेल का साधन मानते थे उनके बच्चे मछली मारने में शर्म महसूस करते हैं। कोई कहावत वाला नही रहा न ही कहावत वाली मछरी।
रोटी से बोटी, शुरूआ से भात, कुछ तीत कुछ तात, कुछ गइले पे रात।
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