शनिवार, 29 अगस्त 2026

खो रही है बनारस मे बनारसियत/ व्योमवार्ता

खो रही है बनारसियत......./ व्योमवार्ता                                                    खो रही है बनारसियत..........
                                                       
                                                                                                                                        .व्योमेश चित्रवंश            

दुनिया में दो तरह के शहर होते हैं। पहले वे शहर, जो दुनिया के नक्शे पर महज़ पत्थरों और सीमेंट, कंक्रीट, सड़कों और आर्किटेक्चरल डिजाईन से बनते हैं जिन्हें भूगोल तय करता है। दूसरे वे, जो इंसानी मिजाज, संस्कृति और इतिहास के ताने-बाने से बुने जाते हैं; जिन्हें समय भी नहीं बदल पाता। वे समय की छाती पर लिखे गए जीवित महाकाव्य होते हैं। काशी ऐसा ही एक महाकाव्य है। बल्कि बनारस इसी दूसरी श्रेणी के लिखे जीवित महाकाव्यों का सिरमौर रहा है। जिसके बारे में मार्क ट्वेन ने लिखा था कि यह शहर इतिहास, परंपरा और किंवदंतियों से भी पुराना है।बनारस महज़ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक 'अवस्था' है, एक 'मनःस्थिति' है, एक शाश्वत जीवंत अवस्था है,जिसे दुनिया 'बनारसियत' के नाम से जानती है। यह बनारसियत संकरी गलियों के मोड़ पर, घाटों की सीढ़ियों पर, सुबह की मखमली धूप में और यहाँ के लोगों के फक्कड़पन में सांस लेती रही है।
यह भी सच है कि विकास और आधुनिकता की दौड़ में जब कोई प्राचीन शहर अपनी रफ्तार बदलता है, तो उसकी कीमत अक्सर उसकी आत्मा को चुकानी पड़ती है। आज हमारा बनारस इसी चौराहे पर खड़ा है। बीते वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने जो करवट ली है, उसने हम सभी को एक गंभीर आत्मचिंतन के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा।आज जब हम बनारस की गलियों, घाटों और चौराहों से गुजरते हैं, तो मन में एक गंभीर बेतैनी पैदा होती है। बीते बारह वर्षों में इस शाश्वत नगरी ने विकास की जो करवट ली है, उसने हमारे मन मस्तिष्क में एक गंभीर वैचारिक द्वंद्व को जन्म दिया है। यह द्वंद्व है भौतिक विकास की चकाचौंध और सांस्कृतिक पहचान के बिखराव के बीच का द्वंद्व।
         आज बनारस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ भौतिक और आर्थिक प्रगति की चमचमाती ऊंचाइयाँ हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के बिखरने की मूक चीत्कारों का सन्नाटा  इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का कायाकल्प हुआ है। आर्थिक और भौतिक दृष्टि से शहर ने वह ऊंचाइयां छुई हैं, जिसकी कल्पना आज से बीस साल पहले असंभव था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले एक दशक में बनारस का भौतिक कायाकल्प अभूतपूर्व रहा है। आर्थिक और ढांचागत पैमानों पर शहर ने वह छलांग लगाई है, जिसकी कल्पना दो दशक पहले अकल्पनीय थी। शहर के चारों तरफ बिछा रिंग रोड का जाल, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, और फुलवरिया फोरलेन जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं ने बनारस को जाम के पुराने अभिशाप से काफी हद तक मुक्ति दिलाई है। कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा देश का पहला अर्बन रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की अत्याधुनिक परिवहन तकनीक से जोड़ता है। इस बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण से पर्यटन उद्योग में अप्रत्याशित उछाल आया है। बनारस के होटलों, होम-स्टे, नौका-व्यवसाय और हस्तशिल्प उद्योग में पूंजी का प्रवाह बढ़ा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नई संजीवनी मिली है।शहर के चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का आधुनिक नेटवर्क, फुलवरिया फोरलेन जैसी परियोजनाएं—इन सबने शहर की रीढ़ माने जाने वाले यातायात को एक नई सुगमता दी है। कैंट से गोदौलिया के बीच आकार ले रहा रोपवे प्रोजेक्ट इस प्राचीन शहर को सीधे इक्कीसवीं सदी की आधुनिक तकनीक से जोड़ता है।
काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप ने पूरी दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर खींचा है।भौतिक और आर्थिक पैमानों पर यह एक अत्यंत सफल और विकसित शहर की तस्वीर है। लेकिन, आज हमें इस चमक के पीछे छिपे उस अंधेरे और सन्नाटे पर भी बात करनी होगी, जो इस विकास की कीमत के रूप में हमारा यह शहर चुका रहा है।
इस भौतिक बदलाव का सबसे प्रखर और प्रतीकात्मक केंद्र काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लिये सदियों पुरानी, संकरी और घुमावदार, लेकिन इतिहास और आत्मीयता से जीवंत रहने वाली 'विश्वनाथ गली' को जब उजाड़ा गया, तो केवल कंक्रीट की इमारतें औरवईंट पत्थरों के मकान नही ढहाये गये, बल्कि उसके साथ काशी का वह पारंपरिक समाजशास्त्र भी जमींदोज़ हो गया जो पीढ़ियों से अक्षुण्ण था। उस गली की दुकानों का केवल व्यावसायिक महत्व नहीं था, वे दुकानदार और वहाँ से गुजरने वाले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख के गवाह थे।पहले इस गली का एक अपना चरित्र था। यहाँ की दुकानों पर पीढ़ियों का परिचय था। संकरी गलियों से गुजरते हुए महादेव के भक्त जिस आत्मीयता का अनुभव करते थे, वह इस नए, विशाल और पत्थरों से बने भव्य प्रांगण में कहीं खो गई है। बनारस के भोले बाबा महादेव का नही बल्कि श्री काशी विश्वनाथ धाम का भव्य कॉरिडोर तो बन गया, लेकिन इसके साथ ही वह पारम्परिक ताना-बाना भी बिखर गया जो काशी की असल धड़कन था। अब भोर की पहली किरण के साथ गंगा स्नान कर, लोटे में जल लिए"हर हरमादेव शंभो, काशी विश्वनाथ गंगे " की टेर लगाते हुये बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ने वाले वे पारम्परिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले) ढूंढने से भी नहीं मिलते। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और वीआईपी संस्कृति के बीच काशी के स्थानीय भक्तों का सहज जुड़ाव कहीं पीछे छूट गया है।
इसमें दो राय नहीं कि इस परियोजना ने बाबा के दरबार को एक वैश्विक भव्यता, स्वच्छता और विशालता प्रदान की है। लेकिन इस भव्यता को हासिल करने के लिए जो कीमत चुकाई गई, वह बनारस की आत्मा का एक हिस्सा थी। यह काशीवासी के लिये सबसे बड़ी और कचोटने वाली तब्दीली काशी के परंपरा के विस्थापन के रूप में दिखती है। बनारस की सुबह का एक स्थापित नियम था—भोर की पहली किरण के साथ गंगा में स्नान करना, तांबे के लोटे में गंगाजल, फूल और बेलपत्र लेकर नंगे पैर बाबा विश्वनाथ के दरबार की ओर बढ़ जाना। यह दर्शन किसी वीआईपी पास या कतार प्रबंधन का मोहताज नहीं था, यह भक्त और भगवान के बीच का एक सहज, अनौपचारिक और दैनिक पारिवारिक संवाद था।बाबा के दरबार के ये पारंपरिक 'नेमी' (नियम से दर्शन करने वाले स्थानीय लोग) इस शहर की आत्मा थे। आज वे नेमी इस वीआईपी संस्कृति, सुरक्षा के कड़े घेरों और पर्यटकों की असीम और अभूतपूर्व भीड़, सुरक्षा के कड़े चक्रव्यूहों और कॉर्पोरेट कतारों के बीच खुद को शापित और उपेक्षित महसूस करते हैं।
       भव्यता का मलबे और आत्मीयता का विस्थापन के नींव पर दर्शन और आस्था के भौतिक और दृश्यमान बदलाव का यह जो नया 'इवेंट मैनेजमेंट' स्वरूप उभरा है, उसने बनारस के मूल आध्यात्मिक एकांत को एक कोलाहलपूर्ण पर्यटन केंद्र में बदल दिया है। आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ की लहरों पर संगीत गूंज रहा है, और रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच 'सुबह-ए-बनारस' का वह पारंपरिक, आध्यात्मिक सन्नाटा कहीं खो गया है, जहाँ बैठकर कभी कबीर ने रूढ़ियों पर प्रहार किया था, तुलसीदास ने रामचरितमानस की चौपाइयाँ रची थीं और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने गंगा की लहरों को अपने शहनाई के सुर सौंपे थे , रत्नाकर ने अपनी लाविनी के साथ गंगालहरी गाते हुये गंगा मे स्वयं को तिरोहित कर दिया था। शंकराचार्य ने डोम के रूप मे शिव का साक्षात कर शिवोहम् शिवोहम का अस्तित्व स्वीकार किया। आज का बनारस 'हेरिटेज टूरिज्म' के शोरूम में सजे किसी महंगे शो-पीस जैसा होने लगा है, जिसे पर्यटक दूर से देख तो सकते हैं, पर उसके भीतर की तरलता को महसूस नहीं कर पाते। बाज़ारीकरण के दबाव के चलते जो दर्शन कभी एक सहज, आत्मीय और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था, वह अब एक 'इवेंट' (आयोजन) बन चुका है। आस्था का यह बाज़ारीकरण बनारस के मूल धार्मिक चरित्र पर एक गहरी चोट है।आजकल यह नया शब्द बहुत चलन में है—'हेरिटेज टूरिज्म' या 'सांस्कृतिक पर्यटन'। बनारस इसका सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि संस्कृति को 'बेचना' और संस्कृति को 'जीना'—दो अलग-अलग बातें हैं।
आज घाटों पर लेजर शो हो रहे हैं, क्रूज़ चल रहे हैं, रोशनी की चकाचौंध है। लेकिन इस तमाशे के बीच घाटों की वह पारंपरिक शांति, सुबह-ए-बनारस का वह आध्यात्मिक एकांत, जहाँ बैठकर कभी कबीर, तुलसी और बिस्मिल्लाह खान ने अपनी साधना की थी, वह शोरूम की खिड़की में सजे किसी शो-पीस जैसा हो गया है। पर्यटक यहाँ 'बनारसियत' को देखने आ रहे हैं, लेकिन उन्हें जो परोसा जा रहा है, वह असली बनारस नहीं बल्कि उसका एक चमक-दमक वाला 'वर्शन' (संस्करण) है।
मूल बनारसी जो घाट पर घंटों बैठकर गंगा की लहरों को निहारते हुए जीवन के परम सत्य को पा लेता था, वह अब इस भीड़ और कमर्शियलाइजेशन (व्यावसायिकता) के कारण घाटों से दूर होता जा रहा है।
             बनारस सिर्फ आलीशान इमारतों और चौड़ी सड़कों का नाम नहीं है; यह एक मिजाज है, एक जीने का सलीका है।बनारस की असली पहचान उसकी वास्तुकला से ज्यादा उसकी सामाजिक जीवनशैली में निहित थी। यहाँ की 'अल्मस्ती', 'फक्कड़पन' और 'मौज' दुनिया के किसी भी आधुनिक शहर के लिए एक पहेली जैसी थी।  आज, शहर के बाहरी इलाकों से लेकर मुख्य भूभाग तक खड़ी हो रही बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली ऊंची इमारतें इस पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को निगल रही हैं। बनारस के पुराने मोहल्लों मे मंदिर, घर के बाहर का चौतरा केवल बैठने की जगह नहीं था, वह एक खुली संसद था।  चबूतरा' केवल एक स्थापत्य (Architecture) नहीं था, वह एक खुली लोकतांत्रिक संसद था। वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर वर्ग—चाहे वह प्रोफेसर हो, सरकारी कर्मचारी हो, बुनकर हो या कोई आम रिक्शा चालक—बिना किसी औपचारिक झिझक के एक साथ बैठता था।वह एक ऐसा मंच था जहाँ समाज का हर तबका बिना किसी भेदभाव ऊंचनीच के बैठता था।मोहल्ले के शास्त्री जी सुबह सुबह गंगा स्नान कर बाबा का दर्शन कर वहीं बैठते थे तो मुन्सीपाल्टी (म्यूनिसिपल बोर्ड) से मोहल्ले मे रोजाना झाड़ू मारने वाला स्वीपर भी। कंधे पर गमछा लपेटे, हाथ में सुरती (खैनी) मलते, बतकही करते हुये उंगली से सुंघनी मलते 'गप्पाजी' की मुद्रा में बैठे मोहल्ले से लेकर ब्रह्मांड का चिंतन करने वाले बनारसी वहाँ देश-दुनिया, राजनीति, धर्म और दर्शन समसामयिक राजनीति, धर्म, साहित्य और दर्शन पर ऐसी बेबाक और अचूक टिप्पणियाँ करते थे, जो बड़े-बड़े विचारकों और  थिंक-टैंकों को हैरान कर दें। वह संवाद निश्छल था, उसमें कोई व्यावसायिक स्वार्थ नहीं था।यह 'गप्पाजी' और बतकही अपने आप मे एक मजबूत सूचना नेटवर्क था जो हर घर परिवार के सुख दुख हालचाल स्वास्थ्य समृद्धि लेन देन का प्लेटफार्म था। यह चबूतरा व्यवस्था पूरे मोहल्ले का संवाद तंत्र था। वहां अल्हड़पन, अकारण मुस्कुराहट और घाटों-गलियों में 'सुख' की तलाश होती थी।आज इन चबूतरों की जगह बहुमंजिला इमारतों की ऊंची, बंद दीवारों और लिफ्ट संस्कृति और बंद दरवाजों वाले एकांतवास ने ले ली है। आधुनिक अपार्टमेंटों ने लोगों को भौतिक रूप से पास पास तो ला दिया है, लेकिन उनके बीच की मानसिक और सामाजिक दूरियों को अनंत काल तक बढ़ा दिया है। अब मोहल्लों में वह सामूहिक ठहाका और अकारण मुस्कुराने की प्रवृत्ति गायब हो रही है। आज अपार्टमेंट की  लिफ्ट संस्कृति ने उस जीवंत संवाद को समाप्त कर दिया है। अब चबूतरों पर वह सामूहिक ठहाका नहीं सुनाई देता। आधुनिक जीवन की आपाधापी, कॉरपोरेट नौकरियों के दबाव और ईएमआई (EMI) के तनाव ने बनारसी मिजाज की उस बेफिक्री को सोख लिया है, जो कभी इस शहर का ट्रेडमार्क हुआ करती थी।
बीते बारह वर्षों में काशी ने अभूतपूर्व आर्थिक और भौतिक विकास देखा है। चारों तरफ फैला रिंग रोड, सिक्स लेन और फोर लेन सड़कों का जाल, फुलवरिया फोरलेन, और आसमान को छूने को बेताब रोपवे जैसी आधुनिक यातायात सुविधाओं ने शहर की रफ्तार बढ़ा दी है। ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट वाली इमारतों ने बनारस के क्षितिज (स्काईलाइन) को बदल दिया है। लेकिन, इस कंक्रीट के चमकते जंगल के पीछे बनारस की वह सदियों पुरानी पहचान कहीं खो गई है, जिसे हम गर्व से 'बनारसियत' कहते थे।
लेकिन, अर्थशास्त्र के स्थापित नियम जहाँ तरक्की का जश्न मना रहे हैं, वहीं समाजशास्त्र और संस्कृति के मोर्चे पर एक बड़ा शून्य उभर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि भूगोल के इस तीव्र विस्तार में क्या हमारा इतिहास संकुचित नहीं हो रहा है? चौड़ी होती सड़कों के समानांतर क्या हमारे दिलों और सामाजिक संवाद की संकरी गलियां और संकुचित नहीं होती जा रही हैं? विकास का यह पहला कॉलम जितना चमकदार है, इसकी कीमत उतनी ही गंभीर है। यह सच है कि बुनियादी ढांचे के विकास से रोजगार बढ़ा है, पर्यटन को पंख लगे हैं और यातायात सुगम हुआ है। लेकिन क्या भौतिक समृद्धि के बदले अपनी सांस्कृतिक विरासत और आत्मीयता को खो देना सही है? आज का बनारस पर्यटकों के लिए तो आकर्षक हो गया है, पर मूल बनारसियों के लिए थोड़ा अजनबी सा होने लगा है।
हमारा उद्देश्य विकास का विरोध करना कतई नहीं है। सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, यातायात सुगम होना चाहिए, स्वास्थ्य और शिक्षा की आधुनिक सुविधाएं हर नागरिक को मिलनी चाहिए। यह समय की मांग है और इस प्रगति का स्वागत होना ही चाहिए।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी पहचान की कीमत पर ही होना चाहिए? क्या हम ऐसा आधुनिक शहर नहीं बना सकते जो अपनी जड़ों से भी जुड़ा रहे?
यूरोपीय देशों ने अपने प्राचीन शहरों (जैसे रोम, वेनिस या क्योटो) के ऐतिहासिक और पारंपरिक स्वरूप से बिना कोई छेड़छाड़ किए, उन्हें आधुनिक सुविधाओं से लैस किया है। उन्होंने अपनी पुरानी बसावट, गलियों और सामाजिक चरित्र को संरक्षित रखते हुए शहर के बाहर नया विकास किया।बनारस के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन' की आवश्यकता थी और आज भी है।यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, शानदार गाड़ियाँ होंगी, आलीशान अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी मिजाज, वह 'साझा संस्कृति', वह 'अल्हड़पन' और 'अपसंस्कृति से दूर रहने की फक्कड़ता' नहीं होगी, तो यकीन मानिए, वे एक बहुत अमीर शहर में तो रहेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे।
इस शहर को आधुनिक विकास की गति  देने वाले नीति-नियंताओं तक यह आवाज पहुंचनी जरूरी है कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' जरूर बनाइये, लेकिन इसकी 'बनारसियत' की बलि चढ़ाकर नहीं। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के अनुभव और साधना से उपजी संस्कृतियां अगर एक बार मर गईं, तो उन्हें दोबारा जीवित करना असंभव होगा।बनारस की आत्मा को बचाना ही इस शहर के अस्तित्व को बचाना है।विकास जरूरी है, समय के साथ चलना भी अनिवार्य है। परंतु, यदि विकास की इस आंधी में काशी की अल्मस्ती, बनारसी पान की मिठास, घाटों की शांति और अपनों के बीच की वह 'गपशप' ही गायब हो जाएगी, तो यह शहर सिर्फ एक ढांचा बनकर रह जाएगा। हमें यह समझना होगा कि बनारस की ताकत इसके कंक्रीट में नहीं, इसकी 'बनारसियत' में है। यदि हम इसे नहीं बचा पाए, तो आने वाली पीढ़ियां एक समृद्ध शहर तो पाएंगी, लेकिन वह 'जीती-जागती काशी' खो चुकी होंगी।
यह सही है कि आज की आधुनिक जरूरत के लिहाज से सड़कें चौड़ी होनी चाहिए, सीवेज सिस्टम आधुनिक होना चाहिए, रोपवे और हवाईअड्डे बनने चाहिए, क्योंकि यह समय की मांग है और नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के लिए आवश्यक है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या विकास हमेशा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान की बलि देकर ही संभव है? दुनिया के कई प्राचीन देशों (जैसे इटली का रोम, वेनिस या जापान का क्योटो) ने अपनी प्राचीन बसावट, संकरी गलियों और सामाजिक चरित्र को बिना छुए, शहर के बाहर नए उपनगरों का विकास किया और अपनी प्राचीन कोर-सिटी को एक जीवित संग्रहालय के रूप में संरक्षित रखा। काशी के संदर्भ में भी हमें इसी 'संतुलन और सतत विकास' (Sustainable Development) की आवश्यकता थी।
यदि हमारी आने वाली पीढ़ी के पास चौड़ी सड़कें होंगी, आलीशान गाड़ियाँ और अपार्टमेंट होंगे, लेकिन उनके भीतर वह बनारसी आत्मीयता, वह साझा संस्कृति और बेफिक्री का अल्हड़पन नहीं होगा, तो वे एक समृद्ध शहर में तो सांस लेंगे, लेकिन वे 'काशी' को खो चुके होंगे। नीति-नियंताओं और प्रबुद्ध समाज को यह सोचना होगा कि बनारस को 'स्मार्ट सिटी' बनाते-बनाते हम इसके 'बनारसियत' के प्राण न हर लें। क्योंकि कंक्रीट के ढांचे और सड़कें कुछ महीनों में दोबारा बन सकते हैं, लेकिन सदियों के साझा सांस्कृतिक अनुभवों से उपजी जीवनशैलियां अगर एक बार विलुप्त हो गईं, तो उन्हें किसी भी तकनीक से दोबारा जीवित करना असंभव होगा।
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काशी,कृष्ण पक्ष द्वितीया, भाद्र, संवत2083वि0
रविवार, 30 अगस्त 2026

रविवार, 23 अगस्त 2026

आधुनिक व्यवसायिक बयार मे बदलता बनारस.......

आधुनिक व्यवसायिक  व्यवसायिक बयार मे बदलता बनारस......

             हमारा शहर बनारस. युगों-युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को शहर बनारस ऐसा भाया कि उन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों, मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या? तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता? बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री. मकान बनवाओ चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
दिक्कत शुरू हुई सन 2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो अनियोजित विकास के महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक, ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के होड़ देने पर विराम लगा," न तो मै यहां लाया गया हूं, न ही मुझे किसी ने भेजा है। मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है."
बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने अपने क्षेत्र का दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा. कभी उपेक्षित सा पड़ा बनारस बदलाव के राह पर चल पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने अपने संसदीय क्षेत्र के लिये बजट के नाम पर अवरोध बने आर्थिक और वित्तीय संसाधनों का पिटारा खोल दिया तो आज वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा होने लगी है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। इक्कीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में वाराणसी स्टेशन से काशी विद्यापीठ और सिगरा होते हुए रथयात्रा -महमूरगंज चौराहे तक पहुंचने में कम से कम 25-30 मिनट लगते थे. दूरी सिर्फ 4 किलोमीटर के आसपास ही थी, लेकिन जाम ऐसा कि पसीना छूट जाता. आप पोंछते रहिए. अगर बीएचयू जाना हो तो 45 मिनट का समय लगना आम बात थी. लेकिन पिछले कुछ साल में गंगा में बहुत पानी बह चुका है. बनारस के बाहर ही नही भीतरी सड़कों पर भी काफी परिवर्तन हुये है। अतिक्रमण से लगातार दुबली होती गई सड़के अब चौड़ी हो गई हैं। शहर के बाहर तेज रफ्तार से भागते ट्रकों के लिये रिंगरोड के अलावा शहर के अंदर फुलवरिया फोरलेन, बीएलडब्लू रविन्द्रपुरी भेलूपुर फोरलेन, मोहनसराय कैण्ट राजघाट फोरलेन ने  पहले की स्थितियों को बदल दिया है।जिसने काशी को उन दिनों देखा था वे आज की काशी को देखकर स्वाभाविक रूप से अचंभित हो सकते हैं। उबड़-खाबड़ सड़कें. सड़कों के किनारे जगह-जगह बिजली के पोल और पोल पर लटके बेतरतीब तार. बिजली से लेकर टेलीफोन और केबल नेटवर्क के तार. तार नहीं जंजाल हो जैसे. यूपी में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, किसी ने बाबा विश्वनाथ की नगरी को संवारने के बारे में नहीं सोचा. किसी की सोच वोट बैंक से ऊपर उठ ही नहीं सकी.एक बार जब मोदीजी वाराणसी दौरे पर थे. तब उन्होंने भी इस ओर इशारा किया था- “जब काशी के लोगों ने 2014में  विकास का संकल्प लिया था. कई लोगों को लगता था कि बनारस में कोई बदलाव नहीं हो पाएगा. लेकिन काशी के लोगों ने करके दिखा दिया. देश के लोग काशी के विकास से मंत्रमुग्ध हैं.”
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 14 में से 8 प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही रहे, लेकिन बाहर से यूपी आकर, वाराणसी से चुनकर लड़कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले नरेंद्र मोदी पहले ही हैं. जब नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में नामांकन के लिए वाराणसी पहुंचे थे, तब जो उन्होंने कहा था, वो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया था- “ना किसी ने मुझे यहां भेजा है, ना मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है.”
तब नरेंद्र मोदी ने काशी को क्योटो बनाने की बात कही थी. पता नहीं तब काशीवासियों को कितना यकीन या भरोसा हुआ होगा, कितने लोगों ने बातें बनाई होंगी, लेकिन पिछले वर्षों में काशी में जो काम हुए हैं, उनसे ये भरोसा अब यकीन में बदलने लगा है कि काशी का कायाकल्प हो सकता है और काफी हद तक पीएम मोदी ने करके दिखाया है. शुरूआत काशी विश्वनाथ धाम कारीडोर से करें तो नगर के ही नही नगर से लगे मंदिरों को भी पर्यटक स्थल के रूप मे सरकार ने विकसित किया है। सारनाथ शूल टंकेश्वर मार्कण्डेय महादेव कालभैरव पंचकोसी सहित बहुतेरे धार्मिक स्थलों पर कार्य प्रगति पर है। चूंकि संसदीय सीट देश के प्रधानमंत्री की है तो प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद दिलचस्पी दिखाते हैं. औसतन 21 दिनों में एक दौरा वाराणसी का करते हैं और लगातार विकास कार्यों की समीक्षा करते रहते हैं. वाराणसी के विकास के लिए अब तक हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं दी गई हैं. कुछ पर काम पूरा हो चुका है. कुछ पर काम जारी है और कुछ काम अभी पाइपालाइन में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं “पीएम जब भी काशी आते हैं, हमेशा सौगात लेकर आते हैं.” हम सभी जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने  यूपी के राजनीतिक इतिहास मे पहली बार दो निरंतर पारी पूरा किया है. इन सालों में ही योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी के विकास उन्मुख परियोजनायों को लगातार हरी झण्डी देने के साथ प्रदेश सरकार से भी अनेकों  सौगातें दी है. जो मूलभूत संरचनाओं के साथ शिक्षा चिकित्सा पर्यटन यातायात विकास से जुड़ी हुई हैं। राजातालाब मे वेयर हाऊस, गोदौलिया बेनियाबाग टाऊनहाल कचहरी मे मल्टीलेवल पार्किंग, ईबसों का पूरा जखीरा, मिर्जामुराद मे ई चार्जिं स्टेशन और ईबस टर्मिनल, बनारस लखनऊ, बनारस आजमगढ़, बनारस गाजीपुर मार्ग का फोरलेन सिक्सलेन चौड़ीकरण, रामनगर पड़ाव मार्ग का चौड़ीकरण, कचहरी सारनाथ संदहा मार्ग का चौड़ीकरण, आशापुर फ्लाईओवर, सारनाथ का सौन्दर्यीकरण व विकास,
लालबहादुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का विस्तारीकरण, काशी रेलवे स्टेशन पर जल वायु सड़क मार्ग का समन्वित टर्मिनल, अंतर्राज्यीय नौपरिवहन, शहर के अंदर आने वाली सभी सड़कों का फोरलेन मे चौड़ीकरण, बनारस, वाराणसी और काशी रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण, देश के पहले शहरी रोप-वे के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी इसमें शामिल है. वर्तमान समय मे बनारस से कई अंतरराष्ट्रीय उड़ान के साथ साथ देश के लगभग सभी बड़े शहरों और राजधानियों के लिये वायु सेवा उपलब्ध है। वहीं  बनारस से रेलवे की अत्याधुनिक प्रीमियम रेल सेवा वंदे भारत सहित देश के हर कोने तक रेल कनेक्सन बन चुका है। चिकित्सा में बनारस का एम्स भले नही मिला पर बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान को लाइक एम्स इंस्टिट्यूट बनाये जाने के साथ ही नेशनल एजिंग जिरियाट्रिक सेन्टर, सुपर स्पेशियलिटी सेन्टर, रीजनल आई स्पेशियलिटी सेन्टर, देश के सबसे बड़े आपातकालीन केन्द्रों मे शामिल ट्रौमा सेन्टर लेवल 1, इंस्टिट्यूट आफ बोन मैरो ट्रांस्प्लांटेशन, 150 बेड की क्रिटिकल केयर यूनिट के साथ पावर ग्रिड आफ इंडिया के सीएसआर फण्ड से मरीजों के परिजनों के ठहरने के लिये 200 बेड का विश्राम सदन बना कर एम्स की भरपाई की कोशिश की गई है। इसके अतिरिक्त महामना कैंसर इंस्टिट्यूट, आरजे शंकर नेत्रालय, सद्गुरू नेत्र चिकित्सालय के अतिरिक्त सोवा रिग्पा मेडिकल कालेज, ईएसआईसी मेडिकल कालेज, सरस्वती शिवकिशन दमानी मेडिकल कालेज, होम्योपैथिक मेडिकल कालेज जैसे सरकारी और कुछ प्राईवेट मेडिकल कालेजों की स्थापना के साथ कबीरचौरा अस्पताल का आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण, राजकीय आयुर्वेदिक कालेज का उन्नयन होने  से आने वाले दिनों मे बनारस मेडिकल हब बनने की दिशा मे अग्रसर है। शिक्षा के क्षेत्र मे किये जाने वाले कार्य अपने प्रचार प्रसार से दूर अपने उद्देश्यपूर्ति मे लगे हुये हैं। सेन्ट्रल इंस्टिट्यूट आफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नॉलाजी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नेशनल इंस्टिट्यूट आफ फैशन टेक्नालॉजी, इंडियन इंस्टिट्यूट आफ जेम्स एण्ड ज्वेलरीज जैसे अत्याधुनिक  संस्थान जो केन्द्र सरकार ने स्थापित किया है उनकी तो चर्चा ही नही होती। रोप वे, रूद्राक्ष, दीनदयाल हस्तकला संकुल, संपूर्णानंद स्टेडियम, नमोघाट, निर्माणाधीन मण्डलीय कार्यालय भवन डमरू, निर्माणाधीन नगर निगम मुख्यालय त्रिशूल, काशी रेलवे स्टेशन पर जल भूतल और वायु परिवहन का समन्वित टर्मिनल , दालमण्डी सड़क चौड़ीकरण परियोजना बनारस के विकास की नई इबारत लिखने को तैयार हैं।
पीएम मोदी ने काशीवासियों को संबोधित करते हुए रोप-वे के बारे में कहा, “बनारस के जाम से डरने वालों के लिए रोप-वे अच्छी चीज है. इसके बनने पर कैंट रेलवे स्टेशन और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बीच की दूरी कुछ मिनटों की ही रह जाएगी. गोदौलिया के जाम की दिक्कत भी बहुत हद तक घट जाएगी. जाम की वजह से बनारस घूमने से बचने वाले लोगों के लिए रोप-वे बनने के बाद घूमना आसान हो जाएगा.” आने वाले नवरात्रि से संचालित होने वाले ये रोपवे सड़क से 50 मीटर की ऊंचाई पर वाराणसी स्टेशन से गोदौलिया तक 3.8 किलोमीटर की यात्रा कराएगा. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कांप्लेक्स सिगरा में निर्मित वर्ल्ड क्लास इनडोर स्टेडियम में क्रिकेट, फुटबाल, एथलेटिक्स ट्रैक, चार लॉन टेनिस कोर्ट, बास्केटबाल कोर्ट, वॉलीबाल कोर्ट, दो कबड्डी कोर्ट ड्रेसिंग और कैफेटेरिया भी है. अनुमान है कि ओलंपिक में खेले जाने वाले 28 में से 24 खेल इस स्टेडियम में खेले जा सकेंगे.
शहर के सीवेज का गंदा पानी सीधे गंगा में मिलने से रोकने के लिए नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत बीएचयू के पास भगवानपुर में 55 एमएलडी शोधन क्षमता वाला ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है. शहर मे सीएनजी पंपों सहित घरों मे गैसपाईपलाईन लगावकरवपीएनजी आपूर्ति , मियावाकी वन, सीएनजी गाड़ीयों, ई वाहनों, घरेलू सोलर सिस्टम जैसी सुविधाओं के माध्यम से 
नगर के पर्यावरण प्रबंधन  व उर्जा जरूरतों को पूरी करने  के प्रयास निरंतर जारी है। शहर के चारो दिशाओं मे रोडवेज स्टेशन, मोहनसराय मे ट्रांसपोर्ट नगर, शहर से लगे हुये रिंगरोड क्षेत्र मे टाउनशिप, राजघाट मे सिगनेचर ब्रिज और नया रेल कारीडोर, गंगा व वरूणा एलिवेटेड रोड  जैसी परियोजनायें आने वाले दिनों मे मूर्त रूप ले लेगी। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण परियोजना पर काम हो रहा है. वाराणसी के इसरवार गांव में एचपी के बॉटलिंग प्लांट को सीधे एलपीजी मिलेगी. गुजरात के कांडला बंदरगाह से मध्य प्रदेश होते हुए गोरखपुर तक पाइप लाइन केजीपीएल से एलपीजी की आपूर्ति परियोजना पर काम चल रहा है. बताते हैं कि यहां से वाराणसी समेत यूपी के 20 जिलों को LPG सिलेंडर की नॉन स्टॉप आपूर्ति होगी. इस बॉटलिंग प्लांट परियोजना का सीधा लाभ चंदौली, जौनपुर, गाजीपुर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र, आजमगढ़, बलिया, मऊ, अंबेडकर नगर, बांदा, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, रायबरेली, प्रयागराज, फतेहपुर, कौशांबी और चित्रकूट जिलों को मिलेगा.
स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोज़गार, पर्यटन और यातायात जैसे कई क्षेत्रों में काम जारी है. आरामदायक सफर के लिए कई योजनाओं पर काम चल रहा है. फ्लाईओवर, रिंग रोड, सड़कों का चौड़ीकरण देखने को मिल रहा है. प्रमुख संजीवनी के रूप में 325.59 करोड़ की शिवपुर फुलवरिया लहरतारा 4 लेन सड़क है. पर्यटन, रोजगार एवं सौंदर्यीकरण के अंतर्गत 72.63 करोड़ की लागत से सारनाथ बौद्ध सर्किट है, इसके साथ-साथ 39.20 करोड़ की लागत से पंचक्रोशी परिक्रमा यात्रा मार्ग भी है.
वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा हो रही है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. पर्यटक बढ़ने से काशी में रोज़गार के अवसर भी बढ़े और बढ़ रहे हैं. विकास बनारस का हो तो फायदा आसपास के इलाकों को भी मिलता ही है. पूर्वांचल और बिहार के लोग भी लाभ पा रहे हैं. इन सबसे बनारस की व्यवसायिक गतिविधियां तो बढ़ी है । रोजगार का भी सृजन हुआ है पर वह अल्पकालिक और अस्थाई और अवसरकालिक है। पर्यटन के क्षेत्र मे देशी पर्यटकों की संख्या मे कई गुना बढ़ोत्तरी से होटल, लान, स्टेहोम, और पर्यटन सेवा संबंधी सेवियों बढ़ने से रोजगार बढ़ा है। पर यह दीर्घकालिक नही है। बनारस को जरूरत है बंगलोर हैदराबाद पुणे जैसे आधुनिक साईबर सेवा उद्योग केन्द्र के रूप मे विकसित करने की। आज बनारस यातायात बिजली सेवा परिवहन और आधुनिक संसाधनों से लैश वह मुकाम प्राप्त कर चुका है जिसे साइबरसिटी के रूप मे विकसित किया जा सके। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि बनारस मे विकास की एक मजबूत नींव तैयार हो चुकी है अब जरूरत है उसे पुख्ता करने की। पर बनारस के विकास के साथ शहर की भीड़ बढ़ती जा रही है। अगल बगल के ही नही बिहार झारखण्ड और मध्यप्रदेश से भी लोगों का माइग्रेशन बनारस मे तेजी से हो रहा है। नजीजा शहर मे बढ़ती सुविधायें भी भीड़ की जरूरत के हिसाब से कम दिख रही है। जगजीत सिंह की एक गजल है " हर तरफ हर कहीं बेशुमार आदमी, हर नये दिन नया इंतजार आदमी". आज बनारस की हालत वैसी होती जा रही है.
साथ ही साथ यह भी शोचनीय है कि बनारस ने अपने इस विकास की क्या कीमत चुकाई है। बहुतेरे बनारसी यह मानते है कि बनारस के व्यवसायिकआधुनिकीकरण से बनारसियत मर रही है। बनारसियत को क्या नुकसान हुआ है? शहर ने अपने मूल स्वरूप और स्वभाव मे क्या बिखराव पाया है ? यह एक अलग सवाल है ,जिस पर हम आगे चर्चा करेगें।

काशी, श्रावण शुक्ला एकादशी संवत 2087 वि0,
रविवार, 23 अगस्त,2026
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