हमारा शहर बनारस. युगों-युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को शहर बनारस ऐसा भाया कि उन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों, मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या? तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता? बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री. मकान बनवाओ चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
दिक्कत शुरू हुई सन 2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो अनियोजित विकास के महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक, ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के होड़ देने पर विराम लगा," न तो मै यहां लाया गया हूं, न ही मुझे किसी ने भेजा है। मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है."
बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने अपने क्षेत्र का दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा. कभी उपेक्षित सा पड़ा बनारस बदलाव के राह पर चल पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने अपने संसदीय क्षेत्र के लिये बजट के नाम पर अवरोध बने आर्थिक और वित्तीय संसाधनों का पिटारा खोल दिया तो आज वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा होने लगी है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। इक्कीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में वाराणसी स्टेशन से काशी विद्यापीठ और सिगरा होते हुए रथयात्रा -महमूरगंज चौराहे तक पहुंचने में कम से कम 25-30 मिनट लगते थे. दूरी सिर्फ 4 किलोमीटर के आसपास ही थी, लेकिन जाम ऐसा कि पसीना छूट जाता. आप पोंछते रहिए. अगर बीएचयू जाना हो तो 45 मिनट का समय लगना आम बात थी. लेकिन पिछले कुछ साल में गंगा में बहुत पानी बह चुका है. बनारस के बाहर ही नही भीतरी सड़कों पर भी काफी परिवर्तन हुये है। अतिक्रमण से लगातार दुबली होती गई सड़के अब चौड़ी हो गई हैं। शहर के बाहर तेज रफ्तार से भागते ट्रकों के लिये रिंगरोड के अलावा शहर के अंदर फुलवरिया फोरलेन, बीएलडब्लू रविन्द्रपुरी भेलूपुर फोरलेन, मोहनसराय कैण्ट राजघाट फोरलेन ने पहले की स्थितियों को बदल दिया है।जिसने काशी को उन दिनों देखा था वे आज की काशी को देखकर स्वाभाविक रूप से अचंभित हो सकते हैं। उबड़-खाबड़ सड़कें. सड़कों के किनारे जगह-जगह बिजली के पोल और पोल पर लटके बेतरतीब तार. बिजली से लेकर टेलीफोन और केबल नेटवर्क के तार. तार नहीं जंजाल हो जैसे. यूपी में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, किसी ने बाबा विश्वनाथ की नगरी को संवारने के बारे में नहीं सोचा. किसी की सोच वोट बैंक से ऊपर उठ ही नहीं सकी.एक बार जब मोदीजी वाराणसी दौरे पर थे. तब उन्होंने भी इस ओर इशारा किया था- “जब काशी के लोगों ने 2014में विकास का संकल्प लिया था. कई लोगों को लगता था कि बनारस में कोई बदलाव नहीं हो पाएगा. लेकिन काशी के लोगों ने करके दिखा दिया. देश के लोग काशी के विकास से मंत्रमुग्ध हैं.”
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 14 में से 8 प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही रहे, लेकिन बाहर से यूपी आकर, वाराणसी से चुनकर लड़कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले नरेंद्र मोदी पहले ही हैं. जब नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव में नामांकन के लिए वाराणसी पहुंचे थे, तब जो उन्होंने कहा था, वो बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया था- “ना किसी ने मुझे यहां भेजा है, ना मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है.”
तब नरेंद्र मोदी ने काशी को क्योटो बनाने की बात कही थी. पता नहीं तब काशीवासियों को कितना यकीन या भरोसा हुआ होगा, कितने लोगों ने बातें बनाई होंगी, लेकिन पिछले वर्षों में काशी में जो काम हुए हैं, उनसे ये भरोसा अब यकीन में बदलने लगा है कि काशी का कायाकल्प हो सकता है और काफी हद तक पीएम मोदी ने करके दिखाया है. शुरूआत काशी विश्वनाथ धाम कारीडोर से करें तो नगर के ही नही नगर से लगे मंदिरों को भी पर्यटक स्थल के रूप मे सरकार ने विकसित किया है। सारनाथ शूल टंकेश्वर मार्कण्डेय महादेव कालभैरव पंचकोसी सहित बहुतेरे धार्मिक स्थलों पर कार्य प्रगति पर है। चूंकि संसदीय सीट देश के प्रधानमंत्री की है तो प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद दिलचस्पी दिखाते हैं. औसतन 21 दिनों में एक दौरा वाराणसी का करते हैं और लगातार विकास कार्यों की समीक्षा करते रहते हैं. वाराणसी के विकास के लिए अब तक हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं दी गई हैं. कुछ पर काम पूरा हो चुका है. कुछ पर काम जारी है और कुछ काम अभी पाइपालाइन में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं “पीएम जब भी काशी आते हैं, हमेशा सौगात लेकर आते हैं.” हम सभी जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने यूपी के राजनीतिक इतिहास मे पहली बार दो निरंतर पारी पूरा किया है. इन सालों में ही योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी के विकास उन्मुख परियोजनायों को लगातार हरी झण्डी देने के साथ प्रदेश सरकार से भी अनेकों सौगातें दी है. जो मूलभूत संरचनाओं के साथ शिक्षा चिकित्सा पर्यटन यातायात विकास से जुड़ी हुई हैं। राजातालाब मे वेयर हाऊस, गोदौलिया बेनियाबाग टाऊनहाल कचहरी मे मल्टीलेवल पार्किंग, ईबसों का पूरा जखीरा, मिर्जामुराद मे ई चार्जिं स्टेशन और ईबस टर्मिनल, बनारस लखनऊ, बनारस आजमगढ़, बनारस गाजीपुर मार्ग का फोरलेन सिक्सलेन चौड़ीकरण, रामनगर पड़ाव मार्ग का चौड़ीकरण, कचहरी सारनाथ संदहा मार्ग का चौड़ीकरण, आशापुर फ्लाईओवर, सारनाथ का सौन्दर्यीकरण व विकास,
लालबहादुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का विस्तारीकरण, काशी रेलवे स्टेशन पर जल वायु सड़क मार्ग का समन्वित टर्मिनल, अंतर्राज्यीय नौपरिवहन, शहर के अंदर आने वाली सभी सड़कों का फोरलेन मे चौड़ीकरण, बनारस, वाराणसी और काशी रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण, देश के पहले शहरी रोप-वे के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी इसमें शामिल है. वर्तमान समय मे बनारस से कई अंतरराष्ट्रीय उड़ान के साथ साथ देश के लगभग सभी बड़े शहरों और राजधानियों के लिये वायु सेवा उपलब्ध है। वहीं बनारस से रेलवे की अत्याधुनिक प्रीमियम रेल सेवा वंदे भारत सहित देश के हर कोने तक रेल कनेक्सन बन चुका है। चिकित्सा में बनारस का एम्स भले नही मिला पर बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान को लाइक एम्स इंस्टिट्यूट बनाये जाने के साथ ही नेशनल एजिंग जिरियाट्रिक सेन्टर, सुपर स्पेशियलिटी सेन्टर, रीजनल आई स्पेशियलिटी सेन्टर, देश के सबसे बड़े आपातकालीन केन्द्रों मे शामिल ट्रौमा सेन्टर लेवल 1, इंस्टिट्यूट आफ बोन मैरो ट्रांस्प्लांटेशन, 150 बेड की क्रिटिकल केयर यूनिट के साथ पावर ग्रिड आफ इंडिया के सीएसआर फण्ड से मरीजों के परिजनों के ठहरने के लिये 200 बेड का विश्राम सदन बना कर एम्स की भरपाई की कोशिश की गई है। इसके अतिरिक्त महामना कैंसर इंस्टिट्यूट, आरजे शंकर नेत्रालय, सद्गुरू नेत्र चिकित्सालय के अतिरिक्त सोवा रिग्पा मेडिकल कालेज, ईएसआईसी मेडिकल कालेज, सरस्वती शिवकिशन दमानी मेडिकल कालेज, होम्योपैथिक मेडिकल कालेज जैसे सरकारी और कुछ प्राईवेट मेडिकल कालेजों की स्थापना के साथ कबीरचौरा अस्पताल का आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण, राजकीय आयुर्वेदिक कालेज का उन्नयन होने से आने वाले दिनों मे बनारस मेडिकल हब बनने की दिशा मे अग्रसर है। शिक्षा के क्षेत्र मे किये जाने वाले कार्य अपने प्रचार प्रसार से दूर अपने उद्देश्यपूर्ति मे लगे हुये हैं। सेन्ट्रल इंस्टिट्यूट आफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नॉलाजी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नेशनल इंस्टिट्यूट आफ फैशन टेक्नालॉजी, इंडियन इंस्टिट्यूट आफ जेम्स एण्ड ज्वेलरीज जैसे अत्याधुनिक संस्थान जो केन्द्र सरकार ने स्थापित किया है उनकी तो चर्चा ही नही होती। रोप वे, रूद्राक्ष, दीनदयाल हस्तकला संकुल, संपूर्णानंद स्टेडियम, नमोघाट, निर्माणाधीन मण्डलीय कार्यालय भवन डमरू, निर्माणाधीन नगर निगम मुख्यालय त्रिशूल, काशी रेलवे स्टेशन पर जल भूतल और वायु परिवहन का समन्वित टर्मिनल , दालमण्डी सड़क चौड़ीकरण परियोजना बनारस के विकास की नई इबारत लिखने को तैयार हैं।
पीएम मोदी ने काशीवासियों को संबोधित करते हुए रोप-वे के बारे में कहा, “बनारस के जाम से डरने वालों के लिए रोप-वे अच्छी चीज है. इसके बनने पर कैंट रेलवे स्टेशन और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बीच की दूरी कुछ मिनटों की ही रह जाएगी. गोदौलिया के जाम की दिक्कत भी बहुत हद तक घट जाएगी. जाम की वजह से बनारस घूमने से बचने वाले लोगों के लिए रोप-वे बनने के बाद घूमना आसान हो जाएगा.” आने वाले नवरात्रि से संचालित होने वाले ये रोपवे सड़क से 50 मीटर की ऊंचाई पर वाराणसी स्टेशन से गोदौलिया तक 3.8 किलोमीटर की यात्रा कराएगा. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कांप्लेक्स सिगरा में निर्मित वर्ल्ड क्लास इनडोर स्टेडियम में क्रिकेट, फुटबाल, एथलेटिक्स ट्रैक, चार लॉन टेनिस कोर्ट, बास्केटबाल कोर्ट, वॉलीबाल कोर्ट, दो कबड्डी कोर्ट ड्रेसिंग और कैफेटेरिया भी है. अनुमान है कि ओलंपिक में खेले जाने वाले 28 में से 24 खेल इस स्टेडियम में खेले जा सकेंगे.
शहर के सीवेज का गंदा पानी सीधे गंगा में मिलने से रोकने के लिए नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत बीएचयू के पास भगवानपुर में 55 एमएलडी शोधन क्षमता वाला ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है. शहर मे सीएनजी पंपों सहित घरों मे गैसपाईपलाईन लगावकरवपीएनजी आपूर्ति , मियावाकी वन, सीएनजी गाड़ीयों, ई वाहनों, घरेलू सोलर सिस्टम जैसी सुविधाओं के माध्यम से
पीएम मोदी ने काशीवासियों को संबोधित करते हुए रोप-वे के बारे में कहा, “बनारस के जाम से डरने वालों के लिए रोप-वे अच्छी चीज है. इसके बनने पर कैंट रेलवे स्टेशन और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बीच की दूरी कुछ मिनटों की ही रह जाएगी. गोदौलिया के जाम की दिक्कत भी बहुत हद तक घट जाएगी. जाम की वजह से बनारस घूमने से बचने वाले लोगों के लिए रोप-वे बनने के बाद घूमना आसान हो जाएगा.” आने वाले नवरात्रि से संचालित होने वाले ये रोपवे सड़क से 50 मीटर की ऊंचाई पर वाराणसी स्टेशन से गोदौलिया तक 3.8 किलोमीटर की यात्रा कराएगा. संपूर्णानंद स्पोर्ट्स कांप्लेक्स सिगरा में निर्मित वर्ल्ड क्लास इनडोर स्टेडियम में क्रिकेट, फुटबाल, एथलेटिक्स ट्रैक, चार लॉन टेनिस कोर्ट, बास्केटबाल कोर्ट, वॉलीबाल कोर्ट, दो कबड्डी कोर्ट ड्रेसिंग और कैफेटेरिया भी है. अनुमान है कि ओलंपिक में खेले जाने वाले 28 में से 24 खेल इस स्टेडियम में खेले जा सकेंगे.
शहर के सीवेज का गंदा पानी सीधे गंगा में मिलने से रोकने के लिए नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत बीएचयू के पास भगवानपुर में 55 एमएलडी शोधन क्षमता वाला ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है. शहर मे सीएनजी पंपों सहित घरों मे गैसपाईपलाईन लगावकरवपीएनजी आपूर्ति , मियावाकी वन, सीएनजी गाड़ीयों, ई वाहनों, घरेलू सोलर सिस्टम जैसी सुविधाओं के माध्यम से
नगर के पर्यावरण प्रबंधन व उर्जा जरूरतों को पूरी करने के प्रयास निरंतर जारी है। शहर के चारो दिशाओं मे रोडवेज स्टेशन, मोहनसराय मे ट्रांसपोर्ट नगर, शहर से लगे हुये रिंगरोड क्षेत्र मे टाउनशिप, राजघाट मे सिगनेचर ब्रिज और नया रेल कारीडोर, गंगा व वरूणा एलिवेटेड रोड जैसी परियोजनायें आने वाले दिनों मे मूर्त रूप ले लेगी। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण परियोजना पर काम हो रहा है. वाराणसी के इसरवार गांव में एचपी के बॉटलिंग प्लांट को सीधे एलपीजी मिलेगी. गुजरात के कांडला बंदरगाह से मध्य प्रदेश होते हुए गोरखपुर तक पाइप लाइन केजीपीएल से एलपीजी की आपूर्ति परियोजना पर काम चल रहा है. बताते हैं कि यहां से वाराणसी समेत यूपी के 20 जिलों को LPG सिलेंडर की नॉन स्टॉप आपूर्ति होगी. इस बॉटलिंग प्लांट परियोजना का सीधा लाभ चंदौली, जौनपुर, गाजीपुर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र, आजमगढ़, बलिया, मऊ, अंबेडकर नगर, बांदा, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, रायबरेली, प्रयागराज, फतेहपुर, कौशांबी और चित्रकूट जिलों को मिलेगा.
स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोज़गार, पर्यटन और यातायात जैसे कई क्षेत्रों में काम जारी है. आरामदायक सफर के लिए कई योजनाओं पर काम चल रहा है. फ्लाईओवर, रिंग रोड, सड़कों का चौड़ीकरण देखने को मिल रहा है. प्रमुख संजीवनी के रूप में 325.59 करोड़ की शिवपुर फुलवरिया लहरतारा 4 लेन सड़क है. पर्यटन, रोजगार एवं सौंदर्यीकरण के अंतर्गत 72.63 करोड़ की लागत से सारनाथ बौद्ध सर्किट है, इसके साथ-साथ 39.20 करोड़ की लागत से पंचक्रोशी परिक्रमा यात्रा मार्ग भी है.
वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा हो रही है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. पर्यटक बढ़ने से काशी में रोज़गार के अवसर भी बढ़े और बढ़ रहे हैं. विकास बनारस का हो तो फायदा आसपास के इलाकों को भी मिलता ही है. पूर्वांचल और बिहार के लोग भी लाभ पा रहे हैं. इन सबसे बनारस की व्यवसायिक गतिविधियां तो बढ़ी है । रोजगार का भी सृजन हुआ है पर वह अल्पकालिक और अस्थाई और अवसरकालिक है। पर्यटन के क्षेत्र मे देशी पर्यटकों की संख्या मे कई गुना बढ़ोत्तरी से होटल, लान, स्टेहोम, और पर्यटन सेवा संबंधी सेवियों बढ़ने से रोजगार बढ़ा है। पर यह दीर्घकालिक नही है। बनारस को जरूरत है बंगलोर हैदराबाद पुणे जैसे आधुनिक साईबर सेवा उद्योग केन्द्र के रूप मे विकसित करने की। आज बनारस यातायात बिजली सेवा परिवहन और आधुनिक संसाधनों से लैश वह मुकाम प्राप्त कर चुका है जिसे साइबरसिटी के रूप मे विकसित किया जा सके। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि बनारस मे विकास की एक मजबूत नींव तैयार हो चुकी है अब जरूरत है उसे पुख्ता करने की। पर बनारस के विकास के साथ शहर की भीड़ बढ़ती जा रही है। अगल बगल के ही नही बिहार झारखण्ड और मध्यप्रदेश से भी लोगों का माइग्रेशन बनारस मे तेजी से हो रहा है। नजीजा शहर मे बढ़ती सुविधायें भी भीड़ की जरूरत के हिसाब से कम दिख रही है। जगजीत सिंह की एक गजल है " हर तरफ हर कहीं बेशुमार आदमी, हर नये दिन नया इंतजार आदमी". आज बनारस की हालत वैसी होती जा रही है.
वाराणसी के विकास मॉडल की विदेश में भी चर्चा हो रही है. स्थानीय निवासियों का जीवन पहले से ज्यादा सुगम होता जा रहा है. काशी विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प और शहर में सुविधाओं की वजह से काशी में पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. पर्यटक बढ़ने से काशी में रोज़गार के अवसर भी बढ़े और बढ़ रहे हैं. विकास बनारस का हो तो फायदा आसपास के इलाकों को भी मिलता ही है. पूर्वांचल और बिहार के लोग भी लाभ पा रहे हैं. इन सबसे बनारस की व्यवसायिक गतिविधियां तो बढ़ी है । रोजगार का भी सृजन हुआ है पर वह अल्पकालिक और अस्थाई और अवसरकालिक है। पर्यटन के क्षेत्र मे देशी पर्यटकों की संख्या मे कई गुना बढ़ोत्तरी से होटल, लान, स्टेहोम, और पर्यटन सेवा संबंधी सेवियों बढ़ने से रोजगार बढ़ा है। पर यह दीर्घकालिक नही है। बनारस को जरूरत है बंगलोर हैदराबाद पुणे जैसे आधुनिक साईबर सेवा उद्योग केन्द्र के रूप मे विकसित करने की। आज बनारस यातायात बिजली सेवा परिवहन और आधुनिक संसाधनों से लैश वह मुकाम प्राप्त कर चुका है जिसे साइबरसिटी के रूप मे विकसित किया जा सके। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि बनारस मे विकास की एक मजबूत नींव तैयार हो चुकी है अब जरूरत है उसे पुख्ता करने की। पर बनारस के विकास के साथ शहर की भीड़ बढ़ती जा रही है। अगल बगल के ही नही बिहार झारखण्ड और मध्यप्रदेश से भी लोगों का माइग्रेशन बनारस मे तेजी से हो रहा है। नजीजा शहर मे बढ़ती सुविधायें भी भीड़ की जरूरत के हिसाब से कम दिख रही है। जगजीत सिंह की एक गजल है " हर तरफ हर कहीं बेशुमार आदमी, हर नये दिन नया इंतजार आदमी". आज बनारस की हालत वैसी होती जा रही है.
साथ ही साथ यह भी शोचनीय है कि बनारस ने अपने इस विकास की क्या कीमत चुकाई है। बहुतेरे बनारसी यह मानते है कि बनारस के व्यवसायिकआधुनिकीकरण से बनारसियत मर रही है। बनारसियत को क्या नुकसान हुआ है? शहर ने अपने मूल स्वरूप और स्वभाव मे क्या बिखराव पाया है ? यह एक अलग सवाल है ,जिस पर हम आगे चर्चा करेगें।
काशी, श्रावण शुक्ला एकादशी संवत 2087 वि0,
रविवार, 23 अगस्त,2026
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