रविवार, 13 सितंबर 2026

वाराणसी की बे-पटरी यातायात व्यवस्था.........../ व्योमवार्ता

  वाराणसी की बे-पटरी यातायात व्यवस्था...... 
                                             *व्योमेश चित्रवंश
        आज जब हम २१वीं सदी के तीसरे दशक में,२०२६ के धरातल पर खड़े हो कर काशी की यातायात व्यवस्था देखते हैं  तो स्पष्ट दिखता है कि विश्व की यह प्राचीनतम नगरी अपने  यातायात व्यवस्था के पूर्णतः पंगु हो जाने के एक अभूतपूर्व और अत्यंत वीभत्स संकट के मुहाने पर खड़ी है। हाल के वर्षों में, विशेषकर काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के ऐतिहासिक और भव्य कायाकल्प के बाद, वाराणसी में आने वाले देश-विदेशी तीर्थयात्रियों, आध्यात्मिक पर्यटकों और शोधकर्ताओं की संख्या में अप्रत्याशित रूप से कई सौ गुना की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां पहले सावन या विशेष त्योहारों पर ही भीड़ उमड़ती थी, वहीं अब प्रत्येक सामान्य सप्ताहांत पर शहर की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है। व्यवहारत: इस सांस्कृतिक और पर्यटन पुनर्जागरण का स्वागत किया जाना चाहिए और यह स्वागत हो भी रहा है  परंतु शहर का भौतिक और ढांचागत स्वरूप इस वैश्विक दबाव को संभालने में पूरी तरह अक्षम सिद्ध हो रहा है। काशी मूलतः अपनी संकरी गलियों, पारंपरिक मिश्रित भू-उपयोग वाले बाजारों और गंगा नदी के समानांतर विकसित बस्तियों के लिए जानी जाती है। जब इन प्राचीन और संकरी सड़कों पर आधुनिक, तीव्रगामी, भारी-भरकम चारपहिया वाहन और अनियंत्रित ई-रिक्शा का रेला उतरता है, तो पूरा शहर एक विशाल 'ओपन-एयर पार्किंग लॉट' में तब्दील हो जाता है।
             वाराणसी में जाम केवल सड़कों पर गाड़ियों के रुकने की घटना नहीं है; यह यहाँ के नागरिकों के मौलिक अधिकारों, उनके स्वास्थ्य, समय और शहर की आर्थिक उत्पादकता पर एक निरंतर होने वाला अदृश्य प्रहार है। एक कामकाजी पेशेवर, छात्र या व्यापारी जो कैंट स्टेशन से लंका या गोदौलिया जाना चाहता है, उसे महज ५ से ६ किलोमीटर की दूरी तय करने में औसतन १ से १.५ घंटे का समय गवाना पड़ता है। रोजाना लाखों मानव-घंटे चौराहों पर धुएं और हॉर्न के शोर के बीच नष्ट हो रहे हैं। चौराहों पर लगातार बजने वाले अनियंत्रित हॉर्न के कारण ध्वनि प्रदूषण सामान्य स्वीकृत डेसिबल सीमाओं से कहीं ऊपर पहुंच चुका है। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय दुकानदारों, यातायात पुलिसकर्मियों और दैनिक यात्रियों में उच्च रक्तचाप, चिड़चिड़ापन, बहरापन और क्रोनिक स्ट्रेस जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं। जाम में फंसे वाहनों के इंजनों से लगातार निकलने वाली जहरीली गैसें (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर शहर के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) को खतरनाक स्तर पर बनाए रखती हैं। यह जहरीला धुआं न केवल इंजनों की बर्बादी कर रहा है, बल्कि फेफड़ों को भी नुकसान पहुँचा रहा है। वाराणसी का बीएचयू  ट्रॉमा सेंटर पूर्वांचल, बिहार और नेपाल तक के मरीजों के लिए जीवनदायिनी माना जाता है। परंतु, जब कोई गंभीर एम्बुलेंस कैंट, लहरतारा या लंका के भीषण जाम में फंसती है, तो कई बार मरीज अस्पताल की दहलीज तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए एक गंभीर मानवाधिकार संकट है।
          वाराणसी की यातायात समस्या की जब भी समीक्षा की जाती है, तो अक्सर वाहनों और चौड़ी सड़कों पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है, परंतु इस पूरे संकट की एक सबसे मर्मांतक जड़ फुटपाथों का पूर्णतः लोप हो जाना  है। शहर के जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण योजना (जे एनएनआरयूएम) के समय से लेकर आधुनिक स्मार्ट सिटी योजनाओं में भी पैदल यात्रियों की अनदेखी हो रही है।
"फुटपाथ हमारा है" केवल एक प्रशासनिक स्लोगन बनकर रह गया है। कचहरी से अर्दली बाजार व भोजूबीर मार्ग हो या गोदौलिया-दशाश्वमेध मार्ग, यहाँ फुटपाथों पर पैदल चलने वालों के अलावा सब कुछ मिलता है। सच तो यह है कि शहर की अधिकांश पुरानी सड़कों के निर्माण के समय आधुनिक 'पेडस्ट्रियन पाथवे' का कोई विजन ही नहीं रखा गया। सड़कें तो चौड़ी की गईं, लेकिन पैदल चलने वालों के लिए एक इंच जगह नहीं छोड़ी गई। जहाँ प्रशासन ने फुटपाथ बनाए भी (जैसे वाराणसी स्मार्ट सिटी के तहत), वहां स्थानीय दुकानदारों ने अपनी दुकानों के काउंटर २ से ३ फीट आगे बढ़ाकर फुटपाथों को अपनी निजी जागीर बना लिया है। इसके आगे तीन चार फीट तक  दोपहिया वाहनों की अवैध पार्किंग फुटपाथ को पूरी तरह अवरुद्ध कर देती है। जब पैदल चलने वाले वृद्धों, महिलाओं, बच्चों और पर्यटकों के लिए चलने की कोई सुरक्षित जगह नहीं बचती, तो वे अपनी जान हथेली पर रखकर मुख्य सड़क पर वाहनों के बीच चलने को मजबूर होते हैं। इससे सड़क का 'कैरिज-वे' (वाहनों के चलने की जगह) स्वतः संकरा हो जाता है और पूरी सड़क की गति १० किमी/घंटा से भी कम हो जाती है।
        बनारस के अधिकांश प्रमुख बाजार—जैसे दालमंडी, हनुमानगंज, चौक, लंका, और रथयात्रा—दशकों पुराने हैं। इन बाजारों का विकास उस दौर में हुआ था जब परिवहन का मुख्य साधन बैलगाड़ी, इक्का, साइकिल या पैदल चलना था। परंतु वर्तमान में, इन्हीं संकरे बाजारों में बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, बड़े मॉल, डायग्नोस्टिक सेंटर्स और अस्पताल धड़ल्ले से खोल दिए गए हैं। इनमें से ८०% से अधिक व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पास अपनी कोई बेसमेंट या समर्पित पार्किंग व्यवस्था नहीं है। यदि कहीं कागजों पर बेसमेंट पार्किंग दिखाई भी गई है, तो बिल्डरों और व्यापारियों ने स्थानीय प्राधिकरणों से सांठगांठ कर उस पार्किंग स्पेस को गोदाम, दुकान या रेस्टोरेंट में तब्दील कर दिया है। परिणामस्वरूप, इन दुकानों या अस्पतालों में आने वाले ग्राहकों और मरीजों के वाहन (दोपहिया और चारपहिया दोनों) सीधे फुटपाथों और मुख्य सड़क पर पार्क करा दिए जाते हैं। जब एक व्यस्त चार-लेन की सड़क के दोनों ओर गाड़ियां खड़ी हो जाती हैं, तो वह प्रभावी रूप से केवल एक-लेन या दो-लेन की सड़क बनकर रह जाती है, जिससे 'बॉटलनेक'  की स्थिति पैदा होती है।
               वाराणसी में शहर के मौलिक स्वभाव के अनुरूप यातायात नियमों के प्रति सम्मान और भय का स्तर लगभग शून्य दिखाई देता है। यहाँ गाड़ियां सड़कों पर बनी सफेद पट्टियों  के अनुसार नहीं, बल्कि जहां थोड़ी सी भी जगह दिखे, वहां गाड़ी घुसा देने की प्रवृत्ति से चलती हैं। चंद मीटर की दूरी या यू-टर्न बचाने के चक्कर में भारी वाहन, मोटरसाइकिल और विशेष रूप से ई-रिक्शा मुख्य सड़क पर सामने से आ रहे ट्रैफिक के विपरीत दिशा में तेज गति से चलते हैं। रोजगार के नाम पर विशेषकर कोरोना के बाद शहर में हजारों की संख्या में अनाधिकृत और अपंजीकृत ई-रिक्शा सड़कों पर उतार दिए गए हैं। सवारी देखते ही ये  बिना कोई सिग्नल दिये सड़क के ठीक बीच में या चौराहों के मोड़ों पर अचानक ब्रेक लगा देते हैं, जिससे पीछे आ रहा पूरा ट्रैफिक ठप हो जाता है।
         वाराणसी जैसे अत्यधिक धार्मिक और संवेदनशील शहर में 'आस्था की आड़ में अतिक्रमण' एक ऐसा कड़वा सच है जिस पर सार्वजनिक मंचों पर बात करने से अक्सर प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर बचा जाता है। भारत में धार्मिक भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं कि कानून तोड़ने वाले तत्व इसे एक 'सुरक्षा कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यस्त चौराहे या फुटपाथ पर चाय या पान की दुकान खोलता है, तो नगर निगम का दस्ता उसे अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत तुरंत ध्वस्त कर सकता है। परंतु, यदि उसी स्थान पर किसी पेड़ के नीचे चुपके से एक छोटा सा चबूतरा बनाकर कोई धार्मिक प्रतिमा स्थापित कर दी जाए, या किसी पुरानी संरचना पर चादर चढ़ाकर उसे मजार का रूप दे दिया जाए, तो स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। जैसे ही किसी संरचना के साथ 'धर्म' का नाम जुड़ता है, स्थानीय प्रशासन कानून-व्यवस्था बिगड़ने, सांप्रदायिक तनाव फैलने या धार्मिक भावनाओं के आहत होने के डर से बैकफुट पर आ जाता है। धीरे-धीरे उस छोटे से चबूतरे के चारों ओर लोहे की ग्रिल लग जाती है, फिर एक पक्का कमरा बन जाता है, और उसके बाद उस धार्मिक स्थल की सेवा या सुरक्षा के नाम पर उसके आस-पास फुटपाथों को घेरकर फूल-प्रसाद, चादर, या मजहबी किताबों की दुकानें सज जाती हैं। यह व्यावसायिक विस्तार अंततः एक बड़े और स्थायी जाम का केंद्र बन जाता है।
वाराणसी में ऐसे कई क्षेत्र रहे हैं जहाँ विकास और सुगम यातायात के मार्ग में धार्मिक अतिक्रमण एक बड़ी बाधा बनकर उभरा, परंतु हाल के वर्षों में कुछ कड़े प्रशासनिक और विधिक कदम भी देखने को मिले हैं। काशी विश्वनाथ धाम के ठीक बगल में स्थित दालमंडी बाजार अपनी संकरी गलियों और सघन आबादी के लिए जाना जाता है। यहाँ सड़कों और फुटपाथों की चौड़ाई इतनी कम हो चुकी थी कि पैदल चलना भी दूभर था। सरकार ने शहर के इस कोर एरिया को जाम-मुक्त करने के लिए ₹२२२ करोड़ की दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण परियोजना शुरू की। इस परियोजना के तहत सड़कों को १७.५ मीटर तक चौड़ा किया जाना था, जिसके दायरे में लगभग १४६ अवैध और आंशिक ढांचे आ रहे थे। प्रशासन ने विधिक प्रक्रियाओं के तहत इन अतिक्रमणों को हटाने की कार्रवाई शुरू की, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी हरी झंडी दी। इसी तरह काशी रेलवे स्टेशन को एक वैश्विक स्तर के 'इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट हब' के रूप में विकसित करने की योजना पर रेलवे की अधिग्रहित और स्वामित्व वाली भूमि पर खड़े अवैध कब्जों को हटाया गया। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता  और एक अच्छी बात यह थी कि यह पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और निष्पक्ष था। जहां एक ओर रेलवे की जमीन पर अनधिकृत रूप से बनी संरचनाओं (मजार का अवैध हिस्सा) को ध्वस्त किया गया, वहीं उसी कॉरिडोर के मार्ग में आने वाले अवैध हनुमान मंदिर को भी पूरी विधिक प्रक्रिया और नोटिस के बाद शांतिपूर्ण ढंग से हटाया या स्थानांतरित किया गया।
वाराणसी मे यातायात और जाम की समस्या का सबसे दुखद और विरोधाभासी पहलू यह है कि जो पुलिस विभाग, प्रशासनिक अमला और विधिक बिरादरी सड़कों व फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए कानूनन बाध्य है, उसके स्वयं के पैर सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से जमे हुए हैं। वाराणसी में पुलिस द्वारा थाना और पुलिस चौकी बनाने के नाम पर तथा वकीलों व मुवक्किलों द्वारा कचहरी के बाहर बेतरतीब वाहनों की कतारें लगाने के नाम पर फुटपाथों और सड़कों का भीषण अतिक्रमण किया गया है। यह एक ऐसी प्रशासनिक विडंबना है जहाँ कानून के रक्षक (पुलिस) और कानून के पैरोकार (अधिवक्ता) स्वयं कानून का उल्लंघन करते हुए प्रतीत होते हैं। सोचने वाली बात यह है कि जब मुख्य सड़कों और फुटपाथों पर ही पुलिस का पक्का ढांचा और वकीलों की गाड़ियों का अवैध स्टैंड खड़ा हो, तो प्रशासन किसी आम रेहड़ी-पट्टी वाले को अतिक्रमण हटाने की नैतिक या कानूनी हिदायत किस मुंह से दे सकता है? वाराणसी का प्रशासनिक, पुलिस और न्यायिक मुख्यालय क्षेत्र कचहरी  प्रशासनिक अव्यवस्था और संगठित अतिक्रमण का सबसे बड़ा उदाहरण है।  शासन द्वारा कचहरी के ठीक पास करोड़ों रुपये की लागत से आधुनिक मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण कराया गया है, ताकि सड़कें खाली रह सकें। परंतु, वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। न्यायालय आने वाले अधिकांश अधिवक्ता, मुवक्किल और अन्य लोग पार्किंग शुल्क बचाने या थोड़ी सी पैदल दूरी से बचने के लिए अपने वाहनों को मल्टी-लेवल पार्किंग में पार्क करने की जगह सीधे मुख्य सड़क और फुटपाथ पर खड़ा कर देते हैं। इसके अलावा, फुटपाथों पर चाय पान की दुकानें, कचहरी मे जिलापंचायत मार्ग पर नोटरी वकीलों के तख्त, कुर्सियां और टाइपिस्टों के अवैध केबिन स्थायी रूप से काबिज हैं। सर्किट हाउस से लेकर कलेक्ट्रेट गेट तक वाहनों की दो-दो, तीन-तीन कतारें लग जाती हैं। वकीलों के संगठित एकता के रसूख और प्रभाव के कारण कोई भी जूनियर ट्रैफिक पुलिसकर्मी या नगर निगम का दस्ता इन गाड़ियों को टो  करने या उन पर चालान काटने का साहस नहीं जुटा पाता। इसके चलते एक शानदार चौड़ी सड़क और उसका फुटपाथ प्रभावी रूप से महज ६ से ८ फीट के 'सिंगल-लेन बॉटलनेक' में तब्दील हो गया है। कचहरी के साथ-साथ पुलिस अवसंरचना ने भी शहर के मुख्य चौराहों, फुटपाथों और रास्तों का गला घोंट रखा है। भेलूपुर  थाने की मुख्य इमारत का एक हिस्सा, उसकी बाउंड्री वॉल और थाने के ठीक बाहर सड़क व फुटपाथ पर खड़े किए गए वाहन'  मुख्य मार्ग की चौड़ाई को ४०% तक कम कर देते हैं। इसी तरह चेतगंज थाने के सामने सड़क पर आगेबारह फीट तक बढ़ कर बनाये गये बाउंड्रीवाल पुलिस की गाड़ियों की बेतरतीब पार्किंग, सुरक्षा के नाम पर सड़कों और फुटपाथों पर स्थायी रूप से लगाए गए भारी लोहे के बैरिकेड्स के कारण राहगीरों का चलना असंभव हो जाता है।सिगरा थाने के विस्तार, वहां खड़ी रहने वाली वज्र वाहन, पुलिस क्रेन और विभिन्न मामलों में जब्त किए गए ट्रकों व कारों के कारण सड़क का बायां लेन और फुटपाथ पूरी तरह से एक 'कबाड़खाने' में तब्दील हो चुका है।कचहरी, तेलियाबाग, लहुराबीर और गिलटबाजार की पुलिस चौकियां किसी विशाल सरकारी भूखंड पर नहीं, बल्कि चौराहों के बिल्कुल मुहाने पर, त्रिकोणीय मोड़ों  पर या फुटपाथों को काटकर बनाई गई हैं। इन चौकियों के पक्के निर्माण और उनके बाहर सुरक्षा के नाम पर घेरे गए क्षेत्र के कारण वाहनों का टर्निंग रेडियस  और पैदल यात्रियों का रास्ता पूरी तरह खत्म हो जाता है।
मजेदार तो यह है कि  उच्च एवं उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय भी भोले बाबा के नगरी मे नजीर नही बनते बल्कि वे केवल कागजों के बस्ते में बंद हो कहीं पड़े रहते हैं।
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम स्टेट ऑफ गुजरात (२००९) के  ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को सख्त आदेश जारी किया था कि सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों, गलियों और सार्वजनिक पार्कों में किसी भी नए धार्मिक ढांचे के निर्माण की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाएगी। इसी तरह ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (१९८५) के निर्णय मे सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि संविधान के अनुच्छेद २१ (जीवन का अधिकार) के तहत फुटपाथों और सड़कों का प्राथमिक और एकमात्र उद्देश्य पैदल यात्रियों और वाहनों का आवागमन है। किसी भी व्यक्ति, संस्था, बार एसोसिएशन या सरकारी विभाग को इस सार्वजनिक स्थान पर कब्जा करने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
अवैध धार्मिक ढांचों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने कड़ा रूख अपनाते हुये 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों पर निर्मित सभी अवैध ढांचों को बिना किसी देरी के हटाया जाए। न्यायालय ने कहा था कि सार्वजनिक मार्ग को अवरुद्ध करना साक्षात अधर्म है।सरकारी और पुलिस अतिक्रमण पर  भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट विधिक सिद्धांत दिया है कि "सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में पुलिस स्वयं कानून का उल्लंघन नहीं कर सकती।" यदि किसी थाने या चौकी के कारण सार्वजनिक यातायात या फुटपाथ बाधित हो रहा है, तो राज्य सरकार का यह कर्तव्य है कि वह उसे तुरंत किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित करे। परंतु ये सभी नजारे बनारस मे केवल कानून की मोटी किताबों मे दर्ज है
           आज वाराणसी को इस बहुआयामी यातायात नरक से बाहर निकालने के लिए एक सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, आधुनिक तकनीक  और विधिक कड़ेपन से युक्त एक दीर्घकालिक महा-योजना  की आवश्यकता है, जिसे केवल निर्माण ही नही बल्कि सख्त ढंग से  क्रियान्वित किया जाना चाहिए। जैसे  फुटपाथ हमारा है या 'राइट टू वॉक' का क्रियान्वयन करते हुये शहर की सभी मुख्य सड़कों के दोनों तरफ आधुनिक, ऊंचे और बाधा-मुक्त फुटपाथों का निर्माण अनिवार्य किया जाए। फुटपाथों पर चढ़ने के लिए दिव्यांगों हेतु रैंप बनाए जाएं और वाहनों के प्रवेश को रोकने के लिए 'बोलार्ड्स' लगाए जाएं। जो दुकानदार फुटपाथ पर अपना सामान फैलाते हैं, उनका लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए। रेहड़ी-पटरी और ठेले वालों के लिए मुख्य सड़क से दूर समर्पित 'स्मार्ट वेंडिंग जोन' विकसित किए जाएं। कचहरी क्षेत्र के लिए विशेष 'विधिक प्रवर्तन' करते हुये सर्किट हाउस से लेकर कलेक्ट्रेट और जिला न्यायालय के गेट तक की पूरी सड़क और फुटपाथ को 'जीरो टॉलरेंस नो-पार्किंग ज़ोन' घोषित किया जाए। मल्टी-लेवल पार्किंग का उपयोग अनिवार्य हो और सड़क पर खड़ी किसी भी गाड़ी पर (चाहे उस पर 'अधिवक्ता' या 'पुलिस' 'प्रेस' ही क्यों न लिखा हो) भारी आर्थिक जुर्माना लगाया जाए। भेलूपुर, सिगरा और चेतगंज जैसे थानों को वर्तमान सड़क मार्ग से हटाकर, उनके नजदीक ही किसी सरकारी या नजूल भूमि पर बहुमंजिला 'वर्टिकल पुलिस स्टेशन' भवनों में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। इसी तरह चौराहों के मुहाने पर बनी कंक्रीट की चौकियों (जैसे कचहरी, लहुराबीर, मैदागिन, गिलटबाजार, तेलियाबाग) को तुरंत ध्वस्त किया जाना चाहिए। उनकी जगह चौराहों से दूर, कम जगह घेरने वाले फाइबर या स्टील के प्रीफैब्रिकेटेड कियोस्क स्थापित किए जाएं। थानों के बाहर कबाड़ बन रही गाड़ियों को तुरंत हटाने के लिए शहर के बाहरी हिस्से (जैसे मुख्य रिंग रोड के पास) एक विशाल केन्द्रीय डंपिंग यार्ड बनाया जाए। शहर के अंदरूनी व व्यस्त व्यापारिक इलाकों में माल ढोने वाले भारी और मध्यम कमर्शियल वाहनों का प्रवेश दिन के समय पूरी तरह प्रतिबंधित हो। बाजारों में माल की लोडिंग और अनलोडिंग केवल रात ११:०० बजे से सुबह ६:०० बजे के बीच ही सुनिश्चित की जाए। फोटो आटो को निश्चित मात्रा मे परमिट देकर उन्हे क्षेत्रवार विभाजित व वर्गीकृत किया जाय। शहर मे वाहनों के भारी भीड़ को कम करने के लिये सार्वजनिक समयबद्ध नगर बसें संचालित हों। तब शायद हम बनारस के सड़कों पर अनायास भीड़ धक्का मुक्की और जाम की समस्या से हम कुछ हदलतक निजात पा सकेगें।
विकास की इस तीव्र दौड़ में काशी की प्राचीनता, उसके हेरिटेज और उसकी आत्मा को बचाते हुए उसे एक आधुनिक, सुगम और प्रदूषण-मुक्त बुनियादी ढांचा प्रदान करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी पुकार है। यातायात और जाम की इस वीभत्स समस्या का समाधान केवल सिविल इंजीनियरिंग से नहीं होगा। इसके लिए सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, न्यायपालिका के आदेशों का बिना किसी तुष्टिकरण या पद-रसूख के कड़ाई से जमीनी क्रियान्वयन, फुटपाथों की पूर्ण बहाली और नागरिकों के भीतर एक जिम्मेदार नागरिक बोध का जाग्रत होना अनिवार्य है। जब कानून के रक्षक (पुलिस), कानून के पैरोकार (अधिवक्ता) और आस्था के साधक (जनता) तीनों मिलकर सड़कों और फुटपाथों का सम्मान करेंगे, तभी इस 'आनंद कानन' की वास्तविक सुंदरता और उसका वैश्विक गौरव अक्षुण्ण रह सकेगा।
काशी, 13सितंबर 2026, http://chitravansh.blogspot.com