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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

भारत वंदना : व्योमेश चित्रवंश की कवितायें, 26 जनवरी 1988

व्योमेश की कवितायें : भारत वंदना

हे भारत तुझे प्रणाम, माँ भारत तुझे प्रणाम
तेरे चरणों का वंदन करते हम तेरे संतान ।
वो तुम ही हो भारत भूमि,जहाँ संस्कृति का निर्माण हुआ
गीता का उपदेश हुआ, भारत का संग्राम हुआ
रामायण युग धर्म हुआ ,सभ्यता का संचार हुआ
जब जब तुझ पे संकटआया , अवतार लिए भगवान।
तुम ही वो जननी हो माँ जो वीरो को जनती है
तेरी संताने तुझ पे माँ सर्वस्व निछावर करती है
राणा, शिवा, आजाद, भगत जैसे कितने वीर हुए
गाँधी, नेहरू, शास्त्री, सुभाष ने किया स्वयं बलिदान।
तेरी शांत प्रकृति के बेटे ,माँ हम शान्ति दूत कहलाते है
पर उठे कोई ऊँगली तुझ पर ,हम कालदूत बन जाते है
रंगभेद मिटला कर हम , विश्वबंधु कहलाये है
तेरी धरती पे जन्म लिए ,हमको है अभिमान।
कश्मीर से कन्याकुमारी, तुम एक अखंड मूर्ति हो माँ
भारत के हर जन जन के मन में बसी छवि हो माँ
तुझ पे गर कोई हाथ उठा, वो हाथ वहीं कट जाएगा
तेरी खातिर दे देंगे हम कोटि कोटि जन प्राण.

(गणतंत्र दिवस विशेषांक, दैनिक आज , २६ जनवरी १९८८, वाराणसी के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित मेरी पहली कविता)

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

व्योमेश की कविताये: आज इस ख्वाब को सच में....

आज इस ख्वाब को चलो सच में सजाया जाए
हम गरीबो का भी एक देव बनाया जाए.
देव ऐसा जो चडावे पे न बिक जाए
बस्तिया छोड़ कें महलो में ना वो बस जाये
हम उसक सुने, उससे कहे अपने गम
मन का दुःख दर्द जिसे जा के सुनाया जाए।
उसका मन्दिर मरमरका ना हो कच्चा हो
वह कुछ और भले हो ना मगर सच्चा हो
सोने चंडी की नही, मूरत तो भी क्या है गम
खेत की माटी से उसकी मूरत को बनाया जाए।
हम गरीबो की रोटी में जो खुश हो ले
हमारे टूटे हुए बर्तन में जो पानी पी ले
हमारे टूटे हुए झोपडी में सो जाए जो
ऐसे ही देव को मन्दिर में बसाया जाए।
जो हर शाम हर मेहनतकश को रोटी दे दे
दिन के थके हारे को रातो को एक छत दे दे
और कुछ न दे तो वो हमको सलामत रखे
अपने उस देव से बस ये ही मनाया जाए।