बुधवार, 18 जनवरी 2017

आईजी आफिस के सिपाही की हनक : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18जनवरी 2016, वुधवार

आज सुबह अखबार मे एक खबर पढ़ा अमूमन रोजमर्रा की खबर. मामला पास का था तो सोचने को मजबूर होना पड़ा, कल भोजूबीर के व्यस्ततम चौराहे पर प्रकाशदीप हास्पिटल के सामने से एक ईनोवा कार जा रही थी, ठीक उसी समय सामने विपरीत दिशा से कचहरी की ओर से नंबरप्लेट की जगह पुलिस लिखी हुई एक बाईक पर आ रहे सज्जन ने अपनी साईड के बजाय डिवाईडर पार कर बिल्कुल दाहिने पटरी मे आये और ईनोवा के बगल से उल्टे निकलने लगे. न चाहते हुये भी ईनोवा से बाईक की हैण्डिल को टच होना ही था, बस सज्जन का पारा चढ़ गया और वे सही दिशा मे चल रही ईनोवा के ड्राइवर को खींच कर बाहर निकाला और पीटना शुरू कर दिया. इसी स्थान से सोलह सत्रह कदमो की दूरी पर यातायात पुलिस की पिकेट है. जहॉ मौजूद सिपाही व एएसआई मौके पर  पहुँचे तो बाईक वाले सज्जन ने अपना परिचय आईजी आफिस के सिपाही के रूप मे दिया बस वे लोग पीछे हट गये. मार खाता व अपनी कई पुस्तो के साथ अपनी मॉ बहन बेटी के बारे ने अशोभनीय संबोधन सुनता हुआ यह नही समझ पा रहा था कि आखिर उसने गलती कहॉ व क्या की? धीरे धीरे भीड़ जुटने लगी. लोग बाग सहित पिकेट के पुलिस वाले आईजी साहब के सिपाही जी को समझाते रहे पर सिपाही जी का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा था उसने अपने रूतबे का इस्तेमाल करते हुये  पुलिसलाईन से क्रेन मंगवा लिया. सूचना पा कर सीओ कैण्ट भी आये पर लोग बाग यह देख कर हैरान रह गये कि आईजी आफिस के सिपाही के रूतबे के आगे वे भी लाचार नजर आ रहे थे. उन्होने सिपाही को उसके गलती जताने के बजाय उसे समझाना शुरू कर दिया.  सामान्य जन पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा गलत दिशा बिना नंबर की गाड़ी बिना वर्दी वाले सिपाही  के मानमनोव्वल को देख भौचक्का थे. सिपाही ईनोवा को जबर्दस्ती क्रेन से खिंचवा कर पुलिसलाईन ले जाने से नीचे मानने को तैय्यार ही नही था. जब कुछ मीडियाकर्मी व लोग गलत ट्रैक पर  खड़ी बाईक की फोटो लेना शुरू किया तब सिपाही जी वहॉ से खिसक गये. 
     सुबह अखबार मे यह खबर पढ़ कर एक जिम्मेदार शहरी की तरह मैने इस खबर को वाराणसी पुलिस को  ट्वीट किया तो शाम तक उनका रिट्वीट भी आ गया कि प्रकरण की जॉच कर कार्यवाही की जा रही है.
बहरहाल हमे इससे नही मतलब कि उक्त सिपाही के विरूद्घ जॉच कर क्या कार्यवाही हुई. क्योंकि ऐसे जॉचो का हश्र हन् मालूम है. पर कुछ सवाल उठना लाजिम है. क्या अनुशासन को तार तार करने वाले सिपाही के विरूद् अनुशासनात्मक कार्यवाही से पुलिस प्रशासन मे अपने रूतबे व पहुँच के बल पर उच्चाधिकारीयो के अवमानना का परिमार्जन गो सकेगा?
क्या सही दिशा मे चलने वाले ईनोवा ड्राइवर के बेईज्जती व मारपीट के लिये सिपाही के विरूद्घ कोई कानूनी कार्यवाही की जायेगी? सामान्य जन को हेलमेट से लेकर नंबरप्लेट पर गर्द पड़े रहने पर चालान करने वाली पुलिस क्या बिना नंबर वाले बाईक चलाने मे चालान करेगी? वैसे हमे पूरा विश्वास है कि उस वाहन का पंजीकरण, ईश्योरेंस, प्रदूषण, डीएल कुछ भी नही रहा होगा? बावजूद इसके कुछ नही होगा. क्योंकि सारे नियम कानून सामान्य जनता के लिये है न कि रसूख व पहुँच वाले लोगो के लिये.
वैसे भी जहॉ यह घटना हुई वहॉ पर यातायात पिकेट के सिपाही व एएसआई हमेशा मौजूद रहते है. यह वरूणापार का व्यस्ततम चौराहा है एकतरह से शहर का प्रवेशद्वार. सड़क के दोनो पटरियो पर तीन चार बड़े नीजी अस्पताल, तीन चार डिपारिटमेण्टल स्टोर्स, बीसीयों डाक्टर, व मिठाई, बेकरी, मॉस, इलेक्ट्रॉनिक की दुकाने है. जिनके यहॉ खड़े दूपहिया, चारपहिया वाहन आधे सड़क को घेरे रहते हैं. शेष आधी सड़क पर फल वाले, खोमचे वाले,  रजाई गद्दे वाले कब्जा जमाये है. शेष बची सड़क पर आटो स्टैण्ड बना हुआ है. ऐसे मे चौड़ी होने के बावजूद सड़क अतिक्रमण की जद मे फंस कर जाम लगाने को मजबूर है. मजेदार तथ्य यह है कि  इस चौराहे को प्रशासन व पुलिस के उच्चाधिकारीगण संयुक्त रूप से सौन्दर्यीकरण के उद्देश्य से गोंद लिये है. पर सौन्दर्यीकरण तो दूर सड़क से अतिक्रमण से भी मुक्त नही करा सके है. जब प्रॉजल  यादव  यहॉ के डीएम  हुआ करते थे तो उन्होने सड़क को अतिक्रमणमुक्त कराने के साथ डिवाईडर भी बनवाया था जिससे काफी हद तक चीजें नियंत्रण मे हो गयी थी पर अब स्थिति बद से बदतर होने लगे है.
अभी भी हमारे दृष्टि से अगर एक पखवारे तक लगातार बिना किसी भेदभाव के सड़को पर खड़े वाहनो का नियमित चालान होने लगे. अस्पताल, बेकरी, डिपार्टमैंटल स्टोर पर अतिक्रमण के लिये भारी जुरमाना लगाया जाय तो मात्र तीन दिनो मे स्थिति बदल सकती है. ऐसा नही है कि यह केवल भ्रम है वरन इसी शहर मे हम लोगो ने मात्र दो साल पहले प्रॉजल यादव के डीएम कार्यकाल मे हमने यह देखा है. हॉ यह जरूर है कि इस शहर का मिजाज व माहौल अलग है नही तो क्या इसी तरह हनक दिखा कर कोई भी सिपाही सही व्यक्ति पर हाथ उठा देता. और हम इसे चुपचाम सहन कर लें.
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शनिवार, 14 जनवरी 2017

THE ONE YOU CANNOT HAVE : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13/14जनवरी 2017

The One You Cannot Have

      Tonight is so chilled, the temperature of outside of my room is not more then 7 degree centi. I watched its 12.40 midnight and i just completed Preety Shenoy ' s THE ONE YOU CANNOT HAVE.  Its a very simple emotional story which all about the college life love and family pressure of indian families.
      How long does it take to heal a broken heart? Can you ever forget that one perfect relationship you had? Anjali knows who she wants, she wants Aman. Aman too knows who he wants, he wants Shruti. Shruti and Aman were once inseparable. Theirs was a love that would last forever and more. Then, out of the blue, Shruti left Aman. A devastated Aman moved abroad in the hope of forgetting Shruti and to heal. Shruti married Rishabh. Now Aman is back in India and looking for a fresh start. But he is still haunted by memories of his love. Can he ever break free from it? His head tells him to move on, to find love with Anjali, but his heart wont listen. No matter what he does, Shrutis shadow looms large. Can there be a happily-ever-after for any of them? A straight-from-the-heart modern-day romance of unrequited love, of complicated relationships and about moving on when you realise that there will always be the one you cannot have.
Preety' s writing style is good which is  simple and hearttouching. The theam problem of novel indicated so nearer and dearer story which relates everyone. For timepass and emotional mood it is a great story.
(Banaras, 13/14 january 2017, 12.36 pm.)
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

मुझे फर्क नही पड़ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13 जनवरी, 2017, शुक्रवार

मुझे फर्क नही पड़ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13 जनवरी, 2017, शुक्रवार
( सोशल मीडिया पर मिली एक पोस्ट, जो मन के बड़ी करीब लगी)

              भारत में बहुत से लोग है, जो कथित भांड पत्रकारों, और भ्रस्ट नेताओं की बातों में आकर नरेन्द्र मोदी का विरोध करते है
अच्छा है, लोकतंत्र है विरोध करें या समर्थन ये तो आपका अपना हक है
पर मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हो ?

क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, पप्पू, केजरीवाल, ममाता बनर्जी, वामपंथी
ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर है, या इनका रिकॉर्ड बेहतर है

* क्या नरेन्द्र मोदी से बेहतर मुख्यमंत्री है ममाता बनर्जी, बेहतर दिखती है तो कोल्कता में और गुजरात के किसी छोटे शहर भी जाकर 1 नजर मार लीजिये

* लालू और मुलायम, दोनों के घर की ऐसी स्तिथि थी की, 1 के घर पर साइकिल और एक के घर पर लालटेन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, 
जाति के नाम पर चलने वाले नेता, आज अरबपति है,
रामगोपाल चार्टर्ड प्लेन में घूमता है, तो शिवपाल महँगी ऑडी, ये लोग नरेन्द्र मोदी से
बेहतर है ?

* एक रेस्तरां/बार में काम करने वाली और उसके  बेटा-बेटी और दामाद आज सभी अरबपति है, 10 साल तो इनका हाल में ही राज बीता है, क्या ये नरेन्द्र मोदी से बेहतर है

* 35 साल बंगाल में राज करने वाले वामपंथी, नरेन्द्र मोदी से बेहतर है ?

* 5 साल केजरीवाल, 5 साल केजरीवाल, का विज्ञापन चलाकर दिल्ली के लोगों को चुना लगाने वाला, 5 दिन भी दिल्ली में नहीं रहता, WIFI, CCTV, 150 कॉलेज, 500 स्कुल क्या ये कुकुरमुत्ता नरेंद्र मोदी से बेहतर है ?

* जब मायावती राजनीती करने निकली थी, और कांशीराम की पिछलगू थी, तब उसके घर में दिया जलने का धन नहीं था, आज उसका सैंडल भी प्लेन से आता है, उसके भाई के पास 497 कंपनिया है, क्या मायावती नरेंद्र मोदी से बेहतर है ???

अरे मोदी का विरोध करने वालो, विरोध करो, पर समर्थन किनका करते हो, तुम्हे कोई शर्म है ?

थोड़ा सोचो, देश को और कितने टुकड़े में देखना है, कितना बर्बाद करवाना है ?
अब तो शर्म करो। कितना लूटना है ?

मान लो की मैं मूर्ख हूँ और

● मुझे नहीं मालूम कि मैं मोदी जी को क्यों पसंद करता हु । लेकिन मेरे पास कोंग्रेस , सपा ,बसपा , आप को नापसंद करने के बहुत कारण है ।

● मुझे नहीं मालूम कि अच्छे दिन आएंगे कि नहीं, पर मोदी जी के अतरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता जो भारत के अच्छे दिनों के लिए तन और मन से प्रयत्न करता हो

● मुझे ये भी नहीं मालूम कि मोदी जी भारत को हिन्दू राष्ट्र बना पायेगे या नहीं । लेकिन, इसका पूरा यकीन हैं, उनके खून का एक एक कतरा  भारत माता को पुनः विस्वगुरु का दर्जा दिलवाने हेतु प्रयासरत है ।

● मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मोदी के पास 56 इंच का सीना हैं या नहीं। लेकिन ये पता हैं कि उनके सीने में 'दम' हैं 'दमा '(कुकुखॉसी) नहीं।

● मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर मोदी से देश के कुछ बुद्धि जीवी नाराज है क्यूंकि मुझे यकीन है, उनके आने के बाद युवा पीढ़ी बहुत खुश है

● मुझे ज्ञात नहीं कि मोदी देश का कितना विकास कर पाएंगे, लेकिन मुझे यकीं है वो अपनी जिम्मेवारियां उठाने में कोई कसर बाकि नहीं रखेंगे।

● मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मोदी जी के पास इतिहास की जानकारी हैं या नहीं। मुझे पक्का यकीन हैं उनके पास भविष्य की पूरी तैयारी है ।

● हां बाकई मुझे नहीं पता कि नोटबंदी कारण भविष्य में बीजेपी हारेगी या जीतेगी पर एक चार्टर्ड अधिवक्ता और देश का सजग नागरिक  विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मेरा देश जीत गया ।
(बनारस, 13 जनवरी, 2017, शुक्रवार )
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रविवार, 8 जनवरी 2017

जीवन जीने का ढंग सीखाती एक कविता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08 जनवरी 2017, रविवार

जीवन का एक सच जो हम स्वीकार नही करते या जानबूझ कर उस वास्तविक सच को जीवन भर झुठलाते है. और जीवन रोजमर्रा  के आपाधापी मे वास्तविक जीवन को जीना भूल जाते है . लिहाजा हम धीरे धीरे मरने लगते है. बावजूद इसके दुर्भाग्यत: हम जीना नही सीख पाते.
नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता  "You  Start  Dying  Slowly" जो मुझे बेहद पसंद है. प्राय: जब अनायास के भागदौड. व्यस्तता व तनाव से मेरा सामना पडता  है तो यह कविता मुझे बहुत सूकून देती है. इस कविता का हिन्दी अनुवाद भी बेहद सरल व सहज है. कविता का हिन्दी अनुवाद...

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- करते नहीं कोई यात्रा,
- पढ़ते नहीं कोई किताब,
- सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
- करते नहीं किसी की तारीफ़।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप :
- मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
- नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
- चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
- नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
- नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
- आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :
- नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
- अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
- अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
- अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की...।
*तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं...!!!*
( बनारस, 08जनवरी2017, रविवार)
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शनिवार, 7 जनवरी 2017

मेरा मानना है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 06 जनवरी 2017, शुक्रवार

        उसने टोपी नहीं पहनी मुस्लिमों को नाराज किया....
उसने 1% टैक्स लगा कर स्वर्णकारों को नाराज किया....
उसने होटल वालों के सर्व्हीस चार्जपर हथौड़ा चला के ग्राहकों के हित के लिए होटलवालों से पंगा लिया...
उसने 500 और 1000 के नोट बन्द कर के अपने ही परम्परागत वोट बैंक को नाराज किया....
बैंकवालों पे नकैल कसना शुरू कर के उन से भी पंगा लिया....
कैश लेस को बढ़ावा दे कर वो टैक्स चोरों के रास्तों का रोड़ा बन गया है....
रेडा जैसा क़ानून कर के बिल्डरों को नाराज़ किया...
बेनामी का क़ानून पारित कर के ज़मीन के काला बाजारियों को बेनक़ाब कर रहा है...
स्पेक्ट्रम, कोयला आदि का भ्रष्टाचार दूर कर के देश को लाखों करोड़ों का फ़ायदा देने के लिए बड़े उद्योगपतियों से पंगा लिया....
गैस सब्सिडी, मनरेगा आदि का पैसा सीधे बैंक खाते में जमा करने के कारण सभी बिचौलियों की दुकानें बंद कर दी....
युरिया को नीम कोटिंग करने से केमिकल फ़ैक्टरियों का गोरख धंदा चौपट कर दिया...
लगभग हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार कम करने के नये नये तरीक़ों का आग़ाज़ कर रहा है....
सभी सरकारी कामों में टेक्नॉलजी के कारण गति लाने के प्रयास के कारण दलालों का 'स्पीड-मनी' बंद कर रहा है...
और न जाने कितनों को वो रोज़ नाराज़ कर रहा है....
       हो सकता है आप भी उस के किसी क़दम से नाराज़ चल रहे हो, आप का भी कुछ नुक़सान हुआ हो....
           वो सही में पागल बन गया है क्या? वो चाहता तो आराम से किसी का दिल दुखाये बिना राज कर सकता है...
वह हर रोज़ नये नये क़दम उठा कर देश के हर क्षेत्र की बुराइयाँ दूर करने की रात दिन मेहनत कर रहा है...
क्यों कि...
उसे कुर्सी से प्रेम नहीं है । उसे सिर्फ अपने देश और सवा सौ करोड देशवासियों से प्रेम है...वो अपने देश को दुनियाँ में सबसे समृद्ध बनाना चाहता है...हर बुराई को ख़त्म करना चाहता है...वो भी इसी जनरेशन में...
अब भले ही आप उसे वोट न दें....
हो सकता है उस की कुर्सी २०१९ में चली जाएँ...उसे उस की चिंता नहीं है....
आज जो उसका या उस के समर्थकों का मजाक उडा रहा है वो वास्तव में खुद का और खुद की भावी पीढी का मजाक उडा रहा है...।   
      देश बेचकर अपना जेब भरनेवाले चंद दोगले नेताओं, टीव्ही चैनलों और ब्युरोक्रेट्स की बातों में आकर उसका साथ छोडा तो खुद को मजाक बनने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। सरकार की कुछ कमियों को, कुछ अब तक न हुए कामों को बढ़ा चढ़ा कर बोल कर ये लोग आप को गुमराह कर रहे है...
इस स्थिति में सभी खुनी भेडिये उसके खिलाफ लामबंद हो रहे हैं...देश के लिए उसे हमारे साथ की जरुरत है...
          इस से भी जादा हमें उस की ज़रूरत है। आप ने उसे हटा दिया तो उस का कुछ नहीं बिगड़नेवाला...वो तो हिमालय में चला जाएगा...
  लेकिन हमारी अगली नस्लें हमें सैकड़ों सालों तक कोसेगी.....
      भाइयों, हमें अपने प्रधानमंत्री का साथ हर हाल में देना ही होगा..हमें उसकी आवाज बननी है...अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए....
(बनारस, 06 जनवरी 2017, शुक्रवार)
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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

बनारस, रवीश के नजरों से : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 जनवरी 2017, शनिवार

रवीश तिवारी एक जमाने मे मेरे पसंदीदा टीवी एन्करो मे से एक थे बाद मे उनके प्रो सेक्यूलरिज्म व विचार विशेष की पैरवी व जबर्दस्ती के विचार थोपने वाली पत्रकारिता के च ते हमने उन्हे व उनके चैनल को देखना ही लगभग बंद कर दिया. अभी हाल मे हमारे एक मित्र ने हमारे शहल बनारस पर लिखा रवीश का यह ब्लॉग भैजा, पढ़ने पर अच्छा लगा. बनारस शहर पर रवीश के नजरिये के हम बनारसी लोगों को पढ़ना चाहिए

      बनारस:रोज़ देखा जाने वाला, कहा जाने वाला, सुना जाने वाला लिखा जाने वाला और इन सबसे ऊपर जीया जाने वाला शहर है। इसकी इतनी परिभाषाएं और व्यंजनाएं हैं कि यह शहर हर लफ़्ज़ के साथ कुछ और हो जाता है। लिखनेवाले की गिरफ़्त से निकल जाता है। मैं बनारस के ख़िलाफ़ किसी बनारस को खोजने निकला था मगर हर जगह मिला उसी बनारस से जिसे मीडिया ने एक टूरिस्ट गाइड की तरह एकरेखीय वृतांत में बदल दिया था। वृतांतों का रस है बनारस।
दरअसल, बनारस कोई शहर ही नहीं है। यह कभी था न कभी है और कभी रहेगा। शहर होता तो किसी पेरिस जैसा होता, किसी लुधियाना-सा होता या किसी दिल्ली-सा। सड़कों दीवारों से बनारस नहीं है। बनारस है बनारस के मानस से। आचरण, विचरण और धारण से। जो भी मिला बनारस को धारण किए मिला। बनारसीपन। इसके बिना तो कोई बाबा विश्वनाथ को देख सकता है न बनारस को। यह बनारस का होकर बनारस को जीने का शहर है। यह न मेरा है न तेरा है न उसका है, जो बनारस का है।
बहुत कम हुआ जब लौट आने के बाद किसी शहर की याद आई। किसी शहर में जागने-सा अहसास हुआ। सोचता रहा कि क्या लिखूं बनारस पर। क्या नहीं लिखा जा चुका है। इस शहर के लोग किसी दास्तान की तरह मिलते हैं। क़िस्सों से इतने भरे हैं कि सुनाते-सुनाते ख़ुद किसी किस्से में बदल जाते हैं। मिलने और बोलने का ऐसा रोमांच कहीं और महसूस नहीं हुआ। जो भी मिला उसे जितना मिलना चाहिए उससे ज़्यादा मिला। कम तो कोई मिला ही नहीं। कम तो हम दिल्ली वाले मिले। सोचते रह गए कि कितना मिले और सामने वाला पूरा मिलकर चला गया। बनारस को खोजना नहीं पड़ता है। कहीं भी मिल जाता है।
हम बाबा ठंडई की दुकान पर थे। उनकी शान में क़सीदे पढ़ते रहे कि हर साल आपकी ठंडई एक मित्र से बुज़ुर्ग के हवाले से दिल्ली पहुंच जाती है। पिछले कई सालों से आपकी ठंडई पी रहा हूं। कोई चालीस-पचास साल से ठंडई बना रहे जनाब ने ऊपर देखा तक नहीं कि कौन है क्या बोल रहा है। बस किसी साधना की तरह ठंडई बनाने में लगे रहे। साधना ज़रूरी है। चाहे आप देश चलाएं या ठंडई बनाए। मगर वहीं खड़े किसी शख़्स ने किसी को भेजकर पान मंगवा दिया। लस्सी की दुकान का पता बता दिया। कार से गुज़रते वक्त पान और चाय की दुकानों पर लोगों को जमा देखा। रुककर खाकर बतियाते देखा ।
लगा कि इस शहर में लोग दफ़्तर दुकान जाने के अलावा भी घर से निकलते हैं। सुबह-सुबह चाय पीने गया था। बस किसी ने किसी को कह दिया कि बाइक से इन्हें पार्क तक छोड़ आओ। बिना देखे बिना जाने उसने चाय छोड़ी और पार्क तक छोड़ आया। जिन्हें भी जीवन में बात करने की समस्या है। लगता है कि वो तर्क नहीं कर पाते। वो बनारस चले जाएं। बोलने लग जाएंगे। ख़ासकर टीवी के ये बौराये और झुंझलाये एंकरों को हर साल बनारस जाना चाहिए।
रेडियो मिर्ची के दफ़्तर गया था। नौजवान जौकियों के संसार में। बात करने की ऐसी शैली कि मेरा बस चले तो हर जौकी बनारस की सड़कों से उठा लाऊं। सबके पास कुछ न कुछ अतिरिक्त था, मुझे देने के लिए। आज के इस दौर में उनके पास बहुत-सी गर्मजोशियां बची हुई हैं। जल्दी समझ गया कि यह टीवी में दिखने के कारण नहीं है। जो प्यार बह रहा है वो बनारस के कारण है। मिर्ची के इन मिठ्ठुओं से मेरा भी दिल लग गया। तोते की तरह बोलता था वो मोटू! तो शांत संभलकर अमान और रह रहकर सोनी। एक से एक किस्सागो। बात-बात में मैं विशाल के साथ लाइव हो गया। उनके कुछ और दोस्तों से मुलाक़ात हुई। हर मुलाक़ात में मैं बस इस शहर के लोगों में मिलने की फ़ितरत देख रहा था। कितना मिलते हैं भाई। भाइयों ने मेरी शान में दफ़्तर के भीतर चाट का एक स्टाल ही लगा दिया। टमाटर की चाट। वाह। दिल्ली वालों को पता चल गया तो हर नुक्कड़ और बारात में बेचकर खटारा बना देंगे।मुझे पता है कि जितना मिल जाता है उतना लायक नहीं हूं। वैसे भी क्या करना है हिसाब कर। टीवी के फ़रेब के नाम पर प्यार ही तो मिल रहा है। मैं माया में यक़ीन करता हूं। सब माया है। माया मिलाती है, माया रुलाती है और माया हंसाती है। घड़ी की दुकान में स्ट्रैप बदलवाने गया था। जनाब ने कोई स्पेशल जूस मंगवा दी। कहा कि पीते जाइये। ज़ोर देकर कहा कि मैं चाहता हूं कि आप पीयें। ये बनारस का असली है। मैंने तो कहा भी नहीं था पर वो यह जूस पिलाकर काफी ख़ुश दिखे। इतने ख़ुश कि लाज के मारे शुक्रिया कहते न बना।
वो पता नहीं कौन लड़का था। लंका चौक पर जहां बीजेपी का धरना चल रहा था। भयानक गर्मी थी। वो पहले जूस लाया फिर पार्कर पेन ख़रीद लाया खुद ही पैकेट से निकाल कर जेब में रख गया। किसी चैनल के फ़्रेम में देखकर वो महिला अपने पति और बेटी के साथ दौड़ी चली आई। हांफ रही थी। वो घर ले जाकर खाना खिलाना चाहती थी। काश मैं चला गया होता। और वो कौन था जो मिर्ची दफ़्तर के बाहर हम सबकी चाय के पैसे देकर चला गया। आठ दस लोगों की चाय के पैसे। मैं सोचता रह गया कि हमने कब किसी अजनबी के लिए ऐसा किया है। उफ्फ!
अजीब शहर है कोई ख़ाली हाथ मिलता ही नहीं है। ऐसा नहीं कि मैं टीवी वाला हूं इसलिए लोग मिल रहे थे। मुझसे मिलने के बाद वहां मौजूद किसी से वैसे ही मिल रहे थे। हम दिल्ली वाले मिलना भूल गए हैं। काम से तो मिलते हैं, मगर मिलने के लिए नहीं मिलते हैं। रोज़ दफ़्तर से लौटते वक्त ख़ाली-सा लगता हूं। अब तो मेरा एकांत ही मेरी भीड़ है। मैं भी तो कहीं नहीं जाता। जाने कब से अकेला रहना अच्छा लग गया। ग़नीमत है कि फेसबुक ट्वीटर है। जो भी अकेले में बड़बड़ाता हूं, लिख देता हूं। अकेले बैठे बैठाए दुनिया से मिल आता हूं। काम और शहर के अनुशासन की क़ीमत पर मुलाक़ात का बंद होना ठीक नहीं। हम मिलते तो यहीं बनारस बना देते। बनारस एक-दूसरे से मिलता है इसलिए बनारस है। दिल्ली के नाम में तो दिल है मगर दिल है कहां। दिल्लगी है कहां और कहां है दीवानगी। बनारस में है। वहां के लोगों में है। आप सबने मुझे बेहतरीन यादें दी हैं। मैं बनारस को याद कर रहा हूं।
@रवीश कुमार की कलम से (NDTV)
(बनारस, 07 जनवरी, 2017, शनिवार)
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सोमवार, 2 जनवरी 2017

एक और जिम्मेदारी के लिये धन्यवाद : व्योमेश चित्रवंश की डायरी 02 जनवरी 2017, सोमवार

एक और जिम्मेदारी के लिये धन्यवाद

उपजा वाराणसी इकाई का 2017-18, 2018-19  द्विवार्षिक चुनाव शिवपुर उपजा कार्यालय में सम्पन्न हुआ। उपजा सदस्यों की मौजूदगी में सर्वसम्मत से विनोद बागी को अध्यक्ष, सुबोध त्रिपाठी को महामंत्री चुना गया। उपाध्यक्ष सुशील श्रीवास्तव, अमन सिद्दकी, रामनरेश जी, डॉक्टर रुद्रानंद चुने गए।
मंत्री पद पर रविंद्र गिरी, विजय शंकर चौबे, व्योमेश चित्रवंश और कोषाध्यक्ष  अतुलेश उपाध्याय चुने गए। कार्यकारिणी में 11 सदस्य चुने गए।
सभी नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

मेरी बिटिया द्वारा नये साल पर रचित कविता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 31 दिसबंर 2016

Aaj ek aur saal beet jaega
Kuch khatti or
Kuch meethi yaaden de
Naye dost mile
Kuch purane dur bhi ho gye
Naye anubhav diye
Kuch ache
Kuch kharab
Zindagi aage badhi
Kuch nayi yaaden batori
Kuch purani dushmani
Dosti me badli
Lakho sapne dekhe
Kuch pure hue
Kuch adhure hi reh gye
Ek umeed h naye saal me
Honge rubaru nayi khushiyon se
Sapne honge pure
Kamyabi kadam chumegi
Apne aur kareeb aenge
Kuch naye dost zindagi me jagah me jagah banaege
Isi umeed k sath iss saal ko vida krte h
Aur bahen phaila naye saal ka swagat krte h....
- Vidisha Chitravansh, 31 December 2016

यह झटपट कविता मेरी बिटिया कनु ने अपनी सहेलियों के लिये लिख कर अभी अभी फेसबुक पर पोस्ट किया, मुझे अच्छी लगी तो अपनी डायरी मे कापी कर पोस्ट कर रहा हूँ.

अखबारों मे पढ़ के अच्छा लगता है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 31 दिसंबर 2016, शनिवार

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

आज कमिश्नर साहब ने फिर मेरे शहर के बेपटरी यातायात समस्या हेतु रणनीति बनाई पर वीडीए व नगरनिगम के नीयत को देखते हुये हम मुतमइन है.
देखें कि भोजूबीर लगायत गोदौलिया , आशापुर लगायत चौक के बड़े रसूखदार लोगों द्वारा किया अतिक्रमण शायद हट जाये या वरूणा की तरह बड़़े लोगो के असर से सड़क ही न सिकुढ़ जाये.
(बनारस, 31दिसंबर 2016, शनिवार)
http:chitravansh.blogspot.com

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

नववर्ष 2017

बदलते वक्त के संग शुभकामना संदेश: व्योमेश चित्रवंश की डायरी,29 दिसंबर,2016,गुरूवार

बदलते वक्त के संग शुभकामना संदेश

अब नही रहता इंतजार
नये साल पर डाकिये के आने का
बार बार नही उठती है ऑखे
टेबुल पर पड़े हैप्पी न्यू ईयर कार्डों पर
नही रहती होड़ औरों से अच्छा कार्ड चुनने की
कोहरे व ठण्ड भरे दिनों मे कई कई दुकानों पर

क्योंकि अब मिल जाते है शुभकामना संदेश
मोबाईल, टेलीफोन पर 'हैप्पी न्यू ईयर' के तीन शब्दों मे
बारह बजते ही रात के आनन फानन में
वाट्सऐप्प, फेसबुक, एसएमएस व सोशल मीडिया में

पर मुँह से बोले उन तीन शाब्दों मे वह अपनापन
नही महसूस कर पाता मेरा मन
जो साल भर तक रिश्तो को गरमाये रखता था
नव वर्ष के के शुभकामना वाले रंगीन कार्डों में
साल के पहले दिन से आखिरी रात तक
मन को छूती यादों मे
डाकिये के कदमों मे, किवाड़ पर पड़ी दस्तकों में

हम बदल रहे हैं, हमारा स्वभाव बदल रहा है
घड़ी की सूईयों व तारीखों के साथ साल बदल रहा है .

बदलते वक्त के दौर मे आपके संग बिताये यादो के क्रम में वर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाये,
                                                -व्योमेश चित्रवंश,
                          बनारस, 29दिसंबर 2016, गुरूवार

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

ये तो मनोरोग का मामला है हूजूर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 दिसंबर 2016, मंगलवार

ये *मनोरोग का मामला है हूजूर..!*

- उसके चेहरे से नफरत...
- उसके PM बनने की बात से नफरत..
- उसके PM बन जाने से नफरत,
- उसके कपड़ों से नफरत...
- उसके सुधार कार्यक्रमों से नफरत..
- उसके विदेश दौरों से नफरत...
- उसके भाषण से नफरत...

- उसकी माँ से नफरत..
- उसने चाय बेचीं तो नफरत..
-उसने देश के लिए घरबार बीबी को त्याग किया तो नफरत..

- संसद में बैठे तो नफरत..
- जनता से बोले तो नफरत..
-रेडियो टीवी पर बोले तो नफरत..
-न बोले तो नफरत..
- भाषण की भावुकता से नफरत..
- भाषण की दृढ़ताओं से नफरत..
-वो रोये तो नफरत..
-वो हँसे तो नफरत..

- पाकिस्तान से वार्ता पर नफरत...
- पाकिस्तान से सख्ती पर नफरत,
-surgicle स्ट्राइक पर नफरत..
-सैनिको को मारने वाले आतंकवादी मारे तो नफरत..

- काले धन पर अभियान न चलने पर नफरत...
- अभियान चले तो नफरत...
-15लाख की भीख नहीं मिले तो नफरत..
-भ्रष्टाचारी की पुंगी बजाई तो नफरत...

इस बात से भी नफरत कि कोई आदमी उसके पक्ष में पोस्ट कैसे लिख सकता है..??
और-
तो मोदी भक्त का संबोधन...

मोदी का विरोध करने वाले यह नहीं बताते कि वह *समर्थन किसका करते हैं..?*
जिसको जनता ने चुन के लाया उसका या अल्प मत का?
कामचोरों का या जो 18 घंटे काम करता है उसका..

माफ़ कीजियेगा हुज़ूर
ये मनोरोग का मामला है।
(बनारस, 27 दिसंबर 2016, बुधवार)
http://chitravansh.blogspot.com
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गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

जाने कहॉ गये वे दिन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22दिसम्बर 2016, गुरूवार

शादी मे (buffer) खाने में वो आनंद नहीं जो पंगत में
आता था जैसे.... 
👉 पहले जगह रोकना ! 
👉 बिना फटे पत्तल दोनों का सिलेक्शन!
👉 उतारे हुयें चप्पल जूतें
पर आधा ध्यान रखना...!
👉 फिर पत्तल पे ग्लास रखकर उड़ने से रोकना!
👉 नमक रखने वाले को जगह बताना
यहां रख नमक
.
सब्जी देने वाले को गाइड करना
हिला के दे
या तरी तरी देना!
.
👉 उँगलियों के इशारे से 2 लड्डू और गुलाब जामुन,
काजू कतली लेना
.
👉 पूडी छाँट छाँट के
और
गरम गरम लेना !.
👉 पीछे वाली पंगत में झांक के देखना क्या क्या आ
गया !
अपने इधर और क्या बाकी है।
जो बाकी है उसके लिए आवाज लगाना
.
👉 पास वाले रिश्तेदार के पत्तल में जबरदस्ती पूडी
🍪 रखवाना !
.
👉 रायते वाले को दूर से आता देखकर फटाफट रायते
का दोना पीना ।
.
👉 पहले वाली पंगत कितनी देर में उठेगी। उसके
हिसाब से बैठने की पोजीसन बनाना।
.
👉 और आखिर में पानी वाले को खोजना।
🍴 🍴 🍴 🍴 🍴 🍴 😜
#अपनी संस्कृति, अपनी विरासत
(बनारस, 22 दिसंबर 2016)

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

बीएसएनएल मोबाईल मे घोटाले की आशंका

माननीय मंत्री जी,

मै प्रधानमंत्री मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का बीएसएनएल पोस्टपेड मोबाईल 9450960851 का पिछले लगभग आठ साल से उपभोक्ता हूँ. पिछले तीन वर्षो से हमे उक्त नंबर का मुद्रित बिल नही मिल रहा है. जबकि मैने कई बार इस तथ्य की शिकायत करते हुये यह अनुरोध किया कि मुझे ईमेल द्वारा या वेवसाईट के माध्यम से ही काल डिटेल्स व बिल का विस्तृत विवरण दिया जाय पर आज तक कोई सुनवाई नही हुई. जिससे मुझे यह जानकारी नही मिल पाती कि मेरे मोबाईल नंबरो से किन नंबरो पर काल व मैसेज का आदान प्रदान हो रहा है. 

कृपया अपने स्तर से मुझे मेरे मोबाईल नंबरो के काल व मैसेज डिटेल्स व बिल विवरण उपलब्ध कराने की कृपा करें.

chitravansh@gmail.com

रविवार, 4 दिसंबर 2016

ये कैसा प्रजातंत्र है? हम संसद नहीं चलने देगें : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 04दिसंबर2016, रविवार

कमाल है यार..........

आप कह रहे हो नोट बंदी में 50 दिन कस्ट सह लो.

अभी कह रहे हो सिनेमा में राष्ट्रगान के लिए खड़े हो जाओ,
कल को कहोगे सड़क पर थूको मत.
परसों दीवाल पर पेशाब करने से मना करोगे,
उसके अगले दिन रेलवे ट्रैक गन्दा करने से भी रोक दोगे.
उधर कचड़ा मत फेंको ये न करो वो न करो
फिर 2 से ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं करने दोगे,
उसके बाद सबके बच्चों को 2 साल तक सेना में जाने की भी ज़बर्दस्ती करोगे.
फिर बोलोगे बिधायक और सांसद के लिये शिक्षा और दो साल का सेना में नौकरी भी अनिवार्य होगा।।
झोलटंग समझ लिए हो क्या?
ये कैसा भारत बनाना चाहते हो?
आखिर हम अनपढ़, जाहिल, काहिल, घूसखोर, मक्कार लोग कहाँ जाएंगे, अंधेरगर्दि है क्या?
अजी हमारा कोई अधिकार हैं भी या नहीं ? हम भी इसी धरती पर पैदा लिए हैं।
ये कैसा प्रजातंत्र है?

हम संसद चलने नहीं देंगे.......
(बनारस, 04दिसंबर2016,रविवार)