शनिवार, 5 सितंबर 2026

विकास की कसौटी पर पानी पानी होता बनारस...../व्योमवार्ता

       विकास की कसौटी पर पानी पानी होता बनारस.....
                                                                   * व्योमेश चित्रवंश
                       काशी मात्र एक नगर नही वरन शाश्वत और सनातन है, जिसे महाकवि गालिब ने 'चिराग-ए-दैर' यानी दुनिया का रोशनदान कहा था। बाबा विश्वनाथ की नगरी, विश्व की सांस्कृतिक राजधानी, अध्यात्म का केंद्र और एक प्राचीन जीवंत शहर की आज चिंता उसके सांस्कृतिक भव्यता से आगे बढ़कर, उसके भौगोलिक अस्तित्व और उसके वर्तमान संकट पर है। हर साल मानसून आते ही इस पावन नगरी की एक दूसरी और विचलित करने वाली तस्वीर सामने आती है। आज हमारा बनारस हर मानसून में विकास की कसौटी पर पानी-पानी क्यों हो जाता है?हर साल मानसून आते ही इस पावन नगरी की एक दूसरी और विचलित करने वाली तस्वीर ही  सामने क्यूं आती है? गलियों और सड़कों का स्विमिंग पूल बन जाना, सीवर लाइनों का बैक-फ्लो मारना और वरुणा व गंगा नदियों के उफान से रिहाइशी इलाकों का डूब जाना यहाँ की नियति बन चुका है। जब हम 'स्मार्ट सिटी' की बात करते हैं, तो वाराणसी के संदर्भ में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या हमारी तकनीक और नीतियां प्रकृति के मिजाज को समझने में पूरी तरह विफल रही हैं?
              वर्तमान में, पहाड़ों और स्थानीय इलाकों में हुई भारी मानसूनी बारिश के कारण गंगा का जलस्तर 70 मीटर के पार पहुंच चुका है, जिससे सभी 84 घाट पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। इस साल भी गंगा का जलस्तर चेतावनी बिंदु को पार कर चुका है। वरुणा नदी में बैक-फ्लो के कारण सैकड़ों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। मणिकर्णिका घाट पर शवदाह छतों पर करना पड़ रहा है और वरुणा के तटीय इलाकों के 16 से अधिक मोहल्लों में बाढ़ का पानी घुसने से 3,800 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। यह कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि हमारी दोषपूर्ण प्रशासनिक नीतियों और नागरिक गैर-जिम्मेदारी का एक "मानव-निर्मित" (मैन-मेड) संकट है।
              यदि हम पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि वाराणसी की भौगोलिक स्थिति और ड्रेनेज क्षमता का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है. वाराणसी के हालिया इतिहास में 2013 और 2016 के दो साल सबसे विनाशकारी रहे। शोध बताते हैं कि वाराणसी का लगभग 32 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र फ्लड ज़ोन (बाढ़ प्रवण क्षेत्र) में आता है, जिससे सीधे तौर पर 8 लाख से अधिक की आबादी प्रभावित होती है। 2016 में गंगा का जलस्तर खतरे के निशान (71.26 मीटर) को पार कर 72.50 मीटर तक पहुंच गया था।2021 और 2022 में भी गंगा का जलस्तर 72 मीटर के करीब पहुंचा, जिससे मारुति नगर, सामनेघाट और कोनिया जैसे इलाकों में नावें चलानी पड़ी थीं।
                 प्राचीन इतिहास और पुराणों का संदर्भ लें तो ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में काशी को एक अद्भुत प्राकृतिक जल संवहन प्रणाली (नेचुरल ड्रेजिंग ग्रिड) वाले नगर के रूप में वर्णित किया गया है। स्कंदपुराण के काशी खंड में इस नगरी की जल-भौगोलिक सीमा को स्पष्ट करते हुए लिखा गया है: वरुणा च असी च द्वे नद्यौ सुरवन्दिते। तयोर्मध्ये च या काशी सा काशी सर्वमंगला॥ वरुणा और असी—ये दोनों देव-वंदित पवित्र नदियां हैं। इन दोनों नदियों के मध्य में जो 'काशी' बसी हुई है, वह सभी का मंगल करने वाली है ।
                 पौराणिक काल में काशी का भूगोल एक 'स्पंज सिटी' (वाटर सेंसिटिव सिटी ) जैसा था।शहर के भीतर दर्जनों तालाबों, कुंडों और झीलों का एक प्राकृतिक अंतःसम्बन्धित जाल था, जिसका वर्णन पुराणों में मिलता है: मत्स्योदरी च विख्याता मंदाकिनी तथापरा।सरोवराणि पुण्यानि काशीमध्ये स्थितानि वै॥ काशी के मध्य में मत्स्योदरी और मंदाकिनी जैसे अनेक पुण्यमयी सरोवर (तालाब) स्थित हैं । जब भी मानसून में गंगा उफान पर होती थी, तो अतिरिक्त पानी इन आंतरिक तालाबों में समा जाता था। यह न केवल बाढ़ को रोकता था, बल्कि भूजल स्तर को भी बनाए रखता था।
                     पद्म पुराण के अनुसार, शिव ने काशी को अपने त्रिशूल पर धारण किया है ('त्रिशूलं धृतवान् शंभुः...')। भौगोलिक दृष्टि से यह इस बात का प्रतीक है कि काशी का मुख्य हिस्सा ऊंचे कगार (जियोग्राफिकल एलिवेशन ) पर बसा था, जिससे गंगा की बाढ़ का पानी शहर में नहीं घुस पाता था। स्कंदपुराण के काशी खंड में भी अंकित है कि यह नगरी “वरुणा और असी नामक दो पवित्र जलधाराओं के बीच बसी काशी का भूगोल 'जल-संवेदनशील' (वाटर सेंसिटिव) था। अध्ययन बताते हैं कि “बनारस का प्राचीन ताना-बाना दर्जनों तालाबों, कुंडों और झीलों के एक प्राकृतिक तंत्र (स्पोंजी ड्रेनेज) से जुड़ा था।” जब भी मानसून में गंगा उफान पर होती थी, तो अतिरिक्त पानी इन आंतरिक तालाबों जैसे बेनियाबाग, लक्ष्मीकुंड, मत्स्योदरी गोदावरी, सप्तसागर, मंदाकिनी आदि  में समा जाता था।
                १८वीं शताब्दी में स्थानीय शासकों और नवाबों के समय, शहर की ढलान को व्यवस्थित करने के लिए एक विशाल भूमिगत इंजीनियरिंग का प्रयोग किया गया। इसके तहत 'शाही नाला' बनाया गया, जो आज भी शहर के मध्य से गुजरने वाला एक विशाल ईंटों का मुख्य नाला है। इसका मुख्य उद्देश्य भारी बारिश के दौरान शहर के अतिरिक्त पानी को तेजी से गंगा और वरुणा में गिराना था। इसी प्रकार 'हाथी नाला' भी एक बड़ी जल संवहन प्रणाली थी, जो इतनी चौड़ी थी कि इसके भीतर से पानी की विशाल मात्रा हाथी के वेग के समान बिना किसी रुकावट के गुजर सकती थी। इन नालों ने प्राकृतिक सरोवरों के पूरक के रूप में काम किया, जिससे शहर में कभी जल-जमाव नहीं होता था।
                    जनसंख्या बढ़ने के साथ प्राकृतिक जल संवहन प्रणाली पर दबाव बढ़ा, जिसके बाद अलग-अलग कालखंडों में कृत्रिम नालों और सीवर ग्रिड्स का विकास किया गया। १९वीं शताब्दी के अंत में विशेषकर इंजीनियर जेम्स प्रिंसेप के योगदान के बाद, अंग्रेजों ने वाराणसी में पहली बार संगठित पाइपलाइन आधारित सीवरेज और ड्रेनेज ग्रिड बिछाया। उन्होंने तत्कालीन २ लाख की आबादी के लिए भेलूपुर वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट की नींव रखी। अंग्रेजों ने 'शाही नाले' को मुख्य सीवर ट्रंक लाइन के रूप में तब्दील कर दिया, जो कि इसकी क्षमता से अधिक का बोझ था।  शहर के कृत्रिम नालों और सीवर ग्रिड्स का विकास की योजनायें तो बनी पर जल संवहन प्रणाली मे मानव निर्मित
गलतियां यहीं से होनी प्रारंभ हुई। जैसा कि काशी के अध्येता महेश गोगटे अपनी पुस्तक “दि सैक्रेड वाटर्स आफ वाराणसी ” में लिखते हैं कि “औपनिवेशिक काल से ही बनारस को एक 'शुष्क शहर' (ड्राई सिटी) बनाने की भूल शुरू हुई, जिसके तहत प्राकृतिक जल निकायों को पाटकर जमीन और पानी को जबरन अलग किया गया।”
                       स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर पिछले चार दशकों में, गंगा की स्वच्छता और वाराणसी के सीवर ग्रिड को सुधारने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर बड़े पैमाने पर धन तो आवंटित किया पर वह सही ढंग से उपयोग होने के बजाय भ्रष्टाचार के खेल मे बंदरबांट हो गया।
               गंगा एक्शन प्लान की शुरूआत 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बनारस से ही किया था जिसका उद्देश्य था नदी में गिरने वाले घरेलू सीवर को रोकना, सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाना और गंगा प्रदूषण को कम करना। इस के अंतर्गत दीनापुर में पहला बड़ा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हुआ। कुछ मुख्य नालों की टैपिंग शुरू हुई पर ड्रेनेज और सीवर लाइनों को अलग नहीं किया गया। आबादी बढ़ने के कारण प्लांट छोटे पड़ गए और गंगा में सिल्टेशन (गाद) की समस्या को नजरअंदाज किये जाने से समस्या का प्रभावी समाधान नही आ सका।
                               सन 2005 से 2014 के यूपीए कार्यकाल मे जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय अर्बन रिन्युअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) में वाराणसी के लिए ₹५००+ करोड़ से शहर के बुनियादी ढांचे के सुधार, सीवर लाइनों का विस्तार और पुराने नालों का आधुनिकीकरण के साथ शहर के बाहरी इलाकों (जैसे ट्रांस-वरुणा क्षेत्र) में आंशिक रूप से नई सीवर लाइनें बिछाई गईं। परंतु खराब कोऑर्डिनेशन के कारण योजना समय पर पूरी नहीं हुई। पुरानी काशी की तंग गलियों के ड्रेनेज में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ।
नरेन्द्र मोदी के वाराणसी से सांसद और देश के प्रधानमंत्री बनने पर नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरूआत हुई जिसका उद्देश्य गंगा का प्रदूषण कम करना, संरक्षण और पुनरुद्धार था। इसमें घाटों का नवीनीकरण, आधुनिक एसटीपी (सीवर ट्रीटमेण्ट प्लांट) का निर्माण और नालों की 100% टैपिंग जैसी योजनायें शामिल है।वाराणसी के 17 परियोजनाओं ₹1,469 करोड़ स्वीकृत किये गये जिसमे गोईढहा, दीनापुर (140एमएलडी) और रमना (50एमएलडी) जैसे अत्याधुनिक एसटीपी चालू हुए। ऊपरी इलाकों में पानी की शुद्धता बढ़ी और जलीय जीवों में सुधार हुआ परंतु ड्रेनेज ओवरफ्लो और 'बैक-फ्लो' की समस्या अब तक हल नहीं हुई। सीपीसीबी के अनुसार फेकल कोलीफॉर्म का स्तर अभी भी चिंताजनक है। नदी के तल की गाद निकाले बिना घाटों को कंक्रीट से पाटने के कारण जल-जमाव बढ़ गया।
             हाल ही में किए गए रिमोट सेंसिंग और भू-स्थानिक अध्ययनों (जियोस्पैशल स्टडीज) ने वाराणसी के बाढ़ संकट को लेकर चौंकाने वाले वैज्ञानिक तथ्य सामने रखे हैं।काशी हिंदू विश्वविद्यालय और सर्वे ऑफ इंडिया के डेटा पर आधारित एक वैज्ञानिक शोध पत्र (फ्लड रिस्क एण्ड इंपैक्ट एनालिसिस आफ वाराणसी) के अनुसार, वाराणसी का लगभग 32 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र 'एक्टिव फ्लड ज़ोन' में तब्दील हो चुका है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि “1970के दशक के बाद से बाढ़ के मैदानों (फ्लडप्लेन्स) में अनियंत्रित शहरी विस्तार ने ही इस विभीषिका को तीव्र किया है।” गूगल अर्थ इंजन (जीईई) के द्वारा किये लिये गये सन 2017 से 2023 के बीच के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले एक नवीनतम वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि “फ्लड-प्रोन ज़ोन (बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों) में कंक्रीट के पक्के निर्माणों के कारण 8,19,472 लोग और 7,578हेक्टेयर क्षेत्र सीधे तौर पर गंभीर खतरे की जद में आ चुके हैं।”
                   इतिहास साक्षी है कि काशी का संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और प्रशासनिक भूलों की क्रमिक परिणति है। वैज्ञानिक और पर्यावरणविद आज वाराणसी को "इंजीनियर्ड कैटास्ट्रोफी" (मानव-निर्मित आपदा) का सटीक उदाहरण मान रहे  हैं। इसके पीछे कई बड़े तकनीकी और नीतिगत दोष जिम्मेदार हैं।पिछले कुछ वर्षों में ही हजारों ट्रक मलबे और कंक्रीट को गंगा के तटीय क्षेत्रों में डंप किया गया है जिस तरह से घाटों के मूल स्वरूप को बदलकर 'कंक्रीट के जंगल' खड़े किए जा रहे हैं, उसने गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह बाधित कर दिया है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां गंगा को सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी। गंगा को बचाने के नाम पर नदी में रेत/बालू के खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से पहाड़ों से बहकर आने वाली लाखों टन गाद (सिल्ट) हर साल वाराणसी में गंगा की तलहटी में जमा हो रही है। उत्खनन न होने से नदी का तल (रिवरबेड) लगातार ऊंचा हो गया है। नदी गहरी न होने के कारण अब कम पानी आने पर भी जलस्तर तेजी से ऊपर (वर्टिकल राइज) उठता है और पानी सीधे घाटों व तटीय बस्तियों को डुबो देता है। गंगा के बीचों-बीच रेत के बड़े-बड़े टापू बन गए हैं, जिससे नदी की प्राकृतिक चौड़ाई और जल धारण क्षमता आधी रह गई है। पर्यावरणविदों और नदी-वैज्ञानिकों के अनुसार,यह भयानक तकनीकी दुष्प्रभाव पूरी तरह से हम मानव प्रजाति द्वारा प्राकृतिक व्यवस्था मे अवरोध उत्पन्न किये जाने से पैदा हुआ है।
इसी तरह वाराणसी को पहचान देने वाली वरूणा के पुनरूद्धार के नाम पर लगभग ₹201 करोड़ की लागत से बना 'वरुणा कॉरिडोर' वैज्ञानिक दूरदर्शिता के अभाव का सबसे बड़ा सुबूत है।
नदी तल की खुदाई के बिना पक्की दीवारें बना कर नदी के प्रवाह को जबर्दस्ती रोकने की कोशिश कहें या वरूणा के नाम पर सरकारी खजाने की लूट ने जहां वरूणा के स्वाभाविक प्रवाह को सीमित कर दिया वहीं बाढ़ की स्थिति मे जल प्रवाह को अनियंत्रित।आईआईटी के जल-विशेषज्ञों और विद्वानों का मानना है कि कॉरिडोर बनाते समय सबसे पहला काम वरुणा नदी की तलहटी की गहरी सिल्टिंग/ड्रेजिंग (सफाई और खुदाई) करना था, ताकि नदी की गहराई बढ़े पर प्रशासन ने गहराई बढ़ाने के बजाय नदी के प्राकृतिक ढलान और 'फ्लडप्लेन' को मिट्टी से पाट दिया और दोनों किनारों पर कंक्रीट की दीवारें (रिटेनिंग वाल) खड़ी करके नदी को एक संकरे नाले (चैनल) में तब्दील कर दिया।परिणाम स्वरूप अब मानसून में जैसे ही गंगा का बैक-वाटर (उल्टा पानी) वरुणा में आता है, गहराई न होने के कारण वरुणा का पानी तुरंत उफनकर दीवारों को लांघ जाता है और कोनिया, शैलपुत्री,सरैया, हुकुलगंज, हरमिटिया, सिकरौल जैसे इलाकों को जलमग्न कर देता है।
वाराणसी के इस हाल के लिए केवल भारी बारिश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। स्थानीय प्रशासन और योजनाकारों की कई ऐसी नीतियां हैं जिन्होंने इस समस्या को और गंभीर बनाया है।'कंक्रीट का जंगल'  बनते शहर मे अनियोजित व अवैज्ञानिक निर्माण सहित विकास के नाम पर किए जा रहे बड़े प्रोजेक्ट्स पर हमेशा सवाल उठाए हैं। गंगा के ठीक किनारे बने बड़े पक्के निर्माणों (जैसे नमो घाट का आधुनिकीकरण या विश्वनाथ धाम जैसे तटीय कॉरिडोर्स) के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह और चौड़ाई प्रभावित हुई है। नदी के फ्लडप्लेन (बाढ़ क्षेत्र) को कंक्रीट से पाट देने के कारण पानी को फैलने की जगह नहीं मिलती। बनारस की ड्रेनेज व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी लगभग 200 साल पुराने 'शाही नाले' और ब्रिटिशकालीन ईंटों के ड्रेनेज पर निर्भर है। शहर की आबादी तो लाखों में बढ़ गई, लेकिन नालों की क्षमता वैसी ही रही। प्रशासन ने हाल ही में 13 पुराने वार्डों के सीवरेज बदलने के लिए ₹527 करोड़ का बजट स्वीकृत किया है, लेकिन यह कदम दशकों की देरी के बाद उठाया गया है। वरुणा नदी के सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर 'वरुणा कॉरिडोर' में प्राकृतिक ढलान को बनाए रखने के बजाय केवल किनारों पर पक्का निर्माण कर दिये जाने का नतीजा यह है कि आज वरुणा किनारे की रिहाइशी सोसायटियों की पहली मंजिलें पानी में डूबी हुई हैं।
          वाराणसी विकास प्राधिकरण के नियमों के बावजूद बाढ़ प्रभावित निचले इलाकों (फ्लड प्रोन जोन) में धड़ल्ले से कॉलोनियां बढ़ती गई । जब बाढ़ आती है, तब अधिकारी "अवैध निर्माण सील करने" की चेतावनी देते हैं, लेकिन सूखे के दिनों में वही तंत्र आंखें मूंदकर निर्माण होने देता है।
ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। यदि प्रशासन की नीतियां दोषपूर्ण हैं, तो काशी के नागरिकों का व्यवहार भी इस संकट को बढ़ाने में बराबर का भागीदार है। हम बनारसियों द्वारा  बनारस की गलियों और सड़कों पर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, रैपर्स और घरेलू कचरा खुले में फेंकना आम है। मानसून के दौरान यही 'फ्लोटिंग वेस्ट' (तैरता कचरा) बहकर गली-पिट्स और ड्रेनेज के मुहानों को पूरी तरह चोक (जाम) कर देता है। 15 मिनट की तेज बारिश में सड़कों के डूबने का सबसे बड़ा कारण यही नागरिक लापरवाही है। बनारस कभी तालाबों और कुंडों का शहर हुआ करता था (जैसे लक्ष्मीकुंड, बेनियाबाग, बेदब्यास,सुरज कुण्ड, सगरा तालाब, सोनिया पोखरा, सिकरौल पोखरा, लक्ष्मीकुंड, पितरकुण्डा जैसे अनेकों पोखरे बावली व कूप)। ये तालाब 'वॉटर बफर' का काम करते थे—यानी बारिश का अतिरिक्त पानी इनमें जमा हो जाता था। लेकिन जनता ने धीरे-धीरे इन तालाबों को पाटकर उन पर मकान और दुकानें खड़ी कर लीं। जब पानी के पास जाने की कोई जगह नहीं बची, तो उसने सड़कों और घरों का रुख कर लिया।सस्ते भूखंडों के लालच में नागरिकों ने सामनेघाट, नगवा और वरुणा के तटीय निचले इलाकों में बिना नक्शा पास कराए और बिना सुरक्षा मानकों के बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर लीं। आज वे परिवार अपनी जीवनभर की कमाई को पानी में डूबते देखने को विस्थापित हैं।
काशी को इस सालाना जल-समाधि से बचाने के लिए प्रशासन को अपनी नीतियों में "पारिस्थितिकीय सुधार" (इकोलाजिकल करेक्सन) करने होंगे। इसके लिये जरूरी है कि केवल बरसात मे जलजमाव व बाढ़ की समस्या होने तक ही नही वरन इसके लिये एक बृहद वार्षिक योजना तैयार कर के उस को कार्यान्वित किया जाये। पर्यावरण नियमों के दायरे में रहकर, गंगा के बीच में जमा हो चुके रेत के टीलों और सिल्ट को 'वैज्ञानिक ड्रेजिंग' के जरिए निकाला जाए, ताकि नदी का तल गहरा हो और उसकी जल-धारण क्षमता बढ़े। वरुणा नदी के तल की भारी खुदाई (डीप ड्रेजिंग) कराई जाए। कॉरिडोर के उन हिस्सों को री-डिजाइन किया जाए जो पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकते हैं।गंगा और वरुणा का जलस्तर बढ़ने पर सीवर का पानी वापस शहर में न आए (बैक फ्लो), इसके लिए सभी प्रमुख नालों के मुहाने पर आधुनिक मैकेनिकल फ्लड गेट्स और पानी को बाहर फेंकने के लिए हाई-कैपेसिटी ऑटोमैटिक पंपिंग स्टेशन्स चालू किए जाएं। विकास प्राधिकरण अपनी जिम्मेदारी के प्रति पूरी तरह ईमानदार हो कर एनजीटी (NGT) के नियमों के तहत नदियों के फ्लड-प्लेन (बाढ़ क्षेत्र) में किसी भी नए पक्के निर्माण को पूरी तरह प्रतिबंधित करे।शहर के पारंपरिक नालों को आधुनिक स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम से बदलने के साथ साथ नदियों के जलस्तर बढ़ने पर पानी को बाहर फेंकने के लिए बड़े और आधुनिक हाई-कैपेसिटी पंपिंग स्टेशन लगाए जाने चाहिये। नालियों में कचरा फंसने (फ्लोटिंग मैटेरियल्स) की समस्या को रोकने के लिए वार्ड स्तर पर कचरा प्रबंधन दुरुस्त करते हुये नालों के मुहाने पर आयरन मेश (लोहे की जालियां) लगानी होंगी। वरुणा और गंगा के किनारों (फ्लड जोन) पर किसी भी नए निर्माण को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इन क्षेत्रों में पेड़ लगाकर ग्रीन बफर जोन विकसित करना होगा, जो बाढ़ की तीव्रता को सोख सके।शहर के बाहरी इलाकों और बड़े होटलों, शिक्षण संस्थानों , बड़े परिसर वाले राजकीय कार्यालयों ,पार्कों में बड़े तालाबों वॉटर रिटेंशन पोंड्स या वाटर हार्वेस्टिंग पिट्स का पुनरुद्धार किया जाए, ताकि बारिश का अतिरिक्त पानी सीधे सड़कों पर आने के बजाय जमीन में समा सके।
                  वैदिक काल की प्राकृतिक जल संवहन प्रणाली से लेकर मुगलों के शाही नाले, अंग्रेजों के सीवर नेटवर्क और आज की अरबों रुपये की 'नमामि गंगे' योजना तक—काशी ने इंजीनियरिंग के कई दौर देखे हैं। वाराणसी के प्रशासन, विकास प्राधिकरण ही नही हम आम बनारसियों को भी यह ध्यान रखना होगा कि वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक सनातन संस्कृति की धरोहर है। इसे सिर्फ कंक्रीट और लाइटों से चमकाकर 'स्मार्ट' नहीं बनाया जा सकता। वाराणसी केवल कंक्रीट, सड़कों और आधुनिक लाइटों के ढांचे से 'स्मार्ट' नहीं बन सकती। असली स्मार्टनेस इस प्राचीन शहर के पारंपरिक भूगोल, इसकी सहायक नदियों (वरुणा और असी) और इसके प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का सम्मान करने में है। हमें ही इसके प्राचीन भूगोल, इसकी सहायक नदियों और इसकी प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का सम्मान करना होगा। जब तक प्रशासन दूरदर्शी और वैज्ञानिक नीतियां नहीं अपनाएगा और जब तक काशी की जनता नागरिक अनुशासन का पालन नहीं करेगी, तब तक हर मानसून में विकास की यह चमक पानी में बहती रहेगी। 
काशी, भाद्र कृष्णपक्ष दसमी,सं02083वि0, शनिवार, 5सितंबर2026
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