शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : बासंतिक नवरात्रि 08अप्रैल 2016, शुक्रवार

08 अप्रैल 2016, शुक्रवार

बासंतिक नवरात्रि
आज से बासंतिक नवरात्रि प्रारंभ हुआ। पर्यावरण असंतुलन के कारण शहर के तापमान मे अप्रत्याशित बृद्धि ने व्यवस्था अस्त व्यस्त कर दिया है। सुबह १० बजे तक सूरज के तेज को झेलते हुये तापमान ४२ डिग्री तक पहुँच जाना कही से भी उचित नही कहा जा सकता । उस पर विकास के नाम पर अंधाधुँध प्राकृतिक संसाधनो का दोहन, सड़क के चौड़िकरण के लिये वृक्षो की मनमानी कटाई व विकल्प के नाम पर केवल मौखिक आश्वासन । पता नही कब इस सोच को सकारात्मक दिशा मिल सकेगी?
आज से हमारा नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हुआ। हमारा मानना है कि नवरात्रि का व्रत जहॉ रितु संक्रमण मे शरीर के अवयवो को विकाररहित करते हुये एक नया कलेवर देता है वही आध्यात्मिक दृष्टि से मन व आत्मा को भी एक उत्कृष्ट अवसर देता है स्वयं के मूल्यांकन व स्वयं को आत्मसाक्षात्कार करने का। मेरे लिये नवरात्रि व्रत का दूसरा उद्देश्य ही महत्वपूर्ण है।
इस बार पता नही क्यों होली के बाद से ही पेट कुछ ठीक नही चल रहा है, उम्मीद थी कि दो चार दिन मे ठीक हो जायेगा। दवाये मेरे लिये सदैव से परहेज की विषयवस्तु रही है, पर अभी तक इस बार ऐसा नही हुआ अंतत: दवा की शरण मे जाना ही पड़ा, उम्मीद है कि कल तक ठीक हो जायेगा।
दिन मे आकाशवाणी वाराणसी मे रिकार्डिग थी। अम्बेदकर पर जन्मदिवस पर वार्ता के लिये, बीच दूपहरी मे जाना हुआ पर सड़को की ताप के बीच कही गलियो मे बचे इक्का दुक्का पेड़ यह अहसास कराने से नही चूक रहे थे कि उनका महत्व पूर्व की तुलना मे और बढ़ गया है।
बनारस मे नवरात्रि के पर्व का विशेष महत्व है यहॉ नौ दिनो के लिये नौ अलग देवियो के नौ अलग आस्थानो के दर्शन की परंपरा है जिसका बनारसी लोग बड़ी श्रद्धा व विश्वास से पालन करते है। इस दौरान काशी में स्थित देवी के अलग-अलग नौ स्वरूपों की पूजा की जाएगी। मान्यता है कि नौ दिनों में देवी के इन स्वरूपों के दर्शन करने से सभी परेशानियां दूर हो जाती है। देवी मां भक्तों की हर मन्नत पूरी करती हैं। मान्यता है कि काशी भारत में एक मात्र स्थान है, जहां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री रूपी नव दुर्गा मंदिर में विराजमान हैं। नवरात्रि के दौरान यहां दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। कई स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि 13वीं शताब्दी के समय से ही काशी में नव दुर्गा मंदिर अस्तित्व में है। शास्त्रों में भी वर्णन मिलता है कि दुर्गा के अलग-अलग रूप आठों दिशाओं से काशी की रक्षा करती हैं।
1. शैलपुत्री देवी:
नवदुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री का है। काशी के अलईपुरा इलाके में इनका मंदिर बना है। हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। शैलपुत्री देवी का वाहन वृषभ है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल है। इन्हें पार्वती का स्वरूप भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप ने ही शिव की कठोर तपस्या की थी। कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से शादी में आ रही रुकावटें दूर हो जाती हैं।
2. ब्रह्मचारिणी देवी:
देवी के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी देवी का मंदिर दुर्गाघाट में स्थित है। इस स्वरूप में देवी तप का आचरण करने वाली हैं। ऐसे में उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। उनका स्वरूप ज्योतिर्मय और बेहद भव्य है। इनके दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। जो भक्त देवी के इस रूप की आराधना करता है, उसे साक्षात परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
3. चंद्रघंटा देवी:
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी देवी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। काशी में इनका मंदिर चौक इलाके में स्थित है। माता का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र बना हुआ है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है। इनके दस हाथ होते हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने की होती है।
4. कुष्मांडा देवी:
यह देवी मां का चौथा स्वरूप है। इनका मंदिर दुर्गाकुंड में स्थित है। मान्यता है कि देवी मां ने अपनी हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था। इस कारण उनका नाम कुष्मांडा देवी हो गया। इन्हें सृष्टि की आदि स्वरूपा माना जाता है। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, फूल, अमृत पूर्ण कलश, चक्र और गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। देवी का वाहन सिंह है।
5. स्कंदमाता देवी:
आदि शक्ति का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता है। जैतपुरा इलाके में इनका मंदिर स्थित है। स्कंद कुमार यानि कार्तिकेय की मां होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। देवी मोर की सवारी करती हैं और कमल पर विराजमान रहती हैं। इनकी गोद में बाल स्कंद कुमार बैठे रहते हैं। इसी कारण से इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। संतान सुख के लिए इनका दर्शन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि पूजा से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्त की गोद भर देती हैं।
6.कात्यायनी देवी:
देवी का छठा स्वरूप कात्यायनी देवी है। काशी में इनका मंदिर सिंधिया घाट मोहल्ले में है। माना जाता है कि देवी ने महर्षि कात्यायन की बेटी के रूप में अवतार लिया था। इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। ऋषि कात्यायन ने लगातार सप्तमी, अष्टमी और नवमी को इनकी पूजा की थी। दशमी के दिन देवी ने महिषासुर का वध किया था। इनका स्वरूप भव्य और दिव्य है। इनकी अराधना से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहा जाता है कि रुक्मिणी ने भी कात्यायनी देवी की आराधना कर कृष्ण को पति के रूप में पाया था।
7. कालरात्रि देवी:
देवी मां का सातवां स्वरूप कालरात्रि है। इनका मंदिर कलिका गली में है। इनके शरीर का रंग घने अंधेरे की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। देवी की तीन आंखें हैं। ये ब्रह्मांड की तरह गोल हैं। इनका वाहन गर्दभ है। देवी अपने दाएं हाथ की वर मुद्रा से सभी भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। देवी का यह स्वरूप देखने में काफी भयानक है, लेकिन इनका दर्शन करना हमेशा शुभ फल देता है। इसी कारण इनका नाम शुभ कारिणी भी है।
8. महागौरी देवी:
महागौरी देवी दुर्गा का आठवां स्वरूप है। विश्वनाथ गली में इनका मंदिर है। यहां महागौरी को अन्नपूर्णा देवी के रूप में भी पूजा जाता है। महागौरी देवी वृषभ की पीठ पर विराजमान रहती हैं। उनके माथे पर चांद का मुकुट सजा रहता है। मां अपने चार हाथों में शंख, चक्र, धनुष और बाण लिए हुए हैं। उनके कानों में रत्न जड़ित कुंडल झिलमिलाते हैं। महागौरी देवी अपने भक्तों को सौंदर्य प्रदान करती हैं।
9. सिद्धिदात्री देवी:
यह आदि शक्ति माता का नौवां रूप है। सिद्धिदात्री मंदिर बुलानाला में स्थित है। मां भगवती का यह स्वरूप भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां देता है। वह श्रद्धालुओं की सभी कामनाओं को पूरा करती हैं। माना जाता है कि देवी के नौ रूपों की पूजा तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक की सिद्धिदात्री की पूजा नहीं कर ली जाती है।
     आज से ही हम सनातनधर्मियों के नववर्ष विक्रम संवत की शुरूआत हो रही है। घर मे पूजा पाठ व उत्सव का माहौल है। बच्चो ने ऊँ कार युक्त भगवा ध्वज छत पर लगा दिया है। मित्रो के बीच शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी चल रहा है। विश्वास है मॉ भगवती आने वाले वर्ष मे हम सबको सुख समृद्धि व स्वास्थ्य से परिपूर्ण करेगीं।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

व्योमेश चित्रवंश की कवितायें: मॉ, (03अक्टूबर1999)

                         मॉ,

ओ मेरी जन्मदात्री, मेरी अनकही मॉ
तूने ये क्यों नही सोचा
कि तू भी तो एक लड़की थी
बिलकुल मेरी तरह
आज से बीस पचीस बरस पहले
क्यों भूल गयी तू कि मॉ होना ही
स्त्री के लिये सबसे अनमोल तोहफा है
पर नही, तू तो निर्दय थी।
ओ मेरी जन्मदात्री, मेरी निष्ठुर मॉ
तूने ये भी नही सोचा
कि कूड़े की ढेर पर फिंके मेरे नन्हे से तन को
खा जायेगे कुत्ते स्वाद ले ले कर
सच बता?
क्या तूझे बिलकुल दया नही आयी थी
अपने ही शरीर के अंश रहे
मेरे रक्त मज्जा से लिपटे कोमल तन पर,
क्या तू बिलकुल ही हृदयहीना थी,
ओ मेरी जन्मदात्री मेरी अनकही मॉ
तूने क्या ये भी नही सोचा कि मै भी
इंदिरा, ऊषा या टेरेसा या क्यूरी बन सकती हूँ
पर तूने तो मुझे मार डाला था मुझे फेंक कर
उस कूड़े की ढेर पर
क्या तूझे बिलकुल भी दया नही आयी थी
मेरी टुकुर टुकुर करती टिमटिम ऑखो पर,
हॉथ की मुट्ठियों मे बंधे
मेरे भविष्य के पन्नो पर
अंगूठे को चूसती अपनी मॉ को खोजती
उस दूधमुँही बच्ची पर
जो बिलकुल नयी थी
तुम्हारे इस क्रूर दुनिया मे,
ओ मेरी जन्मदात्री मेरी पाषाणहृदया मॉ
क्या कहूँ तुझे, तुम खुद ही बतलाओ
मेरी जन्मदात्री या मेरी हत्यारिन?
क्या तूझे आज भी अपराधबोध नही ग्रसता
मेरी हत्या के प्रयासो पर?
क्या लज्जित नही हुई थी तू
मुझ अबोली को फेकते हुये
कूड़े के ढेर पर?
मै जानती हूँ तुम्हारे पास कोई उत्तर नही है
मेरे सवालो का,
क्योकि हर बार खुद से भी यही पूछ कर
रह गयी हो तुम उत्तरहीन।
है ना मेरी जन्मदात्री मेरी अनकही मॉ ।

(अक्टूबर १९९९ मे कूड़े पर मिली एक नवजात बच्ची की खबर से प्रेरित लिखी भावनायें)

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : बुढ़वा मंगल , 5 अप्रैल 2015 मंगलवार

                     आज बुढ़वा मंगल है। बनारस मे बुढ़वा मंगल के त्यौहार से ही होली का समापन माना जाता है। वैसे तो देश में प्रत्येक स्थान पर होली अलग-अलग तरह से मनाई जाती है, किंतु  बनारस में इसे मनाने का अपना एक निराला ही अन्दाज़ है। बनारस मे कायदे से होली रंगभरी एकादसी से शुरू होकर आज के दिन तक मनायी जाती है।बुढ़वा मंगल होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है, 'वृद्ध अंगारक' पर्व भी कहते हैं। नवान्नेष्टि यज्ञ माघ मास की पूर्णिमा पर प्राय: "होली का डांडा" रोप दिया जाता है और इसी दिन से लोग इसके समीप लकड़ियाँ और गाय के गोबर से कण्डे इकट्ठा करने लगते हैं। लकड़ियों को इकट्ठा करने का यह काम फाल्गुन की पूर्णिमा तक चलता है। इसके बाद उसमें आग लगाई जाती है। यह भी एक प्रकार का यज्ञ है। इसे नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता है। एक महत्त्वपूर्ण कथन यह भी है कि इस दिन खेत से उपजे नये अन्न को लेकर इस यज्ञ में आहुति दी जाती है और उसके बाद प्रसाद वितरण किया जाता है।होलिका के पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चरण किया जाता है-

असृक्याभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।।

होलिका के दिन खेत में उगने वाले नये अन्न को लेकर यज्ञ में हवन करने की परंपरा है। इस अन्न को 'होला' कहा जाता है। इसीलिए इस पर्व को भी लोग 'होलिकोत्सव' कहते हैं। बनारस की परंपरा में यह पर्व होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है।इस मंगल को 'बुढ़वा मंगल' इसलिए भी कहते हैं कि यह वर्ष के आखिरी मंगल के पूर्व का मंगल होता है। मंगल का अभिप्राय मंगल कामना से है, इसलिए बनारस में इस उत्सव को मंगलवार को पूर्ण माना जाता है। होली को प्राय: उत्सव समाप्त हो जाता है, परंतु वाराणसी में इसके बाद मिलने-जुलने का पर्व प्रारम्भ होता है। लोग घर-घर जाकर अपने से बड़ों के चरणों में श्रद्धा से अबीर और गुलाल लगाते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं तथा छोटों को आशीर्वाद देते हैं। विभिन्न कार्यक्रम 'बुढ़वा मंगल' पर्व के बाद वाराणसी में नृत्य, संगीत, कवि सम्मेलन एवं महामूर्ख सम्मेलन चलते रहते हैं। लोग बड़े उत्साह से इन सभी सम्मेलनों में जाते हैं। भारत की पवित्र नदियों में से एक गंगा नदी में लोग नौका विहार भी करते हैं और साथ ही गंगाजी की पूजा भी करते हैं। इसी उल्लास के साथ आने वाले नूतन वर्ष की मंगल कामना करते हुए वाराणसी में यह पर्व मंगलवार को होली के बाद समाप्त समझा जाता है। मेले का आयोजन होली के अगले मंगलवार को आयोजित होने वाला 'बुढ़वा मंगल' का मेला बनारसी मस्ती और जिन्दादिली की एक नायाब मिसाल है। ऐसी मान्यता है कि होली, जिसमें मुख्यतः युवाओं का ही प्रभुत्व रहता है, को बुजुर्गों द्वारा अब भी अपने जोश और उत्साह से परिचित कराने का प्रयास है- 'बुढ़वा मंगल' का मेला। बनारस के इस पारम्पिक लोक मेले से हिन्दी साहित्य के शिरोमणि भारतेंदु हरिश्चंद्र का भी जुड़ाव रहा है। बनारस के राजपरिवार ने भी इस परंपरा को अपना समर्थन दिया। मेले के आयोजन को कई उतार-चढाव से भी गुजरना पड़ा, किन्तु आम लोगों की सहभागिता और दबाव ने प्रशासन को भी इस समारोह के आयोजन में तत्परता से जुड़ने को बाध्य किया। गंगा की लहरों पर सफेद लकदक कुर्ता पजामा या धोती पहने सर पर बनारसी टोपी सजाए छोटी-बड़ी नौकाओं तथा घाटों पर बैठे संस्कृतिप्रेमी व सुधि दर्शकगण इस सांस्कृतिक नगरी की पारम्परिकता को एक नया आयाम देते हैं। पान की गिलौरियो के बीच गुलाब जल की हल्की बौछारे व गुलाब की पंखुड़ियॉ के साथ चैता व होरी की तान का आनन्द सन १७३०-३१ से लगातार चली आ रही है। बीत मे एक दो अवरोधो के चलते कार्यक्रम स्थगित हुआ पर बनारस के संस्कृतिप्रेमियो ने फिर जीवन्तता दी।
      तीन वार तेरह त्योहार वाले इस शहर के लोग जिन्दगी जीना और मस्ती के साथ जीना अपनेवआराध्य महादेव शंकर से सीखा है और उसी फक्कड़पन से जी रहे है।
कहावत है पाथर पड़े चाहे बज्जर
हमरे ठेंगे से।
(बनारस को जानने वाले मित्र सही शब्द का चयन स्वयं कर लेगें)
बनारस मे हर शख्स आज जीता है। आने वाले कल की न उसे चिन्ता है न फिकर, तभी तो वह आने वााले तल को भी अपने उसी पुरूषॉग पर ही रखता है।

बुधवार, 30 मार्च 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : मि० होपलेस, 30 मार्च 2016

आजकल हम  राबर्ट एच शूलर की बेस्टसेलर पुस्तक tough times never last but tough people do को लगभग १५-१६ साल बाद दूबारा पढ़ रहे है। १९८८ मे प्रकाशित इस मोटिवेसनल किताब ने हमे बहुत प्रभावित किया है क्योकि इसके सिद्धान्त बेहद व्यवहारिक व सुगम है जिन्होने हमे कठिन समय मे भी बड़ा बल दिया है।
पर व्यवहारिक जीवन का एक दूसरा पहलू भी है निरासाजनक व नकारात्मक पहलू। इस अवधारणा को मानने वाले लोग संसार के हर तथ्य, प्रकृति के हर भेंट, व हर मानवीय संबंधो को एक शव विच्छेदनात्मक दृष्टि ( पोस्टमार्टम एनालसिस) से देखते है। उनका 'क्यो' विश्लेषण इतना मजबूत होता है कि वे किसी भी तथ्य के सकारात्मक पहलू पर नकारात्मक सवाल उठा देते है और निश्चयात्मक रूप से अंतिम निर्णय सुना देते है कि किसी भी कार्य का को सकारात्मक रूप से परिणति किया ही नही जा सकता। मुश्किल यह है कि ऐसे लोग स्वयं को विश्व के सबसे बुद्धिमान व विश्लेषक मानते है। अगर ऐसे व्यक्ति आप के सुख दु:ख मे शामिल हो गये तो क्या कहना? आप की थोड़ी सी खुशी व संतोष तो पलीता लगा कर कपूर जैसे यूँ उड़ जायेगा कि क्या कहने।
हमारा वास्ता ऐसे लोगो से प्राय: पड़ता रहता है, पेशेगत मजबूरियो व आपसी सम्बंधो को ख्याल मे रखते हुये हम इन्हे मना भी नही कर पाते पर बचते बचाते व मजबूत ईच्छाशक्ति के बावजूद भी हम जैसे लोग भी जानने समझने के बावजूद भी ऐसे लोगो व उनके विचारो के हल्के फुल्के प्रभावक्षेत्र मे आ ही जाते हैं।
           भगवान बचाये ऐसे लोगो से। हमने ऐसे लोगों का नाम मि० होपलेश व श्रीमान निराश जी रखा है।
            ताजी घटना, मेरे एक परिचित वकील साहब है , जानकार है पर दृष्टि वही निराशावादी। दोतीन साल पहले वे बीमार पड़े, अच्छे डाक्टरों को दिखाया गया , लाभ होना भी प्रारंभ हुआ। पर वकील साहब ठहरे विश्लेषणात्मक व्यक्तित्व के धनी। उन्होने कुछ इधर उधर का अध्ययन किया। इस तरह के कुछ बिगड़े घटनाओं पर विचार कर के यह अवधारणा स्थापित कर लिया कि ऐसे सभी लक्षण कैंसर बीमारी के है। और चिकित्सक लोग उन्हे बता नही रहे है पर है उन्हे कैंसर ही। फिर क्या था मि० होपलेस के साथ साथ पूरा परिवार परेसान। भगवान का शुक्र है कि वे ठीक हो गये। फिर उन्हे लगा कि वे मधुमेह से भयंकर  रूप से ग्रसित है और उनका मधुमेह स्तर से पार का है। अब उन्होने जो अधिकतम परहेज हो सकता है शुरू कर दिया। नतीजा वही ढाक के तीन पात। इनकी  सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे किसी को अपने से अच्छा व ज्यादा मानने को तैयार भी नही चाहे वह रोग हो या जानकारी। संपर्क हो या सामाजिकता। इसलिये खुद को खुद की वास्तविकता से परे दिखाने की कोशिस मे वह स्वयं के साथ औरो के निसाने पर भी आते है पर इस बात को मानने को तैयार नही। इसी तरह पिछले साल उनके पुत्र का १०+२ के बाद आगे की पढ़ाई थी। मि० होपलेस ने यह मान लिया कि इस देश के सभी शिक्षण पाठ्यक्रम बीएससी बीए बीकाम आदि अब बेमतलब रह गये है। +२ के बाद पढ़ाई का मतलब केवल  कुछ विशेष संस्थानो से इंजीनियरिंग की पढ़ाई है बाकी सब बेकार। उन्होने यह भी निश्चय किया कि वे बच्चे को बिना कोचिंग के ही टेस्ट दिलायेगे क्योकि १ तो उनका लड़का पढ़ने मे काफी तेज है , २ कि कोचिंग वाले पढ़ाते तम है और सेटिंग ज्यादा करते है, ३ कि बच्चे को उसके मौलिक ग्यान की परख होनी चाहिये। बच्चे मे भी मि० होपलेस के कुछ मूलभूत गुणसूत्र आना स्वाभाविक ही है। लिहाजा उसने भी उसी लाईन पर सोचना शुरू किया। प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट आने पर दूर दूर तक उन विशेष संस्थानो के प्रवेश सूची मे उसका नाम ही नही था। फिर मि० होपलेस ने पूरे प्रकरण का पोस्टमार्टम कर के यह निष्कर्ष निकाला कि सब के बच्चे कोचिंग किये इसलिये वे इंजीनियरिंग मे प्रवेश पा सके। बस उनका ही लड़का रह गया साथ ही उन्होने लोगो की जानकारी मे यह इजाफा किया कि गत वर्ष के पेपर आउट आफ कोर्स थे। इसलिये गत वर्ष इंजीनियरिंग मे प्रवेश पाने वालो को पूरे पढ़ाई आउट आफ कोर्स ही करनी होगी लिहाजा उन सब का इंजीनियरिंग करना बेकार लेकिन यह बात मि० होपलेस भी जानते है कि दूसरो के लिये सिद्धान्त बघारना और बात है और व्यवहारिक प्रक्रिया और। इसलिये बस दो ही महीने के बाद वह किसी कोचिंग को यह कह कर ढूढ़ने लगे कि कल उनका लड़का उन्हे यह ताना न दे कि उन्होने उसे कोचिंग नही कराया। कचहरी की व्यवस्था से भी वे परेशान रहते है और उनकी निगाह मे शायद ही कोई अधिकारी या वकील हो जो ईमानदार हो। चाहे उनके गुरू हो या कोई मित्र हर कोई उनकी दृष्टि मे बेकार साबित हुआ है। बहरहाल बात वर्तमान संदर्भ की। मेरे साथ मि० होपलेस एक बीमार व्यक्ति को देखने गये, उन्होने उसकी मिजाजपुर्शी के बजाय उसके बीमारी का पोस्टमार्टम करना प्रॉरंभ कर दिया। और इस व इस जैसी बिमारी के जितने बिगड़े केस थे उन सब का यूँ विश्लेषण किया कि बेचारा बीमार भी खुद को केसने लगा होगा कि वह अभी तक इस धरती पर यदि है तो वह उसका अभिशाप ही है। और तो और होपलेस साहब ने यहॉ तक कह डाला कि इस तरह बिस्तर पर आराम करने से बेहतर है कि कब्र मे आराम किया जाये।
अब बेचारे बीमार के घर वाले यह निश्चित नही कर पा रहे थे कि मि० होपलेस उनके पिता जी की मिजाजपुर्शी मे आये है या यमराज के वारंट की खबर देने। अंत मे उनके बीमार के पुत्र ने मुझे बुला कर पूछा कि भैया जी पिताजी के रिपोर्ट अच्छे आ रहे है। दिन पर दिन उनके स्वास्थ्य मे सुधार हो रहा फिर भी भाई साहब बड़े निरास है। मुझे टी२० मे बॉग्लादेश से आखिरी बाल पर एक रन से जीतने के बाद धोनी का इंटरव्यू याद आ रहा था। बीमार बाप के पुत्र को शिकायत यह थी कि मि० होपलेस मेरे जैसे सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के साथ आये है और मेरी हालत 
मझे गालिब का वो शेर याद आ रहा था कि
इस दुनिया मे कमी नही साहब
एक ढूढ़ो हजार मिलते हैं।

व्योमेश चित्रवंश की डायरी: निरीह मूक बछड़े का करूण क्रंदन ,29 मार्च 2016

29 मार्च 2016, मंगलवार
आज घर लौटते ही कृष्ना जी ने बताया कि डैडी एक बछड़ा अपनी मम्मी से छूट गया है बेचारा चिल्ला रहा है. मैने उनकी सारी बाते गौर से सुनी. तभी वह बछड़ा दिख गया, उसे देखते ही सारी बाते मेरे समझ मे आ गयी, कोई गोपालक सज्जन अपने गाय के बछड़े कोअनुपयोगी होने के कारण जानबूझ कर उसे भटका कर हमारे एरिया मे छोड़ गये थे, अब बेचारा वो बेकसूर बछड़ा जिसका कसूर मात्र इतना है कि वहबछड़ा है, मेरे दोनो बच्चे हाथ मे रोटी लेकर उसे खिलाने को परेशान है पर वह बेचारा अनचिन्हा अनजाना होने के वजह से दूर से ही भाग जा रहा है, काफी रात बीत गयी है पर वह बेचारा बेकसूर बेजुबान बछड़ा अभी भी चिल्लाते हुये अपनी मॉ व अपने पालनहारो को खोज रहा है. हमे डर है कि कही रात मे उस भूखे प्यासे बेकसूर जीव पर कुत्ते हमला न कर दे, मेरे दोनो बच्चे उसकी चिन्ता मे अभी रात के १२.२० तक चिंतातुर हो कर जाग रहे है पर जिस सज्जन का वह बछड़ा है वह तो उसे दूसरे मोहल्ले मे भटका कर अपने को कर्तव्यमुक्त मान चैन की नींदसो रहे होगें?
क्या उन्हे गोभक्त कहना उचित होगा?
साथ ही साथ मै उस बछड़े की पीड़ा वाली आवाज पर यह सोच रहा हूँ कि क्या वो समय  आ गया है जब राष्ट्रीय गो नीति पर पुनर्विचार करते हुये उसमे इस तरह के अनुपयोगी माने जाने वाले मूक निरीह पशुओ पर भी विचार किया जाये.

रविवार, 27 मार्च 2016

व्योमेश की कवितायें: दिल्ली की दामिनी (27दिसम्बर 2012)

दिल्ली की दामिनी
केवल आज दमित नही की गयी
वह तो दमित होती रही
हर देश मे हर काल मे
बस संबोधन बदलते रहे
समय के साथ साथ
वह कभी सीता बन के छली गयी
आदर्श और कर्म के नाम पर
कभी पॉचाली बन अपमानित हुई
राजधर्म के नाम पर
कभी संयोगिता बन प्रेम के नाम पर
कभी पद्मिनी बन चरित्र के नाम पर
वह मीरा भी है, वह जोधा भी है
वह रजिया भी है
वह मंदोदरी व उर्मिला भी है
बस नाम बदलते गये
और भूमिकाये बदल गई
समय के साथ
परिस्थितियॉ आज भी वही है
बस उनके रूप व संदर्भ बदले हैं
नाम बदले है
आधुनकता, बराबरी, समानता,
और अवसर के संग्याओं मे
क्रियायों मे
व्याकरण की भाषाओं मे
पर सोच आज भी वही है
काश!
हम संबोधनो को बदलने के बजाय
सोच बदल पाते

(दिल्ली मे हुये दामिनी बलात्कार व हत्या  पर मन की भावनायें, २७ दिसम्बर २०१२)

व्योमेश की कवितायें : मुट्ठी की रेत (२४-१२-२०१२)

आज पॉच दिनो बाद निकला है सूरज
गुनगुनी धूप लेकिन सिहराती हवाओंके साथ
मन को दूर दूर ले जाती है
लान मे खिले गुलाबों और गेदें की क्यारियो के उस पार
जहॉ मन उ़ने को आतुर है ढेर सारी यादों के पीछे
जो सिर्फ गुगुदा जाती है दिल को हौले से
और उन्हे समेटने की कोशिस करता हूँ मै
पर वक्त फिसल जाता है हर बार
मुट्ठी मे बंधे रेत की तरह।

(24 दिसम्बर 2012)

व्योमेश की कवितायें :कनु के लिये (मार्च २०००)

सॉझ ढले,
काम की थकान,
मन की उलझन,
तन की टूटन,
सब कुछ, ओस की बूँदो की तरह,
एक ही पल मे खतम हो जाती है
जब तु अपनी टिमटिम जैसी ऑखो से
निहारती हो मुझको
तुम्हारे किलकिते लाल लाल होठ गू गा करते है
और तुम्हारी दोनो नन्ही बॉहे उठती है
मुझको समेटने के लिये
सच कहूँ मेरी कनुप्रिया
मेरे लिये सबसे खूबसूरत लम्हे है ये
जिन्हे शब्दो मे नही बॉधा जा सकता
सिर्फ व सिर्फ महसूस किया जा सकता है,
तुममे खोजता हूूँ बार बार मै अपना अक्स
और फिर खो जाता हूँ
तुम्हारी नन्ही टिमटिम ऑखो में।

(कनु के बचपने के समय लिखी मन की भावनायें, संभवत: मार्च २००० में)

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : प्यार मनुहार की बनारसी होली 23 मार्च 2016, बुधवार

24 मार्च 2016 बुधवार
बनारस मे होली आज है, बनारस की होली का मतलब फगुआ' जो प्रतीक है हुल्लड़ हुड़दंग मस्ती व बिन्दासपन को. इस शहर मे तो वैसे भी कोई चेला नही होता सभी गुरू है पर होली ते दिन वह सब गुरूत्व मस्ती व सुरूर मे बह जाता है. अब आज को ही ले पूरे देश मे होली कल यानि 24 मार्च गुरूवारको होनी है परबनारस वालो को चैन कहॉ, उनके पास २४ घंटे इंतजार करने का सब्र कहॉ, वह भी फगुआ के लिये? सवाल ही नही उठता, कहेगे भाग ....... के, फगुआ भी कौनो जोहे वाली चीज हौ, साल भर त जोहबे करै? यहॉ की मस्ती का अलग अंदाज है, वैसे भी बनारसियो के तर्को से होली आज ही है, बनारस मे होली का त्योहार पूरे सात दिन से दस दिनो का होता है, रंगभरी एकादसी से लेकर बुढ़वा मंगल तक. मान्यता है कि रंगभरी एकादसी के दिन भगवान शकर का गौना होता है उसी दिन से शिव जी के साथ अबीर गुलाल के साथ यहॉ होली शुरू होजाती है जो होली को बाद वाले मंगलवार तक चलती है, इसे बुढ़वा मंगल केनाम से जाना जाता है और यह अपने विशिष्ठ अंदाज मे गुलाबबाड़ी व चैता के साथ सम्पन्न होती है. मजा यह है कि लगभग सप्ताह पर्यन्त चलने वाला यह संपूर्ण आयोजन बेहड शालीन व आनन्द मय होता है फिर उसमे हुड़दंग कहॉ है?
हुल्लड़ व हुड़दंग वाली रंग की होली बनारस मे होलिका दहन से ही शुरू हो जातीहै, ही कहीं तो भाई लोग होलिका दहन से लौटते हुये रास्ते मे गी रंग खेलना शुरू कर देते है और यह रंग पानी  कीचड़ पेन्ट दिन के खड़ी दूपहरिया यानि १२ बजे तक भरपूर होता है, फिर इसमे बनारस का वह रंग दिखता है जिसके लिये होली जानी जाती है, मन के कलुष का अभिव्यक्तिकरण, जहॉ गाली गलौज, बोली ठोली, हंसी मजाक सब माफ. पकड़ ,धर, भाग,ऊहे जात हौ सरवा, डाल दे ऊपर से, थाम ले नीचे से, खोल के डाल दे जैसे द्वि अर्थी बोलियो  व हँसी ठटोली से पूरा शहर गुंजायमान रहता है, घाटो पर पहुँचते ही ' आयल हौ सरवा उत्तर से, ... मरवलेस कबूत्तर से, जाये मत दिहे सारे के बच के, रगड़ त एके भित्तर से' और कबीरा का अपना अलग माहौल रहता है, कबीरा बनारस की एक अलग भाषाई संस्कृति है जो फागुन के महीने मे ही दिखती है, कबीर दास के लाईनो को आधार बना कर उन्हे द्विअर्थी व भदेस कर के कुण्डलियॉ पढ़ी जाती है और हर दो लाईना कुण्डलियो के बाद जोगीराााााााााा सर्रररररररररररररर की एक लम्बी टेक कबीरा को होलियाना मूड मे पेश करने का अंदाज है. इन कुण्डलियो का नाम कबीरा रखने के पीछे भी बड़ा महत्वपूर्ण रहस्य है. देश मे पहली बार धर्म जाति की बंदिसो को तोड़ कर प्रेम व सच के अलख जगाने वाले क्रंतिकारी कबीर बनारस के ही थे, कबीर ने हर उस कुरीति का मजाक उड़ाया जो  इंसानियत आपसी प्रेम व भाईचारे के बीच दूरियॉ बनाती थी, कबीर ने आपसी सद्भाव पर बल दिया और खुद को निर्मल कर प्रेम  को आधार मान ईश्वर को पाने की बात कही, बनारस का कबीरा उसी परंपरा का द्योतक है , इस परंपरा मे वह किसी को स्वीकार नही करते, न ही किसी का हस्तक्षेप स्वीका नही करते जो भी इस चपेटे मे आया वह तो लपटाया होली मे, फिर उसके सात पुश्तो के जनम मरन व पैदाइसी इतिहास भूगोल का विस्तृत व्यौरा काशिका मे दे दिया जायेगा,  जो लपटाया वह भी इसे बुरा नही मानता, बस मुस्करा के पान के पीक के बीच भाग ........ के साथ वह इसे कुर्ते पर पड़ेधूल की तरह झाड़ आगे बढ़ जाता है.
बहरहाल, हम भी जन्मना व कर्मणा दोनो से बनारसी है, वाणी से भी है पर उतने पक्के नही। भोर मे होलिका दहन के बाद घर मोहल्ले के बच्चे उत्साहित हो कर अलसुबह ही होलियाने लगे। हमारे पुत्र कृष्ना जी व उनके मित्र अक्षत तो इतने उत्साही थे कि एक दूसरे के ऊपर रमग रोगन कर दीवारो को ही रंगना शुरू कर दिये।कृस्ना जी है तो परिवार के सबसे छोटे सदस्य पर वे अपने पूरे ग्रुप को लीड करते हैं। उनके मित्र मंडली मे ५ से लेकर १८ साल तक के आसपास के बच्चे शामिस है। हम  सुबह सुबह घर के कई छूटे काम पूरा करने के चक्कर मे छत पर ही थे कि भाई लोगो की टोली आ गयी ।
साथ लगना ही था। शकल बनाये दोपहर तक हम लोग भी डॉय डॉय घूमते रहे कहीं होली की गुझिया कही होली की फार्मेलिटी। जो घर पर आ कर चौबे जी, जेपी, साहब भैया के साथ होली के सुरूर पर समाप्त हुई।
दोपहर के १२ बज चुके थे, अघोषित रूप से रंग वाली होली का समापन हो चुका था। हमने भी सस्तहवा ५/- रूपईया वाले लाईफबाय से रगड़ धो के चेहरा साफ किया व भोजनोपरान्त कालोनी के होली मिलन समारोह मे। यह होली मिलन समारोह भी एक अच्छी  परंपरा है, हर कोई एक ही स्थान पर मिल जाता है, न किसी के यहॉ देर तक बैठने की शिकायत न ही किसी के घर न जाने की शिकायत । समोसी, ठंडई के साथ सबसे मिलना जुलना व एक खुशनुमा त्योहार की विदाई।
शाम कुछेक खास मित्र, अपने लोग, आ गये थे।
भॉजा गोलू व बहू होली मिलने आये, अच्छा लगा। दोनो उड़ीसा के अंगुल मे रहते है, तीज त्योहार पर बनारस आते है। बच्चो के साथ घर भी खिलखिला उठता है।
देर शाम अपनी असली भौजी से होली मिलने गया, होली पर अबकी सादी सादी भौजी को थोड़ा सा रंगीन किया और उनका प्यारा वाला आशीर्वाद लिया।
शाम हर साल की तरह विशिष्ठ होली कवि सम्मेलन मे टाऊनहाल चलने की तैयारी।

मंगलवार, 22 मार्च 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : होली पर सुकून की तलाश 22मार्च2016, मंगलवार

22 मार्च 2016 ,मंगलवार

आज से होली की छुट्टी शुरू हुई. फगुआ को लेकर गजब का कन्फ्यूजन है, होलिका दहन कल  यानि बुधवार की भोर मे होना है , उदया तिथि मे प्रतिपदा न होने के कारण पूरे देश मे फाग गुरूवार को मनाया जायेगा, पर बनारस मे रंगभरी एकादसी से बुढ़वा मंगल तक सूखे रंग से होली मनाने की परंपरा रही है. यहॉ पानी व बनारसी मस्ती से सरोबार फगुआ का हुड़दंग व मस्ती होलिका जलने से शुरू हो कर  अगले दिन मध्य दोपहर १२ बजे तक होती है, इसलिये बनारस  मे फगुआ कल ही मनाया जाना है, वैसे मस्ती व हुड़दंग तो शुरू हो चुकी है, नगाड़े व ढोल बजा के कबीरा सरररा व किसिम तिसिम के मुखौटे व शकल बनाये मस्ताने जगह जगह झुण्ड बना के होली का चंदा वसूल रहे है़ होलिका माई की मुर्तियॉ होली पर बैठाने के साथ ही डीजे व सॉउंड बाक्स मे होली गीत बजने लगे है़ ये कल सुबह होलिका दहन तक बजते रहेगे, साथ ही इन पर कमर हिलाऊ नाच भी रात भर गुलजार रहेगा.
       होली का सरूर देखने हम भी दोपहर मे निकले , सड़के तो गुलजार थी पर दुकाने नही, बढ़ती मंहगॉई के चलते हर आदमी त्योहारो का आभासी व दर्शनीययआनंद लेने को इच्छुक है. निम्न वर्ग व उच्च वर्ग बस इन्ही दोनो के ल्ये होली का वास्तविक आनंद रह गया है. बीच वाले तो परंपरा ढो रहे है, नये कपड़ो व नये सामानो की दुकानदारी भी बाजार को कोई गति नही दे पा रही है  क्योकि मेगा मार्ट संस्कृति दुकानदारी को लीलती जा रही है. वरूणापार के सबसे बड़े व व्यस्त अर्दलीबाजार व भोजूबीर मे बिग बाजार वियाल स्पेंसर जालान जैसे नामी साहूकारो के चलते मैहल्ला फुटपाथ का बनिया  बेकार हो रहा है, इन के आगे जहॉ सड़क पर जाम लगा हुआ है वही बाकी दुकानदारो के यगॉ झॉकनेवाले भी गिनती के रह गये है.
हॉ आज खोये व दारू शराब के दुकानो पर जबर्दस्त भीड़ दिखी़ शायद दारू व शराब के पहलू मे ही आम बहुतायत को सुकून की तलास हो.

होली की मौज मस्ती 22.03.2016

होली के पिनक में
भारत से हारने के बाद नवाज शरीफ ने पाकिस्तान की नई टीम की घोषणा की ।
ये होंगे नए खिलाडी
1. आमीर खान (कप्तान)
2.शाहरुख़ खान (उप कप्तान)
3.अरविंद केजरीवाल ( कीपर)
4.दिग्विजय सिंह
5.मुलायम सिंह
6.लालू यादव
7.नितीशकुमार
8.सीताराम येचुरी
9.ओवेसी
10.राहुल बावा (पप्पू जी)
11.राजदीप सरदेसाई

नवाज शरीफ का कहना हे की इनसे बेहतर भारत का विरोध कोई नहीं कर सकता हे। सारे मैचों का प्रसारण आजतक, ndtv , ibn7 , abp news, चैनल पर ही दिखाया जायेगा. किसी और चैनल पर मैच देखने वाले को स्कोर के वास्तविकता के संबंध मे प्रमाणन की कोई जिम्मेदारी पाकिस्तनिया सरकार, पाक क्रिकेट बोर्ड के साथ कॉग्रेस पार्टी, आप, सभी कम्युनिस्ट बाम दल व बॉयेहत्थे पत्रकारों की नही है।