शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

बनारस/ चेतगंज की नक्कटैया: आस्था, लोक संस्कृति व जनजागरण का अद्भुत संगम

            बनारस/ चेतगंज की नक्कटैया..........(आस्था, राष्ट्रभक्ति और लोकचेतना का अनूठा संगम)
                                                                                                                    *व्योमेश चित्रवंश                
                       कहते हैं कि कार्तिक मास के करवाचौथ की ढलती निशा में जब पूरी दुनिया सो जाती है, तब काशी की चेतगंज की गलियां जाग उठती हैं। आश्विन मास के ढलते और कार्तिक मास के चढ़ते दिनों में जब पूरी काशी उत्सवधर्मी हो उठती है, तब करवाचौथ की निशा में आयोजित होने वाला 'चेतगंज का नक्कटैया मेला' लोकचेतना के एक नए क्षितिज का विस्तार करता है।शूर्पणखा के मान-मर्दन के बहाने जहाँ एक ओर सनातन धर्म की मर्यादा जीवंत होती है, वहीं दूसरी ओर सन 1887से चला आ रहा 139 वर्षों का वह इतिहास अंगड़ाई लेता है जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। काशी के उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लक्खा मेलों मे शामिल चेतगंज की नक्कटैया अपने आप में आस्था, राष्ट्रभक्ति और लोकचेतना का अनूठा दस्तावेज है। यह जीवंत प्रमाण है कि
धर्मनगरी काशी केवल शिवालयों, गंगा के घाटों और मोक्ष की धरा ही नहीं है, बल्कि यह लोक संस्कृति के उन जीवंत उत्सवों की जननी भी है जो शताब्दियों से समाज को एक नई दिशा देते आए हैं।  रामचरितमानस के 'शूर्पणखा नासिका कर्तन' प्रसंग पर आधारित यह अद्भुत लोक-उत्सव केवल एक धार्मिक अभिनय नहीं, वरन औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध शुरू हुआ एक ऐतिहासिक प्रतिरोध और सामाजिक कुरीतियों पर तीखा प्रहार करने वाला एक विशाल सांस्कृतिक महोत्सव है, जो आज 139 वर्षों की अविच्छिन्न यात्रा पूरी कर अपनी प्रासंगिकता को और प्रगाढ़ कर चुका है।
चेतगंज की नक्कटैया का इतिहास करीब 139 वर्ष पुराना है, जिसकी विधिवत शुरुआत सन् 1887 में परम रामभक्त बाबा फतेहराम द्वारा की गई थी। उस दौर में काशी की गलियों में यायावर की भांति भ्रमण करने वाले बाबा फतेहराम जहां भी रामलीला होती, वहीं रम जाते थे। उन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के दमन चक्र और भारतीयों की सोई हुई चेतना को जगाने के लिए 'श्री चेतगंज रामलीला समिति' की नींव रखी। बाबा फतेहराम ने यह भांप लिया था कि सीधे तौर पर ब्रिटिश राज का विरोध करने पर पाबंदी लग सकती है, इसलिए उन्होंने धर्म और जनभावना की आड़ में एक ऐसा मंच तैयार किया, जहां आस्था के बहाने राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई जा सके।
तब के ब्रिटिश शासनकाल में जब भारतीय जनता पर अत्याचार चरम पर थे और किसी भी प्रकार के राजनीतिक जमावड़े या जनसभा पर पूर्ण प्रतिबंध था, तब चेतगंज की नक्कटैया ने एक 'पैगामी लीला' के रूप में जन्म लिया। यह आश्चर्यजनक रहस्य भी है कि बनारस के पारंपरिक लक्खी मेले में शामिल चेतगंज की नक्कटैया को अंग्रेजों के कारण ही विशाल रूप मिला था । बाबा फतेह राम अंग्रेजों के दमन पर आम जन काध्यान आकृष्ट करने के साथ ही आम जन के मन मे दबे अंग्रेजी शासन के विरूद्ध असंतोष और विरोध प्रदर्शित करना चाहते है जोव्यंग्यात्मक नाटिका, झांकी और लाग विमान से संभव था ।  बाबाजी ने चतुर कूटनीति का परिचय देते हुए धार्मिक जुलूस के नाम पर लीला के लिये  ब्रिटिश प्रशासन से अनुमति प्राप्त करने के साथ ही तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर को नक्कटैया के जुलूस का उद्घाटन करने को तैयार किया। तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर इस छलावे को समझ नहीं पाए कि जिस धार्मिक मेले की शुरुआत वे कर रहे हैं, वही आने वाले दिनों में ब्रिटिश राज के ताबूत में आखिरी कील साबित होने वाला था। मेले मे दांडी यात्रा और नमक सत्याग्रह, महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन की ताकत और नमक कानून तोड़ने के दृश्य को बनारस की सड़कों पर प्रदर्शित किया जाता था।फांसी के फंदे पर क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को जीवंत कर लोगों में देशभक्ति और बलिदान की भावना भरी जाती थी।भारत माता की बेड़ियां,जंजीरों में जकड़ी भारत माता और उनके पैरों में लेटे अत्याचारी ब्रिटिश सैनिकों का दृश्य सीधा जनता के दिलों पर चोट करता था।इन लाग-विमानों में अंग्रेजी हुकूमत की आर्थिक नीतियों, नील की खेती के शोषण, भारी कर-वसूली और दमन चक्र पर इतने तीखे कटाक्ष और व्यंग्य किए जाते थे कि अशिक्षित और सामान्य जनता भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो उठती थी। अंग्रेज अधिकारी इन झांकियों को देखते तो थे, लेकिन धार्मिक जुलूस का हिस्सा होने के कारण उन पर कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। पुरानी परम्परा का निर्वाह करते हुए आज भी बनारस के कलेक्टर ही आधीरात को जुलूस का उद्घाटन करते है।                                    चेतगंज की नक्कटैया का ऐतिहासिक महत्व इस बात से भी आंका जाता है कि यह स्वतंत्रता संग्राम के दौर में महान क्रांतिकारियों के मिलन का एक प्रमुख व सुरक्षित गुप्त केंद्र था। अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मन्मथ नाथ गुप्त और शचींद्रनाथ सान्याल जैसे दिग्गज क्रांतिकारी इस मेले की अपार भीड़ और विशाल क्षेत्र का लाभ उठाकर वाराणसी में गुप्त बैठकें आयोजित करते थे। बनारस अपनी भौगोलिक बनावट—संकरी गलियां, बहुमंजिला इमारतें और गंगा के घाट के कारण क्रांतिकारियों की सुरक्षित शरणस्थली था। अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मन्मथ नाथ गुप्त, शचींद्रनाथ सान्याल और रामप्रसाद बिस्मल जैसे दिग्गज क्रांतिकारी इस मेले की अपार भीड़ और विशाल भौगोलिक क्षेत्र का लाभ उठाकर वाराणसी में अपनी गुप्त बैठकें आयोजित करते थे। इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों के संस्मरणों के अनुसार, सन् 1925 के प्रसिद्ध काकोरी कांड के बाद जब ब्रिटिश पुलिस और खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को पूरे उत्तर भारत में सरगर्मी से ढूंढ रहा था, तब वे मेले की भारी भीड़, ढोल-नगाड़ों, शहनाई की धुन और डमरू वादन के कानफोड़ू शोर के बीच, वे अपने साथियों से मिलते थे और अंग्रेजी पुलिस की नाक के नीचे से अगली रणनीति के गोपनीय पर्चे बांटकर निकल जाते थे। चेतगंज क्षेत्र में स्थित तत्कालीन सरस्वती वाचनालय क्रांतिकारियों के जुटने और गुप्त संवादों का मुख्य केंद्र हुआ करता था। फिरंगियों की जासूस पुलिस लाखों की इस अनियंत्रित भीड़ में राष्ट्रभक्तों को ढूंढने में पूरी तरह नाकाम रहती थी। यह मेला क्रांतिकारियों के लिए एक ऐसा अभेद्य सुरक्षा कवच था, जिसने देश की आजादी की लड़ाई को वाराणसी की धरती पर निरंतर जीवित रखने का काम किया। इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, काकोरी कांड के बाद जब ब्रिटिश पुलिस क्रांतिकारियों को सरगर्मी से ढूंढ रही थी, तब चंद्रशेखर आजाद ने भेष बदलकर चेतगंज की नक्कटैया में शरण ली थी। वे बनारसी बग्घियों और 'लाग' के कारीगरों के बीच साधारण धोती-कुर्ता पहने घूमते रहे। मेले की भारी भीड़ और ढोल-नगाड़ों के शोर के बीच उन्होंने अपने साथियों को अगली रणनीति के पर्चे बांटे थे। यह मेला क्रांतिकारियों के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच था। फिरंगियों की जासूस पुलिस लाखों की इस भीड़ में क्रांतिकारियों को ढूंढने में पूरी तरह नाकाम रहती थी। क्रांतिकारी न केवल यहां रणनीतियां बनाते, बल्कि जुलूस में निकलने वाले 'लाग-विमानों' (चलती-फिरती झांकियों) में अंग्रेजी हुकूमत पर किए गए तीखे कटाक्षों और व्यंग्यों का भरपूर आनंद भी लेते थे।
                मूल रूप से यह उत्सव गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अरण्यकांड के उस प्रसंग पर आधारित है, जिसमें रावण की बहन शूर्पणखा पंचवटी के जंगल में रूप बदलकर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को रिझाने का प्रयास करती है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति वफादार रहने और अमर्यादित आचरण करने पर लक्ष्मण क्रोधित होकर शूर्पणखा की नाक और कान काट देते हैं। चेतगंज की नक्कटैया में इसी पौराणिक घटनाक्रम को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया जाता है। मध्यरात्रि के बाद पिशाचमोचन से शुरू होने वाला यह जुलूस करीब दो किलोमीटर का सफर तय कर भोर में चार बजे तक चेतगंज लीला स्थल पहुंचता है, जहां लोक कलाकारों द्वारा इस महागाथा का मंचन किया जाता है। चेतगंज की नक्कटैया में इसी पौराणिक घटनाक्रम को अत्यंत भव्य और नाटकीय रूप में चार चरणों में प्रदर्शित किया जाता है। पहले चरण में बाबा फतेह राम के बगीचे चऊछठवा मे मुकुट पूजा कर रामलीला की धार्मिक शुरूआत होती है। द्वितीय चरण मे बनारस के कलेक्टर मध्यरात्रि को पिशाचमोचन तालाब पर मेले का उद्घाटन कर जुलूस का प्रारंभ करते हैं। तृतीय चरण मे चेतगंज मुख्यमार्ग पर रात 12.30 से प्रात:3.30 तक समसामयिक व राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दो पर झांकियों के साथ लाग विमान और जूलूस संचलन होता है। अंतिम चरण मे भोर के 4बजे चेतगंज लीला स्थल पर सूपनखा के नासिका कर्तन का जीवंत मंचन होता है।
मुकुट पूजा के साथ शुरू होने वाला यह ऐतिहासिक जुलूस मध्यरात्रि के बाद पिशाचमोचन से आगे बढ़ता है। ढोल-नगाड़ों, शहनाइयों, डमरुओं के गूंजते नाद और पारंपरिक अखाड़े के पहलवानों के लाठी-डंडे और तलवारबाजी के हैरतअंगेज करतबों के बीच यह काफिला करीब दो किलोमीटर का सफर तय करता है। भोर की पहली किरण के साथ जब लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटने की मुख्य लीला संपन्न होती है, तो लाखों दर्शकों का समूह 'जय श्री राम' के उद्घोष से पूरी काशी को गुंजायमान कर देता है।
मलदहिया, पिशाचमोचन, लहुराबीर, सेनपुरा, रामकटोरा से लेकर चेतगंज और लहंगपुरा तक फैले करीब चार किलोमीटर के इस विशाल मेला क्षेत्र में दिन और रात का भेद मिट जाता है। लाखों की संख्या में उमड़ने वाला जनसैलाब काशी के खांटी 'अलमस्त' और 'बनारसीपन' के मिजाज को जीवंत करता है। पूरी रात चलने वाले इस सांस्कृतिक महोत्सव में रोशनी की चमचमाती बारात और बजते डमरू-नगाड़े वातावरण को भक्ति और उत्साह से सराबोर कर देते हैं। इस मेले का ताना-बाना ऐसा है जिसमें जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें ढह जाती हैं और पूरी काशी एक सूत्र में पिरोई नजर आती है।
नक्कटैया मेले की सबसे बड़ी विशेषता इसके 'लाग-विमान' यानी चलती-फिरती झांकियां हैं। शुरुआत में जहां इन झांकियों में जलियांवाला बाग हत्याकांड, दांडी यात्रा, नमक सत्याग्रह और ब्रिटिश पुलिस के अत्याचारों को दिखाकर जनता में राष्ट्रीय चेतना भरी जाती थी, वहीं आधुनिक दौर में भी यह परंपरा कायम है। हाल के वर्षों में 'ऑपरेशन सिंदूर', वैश्विक पटल पर 'ट्रंप टैरिफ', पर्यावरण संरक्षण के तहत 'प्लास्टिक से आजादी' और ऐतिहासिक फिल्मों (जैसे 'छावा') पर आधारित अद्भुत और चमत्कृत करने वाली झांकियां निकाली गई हैं। ये झांकियां समाज की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विद्रूपताओं पर सीधा प्रहार करती हैं।
यह मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक खुला सामाजिक रंगमंच है। स्वांग और झांकियों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे—शराबखोरी, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बहु-विवाह और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को बेहद तीखे ढंग से आम जनता के सामने प्रस्तुत किया जाता है। विभिन्न देवी-देवताओं के दिव्य स्वरूपों, राजा हरिश्चंद्र के सत्य व्रत प्रसंगों के साथ-साथ इन सामाजिक बुराइयों का ऐसा सजीव चित्रण किया जाता है कि दर्शक आत्मसात करने पर मजबूर हो जाते हैं। यह लोक मानस को झकझोरने और उसे सही मार्ग पर लाने की एक अद्भुत अनौपचारिक शिक्षा पद्धति है।
समय के साथ चेतगंज की नक्कटैया ने वैश्विक ख्याति तो अर्जित की है, लेकिन बदलते दौर में इस ऐतिहासिक विरासत को आर्थिक संकटों और आधुनिक चकाचौंध से बचाने की बड़ी चुनौती है। प्रारंभ में इस लीला की व्यवस्था चन्दे पर आधारित थी किन्तु बाद में बाबा ने एक अनूठी तरकीब निकाली कि मेला क्षेत्र का प्रत्येक दुकानदार प्रतिदिन एक-एक पैसा देगा। इस प्रकार वर्ष भर में लीला की व्यवस्था के लिए काफी धन एकत्रित होने लगा। बाद में बाबा के इस निस्पृह जीवन से अभिभूत होकर नगर के सेठ-साहुकार भी इस लीला में उत्साह के साथ भाग लेने लगे। उनकी तरफ से लाग-विमानों की व्यवस्था होने लगी।
श्री चेतगंज रामलीला समिति और स्थानीय नागरिकों के भगीरथ प्रयासों से यह गौरवशाली परंपरा आज भी अक्षुण्ण है, परंतु शासन-प्रशासन स्तर पर इसके ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व को देखते हुए दीर्घकालिक संरक्षण की आवश्यकता है।
चेतगंज की नक्कटैया केवल एक मेला नहीं, बल्कि काशी की अदम्य जिजीविषा, उसकी प्रतिरोध की संस्कृति, अटूट आस्था और जीवंत लोककला का अमर दस्तावेज है, जो हर साल हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और समाज के प्रति सचेत रहने का संदेश देता है। कला और अभिनय का ऐसा राष्ट्रवादी उपयोग भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है।
समय बदला, देश आजाद हुआ, लेकिन चेतगंज की नक्कटैया ने अपनी जन-जागृति की मूल भावना को कभी नहीं छोड़ा। बाबा फतेहराम द्वारा स्थापित यह परंपरा आज के आधुनिक दौर में भी पूरी तरह जीवंत है। आज  भी समसामयिक विद्रूपताओं पर प्रहार करने वाली  आधुनिक दौर में झांकियों का स्वरूप, लाग-विमान के माध्यम से देश और दुनिया की समसामयिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विद्रूपताओं पर सीधा और तीखा प्रहार करते हैं।
हाल के वर्षों और वर्तमान दौर के मेलों में निकलने वाली झांकियों के मुख्य आकर्षणों पर नजर डालें तो इसकी व्यापकता का पता चलता है। वैश्विक पटल पर होने वाली उथल-पुथल जैसे रूस-यूक्रेन संकट, इजराइल-हमास और ईरान का युद्ध, तथा वैश्विक आर्थिक नीतियां जैसे 'ट्रंप टैरिफ' को झांकियों के जरिए बेहद सरल ढंग से आम जनता को समझाया जाता है। आज भी राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा के प्रति  भारतीय सेना के शौर्य पराक्रम पर आधारित 'ऑपरेशन सिंदूर' या सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सैन्य झांकियां युवाओं में देशभक्ति का नया जोश भरती हैं। पर्यावरण और सामाजिक विमर्श, प्लास्टिक से आजादी', जल संरक्षण, ग्लोबल वार्मिंग, और कन्या भ्रूण हत्या जैसे विषयों पर आधारित झांकियां समाज को अपनी कुरीतियों को सुधारने की चेतावनी देती हैं।  पिछले वर्षों मे छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और मुगलों के खिलाफ उनके संघर्ष पर आधारित ऐतिहासिक फिल्मों (जैसे 'छावा') और प्रसंगों की भव्य सजीव झांकियां दर्शकों को चमत्कृत किया है।बनारस ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों जैसे प्रयागराज, मीरजापुर, जौनपुर, आजमगढ़ और प्रतापगढ़ से भी झांकियों के कुशल कारीगर और कलाकार 100 से अधिक लाग-विमानों के साथ इस मेले की शोभा बढ़ाने आते हैं। चेतगंज की नक्कटैया का एक और महत्वपूर्ण पहलू झांकियों का निर्माण और बनारसी हुनर है । इसकी निर्माण प्रक्रिया और इसमें छिपी अद्भुत कलात्मक बारीकियां हैं। इस मेले में प्रदर्शित होने वाले 'लाग-विमान' और 'चौकियां' रातों-रात तैयार नहीं होतीं, बल्कि इनके पीछे स्थानीय कारीगरों की महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत, लगन और पुश्तैनी हुनर छिपा होता है। इस मेले की तैयारी महीनों पहले से शुरू हो जाती है, जिसमें बनारसी साड़ियों के बुनकर, बग्घियों के संचालक, लकड़ी और लोहे के कारीगर, विद्युत सज्जा के विशेषज्ञ और स्थानीय छोटे-बड़े व्यवसायी मिलकर काम करते हैं। बनारस के पुराने मोहल्लों जैसे कतुआपुरा, चेतगंज, लक्सा, और दशाश्वमेध के कारीगर इस विधा के उस्ताद माने जाते हैं। इन झांकियों के निर्माण में मुख्य रूप से लोहे और लकड़ी का ढांचा कलात्मक तत्वों के रूप मे उपयोग किया जाता है। ऊंची-ऊंची झांकियों को स्थिरता देने के लिए बांस, बल्ली, लोहे के पाइप और मजबूत रस्सियों का एक ऐसा जटिल ताना-बाना बुना जाता है जो चलते हुए वाहन पर भी संतुलन बनाए रखे। झांकियों में सबसे कठिन कार्य जीवित बच्चों या कलाकारों को भगवान, राक्षसों या क्रांतिकारियों के रूप में ऊंचे ढांचों पर बांधना या टिकाना होता है। कलाकार घंटों तक एक ही मुद्रा में बिना हिले-डुले खड़े रहते हैं, जो उनकी एकाग्रता और भक्ति की पराकाष्ठा है। झांकियों को भव्य रूप देने के लिए बनारस की प्रसिद्ध ज़री और ब्रोकेड के कपड़ों, चमकीले मुकुटों, कृत्रिम हथियारों और पारंपरिक आभूषणों का उपयोग किया जाता है। रात्रि के समय जब इन पर आधुनिक रंग-बिरंगी लाइटों का प्रकाश पड़ता है, तो पूरा दृश्य अलौकिक और जादुई प्रतीत होता है।यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। दादा से पोते तक पहुंचने वाली इस कला ने न केवल बनारस की लोक-कला को जीवित रखा है, बल्कि युवा पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और पौराणिक आख्यानों से जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम भी प्रदान किया है।
काशी की 'लक्खा मेला' संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि यह समाज के हर वर्ग, जाति और धर्म को एक सूत्र में पिरो देती है। चेतगंज की नक्कटैया इस सामाजिक समरसता का एक अद्भुत उदाहरण है। इस मेले की रात काशी की गलियों में अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का भेद पूरी तरह मिट जाता है। सड़कों के दोनों ओर बने मकानों की छतों और छज्जों पर लाखों की संख्या में बैठे लोग पूरी रात जागकर इस सांस्कृतिक महाकुंभ का हिस्सा बनते हैं। यह मेला बनारस की उस 'अक्खड़पन' और 'मस्ती' को भी दर्शाता है, जहां लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर अपनी संस्कृति के प्रति अपनी निष्ठा को प्रकट करते हैं। यह आयोजन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि काशी की लोक संस्कृति कितनी लचीली और समावेशी है, जो धर्म के पारंपरिक ढांचे के भीतर राष्ट्रवाद और समसामयिक विषयों को इतनी सहजता से समाहित कर लेती है।
       140 वर्षों के इस लंबे सफर में चेतगंज की नक्कटैया ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज के आधुनिक और डिजिटल युग में, जहां मनोरंजन के साधन मोबाइल स्क्रीन तक सिमट गए हैं, इस भव्य लोक-उत्सव को संजोए रखना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन गया है।बदलते परिवेश में चुनौतियां और संरक्षण की आवश्यकता स्पष्ट दिख रही है। समिति और स्थानीय कलाकारों के सामने आज कई तरह की व्यावहारिक और आर्थिक अड़चनें आती हैं। झांकियों के निर्माण के लिए कच्चा माल (लकड़ी, लोहा, कपड़े) और कारीगरों की मजदूरी लगातार महंगी हो रही है। रामलीला समितियों को बढ़ती लागत और आर्थिक संकट के कारण कई बार फंड की कमी का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए वे पूरी तरह से जन-सहयोग और स्थानीय व्यापारियों के चंदे पर निर्भर रहते हैं। प्रशासनिक दृष्टि से आधुनिक दौर में लाखों की भीड़ को नियंत्रित करना, संकरी गलियों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना और यातायात को सुचारू रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होती है। हालांकि, वाराणसी पुलिस और जिला प्रशासन इस आयोजन को सफल बनाने के लिए महीनों पहले से रूट मैप और बैरिकेडिंग की पुख्ता योजना तैयार करते हैं।परंपरा बनाम आधुनिकता के इस दौर में  नई पीढ़ी को इस पुश्तैनी हुनर और लोक-अभिनय से जोड़े रखना मुश्किल हो रहा है। इसके बावजूद, बनारसी युवाओं का इस मेले के प्रति उत्साह यह साबित करता है कि यह परंपरा उनकी रगों में दौड़ती है। इस ऐतिहासिक धरोहर को अक्षुण रखने के लिए इसे सरकारी स्तर पर 'सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा देकर विशेष वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए, ताकि बाबा फतेहराम की यह अनमोल विरासत कभी भी आर्थिक तंगहाली की भेंट न चढ़े।                                              जन-चेतना का शाश्वत और अमर शंखनाद का यह मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सनातन मूल्यों की रक्षा, राष्ट्रभक्ति की अखंड लौ और आधुनिक सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त करने का एक अत्यंत सशक्त और जीवंत माध्यम है। यह काशी की उस अदम्य इच्छाशक्ति का कालजयी प्रमाण है जिसने कभी भी औपनिवेशिक दासता को मानसिक रूप से स्वीकार नहीं किया। कला, आस्था और धर्म के अनूठे त्रिकोण पर खड़ा होकर बाबा फतेहराम ने क्रांति की जो मशाल जलाई थी, उसकी लौ आज भी उतनी ही प्रखर है।
कल तक जो मंच फिरंगियों के अत्याचारों के खिलाफ क्रांतिकारियों का एक अभेद्य सुरक्षा कवच और सामूहिक प्रतिरोध का स्वर हुआ करता था, आज वह स्वतंत्र भारत की चुनौतियों, वैश्विक राजनीति और सामाजिक विसंगतियों पर विमर्श का एक खुला, लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक रंगमंच बन चुका है। कार्तिक मास की उस ढलती निशा में चेतगंज की ऐतिहासिक गलियों से उठने वाला डमरुओं का नाद और जयघोष केवल शूर्पणखा के मान-मर्दन की पौराणिक गाथा का स्मरण नहीं है, बल्कि यह हर युग में अधर्म, दमन, विदेशी आक्रांताओं और सामाजिक विद्रूपताओं पर लोक-शक्ति की शाश्वत विजय का एक अनूठा, जीवंत और अमर शंखनाद है। 140 वर्षों की यह अविच्छिन्न यात्रा इस बात की गारंटी है कि काशी की यह लोक-चेतना आने वाली सदियों तक भारत की सांस्कृतिक विरासत को आलोकित करती रहेगी।
काशी,महासप्तमी, शारदीय नवरात्रि,संवत 2083, वि0 शनिवार,17दिसंबर2026
http://chitravansh.blogspot.com

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