शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

महाश्मसान मे नगरवधुओं द्वारा नृत्याभिषेक : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15अप्रैल 2016, शुक्रवार

15 अप्रैल 2016, शुक्रवार

श्मसान मे नगरवधुओं द्वारा नृत्याभिषेक

                     श्री श्री 1008 बाबा महाश्मशान नाथ जी मणिकर्णिका घाट के त्रिदिवशीय श्रृंगार महोत्सव के अन्तिम दिन कल नवरात्रि के सप्तमी तिथि को प्राचीन काल से चली आ रही गणिकाओं के नृत्य की परम्परा को जीवंत किया आज की नगर वधुओं ने, ऐसी मान्यता और कहा जाता है कि जब दशाश्वमेध घाट पर राजा जयसिंह द्वारा मान महल का निर्माण कराया जा रहा था तो उसी समय राजा जयसिंह द्वारा महाश्मशान नाथ जी के मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया गया था चूकिं हिन्दूओं में ऐसा चलन है कि हर शुभ कार्य में संगीत जरूर होता है तो उस समय राजा को अपने समकक्ष ऐसा कोई संगीतकार नहीं मिला जो महामशान पर आकर संगीत प्रस्तुत कर सके कारण उस समय का छुआछूत व जातीय परम्परा का होना तब काशी की नगर वधुओं को इस बात की जानकारी हुई कि उनके आराध्य के सामने कोई संगीतकार नहीं आना चाहता है तो उन्हें इस बात का काफी मलाल हुआ और अपने संदेश वाहक से नगर वधुओं ने तत्काल यह संदेश राजा जयसिंह को भिजवाया कि अगर आप को ऐतराज ना हो तो अपने आराध्य बाबा को हम काशी की गणिकाएं नृत्याजलीं व गीतांजलि के माध्यम से दरबार सजाना चाहते हैं जिसे राजा ने त्वरित स्वीकार करते हुए निमंत्रण भिजवा दिया कि काशी की गणिकाएं ही सजाएंगी बाबा महाश्मशान नाथ जी का दरबार और एक नई परम्परा का होगया श्री गणेश, तब से आज तक यह महफिल सजने लगी महामशान पर काशी के अदभुत, अद्वितीय, अलोकिक, अविस्मरणीय त्योहारों की तरह, और नगर वधुओं में यह मान्यता घर कर गई थी कि एक दिन सब को चार कधें पर बाबा महाश्मशान नाथ जी के गोद मणिकर्णिका जाना ही है तो क्यों न अपने दुर्भाग्य को जो इस जन्म में मिला है नाचने वाली के रूप में उसे जीभर कर जी ले व जीते जी बाबा से अपने दुख भी बाट आए जिससे अगला जन्म तो ऐसा ना मिले, और शुरु हो गई एक परम्परा, जो आज भी बदस्तूर जारी है कि बिना किसी निमंत्रण और बुलावे के देश के कोने कोने से चली आ जाती है ये नगर वधुएं  जिन्हें भी यह जानकारी मिलती है।
# नोट : आशुतोष तिवारी जी बनारस के बनारसियत को जीने वाले एक बेहतरीन फोटोग्राफर है। यह फोटो व जानकारी उन्होने ही उपलब्ध करायी है।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

संवेदनहीनता या सियासत: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 14 अप्रैल 2016गुरूवार

14 अप्रैल 2016,गुरूवार

संवेदनहीनता या सियासत

       आज सुबह उठते ही घर व मोहल्ले मे हल्की अफरा तफरी दिखी। पहले तो यह सोचा कि आज महाष्टमी के व्रत व पूजन के कारण यह सरगरमी हो, पर मामला दूसरा था। पता चला कि आज सुबह से पूरे इलाके मे पानी की सप्लाई ही गोल है। वैसे दो दिन से बिजली व्यवस्था भी छिन्नभिन्न है। पहले तो यह बताया गया था कि बनारस मे विद्युत वितरण उपकेन्द्रो का उन्नकिकरण हो रहा है इस वजह से मंगलवार को विद्युत आपूर्ति बाधित होने की संभावना थी पर बुधवार को तो हद ही हो गयी सुबह से गयी बिजली रानी शाम के ६ बजे आई तो पर पल मे रत्ती पल मे मासा की तरह उन्होने जो रंग दिखाना शुरू किया कि यह ऑखमिचौनी का खेल रात के डेढ़ बजे तक चलता रहा।
बहरहाल बात आज सुबह की। पानी की आपूर्ति न होने से हर कोई परेशान । लोग बाग अपने अपने दरवाजे पर खड़े होकर पड़ोसियो से दरयाफ्त करते रहे कि पानी आया कि नही? जिन लोगो के यहॉ समर्सेबुल व पंप है वे भी लाचार दिख रहे थे कि बिजली भी नही आखिर पंप चले भी तो कैसे?
कुछ लोगो ने लगभग एक किलोमीटर दूर लालपुर पानी टंकी जा कर दरयाफ्त किया तो वहॉ से जो जबाब मिला उसे सुन दरियाफ्ती भाई लोग और भी परेशान । उन्हे कोई वाजिब वजह नही सूझ रहा था कि वे अपना सिर टंकी पर दे मारे या सामने मौजूद सरकारी कर्मचारियो का सिर फोड़ डाले। कारण जो वजह  कर्मचारियो द्वारा बताया जा रहा था, वो बनारसी भाषा मे ' विशुद्ध चुतियापा' था और जिसे करने को हर बनारसी अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है। टंकी पर यह बताया गया कि कल बिजली के तार को उल्टा जोड़ दिया गया था इसलिये पानी टंकी मे चढ़ नही सका। अब उसे ठीक किया जा रहा है। बिजली आते ही पानी चढ़ा कर सप्लाई दे दी जायेगी। अब आप समझते रहिये कि कई कई बरस से काम कर रहे पंप कर्मचारियो को अभी तक यह ही नही मालूम कि सही तार कौन सा है? या कल से उल्टे तार को जोड़े जाने के जानकारी के बावजूद क्या वो आज तक इंतजार कर रहे थे कि जब सुबह पब्लिक आ के उनका 'बहिनिया- मतरिया करेगी तब वे उसे ठीक करने का सोचेगें?
हमारा नवरात्रि ब्रत चलने के कारण फिलहाल हम इस भागदौड़ से अलग है पर लगे हाथ मैने सोचा कि एक सच्चे मोहल्लेवासी का फर्ज थोड़ा बहुत मुझे भी निभाना चाहिये। मैने फेसबुक पर अपने इलाके की दुर्दशा अपडेट किया साथ ही वाट्सऐप्प पर जल संस्थान के सचिव, नगरनिगम के आयुक्त, अपने विधायक, कुछेक मीडियाकर्मियो, कुछेक सोशल साईट्स ग्रुपों व दोचार सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस बात की सूचना दी पर फालतू व वाहियात जोक्स को शेयर करने वाले किसी भी ग्रुप ने इस समस्या पर संवेदनशील होने की आवश्यकता नही समझी। माननीय विधायक रविन्द्र जायसवाल जी ने न तो मेरा फोन उठाया न तो संदेश देखने की भी जहमत उठाई और जल कल के सचिव साहब संदेश पढ़ कर उसे फाईलो की तरह ही दरकिनार कर दिये जबकि समस्या का मूल संबध उनही से था। बल्कि नगर आयुक्त डा० हरि प्रताप साही जी के बारे मे व उनकी त्वरित जिम्मेदार कार्यपद्धति पर हम अब तक जो सुनते आये थे, उसका परिचय मिला। डा० साही साहब ने पूरे प्रकरण के विषय मे जानकारी लेकर उसका समाधान कराते हुये हमे १०.१८ बजे संदेश " सर उपरोक्त इलाके मे पानी की supply नतनिदाइ टंकी से होती है रात्रि मे बिजली कटौती की वजह से टंकी भर नही पाई है। सुबह से tubewell बिजली आने पर चालू है।" भी प्रेषित किया।
  यही नही हमने इस संदेश को ट्विटर के माध्यम से मुख्यमंत्री लगायत मीडियाहाऊसो तक भी भेजा था प्रत्यूषा के आत्महत्या , कन्हैया के स्वागत जैसे महत्वपूर्ण सवालो पर जूझने वाली मीडिया के पास आमजन की समस्या के बारे मे चर्चा करने को समय कहॉ?
यह तो रही आमजन के प्रति संवेदनहीनता, लगे हाथ सियासत की भी चर्चा कर लें।
समाजवादी पार्टी की पिछले तीन सालो के अवधि के दौरान हम लोग प्राय: हर हिन्दू त्यौहारो पर बिजली व पानी की समस्यायो से दो चार होते है। दशहरा ,दिवाली, शिवरात्रि, बसंतपंचमी, मौनी अमावस्या, रामनवमी के अवसर पर पानी बिजली की आपूर्ति अवशय ही अवरोधित हो रही है। पहले हमे यह संयोग लगता था, पर अब हर किसी के कहने पर हमे भी यह सियासत लगता है।
क्या हमारी राजनीति व व्यवस्था का स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि अब हम त्यौहारो व खुशियो पर भी राजनीतिक शतरंज के सियासती दॉव चलने लगे है?

रविवार, 10 अप्रैल 2016

अब क्या करोगे अभिमन्यु: व्योमेश चित्रवंश की कवितायें, 30 दिसम्बर 1999

अब क्या करोगे अभिमन्यु?

पुन: मोड़ दर मोड़, घने अंधियारे में
राहों के चक्रव्यूह मे खड़ा अभिमन्यु
नही पहुँचलपाता चक्रव्यूह के द्वार तक
इस अभिमन्यु ने नही सुना था व्यूहभेदन
अपनी मॉ सुभद्रा के गर्भ मे
नहीसिखाया उसे धनुरविद्या के साथ
व्यवहार शिक्षा, उसके मामा श्री कृष्ण ने
वह तो निपट अकेला है बेबस
हाथ मे थोथी डिग्रियों का धनुष
स्मृति पर आधारित परीक्षा प्रणाली की
तरकस खाली है, आज उसके
उसकी खाली जेबों की तरह
उसके पास सोर्स और मनी फोर्स भी नही
चक्रव्यूह के द्वार पर खड़े गुरू द्रोण
जो आकांक्षी है गुरूदक्षिणा मे अंगूठे के
खड़ा अंधियारे भविष्यहीन चक्रव्यूह के द्वार पर
विवस, एकाकी, थका,उत्साहहीन अभिमन्यु
स्वयं से ही करता अंतहीन, उत्तरहीन प्रश्न
अब क्या करोगे अभिमन्यु ?
(३०-१२-१९९९)

एक बार फिर गिनिज रिकार्ड बनारस के नाम: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 09 अप्रैल 2016,शनिवार

एक बार फिर गिनिज रिकार्ड बनारस के नाम

बनारस की बेटी सोनी चौरसिया ने आज बनारस का नाम विश्व में ऊंचा किया है! जिसके लिए उसे दिल की गहराइयों से★★★बहुत बहुत बधाई हो★★★

वाराणसी: वाराणसी की बेटी सोनी चौरसिया ने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए अपना नाम गिनीज बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज करा लिया है। सोनी के कोच राजेश डोगरा ने बताया कि शनिवार देर शाम 9 बजकर 23 मिनट पर यह रिकॉर्ड सोनी ने अपने नाम किया। उसने लगातार 124 घंटे तक कथक डांस कर यह उपलब्धि हासिल की।

बता दें, इसके पहले यह रिकॉर्ड केरल की हेमलता कमंडलु के नाम था। उन्होंने 123 घंटे 15 मिनट डांस कर यह रिकॉर्ड बनाया था। 124 घंटे पूरे होने के बाद भी साेनी का डांस अब भी जारी है। सोनी का कहना है कि जब तक उनका शरीर साथ देगा वो डांस करती रहेंगी।

सोनी की इस उपलब्धि को हासिल करते ही लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी। सोनी, उनके कोच राजेश डोगरा, और उनके परिवार के अन्य लोग फूले नहीं समा रहे हैं।

माउंट लिट्रा स्कूल में बना यह रिकॉर्ड
सोनी चौरसिया ने मोहनसराय स्थिल माउंट लिट्रा जी स्कूल में यह रिकॉर्ड बनाया है। डांस की शुरुआत करने से पहले सोनी लगातार तीन दिन तक कथक करने का अभ्यास कर चुकी थीं।

पिछली बार टूटा था सोनी का सपना
सोनी चौरसिया ने पिछले साल वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का प्रयास किया था लेकिन असफल रही थी। आर्य महिला पीजी कॉलेज में 14 से 17 नवंबर तक सोनी ने 87 घंटे 18 मिनट तक कथक किया था लेकिन थकान की वजह से वह गिर गई थीं और उनका वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का सपना टूट गया था।

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी: स्कूलो मे लूट, 09 अप्रैल 2016, शनिवार

स्कूलों में लूट ..........

आज बैठे बैठे स्कूलों के शुल्क संरचना के विषय मे सोच रहा था। समाज मे शिक्षा के प्रसार व दान के नाम पर चलने वाला यह व्यापार किस तरह काम करता है इसका आकलन करते हुये यह महसूस किया कि यदि इस व्यापार पर जल्दी ही कोई नियंत्रणातम्क व्यवस्था नही लागू की गयी तो वह दिन दूर नही जब शिक्षा के नाम पर चलने वाले यह संगठन आर्थिक भ्रष्टाचार के सबसे बड़े तंत्र बन जायेगें।
एक उदाहरण के लिये हमने सी क्लास के एक शहर के मध्यम वर्गीय विद्यालय को लिया। मान लें कि अगर स्कूल में  7000 बच्चे हैं Annual fee building fund ke sath 5000/- rs hai ,
7000*5000=35000000 , यानी कि तीन करोड़ पचास लाख रुपये यह रकम आप से बिना वजह लेते है बिलिंडग और ऐनुयल फडं के रूप मे , यह फडं स्कूल लगाता कहा है ?? कही नही...............
अब टयुश्न फीस 1400/- महीना  यानी 7000 बच्चे , 7000*1400 =9800000 रुपये प्रति महीना और स्कूल का खर्च 160 मैडम कर्मचारी लगभग 160*20000=3200 000 बत्तीस लाख साथ में मैनटेंनस 1800000 अठारह लाख रुपये यह भी मैंने ज्यादा गिन दिए टोटल हुए 50000000 पचास लाख रुपये  ................
आया प्रति महीना 98000000 और खर्च हुआ 50000000 बाकी बचे 48000000 अरतालिस  लाख रुपये महीना ,अब कम्प्यूटर के लिए 100 रुपये प्रति महीना 5000*100=500000 पांच लाख रुपये प्रति महीना लगता लगभग लाख रुपये महीना बाकी बचे 400000 रुपये टोटल हुए बावन लाख रुपये महीना ,फिर यह ऐनुयल फीस और बिलिंडग फंड क्यो ??
यहां ना तो सरकार देखती है ना ही कोई विभाग .....................
टैक्स के लिए सभी लोगों को ऊपर गिद्ध दृष्टि लगा  कर मडंराते रहने वाले आयकर विभाग की भी स्कूलों पर निगाह नहीं है ।

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : नवरात्रि का दूसरा दिन और अपना बनारस, 09 अप्रैल 2016, शनिवार

बनारस के रेसम कटरा मे सुबह ५.४५ पर

बनारस गजब का नगर है...........!!
जहां हर कोई "गुरु" है,
चेला कोई नही,
और
हर कोई " राजा " है,
प्रजा कोई नही।
एक कहता है कि " कागुरु "
दूसरा कहता है " हाँ गुरु "।
एक कहता है " काराजा "
दूसरा कहता है " हाँ राजा "।
.
और तो और बनारस की पतली सी गली में
एक ओर से मोटरसाइकिल तो
दूसरी ओर से सांड आमने-सामने होने पर ,
सांड बड़ी समझदारी से अपनी गर्दन एक तरफ झुकाकर रास्ता दे देता है।
.
एक ऐसा शहर जहां कोई ड्रेस कोड नही है....
एक " गमछा "कमर से लपेटकर दूसरा गमछा कन्धे पर रखकर नंगे बदन पूरा बनारस घूम आइये,
न कोई टोकेगा और न ही खुद बिना कपड़ों के होने का एहसास होगा।।
.
शायद इसीलिए बनारसी लोग बड़े शान से कहते हैं..
.
" ई राजा बनारस है।
.हरऽऽऽऽऽऽ हरऽऽऽऽऽऽ महाऽऽऽदेव

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

भारत वंदना : व्योमेश चित्रवंश की कवितायें, 26 जनवरी 1988

व्योमेश की कवितायें : भारत वंदना

हे भारत तुझे प्रणाम, माँ भारत तुझे प्रणाम
तेरे चरणों का वंदन करते हम तेरे संतान ।
वो तुम ही हो भारत भूमि,जहाँ संस्कृति का निर्माण हुआ
गीता का उपदेश हुआ, भारत का संग्राम हुआ
रामायण युग धर्म हुआ ,सभ्यता का संचार हुआ
जब जब तुझ पे संकटआया , अवतार लिए भगवान।
तुम ही वो जननी हो माँ जो वीरो को जनती है
तेरी संताने तुझ पे माँ सर्वस्व निछावर करती है
राणा, शिवा, आजाद, भगत जैसे कितने वीर हुए
गाँधी, नेहरू, शास्त्री, सुभाष ने किया स्वयं बलिदान।
तेरी शांत प्रकृति के बेटे ,माँ हम शान्ति दूत कहलाते है
पर उठे कोई ऊँगली तुझ पर ,हम कालदूत बन जाते है
रंगभेद मिटला कर हम , विश्वबंधु कहलाये है
तेरी धरती पे जन्म लिए ,हमको है अभिमान।
कश्मीर से कन्याकुमारी, तुम एक अखंड मूर्ति हो माँ
भारत के हर जन जन के मन में बसी छवि हो माँ
तुझ पे गर कोई हाथ उठा, वो हाथ वहीं कट जाएगा
तेरी खातिर दे देंगे हम कोटि कोटि जन प्राण.

(गणतंत्र दिवस विशेषांक, दैनिक आज , २६ जनवरी १९८८, वाराणसी के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित मेरी पहली कविता)

मिल कर बने सूरज : व्योमेश चित्रवंश की कवितायें , 02जनवरी 2000

मिल कर बने सूरज

कुहॉसे और अंधियारे के बीच
दिखने लगी आशा की एक किरण
बादलो के घने लामबंद परतो को तोड़
चमकने को आतुर है अब सूरज
बार बार पीछे कर देते हैं उसे
काले डरावने सफेद भूरे बादल
लेकिन वह आयेगा, चमकेगा अवश्य
क्योंकि उस पर ही टिकी हैं
सारी दुनिया की आशायें
अंधकार से लड़कर प्रकाश
और अग्यानता को चीर कर ग्यान को
विस्तारित करने के उदाहरण
आओ हम सब मिल कर बने सूरज
फैलाये नव प्रकाश
क्योंकि मिल कर अंधेरे से लड़ने पर
सूरज को शक्ति मिलती है....

(०२ जनवरी,२०००)

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : बासंतिक नवरात्रि 08अप्रैल 2016, शुक्रवार

08 अप्रैल 2016, शुक्रवार

बासंतिक नवरात्रि
आज से बासंतिक नवरात्रि प्रारंभ हुआ। पर्यावरण असंतुलन के कारण शहर के तापमान मे अप्रत्याशित बृद्धि ने व्यवस्था अस्त व्यस्त कर दिया है। सुबह १० बजे तक सूरज के तेज को झेलते हुये तापमान ४२ डिग्री तक पहुँच जाना कही से भी उचित नही कहा जा सकता । उस पर विकास के नाम पर अंधाधुँध प्राकृतिक संसाधनो का दोहन, सड़क के चौड़िकरण के लिये वृक्षो की मनमानी कटाई व विकल्प के नाम पर केवल मौखिक आश्वासन । पता नही कब इस सोच को सकारात्मक दिशा मिल सकेगी?
आज से हमारा नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हुआ। हमारा मानना है कि नवरात्रि का व्रत जहॉ रितु संक्रमण मे शरीर के अवयवो को विकाररहित करते हुये एक नया कलेवर देता है वही आध्यात्मिक दृष्टि से मन व आत्मा को भी एक उत्कृष्ट अवसर देता है स्वयं के मूल्यांकन व स्वयं को आत्मसाक्षात्कार करने का। मेरे लिये नवरात्रि व्रत का दूसरा उद्देश्य ही महत्वपूर्ण है।
इस बार पता नही क्यों होली के बाद से ही पेट कुछ ठीक नही चल रहा है, उम्मीद थी कि दो चार दिन मे ठीक हो जायेगा। दवाये मेरे लिये सदैव से परहेज की विषयवस्तु रही है, पर अभी तक इस बार ऐसा नही हुआ अंतत: दवा की शरण मे जाना ही पड़ा, उम्मीद है कि कल तक ठीक हो जायेगा।
दिन मे आकाशवाणी वाराणसी मे रिकार्डिग थी। अम्बेदकर पर जन्मदिवस पर वार्ता के लिये, बीच दूपहरी मे जाना हुआ पर सड़को की ताप के बीच कही गलियो मे बचे इक्का दुक्का पेड़ यह अहसास कराने से नही चूक रहे थे कि उनका महत्व पूर्व की तुलना मे और बढ़ गया है।
बनारस मे नवरात्रि के पर्व का विशेष महत्व है यहॉ नौ दिनो के लिये नौ अलग देवियो के नौ अलग आस्थानो के दर्शन की परंपरा है जिसका बनारसी लोग बड़ी श्रद्धा व विश्वास से पालन करते है। इस दौरान काशी में स्थित देवी के अलग-अलग नौ स्वरूपों की पूजा की जाएगी। मान्यता है कि नौ दिनों में देवी के इन स्वरूपों के दर्शन करने से सभी परेशानियां दूर हो जाती है। देवी मां भक्तों की हर मन्नत पूरी करती हैं। मान्यता है कि काशी भारत में एक मात्र स्थान है, जहां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री रूपी नव दुर्गा मंदिर में विराजमान हैं। नवरात्रि के दौरान यहां दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। कई स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि 13वीं शताब्दी के समय से ही काशी में नव दुर्गा मंदिर अस्तित्व में है। शास्त्रों में भी वर्णन मिलता है कि दुर्गा के अलग-अलग रूप आठों दिशाओं से काशी की रक्षा करती हैं।
1. शैलपुत्री देवी:
नवदुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री का है। काशी के अलईपुरा इलाके में इनका मंदिर बना है। हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। शैलपुत्री देवी का वाहन वृषभ है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल है। इन्हें पार्वती का स्वरूप भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप ने ही शिव की कठोर तपस्या की थी। कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से शादी में आ रही रुकावटें दूर हो जाती हैं।
2. ब्रह्मचारिणी देवी:
देवी के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी देवी का मंदिर दुर्गाघाट में स्थित है। इस स्वरूप में देवी तप का आचरण करने वाली हैं। ऐसे में उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है। उनका स्वरूप ज्योतिर्मय और बेहद भव्य है। इनके दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। जो भक्त देवी के इस रूप की आराधना करता है, उसे साक्षात परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
3. चंद्रघंटा देवी:
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी देवी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है। काशी में इनका मंदिर चौक इलाके में स्थित है। माता का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र बना हुआ है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है। इनके दस हाथ होते हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने की होती है।
4. कुष्मांडा देवी:
यह देवी मां का चौथा स्वरूप है। इनका मंदिर दुर्गाकुंड में स्थित है। मान्यता है कि देवी मां ने अपनी हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था। इस कारण उनका नाम कुष्मांडा देवी हो गया। इन्हें सृष्टि की आदि स्वरूपा माना जाता है। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, फूल, अमृत पूर्ण कलश, चक्र और गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। देवी का वाहन सिंह है।
5. स्कंदमाता देवी:
आदि शक्ति का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता है। जैतपुरा इलाके में इनका मंदिर स्थित है। स्कंद कुमार यानि कार्तिकेय की मां होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। देवी मोर की सवारी करती हैं और कमल पर विराजमान रहती हैं। इनकी गोद में बाल स्कंद कुमार बैठे रहते हैं। इसी कारण से इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। संतान सुख के लिए इनका दर्शन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि पूजा से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्त की गोद भर देती हैं।
6.कात्यायनी देवी:
देवी का छठा स्वरूप कात्यायनी देवी है। काशी में इनका मंदिर सिंधिया घाट मोहल्ले में है। माना जाता है कि देवी ने महर्षि कात्यायन की बेटी के रूप में अवतार लिया था। इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। ऋषि कात्यायन ने लगातार सप्तमी, अष्टमी और नवमी को इनकी पूजा की थी। दशमी के दिन देवी ने महिषासुर का वध किया था। इनका स्वरूप भव्य और दिव्य है। इनकी अराधना से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहा जाता है कि रुक्मिणी ने भी कात्यायनी देवी की आराधना कर कृष्ण को पति के रूप में पाया था।
7. कालरात्रि देवी:
देवी मां का सातवां स्वरूप कालरात्रि है। इनका मंदिर कलिका गली में है। इनके शरीर का रंग घने अंधेरे की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। देवी की तीन आंखें हैं। ये ब्रह्मांड की तरह गोल हैं। इनका वाहन गर्दभ है। देवी अपने दाएं हाथ की वर मुद्रा से सभी भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। देवी का यह स्वरूप देखने में काफी भयानक है, लेकिन इनका दर्शन करना हमेशा शुभ फल देता है। इसी कारण इनका नाम शुभ कारिणी भी है।
8. महागौरी देवी:
महागौरी देवी दुर्गा का आठवां स्वरूप है। विश्वनाथ गली में इनका मंदिर है। यहां महागौरी को अन्नपूर्णा देवी के रूप में भी पूजा जाता है। महागौरी देवी वृषभ की पीठ पर विराजमान रहती हैं। उनके माथे पर चांद का मुकुट सजा रहता है। मां अपने चार हाथों में शंख, चक्र, धनुष और बाण लिए हुए हैं। उनके कानों में रत्न जड़ित कुंडल झिलमिलाते हैं। महागौरी देवी अपने भक्तों को सौंदर्य प्रदान करती हैं।
9. सिद्धिदात्री देवी:
यह आदि शक्ति माता का नौवां रूप है। सिद्धिदात्री मंदिर बुलानाला में स्थित है। मां भगवती का यह स्वरूप भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां देता है। वह श्रद्धालुओं की सभी कामनाओं को पूरा करती हैं। माना जाता है कि देवी के नौ रूपों की पूजा तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक की सिद्धिदात्री की पूजा नहीं कर ली जाती है।
     आज से ही हम सनातनधर्मियों के नववर्ष विक्रम संवत की शुरूआत हो रही है। घर मे पूजा पाठ व उत्सव का माहौल है। बच्चो ने ऊँ कार युक्त भगवा ध्वज छत पर लगा दिया है। मित्रो के बीच शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी चल रहा है। विश्वास है मॉ भगवती आने वाले वर्ष मे हम सबको सुख समृद्धि व स्वास्थ्य से परिपूर्ण करेगीं।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

व्योमेश चित्रवंश की कवितायें: मॉ, (03अक्टूबर1999)

                         मॉ,

ओ मेरी जन्मदात्री, मेरी अनकही मॉ
तूने ये क्यों नही सोचा
कि तू भी तो एक लड़की थी
बिलकुल मेरी तरह
आज से बीस पचीस बरस पहले
क्यों भूल गयी तू कि मॉ होना ही
स्त्री के लिये सबसे अनमोल तोहफा है
पर नही, तू तो निर्दय थी।
ओ मेरी जन्मदात्री, मेरी निष्ठुर मॉ
तूने ये भी नही सोचा
कि कूड़े की ढेर पर फिंके मेरे नन्हे से तन को
खा जायेगे कुत्ते स्वाद ले ले कर
सच बता?
क्या तूझे बिलकुल दया नही आयी थी
अपने ही शरीर के अंश रहे
मेरे रक्त मज्जा से लिपटे कोमल तन पर,
क्या तू बिलकुल ही हृदयहीना थी,
ओ मेरी जन्मदात्री मेरी अनकही मॉ
तूने क्या ये भी नही सोचा कि मै भी
इंदिरा, ऊषा या टेरेसा या क्यूरी बन सकती हूँ
पर तूने तो मुझे मार डाला था मुझे फेंक कर
उस कूड़े की ढेर पर
क्या तूझे बिलकुल भी दया नही आयी थी
मेरी टुकुर टुकुर करती टिमटिम ऑखो पर,
हॉथ की मुट्ठियों मे बंधे
मेरे भविष्य के पन्नो पर
अंगूठे को चूसती अपनी मॉ को खोजती
उस दूधमुँही बच्ची पर
जो बिलकुल नयी थी
तुम्हारे इस क्रूर दुनिया मे,
ओ मेरी जन्मदात्री मेरी पाषाणहृदया मॉ
क्या कहूँ तुझे, तुम खुद ही बतलाओ
मेरी जन्मदात्री या मेरी हत्यारिन?
क्या तूझे आज भी अपराधबोध नही ग्रसता
मेरी हत्या के प्रयासो पर?
क्या लज्जित नही हुई थी तू
मुझ अबोली को फेकते हुये
कूड़े के ढेर पर?
मै जानती हूँ तुम्हारे पास कोई उत्तर नही है
मेरे सवालो का,
क्योकि हर बार खुद से भी यही पूछ कर
रह गयी हो तुम उत्तरहीन।
है ना मेरी जन्मदात्री मेरी अनकही मॉ ।

(अक्टूबर १९९९ मे कूड़े पर मिली एक नवजात बच्ची की खबर से प्रेरित लिखी भावनायें)