शनिवार, 7 जनवरी 2017

मेरा मानना है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 06 जनवरी 2017, शुक्रवार

        उसने टोपी नहीं पहनी मुस्लिमों को नाराज किया....
उसने 1% टैक्स लगा कर स्वर्णकारों को नाराज किया....
उसने होटल वालों के सर्व्हीस चार्जपर हथौड़ा चला के ग्राहकों के हित के लिए होटलवालों से पंगा लिया...
उसने 500 और 1000 के नोट बन्द कर के अपने ही परम्परागत वोट बैंक को नाराज किया....
बैंकवालों पे नकैल कसना शुरू कर के उन से भी पंगा लिया....
कैश लेस को बढ़ावा दे कर वो टैक्स चोरों के रास्तों का रोड़ा बन गया है....
रेडा जैसा क़ानून कर के बिल्डरों को नाराज़ किया...
बेनामी का क़ानून पारित कर के ज़मीन के काला बाजारियों को बेनक़ाब कर रहा है...
स्पेक्ट्रम, कोयला आदि का भ्रष्टाचार दूर कर के देश को लाखों करोड़ों का फ़ायदा देने के लिए बड़े उद्योगपतियों से पंगा लिया....
गैस सब्सिडी, मनरेगा आदि का पैसा सीधे बैंक खाते में जमा करने के कारण सभी बिचौलियों की दुकानें बंद कर दी....
युरिया को नीम कोटिंग करने से केमिकल फ़ैक्टरियों का गोरख धंदा चौपट कर दिया...
लगभग हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार कम करने के नये नये तरीक़ों का आग़ाज़ कर रहा है....
सभी सरकारी कामों में टेक्नॉलजी के कारण गति लाने के प्रयास के कारण दलालों का 'स्पीड-मनी' बंद कर रहा है...
और न जाने कितनों को वो रोज़ नाराज़ कर रहा है....
       हो सकता है आप भी उस के किसी क़दम से नाराज़ चल रहे हो, आप का भी कुछ नुक़सान हुआ हो....
           वो सही में पागल बन गया है क्या? वो चाहता तो आराम से किसी का दिल दुखाये बिना राज कर सकता है...
वह हर रोज़ नये नये क़दम उठा कर देश के हर क्षेत्र की बुराइयाँ दूर करने की रात दिन मेहनत कर रहा है...
क्यों कि...
उसे कुर्सी से प्रेम नहीं है । उसे सिर्फ अपने देश और सवा सौ करोड देशवासियों से प्रेम है...वो अपने देश को दुनियाँ में सबसे समृद्ध बनाना चाहता है...हर बुराई को ख़त्म करना चाहता है...वो भी इसी जनरेशन में...
अब भले ही आप उसे वोट न दें....
हो सकता है उस की कुर्सी २०१९ में चली जाएँ...उसे उस की चिंता नहीं है....
आज जो उसका या उस के समर्थकों का मजाक उडा रहा है वो वास्तव में खुद का और खुद की भावी पीढी का मजाक उडा रहा है...।   
      देश बेचकर अपना जेब भरनेवाले चंद दोगले नेताओं, टीव्ही चैनलों और ब्युरोक्रेट्स की बातों में आकर उसका साथ छोडा तो खुद को मजाक बनने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। सरकार की कुछ कमियों को, कुछ अब तक न हुए कामों को बढ़ा चढ़ा कर बोल कर ये लोग आप को गुमराह कर रहे है...
इस स्थिति में सभी खुनी भेडिये उसके खिलाफ लामबंद हो रहे हैं...देश के लिए उसे हमारे साथ की जरुरत है...
          इस से भी जादा हमें उस की ज़रूरत है। आप ने उसे हटा दिया तो उस का कुछ नहीं बिगड़नेवाला...वो तो हिमालय में चला जाएगा...
  लेकिन हमारी अगली नस्लें हमें सैकड़ों सालों तक कोसेगी.....
      भाइयों, हमें अपने प्रधानमंत्री का साथ हर हाल में देना ही होगा..हमें उसकी आवाज बननी है...अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए....
(बनारस, 06 जनवरी 2017, शुक्रवार)
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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

बनारस, रवीश के नजरों से : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 जनवरी 2017, शनिवार

रवीश तिवारी एक जमाने मे मेरे पसंदीदा टीवी एन्करो मे से एक थे बाद मे उनके प्रो सेक्यूलरिज्म व विचार विशेष की पैरवी व जबर्दस्ती के विचार थोपने वाली पत्रकारिता के च ते हमने उन्हे व उनके चैनल को देखना ही लगभग बंद कर दिया. अभी हाल मे हमारे एक मित्र ने हमारे शहल बनारस पर लिखा रवीश का यह ब्लॉग भैजा, पढ़ने पर अच्छा लगा. बनारस शहर पर रवीश के नजरिये के हम बनारसी लोगों को पढ़ना चाहिए

      बनारस:रोज़ देखा जाने वाला, कहा जाने वाला, सुना जाने वाला लिखा जाने वाला और इन सबसे ऊपर जीया जाने वाला शहर है। इसकी इतनी परिभाषाएं और व्यंजनाएं हैं कि यह शहर हर लफ़्ज़ के साथ कुछ और हो जाता है। लिखनेवाले की गिरफ़्त से निकल जाता है। मैं बनारस के ख़िलाफ़ किसी बनारस को खोजने निकला था मगर हर जगह मिला उसी बनारस से जिसे मीडिया ने एक टूरिस्ट गाइड की तरह एकरेखीय वृतांत में बदल दिया था। वृतांतों का रस है बनारस।
दरअसल, बनारस कोई शहर ही नहीं है। यह कभी था न कभी है और कभी रहेगा। शहर होता तो किसी पेरिस जैसा होता, किसी लुधियाना-सा होता या किसी दिल्ली-सा। सड़कों दीवारों से बनारस नहीं है। बनारस है बनारस के मानस से। आचरण, विचरण और धारण से। जो भी मिला बनारस को धारण किए मिला। बनारसीपन। इसके बिना तो कोई बाबा विश्वनाथ को देख सकता है न बनारस को। यह बनारस का होकर बनारस को जीने का शहर है। यह न मेरा है न तेरा है न उसका है, जो बनारस का है।
बहुत कम हुआ जब लौट आने के बाद किसी शहर की याद आई। किसी शहर में जागने-सा अहसास हुआ। सोचता रहा कि क्या लिखूं बनारस पर। क्या नहीं लिखा जा चुका है। इस शहर के लोग किसी दास्तान की तरह मिलते हैं। क़िस्सों से इतने भरे हैं कि सुनाते-सुनाते ख़ुद किसी किस्से में बदल जाते हैं। मिलने और बोलने का ऐसा रोमांच कहीं और महसूस नहीं हुआ। जो भी मिला उसे जितना मिलना चाहिए उससे ज़्यादा मिला। कम तो कोई मिला ही नहीं। कम तो हम दिल्ली वाले मिले। सोचते रह गए कि कितना मिले और सामने वाला पूरा मिलकर चला गया। बनारस को खोजना नहीं पड़ता है। कहीं भी मिल जाता है।
हम बाबा ठंडई की दुकान पर थे। उनकी शान में क़सीदे पढ़ते रहे कि हर साल आपकी ठंडई एक मित्र से बुज़ुर्ग के हवाले से दिल्ली पहुंच जाती है। पिछले कई सालों से आपकी ठंडई पी रहा हूं। कोई चालीस-पचास साल से ठंडई बना रहे जनाब ने ऊपर देखा तक नहीं कि कौन है क्या बोल रहा है। बस किसी साधना की तरह ठंडई बनाने में लगे रहे। साधना ज़रूरी है। चाहे आप देश चलाएं या ठंडई बनाए। मगर वहीं खड़े किसी शख़्स ने किसी को भेजकर पान मंगवा दिया। लस्सी की दुकान का पता बता दिया। कार से गुज़रते वक्त पान और चाय की दुकानों पर लोगों को जमा देखा। रुककर खाकर बतियाते देखा ।
लगा कि इस शहर में लोग दफ़्तर दुकान जाने के अलावा भी घर से निकलते हैं। सुबह-सुबह चाय पीने गया था। बस किसी ने किसी को कह दिया कि बाइक से इन्हें पार्क तक छोड़ आओ। बिना देखे बिना जाने उसने चाय छोड़ी और पार्क तक छोड़ आया। जिन्हें भी जीवन में बात करने की समस्या है। लगता है कि वो तर्क नहीं कर पाते। वो बनारस चले जाएं। बोलने लग जाएंगे। ख़ासकर टीवी के ये बौराये और झुंझलाये एंकरों को हर साल बनारस जाना चाहिए।
रेडियो मिर्ची के दफ़्तर गया था। नौजवान जौकियों के संसार में। बात करने की ऐसी शैली कि मेरा बस चले तो हर जौकी बनारस की सड़कों से उठा लाऊं। सबके पास कुछ न कुछ अतिरिक्त था, मुझे देने के लिए। आज के इस दौर में उनके पास बहुत-सी गर्मजोशियां बची हुई हैं। जल्दी समझ गया कि यह टीवी में दिखने के कारण नहीं है। जो प्यार बह रहा है वो बनारस के कारण है। मिर्ची के इन मिठ्ठुओं से मेरा भी दिल लग गया। तोते की तरह बोलता था वो मोटू! तो शांत संभलकर अमान और रह रहकर सोनी। एक से एक किस्सागो। बात-बात में मैं विशाल के साथ लाइव हो गया। उनके कुछ और दोस्तों से मुलाक़ात हुई। हर मुलाक़ात में मैं बस इस शहर के लोगों में मिलने की फ़ितरत देख रहा था। कितना मिलते हैं भाई। भाइयों ने मेरी शान में दफ़्तर के भीतर चाट का एक स्टाल ही लगा दिया। टमाटर की चाट। वाह। दिल्ली वालों को पता चल गया तो हर नुक्कड़ और बारात में बेचकर खटारा बना देंगे।मुझे पता है कि जितना मिल जाता है उतना लायक नहीं हूं। वैसे भी क्या करना है हिसाब कर। टीवी के फ़रेब के नाम पर प्यार ही तो मिल रहा है। मैं माया में यक़ीन करता हूं। सब माया है। माया मिलाती है, माया रुलाती है और माया हंसाती है। घड़ी की दुकान में स्ट्रैप बदलवाने गया था। जनाब ने कोई स्पेशल जूस मंगवा दी। कहा कि पीते जाइये। ज़ोर देकर कहा कि मैं चाहता हूं कि आप पीयें। ये बनारस का असली है। मैंने तो कहा भी नहीं था पर वो यह जूस पिलाकर काफी ख़ुश दिखे। इतने ख़ुश कि लाज के मारे शुक्रिया कहते न बना।
वो पता नहीं कौन लड़का था। लंका चौक पर जहां बीजेपी का धरना चल रहा था। भयानक गर्मी थी। वो पहले जूस लाया फिर पार्कर पेन ख़रीद लाया खुद ही पैकेट से निकाल कर जेब में रख गया। किसी चैनल के फ़्रेम में देखकर वो महिला अपने पति और बेटी के साथ दौड़ी चली आई। हांफ रही थी। वो घर ले जाकर खाना खिलाना चाहती थी। काश मैं चला गया होता। और वो कौन था जो मिर्ची दफ़्तर के बाहर हम सबकी चाय के पैसे देकर चला गया। आठ दस लोगों की चाय के पैसे। मैं सोचता रह गया कि हमने कब किसी अजनबी के लिए ऐसा किया है। उफ्फ!
अजीब शहर है कोई ख़ाली हाथ मिलता ही नहीं है। ऐसा नहीं कि मैं टीवी वाला हूं इसलिए लोग मिल रहे थे। मुझसे मिलने के बाद वहां मौजूद किसी से वैसे ही मिल रहे थे। हम दिल्ली वाले मिलना भूल गए हैं। काम से तो मिलते हैं, मगर मिलने के लिए नहीं मिलते हैं। रोज़ दफ़्तर से लौटते वक्त ख़ाली-सा लगता हूं। अब तो मेरा एकांत ही मेरी भीड़ है। मैं भी तो कहीं नहीं जाता। जाने कब से अकेला रहना अच्छा लग गया। ग़नीमत है कि फेसबुक ट्वीटर है। जो भी अकेले में बड़बड़ाता हूं, लिख देता हूं। अकेले बैठे बैठाए दुनिया से मिल आता हूं। काम और शहर के अनुशासन की क़ीमत पर मुलाक़ात का बंद होना ठीक नहीं। हम मिलते तो यहीं बनारस बना देते। बनारस एक-दूसरे से मिलता है इसलिए बनारस है। दिल्ली के नाम में तो दिल है मगर दिल है कहां। दिल्लगी है कहां और कहां है दीवानगी। बनारस में है। वहां के लोगों में है। आप सबने मुझे बेहतरीन यादें दी हैं। मैं बनारस को याद कर रहा हूं।
@रवीश कुमार की कलम से (NDTV)
(बनारस, 07 जनवरी, 2017, शनिवार)
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सोमवार, 2 जनवरी 2017

एक और जिम्मेदारी के लिये धन्यवाद : व्योमेश चित्रवंश की डायरी 02 जनवरी 2017, सोमवार

एक और जिम्मेदारी के लिये धन्यवाद

उपजा वाराणसी इकाई का 2017-18, 2018-19  द्विवार्षिक चुनाव शिवपुर उपजा कार्यालय में सम्पन्न हुआ। उपजा सदस्यों की मौजूदगी में सर्वसम्मत से विनोद बागी को अध्यक्ष, सुबोध त्रिपाठी को महामंत्री चुना गया। उपाध्यक्ष सुशील श्रीवास्तव, अमन सिद्दकी, रामनरेश जी, डॉक्टर रुद्रानंद चुने गए।
मंत्री पद पर रविंद्र गिरी, विजय शंकर चौबे, व्योमेश चित्रवंश और कोषाध्यक्ष  अतुलेश उपाध्याय चुने गए। कार्यकारिणी में 11 सदस्य चुने गए।
सभी नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

मेरी बिटिया द्वारा नये साल पर रचित कविता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 31 दिसबंर 2016

Aaj ek aur saal beet jaega
Kuch khatti or
Kuch meethi yaaden de
Naye dost mile
Kuch purane dur bhi ho gye
Naye anubhav diye
Kuch ache
Kuch kharab
Zindagi aage badhi
Kuch nayi yaaden batori
Kuch purani dushmani
Dosti me badli
Lakho sapne dekhe
Kuch pure hue
Kuch adhure hi reh gye
Ek umeed h naye saal me
Honge rubaru nayi khushiyon se
Sapne honge pure
Kamyabi kadam chumegi
Apne aur kareeb aenge
Kuch naye dost zindagi me jagah me jagah banaege
Isi umeed k sath iss saal ko vida krte h
Aur bahen phaila naye saal ka swagat krte h....
- Vidisha Chitravansh, 31 December 2016

यह झटपट कविता मेरी बिटिया कनु ने अपनी सहेलियों के लिये लिख कर अभी अभी फेसबुक पर पोस्ट किया, मुझे अच्छी लगी तो अपनी डायरी मे कापी कर पोस्ट कर रहा हूँ.

अखबारों मे पढ़ के अच्छा लगता है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 31 दिसंबर 2016, शनिवार

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

आज कमिश्नर साहब ने फिर मेरे शहर के बेपटरी यातायात समस्या हेतु रणनीति बनाई पर वीडीए व नगरनिगम के नीयत को देखते हुये हम मुतमइन है.
देखें कि भोजूबीर लगायत गोदौलिया , आशापुर लगायत चौक के बड़े रसूखदार लोगों द्वारा किया अतिक्रमण शायद हट जाये या वरूणा की तरह बड़़े लोगो के असर से सड़क ही न सिकुढ़ जाये.
(बनारस, 31दिसंबर 2016, शनिवार)
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गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

नववर्ष 2017

बदलते वक्त के संग शुभकामना संदेश: व्योमेश चित्रवंश की डायरी,29 दिसंबर,2016,गुरूवार

बदलते वक्त के संग शुभकामना संदेश

अब नही रहता इंतजार
नये साल पर डाकिये के आने का
बार बार नही उठती है ऑखे
टेबुल पर पड़े हैप्पी न्यू ईयर कार्डों पर
नही रहती होड़ औरों से अच्छा कार्ड चुनने की
कोहरे व ठण्ड भरे दिनों मे कई कई दुकानों पर

क्योंकि अब मिल जाते है शुभकामना संदेश
मोबाईल, टेलीफोन पर 'हैप्पी न्यू ईयर' के तीन शब्दों मे
बारह बजते ही रात के आनन फानन में
वाट्सऐप्प, फेसबुक, एसएमएस व सोशल मीडिया में

पर मुँह से बोले उन तीन शाब्दों मे वह अपनापन
नही महसूस कर पाता मेरा मन
जो साल भर तक रिश्तो को गरमाये रखता था
नव वर्ष के के शुभकामना वाले रंगीन कार्डों में
साल के पहले दिन से आखिरी रात तक
मन को छूती यादों मे
डाकिये के कदमों मे, किवाड़ पर पड़ी दस्तकों में

हम बदल रहे हैं, हमारा स्वभाव बदल रहा है
घड़ी की सूईयों व तारीखों के साथ साल बदल रहा है .

बदलते वक्त के दौर मे आपके संग बिताये यादो के क्रम में वर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाये,
                                                -व्योमेश चित्रवंश,
                          बनारस, 29दिसंबर 2016, गुरूवार

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

ये तो मनोरोग का मामला है हूजूर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 दिसंबर 2016, मंगलवार

ये *मनोरोग का मामला है हूजूर..!*

- उसके चेहरे से नफरत...
- उसके PM बनने की बात से नफरत..
- उसके PM बन जाने से नफरत,
- उसके कपड़ों से नफरत...
- उसके सुधार कार्यक्रमों से नफरत..
- उसके विदेश दौरों से नफरत...
- उसके भाषण से नफरत...

- उसकी माँ से नफरत..
- उसने चाय बेचीं तो नफरत..
-उसने देश के लिए घरबार बीबी को त्याग किया तो नफरत..

- संसद में बैठे तो नफरत..
- जनता से बोले तो नफरत..
-रेडियो टीवी पर बोले तो नफरत..
-न बोले तो नफरत..
- भाषण की भावुकता से नफरत..
- भाषण की दृढ़ताओं से नफरत..
-वो रोये तो नफरत..
-वो हँसे तो नफरत..

- पाकिस्तान से वार्ता पर नफरत...
- पाकिस्तान से सख्ती पर नफरत,
-surgicle स्ट्राइक पर नफरत..
-सैनिको को मारने वाले आतंकवादी मारे तो नफरत..

- काले धन पर अभियान न चलने पर नफरत...
- अभियान चले तो नफरत...
-15लाख की भीख नहीं मिले तो नफरत..
-भ्रष्टाचारी की पुंगी बजाई तो नफरत...

इस बात से भी नफरत कि कोई आदमी उसके पक्ष में पोस्ट कैसे लिख सकता है..??
और-
तो मोदी भक्त का संबोधन...

मोदी का विरोध करने वाले यह नहीं बताते कि वह *समर्थन किसका करते हैं..?*
जिसको जनता ने चुन के लाया उसका या अल्प मत का?
कामचोरों का या जो 18 घंटे काम करता है उसका..

माफ़ कीजियेगा हुज़ूर
ये मनोरोग का मामला है।
(बनारस, 27 दिसंबर 2016, बुधवार)
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गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

जाने कहॉ गये वे दिन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22दिसम्बर 2016, गुरूवार

शादी मे (buffer) खाने में वो आनंद नहीं जो पंगत में
आता था जैसे.... 
👉 पहले जगह रोकना ! 
👉 बिना फटे पत्तल दोनों का सिलेक्शन!
👉 उतारे हुयें चप्पल जूतें
पर आधा ध्यान रखना...!
👉 फिर पत्तल पे ग्लास रखकर उड़ने से रोकना!
👉 नमक रखने वाले को जगह बताना
यहां रख नमक
.
सब्जी देने वाले को गाइड करना
हिला के दे
या तरी तरी देना!
.
👉 उँगलियों के इशारे से 2 लड्डू और गुलाब जामुन,
काजू कतली लेना
.
👉 पूडी छाँट छाँट के
और
गरम गरम लेना !.
👉 पीछे वाली पंगत में झांक के देखना क्या क्या आ
गया !
अपने इधर और क्या बाकी है।
जो बाकी है उसके लिए आवाज लगाना
.
👉 पास वाले रिश्तेदार के पत्तल में जबरदस्ती पूडी
🍪 रखवाना !
.
👉 रायते वाले को दूर से आता देखकर फटाफट रायते
का दोना पीना ।
.
👉 पहले वाली पंगत कितनी देर में उठेगी। उसके
हिसाब से बैठने की पोजीसन बनाना।
.
👉 और आखिर में पानी वाले को खोजना।
🍴 🍴 🍴 🍴 🍴 🍴 😜
#अपनी संस्कृति, अपनी विरासत
(बनारस, 22 दिसंबर 2016)

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

बीएसएनएल मोबाईल मे घोटाले की आशंका

माननीय मंत्री जी,

मै प्रधानमंत्री मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का बीएसएनएल पोस्टपेड मोबाईल 9450960851 का पिछले लगभग आठ साल से उपभोक्ता हूँ. पिछले तीन वर्षो से हमे उक्त नंबर का मुद्रित बिल नही मिल रहा है. जबकि मैने कई बार इस तथ्य की शिकायत करते हुये यह अनुरोध किया कि मुझे ईमेल द्वारा या वेवसाईट के माध्यम से ही काल डिटेल्स व बिल का विस्तृत विवरण दिया जाय पर आज तक कोई सुनवाई नही हुई. जिससे मुझे यह जानकारी नही मिल पाती कि मेरे मोबाईल नंबरो से किन नंबरो पर काल व मैसेज का आदान प्रदान हो रहा है. 

कृपया अपने स्तर से मुझे मेरे मोबाईल नंबरो के काल व मैसेज डिटेल्स व बिल विवरण उपलब्ध कराने की कृपा करें.

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रविवार, 4 दिसंबर 2016

ये कैसा प्रजातंत्र है? हम संसद नहीं चलने देगें : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 04दिसंबर2016, रविवार

कमाल है यार..........

आप कह रहे हो नोट बंदी में 50 दिन कस्ट सह लो.

अभी कह रहे हो सिनेमा में राष्ट्रगान के लिए खड़े हो जाओ,
कल को कहोगे सड़क पर थूको मत.
परसों दीवाल पर पेशाब करने से मना करोगे,
उसके अगले दिन रेलवे ट्रैक गन्दा करने से भी रोक दोगे.
उधर कचड़ा मत फेंको ये न करो वो न करो
फिर 2 से ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं करने दोगे,
उसके बाद सबके बच्चों को 2 साल तक सेना में जाने की भी ज़बर्दस्ती करोगे.
फिर बोलोगे बिधायक और सांसद के लिये शिक्षा और दो साल का सेना में नौकरी भी अनिवार्य होगा।।
झोलटंग समझ लिए हो क्या?
ये कैसा भारत बनाना चाहते हो?
आखिर हम अनपढ़, जाहिल, काहिल, घूसखोर, मक्कार लोग कहाँ जाएंगे, अंधेरगर्दि है क्या?
अजी हमारा कोई अधिकार हैं भी या नहीं ? हम भी इसी धरती पर पैदा लिए हैं।
ये कैसा प्रजातंत्र है?

हम संसद चलने नहीं देंगे.......
(बनारस, 04दिसंबर2016,रविवार)

सोमवार, 28 नवंबर 2016

EVERYONE HAS A STORY : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 नवंबर 2016, रविवार

EVERYONE HAS A STORY : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 नवंबर 2016, रविवार
Love is a peculiar thing. When you love, you have so much to be greatful for and to live for, but when you lose it, you go on with every single day as if you just a shell. Survival is the only reason one is on this earth. It has nothing to do with the fact that you feel anything as powerful as love any longer.
            This is the basic theme of love, which creates a story of everyone. EVERYONE HAS A STORY is an Inspirational Romance novel by Savi Sharma. Everyone has a story to tell, Everyone is a writer, Some are written in the books, and some are confined to hearts. My daughter kanu ordered this book on amezon and got it on 18th october 2016, she read it in that very night and insisted me to read it. Since last two days ,I started to read it and just completed. Realy it is very simple but intersting story and appreciable writing. There is Meera, a fledgling writer who is in search of a story that can touch millions of lives. Vivaan, an assistant branch manager at Citibank who dreams of travelling the world. Kabir, a cafe manager who desires something of his own. Nisha, the despondent cafe customer who keeps secrets of her own. Everyone has thier own story. As the four characters get introduced to each others' lives, their lives do change for the better but they also have to struggle through various downfalls. A simple, fare, sacred and  innocent writing is appreciable. The author has poured out her best emotions and has vividly captured each feeling with compassion. The bond of friendship is well developed by the author with realism, sagacity, trials through the genuine essence of its meaning, value and trust. The characters are extremely believable as their realistic demeanor with both flaws and good qualities project them as someone memorable and easy to embrace. The characters evolve throughout the story line, thereby motivating the readers to take a chance to achieve what they dream of and to be brave.
           In a nutshell, this story is not only a driving story encrypted with life's important lessons and intellect, but is highly entrancing yet heart-touching. The book is highly recommended to each and every one, who is looking for a way to believe in their dreams.
You do not start, nor do you ever end. You are constant, yet ever changing. You are everywhere and yet just with me. You are my creater or my creation. I question myself. And got answer for this book "BEAUTIFUL" ( Banaras, 27 November 2016, Sunday)
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शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

मूसबिल्ला : एक संदेश सोशल मीडिया से : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 25 नवंबर 2016, शुक्रवार

(आज हमारे वाट्स एप्प पर हमारेमनीष भाई का एक संदेश मिला । डॉ० मनीष श्रीवास्तव एक बड़े सरकारी उपक्रम मे अधिकारी है और सामयिक सामाजिक मुद्दो पर गहरी पकड़ रखते है।हमे यह शोध व्यंग्य अच्छा लगा तो शेयर कर रहा हूँ।)

                     मुसबिल्ला

           चूहा एक सामाजिक प्राणी होता है । इनका एक पूरा समुदाय होता है और ये भी मधु मक्खियों की तरह एक पूर्णतया विकसित समाज में रहते हैं जिसमे survival का मूल मन्त्र परस्पर सहयोग होता है । सब चूहे मिल के जमीन के नीचे एक colony बनाते हैं । उसमे बाकायदा घर बने होते हैं । माँ और बच्चों के कक्ष अलग होते हैं । एक अन्नागार होता है जहां एक जगह 5 से 10 kg तक गेहूं तक एकत्र कर लेते हैं चूहे । colony में घुसने और निकलने के बीसियों रास्ते होते हैं ।
         मुसहर समुदाय इन चूहों को पकड़ने मारने में बड़ा expert होता है ।
      सबसे पहले कोई सयाना आदमी चूहों के बिल देख के अनुमान लगाता है कि कितनी बड़ी colony है । कितने चूहे होंगे और इस colony में कितना अनाज मिलेगा ।
        उसके बाद कवायद शुरू होती है बिल खोज खोज के उनका मुह बंद करने की । कोई पुराना कपड़ा या सनई ठूंस के बिल का मुह बंद कर देते हैं । फिर किसी एक बिल में बाल्टियों से पानी भरना शुरू करते हैं । इसे आप flooding method कह सकते हैं । चूहे जब डूबने लगते हैं तो बिलों से निकल के बाहर भागते हैं । अब शिकारी का कौशल ये कि सभी बिल खोज के निकल भागने के सारे रास्ते बंद कर दे और सिर्फ दो बिल खुले छोड़े । एक पानी भरने को और दूसरा निकल के भागने का रास्ता । बस उसी बिल के पास सब मुसहर पतली पतली डंडियाँ ले के खड़े रहते है  । चूहा निकला और य्य्य्ये मारा ........ एक आध चूहा निकल के भाग लेता है ....... उसे दो तीन लौंडे दौड़ा के घेर के मार लेते हैं । दौड़ा के मारने का मज़ा अलग ही आता है ।
        उसके बाद कवायद शुरू होती है उन बिलों को खोदने की । मुसहर समुदाय एक colony से 10 - 20 किलो तक गेहूं एकत्र कर लेता हैं । इसके अलावा अगर ठीक ठाक colony हो तो 15 - 20 तक चूहे मार लेते हैं जिनमे कई चूहे तो आधा आधा किलो तक के होते हैं । जी हाँ ....... चूहों के शिकार में छोटी चुहिया पे focus नहीं होता । वो तो यूँ ही हल्ले गुल्ले में और पानी में डूब के या फिर खुदाई में मर जाती हैं । शिकारी की निगाह मोटे ताजे चूहे जिन्हें " घूस " कहा जाता है , उनपे होती है । ऐसे खेत जहां पानी दूर हो वहाँ मुसहर एक अलग तकनीक इस्तेमाल करते हैं जिसे आप smoking कह सकते हैं । किसी एक बिल के पास आग जला के पूरी colony को धुएँ से भर देते हैं । चूहे धुंए के कारण दम घुटने के कारण बाहर भागते हैं और मारे जाते है ।
flooding method में अनाज भीग जाता है जिसे फिर बाद में धो के सुखाना पड़ता है । smoking में अनाज सूखा और सुरक्षित निकल आता है ।
        मोदी भी यूँ समझ लीजे कि मुसहर बने चूहे ही मार रहे हैं । उनका focus मोटे चूहों पे है । ये जो लाख दो लाख या फिर 10 - 20 - 50 लाख या 2 - 4 करोड़ हेरा फेरी कर के या लोगों को बैंक की लाइन में खडा करके exchange करा रहे या वो जो बैंक मेनेजर से मिली भगत कर 2 - 4 करोड़ काले को सफ़ेद कर रहे ये तो छोटी चुहिया हैं।
असली शिकार तो मोटे चूहों का होगा । उनको दौड़ा के मारने में मज़ा आयेगा ।।
         ये जो सरकार रोज़ रोज़ नियम बदल रही है न ....... ये तो चूहे बिल्ली का खेल है ....... सरकार खोज खोज के बिल बंद कर रही है ........ कहाँ से भागोगे बेटा ??????
               31 दिसंबर के बाद देखना ........ जब तहखानों से 50 - 100 करोड़ और 1000 करोड़ या 5 - 10 हज़ार करोड़ वाले चूहे निकलेंगे ........
          डंडा ले के तैयार रहिये ।
(बनारस, 25 नवंबर 2016, शुक्रवार)
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गुरुवार, 24 नवंबर 2016

एक तालाब की कहानी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 23 नवंबर 2016,गुरूवार

एक तालाब की कहानी

                  गाँव के बाहर एक तालाब था...... बहुत ही विशाल... लम्बा-चौड़ा... पानी से लवालव भरा हुआ...
        जितना पुराना गाँव का इतिहास था.... उतना ही पुराना तालाब भी था।
       किसी को नहीं पता कि यह तालाब कब से था?..... किसने बनाया था?
      इसे जिसने भी देखा था.....  ऐसे ही देखा था..... इसी रूप में.....
       तालाब में बहुत सारी मछलियाँ रहती थी..... हर किस्म की..... छोटी-बड़ी..... रंग-विरंगी.....
मछलियाँ इस तालाब की शोभा थी। वह एक झुंड में अपने परिवार के साथ रहती..... तालाब के स्वच्छ, निर्मल जल में इधर-उधर भ्रमण करती..... इतराती-इठलाती......  जल-क्रीड़ा करती।
इन छोटी-बड़ी मछलियों के लिए उस बड़े तालाब में दाने-चारे की कोई कमी न थी..... इस मनोहारी उपयुक्त वातावरण में मछलियों के झुंड खुश थे, फल-फूल रहे थे..... एक साथ बढ़ रहे थे.....
         पर न जाने ऐसा क्या हुआ कि मछलियों के इस सुखी जीवन को किसी की नजर लग गई.....
          इन छोटी-छोटी मछलियों के झुंड में कुछ मछलियाँ बहुत जल्दी ही एक विशाल बड़े मछली के रूप में इसके बीच आ गई...... यह अपने झुंड में से ही अचानक बढ गई या बाहर से इन विशाल मछलियों को किसी ने तालाब में छोड़ दिया..... पता नहीं।
    कैसे क्या हुआ...... भगवान जाने।
तालाब में ये विशाल मछली संख्या में तो थोड़े थे पर पूरे तालाब पर इसका अधिकार हो गया था। यह छोटे-छोटे मछलियों के हिस्से का चारा भी चट करने लग गए..... छोटे मछलियों को अपना ग्रास बनाने लगे....
         छोटे-छोटे मछलियों का जीना मुश्किल होने लगा...... चारे की कमी होने लगी..... हर समय बड़े मछलियों द्वारा खाए जाने का डर सताने लगा।
पर्याप्त चारे के अभाव में छोटी-छोटी मछलियाँ कमजोर होने लगी..... दम तोड़ने लगी...... उसकी वृद्धि रूक गई.....
         अब तालाब में पहले वाली रौनक न थी...... वो धमाचौकड़ी न थी..... वो चंचलता न थी......
शनैः शनैः स्थिति वद से वदतर होने लगी.....
गाँव वाले चिंतित रहने लगे...... गाँव प्रधान भी इससे दुखी थे....
       क्या किया जाए किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। समस्या विकराल थी पर इसका कोई स्थाई समाधान किसी के पास न था.....
        गाँव प्रधान बड़ा जीवट था। वह हर हाल में इस समस्या का निदान चाहता था..... वह तालाब की वही पहले वाली सुंदरता को वापस लाना चाहता था.....वह तालाब के छोटी-छोटी मछलियों के दुख को दूर करना चाहता था।

एक रात.....
ग्राम प्रधान के दिमाग में सहसा एक उपाय सूझा। वह उठा और तालाब के सभी जल निकासी मार्ग पर जाल लगाया और फिर एक साथ सभी मार्ग को खोल दिया। तालाब का जल बहुत तेजी से बाहर आने लगा।
       सुबह होते-होते तालाब का पूरा जल वह चुका था..... जल के अभाव में मछलियाँ तड़प रही थी। छोटी-छोटी मछलियाँ तालाब के दलदल और कीचड़ में घुस कर किसी तरह अपने आप को बचाने लगी। विशाल मछली दल दल में घुस नहीं  पा रही थी..... वह दम तोड़ने लगी।
           विशाल मछली को मारने के चक्कर में छोटी-मछली भी कष्ट झेल रही थी। वावजूद इसके छोटी मछलियाँ इस कष्ट में भी खुश थी। विशाल मछलियों को वे सामने तड़प-तड़प कर मरते देख रही थी। उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे। उनकी समस्या का स्थाई समाधान हो रहा था। अब उन्हें फिर से पर्याप्त चारा मिलने लगेगा..... उसका जीवन सुखमय होने वाला था..... उसे अपना भविष्य उज्ज्वल दिख रहा था।
       जब सारी विशाल मछलियों ने दम तोड़ दिया तो गांव प्रधान ने तालाब को फिर से जल से लबालब भरवा दिया...... छोटी-छोटी मछलियों का कष्ट दूर हो गया।
वर्षों की समस्या का स्थाई समाधान हो गया था।
(बनारस, 23 नवंबर 2016, गुरूवार)