मंगलवार, 20 जून 2017

इतिहास का एक पहलू यह भी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2017

इतिहास का एक पहलू यह भी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2017

योगी आदित्यनाथ का यह बयान कुछ लोगों को बुरा लग रहा है कि ताजमहल हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। लोग इस बयान पर आपत्ति जताते हुए ताजमहल को प्रेम का प्रतीक बता रहे हैं। ताजमहल, और उसके पीछे के प्रेम की कहानी कुछ दिनों पहले भाई रामप्रकाश त्रिपाठी की वाल पर पढ़ी थी। इतिहास को विद्रुप कर हमे वामपंथियों द्वारा सच से परे जो कुछ परोसा गया है, उसकी एक बानगी भर है यह लेख.

मुगलों के हरम की औलाद को हरामजादा
कहा जाता है।

शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं जो उसे
उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी।
उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया।

उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट
की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य
हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को
बढ़ाता ही रहा।''
(अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)

कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली
का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था
और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी।

जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की
यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ
प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों
और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों
हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था।

यह नर पशु,यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित
और उत्साही था,कि हिन्दू महिलाओं का मीना
बाजार लगाया करता था,यहाँ तक कि अपने
महल में भी।

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर
ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि,
''महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार,
जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं
का, क्रय-विक्रय हुआ करता था,राज्य द्वारा बड़ी
संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था,और
नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में
उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान
के लिए ही थी।
(टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर-
फ्रान्कोइसबर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ,
औक्सफोर्ड १९३४)

**शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया
जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए।
८००० औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर
किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार
ही कहा जाएगा।आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे
कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं
बल्कि उसका असली नाम "अर्जुमंद-बानो-बेगम" था।

और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार
की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना
तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी ।

मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी।
इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले
3 शादियाँ कर रखी थी और,मुमताज से शादी करने
के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी
उस ने 3 शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के
मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना
से शादी कर ली थी।
जिसे उसने रखैल बना कर रखा हुआ था जिससे शादी
करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था।

अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और
शादियाँ क्यों की....?????

अब आप यह भी जान लो कि शाहजहाँ की सातों
बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत
बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी ।

उस से भी घिनौना तथ्य यह है कि शाहजहाँ से
शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की
नहीं थी बल्कि वो शादीशुदा थी और,उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम "शेर अफगान खान" था।शाहजहाँ ने शेर अफगान खान
की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।

गौर करने लायक बात यह भी है कि ३८ वर्षीय
मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से
नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान
अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी।

यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन
ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला।

**शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात
था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी
सगी बेटी जहाँआरा के साथ स्वयं सम्भोग करने
का दोषी कहा है।

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी
जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी।

इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में
लम्पट शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को
फंसाकर भोगना शुरू कर दिया था।

जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था
कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया।

बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में
चर्चा शुरू हुई,तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक
बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने
के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि - "माली को अपने द्वारा लगाये पेड़ का फल खाने का
हक़ है"।

(Francois Bernier wrote,
" Shah Jahan used to have regular sex
with his eldest daughter Jahan Ara.
To defend himself,Shah Jahan used to
say that,it was the privilege of a planter
to taste the fruit of the tree he had
planted.")

**इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक
को वह उसके पास फटकने नहीं देता था।
कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ
गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ नेतंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा
जला दिया।

**दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था
कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं
होगी।
इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं।
इसका परिणाम यह होता था कि मुग़लखानदान
की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए
अवैध तरीके से दरबारी,नौकर के साथ साथ,रिश्तेदार
यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।

**जहाँआरा अपने लम्पट बाप के लिए लड़कियाँ भी
फंसाकर लाती थी।
जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई
शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था।

**शाहजहाँ के राजज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण
लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे
से नशा करा बाप के हवाले कर दिया था जिससे शाहजहाँ
ने 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह
किया था।

बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के
बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की
सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों
अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

**शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ' 'वह तिमूर
(तैमूरलंग)का वंशज है जो भारत में तलवार और
अग्नि लाया था।
उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और
उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से इतना
प्रभावित था कि ''उसने अपना नाम तिमूरद्वितीय
रख लिया''।
(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया-
डॉ. के.एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).

**बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों
(हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी।

अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि,
''शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी
पर अधिकार करलिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं
का भीषण नरसंहार किया था ।

**भारत यात्रा पर आये देला वैले,इटली के एक धनी
व्यक्ति के अुनसार -शाहजहाँ की सेना ने भयानक
बर्बरता का परिचय कराया था।
हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित
धन को दे देने के लिए विवश किया गया,और अनेकों
उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग
किया गया।''
(कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड
इट्सनेबरहुड, पृष्ठ २५)

**हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को
एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है।

किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर
हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला
के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था

अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, 'बादशाहनामा' में लिखा था-'महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में
लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र,बनारस में
उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के
पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर
हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं।

इस्लाम पंथ के रक्षक,शहंशाह ने आदेश दिया कि
बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी
स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है,
उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए।

**इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि
जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर
दिया गया था।''
(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी,
अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII,
पृष्ठ ३६)

**हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करनेकी प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।
(मध्यकालीन भारत - हरीश्चंद्र वर्मा - पेज-१४१)

*''कश्मीर से लौटते समय १६३२ में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में
शादी कर ली है।
शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी
बना लिया गया।

प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया
कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका।

तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को
चुन लेने का विकल्प दिया गया।

जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया,उन सभी
पुरूषों का सर काट दिया गया।

लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात् मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और
रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।''
(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल :
आर.सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन,पृष्ठ३१२)

* १६५७ में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के
बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी रखैल जहाँआरा के
साथ आगरा के किले में बंद कर दिया।

परन्तु औरंगजेब मे एक आदर्श बेटे का भी फर्ज निभाया
और अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने
साथ ४० रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी।

दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी
सभी को उसने किले से बाहर निकाल दिया।

उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से
में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है।

जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।

***शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैन शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैनल के अनुसार अत्यधिक कमोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था।

** अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन
और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर
महानबताया जाता है...... ?????

क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर
सकता है....?????

क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमेंखाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही
करते हैं ??

दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए
गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर""तेजो महालय"" है....!

और जिसे प्रमाणित करने के लिए डा० सुब्रहमण्यम स्वामी आज भी सुप्रीम कोर्ट में सत्य की लड़ाई लड़
रहे हैं।

** असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण,
लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू
के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया।
और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।

( दैनिक जागरण  के विशेष संवाददाता श्री ओम प्रकाश  तिवारी के वॉल से साभार )
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शनिवार, 17 जून 2017

मातृ दिवस पर एक बच्ची की अभिव्यक्ति : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 जून 2017


मातृ दिवस पर एक बच्ची की अभिव्यक्ति : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 जून 2017

             वो, एक शहर के अंतररास्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बगीचे में बिना तेज धूप और गर्मी की परवाह किये, बड़ी लग्न से पेड़ पौधों की काट छाट में लगा था की तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज सुनाई दी, "गंगादास तुझे प्रधानाचार्या जी अभी तुरंत बुला रही है"। गंगादास को आखिरी पांच शब्दो में काफी तेजी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वजह से प्रधानाचार्या ने उसे तुरंत ही बुलाया है।
वो बहुत ही शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ किया और फिर द्रुत गति से प्रधानाचार्य के कार्यलय की ओर चल पढ़ा। उसे प्रधानाचार्य महोदय का कार्यालय की दूरी मीलो की दूरी लग रही थी जो खत्म होने का नाम नही ले रही थी। उसकी ह्र्दयगति बडी गई थी। वो सोच रहा था कि उससे क्या गलत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्य महोदया ने उसे तुरंत ही उनके कार्यालय में आने को कहा। वो एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था पता नही क्या गलती हो गयी वो इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्य के कार्यालय पहुचा "मैडम क्या मैं अंदर आ जाऊ, आपने मुझे बुलाया था"।
"हा, आओ अंदर आओ और ये देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी। "पढ़ो इसको" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
"मैं, मैं, मैडम! मैं तो इग्लिश पढ़ना नही जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया। "मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से बहुत ऋणी हूँ क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निशुल्क पढ़ने की अनुमति दी। मुझे कृपया एक और मौका दे मेरी कोई गलती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था कि उसे प्रधानाचार्या ने टोका "तुम बिना वजह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा की अध्यापिका को बुलाती हूँ।
वो पल जब तक उसकी बिटिया की अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। वो सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई गलती हो गयी, कही मैडम उसकी विद्यालय से निकाल तो नही रही। उसकी चिंता और बड़ गयी थी।
कक्षा अध्यापिका के पहुचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी।" अब ये मैडम इस पेपर जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हे सुनाएगी गौर से सुनो"।
कक्षा अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया "आज मातृ दिवस था और आज मैने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा, तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।" उसके बाद कक्षा अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गांव जहा शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी आभाव है। चिकित्सक के आभाव में कितनी ही माँ दम तोड़ देती है बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थी। उसने मुझे छुआ भी नही की वो चलबसी। मेरे पिता ही वो पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वो अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाकी की नजर में मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया पर मेरे दादा दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लाये ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वजह से मेरे दादा दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सबकुछ, जमीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और मेरे विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। वो मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी जरूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।
आज मुझे समझ आता है कि वो क्यो हर उस चीज को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना करदेते थे कि वो उन्हें पसंद नही है क्योंकि वो आखिरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग का महत्व पता चला।
मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखा। और मेरे विद्यालय ने उनको ये सबसे बड़ा पुरुस्कार दिया जो मुझे यहा पढ़ने की अनुमति मिली। वो दिन मेरे पिता की खुशी का कोई ठिकाना न था।
यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी है।
यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ है।
यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर है।
यदि संक्षेप में कहूँ की प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते है। और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ है।
आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामना दूंगी और कहूंगी की आप संसार के सबसे अच्छे पालक है। बहुत गर्व से कहूंगी की ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली है मेरे पिता है।
मैं जानती हूं कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊंगी क्योकि मूझे माँ पर लेख लिखना था पर मैने पिता पर लिखा, पर ये बहुत ही छोटी सी कीमत होगी जो उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद"। आखरी शब्द पढ़ते पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
इस शांति मैं केवल गंगादास के सिसकने की आवाज सुनाई दे रही थी। बगीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दो ने उस कमीज को पिता के आसुंओ से गीला कर दिया था। वो केवल हाथ जोड़ कर वहां खड़ा था। उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, पर इस बार उनकी आवाज काफी मिठास व सौम्य थी "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। ये लेख मेरे अबतक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े जोर शोर से मना रहे है। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। ये सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है, ये सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नही है एक पालक बनने के लिए। साथ ही ये अनुशंषा करना है उस विश्वाश का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमे गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमे गर्व है कि आप एक माली है और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बगीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा खुशबू दार बनाकर रखा जिसकी खुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेगे.
(बनारस, 14जून 2017, शुक्रवार)
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सोमवार, 5 जून 2017

बनारस के नागरिक होने की हमारी जिम्मेदारी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 5जून 2017

शहर मे उगे कंक्रीट के अव्यवस्थित जंगलो ने प्राकृतिक पेड़ पौधों को लील लिया है.
बनारस मे वाराणसी विनास ( सही पढ़ रहे है आप) प्राधिकरण व नरक निगम (पुन: सही पढ़ रहे है आप) के कृपा के चलते शहर मे एक तुलसी भी लगाने की जगह नही बची है. तालाब, पोखरों को तो छोड़े नाला, नजूल व सरकारी जमीन को कब्जा करा दिया इन दोन विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों ने. फिर फटाफट मकान नंबर भी एलाट कर बिजली, पानी,रासनकार्ड सब कुछ बनवा दिया, बदले मे लखनऊ दिल्ली गाजियाबाद नोयडा के पासकालोनियो मे अपनीआलीशान कोठी खड़ी कर ली. अनादिकाल से जिन्दा शहर बनारस  जीये चाहे मरे, इनके बला से.
अब पर्यावरण दिवस पर प्रचण्ड गर्मी मे 48 डिग्री तापमान पर शहर मे पेड़  लगाने की योजना है, योजना बन गई पर बनारस मे जमीन कहॉ है? कल रात देर तक दो तीन मित्रो से चर्चा होती रही कि गीनिजबुक मे प्लॉटेसन पर अखिलेशी रिकार्ड के तरह इस बार भी मामला हवा हवाई करने की मुकम्मल व्यवस्था कर ली है योगी के अफसरान ने.
चलिये प्लांटेसन के लिये हम जमीन का सुझाव देते है. वरूणा के किनारे दोनो तरफ जो गाद निकाली गई है उस पर सघन वृक्षारोपण किया जाये, गंगा वरूणा, नाद, अस्सी के पेटे को साफ कर उनसे तटबंध बनाये जाये व उन पर वृक्षारोपण हो. अर्दलीबाजार लगायत गोदौलिया लंका,  डीएलडब्लू गेट ककरमत्ता होते हुये मंडुआडीह स्टेशन से रथयात्रा तक. लहरतारा से मंडुआडीह बाजार लगायत ककरमत्ता तक और डीएलडब्लू गेट से चितईपुर चौराहा होते हुये अमरा बाईपास तक पेड़ लगाते हुये उसकी जिम्मेदारी पास के दुकानदारो को अर्थदण्ड के साथ सौंपा जाये.
इसी तरह शहर के अनुदानित विद्यालय परिसर मे भी सघन वृक्षारोपण कर के हम शहर के साथ अपना जीवन स्वस्थपूर्ण बना सकते है.
यह सूची समापन नही है, आप अपने सुझाव जोड़ते हुये इस पोस्ट को शेयर व फारवर्ड करे और बनारस शहर के जिम्मेदार नागरिक होने के साथ खुद के व परिजनो के बेहतरी के लिये आगे आयें.
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पर्यावरण दिवस, जो किया जा सकता है: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 5 जून 2017

क्या सार्वजनिक बसो को समयबद्धऔर पर्याप्त मात्रा मे चला कर प्रदूषण व जाम  रोकने की कवायद नही करनी चाहिये?

आज पूरा देश विशेषकर हमारा शहर जाम व प्रदूषण से परेशान है. आम जनता की तकलीफ है कि चारो तरफ जाम रहता है धूल गर्दा धूप से कही जाना मुश्किल हो गया है, प्रशासन की दिक्कत यह है कि शहर की सड़के सँकरी है लोगो को जल्दी है बेतरीब ड्रइविंग है बेहिसाब गाड़ियॉ है कम संसाधन है उपर से बनारसी भौकाल .
ऐसे मे कैसे नियंत्रित व सहज हो शहर की व्यवस्था?
इस बात को लेकर मीटिंग दनादन हो रही है एसी मीटिंग हाल से लेकर चौराहो के कोने अतरे तक.
पर रिजल्ट सब विकास के पैसे की तरह कहॉ जारगा है पता ही नही.

भाई मेरे, कभी इसका सामान्य सा हल सोचा और पालन किया गया होता तो अपने शहर मे ये समस्या ही नही है.
बनारस की जनता को शहर के चारो कोनो से जोड़ने वाली समयबद्ध व सर्वसुलभ नगर बस प्रणाली से बस जोड़ कर उसे नियमित व बाधारहित चलाने की जरूरत है.
मसलन सारनाथ से डीरेका, शिवपुर से लंका. मडुआडीह से मुगलसराय, कचहरी से राजातालाब, बाबतपुर से राजघाट, सामनेघाट से चौकाघाट के रूट पर हर १० से १५ मिनट पर बस चला कर सड़क पर वाहनो की भीड़ काफी कम की जा सकती है. होना तो यह भी चाहिये कि बस रूट पर रिक्सा आटो व प्राईवेट वाहनो को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाये.( विशेष परिस्थिति व रोगी वाहनो को छोड़ कर )
ऐसा नही है कि यह कार्य संभव नही है, बहुतों को याद होगा कि आज से २०-२५ वर्ष पूर्व बनारस मे सिटी बस की यह व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही थी.
सच तो यह है कि हम मे से बहुतेरे जाम प्रदूषण और पार्किंग के झंझट के साथ साथ पेट्रोल खर्च व व्यर्थ समय से बचना चाहते है ऐसे मे हमे सरल सुचारू समयबद्ध सस्ती यातायात बस प्रणाली मिले तो हम क्यो अपने जेब पर पेट्रोल व पार्किंग तथा सिर पर धूप व जाम का टेन्सन झेलेगें ?
शहर के यातायात समस्या पर आपके विचार आमंत्रित है. आइये मिल जुल कर सोशल मीडिया के रास्ते से ही से इसका समाधान खोजा जाय.....
(पिछले साल फेसबुक पर लिखी गई पोस्ट, जो आज भी प्रासंगिक है और कल भी रहेगी)
(बनारस, 5 जून 2017)

पर्यावरण दिवस 5जून 2017: व्योमेश चित्रवंश की डायरी

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मंगलवार, 9 मई 2017

मेरे जन्मदिन पर मेरे बच्चो के गिफ्ट

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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

मानवाधिकार के रहनुमाओं कहॉ हो? व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 अप्रैल 2017, सोमवार )

मानवाधिकार के रहनुमाओं कहॉ हो? व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 अप्रैल 2017, सोमवार )

     I am eagerly waiting for a candle light march from JNU students union in support of Kulbhushan Jadhav who has got stuck in lawless Pakistan.

I am also expecting Kanhaiya Kumar to come out and shout slogan for "Azadi" of Kulbhushan Jadhav.

I AM also waiting for all those politicians and journalists who were in the forefront not so long ago...

Also waiting for the greatest political pimps like Kejrival, shasi and prashant bhushan, Garibon ka case free me लड़ने वाला Jethmalani.

The list is long from Kanhaiya at one end to Barkha dutt at another.

आज वो आजादी-आजादी चिल्लाने वाले भाड़े के छात्र नज़र नहीं आ रहे जब एक बेकसूर को सच में आजादी दिलानी है .

अभी में बैठा बैठा सर्च  रहा था कि पाकिस्तान में भी कोई प्रशांत भूषण, केजरीवाल हैं क्या जो कुलभूषण जाधव के लिए रात के 3 बजे पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट खुलवा दें...

रिज़ल्ट आया "नहीं भाई ऐसे हरामखोर और राष्ट्र द्रोही सिर्फ भारत में ही रहते है.......

क्यों न उन 21 वकील को उठाकर लाहौर फेंक दिया जाए जो कसाब के लिए आधी रात को 2:00 बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवाने गए थे ताकि वो कुलभूषण का केस लड़ सके और मानवता को बचा सके।

कहाँ गया तुम्हारा फवाद
कहाँ गया राहत फ़तेह अली खान
कहाँ गयी अमन की आशा
क्या उन सफ़ेद कबूतरों के टिक्के बना के खा लिए तुमने..

याकूब मेनन की सज़ा रोकने के लिए दया याचिका में हस्ताक्षर करने वाले उन देशद्रोही_कुत्तों को बता दूँ, पाकिस्तान में कुलभूषण के लिए किसी ने दया याचिका दायर नहीं की है...

और कहाँ गयी वो लड़की जो कहती थी कि "pakistan did not kill my dad, the war did"

अजीब है। अब कोई नहीं बोलेगा...
ज़ावेद अख्तर भी चुप है अब तो...
कहॉ हो मानवाधिकार के रहनुमाओं? कुछ तो बोलो?
(इलाहाबाद, 17 अप्रैल 2017, सोमवार)
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रविवार, 16 अप्रैल 2017

रविवार, 2 अप्रैल 2017

नवसंवत्सर 2074 विक्रमी, " साधारण" चैत्र शुकल नवरात्रि : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 अप्रैल 2017, शनिवार

नववर्ष का नव आवाहन
नव संवत्सर नव विहान
पेड़ो पर नवांकुरित होती नव कोंपले
नव ऊष्मा की पछुआ नव बयार
संक्राति को बेध कर नवआदित्य की नव ऊर्जा
आम्रवृक्षो पर ईठलाती नव मंजरियॉ
दौने की पत्तियों से ऊभरती नवसुगंध
नवउत्साह के साथ अलसाया मन
नव संकल्पों का अल्हड़पन
नवरात्रि व्रत से शान्त संकल्पित मन
ब्रह्मबेला मे पक्षियों का नव गुंजारपन
शात्विक विचार, शॉत चित्त
कुछ तो है जो देता है नवचिंतन
भारत के नववर्ष, साधारण नवसंवत्सर में.
      (बनारस, 01 अप्रैल, 2017, शनिवार)
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गुरुवार, 30 मार्च 2017

पब्लिक स्कूलों की मनमानी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 मार्च 2017, गुरूवार

क्या आप ने यह समाचार देखा था?
फिर स्कूल वाले क्यों नही देख रहे, और आप से प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें खरीदवा रहे हैं

Only NCERT books at all CBSE schools

TNN : Feb 16, 2017, 03.00 AM

NEW DELHI: CBSE schools will have to use NCERT textbooks from the 2017-18 academic session. The move to make National Council of Educational Research and Training (NCERT) study materials mandatory for all Central Board of Secondary Education (CBSE) schools across the country is expected to standardise the curriculum across schools in the country.
The decision was taken at a review meeting chaired by Union minister for human resource development Prakash Javadekar.
It is a welcome relief for millions of parents forced by schools to purchase textbooks from private publishers, often at prices 300-600% higher than the NCERT books.
A senior HRD officials said NCERT has been directed to make all the textbooks available, in adequate numbers, through its 680 empanelled distribution vendors across the country by the last week of March, so that the April deadline for the 2017-18 academic session can be met. All the CBSE schools will have to raise their demand online on CBSE's website by February 22, 2017.
The MHRD decision comes after complaints by schools and parents about non-availability of NCERT books on schedule, and also by parents about schools selling expensive books by private publishers. "Many schools have book kiosks on their premises. As well as selling exorbitantly priced textbooks from private publishers, these shops sell 'bundle packs' that include pencils, erasers, and other stationery, which would cost a lot less for parents in the open market. We have also noticed that private publishers are sponsoring several school heads on junkets to countries like Switzerland," a senior HRD official said.
A CBSE official said that based on the mandatory disclosure of its schools, the board has an accurate estimate of the quantum of NCERT textbooks necessary for Classes I-XII for any academic session.
"We now know the number of students a school has class-wise, rather than section-wise. As schools raise their demand online, we will know whether they are requisitioning for adequate number of books. The numbers may vary, as March is also a month of admissions. But the schools are expected to factor this in their purchases. CBSE will also monitor the annual subscription by schools," the official said.
कल बच्चो के स्कूल खुलने वाले हैं, बच्चो ने दबाव बना रखा है नई किताबों के लिये. उनका उत्साह जायज है पर उनका यह उत्साह हमे आर्थिक रूप से हतोत्साहित करने वाला होता है, कमेबेस आप सब के साथ होता होगा.
      ऊपर से कोढ़ मे खाज यह कि इस बार  स्कूल ने बुकलिस्ट नही दिया इसके पीछे उनका सधा कारण कि अभिभावक बच्चों की किताबें उन विशेष दुकानों से या स्कूल के अंदर बने दुकानो या स्टाल से खरीदें जिन्हे स्कूल ने पुस्तक के नाम पर अभिभावकों को मनमाना लूटने का अधिकार दिया है. मेरे बच्चों के विद्यालय मे बुकशाप है. वो भी स्थाई. हाईकोर्ट सुप्रीमकोर्ट सब ने विद्यालय परिसर के अंदर की दुकानो को बंद करने को कहा पर बच्चों के हित मे माल ऐंठने के लिये वे सारे आदेश ठेंगे पर ही रहे.
विद्यालय का समय बीत जाने के बाद उसी दुकान संचालकों की एक दुकान बाईपास मोड़ पर गिसटबाजार मे चलती है.
बहरहाल बात मुद्दे की, शाम को मै बच्चे को लेकर किताबे खरीदने पहुँचा तो दुकान पर संचालिका व उसके दोनो बच्चे जबर्दस्त मेहनत करते हुये ग्राहकों को निपटा रहे थे. एक सज्जन का बिल 11677 रूपये का बना था, वो बेचारे अपना पर्स झाड़झूड़ कर 11675 रूपये दे रहे थे पर दुकान संचालिका बार बार यह कह कर उसे लेने से इंकार कर रही थी कि" सर बहुत घाटा हो जायेगा, आप ऐसा करें कि एक किताब छोड़ दीजिये बाद मे लेते जाईयेगा." वो बेचारे समझ नही पा रहे थे कि 2 रूपये के लिये इतनी जबर्दस्त जिद. मै काफी देर से यह झिकझिक देखने के बाद उस सज्जन से अनुरोध किया कि " भाई साहब, आप मुझसे 2 रूपये ले लिजिये, जिन्दगी के किसी मोड़ पर मिलने पर इसका हिसाब हम लोग कर लेगें" , बेचारे मरता क्या न करता वाले स्थिति मे उनके पास शेष कोई चारा भी नही था, पर उनकी वह कृतग्यता भरी ऑखे मुझे जितना संतोष दे रही थी वही दुकान संचालिका की 2 रूपये के लिये थोथी जिद उतनी ही पीड़ा व क्रोध. क्या मानवता मे संवेदनशीलता इस हद तक शून्य हो चुकी है कि हम 11000 रूपये की खरीद बिक्री पर 2 रूपये के लिये समझौता नही कर सकते?
      मैने अपने बच्चे का स्कूल व कक्षा बताते हुये किताबें पूछा तो दी गई सारी किताबें प्राइवेट पब्लिकेशन की थी , अब चौंकने की बारी मेरी थी, मैने प्रकाश जावड़ेकर साहब के उपरोक्त आदेश को बताते हुये सीबीएससी के दिशानिर्देश का जिक्र किया तो दुकान संचालिका ने कहा कि " सर हो सकता है स्कूल वालों को उस आदेश का पता न हो. उन्होने हमसे तो यही बुक्स बेंचने को बोला है"
      मै अभी तक यह नही समझ पा रहा हूँ कि सीबीएससी के गाईडलाईन मे जब यह तथ्य स्पष्टतः उल्लिखित है कि सीबीएससी स्कूलों मे केवल एनसीईआरटी की किताबे चलेगी तो ये प्राईवेट स्कूल वाले जबरन क्यों प्राईवेट पब्लिकेशन की किताब खरीदवा कर हम अभिवावकों को बेवकूफ बना रहें है.
क्या वो जानना नही चाहते, या हम खुद ही बच्चो के मोह मे इस खबर से जानबूझकर अनजान बने हुये हैं
सोचियेगा जरूर.
(बनारस, 30 मार्च 2017 गुरूवार)
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सोमवार, 27 मार्च 2017

पब्लिक स्कूल मालामाल, हम आप बेहाल : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28 मार्च 2017, सोमवार

क्या आपने कभी सोचा है?

पब्लिक स्कूलों मे पाठ्यपुस्तकों की सूची नही दी जाती क्योंकि अभिवावक कमीशन वाली दुकान के अतिरिक्त कहीं और से किताब न खरीद सकें.
मेरे एक मित्र ने बताया कि जो किताबे हम पब्लिक स्कूलों के कमीशनदात्रि दुकानों से दाम के दाम पर खरीदते है वे दिल्ली के पब्लिकेशन मार्केट मे छपे दाम से 40% कीमत पर मिल जाती है.
यानि नफा 60% . शुद्ध

पूरे मामले को एक उदाहरण से समझते है
बनारस के एक जाने माने पब्लिक स्कूल मे चलने वाली कक्षा 1 को लेते है. कुल 4 सेक्शन, एक सेक्शन मे 60 छात्र, यानि कुल 240. प्रवेश शुल्क मात्र 12000/-  एवं पुस्तक मूल्य 3600/- कापीयॉ कवर सहित 1200/- यानि कुल 16800/-
बाकी सब को छोड़ केवल किताबों की ही चर्चा करें, 3600 रूपये की किताबो का वास्तविक मूल्य 1440/- मात्र, लाभ 2160/- दुकानदार ने स्कूल को कमीशन दिया बिक्री मूल्य का 30% यानि 1080/- रूपये.

कापियों के लिये तो अगर आप दिल्ली के बजाय कर्णघंटा चले जायें तो 1200/- वाली कुल कापियॉ आपको खुदरा मूल्य पर 720 से 780 रूपये मे मिल जायेगीं, यदि इसे रूपये 800/- भी मान ले तो दुकानदार का फायदा 400/- स्कूल को कमीशन गया 200/- रूपये.

यानि बैठे बिठायें, बिना हाथ पैर चलाये, बिना कुछ किये, बिना टेंसन के स्कूल के संचालक को 1280/- प्रति छात्र मिल रहा है. 1280 गुणा 240 कुल हुये 3,07,200/-

यह केवल कक्षा 1 का उदाहरण लिया गया है, बाकी कक्षाओं मे जैसे जैसे ऊपर चलेगें कमीशन की कमाई बढ़ती जायेगी. जो लगभग  50,00,000/- पचास लाख तक प्रतिवर्ष हो जाती है और यह विशुद्ध रूप से पब्लिक स्कूलो की काली कमाई है.

ड्रेस, बैग, जूता,  बेल्ट, टाई,  स्पोर्ट्स किट जैसे बाकी ताम झाम से अलग कमाई होती है जिसकी बेहिसाब कमाई अलग.

कोई रोक टोक नही....
http://chitravansh.blogspot.in(बनारस, 28 मार्च 2017, सोमवार)