शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

व्योमवार्ता /यादें यू पी कालेज की ......(४)

#व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की...(४):व्योमेश चित्रवंश की डायरी

        अक्टूबर नवंबर में दशहरा दीवाली दोनो को मिला कर एक लंबी छुट्टी कालेज मे होती थी। नवप्रवेशी छात्रों विशेषकर दूर से आये छात्रों के लिये यह पहला मौका होता था घर वापस जा के कालेज के दिनचर्या को मिस करते हुये घर परिवार मे जीवन बिताने का। पर हमें लगता है कि ज्यादातर छात्रों के लिये यू पी कालेज का माहौल भूला पाना ज्यादा भारी होता था। दीवाली की छुट्टी खत्म होते ही कालेज पूरी तरह से भर जाता। तब तक सभी अपने अपने ढंग से समय बिताने का जरिया भी खोज लेते। खेल से जुड़े हुये बनारस के हाकी का मक्का कहे जाने वाले शानदार मैदान मे गौरीशंकर मास्टसाब और रामललित सर Ram Lalit Singh के छत्रछाया में, तो क्रिकेट खेलने वाले रणंजय सर के साथ। बास्केटबाल नाथन सर के देखरेख मे तो बालीबाल गुलाब सर के साथ। तब बास्केटबॉल कोर्ट स्विमिंगपुल के सामने पुराने लाईब्रेरी के पीछे हुआ करता था और लड़कियों के लिये रानी मुरार कैम्पस में। एनसीसी के लड़के खुद को रंगरूट के नये ड्रेसअप मे फिट कर के गिरधर सिंह सर, रामसुधार सर Ramsudhar Singh, रामयाद सर और नीलकमल मैडम Neelkamal Singhके कमान मे ड्रिल करते नजर आते थे। तब यू पी कालेज ग्राउण्ड भारतीय हाकी का एक अभिन्न अंग हुआ करता था जहॉ पद्मश्री स्व० मो०शाहिद, नईम, नागेन्द्र सिंह मिण्टू, आर पी सिंह, सुनील सेठ ,शैलेन्द्र सिंह, स्व० विवेक सिंह, प्रशान्त वगैरह डेली प्रैक्टिस को आते थे। तो क्रिकेट मे आज के उत्तर प्रदेश के अम्पायर आर पी गुप्ता, मशहूर अथलीट गुलाब सिंह, अर्जुन सिंह भी शाम को यू पी कालेज मैदान आ ही जाते थे।
                  हम जैसे सख्त अनुशासन को न मानने वालों के लिये सबसे मुफीद जगह एनएसएस थी। बनारसी मिश्रा सर, गणेश सिंह सर , महेन्द्र प्रताप सर के सानिध्य मे हम लोग सप्ताह मे दो दिन सेवा कार्य कम करते कामचोरी ज्यादा। प्राय: हमें और राकेश को सेवा कार्य के बाद प्रोत्साहन प्रसाद के रूप मे समोसा और लालपेड़ा बॉटने की जिम्मेदारी मिलती और हम बड़े ईमानदारी से अपने खास दोस्तों को दो के बदले तीन समोसा और एक की जगह दो लालपेड़ा बॉटने मे कभी भी बेईमानी नही करते थे। बाद मे बॉटने के मेहनताने के रूप मे भी हमारा दो  अतिरिक्त समोसे और दो लालपेड़े पर हक बनता ही था। हम लोग कभी कभी खेल के मैदान मे भी हाथ आजमा लेते थे। हाकी उठाये और चल पड़े मैदान में, पर उसमे कभी नियमितता नही रहने से नियमित खिलाड़ी नही बन सके।कभी  किट पहन के मैदान मे गये तो क्रिकेट खेल लिये, कभी खाली टीशर्ट और लोवर मे गये तो बालीबाल। पर इसका परिणाम यह हुआ कि मैदान के खिलाड़ियों से हमारी अच्छी खासी दोस्ती हो गई। अखिलेश द्वय Akhilesh Singh,Akhilesh Singh, सूर्यभानSuryabhan Singh, राजनRajan Singh, चंद्रबलीChandrabali Singh, स्व०जफर, मार्कण्डेयMarkanday Singh, संजय गुप्ता, मनोज, संजय पाण्डेयSanjay Pandey, रविशंकर सिंह, महेश भैयाMahesh Singh, स्व० रामकुमार, प्रदीप गुप्ता,  संजीवSanjeev Singh, बद्रीविशाल , विजय, महेन्द्र, अजीत और भी कईयों खिलाड़ी हम लोगों के मित्र मण्डली मे बनें तो उनमे से ज्यादातर आज भी संपर्क मे हैं। जो छात्र इन तीनों यानि खेल, एनसीसी और एनएसएस से छूटे उनके लिये शाम बिताने के लिये गेट , महावीरमंदिर और अर्दलीबाजार हुआ करता था। कुछ पढ़ाकू लड़के राजकीय जिला पुस्तकालय मे भी बैठा करते।
       हम हरफनमौला मिजाज के लोग सभी ग्रुपों मे शामिल थे, एनसीसी ,एनएसएस से लेकर खेल के मैदानी दोस्तों तक में। पर आखिर मे हम भी इन तीनों से परे महावीर मंदिर, अर्दलीबाजार पर शाम बिताने वालों मे शामिल हो गये। पर इन दोनों जगहों से भी अलग हमने एक और अन्य जगह तलाशा अपनी अड़ी के लिये वह थी कालेज गेट पर स्व० शरद जायसवाल की ज्ञानप्रसार केन्द्र। तब ज्ञानप्रसार दो दुकानों को मिला कर एक बड़ी दुकान हुआ करती थी उन दोनो दुकानों के जोड़ने वाली गली मे रखे स्टूल से लेकर काउंटर तक हम  ग्रुप मेम्बरान जम जाते और साहित्य से लेकर राजनीति, प्रतियोगिता, खेल, सिनेमा , समाज की बातें होने लगती। जय प्रकाश भाई, समीर कुमार सिंह, प्रेम नारायणPrem Narain Singh, संजय कटिहार, राजीव विश्वास, संतोष सिंह बब्बूSantosh Singh , स्व० संजय श्रीवास्तव, निर्भय सिन्हा गठरी उस बैठकी के नियमित सदस्य थे। प्राय: वहीं अपना क्रिकेट का अभ्यास कर सूर्यभान, संजय पाण्डेय, मनोज और हाकी खेल कर मार्कण्डेय, संजय गुप्ता अखिलेश आ जाते तो हम लोग अर्दली बाजार निकल लेते।
अर्दली बाजार मे जितेन्द्र दीपू, मुशीरMushir Uddin, गप्पूSanjay Kumar Srivastava, चंदूManoj Srivastava, अरविन्दArvindps Srivastava, शफी, राकेश, राजेशRajesh Srivastava, पिंकू, विनय पहले से कुंये के पास जमे रहते वहीं सड़क पर दुनिया जहॉ की बाते कर आठ बजे तक हमारी वापसी होती थी। फिर रात खाना खा कर एक घण्टे दूरदर्शन पर राष्ट्रीय समाचार ओर आधेघण्टे का सीरियल देख सो जाना क्योंकि अब हम लोगों ने अपने को सेक्शन ए मे बदलवा दिया था तो हमारी कक्षाएँ सुबह सात से शुरू हो ११.३० तक खतम हो जाती थी। सुबह उठना पड़ता था तो हम जल्दी सो जाते थे। पढ़ाई का काम कालेज से आने के बाद दोपहर मे होता था। हमारी पढ़ाई और पढ़ाई के तौर तरीके से कभी घर वालों को ऐतराज नहीं था तो वे लोग हस्तक्षेप भी नही करते थे।
          दिवाली की छुट्टी से वापस आते ही १० नवंबर सोमवार से कक्षायें पूरे रौ मे गंभीरतापूर्वक चलने लगी उसी दिन यह सूचना लगाई गई कि कालेज का संस्थापन वार्षिक समारोह २३,२४और २५ नवंबर को है। इसमे जो छात्र सहभागिता करने को इच्छुक हों वे संबधित शिक्षकों को अपना नाम नोट करवा दें। हम नें भी कला संकाय डेलीगेसी इंचार्ज डॉ० राम सुधार सिंह सर Ram Sudhar Singhके पास जा कर वाद विवाद प्रतियोगिता के लिये अपना नाम लिखवा दिया। वाद विवाद का विषय था "औद्योगीकरण पर्यावरण के मूल्य पर नही किया जा सकता।" मैने अपना नाम विषय के विपक्ष मे लिखवाया था और विपक्ष मे बोलने वाला मै एकमात्र प्रस्तावित सहभागी था। जहॉ अन्य छात्र इसके लिये जबर्दस्त तैयारी कर रहे थे वहीं मै बिना कुछ किये लगभग निश्चिंत था। मेरी निश्चिंतता रामसुधार सर के लिये चिंता का सबब बनती जा रही थी। उन्होने कई बार मुझसे कहा कि "तुम अपना भाषण लिख कर मुझे दे दो", पर मेरी समस्या यह थी कि मैने तब तक कुछ लिखा ही नही था तो रोज टालमटोल करता जा रहा था। बात जब डीन और हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ० विश्वनाथ सर के पास पहुंची तो मेरे लचर रवैये को देख  उन्होने भी मेरे ऊपर भरोसा न करने और मुझे हटा कर मेरे बदले किसी और छात्र को मौका देने का सलाह दिया। बहरहाल मुझे हटा  कर किसी अन्य को यह मौका दे दिया गया। संयोगवश उसी वर्ष पं० नारायण गुरू पंचगंगा घाट पर देव दीपावली मनाने की तैयारी कर रहे थे। कुछ संपर्कों द्वारा मेरा जुड़ाव उनसे हुआ तो हम कुल १७ लोग पूरे मनोयोग से उस अनूठे कार्यक्रम की तैयारी मे प्राणपण से जुट गये। चार दिन बाद कार्तिक पूर्णिमॉ,१६ नवंबर रविवार को देवदीपावली कार्यक्रम होना था। हम लोगों ने सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान महाराज बनारस डॉ० विभूति नारायण सिंह को उस कार्यक्रम मे आमंत्रित किया था। तब दीये से लेकर तेल बाती, घाट माला फूल , स्वागत सारी व्यवस्थायें हमी लोगो को करना था। भैरोनाथ से दीये खरीदकर १०१ दीपों को प्रज्वलित कर हम लोगों ने कार्यक्रम का सफल शुभारंभ किया। देवदीपावली #devdeepavali के आयोजन की व्यस्तता मे मै कालेज के कार्यक्रम को लगभग भूल ही चला था। पिछले चार दिनों से कालेज मे पढ़ने के बाद भाग कर  पंचगंगा घाट जाना और कम से कम पॉच से छ: बार घाट की खड़ी सीढ़ीयों पर ऊपर नीचे की कवायद ने ईधर से मुंह मोड़ रखा था। रामसुधार सर को अपना वक्तव्य लिख कर न देने के पीछे यह भी कारण था। वहॉ से  फुरसत पाते ही हम  अपने नियमित दिनचर्या पर आ गये थे। वार्षिक संस्थापन कार्यक्रमो की शुरूआत २० नवंबर से होना था और उसी क्रम मे २१ की शाम को डिग्री कालेज वाद विवाद प्रतियोगिता इण्टर कालेज के हाल मे आयोजित थी। तब आज वाला मल्टीपर्पज आडोटोरियम हाल नही बना था। इण्टर कालेज के पुराने भवन वाला सेण्ट्रल हाल ही साल भर बैडमिंटन कोर्ट और वार्षिक आयोजनों मे इनडोर कंपटीशन के लिये काम मे आता था। जब २१ नवंबर की शाम हम कार्यक्रम देखने पहुंचे तो इण्टर कालेज की वाद विवाद प्रतियोगिता चल रही थी एवं डिग्री कालेज के लिये सहभागियों के नाम पंजीकृत कराने की घोषणा हो चुकी थी। तभी हाल मे मुझे देखते ही राम सुधार सर ने बुलवाया और पूछा कि "तुम्हारा विपक्ष मे बोलने वाला भाषण तैयार है न? " मेरे लिये ये आश्चर्यजनक था क्योंकि मेरी जानकारी मे मेरा नाम  सहभागी सूची से हटा दिया गया था। फिर भी मेरे लिये यह खुद को कालेज पटल पर साबित करने का पहला मौका था तो चुनैतियों से जूझने का आदी मैने तत्काल सहमति दे दी। बस मेरा नाम कला संकाय द्वारा विषय के विपक्ष मे बोले जाने वाले सहभागी रूप मे शामिल हो गया। कला संकाय का क्रम सबसे बाद मे पड़ा था। हमसे पहले न्यू हास्टल के चारों ब्लाक सहित शेष दोनो डिग्री कालेज के छात्रावास, विज्ञान और कृषि संकाय वाले बोल चुके थे। अपनी बारी आने पर मैने अपने सभी विपक्षी खेमे वाले वक्ताओं का जीस्ट लेकर निर्धारित समय मे बोलना शुरू किया। लगभग आधे वक्तव्य सामाप्ति पर छात्रावास वालों को मेरे मे कुछ संभावना दिखी तो उन्होने शोर शराबा मचाते हुये हूट करना शुरू कर दिया। पर मै बिना घबराये अपनी बात पूरी की। मै पहला सहभागी था जो निर्धारित समय मे अपनी पूरी बात रख पाया था क्योंकि इसके पूर्व के सभी प्रतिभागी समय बीतने के बाद भी बोलते रहे थे और अपनी समय सीमा पार कर चुके थे। मुझे कालेज के प्रतियोगिता मे पहली बार द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ ।बाद मे यह जानकारी मिली की बीए द्वितीय वर्ष वाले सज्जन जिन्हे कला संकाय के तरफ से बोलना था वे एक सप्ताह से अपना भाषण रटने के बावजूद मौके पर गायब हो गये। इस प्रतियोगिता ने मुझे मेरे विषय से हट कर हिन्दी वाले अध्यापकों विशेषकर रामसुधार सर का प्रिय बना दिया।
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क्रमश:........
अगले अंक मे संस्थापन समारोह का अखिल भारतीय कवि सम्मेलन......

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यूपी कालेज की .....(३). : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १४ जुलाई २०२०

व्योमवार्ता/ यादें यूपी कालेज की.....(३)

         एडमिशन के बाद लगभग बारह दिन बीतने के बाद पॉच अगस्त भी आ गया । मंगलवार  का दिन।  हमने आशा जताई कि पहला दिन शुभ ही रहेगा। मंगलामुखी सदा सुखी। गॉव से विदा ले दही गुड़ खा डीह बाबा को प्रणाम कर हम चल पड़े जीवन मे उच्च शिक्षा के मुकाम पर यू पी कालेज। संतोष और मेरी राहें आज से अलग होनी थी। एक ही कालेज मे एक ही कक्षा मे पढ़ते हुये हम दोनों के विषय अलग अलग थे। तो बस एक साथ बैठने उठने पढ़ने के बजाय आगे से बस मिलना ही रह जाना था। हम दोनो पहली बार अपने मॉ के ऑचल के छाँव से अलग हो रहे थे ,  इसके पहले गोल गोल रोटी कौन कहे, हमने कभी चाय तक नही बनाया था। तो पढ़ने के लिये मै अपने चाचा जो गिलट बाजार मे रहते थे ,के यहॉ और संतोष ने सरसौली मे राजा मामा लाज मे अपना नया बसेरा बनाया। चाचा के यहॉ कपड़े वाली अटैची रख नहा धो नाश्ता कर  भगवान जी का नाम ले चल पड़ा यू पी कालेज मे पढ़ने। आज पहली बार अकेले पढ़ने जा रहा था इसलिये कुछ अजीब भी लग रहा था। कालेज गेट पर आ कर उदय प्रताप कालेज लिखे दो पतले रजिस्टर वाली कापियॉ खरीदते समय पहली बार ध्यान से कालेज के सिंहद्वार को देखा अब यहीं से जीवन के भविष्य का निर्माण होना था। विशाल सिंह द्वार केसरिया मिश्रित पीले रंग मे रंगा हुआ साफ सुथरा । गेट के ठीक ऊपर कालचक्र के दो पहियों के मध्यअर्द्ध चंद्राकार संगमरमर पट्टी पर लिखा 'उदय प्रताप कालेज' और ठीक उसके नीचे वृत्त मे लिखा कालेज का ध्येयवाक्य "दृढ़ राष्ट्रभक्ति पराक्रमश्च"  खुद को गौरव बोध करा गया। सन १९०९ मे  यह कालेज काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना के सात वर्ष पूर्व स्थापित हो चुका था आवासीय विद्यालय के रूप मे। आज भी इण्टर कालेज का मुख्य भवन , संध्याहाल और इण्टर कालेज के सभी छात्रावास उसी जमाने के है जो स्वयं मे सुदृढ़ है। कापी ले कर कला संकाय मे पहुंचा तो यह पता चला कि मेरा प्रवेश अर्थशास्त्र के बी सेक्शन मे हुआ है, मेरे विषयों के समायोजन के आधार पर । समय सारिणी के हिसाब से १२.१५ से १ बजे वाली अर्थशास्त्र की कक्षा का समय थोड़ी देर मे होने ही वाला था। कला संकाय के प्रथम तल पर बरामदे साईड वाला कक्ष। लगभग ४० छात्र और १२-१३ छात्रायें। यू पी कालेज मे पहला पीरियेड पढ़ने का सौभाग्य मिला डॉ० विनोद कुमार सर से। सौभाग्य से सर आज भी हमारे लिये मार्गदर्शक के रूप मे सदैव पूज्य है और दूसरे तीसरे उनसे आज भी आशीर्वाद प्राप्त हो ही जाता है। डॉ० विनोद कुमार जी ने प्रथमत: अपना परिचय देते हुये इस कालेज की परंपरा और इतिहास के बारे मे बताया ।सन १९०९ के हिवैट क्षत्रिया स्कूल से लेकर उदय प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय बनने तक का सफर और उसमे राजर्षि से लेकर बाबू प्रशिद्ध नारायण सिंह, इण्टर के अद्भुत प्राचार्य जे पी सिंह , डिग्री कालेज के पुनरूद्धारक राजनाथ सिंह लेकर अब तक का एक लेखाजोखा । साथ ही विद्यालय का ध्येयवाक्य दृढ़ राष्ट्रभक्ति के लिये पराक्रम होना जरूरी है। यह पराक्रम हमे अपने अध्ययन और अनुशासन से प्राप्त करना है तभी हम इस राष्ट्र को मजबूत बना सकेगें। स्वागत और शुभकामना के साथ उन्होने इस शैक्षिक सत्र का शुभारंभ किया तो मै उनके सहज और सरल वक्तव्य की तुलना प्रवेश के दिन वाले कटु अनुभव से कर रहा है। फिर मन को यह कह कर संतोष दिया कि भले बुरे दोनो लोग हर कहीं होते हैं कौन सा मुझे अपना अहंकार पोषण करने यहॉ रहना है,हमें तो अपना अध्ययन और अनुशासनरूपी पराक्रम दिखा कर अपने भविष्यनिर्माण के पथ पर आगे बढ़ना है। जाहिर था कि अभी अभी कक्षा मे पाये व्याख्यान को मै गहनता से समझने का प्रयास कर रहाथा। कक्षा समाप्ति के पश्चात छात्र छात्राये बिखर कर अलग अलग हो गये। जब हम पढ़ कर नीचे आये तो भीड़ लगभग नही के ही बराबर थी। विज्ञान व वाणिज्य की कक्षायें अभी प्रारंभ नही हुई थी। कृषि वालो का समय सुबह ही होता था।
           हम जब नीचे आ रहे थे तभी डीन साहब डॉ० विश्वनाथ प्रसाद नीचे खड़े कुछ छात्रों को नीचे के क्लासरूम मे बैठने का निर्देश रहे थे । सीढ़ी से उतरते मुझे देख उन्होने मुझसे भी कहा कि कमरें मे चलों। भूतल वाले बॉये पहले कमरे मे ही काफी छात्र छात्रायें बैठे थे और अध्यापन मंच पर डॉ० विश्वनाथ प्रसाद, डॉ० राम सुधार सिंह(जो बाद के वर्षों मे मेरे अध्यापक संरक्षक भी रहे) के साथ दो अन्य लोग। कुछ गुरूजन और गुरूजन समान लोग छात्रों के साथ सामने  ही बैठे थे। हमे यह बैठने पर पता चला कि  यहॉ हिन्दी साहित्य कार्यक्रम चल रहा था जिसमें बाहर के शोरगुल से व्यवधान होने के कारण डीन साहेब ने बाहर टहल घूम रहे सभी बच्चों को बुला कर अंदर बैठा लिया। मै पीछे की सीट पर अनजान अपरिचित नये चेहरों के बीच बैठे इस फिजूल के बेकारबाजीके लिये कूढ़ना शुरू ही किया था कि मेरे जीवन मे वह क्षण आया जिसने मेरे भविष्य के शौक को एक नई दिशा दी। मंच पर बैठे कुर्ता पाजामा और सदरी पहने मध्यम कद के गौरवर्णीय आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी सज्जन के स्वरों मे जैसे मॉ सरस्वती विराजमान हो अपनी मधुर रागिनी बजा रही हो -

" गीत जिस दिन मोहब्बत के मर जायेगें,
टूट कर हम उसी दिन बिखर जायेगें।
सामने बैठिये आईने की तरह,
आपको देख के हम सँवर जायेगे।
आदमी के ज़हर का असर देखने ,
साँप भी गाँव से अब शहर जायेंगे ! "

              वह सज्जन थे हिन्दी के प्रख्यात गीतकार पं० श्री कृष्ण तिवारी और यह हिन्दी विभाग मे उनके अकस्मात आगमन पर परास्नातक हिन्दी के छात्रों के अनुरोध पर यह आशुकविगोष्ठी आयोजित थी । मेरे लिये टीवी के अलावा किसी कविगोष्ठी मे कवि से रूबरू होने का यह पहला अवसर था।  सधे हुये स्वरों मे डूबते उतराते गीत के बोलों मे मुझे तालियों की आवाजों से वर्तमान का अहसास हुआ। छात्र श्रोताओं के मॉग पर पंडित जी ने  आपातकाल मे लिखा हुआ अपना मशहूर  गीत सुनाया -

भीलों ने बाँट लिए वन
राजा को खबर तक नहीं

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं।

यह मेरे जीवन की प्रथम सुनी  कविता थी और यूपी कालेज के पढ़ाई के पहले दिन की कापी पर लिखी नोट्स भी , जो मैने सुनते हुये जल्दी जल्दी आखिरी पन्ने पर लिख लिया था। वह पन्ना आज भी मेरी पुरानी डायरी के पन्नों मे कहीं सुरक्षित है। संभवतः यही वह दिन था जिसने मुझ उडण्ड और खिलंदड़े लड़के को साहित्य की ओर आकर्षित किया। कालेज से चाचा के घर पहुंचने तक मै बार बार यही गीत गुनगनाता रहा।चाची ने आज की पढ़ाई के बारे मे पूछा तो बरबस ही होठों पर मुस्कराहट आ गई कि मै पढ़ने अर्थशास्त्र गया था और पढ़ आया हिन्दी की कविता।
         पूरे दिन और रात मेरे ऊपर अर्थशास्त्र के बजाय उस  कविता का प्रभाव बना रहा। दूसरे दिन से बाकी नियमित कक्षाएँ भी चलने लगी। कल की तरह आज भी कक्षा से निकलते ही सभी छात्र तितर बितर हो कर बिखर गये,पर यह बिखराव हम जैसों पर ज्यादा भारी था। क्योंकि इसके पूूूूर्व के छात्र जीवन मे कभी भी न हम अकेले रहे न ही एकाकी जीवन ही जीया था। इस बिखराव के बाद भी छात्र छात्राओं के दो गुट तो स्पष्टत: दिख रहे थे। पहले गुट मे वे छात्र छात्रायें जो इसी कालेज परिसर के अंग रहे उदय प्रताप इण्टर कालेज और रानी मुरार से पढ़ कर आये थे वे आपस मे पूर्व परिचय के कारण घुले मिले थे। दूसरे गुट मे वे छात्र छात्रायें जो यू पी कालेज मे पहली बार प्रवेश लेने के बावजूद कालेज परिसर, परिवेश और लोगों से परिचित थे , इस गुट मे शहर के छात्र विशेषकर अर्दली बाजार, शिवपुर, पाण्डेपुर, वरूणापुल,पहड़िया और आस पास के थे। इन दोनो गुटों से उपेक्षित हम लोग थे जो यू पी कालेज मे पढ़ने दूर दराज और दूसरे शहरों गॉवों से आये थे। हमारे जैसे लोग दोनो गुटों से अलग थलग छितराये हुये थे और कालेज परिसर और परिवेश को समझने का एकाकी प्रयास कर रहे थे। मेरे लिये यह एक कष्ट मय प्रक्रिया थी क्योंकि मुझे याद नही कि मैने कभी बिना संगी साथी के जीवन का कोई दिन व्यतीत किया हो। बरामदें मे गुटों से अलग थलग खड़े एक पतले दुबले छात्र को मैने अपना परिचय देते हुये उससे उसके विषय पूछ दोस्ती की शुरूआत की। वह अरविन्द था, लखनऊ से केन्द्रीय विद्यालय मे पढ़ने के बाद यहॉ नाम लिखाया था। उसे भी किसी साथी की ही तलाश थी। तभी हम लोगों से राजेश भी आ मिले, वे मेरे बचपन के मित्र  होने के साथ रिश्ते मे भाई लगते है और उसने भी यहीं प्रवेश लिया था। फिर तो दोनो गुटों से अलग थलग पड़े हम गुटनिरपेक्ष छात्र छात्राओं का तीसरा गुट धीरे धीरे प्रभावी होता गया और एक स्थिति यह हो गई कि दोनो गुट हम लोगों से जुड़ने लगे। सीनियर्स के क्लासेज भी शुरू हो चुके थे। अब बड़े छोटे का आपसी तालमेल भी दिखने लगा था। कहीं कोई रैगिंग नही। कहीं कोई जाति प्रभुत्व नही। क्लास कर के दोस्तों के संग कैण्टीन मे जा कर समोसा चाय लालपेड़ा खाते किसी सीनियर के आने पर सम्मान के साथ उनके लिये सीट छोड़ देना और उस सम्मान के बदले पैसा न देने की नसीहत पाते हुये अब कालेज लाईफ पूरे रौ मे चलने लगी।
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अगले अंक मे  वार्षिक संस्थापन समारोह और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन.....

रविवार, 12 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की ,,,(२) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १२जुलाई२०२०

यादें यू पी कालेज की ....(२)

            बहरहाल तीन दिन बाद शुक्रवार भी आ गया। हम और संतोष तीन दिनों से इस शुक्रवार का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। एक तरफ तो मन मे उत्साह था नये माने जाने कालेज मे पढ़ने का, वहीं दूसरी ओर तीन दिन रात तक मन मे धुकधुकी भी लगी हुई थी कि कहीं तीन दिन मे किसी क्षत्रिय छात्र को प्रवेश देने के लिये मेरा एडमिशन न कैंसिल हो गया हो। मन को यह भरोसा था कि जब बिना किसी सोर्स सिफारिश के नाम लिस्ट मे आ गया तो कटना नही चाहिये। फूलपुर बाजार मे हमें और संतोष को मिलना था वहीं से बस से बनारस आना था। बाजार मे संतोष मिले तो उन्होने कहा कि " यार सुनते है कि यू पी कालेज मे रैगिंग भी होती है और नये लड़कों को सब बड़ा मारते है।" अब यह एक नयी मुसीबत का नाम सुना हम लोगों ने, जिससे आज तक पाला नही पड़ा था। आपस मे तय किया कि चलो जहॉ तक हो सकेगा सह लिया जायेगा, और अति होने पर मूंछ वाले रामयाद सर हैं ही।  शायद इसीलिये उन्होने कहा ही है कि कोई दिक्कत पर मेरे पास आ जाना। बजरंगबली हनुमान जी का नाम ले कर हम लोग बस मे बैठे और भोजूबीर उतर कर यूपी कालेज पहुंच गये। आज भीड़भाड़ कुछ ज्यादा ही थी। लड़कों के साथ लड़कियॉ भी दिख रही थी। इतनी लड़कियों को एक साथ देखने का हमारा पहला अनुभव था क्योंकि  कक्षा ६ से लेकर इण्टर तक की हम लोगों की शिक्षा दीक्षा लड़को के स्कूल मे हुई थी। कला संकाय के भूतल पर संकाय का कार्यालय था । भवन मे प्रवेश करते दॉयी ओर,सीढ़ीयों के पहले। हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान समालोचक डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी संकाय प्रमुख थे और उन्ही के द्वारा कौसिंलिंग ली जा रही थी। हाईस्कूल इण्टर का मार्कशीट, सनद, टीसी, चरित्र प्रमाण पत्र का ओरिजिनल से मिलान कर फार्म के एक हिस्से को फाड़ कर छात्रों को दे दिया जाता और उसे ले जा कर विज्ञान भवन मे प्रथमतल के गलियारे मे स्थित फीस काउंटर पर फीस जमा करना था। यह संपूर्ण प्रक्रिया हम ने तीन चार छात्रों की कौंसिलिंग को देख कर समझ लिया था। बाहर भीड़ लगे रहने पर भी क्या मजाल कि कमरे मे दो के बजाय तीन लड़के घुस जाये। इतना सख्त अनुशासन हम लोगों के लिये नया ही नही अनोखा भी था। लगभग एक घंटा इंतजार करने के बाद संतोष का नंबर आया। मेरा नंबर लिस्ट मे उनसे पांच लाईन नीचे था। संतोष अंदर गये तो सब कुछ जॉच कर ये पता चला कि हाईस्कूल के सनद की कापी नही है। तुरंत बगल मे बैठे कुर्ता पजामा पहने हुये पतले दुबले गूरूजी ने ( बाद मे हम लोग उनको सतीश बाबू के नाम से जाने) एकदम से आदेश दिया कि जाओ  भोजूबीर से सनद फोटो कापी करा के ले आओ। अब बेचारे संतोष परेशान । हम लोगों के लिये  भोजूबीर भी उस दिन आक्सफोर्ड लेन से कम नही था। बाहर निकलने पर मैने संतोष से कहा कि थोड़ी देर रूक कर हमारी कौंसिलिंग के बाद दोनो जन चल के फोटोकापी करवा लेगें। पांच लड़को बाद बस मेरा नंबर है । मेरी बारी में अंदर  जब मेरे डाकूमेण्ट्स का मिलान हो रहा था तो संतोष बाहर  दरवाजे के पास खड़े हो उत्सुकतावश यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि कहीं मेरे मे भी कुछ कमी तो नही रह गई है तभी एकदम सफेद झकाझक सफारी मे विराजमान  डॉ० विश्वनाथ प्रासाद की दृष्टि उन पर पड़ गई और उन्होने कस कर संतोष को वहॉ खड़े होने पर डॉट दिया। रामकसम हम लोग अंदर से बुरी तरह सहम गये पर इस  बात की गॉठ बुरी तरह मन मे बैठ गई। बेचारे संतोष और हम सहमे सकुचाये भकुआये से फोटोकापी कराने दुकान पूछते पूछते हुये भोजूबीर पहुंचे। भोजूबीर भी अजीब जगह है । यहॉ १०० मीटर के अंदर मे तीन तिराहा  और दो चौराहा है और सब का नाम भोजूबीर ही है। तब यूपी कालेज से निकल कर दाहिने हाथ पकड़ कर कचहरी जाने वाले रास्ते पर चौराहे के पास कुंये के सामने कोने मे शव विश्राम स्थल का तबूतरा था और उसी के पास सरस्वती टाईपिंग एण्ड फोटोस्टेट की दुकान थी। पूरे कमरे मे लगी बड़ी सी मसीन मे पहले सीधे प्लेट निकाल कर  फिर गोल गोल आगे पीछे करते हुये फोटोकाफी हुआ करती थी वहॉ।  ५० पैसा कापी पहला पन्ना फिर ३० पैसा कापी दूसरा पन्ना की दर से। हम लोगों ने अपने सारे डाकूमेण्ट जो तब संख्या मे कुल चार थे  फोटो कापी करवा लिया।जेब के फुटकर दो रूपये उसे देकर वापस आर्ट्स फैकल्टी पहुंचे। डरते डरते संतोष के "मे आई कम इन सर?" कह कर अनुमति मॉगने पर डीन साहब ने ऐसे देखा जैसे उससे कोई गुनाह हो गया हो। थोड़ी देर पहले संतोष को मिली डॉट का सबक याद रखते हुये मै दरवाजे से हट कर खिड़की के सामने खड़ा था जहॉ से अंदर की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। डाकूमेण्ट चेक कराते समय संतोष थोड़ा टेबुल पर झुक कर कुछ बता रहा था कि ढीले ढाले कुर्ते पजामे मे अपने को सेट किये हुये पतले दुबले सतीश बाबू ने फिर हड़का दिया, "सीधे खड़े नही हो सकते, ऊपर बिछे जा रहे हो।" अब बेचारे सीधे साधे संतोष खुद की गलती भी नही समझ पाये और पहले ही दिन दो बार डॉट खा गये। खैर कौंसिलिंग की औपचारिकता पूरी कर एडमिशन फार्म का पन्ना हम लोगों को मिल गया फीस जमा करने के लिये। आर्ट्स फैकल्टी से विज्ञान भवन फीस काउंटर तक हम लोग मौन ही रहे। अंदर से दोनो जन महाविद्यालय मे हुये इस पहले साक्षात्कार से खुश नही थे पर एक दूसरे से कुछ कह नही रहे थे।

           शुक्र था कि शुल्क पटल प्रत्येक संकाय के लिये अलग अलग थे। कला संकाय वाले पटल पर आठ नौ छात्र पहले से लाईन मे थे।हम भी लाईन मे लग गये। हमे क्या पता कि असली मुश्किल तो अब होनी थी। हमारी फीस ₹६४१/- और संतोष की ₹५४१/- रूपये लगनी थी, यानि कुल ₹११८२/- रूपये । काउंटर पर पहुंच कर दोनो फार्म दिये तो काउंटर क्लर्क ने कहा कि एक छात्र से एक फार्म। जब पीछे पलट के संतोष का फार्म उसे पकड़ाने लगा तो पता नही क्यों क्लर्क महोदय को दया आ गई उन्होने कहा" अच्छा लाईन मे हो तो दे दो दोनो साथ ही।" हमने सौ सौ के बारह नोट उन्हे पकड़ाये तो फुटकर देने को कहा, तुरंत पीछे से संतोष ने पचास बीस के एक एक और दस के दो नोट बढ़ा कर मामला सेट करने की कोशिश की तो उन्होने दो रूपये फुटकर की डिमांड रख दी। यह कहते ही कि दो रूपये फुटकर नही है , वे महोदय भड़क गये, "नही है से क्या , एडमिशन कराने आये हो तो फुटकर ले के आना चाहिये था न, अब मै कहॉ से ले आँऊ आठ रूपये?" मै कभी खुद को कोस रहा था फुटकर न रखने के लिये कभी फोटोस्टेट वाले को जो उसने फुटकर दो रूपये ले लिये थे। " सर देख लिजिये" पीछे से संतोष ने याचना की। "अरे देख कहॉ से ले? यहॉ क्या हम रेचकारी की दुकान लगा के बैठे हैं।" काउंटर बाबू एकदम असहयोगात्मक मुद्रा मे थे।और हम दोनो काउंटर के बाहर विपन्न दीन हीन जैसे। समस्या यह भी थी कि उसी दिन फीस न जमा करने पर एडमिशन कैंसिल हो जाता। ऐसे मे कोई और सूरत न देख हमने लाईन मे अगल बगल वालों से फुटकर के लिये पूछना शुरू किया पर अंदर के रवैये को देख बाकी लोग भी  अपने अपने फुटकर से सावधान हो गये थे। बगल वाला काउंटर कृषि संकाय का था उस पर भी तीन चार लोग लाईन लगाये थे ,हमने उनसे भी फुटकर के लिये मदद मॉगी। पर सभी ने ना ना कह दिया। तभी उस लाईन मे खड़े तीसरे छात्र जो हम लोगों से वय मे बड़े और अच्छी कद काठी वाले थे, ने पूछा "कितना पैसा कम हो रहा है?" हम लोगों ने कहा कि "सर दो रूपये देना है इन्हे।" उन्होने तुरंत अपने जेब से एक रूपये के दो सिक्के निकाले और देते हुये कहा" कि फुटकर तो नही है, ये लो जमा कर दो।" 

                चलो ये समस्या तो निपटी। हमने ₹११८२ रूपये जमा कर रसीद ले कर औपचारिक प्रवेश पा लिया। तब तक फुटकर दो रूपये देने वाले सज्जन अपना काम निबटा कर के जा चुके थे। पुन: कला संकाय आ कर देखा तो नोटिस बोर्ड पर ५ अगस्त से कक्षाएँ चलने की नोटिस लगी थी। सुबह से लाईन लगाये और खड़े खड़े हम लोग थक गये थे । मन हुआ कुछ चाय चुक्कड़ कर लिया जाये। हमारी जानकारी मे दुकान भोजूबीर थी पर संतोष ने सुझाया कि उस दिन हम लोगों ने एनसीसी के बगल मे कैण्टीन देखा था और वहॉ बैठ कर कुछ चाय नाश्ता करते लोगों को भी। तो हम लोग कैण्टीन पहुंच गये। वहॉ ६० पैसे का समोसा और चालीस पैसे की चाय पी कर निकलने वाले ही थे कि  दो रूपये फुटकर देने वाले सज्जन कैण्टीन मे आते दिखे। हम लोगों ने सोचा बढ़िया है ये यही मिल गये नही तो बिना नाम पता के इनका भी पैसा लौटाना मुश्किल होता। अब हम लोगो के  पास फुटकर भी था । संतोष तुरंत उनके पास पहुंच कर दो रूपये देते हुये कहे "सर, वो आपका पैसा।" उन्होने दो क्षण संतोष और हमे देखा फिर बैठने को कह हम लोगों के बारे मे, विषय, पिछला कालेज, घर दुआर पूछने लगे। फिर बताया कि "इस कालेज मे सर कहने की परंपरा नही है, हम सभी एक परिवार के हैं , यहॉ बड़ो को भईया कह कर सम्मान देते है और अपनापन पाते है।" सुबह से तल्ख व्यवहार झेल रहे हम लोगों ने मुंहदेखी सहमति मे सिर हिलाया। और चलने को हुये। संतोष ने एक बार फिर दो रुपया उनकी ओर बढ़ाते हुये कहा" सर वो आपका दो रूपया।" इतना सुनते ही वो भड़क गये " तुम लोगो को एतना देर से समझा रहे है, बुझा नईखै रहा है। दूई रूपिया अपने छोटे भाई के फीस मे हम जोड़ देगें तो कर्जा मॉगेगें? और ई सर सर का होता है, कायदे से भईया कहे मे शरम आ रहा है तो अरून कहो।रखो पईसा। बड़े आये पईसा देने वाले?"

         आज सुबह से अनजाने लोगों से डॉट खाते हम लोगो का यह तीसरा मौका था। क्या जगह है यार, नये बच्चों को पा के जिसका मन हो रहा है वही हड़का दे रहा है। हम लोगों के मुंह लटक गये। जिसे तुरंत उन्होने ताड़ लिया, फिर बड़े प्यार से बोले " अरे पागल, अब हम भईया हो के तुमसे दो रूपया लेगें , मेरी तरफ से एडमिशन की खुशी मे लाल पेड़ा खा लेना", फिर जैसे उन्हे याद आया कि हम लोग तो पहली बार कालेज आये हैं हम तो लाल पेड़ा से अनजान होगें, तो तुरंत उन्होने कैंटीन काउंटर पर आवाज दिया " ऐ बाऊसाब, तीन गो लालपेड़ा भेजियेगा तो।"उस प्यार भरे डॉट के स्वाद से लालपेड़ा आज तक हमारे पसंदीदा मिठाई मे शामिल है।

         वह सज्जन अरूण भईया थे। मोहनिया रामगढ़ के रहने वाले बीएससी थर्ड ईयर के छात्र। अरूण भईया जब तक रहे, हम लोगों के लिये कालेज मे छॉव बने रहे। फिर जाने कितने बार उनके साथ लालपेड़ा खाने का मौका मिला और हर बार पैसा उन्होने ही दिया। बड़े भाई की मौजूदगी मे डॉट खाने के डर से हमने कभी पैसा देने की कोशिश भी नही की।और वो दो रूपया, वह अभी तक मूल धन के रूप मे अरून भईया के धरोहर रूप मे हमारे खाते मे दर्ज चला आ रहा है।😀😀😀

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क्रमश:.........

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