रविवार, 2 जून 2019

व्योमवार्ता/दिवंगत रिश्ते,आज के रिश्तों का सच : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,30मई 2019

दिवंगत_रिश्ते
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“हैलो…हैलो…अंकित बेटा…हम पहुँचने वाले हैं…ट्रेन आउटर पर खड़ी है।” “अच्छा पापा, मैं भी निकलता हूँ ऑफिस से, बस दस मिनट में स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप वेटिंग रूम में बैठ जाइएगा” कहकर अंकित ने फोन …


“हैलो…हैलो…अंकित बेटा…हम पहुँचने वाले हैं…ट्रेन आउटर पर खड़ी है।”
“अच्छा पापा, मैं भी निकलता हूँ ऑफिस से, बस दस मिनट में स्टेशन पहुँच जाऊँगा। आप वेटिंग रूम में बैठ जाइएगा” कहकर अंकित ने फोन काट दिया।
उधर ट्रेन में बैठे राजेन्द्र जी और उनकी पत्नी उर्मिला ने भी बड़े उत्साह से अपना बैग-अटैची सँभाल ली क्योंकि दिल्ली का स्टेशन आने वाला ही था। गाड़ी भी रेंगने लगी थी।
उर्मिला ने बहुत गद्गद् होते हुए कहा, “पता ही नहीं चला कि पाँच साल कैसे बीत गये? लड्डू भी तो अब बोलने लगा है।”
राजेन्द्र जी भी मुस्कुराकर बोले, “हाँ…अगर उसने फोन पर नहीं कहा होता कि ‘दादा दी तब आओदे’ …तो मैं आता नहीं। पाँच साल में एकबार भी नहीं बुलाया अंकित और सलोनी ने।”
“ओफ्फो! आप तो हर समय झुँझलाते ही रहते हैं। अरे बच्चे अपने काम में बिजी थे कि हमारी देखभाल करते। दोनों को ऑफिस जाना होता है। खाली घर में क्या करते हम? ठीक है, अब बुला लिया ना?” उर्मिला ने समझाते हुए कहा, “अच्छा सुनिए, उनके फंक्शन में कुछ भी हो ज्यादा टेंशन मत करना…दिल्ली का सिस्टम अलग है।”
“हाँ-हाँ जानता हूँ…चलो प्लेटफार्म आ गया” राजेन्द्र जी ने कहा और अपनी अटैची ट्रेन के डिब्बे की गैलरी में घसीटते हुए गेट की ओर चल दिए। पीछे-पीछे बैग और पानी की बोतल सँभाले उर्मिला भी चल रही थी।
पाँच साल पहले अंकित और सलोनी ने दिल्ली में ही गुपचुप शादी कर ली थी। राजेन्द्र जी और उर्मिला को जब पता लगा तो वे बहुत नाराज़ हुए। अब पाँच साल बाद जब उनका बेटा लड्डू दो साल का हो गया तो उसके जन्मदिन पर एक ग्रांड पार्टी का आयोजन दिल्ली के एक बड़े होटल में किया जा रहा है। बहुत मनाया, कई-कई बार दोनों ने सॉरी बोला तब कहीं जाकर राजेन्द्र जी और उर्मिला ने पार्टी में दिल्ली आने का मन बनाया लेकिन पक्का निर्णय उस समय लिया जब दो साल के नन्हें लड्डू ने अपनी तोतली जबान में दादा-दादी को इन्वॉइट किया और सारे गिले-शिकवे भुलाकर दोनों ने रिज़र्वेशन करवा लिया।
राजेन्द्र जी ने उर्मिला को हाथ पकड़कर प्लेटफार्म पर उतारा और अंकित को फोन करने लगे, “बेटा, हम प्लेटफार्म पर आ चुके हैं…तुम कितनी देर में आ पहुँच रहे हो?”
“ओह पापा, बस आधा घंटा लगेगा। आप वेटिंग रूम में बैठिए। चाय-वाय पीजिए मैं ऑफिस से निकलता हूँ” अंकित ने उत्तर दिया।
“तुम अभी तक ऑफिस से निकले ही नहीं हो…तुम तो कह रहे थे कि दस मिनट में…” राजेन्द्र जी को झुँझलाहट आ रही थी।
“अरे पापा! एक इम्पार्टेंट फाइल साइन करनी थी, बस निकल ही रहा हूँ बीस-पच्चीस मिनट में” कहकर अंकित ने फोन काट दिया।
राजेन्द्र जी बड़बड़ाते हुए वेटिंग रूम की ओर चलने लगे, “अभी तक जनाब ऑफिस से निकले ही नहीं हैं…अभी आधा घंटा लगेगा…पहुँचेंगे करीब एक-डेढ़ घंटे में…ऑफिस यहाँ रखा है…हद है।”
“ओफ्फो, अब क्यों बड़बड़ा रहे हो? आ जाएगा। काम कर रहा है घूम तो नहीं रहा” उर्मिला ने कहा।
“तुम्हारी इसी आदत से मुझे चिढ़ है। हमेशा अंकित का पक्ष लेती हो। अरे! जब उसे मालूम था कि हम आज आ रहे हैं तो क्या गाड़ी नहीं भेज सकता था स्टेशन? और फिर जब पार्टी आज है तो एक दिन की छुट्टी भी ली जा सकती थी” राजेन्द्र जी बोले।
“छुट्टी की क्या ज़रूरत है? पार्टी होटल में है। सबकुछ तैयार करना तो होटल का काम है। हमें क्या हम तो पैसा लेकर पहुँच जाएँ बस” उर्मिला जी ने शान्ति से पुल पर चढ़ते हुए कहा।
“बस…माँ-बाप, रिश्तेदार सबको चूल्हे में झोंको और…” राजेन्द्र जी झुँझलाने लगे।
“अच्छा बस करो…किधर जाना है?” उर्मिला जी ने बात काटी।
“इधर चलो, प्लेटफार्म एक इधर है…वेटिंग रूम भी इधर ही है” राजेन्द्र जी सूटकेस घसीटते हुए बढ़ने लगे।
वेटिंग रूम में आकर हाथ-मुँह धोकर दोनों ने एक-एक कप चाय पी। लगभग आधा घंटा बीतने के बाद राजेन्द्र जी ने फिर अंकित को फोन किया, “हैलो…कहाँ हो?”
“बस पापा…अभी पहुँचा। ऑफिस से निकल चुका हूँ…ज़रा होटल में कुछ एडवांस देकर स्टेशन पहुँच रहा हूँ” अंकित का जवाब था।
फोन अपनी जेब में रखते हुए राजेन्द्र जी को खामोश देखकर उर्मिला ने कहा, “क्या हुआ?”
“अभी होटल जा रहा है…एडवांस देने। उसके बाद यहाँ आएगा” राजेन्द्र जी ने बिस्किट मुँह में डालते हुए कहा।
“चलो ठीक है। आ जाएगा। वैसै अभी साढ़े ग्यारह ही तो हुआ है…पूरा दिन पड़ा है। पार्टी तो शाम सात बजे से है” उर्मिला ने कहा।
लगभग एक बज चुका था। दोनों बैठे-बैठे ऊँघने लगे थे कि राजेन्द्र जी ने फिर अंकित को फोन किया। बहुत देर तक घंटी बजती रही और कोई उत्तर न मिला। दो-तीन बार फोन करने पर भी जब कोई उत्तर नहीं मिला तो राजेन्द्र जी झल्लाते हुए बोले, “अब फोन ही नहीं उठ रहा है।”
उर्मिला ने राजेन्द्र जी को समझाया, “क्यों गुस्सा कर रहे हैं? ट्रेफिक में फँसा होगा। गाड़ी चलाए कि फोन उठाए।”
“आधे घंटे में आ रहा हूँ बोला था और डेढ़ घंटा हो चुका है। क्या तरीका है?” राजेन्द्र जी के चेहरे पर अभी भी गुस्से के भाव थे।
“दिल्ली का ट्रेफिक मालूम है…खामख्वाह नाराज़ हो रहे हैं आप। आ जाएगा” उर्मिला ने कहा ही था कि फोन की घंटी बज उठी। राजेन्द्र जी ने झट से फोन उठाया, “हैलो…हाँ…कहाँ हो?”
अंकित ने उत्तर दिया, “अरे पापा, सारी…मैं जाम में फँसा हूँ…पता नहीं कितनी देर लगेगी…मैं सलोनी को फोन करता हूँ वह आपको लेने आ जाएगी…उसका ऑफिस स्टेशन के पास ही है।”
“जब उसका ऑफिस पास है तो पहले नहीं कर सकता था…ठीक है करो…हम भी बैठे-बैठे थक गये हैं” राजेन्द्र जी ने कहा और फिर उर्मिला जी के पास आकर बेंच पर बैठ गये।
प्रतीक्षा करते-करते एक घंटा और बीत गया। लगभग दो बज चुके थे, भूख भी लगने लगी थी और धैर्य भी साथ छोड़ रहा था। झुँझलाते हुए राजेन्द्र जी ने कहा, “क्या तमाशा लगा रखा है? ऑफिस पास है तो अभी तक नहीं आ पाई देवी जी…अच्छा बेवकूफ़ बनाया…ये बड़े शहर वाले भी…अरे हमें पता भी नहीं बताया वरना हम खुद ही पहुँच जाते।”
“आप बहुत जल्दी नाराज़ हो जाते हैं। अपना काम एकदम छोड़कर कोई कैसे आ सकता है? आ जाएगी, वैसे भी पहली बार उसे देखेंगे। अब तक तो केवल फोटो में ही तो देखा है। अच्छा, अब कुछ खा लीजिए,” कहते हुए उर्मिला ने पूड़ी-आलू और अचार डिस्पोज़ेबल प्लेट में लगाया और प्लेट राजेन्द्र जी के सामने बढ़ा दी। भूख ज़ोरों की लग रही थी, अतः सबकुछ भूलकर राजेन्द्र जी ने पूड़ी-आलू खाए, पानी पिया और एक-एक चाय का आर्डर देकर फिर इन्तज़ार करने लगे।
पौने तीन बज चुके थे पर अभी तक कोई भी नहीं आया था। राजेन्द्र जी ने फिर फोन किया तो अंकित ने कहा, “अरे पापा! मैं तो समझ रहा था कि सलोनी आपको ले आयी होगी। मैं तो बड़ी मुश्किल से जाम से निकलकर घर की तरफ जा रहा हूँ। मैं अभी सलोनी से बात करता हूँ।” फोन कट गया। राजेन्द्र जी एकदम शान्त होकर बैठ गये, उर्मिला बेंच पर पैर पसार चुकी थी। लगभग बीस मिनट बाद फिर अंकित का फोन आया, “हैलो पापा जी…सलोनी पहुँच रही है अभी, आप इन्क्वायरी ऑफिस पर पहुँच जाइए।” राजेन्द्र जी ने झटपट उर्मिला को उठाया और अपनी अटैची, बैग आदि सँभालते हुए इन्क्वायरी ऑफिस पर पहुँच गये। लगभग आधा घंटा तक खड़े-खड़े थकने के बाद पास ही पड़ी बेंच पर बैठ गये और घड़ी देखते हुए बोले, “लो, साढ़े तीन बज गया और अभी तक हमारी सुध नहीं आई इन लोगों को। तुम्हें क्या हुआ? आर यू ओके?” उर्मिला जी के चेहरे की ओर देखकर राजेन्द्र जी बोले।
“पता नहीं क्यों एकदम से पेट और सिर में दर्द होने लगा”, उर्मिला ने दर्द के कारण मुँह बिगाड़ते हुए कहा।
“अच्छा चलो, वेटिंग रूम में चलो वहीं लेट जाना। जब सलोनी आयेगी तो यहीं बुला लूँगा। अरे! उसका नम्बर तो पूछा ही नहीं अंकित से,” राजेन्द्र जी ने कहा और दोनों वेटिंग रूम लौट आए।
उर्मिला को बेंच पर लिटाना चाहा लेकिन तब तक अन्य यात्री आकर बैठ चुके थे। अतः केवल बैठने का ही स्थान शेष था जिसपर उर्मिला बैठ गयी। राजेन्द्र जी ने सलोनी का फोन नम्बर पूछने के लिए अंकित को कई बार फोन लगाया लेकिन फोन नॉट रीचेबल बताता रहा। थककर वह भी एक कोने में बैठ गये। शाम के साढ़े चार बज चुके थे। उर्मिला के चेहरे से पता लग रहा था कि उनकी तकलीफ़ बढ़ रही है। अब राजेन्द्र जी परेशान हो रहे थे। एकबार फिर अंकित को फोन मिलाया, “हैलो, बेटा तुम्हारी माँ की तबियत खराब हो रही है…जल्दी आओ।”
“आप कौन बोल रहे हैं?” एक नारी स्वर ने फोन पर प्रश्न पूछा।
“बेटा मैं अंकित का पापा बोल रहा हूँ…तुम सलोनी हो ना?”
“यस मैं सलोनी बोल रही हूँ…पर मैं आपको नहीं जानती और यह अंकित कौन है? सारी रांग नम्बर।” फोन कट गया।
राजेन्द्र जी हैरान व परेशान थे, ‘अभी थोड़ी देर पहले तक तो अंकित के नम्बर पर उससे बात हो रही थी, अब अचानक यह रांग नम्बर कैसे हो गया?’ उनके चेहरे पर उदासी और परेशानी के भाव साफ झलक रहे थे। उर्मिला भी अब तक कराहने की स्थिति में आ चुकी थी। उन्हें धर्य बँधाकर कुछ दवाइयाँ लेने वह स्टेशन के बाहर निकल आए। यहाँ-वहाँ देखा कोई मेडिकल स्टोर नज़र नहीं आया। आने-जाने वालों से पूछते हुए थोड़ी दूरी पर एक मेडिकल तक पहुँचे लेकिन उसने ऐसे कोई भी दवा देने से मना कर दिया और पहले डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी।
राजेन्द्र जी दुखी हो रहे थे। इधर-उधर देखकर सड़क पार करके स्टेशन की ओर बढ़ गए और जेब से फोन निकाल कर फिर से अंकित को फोन किया, “हैलो…अंकित बेटा…तुम्हारी माँ की तबियत बिगड़ रही है…तुम कहाँ हो…” उनकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि “सारी रांग नम्बर” सुनकर वह चुप हो गए। रुआँसा चेहरा लिए वे स्टेशन पर वेटिंग रूम में लौट आए। उर्मिला अभी तक कराह रही थी। राजेन्द्र जी को देखकर पूछने लगी, “कितनी देर में आएगा अंकित?” राजेन्द्र जी ने कुछ नहीं कहा, बस प्रश्न किया, “बहुत दर्द है?” ‘हाँ’ में सिर हिलाने के बाद उर्मिला ने फिर पूछा, “कितनी देर…?” “चलो बाहर किसी डॉक्टर को दिखा दूँ। पता नहीं क्या हो गया अचानक?” उर्मिला की बात काटते हुए राजेन्द्र जी उन्हें उठाने लगे।
“अरे, अंकित कब आएगा…आप कहाँ परेशान हो रहे हैं? अंकित को आने दीजिए, वही दिखा देगा” उर्मिला ने कहा।
राजेन्द्र जी ने उर्मिला से बिना नज़रे मिलाए कहा, “पता नहीं कब आयेगा…और तुम कब तक दर्द सहती रहोगी…चलो बाहर चलो…कोई-न-कोई डॉक्टर मिल ही जाएगा।”
उर्मिला चलने को खड़ी हुई पर लड़खड़ाकर फिर बैठ गयी, “नहीं चला जा रहा है, लगता है पैरों में जान ही नहीं रही।”
“अरे हिम्मत तो करो…आओ मैं पकड़ लेता हूँ” राजेन्द्र जी ने कहा।
“नहीं…रहने दो। मुझे लिटा दो बस…” उर्मिला ने आँखें बंद कर लीं और बेंच पर ही लुढ़कने लगी।
राजेन्द्र जी बहुत विचलित हो गये। जैसे-तैसे उर्मिला को लिटाकर फिर फोन निकाला और न चाहते हुए भी नंबर मिलाया लेकिन ‘नॉट रीचेबल’ ही सुनते रहे। लाचार मजबूर राजेन्द्र जी की आँखें उर्मिला के दर्द में डूबे चेहरे पर पड़ते ही भर आईं। उनकी इस हालत को वेटिंग रूम का सहायक बहुत देर से देख रहा था। वे रुमाल से अपनी आँखें पोंछ ही रहे थे कि वह उनके पास आकर बोला, “क्या हुआ अंकल, कोई परेशानी?” राजेन्द्र जी ने गीली आँखें लिए भर्राए गले से सारा हाल कह सुनाया।
सहायक बोला, “अरे अंकल! आप किस चक्कर में पड़े हैं? यह दिल्ली है। आपका बेटा और बहू कोई आपको लेने आने वाला नहीं है। आप मेरी सलाह मानों पहले आंटी को डॉक्टर को दिखाओ फिर गाड़ी में बैठकर वापस घर चले जाओ। यह दिल्ली जितनी बड़ी है, यहाँ के लोगों के दिल उतने ही छोटे हैं। रुकिए मैं अभी डॉक्टर को बुलाकर लाता हूँ।” सहायक चला गया।
राजेन्द्र जी उसकी बातों को याद करके सोचते हुए उर्मिला के चेहरे को देखते रहे। लगभग दस मिनट बाद वह सहायक डॉक्टर को साथ लेकर लौटा। डॉक्टर ने चेकअप किया और कुछ दवाइयाँ लिखकर राजेन्द्र जी को पर्चा पकड़ा दिया। राजेन्द्र जी ने डॉक्टर से फीस पूछी लेकिन डॉक्टर ने यह कहकर मना कर दिया कि “आप मेरे माता-पिता की तरह हैं, आपसे कैसी फीस? आप जल्दी मेरे साथ चलकर दवाइयाँ ले लीजिए, मेरा मेडिकल स्टोर भी यहीं पास में है।”
राजेन्द्र जी डॉक्टर के पीछे जाने को उठे तभी सहायक ने कहा, “अंकल, आप आंटी के पास बैठिए मैं दवाइयाँ लेकर आता हूँ।” डॉक्टर और सहायक को जाता हुआ देखकर राजेन्द्र जी को आश्चर्य हो रहा था कि इस शहर में जहाँ अपने भी बेगानों जैसे हो गये हैं, ये बेगाने लोग मेरी मदद कर रहे हैं। राजेन्द्र जी उर्मिला के पास बैठ गये। लगभग पन्द्रह-बीस मिनट के बाद सहायक लौटा और उसने दवाइयाँ राजेन्द्र जी को दे दीं। राजेन्द्र जी ने उर्मिला को उठाया और दवाइयाँ दीं।
सहायक अभी तक पास में खड़ा था। उसने राजेन्द्र जी से कहा, “अंकल, आप बरेली से आए हैं ना?” “हाँ… आज सुबह ही तो…” राजेन्द्र जी अपनी बात पूरी नहीं कर पाए कि सहायक ने कहा “जी मैंने देखा था। अंकल…वही गाड़ी अभी एक घंटे बाद इसी प्लेटफार्म से वापस जाएगी। यदि आप मेरी सलाह माने तो वापस चले जाइए क्योंकि आपको लेने यहाँ कोई नहीं आएगा। अभी चार दिन पहले आपकी ही तरह एक अंकल-आंटी पंजाब से आए थे। इसी वेटिंग रूम में दो दिनों तक अपने बेटे का इन्तज़ार करते रहे लेकिन वह नहीं आया और अन्त में उन्हें भी वापस जाना पड़ा। वैसे यदि आप चाहें तो मुझे अपने बेटे का पता बता दीजिए, मैं आपको आपके बेटे के पास पहुँचा…” वह बात पूरी नहीं कर पाया था कि राजेन्द्र जी ने जेब से पाँच सौ का नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “लो बेटे, दवाई के पैसे ले लेना और हम दोनों का वापसी का टिकट भी ले आना।” नोट लेकर सहायक चला गया।
उर्मिला को दवाई से आराम मिलने लगा था। बरेली की ओर वापस जाने वाली ट्रेन भी प्लेटफार्म पर लग रही थी। टिकट लाकर और ट्रेन में आराम से बैठाकर सहायक ने कुछ बिस्किट-नमकीन, जूस के पैकेट और फल उर्मिला दे दिए और उनके पास बैठकर अपने परिवार की बातें करने लगा।
गाड़ी का सिगनल हो चुका था। सहायक ने दोनों को उनकी यात्रा के लिए शुभकामनाएँ दीं और उनके पैर छूकर वहाँ से चला गया। गाड़ी भी प्लेटफार्म से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी कि तभी फोन की घंटी सुनकर राजेन्द्र जी ने फोन उठाया लिया। “हैलो…पापा…कहाँ हैं आप?” अंकित फोन पर पूछ रहा था।


“सॉरी रांग नम्बर” कहकर राजेन्द्र जी ने बन्द कर दिया और खिड़की से बाहर तेजी से पास होते हुए स्टेशन को देखने लगे।


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व्योमवार्ता/हालिया पढ़ी गई किताबें : व्योमेश चितर्वंश की डायरी, 1जून 2019, शनिवार

व्योमवार्ता/ हालिया पढ़ी गयी किताबें: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1 जून 2019, शनिवार

इधर जीवन के अस्तव्यस्तता और अनियमितता के वजह कहें या हाथ मे मोबाइल रहने पर सोशल मीडिया का शुरूआती नशा, किताबें पढ़ने का शौक बिलकुल छूटने लगा था। पिछले जन्मदिन ९ मई पर बच्चो के साथ यह संकल्प लिया कि हर सप्ताह कम से कम एक किताब जरूर पढ़ना है चाहे वह पाकेटबुक्स ही क्यों न हो, ताकि किताबे पढ़ने की आदत जीवन मे फिर से शुमार हो, लिहाजा हर सप्ताह एक नही पर मई महीने मे तीन हिन्दी बेस्ट सेलिंग किताबें पढ़ कर संकल्प का आगाज किया, उम्मीद है कि एक किताब हर हफ्ते वाला संकल्प जून से चलने लगेगा।
जो तीन किताबें सत्य व्यास की चौरासी, विनोद दूबे की इण्डियापा और निखिल सचान की यूपी 65 पढ़ी, आज के युवा लेखकों का ट्रेंड व किस्सागोई को बताती है, तीनो ही आखिरी तक आपको अपने कहानी के जादू से बॉधी रखती है, पढ़ के सचमुच मजा आ गया।
सत्य व्यास बीएचयू छात्र जीवन मे मेरे अनुज रहे हैं इसलिये उनसे थोड़ा अपनापन लगना स्वाभाविक है पर यह स्वाभाविकता वास्तविकता मे बदलने को तब मजबूर हो जाती है जब उनकी लेखनी बनारस टाकीज और दिल्ली दरबार की यात्रा करते हुये चौरासी के बोकारों मे भी अपने को उम्दा साबित करती है। सत्य ने पाठकों को अपने तिलस्म मे बॉधे रखने की जादूगरी को बरकरार ही नहीं रखा बल्कि उसे धारदार तेवर दिया है।
विनोद दूबे का इंडियापा समुंदर के नमकीन हवाओं मे सफर करने के बावजूद बनारस के गली मोहल्ले और घाट पर पसरा रहता है। वही बनारस, जहॉ मै बसता हूँ, जहॉ होना ही मेरा वजूद है, जहॉ के गली मोहल्ले घाट दुकाने माल सब आपको खुद के साथ कहानी का भागीदार बनाते हुये चलते है।हवा और पानी मे तेजी से सफर कर रहे आधुनिकीकरण के इस दौर मे बनारस और आसपास के समाज की परंपरा को न छोड़ पाने की कसक व टीस को महसूस करते हुये मन मे आखिर तक यह ख्याल आता रहता है कि काश कहीं से कुछ ऐसा हो जाता कि दोनो मिल जाते पर आपके सारे कयासों पर रोक लगाते हुये विनोद दूबे का इण्डियापा कहानी को ले जा कर वही छोड़ता है जहॉ आज के मध्यवर्गीय परिवारों की सोच पहुँचती है। विनोद दूबे की पहली किताब, पर सधी थीम पर आखिरी तक बॉधने वाला किस्सा। चैन व सूकूं देता है इण्डियापा पढ़ना। संतोष इस बात का कि सोशल मीडिया के इस जमाने मे भी अच्छी किताबें आ रही हैं ।
निखिल सचान की यूपी 65 बीएचयू के आईआईटी के राजपूताना से शुरू हो बीएचयू गेट पर आये दिन होने वाली पालिटिक्स पर चर्चा है। कानपुरिया व इलाहाबादी भाषा के तालमेल मे तलती हुई यह उपन्यास यात्रा सुसुवाही से अस्सी घाट और मुमुक्षु भवन तक फैल जाती है पर इसका फैलना रायता की तरह नही खट्टी मीठी चटनी जैसे है जो महत्वाकांक्षा के चरम पर जाकर भी शांति व शून्यता के लिये बेचैन है। अपने जीवन मे सब कुछ पाकर भी कुछ न पाने की बेचैनी, अपनों के इंतजार मे तरसती मृत्यु के लिये प्रतिक्षित जीवन संध्या, पिता के सपनों को पूरा करने मे जुटे अपने सपनों को अब तक न जानने वाले मेधावी होनहार आज की सच्चाई बयां करते है। बीएचयू के माहौल पर कोई किताब पढ़ते हुये आज भी मेरा मन बीएचयू वाला हो जाता है पर निखिल की यूपी उसे बीएचयू से निकाल कर भौतिकवाद के मकड़जाल मे खुद को ढूढ़ने के समस्या की जटिलताओं की ओर ईशारा करते चलती है। बहुत अच्छे निखिल ।
(बनारस,1जून 2019, शनिवार)
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बुधवार, 23 जनवरी 2019

व्योमवार्ता/ भारत मे बलात्कार व यौन अपराध का आरंभ, सोशल मीडिया पर घूमता एक विचार :व्योमेश  चित्रवंश की डायरी, 10 जून 2019, सोमवार

व्योमवार्ता/ भारत मे बलात्कार व यौन अपराध का आरंभ, सोशल मीडिया पर घूमता एक विचार :व्योमेश  चित्रवंश की डायरी, 10 जून 2019, सोमवार

          आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी।
        आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।तब आखिर ऐसा क्या हो गया ?? कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??~श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया ।~महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक "डेमेट्रियस प्रथम" ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।~इसके बाद "युक्रेटीदस" भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने "तक्षशिला" को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।~"डेमेट्रियस" के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक "वृहद्रथ" को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।~"सिकंदर" ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा "पुरु" की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और"बेबिलोन" वापस चला गया ।विजेता होने के बाद भी "यूनानियों" (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही "धर्म परिवर्तन" करवाया ।~इसके बाद "शकों" ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। "सिन्ध" नदी के तट पर स्थित "मीननगर" को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।~इसके बाद तिब्बत के "युइशि" (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति "कुषाणों" ने "काबुल" और "कंधार" पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें "कनिष्क प्रथम" (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ। जिसका राज्य "कश्मीर से उत्तरी सिन्ध" तथा "पेशावर से सारनाथ" के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।~इसके बाद "अफगानिस्तान" से होते हुए भारत तक आये"हूणों" ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।~इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे "नेपालवंशी" "शक्य" आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।।    
#अब आते हैं मध्यकालीन भारत में~जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण~और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन।~सबसे पहले 711 ईस्वी में "मुहम्मद बिन कासिम" ने सिंध पर हमला करके राजा "दाहिर" को हराने के बाद उसकी दोनों "बेटियों" को "यौनदासियों" के रूप में "खलीफा" को तोहफा भेज दिया। तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें "हारे हुए राजा की बेटियों" और "साधारण भारतीय स्त्रियों" का "जीती हुयी इस्लामी सेना" द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।~फिर आया 1001 इस्वी में "गजनवी"। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने "इस्लाम को फ़ैलाने" के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।"सोमनाथ के मंदिर" को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों "हिन्दू औरतों" का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर "बाजारों में बोलियाँ" लगाकर"जानवरों" की तरह "बेच" दिया ।~फिर "गौरी" ने 1192 में "पृथ्वीराज चौहान" को हराने के बाद भारत में "इस्लाम का प्रकाश" फैलाने के लिए "हजारों काफिरों" को मौत के घाट उतर दिया और उसकी "फौज" ने "अनगिनत हिन्दू स्त्रियों" के साथ बलात्कार कर उनका "धर्म-परिवर्तन"करवाया। ~मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर,~अपने हरम में "8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ"।~ इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए "मीना बाजार" लगवाने वाला "जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर"।~मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों "हिन्दू महिलाओं" "(माल-ए-गनीमत)"का बेरहमी से बलात्कार किया और "जेहाद के इनाम" के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह "सिपहसालारों" में बांटा तो कभी बाजारों में "जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी" गई।~ये असहाय और बेबस महिलाएं "हरमों" से लेकर"वेश्यालयों" तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।~वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा"पराजित हिन्दू (काफिर) स्त्रियों का बलात्कार" करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे "अपनी जीत" या "जिहाद का इनाम" (माल-ए-गनीमत) मानते थे।~केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा।~बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।~गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए "दिल दहला" देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।~इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।~इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।~ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।~महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।~1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों हिन्दू(काफिर) महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।~इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि "पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों" से "बलात्कार" किये बिना एक भी "हिन्दू (काफिर) स्त्री" वहां से वापस नहीं आ सकती थी।~विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की "नग्न यात्राएं (धिंड) "निकाली गयीं, "बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं"~और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।~20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया।
~इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे।~वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करनेके बाद उनके "स्तनों को काटकर" तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।अंत में कश्मीर की बात~~19 जनवरी 1990~~सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था~ "या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर "।~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं।~वह कहते हैं कि "मस्जिदों के लाउडस्पीकर" लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा,"निजाम-ए-मुस्तफा", 'आजादी का मतलब क्या "ला इलाहा इलल्लाह", 'कश्मीर में अगर रहना है, "अल्लाह-ओ-अकबर"कहना है।~और 'असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ "रोअस ते बतानेव सान" जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।~सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।~सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।~उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके "नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया"।~कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।~कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेजअस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी।~बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।~कश्मीरी हिन्दू महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।~लेखक राहुल पंडित उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, 'मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो'।~राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं,"कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थेवही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।~1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- 'हम सब एक, तुम भागो या मरो'।~घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।~कुल मिलाकर हजारों की संख्या में हिन्दू(काफिर) महिलाओं का बलात्कार किया गया।~आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल "हिन्दू(काफिर)" होने की सजा मिली।~घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।~अभी हाल में ही आप लोगों ने टीवी पर "अबू बकर अल बगदादी" के जेहादियों को काफिर "यजीदी महिलाओं" को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।~पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।~बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों दुःखद घटनाएँ सुनी होंगी।~यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।~केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।~परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी...बलात्कार के रूप में ।~आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।~जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिकरूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है।
(बनारस,10 जून 2019, सोमवार)
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