सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

बनारस / नाटी इमली का भरत मिलाप........

नाटी इमली का भरतमिलाप
                                                  *व्योमेश चित्रवंश

सन 1868 अक्टूबर का महीना।बाढ़ व वर्षा के पानी से वरूणा नदी अभी भी पूरे उफान पर है। इसी के किनारे काशी की संस्कृतिप्रेमी जनता रामलीला देखने भारी संख्या में उपस्थित है। आज की लीला में सीता हरण के पश्चात उनकी खोज में हनुमान को समुद्र लंघन कर लंका जाना है और सीता के बारे में पता करना है। हनुमान को जामवन्त आदि के साथ श्री राम विदा कर रहे हैं। सम्पूर्ण लीला प्रेमी लीला के संवाद और भाव में डूब रहे है तभी एक ओर कोलाहाल होता है पता चला कि अंग्रेज पादरी फादर मैककर्सन, अंग्रेज कलेक्टर व अन्य अधिकारियों के साथ वहां आ पहुँचे हैं। संवाद अदायगी बन्द हो जाती है। उपस्थित लीला प्रेमियों में एक भय मिश्रित कानाफूसी प्रारम्भ हो जाती है। तभी फादर मैकफर्सन आज की लीला के बारे में जानकारी लेते हैं और व्यंग पूर्वक भारतीय संस्कृति पर कटाक्ष करते है "रामायन का हनुमान तो पूरा "सी" लांघ गया था तुम्हारा हनुमान क्या वरूणा लांघेगा? इसी झोंक में मदिरा के नशे में चूर अंग्रेज कलेक्टर धमकी भरा आदेश देता है कि "अगर तुम्हारा हनुमान यह छोटी सी नदी नहीं क्रास करेगा तो कल से रामलीला ढकोसला बन्द।"
       फिर क्या था पादरी और कलेक्टर व्यंग और धमकी भरे लहजे से हनुमान बने पात्र का खून खौल उठा। परतन्त्रता की बेबसी और हनुमान की गरिमा के आवेश से उसका चेहरा लाल हो उठा। उन्होंने भगवान का ध्यान किया और कुछ करने को ठानते हुये लीला के रामचन्द्र जी से वरूणा पार करने की अनुमति माँगी। "एवमस्तु" सुनते ही हनुमान के स्वरूप ने "बोलों राजा रामचन्द्र की जै" का विकट हुंकार किया और एक ही छलांग में  वरूणा पार कर गये। पलक झपकते ही यह घटना घट गयी। उपस्थित भीड़ ठगी सी रह गयी। एक क्षण बाद उसको काल का बोध हुआ तो सभी लोग "पवनपुत्र महावीर जी की जय, राजा रामचन्द्र की जै" का उद्घोष करते हुये वरूणा के उस पार दौड़ पड़े जहाँ वीर हनुमान वरूणा लांघने के बाद गिरे थे और वही आराम कर रहे थे। उनको भक्त लोग वहाँ से उठाकर ले आये। बताते है कि हनुमान स्वरूप बने टेकराम जी नाटी इमली के भरत मिलाप लीला तक जीवित रहे। भरत मिलाप में उन्हें अपने ईष्टदेव श्री राम जी की झांकी में देवत्व के दर्शन हुये और वे स्वर्गवासी हो प्रभु चरणों में समर्पित हो गये। इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार ने रामलीला को सरकारी मान्यता प्रदान करते हुये सरकारी साधन सहित विशेष व्यवस्था की। जिस मुकुट को पहने टेकराम जी ने नदी पार किया था वह आज सुरक्षित रखा हुआ है जिसकी पूजा होती है। यह मुकुट हमारे आस्था और विश्वास के साथ-साथ हमारे पुरुषों के पौरूष और निष्ठा का प्रतीक है।
यह घटना नाटी इमली के भरत मिलाप के महत्व को स्थापित करती है। नाटी इमली का भरत मिलाप विजयादशमी के दूसरे दिन एकादशी को होता है जो वाराणसी का सबसे मेला है। नाटी इमली की इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरी लीला में संवाद नहीं होता केवल झांकिया होती है। साथ ही साथ यह लीला " विश्व के सबसे छोटी झांकी का सबसे बड़ा मेला" है जिसमें राम-भरत का संवादहीन भावपूर्ण मिलन एक मिनट से भी कम कुछ सेकेन्ड का होता है और लीला देखने वालों की भीड़ पाँच लाख से अधिक की होती है।
नाटी इमली के भरत मिलाप की शुरूआत "मेघा भगत" ने किया था। अब तक प्राप्त जानकारियों से मेघा भगत को ही काशी में रामलीला का "आदि प्रवर्तक" माना जाता है हालांकि बहुत से लोग गोस्वामी तुलसीदास को वाराणसी में रामलीला के प्रवर्तक रूप में मानते है पर यह सर्वमान्य है कि चित्रकूट की राम लीला मेघा भगत ने प्रारम्भ किया। मेघा भगत का वास्तविक नाम नारायण दास था। वे गोस्वामी तुलसीदास के अनन्य भक्त व सेवक थे। जब संवत 1680 में गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महा प्रयाण की भविष्यवाणी करते हुये श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया की तिथि बताया तो मेघा भगत व्याकुल हो उठे और गोस्वामी जी की मृत्यु पूर्व ही आत्महत्या को प्रस्तुत हो गये। गोस्वामी तुलसीदास ने इन्हें बहुत समझाते हुये हनुमान जी की शरण में समर्पित होने का आदेश दिया और नियत तिथि पर गोलोकवासी हो गये। गोस्वामी जी के मृत्योपरान्त उनके आदेशानुसार हनुमान के शरण में जाने के बावजूद भगत जी का व्याकुलता कम नहीं हुई और उन्होंने अन्नजल त्याग दिया। एक रात्रि भगत जी को महाबीर हनुमान जी ने अयोध्या जाने का आदेश दिया और भगत जी रात्रि में ही वर्षा ऋतु का व दुर्गम मार्ग का परवाह न करते हुये अयोध्या चल दिये। अयोध्या में उन्होंने सरयू स्नान कर वहीं पर ध्यान लगाया ही था कि दो सुन्दर बालक खेलते हुये वहाँ आये और अपना धनुष बाण मेघा भगत के पास यह कहते हुये रख गये कि "बाबा हमारा धनुष बाण रखो हम आकर ले लेगें।" सबेरा बीता, दोपहर और संध्या के पश्चात रात हो गयी । भगत इन्तजार करते रहे पर वे दोनों बालक नहीं आये। रास्ते के थकान और दिन भर के बैठे भगत को हल्की सी झपकी आयी और झपकी में ही उन्हें यह सुनाई पड़ा कि " कलियुग में प्रत्यक्ष दर्शन दुर्लभ है, तुम काशी जाकर लीला का आयोजन करो। वही भरत मिलाप में तुम्हें दर्शन मिलेगा।" अपने इष्टदेव के इस परोक्ष आदेश पर मेघा भगत तुरन्त काशी लौट पड़े और वही दोनों धनुष-बाण "निधि" के रूप में रखकर चित्रकूट की रामलीला का आयोजन किया जिसका भरत मिलाप लीला नाटी इमली पर होता है। मेघा भगत रामलीला प्रारम्भ करवाने के बाद भरत मिलाप तक जीवित रहे और भरत मिलाप में राम भरत मिलन के स्वरूप में प्रभु दर्शन पाकर स्वर्गवासी हुये।
इस लीला का इतिहास लगभग 482 वर्ष पुराना है। संत मेघा भगत ने 1546 के आसपास इस रामलीला और भरत मिलाप की नींव रखी थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मेघा भगत की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ने इसी मैदान पर उन्हें साक्षात दर्शन दिए थे। आज भी श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि मिलाप के उन चंद पलों के लिए प्रभु यहाँ साक्षात रूप में उपस्थित होते है। वाराणसी का विश्व प्रसिद्ध 'नाटी इमली का भरत मिलाप' केवल एक धार्मिक उत्सव या रामलीला का मंचन नहीं है, बल्कि यह काशी की आत्मा, औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ भारतीय पौरुष की हुंकार और अटूट लोक आस्था का जीवंत महापर्व है। विजयादशमी के ठीक दूसरे दिन आश्विन शुक्ल एकादशी को आयोजित होने वाला यह मेला बनारस के प्रसिद्ध 'लक्खा मेलों' में शीर्ष स्थान रखता है। यह आयोजन "विश्व की सबसे छोटी झांकी का सबसे बड़ा मेला" माना जाता है, जहाँ मात्र एक मिनट से भी कम (कुछ सेकेंड्स) के भावपूर्ण संवादहीन मिलन को देखने के लिए 5 लाख से अधिक श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। पहले रामनगर के बाद गंगा इस पार की काशी में सबसे अधिक भीड़ इसी लीला में होती थी परन्तु अब औपनिवेशिक सभ्यता और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से वह भीड़ केवल नेमियों की रह गयी है। इसके बावजूद भरत मिलाप में आज भी विशाल भीड देखकर लीला के महत्व का अन्दाज लगाया जा सकता है। चित्रकूट की इस रामलीला में भरत मिलाप के अतिरिक्त दो और लीलाएं "शबरी मंगल" और गिरि सुमेर की झांकी" तथा विजया दशमी बहुत ही प्रसिद्ध हैं। इनमें से शबरी मंगल और गिरिसुमेर की झांकी पिशाचमोचन पोखरे के पास रमाकान्त नगर कालोनी के बगल में होती है और विजया दशमी चौकाघाट वरूणा नदी के किनारे होती है। पूर्व में विजया दशमी के दिन रावण वध के पश्चात भगवान राम का विमान काशी के प्रतिष्ठित रईस अपने पारम्परिक वेशभूषा में उठाते थे। गुजराती, मारवाडी और राजस्थानी रईसों द्वारा अपने-अपने देशज वस्त्रों में भगवान का विमान और उसके पीछे दर्शकों की अनगिनत भीड़ पूरे लीला को एक अलग ही छवि प्रदान करते थे। भाव विभोर दर्शकों द्वारा "बोलो राजारामचन्द्र जी की जय" का हुंकार काशी वासियों के उत्सव प्रेम का प्रतीक था। पर अब वह बात नहीं रह गयी है।
नाटी इमली के भरत मिलाप की सबसे बड़ी सामाजिक विशेषता यह है कि यह जाति और वर्ग के भेदों को मिटा देता है। भगवान राम, लक्ष्मण और सीता जी के लगभग 5 टन (50 क्विंटल) वजनी विशाल पुष्प विमान को पारंपरिक रूप से उठाने की जिम्मेदारी काशी के यादव समुदाय (यदुकुल) की होती है।आँखों में गहरा सूरमा, सिर पर साफा (बनारसी पगड़ी), पारंपरिक धोती, गंजी और बनारसी गावटी का गमछा धारण किए हजारों यादव भाई पूरी श्रद्धा के साथ इस भारी-भरकम विमान को अपने कंधों पर उठाते हैं। जब अगाध जनसमुद्र के बीच यह विमान लहराते हुए आगे बढ़ता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो विमान जमीन पर नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के सिरों और हवा के ऊपर तैरता हुआ आ रहा हो। भरत मिलाप की यह लीला धार्मिक सहिष्णुता और शैव-वैष्णव मतों के मिलन का अनुपम उदाहरण है जिसमें मान्यता है कि इस लीला के माध्यम से शिव के प्रतिनिधि द्वारा विष्णु स्वरूप का स्वागत  किया जाता है। स्वयं काशी नरेश, जो काशी में भगवान शिव के प्रतिनिधि माने जाते हैं, भरत मिलाप के प्रत्यक्षदर्शी बनते हैं। वे पूरे राजकीय ठाट-बाट, हाथियों, घोड़ों और पारंपरिक व्यवस्था के साथ विशेष मचान पर आकर बैठते हैं। यह दृश्य ऐसा होता है मानो स्वयं भगवान शिव अपनी नगरी में विष्णु के अवतार श्रीराम का स्वागत कर रहे हों।नाटी इमली मेले की मुख्य आकर्षण अवधि मात्र 4 से 5 मिनट की होती है, लेकिन इसके लिए तैयारियां और प्रतीक्षा घंटों की होती है। इस लीला में समय का प्रबंधन इतना सटीक होता है कि शाम को ठीक सूर्य की किरणों के ढलने और एक निश्चित कोण पर आने के समय प्रायः शाम 4:40 बजे के आसपास यह मिलाप संपन्न होता है।जैसे ही पुष्पक विमान मैदान के एक कोने से चौरे की तरफ बढ़ता है, वैसे ही दूसरी ओर से भरत और शत्रुघ्न नंगे पैर, धूल उड़ाते हुए दौड़ते हैं। प्रभु राम को देखते ही दोनों भाई साष्टांग दंडवत होकर भूमि पर लेट जाते हैं। रामचरितमानस की चौपाई—"परे भूमि नहिं उठत उठाए, बर करि कृपासिंधु उर लाए। स्यामल गात रोम भए ठाढ़े, नव राजीव नयन जल बाढ़े..." के सस्वर गान के बीच प्रभु श्रीराम दौड़कर भरत को अपनी छाती से लगा लेते हैं। चारों भाइयों का यह आलिंगन इतना जीवंत, निश्छल और भावुक होता है कि मैदान में उपस्थित लाखों लोगों की आँखें नम हो जाती हैं। इस मिलन की झांकी मे श्रद्धालु  चारो भाईयो सहित भगवान राम की साक्षात अनुभूति करते हैं। मिलाप के ठीक उसी क्षण पूरा आसमान "हर-हर महादेव" और "जय श्रीराम" के गगनभेदी उद्घोषों से गूंज उठता है। लोग एक-दूसरे के गले मिलते हैं और हवा में अबीर-गुलाल उड़ाया जाता है। पूरा मैदान "हर-हर महादेव" और "जय श्रीराम" के गगनभेदी उद्घोषों से गूंज उठता है। मिलाप के क्षण में जब एक तरफ "राजा रामचंद्र की जय" का उद्घोष होता है, तो दूसरी तरफ "हर-हर महादेव" के नारे से आकाश गुंजायमान हो उठता है। वर्ष 1796 में तत्कालीन काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने इस लीला में शाही भागीदारी शुरू की थी। तब से लेकर आज तक काशी नरेश परिवार वर्तमान में कुंवर अनंत नारायण सिंह पूरे राजकीय ठाट-बाट, हाथी और दल-बल के साथ इस लीला के साक्षी बन इस सदियों पुरानी राजशाही और सांस्कृतिक परंपरा को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।
चित्रकूट रामलीला समिति की इस व्यवस्था में कई परिवार पीढ़ियों से जुड़े हैं। वाराणसी का जौहरी परिवार लखन लाल जौहरी और संजीव लाल जौहरी का परिवार पिछली कई पीढ़ियों से उस पावन लकड़ी के चौरे (चौकी) को सजाता आ रहा है जहां चारों भाइयों का मिलन होता है। मखमली कपड़ों, चमेली-गेंदे के फूलों और तुलसी दल से सजी इस चौकी पर होने वाले मिलाप के बाद, वहां चढ़ी तुलसी को भक्तगण पावन महाप्रयाण या महाप्रसाद के रूप में श्रद्धापूर्वक अपने घर ले जाते हैं।
नाटी इमली का भरत मिलाप  केवल एक धार्मिक उत्सव ही नही है वरन यह आज के उपभोक्तावादी और बिखरते परिवारों के दौर में समाज को एक बहुत बड़ा नैतिक संदेश देता है। यह उत्सव याद दिलाता है कि सत्ता, संपत्ति और वैभव से ऊपर भाई का प्रेम और त्याग होता है। भरत का संपूर्ण चरित्र और राम का उनके प्रति अगाध स्नेह पारिवारिक मूल्यों की रीढ़ है। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भी काशी ने अपनी 480 से अधिक वर्ष पुरानी इस परंपरा को अक्षुण्ण रखा है। यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और गौरवशाली इतिहास से जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम है। इस मेले में अमीर-गरीब, राजा-रंक, जाति-पांत का कोई भेद नहीं रह जाता। पूरी काशी राममय और शिवमय के एक रंग में रंग जाती है।
अब न तुलसीदास है न मेघा भगत न ही टेकारामा बस उनकी यश कीर्तियां है, जो काशी वासियों के राम लीला प्रेम में दिखती हैं। आवश्यकता है भरत मिलाप को पर्यटक यात्रा में स्थान दिलाने की और आर्थिक सहयोग की जिससे काशी वासियों में अपनी परम्परा कायम रहे।
काशी, 5अक्टूबर 2026, सोमवार
http://chitravansh.blogspot.com

कोई टिप्पणी नहीं: