शनिवार, 7 नवंबर 2026

व्योमवार्ता / काशी की धरा पर मसीही आस्था का शिखर : सेंट मेरी कैथेड्रल

 काशी की धरा पर मसीही आस्था का शिखर : सेंट मेरी कैथेड्रल.....
                                                                                                             *व्योमेश चित्रवंश

                                       सनातन संस्कृति, वैश्विक आध्यात्मिकता और ज्ञान की शाश्वत नगरी काशी की पहचान केवल इसके प्राचीन घाटों और शिवालयों तक ही सीमित नहीं है। यहाँ की मिट्टी में हर मत, पंथ और संस्कृति को आत्मसात करने की एक अनूठी क्षमता है। इसी विविधतापूर्ण स्वरूप को अपने आप में समेटे हुए वाराणसी के छावनी (कैंट) क्षेत्र में गरिमा के साथ खड़ा है—सेंट मेरी महागिरजाघर (कैथेड्रल)। प्रभु यीशु के शांति, करुणा और प्रेम के संदेश को प्रसारित करता यह महागिरजाघर अपनी स्थापत्य कला, ऐतिहासिक घटनाओं और सामाजिक सरोकारों के कारण पर्यटकों और श्रद्धालुओं दोनों के लिए एक महान आकर्षण का केंद्र है।
                           औपनिवेशिक काल से कैथेड्रल बनने तक इस धार्मिक केंद्र का इतिहास दो अलग-अलग कालखंडों, ऐतिहासिक मोड़ों और दो भव्य संरचनाओं की कहानी कहता है। औपनिवेशिक काल में छावनी क्षेत्र में मसीही समाज की प्रार्थना और आराधना के लिए मूल रूप से इस चर्च की स्थापना सन 1854 में ब्रिटिश काल के दौरान की गई थी। प्रारंभ में इसे 'सेंट मेरी चर्च' के नाम से जाना जाता था। तत्कालीन समय में यह मुख्य रूप से ब्रिटिश गैरीसन (सेना) और स्थानीय ईसाई परिवारों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने का माध्यम था। सन 1854 में जब इस चर्च की स्थापना हुई, उसके ठीक तीन साल बाद 1857 की क्रांति भड़क उठी। वाराणसी का छावनी (कैंट) क्षेत्र इस विद्रोह का एक प्रमुख केंद्र था। उस कठिन और अशांत समय में, यह चर्च ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए न केवल एक प्रार्थना स्थल था, बल्कि एक सुरक्षित शरणस्थली भी बना रहा। इस विद्रोह की तपन और शांति के प्रयासों के कई ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव इस परिसर के दस्तावेजों में दर्ज हैं। समय के साथ इस पल्ली और मसीही समुदाय का विस्तार हुआ। 5 जून 1970 को कैथोलिक कलीसिया (चर्च) के इतिहास में एक बड़ा प्रशासनिक मोड़ आया। पोप पॉल छठवें के आदेशानुसार वाराणसी को एक स्वतंत्र धर्मप्रांत घोषित किया गया। इसके धार्मिक व प्रशासनिक महत्व को देखते हुए इस चर्च को महागिरजाघर (कैथीड्रल) का सर्वोच्च दर्जा प्रदान किया गया, जिससे यह 'रोमन कैथोलिक डायोसीज ऑफ वाराणसी'  का मुख्य पीठ बन गया और इसका प्रशासनिक कद पूरे पूर्वांचल में सबसे बड़ा हो गया।
चर्च परिसर के लिए भूमि का चयन तत्कालीन ब्रिटिश छावनी प्रशासन की रणनीतिक और नागरिक योजना का हिस्सा था। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत और मध्य में जब वाराणसी कैंट क्षेत्र का विकास हो रहा था, तब ब्रिटिश सैनिकों और अधिकारियों के लिए एक समर्पित प्रार्थना स्थल की आवश्यकता महसूस की गई। ब्रिटिश सैन्य प्रशासन ने इसके लिए छावनी के एक बेहद शांत, सुरक्षित और विस्तृत भूभाग को आवंटित किया। शुरुआती दौर में इस भूमि पर केवल एक छोटा प्रार्थना कक्ष (चैपल) और सैनिकों के आवास थे। बाद के वर्षों में मसीही समुदाय ने इस भूमि पर कॉन्वेंट स्कूल, एक सुंदर बगीचा और बिशप हाउस का विस्तार किया। यह भूमि हमेशा से कैथोलिक धर्मप्रांत की विभिन्न लोक-कल्याणकारी गतिविधियों, सामाजिक आंदोलनों और धार्मिक सभाओं का मुख्य केंद्र रही है। आजादी के बाद इस भूमि का स्वामित्व विधिक रूप से वाराणसी धर्मप्रांत के अंतर्गत सुरक्षित किया गया। समय के प्रवाह के साथ 19वीं सदी की पुरानी इमारत की क्षमता कम होने लगी और वह जर्जर अवस्था में पहुँच गई। इसके बाद वाराणसी धर्मप्रांत के प्रथम बिशप पैट्रिक डिसूजा के प्रयासों से आधुनिक आवश्यकताओं और भारतीय संस्कृति के मेल के अनुरूप एक नए, विशाल परिसर की रूपरेखा तैयार की गई। वर्तमान में दिखाई देने वाली भव्य और आधुनिक इमारत का निर्माण कार्य 1980 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुआ था। ब्रदर जूलियन क्रैस्टो की कुशल देखरेख और तकनीकी पर्यवेक्षण में यह महत्वाकांक्षी परियोजना आगे बढ़ी। प्रसिद्ध वास्तुकार श्री कृष्ण मेनन ने इसका अद्भुत और लीक से हटकर ब्लूप्रिंट तैयार किया था यह नूतन महागिरजाघर पूरी तरह बनकर वर्ष 1992 में तैयार हुआ और 11 फरवरी 1993 को एक भव्य धार्मिक समारोह में इसे विधिवत आशीर्वाद  देकर जनता को समर्पित किया गया। यह लोकार्पण आधुनिक वाराणसी के इतिहास की एक बड़ी घटना थी। इस समारोह में देश-विदेश के कई बड़े ईसाई धर्मगुरुओं के साथ-साथ काशी के अन्य धर्मों के प्रमुख संतों, आचार्यों और नागरिक प्रबुद्ध जनों ने हिस्सा लिया था, जिसने काशी की सर्वधर्म समभाव की परंपरा को एक नया आयाम दिया। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, 1990 के दशक के शुरुआती दौर में इस भव्य भारतीय शैली के गिरिजाघर को बनाने में लगभग 1.5 करोड़ रुपये की लागत आई थी, जो उस समय के आर्थिक परिदृश्य के लिहाज से एक बड़ी और ऐतिहासिक धनराशि थी।
                       स्थापत्य कला और वास्तुकला की दृष्टि से भारतीय संस्कृति का अनूठा समागम सेंट मेरी महागिरजाघर की वास्तुकला समकालीन विश्व में कैथोलिक चर्च कला की एक बेजोड़ मिसाल है। यह पारंपरिक यूरोपीय गोथिक या रोमन वास्तुकला से बिल्कुल अलग, पूर्णतः भारतीय संस्कृति और वास्तुकला  की झलक को प्रदर्शित करता है। इस भव्य महागिरजाघर की कुल ऊंचाई लगभग 100 मीटर है। इसके सबसे ऊपरी छोर पर 30 मीटर ऊंचा एक विशाल स्टील का क्रॉस (क्रूस) स्थापित है, जो आकाश की ऊंचाइयों को छूता हुआ दूर से ही पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचता है।अष्टकमल और मंडल को निर्माण आधार बनाते हुये महागिरजाघर का निचला हिस्सा दो समान वर्गों को जोड़कर एक 16-कोणीय मंडल प्रारूप में तैयार किया गया है। भारतीय दर्शन में 'कमल' को पूर्णता, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक जाना जाता है। इस लिये इसका बाहरी और आंतरिक स्वरूप अष्टकमल के फूल की भांति बनाया गया है। हिंदू मंदिर वास्तुकला का प्रभाव को दृष्टिगत रख चर्च की बाहरी बनावट और इसकी सीढ़ियां किसी पर्वत श्रृंखला के समान क्रमिक स्तरों  में बनाई गई हैं, जो भारतीय हिंदू मंदिरों के शिखर (विमान) से प्रेरित हैं। इसके प्रवेश द्वार और बरामदे पारंपरिक 'मंडपों' की याद दिलाते हैं। गिरिजाघर की आंतरिक रूपरेखा इस प्रकार बनाई गई है कि श्रद्धालु इसकी परिक्रमा कर सकें, जो कि विशुद्ध रूप से एक भारतीय धार्मिक विधान है। चर्च के अंदरूनी व बाहरी हिस्सों में भारतीय प्रतीकों कलश, शंख (जो भगवान के दिव्य संदेश और गूंज का जरिया माना जाता है) और आम के पत्तों जैसे पवित्र भारतीय मांगलिक प्रतीकों का खूबसूरती से समावेश किया गया है। पुरानी और नई वास्तुकला के सामंजस्य में यहाँ साधारण कांच की खिड़कियों के स्थान पर झरोखेदार दरवाजे और हुड वाले वेंटिलेशन का प्रयोग किया गया है, जो उत्तर भारत की तपन और जलवायु के अनुकूल व हवादार है।
                   महागिरजाघर का परिसर केवल एक मुख्य भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक कला दीर्घा की तरह काम करता है। चर्च की दीवारों और झरोखों पर विशेष नक्काशीदार जालियां लगाई गई हैं, जिनमें उकेरी गई आकृतियां 'ख्रीस्त कथा' (ईसा मसीह के जीवन वृत्त, उनके चमत्कारों और उनकी शिक्षाओं) को बेहद जीवंत रूप में प्रदर्शित करती हैं। महागिरजाघर के चारों ओर एक अत्यंत शांत, हरा-भरा और सुव्यवस्थित बगीचा (वाटिका) है। इस बगीचे में विभिन्न कलात्मक प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, जो प्रभु यीशु के जन्म, उनके पहाड़ी उपदेशों, रोगियों को चंगा करने, क्रूस पर उनके महान बलिदान और पुनरुत्थान की विभिन्न झांकियों व दृश्यों को प्रदर्शित करती हैं। यहाँ आने वाले आगंतुक टहलते हुए बाइबल के इतिहास से सीधे रूबरू हो सकते हैं।
                       क्रिसमस के पर्व पर अर्द्धरात्रि पूजा और तीन दिवसीय भव्य मेला में सेंट मेरी महागिरजाघर की रौनक देखते ही बनती है। क्रिसमस की मुख्य धार्मिक गतिविधियां 24 दिसंबर की आधी रात से शुरू होती हैं। रात के ठीक 12 बजे घंटियों की गूंज और प्रभु यीशु के जन्म के उल्लास के साथ विशेष प्रार्थना सभा आरंभ होती है। महागिरजाघर के मुख्य वेदी पर कैरल गायन और पारंपरिक मसीही अनुष्ठानों के साथ प्रभु का स्वागत किया जाता है। अगले दिन (25 दिसंबर) सुबह से ही गिरजाघर के कपाट आम जनता के लिए खोल दिए जाते हैं, जहाँ लोग मोमबत्तियां जलाकर प्रभु से सुख-शांति की कामना करते हैं। कैंट के इस महागिरजाघर परिसर में हर साल 25 दिसंबर से एक तीन दिवसीय भव्य क्रिसमस मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में प्रभु यीशु के जन्म की भव्य सजीव झांकियां सजाई जाती हैं।पवित्र बाइबल पर आधारित ज्ञानवर्धक प्रदर्शनियां, कठपुतली शो और ईसाई संदेशों वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।विभिन्न प्रकार के व्यंजनों, विशेष क्रिसमस केक, और मिठाइयों के स्टॉल लगाए जाते हैं, जहाँ स्थानीय दुकानदारों के साथ अन्य शहरों के व्यवसाई भी अपनी दुकानें लगाते हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए बड़े झूले और खिलौनों के स्टॉल इस मेले को संपूर्ण पारिवारिक उत्सव का रूप देते हैं। इस मेले में बनारस और आसपास के जिलों से हजारों की संख्या में हर धर्म के लोग शिरकत करते हैं।क्रिसमस जैसे बड़े अवसरों पर उमड़ने वाली अपार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रबंधन समिति स्थानीय जिला प्रशासन, कैंटोनमेंट बोर्ड और पुलिस बल के साथ मिलकर काम करती है। सुरक्षा के लिए पूरे परिसर में सीसीटीवी कैमरों और वालंटियर्स की तैनाती की व्यवस्था प्रबंधन स्वयं करता है।
                    प्रशासनिक और कानूनी रूप से सेंट मेरी महागिरजाघर पूरी तरह से स्वतंत्र, पारदर्शी और एक सुगठित व्यवस्था के अधीन संचालित होता है। यह महागिरजाघर 'रोमन कैथोलिक डायोसीज ऑफ वाराणसी' के पूर्ण धार्मिक व विधिक स्वामित्व में आता है। यह संस्था भारतीय ट्रस्ट अधिनियम के तहत पंजीकृत है। इसका सर्वोच्च प्रबंधन वाराणसी धर्मप्रांत के बिशप के मार्गदर्शन में किया जाता है। महागिरजाघर के दैनिक धार्मिक कार्यों, पल्ली के संचालन और वित्तीय लेखा-जोखा की देखरेख के लिए एक मुख्य पल्ली पुरोहित और एक प्रबंधकीय परिषद  नियुक्त होती है। इसमें स्थानीय मसीही समुदाय के प्रबुद्ध नागरिक भी शामिल होते हैं। सेंट मेरी महागिरजाघर केवल पूजा-पाठ का केंद्र नहीं है, बल्कि 'रोमन कैथोलिक डायोसीज ऑफ वाराणसी' के अंतर्गत यह परिसर वर्षभर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों के उत्थान के लिए विभिन्न सामाजिक एवं कल्याणकारी कार्यक्रम कार्यक्रम संचालित करता है। चर्च प्रशासन दीप्ति समाज सेवा संस्थान के माध्यम से वाराणसी और आसपास के ग्रामीण इलाकों में महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूहों का गठन, कौशल विकास और बाल अधिकारों के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम चलाता है। कैथेड्रल परिसर और इसके तहत आने वाली चिकित्सा इकाइयों द्वारा समय-समय पर गरीब व ग्रामीण परिवारों के लिए मुफ्त चिकित्सा, मुफ्त दवाओं का वितरण, टीकाकरण और मोतियाबिंद ऑपरेशन जैसे शिविर आयोजित किए जाते हैं। वाराणसी धर्मप्रांत का यह केंद्र ऐतिहासिक रूप से कुष्ठ रोगियों के इलाज, उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष आश्रय स्थल और परियोजनाएं चलाता आ रहा है। कैथेड्रल के संरक्षण में स्लम बस्तियों और ईंट-भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए 'अनौपचारिक शिक्षा केंद्र'  चलाए जाते हैं, ताकि उन्हें बुनियादी शिक्षा देकर नियमित स्कूलों में प्रवेश दिलाया जा सके। स्थानीय युवाओं और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण, सिलाई-कढ़ाई और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के नियमित सत्र आयोजित किए जाते हैं।
                 महागिरजाघर मे हर रविवार को सुबह और शाम विशेष प्रार्थना सभाएं होती हैं, जिनमें हजारों अनुयायी भाग लेते हैं। इसके अलावा, साल में कई बार आंतरिक शांति और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए 'आध्यात्मिक साधना शिविर' आयोजित किए जाते हैं। काशी की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने के लिए कैथेड्रल प्रशासन हर साल दीपावली, ईद, प्रकाश पर्व और छठ जैसे प्रमुख त्योहारों के अवसर पर 'सौहार्द बैठकें' आयोजित करता है। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख और जैन धर्म के गुरु एक मंच पर आकर समाज में शांति और भाईचारे का संदेश देते हैं।
                            वर्तमान दौर में, जब दुनिया वैचारिक मतभेदों और अशांति से जूझ रही है, सेंट मेरी महागिरजाघर सर्वधर्म समभाव के एक जीवंत लाइटहाउस (प्रकाश स्तंभ) के रूप में खड़ा है। काशी आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए सारनाथ और काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह ही यह कैथेड्रल भी शांति और आध्यात्मिक सुकून तलाशने का एक प्रमुख पड़ाव बन चुका है। स्थापत्य कला में हिंदू-मुस्लिम-ईसाई संस्कृतियों का यह मिश्रण यह संदेश देता है कि ईश्वर के घर में मानवता ही सर्वोपरि है। सेंट मेरी महागिरजाघर केवल ईंट, पत्थर, कंक्रीट और लोहे से बनी 100 मीटर ऊंची एक इमारत मात्र नहीं है बल्कि यह काशी के हृदय में धड़कने वाली आपसी सद्भावना का प्रतीक है।
काशी, धनतेरस, 6 नवंबर 2026,शुक्रवार
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