रविवार, 7 जनवरी 2018

व्योमवार्ता/ न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर

व्योमवार्ता

न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर

          हमारा शहर बनारस. युगों युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब  मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब  बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को  शहर बनारस ऐसा भाया किउन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि  बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की  है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष  भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों,मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा  लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या?   तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत  न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और  न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता. बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री.  मकान बनवाओ  चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
दिक्कत शुरू हुई सन  2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले  वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में  अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक,  ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के  होड़ देने पर विराम लगा दिया कि मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है. बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई  जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने  अपने क्षेत्र का  दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा .खंभे पर फैले तारों को जमीन के अंदर किए जाने की कवायद शुरु हुई तो एक लंबे अरसे से ठंडे बस्ते में पड़ा  रिंग रोड का काम भी. बाबतपुर से शहर तक फोरलेन इंटरनेशनल लेवल रोड का काम जोर-शोर से शुरू हुआ .मड़ुआडीह और बनारस सिटी रेलवे स्टेशन को सैटेलाइट स्टेशन बनाने के साथ वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन को विस्तारित करने की योजनाएं भी लगभग पूर्ण होने को है और भी योजनाएं निर्माणाधीन हैं  एवं धीरे धीरे बनारस बदलने को तैयार है पर इन सारे बदलाव के बाद भी नहीं बदला तो अपना शहर. यह अटपटा लग सकता है इतने सारे बदलाव की बात करने के बाद शहर के न बदलने की बात की जा रही है. जी हां बात शहर में रहने वाले शहरियों की है .मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस स्वच्छता नीति को प्रमुखता से सब को अपनाने की अपील की थी उस स्वच्छता  को उन्हीं के संसदीय क्षेत्र का शहरी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा है,गंगा मे सफाई अभियान के तहत मोदी जी ने अस्सी घाट पर फावड़ा तक चलाया तो शहर में सफाई के लिए यहां की गलियों में झाड़ू लगाया पर उसका रत्तीभर असर हम बनारसियों के ऊपर नहीं पड़ा. आज भी घाटों पर गंदगी फैलाने ,गलियों में पॉलिथीन मे  कूड़े फेंकने ,सड़कों दीवारों पर पान थूकने की आदतों में कोई बदलाव नहीं दिख रहा .कुछ दिनों के लिए डी एम बनकर आए विजय किरण आनंद के सख्ती का असर दिखा तो चाय पान की दुकान वालों ने दुकान के आगे कूड़े की टोकरी रखना व शाम को दुकान बंद करने से पहले दुकान के बाहर साफ सफाई करना प्रारंभ कर दिया था पर विजय किरण आनंद के जाने के बाद भी फिर पुराने ढर्रे पर आ गए. एसपी ट्रैफिक सुरेश चंद्र यादव पूरे शिद्दत से ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने में लगे हुए हैं पर शहरियों के  के सहयोग न मिलने से उनकी सारी कवायद टॉय टॉय फिस्स हो रही है .वरुणा नदी के पेटे तक को पाट देने वाले बड़े आदमियों पर दिए उपाध्यक्ष पुलकित खरे ने निगॉहे उठाई तो उन लोगों ने खरे का ट्रांसफर ही करवा दिया .बार-बार हटाए जाने के बावजूद लगते हुए अतिक्रमण, अवैध पार्किंग, निजी अस्पतालों बड़ी बिल्डिंग के बेसमेंट की पार्किंग को खोले जाने के अभियान के बावजूद पुन: उनका व्यवसायिक उपयोग, सड़कों पर खड़े अपनी निर्देशों का उल्लंघन होते देखते बेबस ट्रैफिक पुलिस के सिपाही ,चौराहों पर बेकार मे जलते बूझते ट्रैफिक सिग्नल, पान की पीक से बदरंग दीवारें व सड़के,  खाली बेकार पड़े मूत्रालय व दुकानों के पीछे उठते मल मूत्रों की महक इस पूरे बदलाव के नीयत पर सवाल खड़े करते हैं. जाहिर है हम बदलाव को अपनी आदत में शामिल नहीं करना चाहते और बदलते शहर में भी न बदलने की जिद पर अड़ा हुआ है अपना शहर .
कहने को बहुत कुछ है पर अबकी बार इतना ही.
          शायर की नजर से कहें तो
दिखावा मत कर मेरे शहर शरीफ होने का ,
हम खामोश तो हैं लेकिन ना समझ नहीं

                                               व्योमेश चित्रवंश,
                                            मो0 9198193851
                 http://chitravansh.blogspot.com



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामना स्वीकार नही

प्रिय साथियों,

मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे आने वाले अंग्रेजी कैलन्डर के अनुसार नववर्ष (न्यू ईयर) की शुभकामनाएं एवं बधाई देने का कष्ट ना करें

क्यूँकि मेरा धर्म सनातन हिन्दू है

हमारे धर्मग्रंथो के अनुसार चैत्र गुड़ी पड़वा से नया वर्ष शुभारम्भ  होता है  और उसे ही में मानाता आया हूँ उसी अनुसार में आपसे भी आग्रह कर रहा हुँ की आप 1 जनवरी को नये वर्ष की शुभकामनाएं मुझे न भेजे और न ही आप उस दिन नया वर्ष मनाये। कृपया ये सन्देश अपने मित्रों और ग्रुप में शेयर करें।
अगर आपको शुभकामनाएं और बधाई देनी है तो मुझे हिंदू नववर्ष चैत्र शुक्ल एकम विक्रमी संवत् 2075 (18 मार्च 2018 )को दीजिएगा ।
      कुछ मित्रों ने अभी से नव वर्ष की अग्रिम शुभकामना की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दिया है ।
ईस परिप्रेक्ष्य मे मैं आप  सब के समक्ष राष्ट्रकवि श्रद्धेय रामधारी सिंह " दिनकर " जी की कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं  

~~~~~~राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर

साथियो, अपनी संस्कृति और पूर्वजों की परंपरा का संरक्षण और सम्मान करने के लिए यह अति आवश्यक है।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

व्योमवार्ता / अपना बनारस स्मार्ट बनारस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 06दिसंबर 2017 बुधवार

अपना बनारस स्मार्ट बनारस: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 06 दिसंबर 2017, बुधवार

        बनारस को स्मार्ट सिटी से लेकर क्योटो तक बनाने की तैयारियां पिछले तीन साल से चल रही हैं, पर इसी बीच यह शहर क्या बन गया है पता ही नहीं चल रहा ?
मेरी समझ से पिछले लगभग 4-5 वर्षों से जिस प्रकार यह शहर खोदा जा रहा है इसे क्योटो या स्मार्ट सिटी की जगह मोहनजोदड़ो बनाने की तैयारियां अंदर ही अंदर चल रही हैं.
शायद अमेरिका या अरब देशों ने भी किसी शहर के हर भाग को लगातार 4-5 वर्षों तक खुदवाया होता तो अब तक 4-6 तेल के कुयें और 1-2 सोने की खदानें मिल चुकी होतीं.
वैसे यह शहर स्मार्ट बन पाये या न बन पाये, इस शहर ने यहां के निवासियों को बेहद स्मार्ट बना दिया है. आप भी ध्यान देंगे तो समझ जायेंगे.
यहां की सड़कों पर कोई भी गाड़ी चलाना एक विश्वप्रसिद्ध कला बन चुका है और उसी गाड़ी को चलाते हुये सही सलामत घर तक पहुंच जाना तो ऐसा लगता है कि आपने सब कुछ जीत लिया. देखिये कैसे-
    आप आराम से चले जा रहे हैं. रास्ते में एक सांड़ बैठा हुआ है जैसे ही आप उसके पास पहुंचे वह खड़ा हो गया. अब उससे बचाते हुये गाड़ी काटकर निकालना स्मार्टनेस नहीं तो और क्या है. यदि सांड़ ने खड़े होने के साथ ही अंगड़ाई लेते हुये अपनी सींगे घुमा दीं तब तो बचना ओवर स्मार्टनेस है.
     अन्य शहरों की तरह यहां सीवर के ढक्कन सड़क के लेबल पर नहीं रखे जाते क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो आप स्मार्ट नहीं बन पायेंगे. ढक्कनों को सड़क के लेबल से 6 इंच ऊपर या नीचे रखा जाता है. इससे तेज चलते हुये एकाएक ब्रेक मारने तथा हैंडिल काटकर निकलने की कला आती है. कुछ लोग उसमें फंसकर या हैंडल काटते समय गिर जाते हैं पर ऐसे लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि आप अभी इस शहर के लायक स्मार्ट नहीं बन पाये है.
  कभी कभी चलते समय एकाएक आपके अगल बगल, आगे पीछे, दाहिने या बांये की गाड़ी यदि गायब हो जाये तो आश्चर्यचकित होने की जगह तुरन्त अपनी गाड़ी रोककर गाड़ी समेत गड्ढे (जो सड़क धंस जाने अथवा किसी कंपनी या ठेकेदार के द्वारा किसी भी काम से खोदकर छोड़ दिये जाने के कारण बना है) में घुसे हुये व्यक्ति की सहायता कीजिये क्योंकि वह बेचारा आपके शहर की स्मार्टनेस की परीक्षा में फेल हो गया है.
   यहां की सड़कें भी आपकी परीक्षा के लिये ही बनायी जाती हैं. नई बनी सड़कों पर 10-15 तक रफ्तार से चलने के बाद एकाएक एक दिन आपको सड़क दिखनी बन्द हो जाती है. पता चलता है कि सड़क की 15 दिन की आयु पूरी हो गयी. अब अगर आप इन 15 दिनों में अपनी आदत खराब कर चुके हैं तो आपका महीन फैली हुयी गिट्टयों में फिसल कर गिरना पक्का है, और आप स्मार्टनेस की परीक्षा में फेल समझे जायेंगे.
   आप आराम से जा रहे हैं और आपको समय पर आफिस पहुंचने की चिन्ता लगी हुयी है, अचानक आपके आगे जा रहे एक निश्चिंत महोदय ने दाहिने गर्दन घुमाकर पान की पीक थूक दी. अब आगे वाली गाड़ी की गति से एक महीन लाल रंग का फव्वारा आपकी तरफ आयेगा. ध्यान रखिये कि इस फव्वारे से अपने आपको बचा लेना सबसे बड़ी कला है और स्मार्टनेस की परीक्षा का अंतिम चरण भी. यदि आपने अपने आपको बचा लिया तो आप स्मार्टनेस की परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुके हैं और बेझिझक इस शहर में रहने के लायक है. यह शहर आपको अपना लेगा.
        मेरे कहने का मतलब केवल इतना है कि यह आवश्यक नहीं है कि शहर देखने में स्मार्ट लगे. हम बनारसी इस बात की लड़ाई लड़ेंगे कि जिस शहर में विश्व के सबसे अधिक स्मार्ट लोग रहते हों वह शहर अपने आप लिस्ट में आना चाहिये.                                                
           बनारस नगर निगम , पी.डब्लू.डी., राज्य सरकार, केंद्र सरकार एवं बनारस की जनता ,सभी को जरा गौर करना चाहिए।
(बनारस, 06 दिसंबर 2017,बुधवार)
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रविवार, 12 नवंबर 2017

BSNL लैण्डलाईन उपभोक्ता होने की व्यथा,: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 नवंबर 2017

बीएसएनएल लैण्डलाईन उपभोक्ता होने की व्यथा

           मेरे नाम बीएसएनएल का एक लैण्डलाईन है, महीने का न्यूनतम बिल 250+जीएसटी. अकसर वो खराब रहता है, तीज त्योहार बनाने वाले आते है,  दो लोग, त्योहारी के नाम पर 100-100रूपये ले जाते है, कभी कभी बनाने भी आते है, तो बनानाने आने के नाम पर 100-100रूपये ले जाते है.
यह क्रम चलता रहता है.   
                      पिछले दीवाली पर घर पर सिर्फ बच्चे थे, सो उन्होने त्योहारी नही दिया, तब से फोन खुद ही त्योहारी बना हुआ है,  हफ्ते मे 6 दिन खराब.
शिकायत आनलाईन करते ही तुरंत sms आता है आपकी शिकायत नं0 यह है, शिकायत फलां सज्जन को सौंप दी गई है, उनका मोबाइल नं0 फलॉ है, वगैरह वगैरह.  फिर एक दिन बाद sms आता है कि शिकायत दूर हो गई है.  कोई अन्य शिकायत होने पर फलॉ नं0 पर संपर्क  कर सकते है.
यह क्रम भी लगातार चलता रहता है.
मेरा फोन 0542-2290255 फिर खराब है,  शिकायत आनलाईन दर्ज हुई, आनलाईन ठीक भी हो गई. उसमे दिये हुये नंबर 9415795897 जो श्री राजाराम जी का है,  उस पर पिछले 4 दिनो से लगातार फोन कर रहा हूँ, घंटी बज रही है पर राजाराम जी को शायद सुनाई नही पड़ रही है.  ट्विटर पर मा0 मनोज सिन्हा जी से लेकर बीएसएनएल मुख्यालय व बीएसएनएल वाराणसी पर भी टि्वट किया पर जबाब वही,  फुरसत नही है टि्वट देखने की,  फिर क्यूँ टि्वटर एकाउंट  का एड्रेस दिया भाई.
   लोग बाग बताते है कि पिछली भाजपा सरकार मे भारतीय दूरसंचार  विभाग का तियॉ पॉच कर करके उसे नवरतन कंपनियों के लाईन से बहरिया कर सड़क पर खड़ा कर बीएसएनएल बनाया गया था,  अब अबकी बार बीएसएनएल को सरकारी नियंत्रण  से बहरिया कर किसी रूईया, अडानी, मित्तल, अंबानी को दे देने की योजना हो सकती है.
बहरहाल मुझे क्या मुझे तो अपने एक अदद मरे हुये टेलीफोन  के जीने का इंतजार है, उसे यह जीवनदान मनोज सिन्हा लगायत राजाराम तक कोई भी दे दे. पर लगता है
#BSNL nahi sudhrega.
(बनारस, 12नवंबर2017, रविवार)
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शनिवार, 4 नवंबर 2017

व्योमवार्ता / अच्छे दिन कब आयेगें???? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 04 नवंबर 2017

अच्छे दिन कब आयेंगे ?????????? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 04 नवंबर 2017

          बन्दरों का एक समूह था, जो फलो के बगिचों मे फल तोड़ कर खाया करते थे। माली की मार और डन्डे भी खाते थे, रोज पिटते थे ।
उनका एक सरदार भी था जो सभी बंदरो से ज्यादा समझदार था। एक दिन बन्दरों के कर्मठ और जुझारू सरदार ने सब बन्दरों से विचार-विमर्श कर निश्चय किया कि रोज माली के डन्डे खाने से बेहतर है कि यदि हम अपना फलों का बगीचा लगा लें तो इतने फल मिलेंगे की हर एक के हिस्से मे 15-15 फल आ सकते है, हमे फल खाने मे कोई रोक टोक भी नहीं होगी और हमारे *अच्छे दिन आ जाएंगे* ।
सभी बन्दरों को यह प्रस्ताव बहुत पसन्द आया । जोर शोर से गड्ढे खोद कर फलो के बीज बो दिये गये ।
पूरी रात बन्दरों ने बेसब्री से इन्तज़ार किया और सुबह देखा तो फलो के पौधे भी नहीं आये थे ! जिसे देखकर बंदर भड़क गए और सरदार को गरियाने लगे और नारे लगाने लगे, "कहा है हमारे 15-15 फल", *"क्या यही अच्छे दिन है?"*। सरदार ने इनकी मुर्खता पर अपना सिर पिट लिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला, "भाईयो और बहनो, अभी तो हमने बीज बोया है, मुझे थोड़ा समय और दे दो, फल आने मे थोड़ा समय लगता है।" इस बार तो बंदर मान गए।
                       दो चार दिन बन्दरों ने और इन्तज़ार किया, परन्तु पौधे नहीं आये, अब मुर्ख बन्दरों से नही रहा गया तो उन्होंने मिट्टी हटाई - देखा फलो के बीज जैसे के तैसे मिले ।
                          बन्दरों ने कहा - सरदार फेकु है, झूठ बोलते हैं । हमारे कभी अच्छे दिन नही आने वाले । हमारी किस्मत में तो माली के डन्डे ही लिखे हैं और बन्दरों ने सभी गड्ढे खोद कर फलो के बीज निकाल निकाल कर फेंक दिये । पुन: अपने भोजन के लिये माली की मार और डन्डे खाने लगे ।
(बनारस, 04 नवंबर 2017, शनिवार)
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रविवार, 29 अक्टूबर 2017

व्योमवार्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी के पुराने पन्ने

  दो वर्ष पूर्व 29 अक्टूबर  2015 को लिखी व फेसबुक  पर पोस्ट की व्यंग्य रचना

प्रधानमंत्री  जी के नाम भैंस का खुला खत

प्रधानमंत्री जी,
सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं ना आज़म खां की भैंस हूं और ना लालू यादव की!
ना मैं कभी रामपुर गयी ना पटना! मेरा उनकी भैंसों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।
यह सब मैं इसलिये बता रही हूं कि कहीं आप मुझे विरोधी पक्ष की भैंस ना समझे लें।
मैं तो भारत के करोड़ों इंसानों की तरह आपकी बहुत बड़ी फ़ैन हूं।
जब आपकी सरकार बनी तो जानवरों में सबसे ज़्यादा ख़ुशी हम भैंसों को ही हुई थी।
हमें लगा कि ‘अच्छे दिन’ सबसे पहले हमारे ही आयेंगे।लेकिन हुआ एकदम उल्टा! आपके राज में तो हमारी और भी दुर्दशा हो गयी।
अब तो जिसे देखो वही गाय की तारीफ़ करने में लगा हुआ है। कोई उसे माता बता रहा है तो कोई बहन! अगर गाय माता है तो हम भी तो आपकी चाची, ताई, मौसी, बुआ कुछ लगती ही होंगी!
हम सब समझती हैं। हम अभागनों का रंग काला है ना! इसीलिये आप इंसान लोग हमेशा हमें ज़लील करते रहते हो और गाय को सर पे चढ़ाते रहते हो!
आप किस-किस तरह से हम भैंसों का अपमान करते हो, उसकी मिसाल देखिये।
आपका काम बिगड़ता है अपनी ग़लती से और टारगेट करते हो हमें कि
देखो गयी भैंस पानी में
गाय को क्यूं नहीं भेजते पानी में! वो महारानी क्या पानी में गल जायेगी?
आप लोगों में जितने भी लालू लल्लू हैं, उन सबको भी हमेशा हमारे नाम पर ही गाली दी जाती है
काला अक्षर भैंस बराबर
माना कि हम अनपढ़ हैं, लेकिन गाय ने क्या पीएचडी की हुई है?
जब आपमें से कोई किसी की बात नहीं सुनता, तब भी हमेशा यही बोलते हो कि
भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फ़ायदा!
आपसे कोई कह के मर गया था कि हमारे आगे बीन बजाओ? बजा लो अपनी उसी प्यारी गाय के आगे!
अगर आपकी कोई औरत फैलकर बेडौल हो जाये तो उसे भी हमेशा हमसे ही कंपेयर करोगे कि
भैंस की तरह मोटी हो गयी हो
करीना; कैटरीना गाय और डॉली बिंद्रा भैंस! वाह जी वाह!
गाली-गलौच करो आप और नाम बदनाम करो हमारा कि
भैंस पूंछ उठायेगी तो गोबर ही करेगी
हम गोबर करती हैं तो गाय क्या हलवा करती है?
अपनी चहेती गाय की मिसाल आप सिर्फ़ तब देते हो, जब आपको किसी की तारीफ़ करनी होती है-
वो तो बेचारा गाय की तरह सीधा है, या- अजी, वो तो राम जी की गाय है!
तो गाय तो हो गयी राम जी की और हम हो गये लालू जी के!
वाह रे इंसान! ये हाल तो तब है, जब आप में से ज़्यादातर लोग हम भैंसों का दूध पीकर ही सांड बने घूम रहे हैं।
उस दूध का क़र्ज़ चुकाना तो दूर, उल्टे हमें बेइज़्ज़त करते हैं! आपकी चहेती गायों की संख्या तो हमारे मुक़ाबले कुछ भी नहीं हैं। फिर भी, मेजोरिटी में होते हुए भी हमारे साथ ऐसा सलूक हो रहा है!
प्रधानमंत्री जी, आप तो मेजोरिटी के हिमायती हो, फिर हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यूं होने दे रहे हो?
प्लीज़ कुछ करो!
आपके ‘कुछ’ करने के इंतज़ार में – 
     आपकी एक तुच्छ प्रशंसक!
(बनारस, 29अक्टूबर 2015)
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सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

व्योमवार्ता / सन 2017 मे भारतीय स्टेट बैंक की आधुनिक सेवा और कम्प्यूटर पर सन 57 की मिसेज गुप्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार

सन 2017 मे भारतीय स्टेट बैंक की आधुनिक सेवा और कम्प्यूटर पर सन 57 की  मिसेज गुप्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार

                        जरूरी नहीं की पापों के प्रायश्चित के लिए दान पुण्य ही किया जाए । स्टेट बैंक में खाता खुलवा कर भी प्रायश्चित किया जा सकता है । छोटा मोटा पाप हो तो बैलेंस पता करने चले जाएँ ।
चार काउन्टर पर धक्के खाने के बात पता चलता है कि , बैलेंस गुप्ता मैडम बताएगी । गुप्ता मैडम का काउन्टर कौनसा है ये पता करने के लिए फिर किसी काउन्टर पर जाना पड़ता है ।
          लेवल वन कम्प्लीट हुआ । यानी गुप्ता मैडम का काउन्टर पता चल गया है । लेकिन अभी थोड़ा वैट करना पड़ेगा क्योंकि गुप्ता मैडम अभी सीट पर नहीं है ।
            आधे घंटे बाद चश्मा लगाए पल्लू संभालती हुई युनिनोर की 2g स्पीड से चलती हुई गुप्ता मैडम सीट पर आती है । आप मैडम को खाता नंबर देकर बैलेंस पूछते है ।
              गुप्ता मैडम पहले तो आपको इस तरह घूरती है जैसे आपने उसकी बेटी का हाथ मांग लिया है । आप अपना थोबड़ा ऐसे बना लेते है जैसे सुनामी में आपका सबकुछ उजड़ गया है और आज की तारिख में आपसे बड़ा लाचार दुखी कोई नहीं है ।
गुप्ता मैडम को आपके थोबड़े पर तरस आ जाता है और बैलेंस बताने जैसा भारी काम करने का मन बना लेती है । लेकिन इतना भारी काम अकेली अबला कैसे कर सकती है ? तो मैडम सहायता के लिए आवाज लगाती है -
- मिश्राजी ....ये बैलेंस कैसे पता करते है ?
मिश्राजी अबला की करुण पुकार सुनकर अपने ज्ञान का खजाना खोल देते है ।
- पहले तो खाते के अंदर जाकर क्लोजिंग बैलेंस पर क्लिक करने पर बैलेंस आ जाता था । लेकिन अभी सिस्टम चैंज हो गया है ...अभी आप f5 दबाएँ और इंटर मारदे तो बैलेंस दिखा देगा ।
गुप्ता मैडम चश्मा ठीक करती है , तीन बार मोनिटर की तरफ और तीन बार की - बोर्ड की तरफ नजर मारती है । फिर उंगलियाँ की - बोर्ड पर ऐसे फिरातीं है जैसे कोई तीसरी क्लास का लड़का वर्ल्ड मैप में सबसे छोटा देश मस्कट ढूंढ रहा हो । मैडम फिर मिश्रा जी को मदद के लिए पुकारती है -
- मिश्रा जी , ये f5 किधर है ?
मैडम की उम्र पचास से ऊपर होने के कारण शायद मिश्राजी पास आकर मदद करने की जहमत नहीं उठाते । इसलिए वहीँ बैठे बैठे जोर से बोलते है -
- की बोर्ड में सबसे ऊपर देखिये मैडम ।
- लेकिन सबसे ऊपर तो तीन बतियां जल रही है ।
- हां उन बतियों से नीचे है ...लम्बी लाईन है f1 से लेकर f12 तक ।
फायनली मैडम को f5 मिल जाता है । मैडम झट से बटन दबा देती है । मोनिटर पर आधे घंटे जलघड़ी ( कुछ लोग उसे डमरू समझते है ) बनी रहती है । अंत में एक मैसेज आता है -
Session expired. Please check your connection.
मैडम अपने हथियार डाल देती है । एक नजर आपके गरीबी लाचारी से पुते चेहरे पर डालती है और कहती है -
- सॉरी .....सर्वर में प्रोब्लम है ।
कहने का टोन ठीक वैसा ही होता है जैसे पुरानी फिल्मो में डोक्टर ओपरेशन थियेटर से बाहर आकर कहता था -
" सॉरी .....हमने बहुत कोशिश की पर ठाकुर साहब को नहीं बचा पाए "
(बनारस, 12 अक्टूबर 2017, शुक्रवार)
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बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

व्योमवार्ता, हिन्दुस्तान मे अब्दुल्ला परेशान है : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11अक्टूबर 2017, बुधवार

अब तो इस मुल्क में दलितों और अल्पसंख्यको का जीना मुश्किल हो गया है,
इतना बड़बड़ाते हुए अब्दुल्ला...

1-- अपने 8वें बच्चे की डिलीवरी के लिए जिला अस्पताल के डॉक्टर से मिलने पहुँच गया !

2--और 6000 रु लेकर मोदी को गालियाँ देते हुए घर चला आया !

3-- उसकी तीसरी बेगम ने फ्री में मिले सिलेंडर को ऑन किया और गोश्त गरम किया, अब्दुल्ला ने खाया और बच्चों को भी  खिलाया और सुलाया !

4--फिर सुबह योगी को कोसते हुए ग्रामीण बैंक पहुँच गया और लोन माफी का सर्टिफिकेट प्राप्त किया !

5--फिर अपने सातों बच्चों को स्कूल से मिली free वाली नई  ड्रेस पहना कर स्कूल भेजा !
और बच्चों को समझाया देखो स्कूल में वंदे मातरम् और भारत माता की जय मत, ये बोलना इस्लाम में गुनाह होता है !

6-- फिर बच्चों को याद दिलाया कि अल्प संख्यक वजीफे वाला फार्म ज़रूर ले कर आना,
फीस तो खैर पहले से ही माफ है !

7-- स्कूल से आने के बाद बच्चों ने बकरियों के लिए हरे हरे पेड़ की पत्तियां तोड़ी,
कुछ पेड़ अब्दुल्ला काट कर पहले ही लकड़ी बेंच चुका है !

8-- ईद पर गली के चौराहे पर बकरे और गाय की कुर्बानी तो पिछले कई साल से दे ही रहा है,अब्दुला !

9--इधर रोहिंग्या मुसलमानो की स्थिति को लेकर अब्दुल्ला बहुत चिंतित रहता है !

10-- उधर चीन ने भी धोखा दे दिया, हिंदुस्तान पर हमला ही नही किया !

11-- पाकिस्तान की निंदा, वो भी चीन की धरती से...
ये बात बड़ी बुरी लगी अब्दुल्ला को !

12-- अब्दुल्ला कल मुफ्त शौचालय के बारे में पता करने जाएगा साथ ही मुफ्त मकान की भी जानकारी प्राप्त करेगा,
बिजली तो सालो से फ्री में जला ही रहा हैं वो...

*लेकिन एक बात जान लो...*
*अब्दुल्ला भारत में खुश नही है... !!*
(बनारस, 11अक्टूबर 2017, बुधवार)
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