मैं अक्षर लिखूं तुम बनारस समझना........
क्या है बनारस? एक भीड़ भाड़ भरा जागता, शोर मचाता शहर? मंदिरों के घंटे घडियाल और कुछ समझ मे कुछ समझ में न आने वाले आरती, मंत्रों, प्रार्थनाओं का शहर ? अपने अस्तित्व को खोजती अस्सी (जिसे कोई नाला कहता है तो कोई नदी) और अस्तित्व से जूझती वरुणा नदी का शहर ? नमो घाट पर प्रणाम की मुद्रा में बने स्कल्पचर के नीचे पिकनिक मनाते और न्याय घाट से आगे चलने एकाकी हो जाने वाले हजूम का शहर ? सारनाथ के शांति वाले स्तूपों खण्डहरों के बाहर सवारी के लिये शोर मचाते आटो टोटो वालों का शहर? काशी विश्वनाथ धाम परिसर में शिव की आस्था में घंटो घंटों पंक्तिबद्ध खड़े ज्ञानबापी मस्जिद को देख अपने 'शिव' को मुक्ति के लिये मन में प्रार्थना करते आस्थावानें का शहर ?
बनारस के इतने रूप है कि बनारस के लिये एक रुप देना संभव ही नहीं। मुझसे प्रायः पूछा जाता है कि आखिर क्या है बनारस ? और मैं हर बार बनारस के बारे में बताते हुये स्वयं संशयग्रस्त हो जाता हूं कि बनारस के विषय में मैंने यह तो बताया ही नहीं। सब कुछ बता कर के भी बहुत कुछ छूट जाता है। क्योंकि बनारस बताने का विषयवस्तु या शहर नहीं है वह महसूस करने का शहर है। बनारस को जानने के लिये खुद को 'बनारस 'होना होगा। बनारस और बनारसी होने में मूलभूत अंतर है। बनारसी होने की एक सीमा रेखा है पर बनारस होना एक निरंतर गतिमान प्रक्रिया है जो अनादि से चल कर अनन्त तक निरंतर जीवन्त यात्रा है एक Living Organism के समान ।
कभीं कभी मै सोचता हूं कि अस्सी घाट पर बैठे बैठे बाबा तुलसीदास ने जब लिखा होगा 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' तो शायद उनके मन मे भगवान राम के प्रति अटूट निष्ठा भक्ति भाव के साथ काशी भी रही होगी तभी तो वे चित्रकूट के समीप राजापुर से चल कर अपने प्रिय भगवान श्री रामचंद्र की अयोध्या पहुँचने के मध्य शिवनगरी काशी में ही धूनी लगा बैठे, 'उमा कहऊ मैं अनुभव अपना, सच हरि भजन जगत सब सपना' तो काशी में ऐसा क्या है जिसे विशेष तौर पर चिन्हांकित किया जा सके। इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास बस एक ही है कि काशी स्वयं में चिन्हांकित है वह काया भी है, माया भी है, मोक्ष भी है, काम भी है, अर्थ भी है और भाव भी है। काशी को देखने के लिये यदि भौतिक चक्षु की आवश्यकता है तो उसे साक्षात अनुभूति करने के लिये श्रद्धा चाहिये। काशी को 'काशी' बन कर ही अनुभूत किया जा सकता है। 'सोई जानई जेहि देहु जनाई, जानत तुन्हहि तुम्हई होई जाई' वाले भाव से । काशी, बनारस, वाराणसी, आनंदकानन, मृगदाव सभी एक होते हुये भी सब अपने में एक है ।जो इतिहास से परे है, स्वयं में इतिहास है। सब की अपनी एक कहानी है अपना एक मिथक है अपना एक विश्वास है। पूरे शहर का ही नहीं, मोहल्लों का भी, घाटों का भी, मंदिरों का भी जो एक सम्मुचय हो कर भी एकक है। यह इतिहास बनारस वालो के मान्यताओं, आस्थाओं से बड़ा नहीं है। हो भी नहीं सकता तभी तो मार्क ट्वेन ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये "Banaras is older then history"
वाराणसी में तीन समानान्तर धारायें चलती है। एक पौराणिक एक ऐतहासिक एक सांस्कृतिक। यहां के मंदिर, मोहल्ले, गलीयों धागे का अपना तीन अलग कथानक है, जो भूगोल से परे है उनके पौराणिक मध्यकालीन और आधुनिक संदर्भ है। रामायण महाभारत से ले कर मुगलकालीन इतिहास और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका अपना महत्व है परन्तु इन सबसे उपर काशीवासियों की अपनी मान्यतायें है जिनके आगे ये सभी इतिहास,संस्कृति, भूगोल ढह जाते है। काशीवासी अपने मान्यताओं पर कोई आक्षेप बर्दास्त भी नहीं करता क्योंकि उसके लिये उसकी अपनी मान्यगये ही सच है और इस सच से बड़ा कुछ भी नहीं। एक दो जिज्ञासुओं ने यह जानना चाहा कि ऐसा क्यों है? पर मुझे यह स्वीकारने मे कोई परहेज नही है कि मेरे पास भी इन मान्यताओं से इतर कोई उत्तर नहीं है। कभी इसी मै सोचता हूँ कि सभवतः ऐसा इसलिये है कि बनारस में कोई ईश्वर, भगवान या देवता नहीं है। निःसंदेह आप को मेरी यह सोच विचित्र लग सकती है पर सच यही है क्योंकि काशी-वासियों का ईश्वर भगवान या देवता से रिश्ता या संबंध ईष्ट भगवान और भक्त का है ही नहीं। उसके लिये मंदिर में विराजमान मूर्तियाँ, प्रतीक भगवान नहीं है बल्कि वे उसके परिवार के बड़े, बुजुर्ग जिम्मेदार और सबका ध्यान रखने वाले सदस्य है। काशीवासी के लिये भगवान शिव परम महादेव नहीं है बाल्कि उसके बाबा है। देवी पार्वती महादेवी नही है बल्कि उसकी माई है। उन बाबा और माई से काशीवासी कुछ पाने की लालसा नहीं रखता न ही कोई मांग या कामना करता है क्योंकि उसकी यह दृढ़- मान्यता है कि उसके लालन पालन और ईच्छा पूर्ति की जिम्मेदारी बाबा और माई की है और वे इसे अपनी जिम्मेदारी मान कर करते रहेगें। जिन्हें पूरा होना ही है। काशीवासी अपने साथ साथ बाबा व माई का हाल चाल भी लेते चलता है " का हो बाबा ?" तो बाबा के दरबार में जा कर उन्हें ही चैलेंज करता है 'बाबा बाबा सब कहे, माई कहे न कोय। बाबा के दरबार में माई करै सो होय" और काशीवासी के इस दृढ़ विश्वास के स्रोत बाबा को देखिये वे भले स्वयं अधनंगे, कमर में मृगछाला पहने, भष्माभूत लपेटे अडभंगी से अपने में मस्त है, कहीं खुले आकाश के नीचे, कभी नदी तट पर धूनी जमाये, कहीं किसी पेड़ के नीचे। पर काशी वालों का विश्वास है कि उनके भोले बाबा ही सर्व लोक समस्त वैभव, धन संपदा के स्वामी है। वे स्वयं पूर्ण है इस लिये शून्य है। उनके लिये भौतिकता की सीमायें समाप्त हो आध्यात्मिकता में समाहित हो गयी है। 'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णत पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवाविशिष्टते।' और सच मानिये बाबा ने आज तक अपने काशीवासियों का विश्वास नहीं तोड़ा है अपितु वे काशी वासियों को भरोसा दिलाते है कि मैं तो हूँ ही तुम क्यों चिंता करते हो? बाबा अपने परिजन काशीवासियों का जीवन भर ध्यान तो रखते ही हैं जीवन के बाद भी उन्हें नहीं छोड़ते। मृत्यु के पश्चात स्वयं वे शव के कान में तारक मंत्र बोल उसे आगामी जीवन यात्रा, मोक्ष के लिये भयमुक्त करते हैं। इसी लिये काशी में उन्होंने श्मसानों में भी श्मशानेश्वर महादेव के रूप में अपना शिविर कार्यालय खोल रखा है। काशीवासी अपने इसी विश्वास से लबालब रहता है उसे अपने बाबा पर विश्वास है
'सानन्दमानन्दवने वसन्त
मानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं
श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥'
काशीवासियों का विश्वास है कि उनके बाबा घर परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य है उन्हें अपने परिवार के सभी सदस्यों से प्यार है। उनका दुलार परिवार के समस्त जन पर है चाहे वह लायक हो, नालायक हो, कम कमाता हो ज्यादा कमाता हो, घर की गृहलक्ष्मी हो या अशक्त बृद्ध हो, नन्हा नासमझ बालक हो या संपूर्ण परिवार का देखरेख करने वाला मुखिया। वे तो बस भाव देखते है। उनके लिये दूध, गंगाजल,सर्वप्रिय व्यंजन, नैवेद्य, शहद, घृत, सुगंधित फूल माला, श्रृंगार प्रसाधन उतना ही प्रिय है जितना पास में कुछ न होने पर सामान्य जल,बगल में अकारण, अनिच्छित उग गये धतूरे के पौधों का कटीला विषैला फल, और मदार का फूल। सामान्य जल से लेकर दूध दही शहद और धतूरे से ले कर नैवेद्य तक समस्त अर्पित भाव में प्रसन्न रहने वाले बाबा अपने काशीवासियों को आश्वस्त करते है कि समय के साथ संतुष्ट रहना सीखो यही सुखमय जीवन है। इसलिये काशीवासी अपने आराघ्य बाबा के समान हर स्थिति में संतुष्ट रहता है। उसे सांसारिक भोग विलास से बहुत लेना देना नहीं। उसे बहुत फर्क नही पड़ता बिजली है कि नहीं, पानी है कि नहीं।बैंक बैलेंस है कि नही। वह तंग गलियों में रह कर भी एक गमछा लपेटे उसी भाव से जीवन जीने का आदी है जिस भाव से सिक्स लेन और आठ लेन बाली सड़कों पर तेज भागती लक्जरी गाड़ियों में , ब्रांडेड कपड़ों में, एसी कमरों में।
विषयान्तर से हट कर पुनः काशी पर आते है। फिर काशी में अन्य देवी देवता और देवालय क्यों है इसके पीछे भी एक मान्यता है कि एक बार काशीनरेश देवोदास के तप के फलस्वरुप काशीपुरपति महादेव शंकर को काशी छोड़ कर जाना पड़ा महादेव काशी छोड़ कर चले तो गये पर काशी बिना बेचैन रहने लगे उनकी उद्धिग्नता को देख कर समस्त देवी देवता, भैरव, योगिनी, कपालिनी काशी में आ कर बारी बारी से देवोदास को काशी से बाहर भेजकर भगवान शिव को पुनः काशी वापसी का प्रयास करने लगे पर यहां आने के बाद वे काशी के महात्म्य से आकर्षित हो कर यहीं बस गये। कालान्तर में जब महादेव शिव पुनः काशी आये तो उन्होंने इन समस्त देवी देवताओं भूत, भैरव, योगिनी आदित्य, चंद्र,विनायक, कपालिनी को अपने स्थान बना कर बसने की अनुमति दे ही। तब से शायद ही कोई देवता देवी व अन्य पूजितगण ऐसे बचे हो जिनका मंदिर वाराणसी में न हो? यह मान्यता कितनी सच है यह एक अलग विषय है पर वर्तमान सच यह है कि काशी के हर आयाम में हर गली, नुक्कड़, मोहल्ले घाट पर मंदिर है और हर मंदिर का अपना महत्व है। इसके अतिरिक्त काशीवासियों ने अपने अपने घरों में अपने देवता के किये अलग मंदिर बना रखा है। कहते है काशी के हर कण में शंकर है उसके पीछे संभवतः यह मान्यता हो कि काशी के किसी क्षण और स्थान की शंकर बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती।
काशी की जीवन शैली, व्यापार, विचार सभी ऐसे विषय है जो अपने में अलगंठ है वे परम्परागत हो कर भी परंपरा से परे हैं। वे विज्ञान के सिद्धांत से निरंतर अछूते रह कर भी अपने परंपराओं, कार्यों से वैज्ञानिक है। उनकी अपनी मान्यताये है अपना विचार है। व्याक्ति ही नहीं मोहल्लो का अपना इतिहास, पौराणिक संदर्भ और मान्यतायें है। काशी कथा 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता के समान चलती रहेगी। काशी को कलम या शब्द (वाणी) के सीमा में बाधा नहीं जा सकता। काशी एक विचार है और विचार सदैव गतिशील होते है। यह विचार निरन्तर प्रगतिशील रहे । बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा की कृपा चलती रहे। काशी स्वयं प्रकाशित होती रहे।
काशी, 9अगस्त 2026, रविवार
कृष्ण एकादशी,श्रावण, संवत2083वि0
("बनारस इतिहास से परे" श्रृंखला मे वक्तव्य)
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