कभी काशी में उगते पहले सूरज को देखिये। राजघाट पुल के पार गंगा के किनारे से लाल रंग से नारंगी रंग में बदलते धीरे धीरे ऊपर उठते हुये। नमो घाट से भी पूरब आदिकेशव घाट के सामने थोड़ा तिरछे हो कर अपने पहले प्रकाश से आदि केशव मंदिर को आलोकित करते हुये। काशी में भगवान भाष्कर अपनी रोज की यात्रा वहीं से प्रारंभ करते है जहां भगवान विष्णु ने काशी में अपना प्रथम कदम रखा था । स्कंद पुराण के काशी खंड में आदि केशव मंदिर स्थापना का वर्णन मिलता है। यह काशी के अति प्राचीनतम् मंदिरों में से है जिसने पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के कई महत्वपूर्ण घटनाओं को देखा है। मिथकीय मान्यताओं के अनुसार मंदार पर्वत के दृढ़ तपस्या से प्रसन्न हो कर उसे भगवान शिव ने मंदराचल पर्वत पर स्वयं आ कर निवास करने का वरदान दिया और काशी स्थित सभी देवी देवताओं के साथ मंदराचल पर्वत पर चले गये। ब्रह्मा जी ने दोषरहित शासन के शर्त पर काशी के शासन व्यवस्था को संभालने हेतु राजा दिवोदास को सौंपा । दिवोदास इतने धर्मात्मा थे कि उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखमय व कंटकहीन जीवन व्यतीत करने लगी। कहीं से भी कोई भी दोष उनके शासन वावस्था में नहीं मिला। दिवोदास के कुशल शासन और लोकप्रियता से देवगण उनसे ईस्या करने लगे और बदनाम करने का प्रयास करने लगे। देवगण के अनेको प्रयासों के बावजूद भी राजा दिवोदास की कीर्ति में कोई आंच नहीं आई। वे अपने कठोर तपस्या एवं कुशल शासन व्यवस्था के बल पर अपनी प्रजा में लोकप्रिय बने रहे जिससे प्रजा पूर्वपूजित देवी देवताओं को भूलने लगी और देवदास की हो पूजा करने लगी। उन्होंने लगभग 80,00 वर्षों तक काशी पर शासन किया।
पर काशी के देवाधिदेव भगवान शिव काशी से विरह के कारण व्याकुल थे। कोई भी शीतलक उन्हें शांत नहीं कर पा रहा था। काशी से बहने वाली हवा भी उन्हें ठंडा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उनके शरीर पर चंदन का लेप लगाया गया, कोमल कमल की डंठले बांधी गई और भगवान शिव को शांत करने के लिए अनेक उपाय किए गए, लेकिन किसी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।बाहर से शांत दिखने के बावजूद, वह काशी से वियोग के कारण उत्पन्न सभी पीड़ा को मन ही मन सहन कर रहे थे। देवतागण यह सोच रहे थे कि पार्वती देवी के आगमन से भगवान शिव के मन मे सती देवी के वियोग का कष्ट भी दूर हो गया है। परन्तु महादेव शिव के लिये काशी से वियोग की अग्नि उससे कहीं अधिक तीव्र थी।
भगवान शिव की स्थिति को समझते हुए, पार्वती देवी ने काशी की महिमा का वर्णन किया और उनसे कहा कि उन्हें तुरंत काशी के लिए प्रस्थान करना चाहिए। यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और पार्वती देवी से प्रसन्न होकर उन्होंने आश्वासन दिया कि वे जल्द से जल्द काशी पहुँचने का प्रयास करेंगे। अब भगवान शिव राजा दिवोदास को काशी से हटाने का उपाय सोच रहे थे। पूरी काशी दिवोदासमय हो चुकी थी।उस समय उन्होंने योगिनियों का एक समूह देखा। पार्वती देवी से परामर्श करने के बाद, उन्होंने 64 योगिनियों के समूह को काशी भेजा। 64 योगिनियों को ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी थी या कोई ऐसा उपाय खोजना था जिससे राजा दिवोदास तंग आकर सिंहासन त्याग दें। योगिनियों ने भगवान शिव का आदेश सहर्ष स्वीकार किया और काशी के लिए रवाना हुई।ये अनियमित तरीकों से काशी में प्रवेश कर गईं और अपनी रहस्यमयी शक्तियों का उपयोग करते हुए विभिन्न रूप और गतिविधियों अपना लीं। एक योगिनी नर्तकी बन गई तो दूसरी हस्तरेखा शास्त्र में पारंगत हो गई। इस प्रकार, सभी योगिनियों ने भगवान शिव के मिशन को पूरा करने के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ या पेशे अपना लिए। लेकिन उनमें से कोई भी राजा दिवोदास में कोई दोष नहीं निकाल सकी।
अंततः उन्होंने हार तो मान ही ली बल्कि काशी शहर के आकर्षण में आकर वहीं रहने का फैसला किया। उन्हें वापस जाने और अपने गुरु को यह बताने से भी डर लग रहा था कि वे उनका मिशन पूरा नहीं कर पाई। योगिनियों के न लौटने पर भगवान शिव ने अपने सेवकों, गणों को काशी भेजा। लेकिन वे भी भगवान शिव को सूचना नहीं दे पाए। गण काशीवासियों को प्रभावित करने में असफल रहे। इसलिए, अपनी विफलता पर शोक करते हुए, उन्होंने काशी में ही रुककर शिवलिंग स्थापित करने और उनकी पूजा करने का निर्णय लिया। इस प्रकार, भगवान शिव ने सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा को भेजा। सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा को भी राजा दिवोदास में कोई दोष नहीं मिला और इसलिए उन्होंने काशी में ही रहने का निर्णय लिया। वास्तव में, भगवान ब्रह्मा पवित्र गंगा के तट पर अश्वमेध यज्ञ करना चाहते थे। लेकिन राजा दिवोदास ने दशाश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस प्रकार, दशाश्वमेध यज्ञ स्थल दशाश्वमेध घाट के नाम से जाना जाने लगा। चौसठ योगिनियों, गणों, सूर्यदेव और भगवान ब्रह्मा के अपने मिशन से वापस न लौटने से चिंतित होकर, भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश को बुलाया। उन्होंने गणेश को काशी जाकर राजा दिवोदास के शासन का अंत करने का उपाय खोजने का आदेश दिया। भगवान गणेश ने ही अपने पिता भगवान शिव के पक्ष में स्थिति को पलट का प्रयास किया।भगवान गणेश ने ज्योतिष के जानकार ब्राहम्ण का रूप धारण किया। वे विभिन्न घरों मे जाकर ज्योतिषीय भविष्यवाणी करते थे। वे राज्य मे एवं रानियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गये। रानियां अप्रत्यक्ष रूप से राजा से
इस पुराने ब्राह्मण ज्योतिषी के बारे में बातें करने लगी। राजा के सामने और आप भी अपने निजी बातचीत में उनकी प्रशंसा करती रहती थीं।
एक बार रानी लीलावती ने राजा दिवोदास के समक्ष उस ब्राह्मण की प्रशंसा की और उनसे कहा कि वे उस ब्राह्मण से मिले। राजा दिवोदास ने इसकी अनुमति दे दी। रानी लीलावती ने अपनी चतुर सहेली को भेजा और ब्राह्मण को राजा के दरबार में बुलाया।भावपूर्ण बातचीत के बाद ब्राह्मण वापस लौटा और राजा उनसे बहुत प्रसन्न हुये। उन्होंने रानी लीलावती के समक्ष ब्राह्मण की खूब प्रशंसा की और अगले दिन सुबह उसे अपने महल में आमंत्रित किया।राजा दिवोदास ने एकांत में वृद्ध ब्राह्मण से पूछा कि उनके कल्याण के लिए कौन से कर्म लाभदायक हैं। राजा दिवोदास ने राजा के रूप में अनेक पुण्य कर्म किए थे, परन्तु उनका मन इन कर्मों में नहीं लगता था। वे उस ब्राह्मण से परम सत्य जानना चाहते थे, जिसे वे उच्च बुद्धि और ज्ञान का धनी मानते थे। वृद्ध ब्राह्मण ने राजा दिवोदास की प्रशंसा करते हुए उन्हें एक सच्चे और धर्मात्मा राजा के रूप में वर्णित किया। उन्होंने राजा को सूचित किया कि उस दिन से शुरू होने वाले अठारहवें दिन उत्तर दिशा से एक ब्राह्मण आएगा और राजा को सलाह देगा। राजा को उस ब्राह्मण की सलाह का निःसंकोच पालन करना था। इसके बाद, भगवान गणेश अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए काशी में ही रहे।
जब भगवान गणेश मंदार पर्वत पर नहीं लौटे, तो भगवान शिव चिंतित हो गए और भगवान विष्णु से मिले, जिन्होंने उनकी सहायता करने का प्रस्ताव रखा। भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी के साथ काशी के लिए रवाना हुए। काशी पहुँचकर, भगवान विष्णु ने पवित्र गंगा और पवित्र वरुण नदी के संगम पर इसी घाट पर स्नान किया। तब से यह गंगा वरूणा संगम पदोदक तीर्थ के नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि भगवान विष्णु ने यहाँ अपने चरण कमलों को धोया था।लक्ष्मी देवी और गरुड़ के साथ, भगवान विष्णु ने यहाँ अपने दैनिक अनुष्ठान किए। उन्होंने अपनी एक प्रतिमा बनाई और स्थापित किया। काशी के उस क्षेत्र को, जहाँ भगवान विष्णु ने स्नान किया और अपनी प्रतिमा स्थापित की, श्वेतद्वीप के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के आसपास कई तीर्थ हैं, जिनमें महालक्ष्मी तीर्थ भी शामिल है, जहाँ देवी लक्ष्मी प्रतिदिन स्नान करती थीं। वहाँ उनकी प्रतिमा भी स्थापित है। भगवान विष्णु द्वारा तराशी गई प्रतिमा में प्रवेश करने के बाद, वे भगवान शिव के मिशन को पूरा करने के लिए आंशिक रूप से बाहर आए। भगवान विष्णु ने काशी के उत्तर में अपने निवास के लिए धर्मक्षेत्र नामक एक क्षेत्र की रचना की।
भगवान विष्णु ने पुण्यकीर्ति नामक एक साधु का रूप धारण किया, जो तीनों लोकों के लिए आकर्षण का स्रोत थे। लक्ष्मी देवी ने विज्ञानकौमुदी नामक एक अत्यंत सुंदर परिव्राजिका (स्त्री साध्वी) का रूप धारण किया। उनके प्रकट होने से संसार थम सा गया। गरुड़ ने एक अद्वितीय रूप धारण किया और विनायकीर्ति नाम से उनके शिष्य बन गए। शिष्य विनायकीर्ति अपने गुरु पुण्यकीर्ति के प्रति अत्यंत समर्पित थे, जिन्होंने उन्हें अहिंसा सहित धर्म के विभिन्न सिद्धांतों का ज्ञान दिया। काशी के लोगों ने पुण्यकीर्ति के उपदेशों के बारे में दूसरों से सुना और उनसे मिलने गए। वहीं, विज्ञानकौमुदी ने काशीवासियों से कहा कि वे केवल वही मानें जो वे देखते हैं और शरीर के सुख की ही तलाश करें। उन्होंने लोगों को भौतिक सुख की आवश्यकता और उसे प्राप्त करने के विभिन्न साधनों के बारे में बताया।
उसने कुछ लोगों को काला जादू भी सिखाया। इस तरह पुण्यकीर्ति और विज्ञानकौमुदी नागरिकों की भौतिक सुख की लालसा में उलझाकर उन्हें पापमय गतिविधियों में लिप्त करने में सफल रहीं। परिणामस्वरूप, राजा दिवोदास, जो अब अपने राज्य का संचालन नहीं करना चाहते थे, की शक्ति कम हो गई।
यह वृद्ध ब्राह्मण द्वारा बताई गई भविष्यवाणी के अनुसार दिन गिन रहा था। अठारहवें दिन, भगवान विष्णु पुण्यकीर्ति ब्राह्मण के रूप में राजा दिवोदास के द्वार पर प्रकट हुए। राजा ने पुण्यकीर्ति का बड़े आदर से स्वागत किया और उनकी पूजा की।
राजा ने पुण्यकीर्ति से सुख प्राप्ति के उपाय पूछे। उन्होंने राजा के रूप में अपनी उपलब्धियों का उल्लेख किया। पुण्यकीर्ति ने राजा की प्रशंसा करते हुए कहा कि राजा ने केवल एक ही पाप किया था। उन्होंने भगवान शिव को काशी से दूर रखा था।
अतः राजा को शिवलिंग स्थापित करना पड़ा और पूरी श्रद्धा से उसकी पूजा करनी पड़ी। राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पुण्यकीर्ति को कई बार प्रणाम किया और उनकी सलाह मानने के लिए सहमत हो गए।भगवान विष्णु चले गए और काशी में स्थायी निवास के लिए एक स्थान की तलाश करने लगे। उन्होंने पंचानद में श्री आदि केशव के रूप में स्थायी निवास करने का निर्णय लिया।
मान्यता यह है कि यहां प्रथम कदम रखने के साथ ही पवित्र गंगा एवं वरुणा के संगम स्थल पर भगवान विष्णु ने स्नान किया इस लिये यह पदोदक तीर्थ के नाम से जाना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार यहां की प्रतिमा स्वयं भगवान विष्णु द्वारा बनाई गई है। काशी में कुल 16 केशव मंदिर माने जाते है जिनमें यह आदिकालिक एवं सबसे प्रमुख है। स्कंद पुराण के काशी खण्डउत्तरार्द्ध के अध्याय 8 के 50वें श्लोक में यहां की महत्ता बताते हुये वर्णित है
आदित्य केशव: पूज्य आदि केशव पूर्वतः।
तस्य संदर्शनादेव मुच्यते चोच्च पातकै:।।
काशी के पूर्व भाग में पूजनीय आदित्य केशव और आदि केशव विराजमान है केवल उनके श्रद्धापूर्वक दर्शनमात्र से ही मनुष्य बड़े से बड़े और भयंकर पापों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
ऐतहासिक स्रोतों के अनुसार ग्याहरवीं सदी में गहड़वाल वंश के राजाओं ने इए पादोदक तीर्थ पर आदि केशव मंदिर व घाट का निर्माण कराया था जिसे सन1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक और 1196 में सिराबुद्दीन ने मंदिर का ध्वंश कर दिया एवं घाट तोड़वा दिया। लगभग छ: सौ वर्षों के बाद सन 1807 में महाराज ग्वालियर सिंधिंया के दीवान माधोजी ने मंदिर का पुनर्निमाण करवाया। अपने काशी प्रवास के दौरान बंगाल की नेटोर की रानी भवानी ने आदिकेशव घाट का निर्माण करवाया परन्तु कुछ वर्षों बाद क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण ग्वालियर नरेश के दीवान नरसिंह राव शितोले ने घाट का पुनर्निर्माण करवाया। इस मंदिर का स्वतंत्रता आंदोलन से भी संबंध बताया जाता है। कहते है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के समय शहर की भीड़भाड़ से दूर एकान्त में स्थित होने के कारण क्रान्तिकारियों के लिये यह काफी सुरक्षित स्थान था जहां वे मिल कर अपनी योजना बनाते और रहते। गंगा वरूणा के संगम, स्थानीय सहयोग एवं चारों तरफ काफी घने जंगल, जलमार्ग से बंगाल से लेकर दिल्ली पंजाब तक पहुंचने की सुगमता से यह मंदिर उनके लिये काफी उपयोगी था। परन्तु बाद में मुखबीरी के कारण यह स्थान अंग्रेजों की निगाह में आ गया और अंग्रेजी सेना ने पुजारियों को निस्कासित कर मंदिर पर कब्जा कर लिया और उसमें पुलिस चौकी बना दिया। दो साल बाद पुजारियों को मंदिर में देवार्चन की अनुमति मिली जो आज तक निर्वाध रूप से जारी है।
प्रायः मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि भगवान विष्णु ने काशी के आनंद कानन परिक्षेत्र को छोड़ कर एक छोर पर बसे शहर के पूरबी सीमा पर किनारे स्थित वाराणसी के अंतिम बिन्दु बरूणा गंगा के संगम स्थल से ही नगर में क्यों प्रवेश किया। सबकी अपनी मान्यताएं अलगअलग हो सकती है पर मैं जब गंगा घाट पर खड़े हो कर उगते सूरज से प्रकाशित हो रहे आदिकेशव घाट व मंदिर को देखता हूँ तो महसूस होता है कि सूरज की प्रथम किरण मन के मोह (चाहे वह अपने सर्वप्रिय राजा देवोदास के प्रति ही क्यों न हो) के अंधकार को मिटाने के लिये पूरब क्षितिज से प्रकट हो ज्ञान का प्रकाश लिये दिन चढ़ने के साथ शहर व पाचिम की ओर बढ़ती है जहां जीवन के शेष सोपान आपस में जुड़ते हुये संपूर्णता अथवा शून्यता की और ले जाते हैं। अतीत से मुक्त हो भविष्य का स्वागत करने। मेरे एक परिचित कहते है कि मनुष्य के चारो आश्रम उसके शरीर में नित्य प्रचालित रहते है। वह प्रातः उठ कर अपने नियमित दिनचर्या, कार्य की तैयारी करता है जो वानप्रस्थ है पुन: अपने कर्मयोग में लग जाता है दिन भर का यह कार्य गृहस्य आश्रम है। सायं अपने कार्यों की समीक्षा करते हुये परिवार के साथ समय व्यतीत करना और अपने अनुभव साझा करना वानप्रस्थ है और रात्रि में समस्त चेतना को विश्राम देते हुये सो जाना सन्यास । मुझे लगता है स्थान भी अपने वृत्ति में समय के साथ चारो आश्रमों को जीता है। पूरब में सूर्य की किरणों के पश्चिम की ओर शहर में बढ़ने के साथ साथ हम गंगा के किनारे इन चारो आश्रम की परिसीमा देखते है। आदि केशव से ओकारखंड तक और ओंकार खंड में प्रवेश करते ही शहर के उत्तरी किनारे में वाणिज्यिक गतिविधियाँ दिखने लगती है और विश्वेश्वरखंड से केदार खण्ड की ओर बढ़ते हुये वानप्रस्थ गतिविधियां, मंदिर, योग, ध्यान, पूजा। केदार खण्ड से आगे चलने पर महाश्मशान हरिश्चद घाट की यात्रा मोक्ष व सन्यास से जुड़ जाती है। यह जीवन यात्रा गंगा के प्रवाह के विपरीत पूरब से पश्चिम की ओर समय के अनुरूप चलती है। काशी की यह अनुभूति नितान्त व्यक्तिगत है। स्वयं की जीवन यात्रा है। जिसे हर कोई अपने अपने विचार और दृष्टि से विश्लेषण करने को स्वतंत्र है पर इन मान्यताओं से सबसे ऊपर जो मान्यता है वह काशी के अध्यात्म महत्ता विचार मिथक और दृढ़ विश्वास की जिसमे काशीवासी को अटूट विश्वास है और इस दृढ़ संकल्प के साथ कि उसके भोलेबाबा और मां अन्नपूर्णा उसकी मान्यताओं का मान बनाये रखेगें।
("काशी: इतिहास से परे" श्रृंखला का वक्तव्य)
काशी,श्रावण शुक्ल चतुर्थी, सं02083 विक्रमी, रविवार, 16अगस्त2027
https://chitravansh.blogspot.com
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