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शनिवार, 19 मार्च 2022

चटगांव बंगाल हिंदू एनक्लेव : एक संभावना.......(कैप्टन आर विक्रम सिंह के कलम से)

हमारे अति सम्माननीय लोकप्रिय प्रशासनिक अधिकारियों मे रहे बड़े भैया कैप्टन आर विक्रम सिंह के लेख बहुत ही समीचीन व तथ्यपरक रहते हैं। विशेषकर भारतवर्ष के पड़ोसी देशों पर उनका शोधपरक अध्ययन हम जैसों के लिये रोचक व ज्ञानवर्द्धक रहता है। उनके लेख बहुत ही से शब्दों मे समस्या के कारण व समाधान के साथ ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे अति प्रासंगिक है।
आज अखण्ड भारत के हिस्सा रहे बांग्ला देश पर उनका यह सारगर्भित लेख।

चटगांव बंगाल हिंदू एनक्लेव : एक संभावना------- 

                    यह कोई सामान्य विचार नहीं है. नया इतिहास लिखना, समाजों का भाग्य बदलना यथास्थितिवादी सत्ता आकांक्षियों के बस का नहीं होता. बात यहां बंगाल के असहाय हिंदुओं की है जिन्हें हमारी आजादी के कथित नायकों ने 1947 में जेहादी भेड़ियों का ग्रास बनने के लिए लावारिस छोड़ दिया था. यह विचार जो अंतिम पैरे में है, 1947-48 में कश्मीर युद्ध के समय भी हमारी बुद्धि में आ सकता था. लेकिन नहीं हमारे नेहरू जैसे नेता तो स्वयं ही पाकिस्तान के विचार के सबसे बड़े संरक्षक थे. 1950 के ढाका के भीषण दंगों के बाद जिसमें न्यूनतम 10,000 हिंदुओं की हत्या हुई थी, सरदार पटेल ने उद्वेलित होकर कहा था कि यही हाल रहा तो हमें शरणार्थियों के लिए जमीन पाकिस्तान से लेनी पड़ेगी. जिसपर नेहरू ने घबरा कर बड़ी सफाई दी कि सरकार का ऐसा कोई विचार नहीं है. यहां यह अवगत कराना चाहूंगा कि चंटगांव से लगी हुई पहाड़ियों का विस्तृत इलाका बौद्ध धर्म को मानने वाली चकमा जनजाति का मूल क्षेत्र रहा है. 1947 में अंग्रेजों के रिकार्ड में था कि इन पर्वतों में मुस्लिम आबादी मात्र 3% है फिर भी इसे पाकिस्तान में शामिल कर चकमा समाज को भूखे भेड़ियों के हवाले कर दिया गया. कांग्रेसियों में से कोई नहीं बोला. वो तो गोपीनाथ बारदोलाई जैसा नेता था वरना नेहरू तो असम को भी पाकिस्तान को देने का मन बना चुके थे. आज चकमा भारत में राज्यविहीन शरणार्थी हैं. कांग्रेस और नेहरू के पाप कहां तक गिनाए जाये. बल्कि नेहरू ने लियाकत अली के साथ मिलकर एक निकृष्ट सोच का ऐसा समझौता कर लिया जो पाकिस्तान के हिंदुओं को पाकिस्तान में ही रहने को बाध्य करता था. हमारे इतिहास में अपने को कश्मीरी ब्राह्मण कहने वाले नेहरू से अधिक हिंदूद्रोही चरित्र खोजना मुश्किल है. चटगांव हिंदू एनक्लेव स्थापित करने का कार्य सन् 1965 के युद्ध के समय भी हो सकता था. लेकिन तब तक तो न रणनीति, न कूटनीति, न राष्ट्रहित की कोई समझ ही विकसित हो सकी थी. हम उन तुरंत आजाद किये गये गुलामों की तरह थे जिनकी गुलामी की आदतें गहरे पैंठी हुई थीं. गुलामी के मानस से आजाद हो जाना, शक्ति की भाषा बोलने लगना आसान न था. अंग्रेजों की गुलामी से छूटे तो नेहरू की बदौलत वामपंथ की वैचारिक गुलामी का दौर आ गया था. एक आकलन के मुताबिक 2013 के बाद से बांग्ला देश में अब तक हिंदुओं पर 3600 हमले किये जाने का रिकार्ड उपलब्ध हैं और कितने ही तो रोज होते हैं जो अनरिपोर्टेड रहते हैंं. मात्र मानवीय आधार पर ही देखें तो इसकी गंभीरता अत्यंत चिंताजनक है. जिस बंगाल की सरकार व मुख्यमंत्री को बंगाली हिंदुओं संस्कृति और भाषा के हित में सीमापार के ये मुद्दे मजबूती से उठाने चाहिए थे वे तो भारत के बंगाल में उसी बांगला देशी जेहादी साम्प्रदायिक मशीन के बेशर्म हिस्से बन चुके हैं. वे भी अपने मजहबी एजेंटों के माध्यम से हिंदू समाज पर अत्याचार करने में कहीं से पीछे नहीं हैं. यह एक अलग विमर्श है कि ये सरकार अभिजात भद्रलोक हिंदू व दलित नमोशूद्र हिंदुओं में भेद करते हुए दलित हिंदू समाज की जेहादी प्रताड़ना से आंखें बंद रखती है. चूंकि मामला दलित बंगाली हिंदूओं का है इसलिए मीडिया वगैरह का शोर भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ा. ये लोकतंत्र के सबक हैं. बंगाल में संभवतः एक छोटे से वर्ग को छोड़ कर सब ने इसे अपनी नियति मान लिया है कि राजनैतिक हित साधने वाले इस प्रायोजित जेहादी विस्तार व वर्चस्व को रोक सकना संभव नहीं है. बांग्ला देश की कुल 17 करोड़ आबादी में हिंदू लगभग 1.5 करोड़ के आसपास हैं. अभी हमने दुर्गा पूजा पंडालों पर हुए जेहादी आक्रमणों को देखा है जिसमें इस्कॉन के पुजारियों समेत दर्जन भर हिंदुओं की वीभत्स हत्या हुई. संभवतः यह पहली बार है कि बांगलादेश का साम्प्रदायिक मुद्दा विश्व स्तर पर उठाया गया और दुनिया ने इनका जेहादी चेहरा देखा. नान रेजिडेंट बंगाली-बांग्ला देशी हिंदुओं में इसके प्रति चिंताएं देखी गयीं कि यह सब आखिर कब तक चलेगा. बांग्ला देश, बताते हैं कि भारत की बदौलत आजाद हुआ है. इतिहास में तो यही लिखा है. हमारी अपनी फौजी रेजिमेंट भी 1971 में ढाका की लड़ाई में थी लेकिन अब भरोसा नहीं होता. हमारी बदौलत आजाद हुए इस देश की साम्प्रदायिकता जेहादियों की सहयोगी बनी हुई हिंदुओं से शत्रुता में किसी से पीछे नहीं है. हमारा दिमाग ही नहीं चलता कि आखिर हमारे देश की भूमिका, हमारा दायित्व और भविष्य की दिशा क्या है. क्या सिर्फ बच्चे पालना, मुफ्तखोरी करना, जब मौका लगे तो जाकर किसी को वोट दे देना ही हमारे भाग्य में है ? मरने के करीब पहुंचे लोगों ने संविधान रच दिया अब वह देश के मरने तक क्या ऐसे ही चलेगा ? जेहादी समाज तो इस देश के मरने के इंतजार में हैं. जेहादी ही नहीं, जातिवादी, भाषावादी, क्षेत्रीय क्षत्रप, मिशनरी, माओवादी, खालिस्तानी और भी बहुत से देश के मरने की प्रतीक्षा में हैं. आपने झंडे पर लिटा कर जेहादियों द्वारा काटी जा रही गाय का तड़पता वीडियो देखा होगा. वह एक सिंबल है कि समाज को काटने वाले सशक्त बेधड़क हो रहे हैं. वे भारत का यही हस्र देखना चाहते हैं. यहां सवाल वैचारिक विमर्शों से बाहर आकर कार्ययोजना पर चलने का है. खालिस सोचना, सिर्फ आलोचक बने रहना, कोई समाधान नहीं है. मैंने खोजने का प्रयास किया कि क्या बांग्ला देश के प्रताड़ित हिंदू समाज ने इस अत्याचारों का प्रतिवाद करने के लिए व अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कोई ऐसा सशक्त संगठन बनाया है जो आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र प्रतिवाद से भी पीछे न हटे. अभी तक ऐसा कोई दिखा नहीं है. बंगाली हिंदू एनआरआई वर्ग इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. 1.5 करोड़ एक सशक्त आबादी है. चटगांव क्षेत्र में हिंदू आबादी 15 लाख के लगभग है. सशक्त राजनैतिक प्रतिक्रियाओं के मद्देनजर अन्य क्षेत्रों से चटगांव की ओर हिंदुओं के माइग्रेशन से यह आबादी बढ़ती जाएगी. इतिहास की गलतियों को सुधारने के ऐसे कई उदाहरण अभी के इतिहास में मौजूद हैं. अभी अभी यूक्रेन के पूर्वी रूसी आबादी बहुल इलाके डोनबास के दो राज्यों को रूस ने अलग मान्यता दी है. इससे पहले यूगोस्लाविया के टूटने से नाटो द्वारा बनाया गया कोसोवो एक अलग मुस्लिम बहुल योरोपीय देश अस्तित्व में आया है. तो बांग्ला देशी हिंदुओं के लिए चटगांव हिंदू राष्ट्र या 'बंगभूमि' नामक देश क्यों नहीं बन सकता. राजस्थान के अरावली की पहाड़ियों की तरह चकमा हिल्स, चटगांव की पहाड़ियां हैं जो क्रांतिकारियों को शरण देकर हिंदू बंगाल की आधारशिला बन सकती हैं. सशक्त प्रयास होगा तो चटगांव हिंदू बहुल भी हो सकता है. सम्बंधित मानचित्र को ध्यान से देखें, गहन अध्ययन करें. चटगांव के पूर्व में भारत, पश्चिम में समुद्र, दक्षिण में म्यांमार और उत्तर में त्रिपुरा का भारतीय क्षेत्र है इसके पश्चिम से होकर फेनी इलाके की एक छोटी जमीनी पट्टी से बांग्ला देश मुख्यभूमि से यह चटगांव प्रायद्वीप जुड़ता है. यहां का भूगोल एक सशस्त्र क्रांति के लिए आदर्श है. बंगाल ने पहले भी देश को रास्ता दिखाया है. अधिक नहीं यदि जमीन से जुड़े मात्र एक लाख बंगाली युवक ही यह प्रतिज्ञा कर लें तो सहयोगी शक्तियां अपने आप साथ आने लगेगी. अगले दस वर्षों से पहले ही चंटगांव प्रायद्वीप में हिंदू राष्ट्र बंगाल का स्वप्न साकार हो सकता है. यदि ऐसा हो सका तो यह हमारे मानस को आमूल बदल देने वाली एक हिंदू क्रांति का सूत्रपात होगा ...
   
-कैप्टन राघवेन्द्र विक्रम सिंह (पूर्व आईएएस अधिकारी)

(काशी,19मार्च 2022,शनिवार)
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शनिवार, 23 जुलाई 2016

ट्रौमा सेण्टर के पार्किंग ठेकेदार खुद मे ही माफिया है।: व्योमेश चित्रवंश की डायरी ,19 जुलाई 2016

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल मे ही अपने सभी चिकित्सालयो मेे पार्किग सुविधा निशुल्क कर दिया उसके लिये बेहद जरूरी व वाजिबकारण बताते हुये यह कहा गया कि अस्पताल मे मरीजो की सुविधा के लिये सुविधाओं को निशुल्क अथवा बेहद मामूली शुल्क पर किया जाना चाहिये।
      वहीं दूसरी तरफ बीएचयू ट्रौमा सेण्टर मे अगर आप सीधे व सरल स्वभाव के है तो पार्किग वाला आपसे मनमाने तौर पर पार्किंग शुल्क वसूल करेगा और काऱण पूछने पर आप के साथ जबरदस्ती व गुंडई करने को बिलकुल स्वतंत्र है। उस पर से बड़ा तुर्रा यह कि वह माफिया है अगर आपको गाड़ी नही खड़ी करनी है तो मत खड़ी करिये। पार्किंग से मिलने वाले रसीद मे व्यौरा कुछ और ही दर्ज है।
पार्किंग स्थल की हालत यह है कि पूरे पार्किंग एरिया मे कीचड़ भरा है। जरा सा पानी बरसने पर वहॉ घुटने भर पानी भर जाता है। गलती से आपकी दूपहिया रह गयी तो फिर स्टार्ट  होने के लिये भगवान मालिक है।
यदि आपने अपनी गाड़ी भूलवश नो पार्किंग एरिया मे खड़ा कर दिया है तो हास्पिटल मैनेजमेण्ट सिस्टम बार बार एनाउंसमेण्ट कर आपको  इस गलती के लिये याद दिलाता रहेगा जब तक आप उसे पार्क करने जायेगे तब तक पार्किग वाले आपकी गाड़ी पंचर भी कर सकते है। और पूछने पर वही जबाब कि वे माफिया है कुछ भी कर सकते हैं।
जब हमने पार्किंग के कर्मचारियो की शिकायत ट्रौमा सेण्टर के सिक्यूरिटी सिस्टम से किया तो उन बेचारो ने अपनी बेबसी बताते हुये कहा कि साहब वे  माफिया लोग हैं वीसी व ओएसडी के खासमखास है हम कॉन्टैक्ट ड्यूटी वाले उन्है कैसे रोक सकते है?
कल रात को ११,३० बजे पार्क की हुई गाड़ी को आज सुबह ६ बजे निकालने पर पार्किंग कर्मचारी द्वारा ३०/- मॉगने पर फिर किचकिच हुई मैने जब शिफ्ट वाईज चार्ज पूछा तो कर्मचारी ने सरलता से गणित समझाया कि रोज 2000/- रूपये वीसी को व3000/- रूपये ओएसडी को देने के बाद हमारे भी बालबच्चो को पालने  के लिये खर्च निकालना पड़ता है।
पता नही कर्मचारी कितना सच बोल रहा था पर अगर इसमे रत्ती भर भी सच्चाई है तो यह पूज्य महामना के परित्राणाम दुखतप्तम्  जैसे पवित्र विचारों की सरेआम हत्या है जिसके प्रतिे बीएचयू के पूर्व छात्र रहे हम जैसे लोग प्रतिकार करते हैं।

अपनों के अव्यवस्था से जूझता ट्रौमा सेण्टर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जुलाई 2016

तीन दिन से ट्रौमा सेण्टर बीएचयू मे हूँ और  एक नेक नीयत से शुरू की गई व्यवस्था को उसके अपनो द्वारा जानबूझ कर ध्वस्त होते हुये देख रहा हूँ। बनारस के लिये एक अनुपम भेंट को ध्वस्त करने वाले कोई और नही यही के कर्मचारीगण हैं। ज्यादातर कॉन्ट्रैक्ट सेलरी पर रखे गये कर्मचारियों का आपस मे कोई तालमेल नही है, ऐसे मे उनसे मरीजो की तीमारदारी की उम्मीद करना बेमानी है।
स्थिति यह है कि अगर आपने एक स्टाफ नर्स को कुछ करने को बोला है तो दूसरी स्टाफनर्स आपके ऊपर ध्यान नही ही दे सकती भले ही आप कितने भी पीड़ा या परेशानी मे क्यों न हो?
      वरिष्ठ चिकित्सको को इन तीन दिनो मे हमने वार्ड का विजिट करते हुये शायद ही देखा, पर उनके अंडर मे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रेजिडेण्ट्स डाक्टर्स जरूर मौजूद मिलते दिखते थे। पर उनका आपसी व्यवहार  इतना तल्ख व अमानवीय होता है जो सामान्य स्तर पर भी उचित नही कहा जा सकता ।  हम लोगो के वार्ड मे तमिलनाडु का एक लड़का डाक्टर है, फर्स्ट ईयर रेजिडेण्ट, नाम देना उचित नही होगा, जब से हम आये है उस बंदे क लगातार काम पर देखा है २४ घंटे रात दिन। बेहद सुलझा और मेहनती। हम मजाक मे उससे पूछते भी है कि डाक्टर साहब आप सोते कब हो, बेचारा मुस्करा के जबाब देता है, सोते कहॉ है सर जी, दोपहर मे दो घंटे रेस्ट करते है तो पूरे वार्ड मे शोर हो जाता है। ऐसे बेचारे जूनियर डाक्टर को उसके सीनियर्स इस बुरी तरह लताड़ लगा के मॉ बहन की गाली देते है कि हम लोगो को सुन कर नागवार लगता है। मजा यह है कि गलती किसी की भी हो , डॉट उसी बेचारे जूनियर रेजिडेण्ट को सुननी है। चाहे वह नर्स ने किया हो चाहे मरीज ने या खुद सीनियर ने पर डॉट जूनियर को इसलिये पड़नी है कि उसने देखा क्योंं नही अथवा बताया क्यो नही।
एक बार तो उस जूनियर रेज्डेण्ट को अनायास डॉट व गाली गलौज सुनते हुये देख मुझसे नही रहा गया मैने उस जूनियर से इतना सब कुछ सहने का कारण पूछा तो उसने बेहद मासूमियत से जबाब देते हुये कहा कि छोड़िये न सर। कौन सा ये लोग जिन्दगी भर हमारे सीनियर बने रहेगें?  पर मै स्वयं एक व्यवसायगत पेशे का हिस्सा होकर भी यह समझ पाने मे असमर्थ हूँ कि अपने जूनियर्स को सिखाने का यह कौन सा तरीका है जहॉ उसे व्यक्तिगत प्रताड़ना व सार्वजनिक बेईज्जती सहते हुये इस तरह की व्यवसायिक जानतारियॉ सिखनी पड़ती है?
बहरहाल बात अव्यवस्था की हो रही थी । कहने को तो ट्रौमा सेण्टर व सुपर स्पेशियल्टी हास्पिटल  बना दिया गया पर दोनो के रखरखाव की व्यवस्थाये परले सिरे से ही नदारद है। न तो सेण्टर मे साफ सफाई की पूरी व्यवस्था है न ही बिजली पानी की। एक फ्लोर पर लगभग ६० मरीजो के बीच एक वाटर कूलर। तीन सामान्य शौचालय दो बेसिन वे भी साफ सफाई से कोसो दूर। कहने को तो औपचारिकताओं के नाम पर कई बार झाडू पोछा किया जाता है पर वह केवल गैलरी के फर्श पर ही नजर आता है।

बदहाल बीएचयू ट्रौमा सेण्टर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी

बीएचयू ट्रौमा सेण्टर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 18 सितंबर 2015 को किया था यह वही समय था जब मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत जोर शोर से हो चुकी थी। देश मे स्वच्छ भारत का असर दिखने भी लगा है पर मोदी जी द्वारा उद्घाटित ट्रौमा सेण्टर की सफाई व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ज्यादातर वाटर वेसिन गंदगी से पटे और जाम पड़े हैं। ज्यादातर लैट्रीन के कमोड्स व सीट बदरंग व गंदे है। वाटर कूलर पर धूल व गंदगी का अंबार लगा है।कुछ सर्विस मास्टर क्लीनर की वर्दी वाले सफाईकर्मी साफसफाई करते नजर आते रहते है पर उनके कामो की देख रेख करने वाला कोई नही। स्थिति यह है कि चौथे मंजिल पर आर्थोपेडिक वार्ड में वेसिन की टोटियॉ रस्सी से बॉधी गई है और बाथरूम की हालत यह है कि आप उसका प्रयोग करना तो दूर वहॉ खड़े तक नही हो सकते। हमने इस संबन्ध मे जब आन ड्यूटी नर्सेज से बात किया तो उनका सीधा जबाब था कि यह देखना उनकी ड्यूटी मे नही हैं। मौजूदा डाक्टर्स तो ज्यादातर प्रथम वर्ष के रेजिडेण्ट है जो स्वयं अपने सीनियर्स के व्यवहार व थोपे गये कार्यो से त्रस्त है वे बेचारे इस संबन्ध मे क्या बता पायेगें।
    हमने इस संबन्ध मे ट्रौमा सेण्टर के विशेष कार्याधिकारी व उप चिकित्सा अधीक्षक से मिल कर शिकायत करने की कोशिश की पर वे दोनो अधिकारी हमे अपने कमरे मे नही मिले।
   पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के साथ साथ छत्तीसगढ व झारखण्ड के लिये एम्स जैसा एकमात्र जीवनदायी माने जाने वाले बीएचयू के अत्याधुनिक ट्रौमासेण्टर की बदहाली को बढ़ाने मे कुछ निहित शक्तियॉ अपने स्वार्थवश बदनाम व ध्वस्त करने मे लगी है क्या उनके मायाजाल से आमजन के बनाये ट्रौमासेण्टर मुक्त हो सकेगा?