काशी और लोक आस्था का महापर्व डालाछठ.......
*व्योमेश चित्रवंश
लोक आस्था, शुद्धि और प्रकृति के प्रति अनन्य कृतज्ञता का महापर्व डाला छठ (सूर्य षष्ठी व्रत) भारतीय संस्कृति की सबसे कठिन और पवित्र आध्यात्मिक साधनाओं में से एक त्योहार है जो मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चार दिनों तक मनाया जाता है।डाला छठ एक ऐसा अद्वितीय पर्व है जिसमें मूर्ति पूजा के बजाय साक्षात दिखने वाले प्रकृति के देवता सूर्य (सूर्य नारायण) और उनकी दिव्य शक्ति छठी मैया (देवी उषा) की आराधना की जाती है।
डाला छठ कोई साधारण पूजा नहीं, बल्कि 36 घंटे का निर्जला अनुष्ठान है, जो चार दिनों की कठोर व्यवस्था के साथ पूरा होता है। पहले दिन - नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी) के दिन व्रती नदी या पवित्र जल से स्नान कर शुद्ध सात्विक भोजन (सेंधा नमक से बनी लौकी की सब्जी, चने की दाल और भात) ग्रहण करते हैं। इसके बाद घर में केवल पूजा की शुद्धता का वातावरण रहता है।दूसरे दिन - खरना या लोहंडा (कार्तिक शुक्ल पंचमी) के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर गन्ने के रस या गुड़ से बनी रसियाव (खीर) और शुद्ध घी की रोटियां बनाई जाती हैं। चंद्रमा के दर्शन के बाद एकांत में पूजा कर इसे ग्रहण किया जाता है, जिसके बाद 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू होता है।तीसरा दिन - संध्या अर्घ्य (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) के दिन मुख्य प्रसाद 'ठेकुआ' (गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बना पकवान) तैयार किया जाता है। बांस की टोकरी (डाला या दौरा) में सूप सजाकर मौसमी फल (डाभ नींबू, केला, गन्ना, नारियल) रखे जाते हैं। शाम को सभी व्रती सपरिवार घाट पर जाते हैं और पानी में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्घ्य देते हैं।चौथे और अंतिम दिन - उषा अर्घ्य व पारण (कार्तिक शुक्ल सप्तमी) को भोर में सूर्योदय से पहले व्रती पुनः घाट पर आते हैं। उगते हुए सूर्य को उषा अर्घ्य देने के बाद सभी में प्रसाद वितरित किया जाता है और व्रती कच्चे दूध व जल से अपना व्रत खोलते हैं । यह हिंदू धर्म में यह एकमात्र अद्वैत व अद्भुत पूजा पद्धति का ऐसा पर्व है, जहाँ डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) को पहले अर्घ्य दिया जाता है और उसके बाद उगते हुए सूर्य (उदीयमान सूर्य) को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है जो समाज में समानता का सबसे बड़ा संदेश देता है। इसमें राजा हो या रंक, सब एक साथ नदी के घाटों पर मिट्टी और बांस से बने सूप-दौरा (डाला) लेकर खड़े होते हैं। इसी कारण इस सूर्योपासना षष्ठी पूजा का नाम डाला छठ भी है।
दिवाली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला छठ पूजा महीने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में पड़ता है। इसे अक्सर सौर पर्व कहा जाता है क्योंकि इसके प्रमुख देवता सूर्य हैं; इसे सूर्य षष्ठी व्रत कहा जाता है, जिसमें 'छठ' शब्द षष्ठी से आया है , जिसका अर्थ है अमावस्या का छठा दिन। सूर्य की पत्नी मानी जाने वाली देवी छठी माई/उषा का विशेष सम्मान और पूजा की जाती है। यह कोई विशेष लिंग-विशिष्ट पर्व नहीं है, लेकिन पारंपरिक और सामाजिक रूप से यह स्त्री-केंद्रित रहा है, जिसका एक कारण यह भी है कि छठी माई को बच्चों की रक्षक देवी माना जाता है, जो उनकी दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करती हैं। लेकिन छठी माई कौन हैं? जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, और इस कथा का एक महत्वपूर्ण तत्व है। छठ पूजा का इतिहास प्रागैतिहासिक और वैदिक काल से जुड़ा है। शास्त्रों में इसके उद्भव को लेकर कई कथाएँ प्रसिद्ध हैं। ' ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार , जब भगवान ने संसार की रचना की, तो उन्होंने पुरुष और प्रकृति के द्वैत की भी रचना की । प्रकृति को आगे कई तत्वों में विभाजित किया गया, जिनमें से छठा भाग छठी/षष्ठी है । उन्हें देवसेना कहा जाता है। इस कथा के अनुसार, स्वायम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत संभवतः वर्तमान बिहार और झारखंड के आसपास के क्षेत्र में रहते थे। उनके कोई संतान नहीं थी और इसके लिये ब्राह्मणों द्वारा सुझाव देने पर पुत्रेष्टि यज्ञ किया। महर्षि कश्यप द्वारा कराए गए इस पुत्रेष्टि यज्ञ के दौरान हवन कुंड से खीर का एक कटोरा प्रकट हुआ । रानी ने खीर खाई और गर्भवती हो गईं। हालांकि, शिशु मृत पैदा हुआ। शोकग्रस्त होकर वह आत्महत्या करने के लिए नदी की ओर दौड़ीं, तभी एक स्त्री प्रकट हुई और उन्हें रोक लिया। स्वयं को देवसेना/षष्ठी बताते हुए उन्होंने रानी से संतान प्राप्ति और उनकी रक्षा के लिए उनकी और सूर्य देव की पूजा करने को कहा, "मैं मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मुझे षष्ठी कहते हैं।" राजा ने देवी के कहे अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रत किया और उन्हें परम तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। रामायण व महाभारत मे भी छठ पूजा के संदर्भ मिलते हैं। मान्यता है कि लंका विजय और 14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे, तब ब्रह्महत्या (रावण वध) के पाप से मुक्ति पाने के लिए महर्षि मुद्गल के निर्देश पर माता सीता ने बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर सूर्य देव की उपासना की थी। इसी तरह महाभारत के अनुसार, सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने अंग देश (वर्तमान मुंगेर, बिहार) में नदी के पानी में खड़े होकर अपने पिता सूर्य की आराधना शुरू की थी। इसके अतिरिक्त, जुए में अपना सब कुछ हार जाने के बाद द्रौपदी ने पांडवों के साथ संकट से मुक्ति और खोया हुआ राज्य वापस पाने के लिए यह कठिन व्रत किया था। आज जो कथाएँ पढ़ी जाती हैं, उनमें कई अन्य संप्रदायों का प्रभाव भी दिखाई देता है, जैसे कि छठी माई नामक मातृ देवी का संप्रदाय । छठ पर मातृ देवी संप्रदाय का प्रभाव संभवतः बाद में आया होगा। इसे पौराणिक कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। कहा जाता है कि देवी का जन्म बिहार में असुरों और देवों के बीच हुए महान युद्ध के बाद सुख का पुनर्स्थापन करने के लिए हुआ था । वे संतानदाता और उनकी रक्षक हैं। वे पुत्रों की प्राप्ति का वरदान देकर वंश ( वंश ) की निरंतरता सुनिश्चित करती हैं। छठी माई का मानवरूपी चित्रण एक हालिया नवाचार है। हालांकि, सूर्य पूजा पर केंद्रित त्योहार के रूप में छठ की मूल विशेषताएं अभी भी बरकरार हैं।'
छठ पूजा से जुड़ी प्रचलित लोककथाओं के अलावा, इस त्योहार का संबंध कृषि से भी है। इसे फसल कटाई के बाद का त्योहार कहा जा सकता है, क्योंकि सूर्य की पूजा बीते मौसम की भरपूर फसल के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है, जिसमें चावल भी शामिल है जिसकी कटाई इस समय की जाती है।
छठ पूजा के पीछे आरोग्य और वैज्ञानिक कारण भी है।ऋषियों और आधुनिक शोध के अनुसार, कार्तिक महीने में सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर कम और नियंत्रित मात्रा में होती हैं। पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर में विटामिन डी और कैल्शियम का इष्टतम अवशोषण होता है, तथा मानसिक शांति व आंतरिक विषहरण (डिटॉक्सिफिकेशन) प्रक्रिया पूरी होती है। छठ पूजा शरीर को विषमुक्त करने का सर्वोत्तम तरीका है, क्योंकि जल में डुबकी लगाने और शरीर को धूप में रखने से सौर जैव विद्युत का प्रवाह बढ़ता है, जिससे शरीर की कार्यप्रणाली में सुधार होता है। यह भी कहा जाता है कि छठ पूजा हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होती है और शरीर को आने वाले शीत ऋतु के लिए तैयार करती है।
छठ पूजा एक सांस्कृतिक पर्व भी है जिस का कोई भी अनुष्ठान बिना पारंपरिक लोकगीतों के अधूरा है। ये गीत केवल संगीत नहीं हैं, बल्कि ये प्रकृति संरक्षण, नारी सशक्तिकरण, पारिवारिक सामंजस्य और दर्शनशास्त्र के अद्भुत दस्तावेज हैं। ये अपने सांस्कृतिक व साहित्यिक अर्थ के माध्यम से प्रकृति , समाज, नारी सशक्तीकरण, आस्था,शूचिता ,समानता एवं पवित्रता के गूढ़ रहस्य प्रकट करते हैं। छठ पर सर्वव्यापी और सर्वाधिक लोकप्रिय गीत: "कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए...." प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। 'कांच का बांस' यानी हरा और कच्चा बांस, जो पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली का प्रतीक है। बहंगी (कांवर) के लचकने का अर्थ है कि व्रती सूर्य देव के लिए जो फल और प्रसाद ले जा रहा है, वह बहुत भारी (श्रद्धा से परिपूर्ण) है। यह गीत सामाजिक संदेश देता है कि ईश्वर की पूजा के लिए महंगे सोने-चांदी के बर्तनों की नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त बांस की टोकरी और सूप की आवश्यकता होती है। इसी तरह गीत: "केरवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय..." में वर्णन है कि केले का घौद (गुच्छा) पेड़ पर लटक रहा है और उस पर एक तोता (सुगा) मंडरा रहा है। व्रती तोते को चेतावनी देती है कि इसे मत छूना, क्योंकि यह 'मरजाद के फल' (छठ मैया के लिए अत्यंत पवित्र फल) हैं। जब तोता अनजाने और लापरवाही मे फल को जूठा कर देता है, तो सूर्य देव के क्रोध से वह मूर्छित हो जाता है, और उसकी मादा (सुगनी) सूर्य देव से क्षमा प्रार्थना करती है। उसी तरह छठी मॉं हम सभी के अनजाने मे किये दोषों को क्षमा करें। यह गीत छठ पर्व में अपरिमित शुद्धता के नियम को सिखाता है। पूजा का प्रसाद बनने से लेकर अर्घ्य देने तक, कोई भी वस्तु पक्षियों या पशुओं द्वारा जूठी नहीं होनी चाहिए।
गीत"कांचन थार सजइली हो, माई मोरी छठ मैया..." छठी मैया के ममतामयी रूप का गुणगान करता है। इसमें व्रती अपनी मनोकामनाएं (जैसे पति की लंबी आयु, पुत्र की रक्षा, घर में सुख-समृद्धि) एक बेटी की तरह अपनी मां (छठी मैया) के सामने रखती है।छठ के गीतों में अमूमन पुरुष प्रधान समाज के बंधनों से अलग, घर की महिलाएं पूरे अनुष्ठान की धुरी होती हैं। वे ही गीत गाती हैं, वे ही आदेश देती हैं और पुरुष उनके सहायक के रूप में काम करते हैं। यह सच्चे अर्थों मे नारी सशक्तिकरण का द्योतक है।
बीते पांच छ: दशकों से काशी में डालाछठ का महत्व बढ़ता जा रहा है। इक्कीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों से काशी ने इस महापर्व को अपने मे समाहित कर लिया है। काशी अनादि काल से भगवान शिव के साथ-साथ भगवान सूर्य की भी पूजा होती रही है। काशीखंड के अनुसार, काशीखंड (स्कंद पुराण) के अनुसार, काशी केवल भगवान शिव की त्रिशूल पर टिकी नगरी ही नहीं है, बल्कि यह सूर्य देव का प्रधान निवास स्थान भी है। जब भगवान शिव मंदराचल पर्वत चले गए थे, तब सूर्य देव ने काशी को अपने तेज से आलोकित रखा था। काशी में बारह अलग-अलग रूपों में सूर्य देव विराजमान हैं, जिन्हें द्वादश आदित्य कहा जाता है। डाला छठ (सूर्य षष्ठी) के व्रत में इन पीठों का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है:
यहाँ द्वादश (12) आदित्य पीठ स्थापित हैं (जैसे लोलार्क आदित्य, द्रुपद आदित्य आदि), जो इस बात का प्रमाण हैं कि काशी में सूर्य पूजा की जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। काशी में सदियों से कार्तिक और भाद्रपद के महीनों में 'सूर्य षष्ठी' (लोलार्क षष्ठी) पर सूर्य उपासना और जल कुंडों में स्नान की एक स्वतंत्र, वैदिक परंपरा रही है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और ग्रंथों के अनुसार, काशी में प्राचीन काल में गहड़वाल राजवंश के समय भी सूर्य षष्ठी के अवसर पर विशेष राजकीय सूर्य पूजा का आयोजन गंगा के विभिन्न घाटों पर किया जाता था। प्राचीन काशी में यह पूजा मुख्य रूप से केवल कठिन वैदिक मंत्रोच्चार और गंगा स्नान तक ही सीमित थी।
वर्तमान रूप में मनाई जाने वाली "डाला छठ" पूजा की आधुनिक शुरुआत के पीछे ऐतिहासिक संस्मरणों के अनुसार, काशी में इस व्यापक रूप की शुरुआत तब हुई बीसवीं सदी के मध्य जब काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह का विवाह छपरा (बिहार) की राजकुमारी महारानी कुंवारी देवी से हुआ था। महारानी ने काशी (रामनगर) आकर अपने मायके की लोक परंपरा के अनुसार गंगा किनारे छठ पर्व मनाने की इच्छा प्रकट की। इसके बाद राजपरिवार के संरक्षण में रामनगर और वाराणसी के घाटों पर यह लोक-उत्सव स्थानीय स्तर पर तेजी से लोकप्रिय होने लगा। पिछले पांच छ: दशकों में जब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश (भोजपुर क्षेत्र) के लोग शिक्षा, व्यापार और रोजगार के सिलसिले में बड़ी संख्या में आकर काशी में बसे, तब यह पर्व एक सीमित पारिवारिक अनुष्ठान से निकलकर काशी के घाटों का सबसे भव्य सामूहिक महापर्व बन गया।
आज, वर्ष 2026 में, काशी की डाला छठ पूजा अपने आप में एक वैश्विक आकर्षण और सांस्कृतिक समागम का अनूठा उदाहरण बन चुकी है।पूर्व में पूजा केवल दशाश्वमेध, अस्सी और रामनगर घाट तक सीमित थी अब न्यायघाट से लेकर नमो घाट तक के सभी 84+ गंगा घाट और शहर के सैकड़ों तालाब (जैसे सूर्यकुंड, लोलार्क कुंड) पूरी तरह व्रतियों से भर जाते हैं। पहले केवल भोजपुरी भाषी या बिहार मूल के परिवारों तक सीमित था परंतु अब मूल बनारसी, मारवाड़ी, बंगाली और यहाँ तक कि काशी में रहने वाले विदेशी सैलानी भी इस पर्व की शुद्धता से प्रभावित होकर घाटों पर शामिल होते हैं।
काशी में डाला छठ का वर्तमान स्वरूप यह दर्शाता है कि यह महापर्व न केवल अपनी पौराणिक शुद्धता को अक्षुण्ध रखे हुए है, बल्कि यह बनारसीपन और लोक आस्था का ऐसा संगम बन चुका है जहाँ गंगा की लहरें, अस्ताचल और उदीयमान सूर्य की किरणें मिलकर पूरी मानवता को एक सूत्र में पिरो देती हैं।
काशी, शरद पूर्णिमा, 25अक्टूबर 2026,रविवार
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