काशी की सांस्कृतिक चेतना का महाउत्सव: देव दीपावली
*व्योमेश चित्रवंश
बनारस, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनंदकानन, रुद्रवास और काशी—ये केवल एक नगर के भौगोलिक नाम नहीं हैं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस शाश्वत चेतना के प्रतीक हैं जो समय की सीमाओं से परे है। काशी के विषय में कहा जाता है कि यह सीधे भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है, जिसका अर्थ है कि यह लौकिक प्रलय और सृष्टि के चक्रों से अप्रभावित, कालजयी नगरी है। "न वै पश्यामि लोकेऽस्मिन् काशीसदृशमीदृशम्। यत्र विश्वेश्वरः साक्षात् तारकं प्रददाति च॥"— स्कंद पुराण (काशी खंड) (अर्थात्: इस संपूर्ण लोक में काशी के समान कोई दूसरी नगरी नहीं है, जहाँ स्वयं विश्वनाथ साक्षात् तारक मंत्र देकर जीवों को मोक्ष प्रदान करते हैं।)
काशी की विशिष्टता केवल उसके प्राचीन होने में नहीं है। उसकी विशिष्टता इस बात में भी है कि वह अपनी पुरानी परंपराओं को नए सामाजिक संदर्भों में अभिव्यक्त करती रहती है।
इसी नगरी के हृदयस्थल, यानी गंगा के अर्धचंद्राकार घाटों पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन जो अद्भुत दृश्य उभरता है,आकाश में पूर्णता बिखेरते चांदनी रात में गंगा के दोनों ओर दीपों की पंक्तियाँ दिखाई देती हैं, तब उस नयनाभिराम दृश्य को केवल रोशनी का उत्सव कहना पर्याप्त नहीं है। वह श्रद्धा, स्मृति, कला, इतिहास और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का संगम है।उसे हम 'देव दीपावली' के नाम से जानते हैं। यह केवल दीपों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह दृश्य जगत और अदृश्य देवलोक के एकाकार होने का महापर्व है। जब कार्तिक की शीतल रात्रिकालीन बेला में काशी के ८४ घाट लाखों-करोड़ों दीपकों की कतारों से जगमगा उठते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश गंगा स्वयं उतरकर महादेव की नगरी के चरणों में लोट रही हो। देव दीपावली वास्तव में अध्यात्म, लोक-संस्कृति, इतिहास और आधुनिक पर्यटन का एक ऐसा अनुपम संगम है, जो संपूर्ण विश्व में केवल और केवल काशी में ही संभव है। सनातन धर्म में कार्तिक मास को सर्वश्रेष्ठ और परम पवित्र मास माना गया है। भगवान विष्णु का यह प्रिय मास आत्म-शुद्धि, तप और साधना का काल है। स्कंद पुराण के अनुसार, पूरे कार्तिक मास में आकाशदीप जलाने और नदी तट पर दीपदान करने का विधान है, लेकिन कार्तिक पूर्णिमा इसका चरमोत्कर्ष है। काशी में गंगा का स्वरूप विशिष्ट है; यहाँ गंगा उत्तरवाहिनी हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि से जीवात्मा के ऊर्ध्वगमन (मोक्ष की ओर प्रगति) का प्रतीक हैं। देव दीपावली के दिन उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर दीपदान करने का महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है। दार्शनिक दृष्टिकोण से, दीपक की लौ अंधकार पर प्रकाश की, अज्ञान पर ज्ञान की और असत्य पर सत्य की विजय का सूचक है। मिट्टी का छोटा सा दीपक जब गंगा की लहरों पर तैरता है, तो वह मानव जीवन की नश्वरता और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। मान्यता है कि इस रात्रि को स्वयं ३३ कोटि देवी-देवता अदृश्य रूप से काशी के घाटों पर उपस्थित होकर मां गंगा की आरती करते हैं और दीपदान करने वाले भक्तों को सुख, समृद्धि और मोक्ष का आशीर्वाद प्रदान करते हैं
"कार्तिके त्रिपुरी पूर्णिमा सर्वपापप्रणाशिनी। तस्यां यत् क्रियते दानं तदक्षय्यं भवेद्भुवि॥"
— पद्म पुराण (अर्थात: कार्तिक मास की त्रिपुरी पूर्णिमा समस्त पापों का नाश करने वाली है, और इस दिन पृथ्वी पर जो भी दान या दीपदान किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है।)
कार्तिक पूर्णिमा को ही देव दीपावली मनाये जाने के पीछे धार्मिक, पौराणिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक मान्यता भी है। सनातन धर्म में कार्तिक मास को सर्वश्रेष्ठ और परम पवित्र मास माना गया है। भगवान विष्णु का यह प्रिय मास आत्म-शुद्धि, तप और साधना का काल है। काशी में गंगा का स्वरूप विशिष्ट है; यहाँ गंगा उत्तरवाहिनी हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि से जीवात्मा के ऊर्ध्वगमन (मोक्ष की ओर प्रगति) का प्रतीक हैं। देव दीपावली के दिन उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर दीपदान करने का महत्व अनंत गुना बढ़ जाता है। दार्शनिक दृष्टिकोण से, दीपक की लौ अंधकार पर प्रकाश की, अज्ञान पर ज्ञान की और असत्य पर सत्य की विजय का सूचक है। मिट्टी का छोटा सा दीपक जब गंगा की लहरों पर तैरता है, तो वह मानव जीवन की नश्वरता और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।"कीटाः पतंगा मशकाश्च वृक्षायो जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः। दृष्ट्वा प्रदीपं न च जन्मभागिनो भवन्ति नित्यं श्वपचा हि विप्राः॥"— स्कंद पुराण (अर्थात्: दीपदान के समय जो भी कीट, पतंगे, जीव, पशु या वनस्पति उस पवित्र प्रकाश का दर्शन करते हैं, वे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।)
देव दीपावली की जड़ें सनातनी पुराणों में अत्यंत गहरी हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण (काशी खंड) और मत्स्य पुराण में इस दिन की महिमा को 'त्रिपुरोत्सव' या 'त्रिपुरी पूर्णिमा' के रूप में वर्णित किया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर के तीन शक्तिशाली पुत्रों—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली (जिन्हें सम्मिलित रूप से 'त्रिपुरासुर' कहा जाता था)—ने ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उन्हें केवल ऐसा कोई संहार कर सकता है जो एक ही बाण से उनके तीनों उड़ने वाले पुरों (नगरों) को एक साथ नष्ट कर दे। इस वरदान के अहंकार में त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया, देवताओं को उनके स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और धर्म का समूल नाश करने पर उतारू हो गए। तब समस्त देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली। महादेव ने देवताओं के तेज से एक भव्य रथ तैयार किया, जिसके पहिए सूर्य और चंद्रमा थे, हिमालय धनुष बना और स्वयं वासुकी नाग प्रत्यंचा बने। महादेव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन अत्यंत रौद्र रूप धारण कर 'त्रिपुरारी' अवतार लिया और एक ही अमोघ बाण से तीनों असुरों के पुरों को भस्म कर दिया। इस महाविजय से त्रिलोकी भयमुक्त हुई और देवताओं ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए महादेव की प्रिय नगरी काशी में आकर दीप जलाए। तभी से इस दिन को देवताओं की दीपावली यानी 'देव दीपावली' कहा जाने लगा।
काशी महात्म्य में कार्तिक पूर्णिमा के दिन 'पंचनद तीर्थ' (वर्तमान पंचगंगा घाट) का स्थान सर्वोपरि है। यहाँ पाँच पवित्र नदियाँ—गंगा, यमुना, सरस्वती, किरणा और धूतपापा—गुप्त रूप से मिलकर महादेव की आराधना करती हैं। देव दीपावली का ऐतिहासिक और धार्मिक आरंभ इसी पंचगंगा घाट से माना जाता है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पंचगंगा घाट पर स्नान करने और वहां स्थापित 'हजारा दीपक' (एक विशेष स्तंभ जिस पर एक साथ हजारों दीप जलाए जाते हैं) का दर्शन करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। मध्यकाल में महान संत कबीरदास, गुरु नानक देव और गोस्वामी तुलसीदास ने भी काशी के इसी महात्म्य को अपनी साधना का केंद्र बनाया था। काशी में इस दिन किए जाने वाले महास्नान को 'कार्तिक स्नान' कहा जाता है, जिसके लिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु भोर की पहली किरण से पूर्व ही घाटों पर उमड़ पड़ते हैं। यह विश्वास है कि काशी में इस दिन प्राण त्यागने वाले या केवल दीपदान करने वाले जीव को यमराज के पाश से मुक्ति मिल जाती है और वह सीधे शिवलोक को प्राप्त होता है।
यद्यपि देव दीपावली का मूल पौराणिक काल से जुड़ा है, परंतु इसे एक वृहद् सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय मध्यकाल और उत्तर-मध्यकाल के शासकों को जाता है। विशेष रूप से इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने जब काशी के घाटों और विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, तब उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा पर घाटों को दीपों से सजाने की परंपरा को राजकीय संरक्षण दिया। घाटों का वर्तमान स्थापत्य और देव दीपावली का मध्यकालीन वैभव पूरी तरह से ऐतिहासिक है। १७वीं और १८वीं शताब्दी में मुग़ल आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद, मराठा साम्राज्य ने इन घाटों का पुनरुत्थान किया। १७४० ईस्वी में पेशवा बालाजी बाजीराव ने दशाश्वमेध घाट का पक्का निर्माण कराया। वहीं, इंदौर की परोपकारी महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने १७७५ से १७८० के बीच पंचगंगा घाट और विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। अहिल्याबाई होल्कर ने ही कार्तिक पूर्णिमा पर 'पंचगंगा घाट' पर विशाल 'हजारा दीप-स्तंभ' (पाषाण का स्तंभ जिसमें एक साथ एक हजार दीपक जलते हैं) की पुनः स्थापना कराई और राजकीय कोष से प्रतिवर्ष दीपदान का ऐतिहासिक नियम बनाया, जो आज भी अनवरत जारी है। इसके साथ ही काशी के वर्तमान राजपरिवार ने इस उत्सव को एक नया आयाम प्रदान किया। महाराजा उदित नारायण सिंह और उनके परवर्ती शासकों ने कार्तिक पूर्णिमा पर रामनगर के किले से लेकर काशी के मुख्य घाटों तक लाखों दीप जलाने की व्यवस्था की। राजाओं के हाथी, घोड़े और सैनिक इन घाटों पर मार्च करते थे, और गंगा की लहरों पर भव्य बजरे (शाही नावें) तैरती थीं। मराठों, सिंधिया और होल्करों के काल में निर्मित पक्के घाटों की स्थापत्य कला ने इन दीपों के प्रकाश को एक प्राकृतिक रंगमंच प्रदान किया, जिससे यह लोक-उत्सव एक दिव्य पर्व में बदल गया।
आधुनिक काल में, २०वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देव दीपावली को जन-आंदोलन का रूप देने में काशी के नागरिकों और स्वैच्छिक संस्थाओं ने अद्भुत भूमिका निभाई। वर्ष १९८५-८६ के आस-पास, पंचगंगा घाट पर 'केंद्रीय देव दीपावली समिति' के माध्यम से हम जैसे कुछ उत्साही युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने नारायण गुरू के नेतृत्व मे इस परंपरा को पुनः पुनर्जीवित किया। प्रारंभ में केवल पंचगंगा घाट पर कुछ हजार दीपों से शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे जन-आंदोलन बन गई। काशी के हर घाट के युवाओं ने अपनी-अपनी 'घाट समितियां' बनाईं। देखते ही देखते, असि घाट से लेकर राजघाट तक के सभी प्रमुख घाटों पर रहने वाले नाविकों, पंडों, व्यापारियों और आम गृहस्थों ने इसे अपनी अस्मिता से जोड़ लिया। महिलाएं दिनभर मिट्टी के दीयों में तेल और बत्ती लगाती हैं, और युवा संध्या समय उन्हें क्रमबद्ध तरीके से घाट की सीढ़ियों पर सजाते हैं। यह पूर्णतः एक 'लोकोत्सव' है, जहाँ सरकार केवल एक सहयोग की भूमिका में होती है, जबकि वास्तविक संचालन काशी की जनता के हाथों में होता है।
आज, २१वीं सदी में काशी की देव दीपावली एक वैश्विक ब्रांड बन चुकी है। अब दीपों की संख्या हजारों से बढ़कर लाखों और करोड़ों में पहुंच चुकी है। अब यह श्रृंखला पूरब मे नमो घाट से लेकर पश्चिम मे न्याय घाट तक विस्तृत हो चुकी है। संपूर्ण अर्धचंद्राकार घाट श्रृंखला (लगभग ८ किलोमीटर लंबा तट) एक ही समय में प्रकाशमान हो उठती है। दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट और राजेंद्र प्रसाद घाट,अस्सी घाट पर होने वाली 'महाआरती' इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होती है, जहाँ रिद्धि-सिद्धि के रूप में कन्याएं और अर्चक वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विशाल दीप-शिखाओं से गंगा की आरती करते हैं। चेत सिंह घाट के ऐतिहासिक किले पर होने वाला 'लेजर शो' और 'लाइट एंड साउंड शो' प्राचीन संस्कृति और आधुनिक तकनीक का एक विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है। भारत के प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित विश्वभर के राजनयिक, राष्ट्राध्यक्ष और लाखों विदेशी पर्यटक इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए महीनों पहले ही बनारस के होटलों और नावों की बुकिंग कर लेते हैं। गंगा की बीच धारा से जब घाटों की ओर देखा जाता है, तो ऐसा लगता है मानो पृथ्वी पर स्वर्ण नगरी अवतरित हो गई हो।
देव दीपावली केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकात्मता का साक्षात दर्शन है। इस दिन काशी के घाटों पर देश के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए 'आकाशदीप' जलाए जाते हैं और 'कारगिल शौर्य स्तंभ' पर सेना के जवानों को सम्मानित किया जाता है, जो राष्ट्रभक्ति और अध्यात्म के मिलन को दर्शाता है। हालाँकि, इस बढ़ते वैश्विक स्वरूप के साथ कुछ चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। अत्यधिक भीड़ के कारण घाटों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, गंगा में नावों से होने वाला प्रदूषण और उत्सव के व्यावसायिकरण ने इसकी मूल आध्यात्मिक शांति को कुछ हद तक प्रभावित किया है। भविष्य में आवश्यकता इस बात की है कि हम पर्यटन और विकास के साथ-साथ इस पर्व की अंतर्निहित पवित्रता, सात्विकता और पौराणिक मान्यताओं को अक्षुण्ण बनाए रखें।भविष्य में आवश्यकता इस बात की है कि हम पर्यटन और विकास के साथ-साथ इस पर्व की अंतर्निहित पवित्रता, सात्विकता और पौराणिक मान्यताओं को अक्षुण्ण बनाए रखें। काशी की देव दीपावली विश्व को यह संदेश देती है कि चाहे अंधकार कितना भी सघन क्यों न हो, सामूहिक संकल्प का एक-एक दीपक मिलकर ब्रह्मांड को आलोकित कर सकता है जो हमारी सनातन संस्कृति की अमरता का उद्घोष है।
काशी, महानवमी, शारदीय नवरात्रि,संवत 2083वि0
18अक्टूबर,2026 रविवार
http://chitravansh.blogspot.com
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
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सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
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