शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 फरवरी 2020
       बहुमुखी प्रतिभा की धनी , भरतनाट्यम  कलाकार अपनी छोटी बहन जैसी प्रतिभा श्रीवास्तव की उपन्यासिका The Peaceful Chaos पढ़ने को मिली। आज के भौतिकवादी भागते दौड़ते माहौल और तुरत फुरत रिश्तो को कैश करा लेने वाले माहौल मे कालेज जीवन के रूमानी प्यार पर बेहद मर्मस्पर्शी लिहाज से कहानी को पिरोया है प्रतिभा ने। यह उनकी पहली किताब है, पर स्टोरी प्लाट का चयन, साफ सुथरे शब्दों का प्रयोग और प्रेमकहानी मे निस्वार्थ भावनात्मक दोस्ती को आधार पर लिखी कहानी प्रतिभा के अंदर छुपे गंभीर लेखक का परिचय कराती है। हालॉकि एक झूठे बहाने को ले कर शुरू हुये कहानी जो अंत मे उसे दूसरे पक्ष के सच मे बदल देती है पर थोड़ी और मेहनत की जरूरत थी, मुझे लगता है कि यदि लेखिका ने इसे उपन्यासिका बनाने के बजाय घटनाओं को विस्तार देते हुये उसे उपन्यास का रूप दिया होती तो संभवतः ज्यादा सफल होती। जतिन और आशी के दोस्ती की यह कहानी उनके आपसी मोहब्बत के एहसास के साथ ही परिस्थितिवश समाप्त हो जाती है, बल्कि मै कहूँ कि समाप्त कर दी गई तो गलत नही होगा। पर जिन बुनियादी सवालातों को लेकर इस प्रेमकहानी का अंत बताया गया वह मेरे गले के नीचे सामान्यत: नही उतरती। एक कालेज मे पढ़ने वाले आज के मोबाईल जमाने मे जाति को न जानने का सवाल, फिर कहानी के पीक प्वाइंट पर आशी के बाबा दादी के महत्वपूर्ण भूमिका के बाद उनका एकाएक कहानी से ओझल हो जाना, रेल भगदड़ मे गुम होने वाली पढ़ी लिखी कालेज गर्ल का बलात्कार के पश्चात अस्पताल मे रहने के दौरान कोई पहचान नही होना, गुमशुदगी की एफआईआर के बावजूद पूरी कहानी से पुलिस कीकोई भूमिका मही होना,आशी का गुमनामी मे  गॉव जा कर वापस आ जाना और अस्पताल मे कहानी का अंत कहीं न कहीं मन मे  सवाल खड़े करते है। लगता है कि जल्दबाजी और पहली बार के लेखकीय उत्साह में सब कुछ बड़ी तेजी से समेट दिया है लेखिका ने।
उपन्यासिका के अंत मे प्रतिभा ने कुछ वाजिब सवाल उठाये है आज के समाज यानि हमसे और आपसे, जो मौजूं ही नही जरूरी है जिन पर हमे सौचना होगा, अगर अभी तक नही सोचा तो सोचना पड़ेगा नही तो यूँ ही जतिन और आशी जैसे सरल और साफगोई से जीने वाले लोग सामाजिक बंधनों के इस अबूझ आत्मघाती चक्की मे पीसे जाते रहेगें।
नवोदित लेखिका के रूप मे प्रतिभा सराहना व बधाई की पात्र है, मनोवैज्ञानिक व भावनात्मक तरीके से उनकी उपन्यासिका पठनीय व प्रशंसनीय है।
(बनारस, शिवरात्रि, 21 फरवरी 2020, शुक्रवार)
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#किताबें मेरी दोस्त , #व्योमवार्ता
#ThePeacefulChaos

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना  ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

                  पिछले सप्ताह अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के मित्र ओम प्रकाश राय यायावर का उपन्यास काशी टेल पढ़ा। इस किताब को पढ़ने की काफी दिनों से ईच्छा रहने के बावजूद किन्ही न किन्ही कारणों से यह पढ़ने से छूट जा रही थी। हालॉकि ओम प्रकाश जी ने भी इसके लिये एक बार उलाहना दे डाला, सो अबकी बार किताब उठाई तो पूरा पढ़ने के बाद ही दूसरे काम हाथ मे लिया। फिर किताब के बारे मे सोचते हुये लिखने मे देर हो गई। बहरहाल आज इस काम को भी पूरा करने का मन मिजाज बना के बैठा हूँ। ओम प्रकाश राय बिहार से बनारस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने आये तो औरों की तरह हमारी सर्व विद्या की राजधानी ने दोनो बॉहें फैलाये इन्हे स्वीकार कर लिया अभी वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे ही उच्च अध्ययनरत हैं।बनारस टेल इसी बीएचयू के शिक्षा संकाय की कथा है जिसमे बड़े बेबाकी से आज कल बीएड करने वाले छात्रों के मनस्थिति व परिस्थिति को दिखाते हुये यात्रा करती है, बिहार से  आये निहाल पाणे के साथ, तो रामनगर की आईपीएस मुस्लिम पिता व हिन्दू मॉ की पुत्री सदफ के साथ कमच्छा से गोदौलिया तक, रामनगर सामनेघाट से लंका तक, रेवड़ी तालाब के जय नारायण इंटर कालेज के खाली बीरान मैदान से दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर  चढ़ते उतरते ,बीएचयू की अमराईयों मे टहलते हुये सेण्ट्रल आफिस तक।
कभी सिविलसर्विस और पीसीएस के रिजल्ट मे अपना बड़ा सा घेरा बनाने वाले आक्सफोर्ड आफ ईस्ट के शहर कहे जाने वाले ईलाहाबाद अब प्रयागराज मे पीसीएस की तैयारी करने वाला बिहारी निम्न मध्यवर्गीय आय वाले परिवार का लड़का निहाल पाण्डेय, अपने पिता की उलाहनाओं से अाजिज आकर एक सिक्योर्ड नैकरी मास्टरी के  लिये बीएड करने  बीएचयू  आ जाता है। वहॉ उसकी मुलाकात उच्च आयवर्गीय मुस्लिम परिवार की सदफ से होती है। पहली मुलाकात के बाद दोनो के बीच दोस्ती से थोड़ा बढ़ कर मधुर रिश्ता बन जाता है। चंचल शोख सदफ के संगत मे अपने मे सिमटे रहने वाला निहाल भरपूर कालेज जीवन के दोस्ती का लुत्फ उठाने लगते है। इस दोस्ती ईश्क मोहब्बत के साथ साथ हास्टल जीवन की चुहलबाजिया, बदमासियॉ और बिन्दास अंदाज किताब की रोचकता को जीवन्त करते हैं। कहानी मे ठहराव आता है तो कहानी हाथ से फिसलती जान पड़ती है पर फिर से बिहार के अपने गॉव मे स्कूली शिक्षा मे अलख जगाने की कोशिश कर रहे निहाल पाणे बाबा कहानी के छोर को थाम लेते है।
कुल मिला कर ओम प्रकाश राय ने कथा को रोचक बनाने मे कोई कसर नही छोड़ा है और जो लोग बनारस, पश्चिम बिहार के भूगोल, और संस्कृति से परिचित है उनके लिये कहानी से जुड़ाव व अपनापन लगना स्वाभाविक है। बनारस टेल बेहतरीन कोशिश है इधर आये बनारस , बीएचयू, बिहार से जुड़े उपन्यासों की कड़ी में।
(बनारस, 18फरवरी,2020, मंगलवार)
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#किताबें मेरी दोस्त
#व्योमवार्ता

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम और हमारे विधायक जी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11 फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम और हमारे विधायक जी : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 11 फरवरी 2020

#मेराघर बनारस शहर उत्तरी मे है,

#बिजली का भारीभरकम बिल हम भरते है पर विधायक जी ने खंभो पर स्विच तार लटकवा के स्ट्रीट लाईट के लिये पिछले तीन साल से आश्वासन देते रहे पर आज तक उन खंभो पर स्ट्रीट लाईट नही लगी। विधायक जी क कहने पर नगर निगम द्वारा यह बताया गया कि बजट आने पर खंभो पर बिजली के लट्टू भी टंग जायेगें पर लट्टू को टंगने को कौन कहे उन खंभो के अंधेरे तलेे दो बेजुबान पशुओं एक साड़ व एक भैंस की मृत्यु हो गई, कमाल है कि कि अखिलेश सरकार के आखिरी समय मे कम हुआ बजट आज तक नही आ सका।

#पानी अभी भी हमारे यहॉ सुबह शाम मल्टीकलर मे आता है कभी पीला, कभी मटमैला, कभी हल्की लालिमा लिये हुये,और कभी कभी तो वह सुगंधित तो कभी दुर्गंधित। शिकायत नगरनिगम की चौकी से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक मेरे मोहल्ले वालों ने किया। पर आज भी हम लोग मल्टीकलर्ड और गंधयुक्त पानी पेयजल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। जबकि विधायक जी का यह दूसरा कार्यकाल है।

#सीवर के बारे मे कहना ही क्या? इसे अखिलेश सरकार की महानता कहे कि सरकारी पैसे की बर्बादी। आज तक वरूणापार वाले समझ ही नही पाये कि सीवर उनके लिये बन रहा है या वे सीवर के लिये ही बने हैं। सीवर की टूटी फूटी पाईप तो डाल दी गई पर उसे मेन लाईन से जोड़ा ही नही गया। जोड़ते भी कैसे जब अब तक यही तय नही हो पाया कि मेनलाईन का डाऊनफ्लो कहॉ होगा? हर दिन किसी न किसी सड़क पर लाल पीले फाईबर के बैरिकेट खड़े कर लाल पीले ग्लो साईन कलर वाले कपड़े पहने दो चार आदमी क्या काम करते है , मुझे नही लगता होगा कि उन्हे भी पता होगा। विधायक जी पिछले कार्यकाल मे तो सारा ठीकरा  सपा सरकार और उसकी नीतियों व ठीकेदारी मे भागीदारी सिस्टम को कोसा करते थे। इस कार्यकाल मे वे सीवर जैसी समस्या पर बोलना अपने सम्मान के विरूद्ध समझने लगे और मंत्री बनने के बाद तो क्षेत्र मे सीवर समस्या कहीं उनके एजेण्डे मे दूर दूर तक नही हैं।

#सड़क के मामले मे वरूणापार हमेशा से बद किस्मत रहा। अखिलेश के जमाने मे  किसी वीवीआईपी मूवमेंट के ठीक पहले चटपट छर्री डाल काला कर के अपनी भूमिका पूरी कर ली जाती थी। भला हो मोदी जी का, जो प्रवासी भापतीय सम्मेलन और टीएफसी के नाम पर कुछ सड़को को चलने फिरने व देखने लायक बना दिया। पर आज सीवर, बिजली,पानी के नाम पर ज्यादातर सड़के खुदी हुई हैं।

#सबकासाथसबकाविकास को अपना आधारवाक्य बीजेपी भले मानती हो पर हमारे विधायक, सारी! मंत्री जी नही मानते। उनके द्वारा जो भी कार्य कराये जा रहे है वह सबके लिये नही बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये होती है। नवलपुर मे तुलसीविहार, शिवपुर मे दुर्गा विहार जैसी कालोनियॉ इसी तरह की उदाहरण है। शायद मंत्री जी को भरोसा हो कि बाकी जगहों के वोट तो उनकी थाती है जो मजबूरन कहीं भटक कर कहीं नही जाने वाले।

यह बातें मै बार बार क्यों सोच कहा हूँ पता नहीं, क्योंकि मुझे अपने विधायक , सारी! मंत्री जी से अब कोई उम्मीद नही है, क्योंकि अब तक हम लिखत पढ़त मौखिक रूप से उनसे कई कई बार आश्वासन पा कर निराश हो चुके हैं। पर शायद #दिल्ली के चुनाव परिणामों को देख कर मै बार बार अपने क्षेत्र के #भाजपा विधायक जी की तुलना पुन: जीते हुये प्रत्याशियों से जाने क्यों करने लगा हूँ।
(बनारस, ११फरवरी २०२०, मंगलवार)
#मेराघर बनारस शहर उत्तरी मे है,

#बिजली का भारीभरकम बिल हम भरते है पर विधायक जी ने खंभो पर स्विच तार लटकवा के स्ट्रीट लाईट के लिये पिछले तीन साल से आश्वासन देते रहे पर आज तक उन खंभो पर स्ट्रीट लाईट नही लगी। विधायक जी क कहने पर नगर निगम द्वारा यह बताया गया कि बजट आने पर खंभो पर बिजली के लट्टू भी टंग जायेगें पर लट्टू को टंगने को कौन कहे उन खंभो के अंधेरे तलेे दो बेजुबान पशुओं एक साड़ व एक भैंस की मृत्यु हो गई, कमाल है कि कि अखिलेश सरकार के आखिरी समय मे कम हुआ बजट आज तक नही आ सका।

#पानी अभी भी हमारे यहॉ सुबह शाम मल्टीकलर मे आता है कभी पीला, कभी मटमैला, कभी हल्की लालिमा लिये हुये,और कभी कभी तो वह सुगंधित तो कभी दुर्गंधित। शिकायत नगरनिगम की चौकी से लेकर मुख्यमंत्री पोर्टल तक मेरे मोहल्ले वालों ने किया। पर आज भी हम लोग मल्टीकलर्ड और गंधयुक्त पानी पेयजल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। जबकि विधायक जी का यह दूसरा कार्यकाल है।

#सीवर के बारे मे कहना ही क्या? इसे अखिलेश सरकार की महानता कहे कि सरकारी पैसे की बर्बादी। आज तक वरूणापार वाले समझ ही नही पाये कि सीवर उनके लिये बन रहा है या वे सीवर के लिये ही बने हैं। सीवर की टूटी फूटी पाईप तो डाल दी गई पर उसे मेन लाईन से जोड़ा ही नही गया। जोड़ते भी कैसे जब अब तक यही तय नही हो पाया कि मेनलाईन का डाऊनफ्लो कहॉ होगा? हर दिन किसी न किसी सड़क पर लाल पीले फाईबर के बैरिकेट खड़े कर लाल पीले ग्लो साईन कलर वाले कपड़े पहने दो चार आदमी क्या काम करते है , मुझे नही लगता होगा कि उन्हे भी पता होगा। विधायक जी पिछले कार्यकाल मे तो सारा ठीकरा  सपा सरकार और उसकी नीतियों व ठीकेदारी मे भागीदारी सिस्टम को कोसा करते थे। इस कार्यकाल मे वे सीवर जैसी समस्या पर बोलना अपने सम्मान के विरूद्ध समझने लगे और मंत्री बनने के बाद तो क्षेत्र मे सीवर समस्या कहीं उनके एजेण्डे मे दूर दूर तक नही हैं।

#सड़क के मामले मे वरूणापार हमेशा से बद किस्मत रहा। अखिलेश के जमाने मे  किसी वीवीआईपी मूवमेंट के ठीक पहले चटपट छर्री डाल काला कर के अपनी भूमिका पूरी कर ली जाती थी। भला हो मोदी जी का, जो प्रवासी भापतीय सम्मेलन और टीएफसी के नाम पर कुछ सड़को को चलने फिरने व देखने लायक बना दिया। पर आज सीवर, बिजली,पानी के नाम पर ज्यादातर सड़के खुदी हुई हैं।

#सबकासाथसबकाविकास को अपना आधारवाक्य बीजेपी भले मानती हो पर हमारे विधायक, सारी! मंत्री जी नही मानते। उनके द्वारा जो भी कार्य कराये जा रहे है वह सबके लिये नही बल्कि कुछ विशेष क्षेत्रों के लिये होती है। नवलपुर मे तुलसीविहार, शिवपुर मे दुर्गा विहार जैसी कालोनियॉ इसी तरह की उदाहरण है। शायद मंत्री जी को भरोसा हो कि बाकी जगहों के वोट तो उनकी थाती है जो मजबूरन कहीं भटक कर कहीं नही जाने वाले।

यह बातें मै बार बार क्यों सोच कहा हूँ पता नहीं, क्योंकि मुझे अपने विधायक , सारी! मंत्री जी से अब कोई उम्मीद नही है, क्योंकि अब तक हम लिखत पढ़त मौखिक रूप से उनसे कई कई बार आश्वासन पा कर निराश हो चुके हैं। पर शायद #दिल्ली के चुनाव परिणामों को देख कर मै बार बार अपने क्षेत्र के #भाजपा विधायक जी की तुलना पुन: जीते हुये प्रत्याशियों से जाने क्यों करने लगा हूँ।
(बनारस, ११फरवरी २०२०, मंगलवार)
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सोमवार, 27 जनवरी 2020

व्योमवार्ता / डॉ० राजीव मिश्रा की किताब विषैला वामपंथ, जिसे बहुत पहले प्रकाशित होना चाहिये था : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 जनवरी 2020

व्योमवार्ता /विषैला वामपंथ, जिसे बहुत पहले प्रकाशित हो कर पढ़ना चाहिये था : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27जनवरी 2020

                    मुखपुस्तिका(फेसबुक) की हमारी साहित्यकार मित्र अभिधा शर्मा के जनवरी 2020 के दिल्ली पुस्तक मेला के दौरान अति उत्सुकता से खोजी गई और न मिलने पर किसी भी मित्र से इस पुस्तक विषैला वामपंथ को उपलब्ध कराये जाने हेतु निवेदन ने मेरा ध्यान इस की तरफ आकर्षित किया। पुस्तक के बारे मे अभिधा की यह जानकारी कि अभी नवम्बर मे पहली बार प्रकाशित और उसके एक माह के अंदर दिसंबर मे दुबारा मुद्रित होने के बावजूद किताब की अनुपलब्धता ने इस आकर्षण को और तीब्र कर दिया। फिर अभिधा के ही पोस्ट पर आये टिप्पणियाँ मे ही किसी ने बताया कि अमेजन पर किताब आ चुकी है। लगे हाथ हमने भी आनन फानन मे किताब को मंगाने हेतु आर्डर बुक कर दिया। किताब आने के बाद जब पढ़ना प्रारंभ किये तो लगा कि हम अभी तक वामपंथ के बनाये छलावे और भूलाये मे ही जी रहे थे। और अपनी आँखों को खुली रखने के बावजूद वही देख रहे थे जो हमे किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिये साजिसन दिखाया जा रहा था।   डॉ० राजीव मिश्रा के छप्पन लेखों के इस बेहतरीन संकलन को पढ़ने से कहीं अधिक गुनते हुये यह कसिस रही कि इस किताब को तो बहुत पहले प्रकाशित होना और पढ़ा जाना चाहिये था ताकि यूटोपिया मे जीने की कल्पना करने वाली अपनी संस्कृति व परंपरा से विमुख हो कर कथित नैरेटिव्स के पीछे भाग रही युवा पीढ़ी को कभी न मिलने वाली मंजिल की सच्चाई और वास्तविकता तो पता हो जाती।
     किताब के बारे में जैसा राजीव स्वयं कहते है कि " यह किताब किसी विद्वता के भ्रम मे नही लिखी गई है। ऐतिहासिक घटनाओं और तारीखों की एक्यूरेसी के लिये इसे एक रिफरेंस बुक भी नही होना है। यह किताब पढ़ने के लिये लिखी गई है, ड्राइंग रूम मे सजाने के लिये तो बिलकुल नही। यह उन किताबों मे ना गिनी जाय जिसकी दस लाख प्रतियॉ बिकें और दस हजार लोग भी उसे खत्म ना कर पाये बल्कि इसकी पॉच हजार प्रतियॉ बिके तो एक लाख लोग उसे पढ़ें।" यह किताब पढ़ने और सोचने के लिये है।
समाज के जड़ तक नकारात्मक प्रवृत्ति ने इतना गहरे तक जम चुकी है कि उसने आम जनमानस का विशेषकर युवा वर्ग को साहित्य, मीडिया, संप्रेषण और कथ्य निर्माण के माध्यम से अपने सोचने समझने के नजरिये का चश्मा लगा कर हर तथ्य को देखने पर विवस करती है। डॉ०राजीव ने समाज को लुभाने वाली भ्रामक वामपंथी शब्दावली की व्याख्या करते हुये बताते है कि " हमारी समस्या यह है कि हम अकसर अपने विमर्श में इन्हीं पॉलिटिकली करेक्ट मूल्यों को मान्यता दिए बैठे हैं। बिना यह समझे कि ये सारे शब्द जिसकी महत्ता और मर्तायादा की दुहाई देते हुये हम आपस में लड़ते हैं, वे सभी किसी न किसी देशविरोधी धर्मविरोधी या समाज विरोधी शक्ति की ढाल है। एक देशद्रोही चैनल मीडिया की स्वतंत्रता के पीछे छुपा है, एक समाज विरोधी फिल्मकार कलात्मकता के की पीछे दो नंबर के पैसे को सफेद करने वाला एक दलाल समाजसेवा के पीछे छुपा है तो नक्सलियों और जिहादियों की फौज धर्मनिरपेक्षता की ओट लिये खड़ी है ....."
डॉ० राजीव अपने विश्लेषण के आधार पर इस पालिटिकल करेक्टनेस के हौव्वा का समाधान भी बताते है " खुलकर प्रश्न किजिये.., पालिटिकल करेक्टनेस के हर मानक को अस्वीकार किजिये.., वह एक सिद्धांत नही है,शत्रु का बंकर है? यह टूटा तो शत्रु सामने होगा.., बिना पालिटिकल करेक्टनेस को अस्वीकृत और अनधिकृत किये यह लड़ाई नही जीती जा सकती। पालिटिकल करेक्टनेस एक किस्म का बौद्धिक आतंकवाद है और इसका उस  बंदूक वाले आतंकवाद से बड़ा भाईचारा है....."
विषैला वामपंथ के तथ्यों ,शब्दावलीयों की सहज ,सरल व बोधगम्य व्याख्या करने के साथ हीजोसेफ मैक्कार्थी, जान एफ केनेडी, निक्सन, जिमक्रो, देंग सियांगो पिंग, ली कुआन यू,साल अलिन्स्की केट मिलेट,एंटिनियो ग्राम्स्की, माओ, मुसोलिनी के बारे भी चर्चा की है तो कुर्ता, जीन्स, मोटे फ्रेमवाले चश्मे और गले मे गमछा लटका कर बुजुर्वा और सर्वहारा की व्याख्या करने वाले वामपंथियों के बोझिल पर असरकारक टर्मोलाजी फ्रैंकफर्ट स्कूल, रूल्स फार रेडिकल्स, पालिटिकल करेक्टनेस, विक्टम आईडेंटिटी, कनफ्लिक्ट नैरेटिव, फेमिनिज्म, सोशल आटो इम्युनिटी, म्यूटेटेड वायरस, नैरेटिव बिल्डिंग को भी विश्लेषित किया है।
कुल मिला कर पूरी तरह से समझने बूझने वाली किताब को पढ़ कर कहीं से यह नही लगता कि किताब के लेखक डॉ० राजीव मिश्रा सीनियर गैस्ट्रोइंन्ट्रोलाजी के वरिष्ठ चिकित्सक है बल्कि यह महसूस होता है कि हम किसी बेहद सुलझे वरिष्ठ राजनीति विज्ञानी, विश्लेषक के द्वारा वामपंथ के वास्तविक स्वरूप से परिचित हो रहे हैं। वैसे हम कहें कि, डाक्टर साहेब ने  किताब लिखते समय भी वामपंथ का पोस्टमार्टम ही किया है जिसमें अंदर तक विष ही भरा मिलता है, तो गलत नही होगा। वाकई यह किताब आज की जरूरत है, हम तो सोच रहे थे कि यदि यह किताब पहले आई होती तो स्वयं मेरे मन मे कुछ सामाजिक कथ्यों पर मेरा जो भ्रम था कब का मिट गया होगा। क्योंकि "वामपंथ एक तरह का sociopsychosis है। उनकी सोशल रियलिटी कुछ और है। उसमे वर्ग संघर्ष है, क्रांतिहै, समानता है .... तरह तरह की बकवास है जो आपको तब तक दिखाई नही देगा जब तक आप उनके नैरेटिव को सब्सक्राईब नही करेगें, या आप खुद उनके सायकोसिस से ग्रस्त नही हो जायेगें।
        और जबतक आपको पता नही चल जाता कि यह सायकोसिस है, आप उसके नैरेटिव को सब्सक्राइब करते हैं और वह आपको वास्तविक ही लगता रहता है....."
(बनारस, 27 जनवरी 2020, सोमवार)
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#किताबें मेरी दोस्त

सोमवार, 20 जनवरी 2020

व्योमवार्ता/है और भी दुनिया मे नावेलनिगार बड़े अच्छे, हम कहते सत्य व्यास का अंदाजे बयॉ और ...

व्योमवार्ता/है और भी दुनिया मे नावेलनिगार बड़े अच्छे, हम कहते सत्य व्यास का अंदाजे बयॉ और : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,20 जनवरी 2020

          कल रात सवा नौ बजे सत्य व्यास की बागी बलिया उठाई तो जिला बलिया के मझौंवा घाट से लेकर सिटी पीजी कालेज तक संजय नेता और रफीक मियॉ के संगत मे दियारा के बलुहट मे उन्नीस मोबाईल काल को नही उठाने के बदले अनुराग राय को उन्नीस चिन्हानी देने तक के जलेबीनुमा मोड़ के बैठकी से उठा तो रात के दो बज रहे थे। घड़ी पर निगाह गई तो मुँह से अरे नही निकला बल्कि बैठकी एक बार मे पूरी कर उठने के लिये खुद के लिये वाह निकल गया। वैसे इस वाह के असली हकदार भी अनुज सत्यव्यास हैं जो बनारस टाकीज से शुरू हुये भरोसे को दिल्ली दरबार से होते हुये चौरासी मे जमसेदपुर की यात्रा कराते हुये बागी बलिया तक बदस्तूर बरकरार ऱखे जा रहे है। यह बैठकी ट्रेन की यात्रा में हो या घोर जाड़े की ठण्डी रातों मे अपना जलवा बिखेर जाती है और यही तो इस एकाकी बैठकी का मजा है। सत्य व्यास के इस रूप का पहला मुझसे परिचय मई २०१६ मे दिल्ली यात्रा के दौरान मंडुआडीह स्टेशन पर हुआ जब स्टेशन की दुकान से बनारस टाकीज खरीद कर मै मंडुआडीह स्पेशल मे बैठ कर पहला पन्ना पलटा तो आखिरी पन्ना उलटने तक गाजियाबाद स्टेशन आ चुका था। बनारस टाकीज मुझे मानसिक रूप से पुन: बीएचयू के दिनो मे ले जा चुकी थी। आखिरी कवर पर लेखक का फोटो देखा तो याद आया अरे यह तो अपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अपना अनुज विद्यार्थी हुआ करता था। बनारस लोटा तो दिल दिमाग मे घुमड़ती बनारस टाकीज के बारे मे अपनी राय अपने ब्लाग मे लिखने के साथ ही फेसबुक मे सत्यव्यास को तलाश कर मित्रता आमंत्रण के साथ ही उसे भी साट दिया। लौटती सॉझ सत्य व्यास का सम्मान सहित स्वीकृति और आभार आ गया। फिर सत्य के साथ जो आत्मीय रिश्ता बना आज तक बरकरार है। मुझे यह स्वीकारने मे कोई गुरेज नही है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अपने जूनियर होने के नाते मै सत्य का पक्षपाती हूँ पर सच यह है कि सत्य ने पक्षपात के इन अवसरों को अपने लेखन प्रतिभा से कहीं बहुत बौना कर दिया है। स्थानीय बोली, स्थान ,इतिहास, भूगोल को अपनी बेमिसाल बुनाई की अदाकारी से कसे उनके उपन्यास उन्हे लोकप्रियता के शिखर तक ले जाने मे सफल रहे  है।
       बागी बलिया मे आज के युवाओं मे खुद की जल्द पहचान बनाने के लिये राजनीति, गुण्डई, नेतागिरी, दादागिरी , चमचागिरी , चंदावसूली, फिरौती, वर्चस्व की जद्दोजहद है वहीं दो धर्मों के दकियानूसी परंपरा से दूर मस्तमौला दो दोस्तों की साफ दिलजोई की कहानी भी है। जो राजधानी दिल्ली और लखनऊ से दूर सीमावर्ती आर्थिक तौर पर पिछड़े पर अपने परंपरा पर गौरव करने वाले जिले के मनस्थिति की भी। छात्र राजनीति को बदबूदार बनाने वाले घूंटे राजनीतिज्ञोंं की तो गॉव की भोलीभाली अपने सपनों को देखने और फिर बदले की आग मे छली गई परिवार के सम्मान के लिये जान देने को मजबूर सीधी सरल लड़की की। शिक्षा मंदिर को अवैध कमाई का दुकान बनाने वाले प्रधानाचार्य की तो शिक्षा को मंदिर समझने वाले सिद्धान्तवादी प्रो० सुमित्रा की।
और डाक साहेब, उनके बारे मे जो कहो वह कम ही है, शुरू मे लगता है कि वह एक विछिप्त बुद्धिजीवी है फिर लगता है कि बंदा सीआईडी का आदमी है और अंत में......
जाने दिजिये , नही तो आपकी बैठकी का मूड बदल जायेगा।
रही बात सत्य की, तो वह अपने नये प्रतिमान स्वयं ही नयी रचनाओं के साथ गढ़ते जा रहे हैं। हम तो पहले ही कह चुके है कि सत्य व्यास का अंदाजे बयां और........
(बनारस, 20 जनवरी 2020, सोमवार)
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