बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

आज का सवाल


क्या सभी शैक्षणिक, व्यवसायिक, रोजगारपरक प्रमाणपत्रों को आधार से जोड़ कर छद्म बेरोजगारी और अवसर के दुरूपयोग को रोका नही जा सकता?

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

व्योमवार्ता / गॉव गिरॉव के वेलेन्टाईन डे नें ललका गुलाब

व्योमवार्ता / व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 12 फरवरी 2018, सोमवार

गॉव गिरॉव के वेलेन्टाईन वीक में ललका गुलाब

गोबर उठाते हुए परभुनाथ चचा ने चाची से पूछा है कि आज कौन सा दिन है हो?
घर के काम काज में अंझुराई चाची अंगुरी पर दिन का हिसाब बैठाती हैं। जहिया देवनथवा गुजरात गया था उस दिन सोमार था। तो सोमारे सोमार आठ आ मंगर नौ... तब तक मोबाइल पर सिर झुकाए रजेसवा बोल पड़ता है
आज 'रोज-डे' है। परभुनाथ चचा पूछ बैठते हैं - ई कौनी कलेण्डर से देख के बता रहे हो?
रजेसवा बताता है - 'लव वीक' चल रहा है आज सेकेंड डे है, इसे 'रोज डे' कहते हैं। आज गुलाब दिया जाता है...
परभुनाथ चचा माथा पीट लेते हैं। कैसा समय आ गया है! प्रेम के लिए भी दिन और सप्ताह तय होने लगे। देने और लेने से प्यार की गहराई देखी जा रही है। एक वो भी समय था। इधर गुलाब था उधर प्रेम था और बीच में लाठी थी।
चालीस साल पहले छपरा जिले के रिविलगंज कस्बे में सिवनाथ चौधरी के लड़के परभुनाथ चौधरी की दुहलिन आई थी। पवनी पूजिहर का नेग जोग निपटाने के बाद माली जब जाने लगा तो परभुनाथ चौधरी ने कोने में ले जाकर माली से कहा-"ए काका! तनी एगो ललका गुलाब सांझ के बेरा पहुंचा दीजिएगा। सुना है पहली रात को दुलहिन के हाथ में गुलाब देने से प्रेम बढता है।"
माली ने कहा - बबुआ ललका गुलाब ए दिन में कहां मिलता है? गंगा पार बलिया जिला से लाना पडेगा। बड़ी खरचा हो जाएगा।
अंगना में मिले कड़कड़िया नोटों की गर्मी से जलते हुए परभुनाथ चौधरी ने कहा था-'काका खरचा की चरचा मत कीजिये। बस ललका गुलाब लाइए।'
नवका घर में दुसुत्ती का पियरका परदा टांग दिया गया था, जिस पर दोनों ओर शेर बने हुए थे, और बीच में स्वागतम लिखा था। रह रह कर परदे के पीछे से दुलहिन की रोवाई उठ जाती थी। इधर परभुनाथ चौधरी का मन करता था कि झट से दुहलिन के पास पहुंच जाएं और उसकी आँखों में देखकर कह दें कि - हम बहुत प्यार करेंगे तुमसे, रोओ मत। लेकिन जाएं कैसे? गुलाब अभी तक आया ही नहीं था। कभी कभी पियरके परदे के पीछे चूड़ियाँ खनखनाने लगतीं तो परभुनाथ चौधरी के कदम परदे के पास पहुंच जाते। कभी दुलहिनियां की पायल बजती तो चौधरी का दिल परदे के अंदर जाने को मचल जाता था। लेकिन जाएं तो जाएं कैसे? गुलाब तो अभी आया ही नहीं था।
सांझ ढलते ढलते दालपूड़ी रसिआव गोझा और चटनी बन के तैयार हो गई थी । घर की औरतें गोबर से लीपे आंगन में बैठी गीत गा रही थीं। परभुनाथ चौधरी तनिको आहट होने पर दुआर की ओर झांकने लगते थे। जब सिवनाथ चौधरी ओसारे में बैठे दहेज में मिले रेडियो का टिसन धराने लगे तभी उधर माली ने आवाज दी थी। परभुनाथ चौधरी दौड़ कर आए और कोने में ले जाकर पूछा - काका ललका गुलाब मिला?
माली ने रोअनियां मुंह बना कर कहा - मिला तो चौधरी। लेकिन हमारा नरक हो गया। बिशुनीपुर माल्देपुर तिखमपुर सब घूम दिए लेकिन कहीं नहीं मिला। हलुमानगंज में एगो माली दो रुपये में दे रहा था। हम डांटे और कहे कि हमहूँ माली हैं और रिविलगंज से आएं हैं। बीस आना से अधिका नहीं देंगे। चाहो तो दो न चाहो तो मत दो, सैकड़ों दूकानें हैं कहीं और से ले लेंगे। आखिर में देना ही पड़ा उसे।
परभुनाथ चौधरी ने खुशी से दो रुपये का ललका नोट माली के हाथ में धर दिया। साथ ही 'प्यार बढ़ जाने के बाद' और दो रुपये देने का वायदा किया।
हाथों में ललका गुलाब छुपाए परभुनाथ जैसे ही ओसारे से होकर गुजरे सिवनाथ चौधरी ने टोका - माली कांहे आया था जी? सुबहे तो नेग ले गया था।
परभुनाथ ने कहा - इसी तरह आया था कोई खास बात नहीं थी।
तभी लालटेन के अंजोरा में ललके गुलाब की हरी हरी पत्तियाँ देखकर सिवनाथ चौधरी दहाड़े - लखनऊवा नबाब बने हो गुलाब लेकर मेहरारू के पास जाओगे? मेहरमऊग बनोगे? और तीसरा सवाल कोने में रखी सिवनाथ चौधरी की लाठी ने किया था। परभुनाथ चारों खाने चित्त पडे थे, ललका गुलाब छिटक कर दो हाथ आगे पडा था।पियरका परदे का कोना थोड़ा सा उठा था और दुलहिन की रोवाई और तेज हो गई थी।
आधी रात बीत गई थी। दुलहिन ने परभुनाथ चौधरी के पीठ पर हल्दी भांग मिलाकर छाप दिया था। परभुनाथ चौधरी अभी भी कराह रहे थे। दुलहिन ने कहा - क्या जरुरत थी ललका गुलाब लाने की?
परभुनाथ ने करवट होकर कराहते हुए कहा - हम सुने थे कि ललका गुलाब देने से प्यार बढता है।
दुलहिन ने कहा - हमारा प्यार बढाने के लिए गुलाब की क्या जरुरत है! हम ऐसे ही सात जनम के लिए आपके हो गए हैं। और परभुनाथ के बांह पर सिर धरकर रोने लगी।
गोबर की खांची कपार पर धरे खेत की ओर जा रहे परभुनाथ चचा की धोती, आंगन में लगे गुलाब के पौधे में फंस गई है। अचकचा कर देखते हैं- राजेसवा अभी मोबाइल में ही सिर गडाए है, चाची गेंहू फटक रही हैं। सफेद धोती ललके गुलाब के फूलों में अभी भी अंझुराई हुई है। अचानक चालीस साल पहले का ललका गुलाब याद आ गया है, दुलहिन के रुप में प्रेम कुमारी याद आ गई है, और बाबूजी की लाठियां भी याद आ जाती हैं। बूढ़ा दिल फिर एकईस साल का हो जाता है और सूखे होंठो पर मुस्कुराहट आ जाती है। बड़े प्यार से आवाज देते हैं - ए परेम हेन्ने आओ तो!
तीन मिनट बाद पैंसठ साल के परभुनाथ चचा साठ साल की परेम कुमारी के हाथों में ललका गुलाब देते हुए कह रहे हैं - आज चालीस साल बाद ई गुलाब दे पाया हूँ मना मत करना।
परेम कुमारी जैसे अभी डोली से उतरी हैं। दोनों हाथों से बुढऊ को पकड़ कर रोने लगती हैं और कहती हैं - हमारा प्यार बढाने के लिए गुलाब की क्या जरूरत है...
उधर रजेसवा गूगल से ललका गुलाब डाऊनलोड कर रहा है.....
(बनारस, 12फरवरी 2018, सोमवार)
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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

व्योमवार्ता /सुना है तेरी महफिल मे रतजगा है.....

व्योमवार्ता /
सुना है तेरी महफिल में रतजगा है ........
                                      • व्योमेश चित्रवंश
                पिछले पखवाड़े योगी जी बनारस क्या आये कि बनारस की पूरी प्रशासनिक मशीनरी ही फास्ट हो गई क्योंकि पहली बार लखनऊ से खबर आई थी कि सूबे के सदर योगी जी रात को रुकेंगे ही नहीं बल्कि रात में शहर बनारस  का जायजा लेंगे . अब अफसरान रात की सुहानी नींद और गर्म बिछौ़ने ,गर्म रजाई छोड़कर भाग भाग कर सड़कों ,साइटों और प्रोजेक्ट आफिसों में नजर आने लगे . रात के कोहरे में फाग लाइट जलाकर के सड़कें बनने लगी तो महीनों से वरुणा पर खड़ी धूल फॉक रहीं पोकलैंड व जेसीबी मशीनें भी गरजने लगी . अफसरों की पत्नियॉ इस मुये थण्ड को कोसने लगी कि जब सीएम का दौरा होने को होता है तभी जाड़े को पड़ना होता है . गर्म पानी की बोतल से लेकर टोपी मफलर जैकेट से लदे फदे अफसरान भीषण ठण्ड मे भी सीएम  के आने की गर्मी से काम करते कराते रहे. दो तीन रातों में शहर चकाचक. योगी जी आए और मीटिंग के बाद निकल पड़े शहर का मुआयना करने . कहॉ अफसरान यह  सोच कर निश्चिन्त थे कि कोहरे की वजह से शायद योगी जी का मौका मुआयना वाला कार्यक्रम टल जाए, पर योगी जी तो ठहरे पुराने हठयोगी, कुर्ता लूंगी के ऊपर एक केशरिया दुशाला रखें कंधे पर, और चल दिए शहर में हो रहे लंबित कार्यों को देखनेे, रैन बसेरा से लेकर बरईपुर पोखरा, नरोखर तालाब, मंडुआडीह आरओबी से लेकर दशाश्वमेध घाट तक. योगी जी का काफिला दौड़ता रहा ,अफसरान हलकान होते रहे . और ना चाहते हुए भी ना देखने लायक बहुत सी चीजों को योगी जी ने देख लिया और तलब कर लिया दूसरे दिन सबको सर्किट हाउस .थोड़ा पुचकाराा ,थोड़ा समझाया ,थोड़ा तंज कसा, जाते जाते यह भी बता गये कि 15 दिनों बाद फिर आएंगे और अब की बार कुछ गलत पाएंगे तो छोड़ेंगे नहीं.
          योगी जी के जाते ही उनके स्वभाव को जानने वाले अफसरान एक्शन में आ गए नरोखर में बनने वाला जल वितरण व्यवस्था का पोखरा तेजी से बनने लगा तो वरुणा कारिडोर में भी टाइमलाइन के साथ गतिविधियां दिखने लगी. फिर एक बार वरुणा के नाम पर लीपापोती की कोशिश शुरू हो गई वरुणा पर कब्जा किए बड़े लोगों के कब्जे तो नहीं हटे पर वरुणा अपने पुराने मौके से जरूर हटने लगी जिसका सबसे बड़ा उदाहरण कचहरी के पास नए वरुणा पुल के दक्षिणी छोर पर साफ नजर आ रहा है. उधर आरटीओ चंदौली के तर्ज पर हालत कर देने की वार्मिंग के बाद ओवरलोड गाड़ियों की धरपकड़ शुरू हुई पर रात में नो एंट्री खत्म होने के बाद साइड रोड से बड़े-बड़े ओवरलोडेड ट्रकों को निकालने का खेल जारी है मंडुआडीह रेलवे ओवरब्रिज के संपर्क मार्ग की सफाई हो रही है तो पूरे शहर को अतिक्रमण मुक्त करने की कोशिशें लगातार जारी है . यह दूसरी बात है इन सब में कहीं साफ नीयत व दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी दिख रही है जो बनारस को सुधारने के लिए बेहद जरूरी है .
           आज मोदी योगी की कुल प्रयासों के बावजूद शहर में कारगर व्यवस्था नहीं दिख रही है जिसके लिए इतनी कवायद की जा रही है .काम व जिम्मेदारियों को एक दूसरे पर फेंकने की अफसरों की कलाबाजी में कहीं न कहीं पूरा शहर हलकान परेशान हो रहा है .गैर जिम्मेदारी का आलम यह है कि बीते 11 जनवरी की रात गुरुधाम चौराहे के समीप भेलूपुर थाना पुलिस द्वारा एक बैंकेट हाल में अश्लील हरकत के आरोप में कुछ लोगों को पकड़ा गया घटना की FIR में दर्ज घटना सुबह के 4:30 बजे के काफी पहले ही मीडिया को घटनास्थल घटनाक्रम और घटना में शामिल आरोपों की संख्या की खबर प्रकाशित कर दी गई .अब साहब, बनारस के हाल ये हैं कि अखबारों में छपी खबर छपने के बाद यहॉ घटना हो रही है फिल्मी तौर पर न्यू देलही टाईम्स के माफिक. एस पी ट्रैफिक सुरेश चंद्र रावत दिन रात मेहनत कर शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने में लगे हुए हैं पर बनारस की ट्रैफिक है कि सुधरने का नाम नहीं लेती . सड़क पर फिजूल के कटों को बंद कराने के बाद सड़क के दोनों तरफ से बढ़ रहे दुकानदारों ने सरकारी सड़कों को अपना अधिकार क्षेत्र समझ पुनः अपनी दुकानें सजा लिया, समस्या ज्यों की त्यों .लहुराबीर क्वींस कॉलेज से लेकर लंका नई सड़क लगायत अर्दली बाजार, भोजूबीर ,पांडेपुर तक वही हालात कायम है .पुलकित खरे के वरुणा पर अतिक्रमण हटाओ तर्ज पर मंडुआडीह थाना प्रभारी आशुतोष तिवारी ने मांडवी तालाब को अतिक्रमण से मुक्त कराना शुरू किया तो उन्हें भी खरे की तरह वहां से हटाकर साइड लाइन कर दिया गया .दाल मंडी में अतिक्रमण हटाने के अभियान की जानकारी लेते हुए एसपी साहब को रिहाइसी भीड़भाड़ व अति संवेदनशील इलाके के नीचे काफी लंबा-चौड़ा बाजार मिला तो अब पूरा बनारस एसएसपी महोदय को इस बाजार के खुलासे के लिए सम्मानित करना चाहता है पर क्या किसी ने पूछा कि अगर विश्वनाथ मंदिर से मात्र सौ मीटर दूर यह भूमिगत बाजार रातों-रात  नही बना तो फिर शहर की खुफिया तंत्र को संभालने वाली एलआईयू की क्या जिम्मेदारी है ? क्या एलआईयू बाजार को बनता हुआ देख कर बनारस में मेट्रो रेल के भूमिगत संचालन के स्टार्टअप प्रोग्राम की जॉच करना चाहती थी कि अगर दालमण्डी मे बीस फीट नीचे बाजार बन सकता है तो पूरे शहर मे मेट्रो रेल भूमिगत क्यों नही चलाई जा सकती.
          बहरहाल बनारस में ये चीजें आम  हो रही है आम होती जा रही है. आम शहरी के शांतिपूर्ण  जीवन व व्यवस्था से बेजार यहॉ के अफसरान अपना पीठ ठोकने के लिए कुछ भी नया प्रयोग कर सकते हैं . नगर निगम ,विकास प्राधिकरण ही नहीं पुलिस विभाग भी अब इस दौड़ में पीछे नहीं है सुना है योगी जी फिर शहर में आकर रात में चौपाल लगाने वाले हैं. जब तक वे आएंगे पूरे शहर की अंधेरी व्यवस्था को चाक चौबंद रोशनी में तब्दील कर लिया जाएगा भले ही वो रोशनी थोड़ी देर के लिए ही हो , क्योंकि वीवीआईपी के आने पर इस शहर में अंधेरे में भी रोशनी का रतजगा हो जाता है .
         सुना है शहर का नक्शा बदल गया है महफूज,
           तो चल के हम भी जरा अपने घर को देखते हैं .
                                              - व्योमेश चित्रवंश,
             http://chitravansh.blogspot.com.              मो0- 9450960851

रविवार, 7 जनवरी 2018

व्योमवार्ता/ न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर

व्योमवार्ता

न बदलने की जिद पर अड़ा बदलता शहर

          हमारा शहर बनारस. युगों युगों से भी पुराना शहर. इतिहास से परे ,काल के चक्र के साथ अनवरत चलता हुआ. कहते हैं कि अविनाशी है काशी , जिसके इतिहास का न आदि है ना अंत. काशी का कौन है? यह भी एक नश्वर प्रश्न है . लोग आते गए, बसते रहे यहां की सोंधी माटी में जीवंत फक्कड़पन को अपनाकर बनारसी हो गए .यह खास से आम बनने यानी शहरी से बनारसी बनने की प्रक्रिया कब  मन, तन और जीवन में स्वयं बस कर कब  बाहरी से बनारसी बना देती है, यह तो बनने वाला भी नहीं जानता. ठीक वैसे ही जैसे कब गंगा को लेकर उत्तर के हिमालय से नीचे की ओर उतर रहे भगीरथ बनारस में आकर मॉ गंगा को मार्ग दिखाते हुए दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगे ,उन्हें भी नहीं पता. बनारस में गंगा दक्षिण से उत्तर गामिनी हो गई उत्तर गामिनी हुई गंगा को  शहर बनारस ऐसा भाया किउन्होने पूरे शहर को अपनी गोद में ले आंचल में समेट लिया और यहां के रंग में ऐसे रंगी कि  बिना गंगा के बनारस और बिना बनारस के गंगा की कल्पना ही बेमानी हो गई .एक बनारसी किस्से के अनुसार आशुतोष भगवान शंकर जब अपना घर बनाने के लिए दुनिया भर में जगहों का मुआयना तलाश कर रहे थे तो मॉ गंगा को उत्तर वाहिनी करने वाला यह शहर उन्हे बहुत पसंद आया .आये भी क्यों नहीं, खुद अड़भंगी जो ठहरे, तो उन्होंने अपना त्रिशूल यही गाड़ा और दाना पानी घर गृहस्थी सब लेकर बनारसी हो गए फिर उसके बाद का इतिहास बताता है कि सारे के सारे देवी देवता वीर योगिनी ब्रह्म भैरव शक्ति कपालिनी सभी उनके पीछे-पीछे यहीं आकर बस गए. कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकृति में कोई देवी देवता प्राणी ऐसा नहीं जो बनारस में ना हो. लोगबाग की माने तो यहां लोगों से ज्यादा मंदिर मूर्तियां भगवान देवी देवता की  है जो हर घर गली हर नुक्कड़ हर चौराहे से लेकर सड़क रेलवे लाइन अस्पताल स्कूल तक में आबाद है बाद में तुलसी कबीर कीनाराम जैसे महापुरूष  भी यहीं के यहीं होकर रह गए. ग़ालिब साहब को बेमन से बनारस छोड़ना पड़ा तो उमरॉवजान अदा को यही जन्नत नसीब हुई. बाद के वर्षों में मुगल आये ब्रिटिश आये तो जो थोड़ी जगह बची थी उन्होंने उस पर अपने देवी-देवता पीरो व खुदाबंदो की याद में इबादत खाना बनवा दिया .अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च से जो जगह बची उस पर मठों,मांटेसरी ,दरगाह बना दिए गए .इन सब से भी कुछ बचा  लोगों ने मकान बनवा लिया .अब इत्ती सी जगह में नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या?   तो मकान बने पर उसे अपनी जरूरत व मनमाफिक के हिसाब से बनारसी ने बनवाया अब इस मनमाफिक व्यवस्था में कहां नक्शा कहां सेट बैक कहां फीडबैक कहां सनसेट के चक्कर में आम बनारसी पड़े .वह गली-कूचे मोहल्ले में मकान बनवा कर ही खुश रहने लगा ना तो आम बनारसी को दिक्कत  न हीं उसके देवी देवता और परवरदिगार को .न हीं उसके यहॉ बिन बुलाए पहुंचने वाले साड़ों को और  न छत पर बैठने वाले भक्तों को .समस्या तो तब हुई जब विकास प्राधिकरण ने पूरे शहर को अपने नक्शे पर उतारना शुरू किया .बनारसी में आज तक किसी की बात मानी कि वह विकास प्राधिकरण के नाज नक्से सहता. बस यही से बात बिगड़नी शुरू हो गई. विकास प्राधिकरण कहे कि मकान ऐसे नहीं ऐसे बनाओ, बनारसी पट्ठा कहता है, यार हम तो अपने मन से ही बनाएंगे, तुम्हारी ऐसी की तैसी .लिहाजा वाराणसी विकास प्राधिकरण ने एक बीच का रास्ता निकाला तुम हमारा ख्याल करो हम तुम्हारा बिल्कुल ख्याल रखना छोड़ देंगे. इस सिद्धांत का पालन आज तक दोनों तरफ से हो रहा है .बनारसी बंदा मकान बनाता है विकास प्राधिकरण वाले पहुंचकर काम रोकते हैं मकान गलत बन रहा है कल पन्ना लाल पार्क में आकर मिलो. दूसरे दिन बनारसी पन्ना लाल पार्क जाकर बताए हुए फलां कर्मचारी अधिकारी से मिलता है उसके मुताबिक उनका ख्याल रखने के लिए नगद नारायण का चढ़ावा देता है और फिर फ्री.  मकान बनवाओ  चाहे कुऑ खोदो. विकास प्राधिकरण नहीं आने वाला उसका ख्याल रखने के लिए. बस इसी सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था से बनारस कब आनंद कानन धर्म अध्यात्म ज्ञान और शिक्षा की नगरी से कंक्रीट के जंगलों में और वाराणसी विकास प्राधिकरण वाराणसी विनास प्राधिकरण में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला ,यही बात नगर निगम के साथ भी हुआ पर उसकी बात फिर कभी.
तो साहेब पूरा बनारस अनियोजित व्यवस्थित शहर की श्रेणी में जाना जाने लगा फिर भी आम बनारसी को किसी से कोई शिकायत नहीं वह तो दिन भर नौकरी दुकानदारी जजमानी से खाली हो कर नुक्कड़ पर पान की दुकान पर अड़ी लगा अपनी मंडली में ज्ञान बांटने मे मस्त था,पचहत्तर के बाद जनमने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपने ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठे या बेडरूम में लेटे हुये टीवी के रिमोट से छेड़छाड़ में व्यस्त होने की आदी हो चुकी थी.
दिक्कत शुरू हुई सन  2014 के लोकसभा चुनाव से. शंकर, तुलसी ,रत्नाकर और गंगा के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से चलकर बनारस लोकसभा चुनाव लड़ने का निश्चय कर बैठे. मोदी जी बनारस आये तो उन्हें बनारस ने हाथों-हाथ लिया उनके नामांकन में पूरा शहर ही मानो सड़कों पर आशीर्वाद देने उमड़ पड़ा और मोदी जी बनारस के सांसद बन गए. पीएम बनने से पहले  वह बाबा विश्वनाथ के दरबार में  अपनी हाजिरी लगाने आए तब उन्होंने देखा कि बनारस तो महाजाल में फंसा हुआ है बिजली के खंभों से लेकर सड़क पर बह रहे सीवर के नालो तक .गंगा में गंदगी से लेकर सरकारी व्यवस्था से जूझते आम आदमी तक,  ऐसे में कोई उन्हें बनारस मे लाने का श्रेय ले इससे पहले ही उन्होंने यह कह कर सभी नामचीन लोगों के  होड़ देने पर विराम लगा दिया कि मुझे किसी ने नहीं बल्कि मां गंगा ने बुलाया है. बात यहीं तक थी तब भी ठीक था पर मोदी जी ने बनारस को बदलने की बात कहते हुए यह भी कर डाला कि मुझे मालूम है कि बनारस वालों से काम करना बहुत मुश्किल है .चलो साहब बात आई गई हो गई पर हद तो तब हो गई  जब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी जी हर तीसरे चौथे महीने बनारस का चक्कर मारने लगे अब लोकल अफसरान के साथ आम जनता भी अचरज में थी कि मोदी जी कैसे पी एम है जो पीएम होने के बावजूद हर तीसरे चौथे महीने  अपने क्षेत्र का  दौरा करते हैं .पर मोदी जी आते रहे. बनारस में बदलाव दिखने लगा .खंभे पर फैले तारों को जमीन के अंदर किए जाने की कवायद शुरु हुई तो एक लंबे अरसे से ठंडे बस्ते में पड़ा  रिंग रोड का काम भी. बाबतपुर से शहर तक फोरलेन इंटरनेशनल लेवल रोड का काम जोर-शोर से शुरू हुआ .मड़ुआडीह और बनारस सिटी रेलवे स्टेशन को सैटेलाइट स्टेशन बनाने के साथ वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन को विस्तारित करने की योजनाएं भी लगभग पूर्ण होने को है और भी योजनाएं निर्माणाधीन हैं  एवं धीरे धीरे बनारस बदलने को तैयार है पर इन सारे बदलाव के बाद भी नहीं बदला तो अपना शहर. यह अटपटा लग सकता है इतने सारे बदलाव की बात करने के बाद शहर के न बदलने की बात की जा रही है. जी हां बात शहर में रहने वाले शहरियों की है .मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस स्वच्छता नीति को प्रमुखता से सब को अपनाने की अपील की थी उस स्वच्छता  को उन्हीं के संसदीय क्षेत्र का शहरी अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा है,गंगा मे सफाई अभियान के तहत मोदी जी ने अस्सी घाट पर फावड़ा तक चलाया तो शहर में सफाई के लिए यहां की गलियों में झाड़ू लगाया पर उसका रत्तीभर असर हम बनारसियों के ऊपर नहीं पड़ा. आज भी घाटों पर गंदगी फैलाने ,गलियों में पॉलिथीन मे  कूड़े फेंकने ,सड़कों दीवारों पर पान थूकने की आदतों में कोई बदलाव नहीं दिख रहा .कुछ दिनों के लिए डी एम बनकर आए विजय किरण आनंद के सख्ती का असर दिखा तो चाय पान की दुकान वालों ने दुकान के आगे कूड़े की टोकरी रखना व शाम को दुकान बंद करने से पहले दुकान के बाहर साफ सफाई करना प्रारंभ कर दिया था पर विजय किरण आनंद के जाने के बाद भी फिर पुराने ढर्रे पर आ गए. एसपी ट्रैफिक सुरेश चंद्र यादव पूरे शिद्दत से ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने में लगे हुए हैं पर शहरियों के  के सहयोग न मिलने से उनकी सारी कवायद टॉय टॉय फिस्स हो रही है .वरुणा नदी के पेटे तक को पाट देने वाले बड़े आदमियों पर दिए उपाध्यक्ष पुलकित खरे ने निगॉहे उठाई तो उन लोगों ने खरे का ट्रांसफर ही करवा दिया .बार-बार हटाए जाने के बावजूद लगते हुए अतिक्रमण, अवैध पार्किंग, निजी अस्पतालों बड़ी बिल्डिंग के बेसमेंट की पार्किंग को खोले जाने के अभियान के बावजूद पुन: उनका व्यवसायिक उपयोग, सड़कों पर खड़े अपनी निर्देशों का उल्लंघन होते देखते बेबस ट्रैफिक पुलिस के सिपाही ,चौराहों पर बेकार मे जलते बूझते ट्रैफिक सिग्नल, पान की पीक से बदरंग दीवारें व सड़के,  खाली बेकार पड़े मूत्रालय व दुकानों के पीछे उठते मल मूत्रों की महक इस पूरे बदलाव के नीयत पर सवाल खड़े करते हैं. जाहिर है हम बदलाव को अपनी आदत में शामिल नहीं करना चाहते और बदलते शहर में भी न बदलने की जिद पर अड़ा हुआ है अपना शहर .
कहने को बहुत कुछ है पर अबकी बार इतना ही.
          शायर की नजर से कहें तो
दिखावा मत कर मेरे शहर शरीफ होने का ,
हम खामोश तो हैं लेकिन ना समझ नहीं

                                               व्योमेश चित्रवंश,
                                            मो0 9198193851
                 http://chitravansh.blogspot.com



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामना स्वीकार नही

प्रिय साथियों,

मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे आने वाले अंग्रेजी कैलन्डर के अनुसार नववर्ष (न्यू ईयर) की शुभकामनाएं एवं बधाई देने का कष्ट ना करें

क्यूँकि मेरा धर्म सनातन हिन्दू है

हमारे धर्मग्रंथो के अनुसार चैत्र गुड़ी पड़वा से नया वर्ष शुभारम्भ  होता है  और उसे ही में मानाता आया हूँ उसी अनुसार में आपसे भी आग्रह कर रहा हुँ की आप 1 जनवरी को नये वर्ष की शुभकामनाएं मुझे न भेजे और न ही आप उस दिन नया वर्ष मनाये। कृपया ये सन्देश अपने मित्रों और ग्रुप में शेयर करें।
अगर आपको शुभकामनाएं और बधाई देनी है तो मुझे हिंदू नववर्ष चैत्र शुक्ल एकम विक्रमी संवत् 2075 (18 मार्च 2018 )को दीजिएगा ।
      कुछ मित्रों ने अभी से नव वर्ष की अग्रिम शुभकामना की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दिया है ।
ईस परिप्रेक्ष्य मे मैं आप  सब के समक्ष राष्ट्रकवि श्रद्धेय रामधारी सिंह " दिनकर " जी की कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं  

~~~~~~राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर

साथियो, अपनी संस्कृति और पूर्वजों की परंपरा का संरक्षण और सम्मान करने के लिए यह अति आवश्यक है।