गुरुवार, 13 मई 2021

व्योमवार्ता/ एक गलती जो श्राप बन गई....(इजरायल फीलीस्तीन विवाद)

एक गलती जो श्राप बन गई....

                                     #इजरायल और #फिलिस्तीन के बीच जंग क्यों हो रही है इसके पीछे इतिहास की एक गलती है जो श्राप बन गई और 2 हजार सालों से यहूदियों के कत्लेआम की वजह बनी रही. अगर आज इजराइल और फिलिस्तीन के बीच जारी संघर्ष को समझना है तो इतिहास की उन गलियों से गुजरना होगा जहां पत्थर कम और लाशें ज्यादा हैं. मानव इतिहास के सबसे घिनौने नरसंहारों को जानना पड़ेगा और तब जाकर जमीन के लिए यहूदियों की भूख को पहचाना जा सकेगा।
इजराइल और फिलिस्तीन के संघर्ष को समझने के लिए यीशू के जन्म से हजार साल पहले का सफर करना पड़ेगा. उस वक्त दुनिया में धर्म के दो केंद्र थे. पहला हिंदुस्तान का वो हरा-भरा इलाका जहां सनातन धर्म की जड़ें मजबूत हो चुकी थीं. और दूसरा मिडिल ईस्ट का वो रेगिस्तानी इलाका जहां हजरत इब्राहीम उन तीन धर्मों के पैगंबर कहलाने की ओर अग्रेसर थे जिनका पूरी दुनिया में फैलना निश्चित था.
हजरत इब्राहीम को यहूदी, ईसाई और इस्लाम में शुरुआती पैगंबर होने का दर्जा हासिल है. साधारण भाषा में समझें तो इन्हीं इब्राहीम की धार्मिक थ्योरी को मूसा (यहूदी के पैगंबर), ईसा (ईसाई के पैंगबर) और मोहम्मद (इस्लाम के पैगंबर) ने अपने-अपने कालखंड में अपने दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया और सभी ने इब्राहीम को सम्मान दिया.
तीनों धर्मों के मुख्य पूर्वज इब्राहीम बने जिनका जिक्र धार्मिक पुस्तकों में मिलता है. इब्राहीम के वंश में इजराइल का जन्म हुआ जो उनके पोते थे. इजराइल ने 12 कबीलों को मिलाकर इजराइल का गठन किया . जिसे आज हम इजराइल देश के नाम से जानते हैं . इजराइल के एक बेटे का नाम जूदा या यहूदा था जिनकी वजह से इस धर्म को Jew या यहूदी नाम मिला.
इब्राहिम, इजराइल और जूदा के बाद जो नाम यहूदियों से जुड़ा वो है हजरत मूसा का. यहूदियों के पैगंबर हुए मूसा इनका उल्लेख कुरान और बाइबल में भी मिलता है. यूं तो यहूदियों के कई पैगंबर हुए लेकिन मूसा प्रमुख हैं. इन्होंने ही वो नियम तय किए जिपर यहूदी आगे बढ़े. यहूदियों की धार्मिक किताब तौराह है जो दुनिया के निर्माण से शुरू होती है जिसे खुदा ने 6 दिन में बनाया और समाप्त होती है मूसा की मृत्यु पर. मान्यता है कि हजरत मूसा ने ही इजराइल के वंशजों को मिस्त्र की सैकड़ों साल पुरानी गुलामी से आजाद कराया था और एक आजाद जिंदगी दी थी.
अब अगर पैगंबरों से नीचे उतरें और यहूदियों के इतिहास पर नजर डालें तो इसका सही सटीक इतिहास ईसा से करीब 1 हजार साल पूर्व किंग डेविड के समय से मिलता है. डेविड को इस्लाम में दाउद के नाम से संबोधित किया गया है. किंग डेविड ने यूनाइडेट इजराइल पर शासन किया. डेविड के बेटे हुए किंग सोलोमन.जो इस्लाम में सुलैमान हुए. इनका कालखंड ईसा से करीब 900 साल पहले का है. किंग सोलोमन ने यहूदियों का पहला टैंपल #यरुशलम में बनवाया जहां भगवान यहोवा की पूजा होती थी. ये यहूदियों का गोल्डन टाइम था. किंग सोलोमन के पास अकूत दौलत थी. उनकी 300 रानियां थीं और इस बात का भी उल्लेख मिलता है की किंग सोलोमन के समय में कई देशों की तरह ही दक्षिण भारत से भी इजराइल का व्यापार होता था.
किंग सोलोमन की मौत के बाद यहूदी बिखर गए और फिर सदियों तक एक छत नसीब नहीं हुई. ईसा पूर्व 931 में यूनाइडट इजराइल में सिविल वॉर होता है और ये इलाका उत्तर में इजराइल किंगडम और दक्षिण में जूदा किंगडम में बंट जाता है. यहीं से इजराइल के पतन की कहानी शुरू होती है लेकिन वो सबसे बड़ी गलती होनी बाकी है. जिसने आने वाले 2 हजार साल तक यहूदियों का पीछा नहीं छोड़ा. इजराइल के बंटवारे के बाद वहां बेबीलोन साम्राज्य का कब्जा हुआ जो इराक के राजा थे. ईसा पूर्व 587 में बेबीलोन ने यरुशलम में किंग सोलोमन के बनाए यहूदियों के पहले मंदिर को गिरा दिया. फिर कुछ समय बीता और 516 ईसा पूर्व में इसे फिर बनाया गया जिसे यहूदी सेकंड टैंपल या दूसरा मंदिर कहते हैं. उस दौर में यहूदी कुछ संभले और इनकी आबादी भी लाखों में पहुंच चुकी थी. यहूदियों ने शिक्षा और व्यापार के जरिए खुद को मजबूत बनाए रखा.
ईसा पूर्व साल 332 में इजराइल की धरती पर सिकंदर ने कदम रखें और उसकी मौत तक वो राजा रहा. सिकंदर के बाद कुछ विशेष नहीं हुआ लेकिन तभी ईसा पूर्व 63 में इजराइल में रोमन की एंट्री होती है और यहूदियों का जमकर कत्लेआम शुरू होता है. और इसी दौर में यरुशलम की उसी जमीन पर जहां आज अल अक्सा मस्जिद है और जो विवाद का केंद्र बना हुआ है वहां ईसा मसीह का जन्म होता है. ईसा एक यहूदी थे लेकिन वो अपनी विचारधारा लेकर आए. उन्होंने अपने धर्म का प्रचार किया जो #रोमन और #यहूदी दोनो को पसंद ना आया. ईसा ने खुद को परमेश्वर का पुत्र कहा और चमत्कार किए कई यहूदी उनके शिष्य बनने लगे और ईसाई धर्म की नींव पड़ी और बस यहीं पर यहूदियों से वो गलती हो गई जिसकी भरपाई अगले 2000 साल तक करनी पड़ी.
ऐसा आरोप है कि यहूदियों ने ही रोमन गवर्नर पिलातुस को भड़काया और ईशु की शिकायत कर दी. पिलातुस ने यहूदियों को खुश करने के लिए ईसा को सलीब पर चढ़ाकर मारने का आदेश दिया तब ईशू की उम्र 30-33 साल बताई जाती है. ईशु की मौत में जिम्मेदार होने का कलंक यहूदियों के साथ चस्पा हो गया कि ये श्राप बन गया इसके बाद तो कई सदियों तक यहूदियों का नरसंहार हुआ है. हालांकि पोप बेनेडिक्ट 16वें ने ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने के आरोप से यहूदियों को मुक्त करार दे दिया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इतिहास में इस एक घटना के कारण इतना रक्त बहा जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती. यहूदी धर्म के आलोचकों के मुताबिक यहूदी धर्म को धार्मिक श्राप मिला है और उसका एक बहुत बड़ा कारण ईसा की मृत्यु में रोमन का साथ देना है. ईशु के बाद दुनिया में जहां भी #ईसाई साम्राज्य स्थापित हुए वहां यहूदियों के रक्त से होली खेली गई लेकिन इन दो धर्मों की लड़ाई में #इस्लाम की एंट्री कब और कैसे हुई ये जानना भी दिलचस्प है.
यहूदियों को मिले धार्मिक श्राप का पहला नजारा ईसा की मौत के करीब 37 साल बाद देखने को मिला जब यहूदियों ने इजराइल पर राज कर रहे रोमन साम्राज्य के खिलाफ बगावत की दी और बदले में रोमन सेनाओं ने यरुशलम को रौंद डाला. ऐसा कत्लेआम इतिहास में नहीं देखा गया था कहा जाता है कि एक ही दिन में करीब 1 लाख से ज्यादा यहूदियों को कत्ल कर दिया गया और सेकंड टैंपल भी नेस्तनाबूद कर दिया. यहूदियों की बहुत सी धार्मिक किताबें और धार्मिक चिन्ह और महत्व की चीजें भी तबाह हो गई और यहीं से शुरू होता है यहूदी डायसपोरा. जो साल 1917 तक जारी रहा करीब 1900 साल का कत्लेआम.

यहूदी डायसपोरा का अर्थ है यहूदियों का इजराइल से भागना और दुनिया के दूसरे मुल्कों में शरण लेना. वो यूरोप, अफ्रीका, अरब और एशिया तक में फैल गए पर कत्लेआम नहीं रुका. रोमन को लगता था कि ईसाई और यहूदी एक ही हैं और वो दोनों का दुश्मन रहा जबकि यहूदी और ईसाई एक-दूसरे कि खिलाफ लड़ रहे थे.
वर्चस्व का त्रिकोणीय मुकाबला अगले 300 साल तक जारी रहा और अरब में लाशों के पहाड़ खड़े कर दिए गए . ईसा 300 में बहुत बड़ा टर्निंग प्वाइंट आया कांस्टैंटिन द ग्रेट जो कि एक रोमन राजा था उसने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया वो पहला रोमन बादशाह हुआ जिसने ईसाई धर्म को चुना और यहां से यहूदियों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गईं क्योंकि अब रोमन और ईसाई एक हो चुके थे जबकि यहूदी बिल्कुल अकेले पड़ गए. अब तो क्या रोमन और क्या ईसाई. सभी ने मिलकर यहूदियों को कहीं का नहीं छोड़ा. ऐसे दौर भी आए जब यहूदियों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए. वो गुलाम नहीं रख सकते थे. बाहर शादी नहीं कर सकते थे, अपने धार्मिक स्थल नहीं बना सकते.
अगले 500 साल तक ईसाई ही यहूदियों के दुश्मन रहे लेकिन ईस्वी 570 आ चुकी थी और यहूदी डायसपोरा को करीब 500 साल पूरे हो चुके थे. इसी साल मक्का में हजरत मोहम्मद का जन्म हुआ. ईस्वी 622 में वो मक्का से मदीना गए जिसे इस्लाम में हिजरी कहा जाता है. मदीना में तब अरबी कबीलों के आलावा ज्यादा आबादी यहूदियों की थी और तीन मुख्य कबीले यहूदियों के पास थे. यहां पर इस्लाम और यहूदियों के बीच संधि हुई कि जब मक्के से हमला होगा तो मुसलमान और यहूदी मिलकर उनका मुकाबला करेंगे और यहां से यहूदियों के जीवन में पहली बार इस्लाम की एंट्री हुई. इस्लाम के जानकर आरोप लगाते हैं कि यहूदियों ने पैगंबर मोहम्मद के साथ धोखा ही किया और कई बार उनके दुश्मनों का साथ दिया और यहीं से यहूदियों और इस्लाम के बीच अविश्वास और दुश्मनी की नींव पड़ी जो आज भी बदस्तूर जारी है.
इतिहास में मुसलमान और यहूदी हमेशा एक दूसरे के दुश्मन नहीं रहे दोनो धर्म साथ-साथ भी रहे हैं. खलीफा उमर के दौर में भी ऐसा ही हुआ. जब मुसलमानों ने सातवीं शताब्दी में स्पेन को फतह किया तो दोनो ने वहां अच्छा दौर भी देखा लेकिन साल 1099 में यूरोप के ईसाई भी संगठित हो चुके थे और क्रूसेडर का क्रूर कालखंड आरंभ हुआ. अब यूरोप से लेकर अरब के मैदान में दो नहीं बल्कि तीन धर्म एक दूसरे से वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे. ईसाइियों, इस्लाम और यहूदियों के बीच जमकर तलवारें चलीं. साल 1271 तक यूरोप के ईसाइयों ने धार्मिक युद्ध छेड़ दिया वो पवित्र भूमि फिलिस्तीन और उसकी राजधानी जेरूसलम जहां ईसा का जन्म हुआ था उसे मुसलमानों से छीनने के लिए युद्ध करने लगे. स्पेन से धीरे धीरे मुसलमान और यहूदियों को बाहर निकलना पड़ा और यहूदी या तो दुनिया के अलग हिस्सों में फैले या फिर हजारों की संख्या में अपने पूर्वजों की घरती इजराइल लौटे और बस्तियां बसानी शुरू कर दी.
भारी संख्या में यहूदी फिर से इजराइल लौटते हैं और 12वीं सदी मामलूक पीरियड और फिर उस्मानिया साम्राज्य के तहत रहते हैं. इस दौरान यहूदियों पर बहुत सी पाबंदियां लगाई गईं लेकिन मरता क्या ना करता उनको सबकुछ सहना पड़ा और पिछली कई सदियों से अपने घर के लिए भटक रहे यहूदियों का सब्र जवाब दे गया उनको लगा कि अब कुछ करना होगा नहीं तो आने वाली पीढ़ियों को क्या मुंह दिखाएंगे. कब तक इस तरह भटकते रहेंगे. इसी विचार को केंद्रबिंदू रख 17वीं शाताब्दी में हशकला मूवमेंट ने जोर पकड़ा . यहूदी राष्ट्रवाद की कल्पना ने पहली बार जन्म लिया. अब यहूदी अपने लिए एक जमीन का टुकड़ा चाहते थे जहां वो अपनी नस्ल को पाल सकें. यहूदियों ने अपने धर्म को फिर से पुर्नजीवित किया और तय किया कि एक देश तो उनके हिस्से होना ही चाहिए.
उस्मानिया साम्राज्य में भी यहूदियों की हालत अच्छी नहीं थी जिसके कारण इन्होंने रूस में भी शरण लेने की कोशिश की लेकिन वहां भी इनका नरसंहार हुआ और ईसा की मृत्यु के साथ चला आ रहा श्राप परछाई बनकर चलता रहा फिर यहूदियों को पौलेंड और लिथुआनिया में सुरक्षित ठिकाना मिला पर वो भी लंबे अरसे तक ना रहा क्योंकि ये भी तो किराए की ही जमीन थी.
बहरहाल अगले संकट से बेखबर यहूदियों ने पौलेंड में खुद को फिर से संगठित किया. ऐसा लगने लगा कि अब यहूदियों को उनके अधिकार मिल जाएंगे क्योंकि नेपोलियन ने फ्रांस की क्रांति के बाद इन्हें फ्रांस बुलाया लेकिन जल्द ही वहां भी इनके दुश्मन पैदा हो गए. यहूदियों ने ना तो कभी यीशू को और ना ही कभी हजरत मोहम्मद को पैगंबर का दर्जा दिया और यही कारण है कि इनको ईसाई और मुसलमानों ने कभी गले नहीं लगाया. कुछ अरसे तक साथ रहा लेकिन लंबा ना चला. कहना गलत नहीं होगा कि मुठ्ठी भर यहूदियों को अपने धर्म पर टिके रहने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है.
अब तक पहले विश्वयुद्ध का बिगुल बज चुका था यहां से ब्रिटेन की एंट्री मिडिल ईस्ट में होती है. इजराइल की भूमि पर मुसलमान भी रह रहे थे और यहूदी भी ये इजराइल भी था और फिलिस्तीन भी और जिस तरह ब्रिटेन ने भारत और पाकिस्तान का बंटवारा कर कभी ना समाप्त होने वाली दुश्मनी पैदा कर दी ठीक उसी तरह उसी कालखंड में यहूदियों को उनका अधिकार दिलाने का झांसा दिया.
बदले में समर्थन लेते रहे और आखिरी में सब चौपट करके चले गए. पहले विश्वयुद्ध के साथ ही उस्मानिया साम्राज्य का अंत हो गया और इजराइल में बचे यहूदी और मुसलमान जो अपने अपने लिए मुल्क चाहते थे. पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही इजराइल के हिस्से में यहूदी आबादी जमना शुरू हो गई जिसका असर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दिखा.
फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर के बीच का समय यहूदी इतिहास का सबसे काला अध्याय साबित हुआ. जर्मनी के जरिए हिटलर ने दुनिया को हिला दिया और शुरू होता है यहूदी होलोकॉस्ट का चैप्टर. कहा जाता है कि करीब 60 लाख यहूदियों को हिटलर ने गैस चैंबर में मरवा दिया और जो बच गए उनकी हालात मुर्दे जैसी थी. इस दौरान जर्मनी समेत यूरोप के बहुत से हिस्सों से यहूदी अमेरिका और इजराइल पहुंचे.
अमेरिका पहुंचने वालो यहूदियों में से एक थे दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में शुमार अल्बर्ट आइंस्टीन जो जर्मनी में पैदा हुए पर अमेरिका में जाकर शरण लेनी पड़ी. दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर की हार हुई और संयुक्त राष्ट की स्थापना हुई.
संयुक्त राष्ट्र की आगुवाई में दुनिया ने तय किया कि अब यहूदियों को उनका एक देश दे देना चाहिए और इस तरह साल 1948 में उस भूमि का बंटवारा हो गया जहां सबसे पहले यहूदियों ने राज किया था किंग डेविड और किंग सोलोमन के समय. हां बाद में वहां रोमन, सिकंदर, बेबलियोन, मुसलमान और ईसाइयों ने भी राज किया। साल 1948 के बाद का इतिहास तो सबको पता है एक हिस्सा अरब को गया और
दूसरा हिस्सा यहूदियों को मिला मगर ये बंटवारा अरब देश को रास ना आया. कई बार इजराइल और अरब मुल्कों की जंग हुई और हर बाहर अरब मुल्कों को मुंह की खानी पड़ी. इस युद्ध का सबसे ज्यादा खामियाजा उन मुसलामानों को भी उठाना पड़ा जो अलग फिलिस्तीन की मांग कर रहे थे यासिर अराफात इन्हीं के नेता थे. 1967 में 6 दिन का युद्ध हुआ जिस में अरब देशों की हार हुई और इजराइल ने जेरूसलम
के बड़े भाग पर कब्जा कर दिया और फिलिस्तीनी रिफ्यूजी हो गए . तब से जो आग लगी है वो मिडिल ईस्ट को लगातार जला रही है.
इतिहास को बारीकी और निष्पक्षता से देखेंगे तो कुछ तथ्य ज्ञात होंगे जैसे कि यहूदियों के ऊपर 2 हजार साल तक बेशुमार अत्याचार हुए हैं, यहूदियों की रंजिश मुसलामनों से ज्यादा रोमन और ईसाइयों से रही है, मुसलामनों और यहूदियों की दिक्कत तो मात्र 100 साल पुरानी है, रोमन ने यहूदियों का जैसा कत्लेआम किया वैसा इतिहास में कहीं और नहीं दिखता और कई जगहों पर यहूदी और मुसलमान साथ भी रहे हैं जैसे मदीना और स्पेन लेकिन उनके बीच विश्वास कभी पैदा ना हो सका. ईसाई और इस्लाम से भी प्राचीन होने के बावजूद यहूदियों के पास सदियों तक अपना कोई मुल्क नहीं रहा. आज जो इजराइल है वो मणिपुर जितना होगा. यहूदी अपने पूर्वजों की भूमि इजराइल और खासतौर से जेरूसलम को लेकर बहुत इमोशनल हैं क्योंकि यहां पर कभी उनकी सल्तनत थी यहीं पर उनका पहला और दूसरा मंदिर था और यहूदियों को भरोसा है कि यहीं पर उनका तीसरा मंदिर बनेगा.
वो आज भी जेरुशलम को अपना सबसे पवित्र स्थान मानते हैं. यहीं पर टेंपल माउंट भी है और अल अक्सा मस्जिद भी और यीशू का जन्म भी यहीं हुआ है. इसलिए जेरुशलम का ये परिसर अखाड़ा बन चुका है लेकिन ये गलती वर्तमान की नहीं इतिहास की है जिसकी सजा आज की पीढी भुगत रही है चाहे वो यहूदी हो या फिलिस्तीनी.
(काशी, 13मई 2021, गुरूवार)
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#यहूदी #यरूसलम #फीलीस्तीन #इजरायल

शनिवार, 1 मई 2021

#कड़ुवा_सच....

व्योमवार्ता/व्योमेश चित्रवंश की डायरी,1मई2021

#कड़ुवा_सच....

           विदेशी मीडिया जब साल भर पहले भारत के स्ट्रेटेजी की तारीफ कर रही थी तब हम चैतन्य नही हुये आज जब विदेशी मीडिया हमारे देश की आलोचना कर रही है तो हम अपने सरकार पर उंगली उठा रहे हैं।
इस कोरोना के दूसरी लहर के लिये सिर्फ व सिर्फ हम जाहिल गवाँर अपने मनमर्जी से चलने वाले लोग जिम्मेदार है। सरकार साल भर से मास्क और दो गज की दूरी के लिये चिल्ला रही थी तो हमे मोबाईल पर आ रहे संदेश बेमानी लगते थे. हम बिना मास्क भीड़भाड़ मे रहने मे अपनी शेखी समझते थे।
अब हम आलोचनात्मक मिजाज मे खड़े है पर खुद के सीने पर हाथ रख यह पूछने का साहस नही कर पा रहे हैं कि जनसंख्या से लेकर वृक्षारोपण तक अस्पताल से लेकर अनुशासन तक हम ने कितनी बार एक अच्छे भारतीय तो दूर साधारण नागरिक का फर्ज पूरा किया है?
(बनारस, 1मई2021 शनिवार)
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#Covid_19
#व्योमवार्ता

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

हम न मरब मरिहै संसारा.../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 अप्रैल 2021/व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/ #हम_न_मरब_मरिहैं_संसारा.....

          इस बीमारी से मचे हाहाकार के बीच गांवों में पेड़ों से महुआ टपकने लगा है। सारे पेड़ नयी पत्तियों से लद कर बताने लगे हैं कि प्रकृति ने उनके लिये नया वस्त्राभूषण भेज दिया है।
भोर में मादक हवा वैसे बह रही है जैसे हर वर्ष बहती है। भोर मे आँख खुलते ही कानों मे चीड़ियों के ची ची ची ची के #सुप्रभाती संदेश के आगे व्हाट्सएप्प फेसबुक के #फर्जी_गुडमार्निंग फीके और औचित्यहीन लगते हैं। सुबह सुबह गेंहू काटती महिला मजदूर जब हँसुआ खिंचती हैं तो एकसाथ तीन ध्वनियां निकलती हैं। हँसुआ की सरसराहट और बालियों की खनखनाहट के बीच यदि काटने वाली के हाथ की चूड़ियाँ भी खनक उठें तो मान लीजिये, यही प्रकृति का महा-रास है।
      सम्पूर्ण संसार में पसरी इस महामारी से मनुष्य को छोड़ कर और कोई भी जीव प्रभावित नहीं है। क्यों? इस क्यों का उत्तर बहुत कठोर है, पर...
     आम के पेड़ों पर टिकोरे जवाँ हो रहे हैं और उनको देख कर मचल उठने वाला बालमन भी! जिन बच्चों का बचपन अंग्रेजी स्कूलों में गिरवी रख दिया गया है, उन्हें छोड़ दें तो सचमुच के बच्चे अब भी बगीचों में सुतुही (ब्लेड) और नमक ले कर मंडराने लगे हैं। और घर के बड़े यह सोच कर खुश हैं कि गेंहू की फसल इस साल शानदार हुई है। तो क्या आपको नहीं लगता कि ये  नववर्ष भी सचमुच बहुत सुंदर है?
      आशुतोष भगवान शिव के ही इस अविमुक्त काशी से सदियों पूर्व #बनारस के अलमस्त फक्कड़ #कबीर ने कहा था, "हम न मरब मरिहैं संसारा..." । बस अपने अंदर के उसी अविमुक्तेश्वर कल्याणकारी शिव और #फक्कड़ कबीर को जगाने की जरूरत है।
अखबार  सोशल मीडिया और समाचार चैनल बताते हैं कि रोज सैकड़ों लोग मर रहे हैं। मैं रोज बस यह खोज कर पढ़ता हूँ कि प्रतिदिन लाखों लोग इस बीमारी को हरा कर ठीक हो रहे हैं। 97%सकारात्मकता पर 3%नकारात्मकता भारी नहीं पड़नी चाहिये। मैं प्रतिदिन यही प्रार्थना करता हूँ कि हम सब उन लाखों ठीक होने वालों में रहें, सैकड़ों में नहीं...
     महामारी का भय प्रबल है, पर इस डर के आगे जीत है!! हम इससे बचने का हर प्रयत्न करेंगे, पर डरेंगे नहीं। मास्क, सेनेटाइजर, दूरी, वैक्सीन, जो भी उपाय सम्भव है उसे अपनाया जाय, पर भय नहीं...
ऐसी जाने कितनी आपदाओं को अनेकों बार अपने साहस के बल पर पैरों तले रौंदा है हमने। अगर एक दिन चले जाना ही सृष्टि का नियम है तो यह महामारी भी जाएगी। सम्भव है कि कल  कुछ लोग न रहें, पर जो रहेंगे वे देखेंगे कि कुछ खास नहीं बदला...
संसार का सौंदर्य जब भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के धराधाम छोड़ने से नहीं घटा तो हम क्या चीज हैं भाई...
      जीव अपनी जिजीविषा के बल पर दीर्घायु होते हैं। जो लड़ेगा वह जीतेगा...
आइए मिलकर लड़ते हैं इस सुनिश्चित जीत के लिए परमपिता परमेश्वर से इस कामना के साथ कि अब और नहीं भगवन, अब तो आंखो के रीत भी सूख चले हैं।
          सौ साल पहले हमारे बुजुर्गों ने बिना किसी दवा और वैक्सीन के ही प्लेग को हराया था, फिर हम तो तब की तुलना में आज बहुत शक्तिशाली हैं। और हम तो बनारस वाले हैं जो मसान मे होली खेलते हुये भी अलख जगाते है #हम_न_मरब_मरिहैं_संसारा......
          आईये, इस प्रकृति के सौन्दर्य और स्वरूप का आनंद लेते हुये भगवान ने जो हमारे लिये दे रखा है उसी मे संतुष्ट हो कर सुखपूर्वक जीवन का आनंद लें। पहले आई ढेरों महामारियों की तरह #कोरोना भी जैसे आया है वैसे ही चला जायेगा।
#व्योमवार्ता
#कोविड_19
(बनारस, 30अप्रैल 2021,शुक्रवार)
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शनिवार, 24 अप्रैल 2021

वर्तमान आपदा काल में आध्यात्मिक पहलू

वर्तमान आपदा काल में आध्यात्मिक पहलू।

एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे :-
*"कहो राम !  सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ  ?"*
राम मुस्कुराए :- 
*"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य ?"*
*"जानते हो राम !   तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्में भी नहीं थे|*  
यह भी नहीं जानती थी,
कि तुम कौन हो ?
कैसे दिखते हो ?
क्यों आओगे मेरे पास ?  
*बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा|*
राम ने कहा :-
*"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है”|*
"एक बात बताऊँ प्रभु !  
*भक्ति के दो भाव होते हैं |   पहला  ‘मर्कट भाव’,   और दूसरा  ‘मार्जार भाव’*|
*”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है,   और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है|  दिन रात उसकी आराधना करता है...”* (मर्कट भाव)
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया|  *”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी,   जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न,   वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है...   मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना..."* (मार्जार भाव)
राम मुस्कुरा कर रह गए |
भीलनी ने पुनः कहा :-  
*"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न...   “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं”|   तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य,   मैं वन की भीलनी...   यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते ?”*
राम गम्भीर हुए | कहा :-
*भ्रम में न पड़ो मां !   “राम क्या रावण का वध करने आया है” ?*
*रावण का वध तो,  लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है|*
*राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है,   तो केवल तुमसे मिलने आया है मां,   ताकि “सहस्त्रों वर्षों बाद,  जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे,   कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था”|*
*जब कोई  भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं !   यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ,   एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है|*
*राम वन में बस इसलिए आया है,   ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय,   तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है”|*
(अंत्योदय)
*राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं|   राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया हैं  मां|*
माता सबरी एकटक राम को निहारती रहीं |
राम ने फिर कहा :-
*राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता ! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है,   भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए”|*
*राम निकला है,   ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है”|*
*राम निकला है,   कि ताकि “भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है”|*
*राम आया है,   ताकि “भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है”|*
*राम आया है,   ताकि “युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय”|*
और
*राम आया है,   ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं”|*
सबरी की आँखों में जल भर आया था|
उसने बात बदलकर कहा :-  *"बेर खाओगे राम” ?*
राम मुस्कुराए,   *"बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां"*
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया|
राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :-
*"बेर मीठे हैं न प्रभु” ?*
*"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां ! बस इतना समझ रहा हूँ,  कि यही अमृत है”|*
सबरी मुस्कुराईं, बोलीं :-   *"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम"*
हिम्मत ना हारिए।
ना हारने देंगे श्री राम।
🙏अपने राम पर भरोसा रखें।वे हमारे साथ हैं। जो ईच्छा करिहौ़ मन माही।
प्रभु प्रताप कुछ दुर्लभ नाही।।🙏
(बनारस, २४ अप्रैल २०२१, शनिवार)
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मंगलवार, 16 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर व्योमेश चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब

#यह_सड़क_मेरे गांव_को_नही_जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर #व्योमेश_चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब

          एक लंबे अंतराल के बाद एक किताब पढ़ने को मिली जिसने गांव की यात्रा करवाई,जिसका शीर्षक वाकई एक रहस्य और दर्द को छुपाये हुये है कि सड़क (लेखक के संग ही समस्त पाठकों के) गांव को नही जाती ,जो खुद अपने गांवों से बिछुड़ गये है।आज वो गांव मिल जाने पर भी या यूं कहे दिख जाने पर भी अनजान सा लगता है। हालांकि अब उस गांव के खेत खलिहानों मे अब बैल की जगह ट्रैक्टर  नजर आते हैं। प्राईमरी स्कूल जहां टाटपट्टी  की जगह मेज कुर्सी दिखती है। अवसरविशेष पर लगने वाले मेले  की जगह माल और मल्टी मार्ट ने ले लिया है। गांव के दादा,दादी,बूढ़ी काकी तो अभी भी है पर उनके गोंद मे खेलने वाले वो नाती,पोते और हुड़दंग मचाने वाली बच्चा मण्डली  नजर नही आती ।
        किताब के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये गांव मे बिताये गये जीवन के हिस्से किसी एलबम की तस्वीरों की तरह जीवन्त हो उठते है जैसे अपने जीवन का ही कोई चलचित्र चल रहा हो। हर कहनी हर किस्से के अंत मे बहती पुरवईया जैसा महसूस हो रहा है, जिसके कारण पुरानी यादों का दर्द व टीस ऊभर आता है। यह लेखक की सफलता है कि उसने अपने मन की पीड़ा के साथ पाठक के संवेदना को ऊभारा है ,जो कही खो गया था या स्मृति से विलुप्त हो गया था ।
सचमुच आज की सड़क उस गांव को नही जाती जहां भारत गांवों का देश होता था। विडंबना यह है कि शहर तो कंक्रीट के ज़गल बनते जा रहे हैं और सरकर गांव का भौतिक विकास कर रही है भले वह कंक्रीट व कोलतार से ही क्यों न हो, पर यह भी कडुआ सच है कि कंक्रीट व कोलतार वातावरण मे जीने के लिये सांस नही मुहैय्या करा पाते ।
                किताब के किस्से गुदगुदाते हुये हंसाते है और हंसाते हंसाते आँसू  निकाल देते है पर किस्से का अंत होते होते  यही हँसी किस्से मे उठाये गये सवालो के साथ गले को रू़धते हुये सिसकियों मे बदल जाती है । पाठक कुछ कहना चाह कर भी भीगे मन और रोते दिल से कुछ बोल नही पाता । वह खुद से सवाल पूछता है कि उसने इन बीते सालों मे क्या खो दिया? उसका सब कुछ उसके आस पास दिख रहा है गांव भी, मगर हकीकत मे  ये वो गांव नही जो गरीब होने के बावजूद दिल से अमीर था। कमजोर और बदरंग  दिखता था मगर वो  मजबूत और सतरंगी स्वभाव को अपने मे समेटा था जैसा कि लेखक अपनी किताब के भूमिका मे अपनी बात मे ही कह देते हैं। लेखक की बात से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ और मै ही नही गांव से रिश्ता रखने वाला हर पाठक सहमत ही होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।
लेखक को सौ सौ बार साधुवाद जो पाठक के मनोभावों को उसकी अपनी मन की भाषा के साथ बहुत गहरे तक पकड़ा है और उसे कलमबद्ध किया है। किताब को पढ़ते समय मेरे जेहन मे  किसी शायर की नज्म याद  आती है ," यादों का एक झोंका आया , मिलने हमसे बरसों बाद......"
एक बार पुन: लेखक व्योमेश चित्रवंश जी को बधाई। हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों म उनकी अगली किताब भी हमे जिन्दगी के ऐसे बिछुड़े लम्हों को जोड़ने मे सफल होगी।

-सूर्य भान सिंह
(सूर्य भान सिंह 'पृथ्वीमित्र' प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता है| वाराणसी को पहचान देने वाली आदि पौराणिक नदी #वरूणा के पुनरूद्धार और पुनर्जीवन देने मे आपका महती योगदान रहा है। देश के उत्तरी छोर पर स्थित कारदुंगला के रोमांचक यात्रा मे अनजाने मे ही रिकार्ड अपने नाम दर्ज कराने वाले सूर्यभान जी का कार्यक्षेत्र  पूर्वोत्तर के बागडोगरा और सिलीगुड़ी के पहाड़ भी रहे हैं। इनके पर्यावरण के क्षेत्र मे योगदान के फलस्वरूप दि अर्थ फाऊण्डेशन ने 'पृथ्वीमित्र' सम्मान दिया | वर्तमान मे बनारस मे रह कर जल और शिक्षा के क्षेत्र मे अपना योगदान दे रहे #सूर्य_भान_सिंह_पृथ्वीमित्र' साहित्य व संस्कृति के गभीर अध्यासु हैं|)

शनिवार, 6 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती की समीक्षा मित्र सूर्यभान सिंह की लेखनी से

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर व्योमेश चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब
          एक लंबे अंतराल के बाद एक किताब पढ़ने को मिली जिसने गांव की यात्रा करवाई,जिसका शीर्षक वाकई एक रहस्य और दर्द को छुपाये हुये है कि सड़क (लेखक के संग ही समस्त पाठकों के) गांव को नही जाती ,जो खुद अपने गांवों से बिछुड़ गये है।आज वो गांव मिल जाने पर भी या यूं कहे दिख जाने पर भी अनजान सा लगता है। हालांकि अब उस गांव के खेत खलिहानों मे अब बैल की जगह ट्रैक्टर  नजर आते हैं। प्राईमरी स्कूल जहां टाटपट्टी  की जगह मेज कुर्सी दिखती है। अवसरविशेष पर लगने वाले मेले  की जगह माल और मल्टी मार्ट ने ले लिया है। गांव के दादा,दादी,बूढ़ी काकी तो अभी भी है पर उनके गोंद मे खेलने वाले वो नाती,पोते और हुड़दंग मचाने वाली बच्चा मण्डली  नजर नही आती ।
        किताब के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये गांव मे बिताये गये जीवन के हिस्से किसी एलबम की तस्वीरों की तरह जीवन्त हो उठते है जैसे अपने जीवन का ही कोई चलचित्र चल रहा हो। हर कहनी हर किस्से के अंत मे बहती पुरवईया जैसा महसूस हो रहा है, जिसके कारण पुरानी यादों का दर्द व टीस ऊभर आता है। यह लेखक की सफलता है कि उसने अपने मन की पीड़ा के साथ पाठक के संवेदना को ऊभारा है ,जो कही खो गया था या स्मृति से विलुप्त हो गया था ।
सचमुच आज की सड़क उस गांव को नही जाती जहां भारत गांवों का देश होता था। विडंबना यह है कि शहर तो कंक्रीट के ज़गल बनते जा रहे हैं और सरकर गांव का भौतिक विकास कर रही है भले वह कंक्रीट व कोलतार से ही क्यों न हो, पर यह भी कडुआ सच है कि कंक्रीट व कोलतार वातावरण मे जीने के लिये सांस नही मुहैय्या करा पाते ।
                किताब के किस्से गुदगुदाते हुये हंसाते है और हंसाते हंसाते आँसू  निकाल देते है पर किस्से का अंत होते होते  यही हँसी किस्से मे उठाये गये सवालो के साथ गले को रू़धते हुये सिसकियों मे बदल जाती है । पाठक कुछ कहना चाह कर भी भीगे मन और रोते दिल से कुछ बोल नही पाता । वह खुद से सवाल पूछता है कि उसने इन बीते सालों मे क्या खो दिया? उसका सब कुछ उसके आस पास दिख रहा है गांव भी, मगर हकीकत मे  ये वो गांव नही जो गरीब होने के बावजूद दिल से अमीर था। कमजोर और बदरंग  दिखता था मगर वो  मजबूत और सतरंगी स्वभाव को अपने मे समेटा था जैसा कि लेखक अपनी किताब के भूमिका मे अपनी बात मे ही कह देते हैं। लेखक की बात से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ और मै ही नही गांव से रिश्ता रखने वाला हर पाठक सहमत ही होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।
लेखक को सौ सौ बार साधुवाद जो पाठक के मनोभावों को उसकी अपनी मन की भाषा के साथ बहुत गहरे तक पकड़ा है और उसे कलमबद्ध किया है। किताब को पढ़ते समय मेरे जेहन मे  किसी शायर की नज्म याद  आती है ," यादों का एक झोंका आया , मिलने हमसे बरसों बाद......"
एक बार पुन: लेखक व्योमेश चित्रवंश जी को बधाई। हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों म उनकी अगली किताब भी हमें जिन्दगी के ऐसे बिछुड़े लम्हों को जोड़ने मे सफल होगी।

-सूर्यभान सिंह

गुरुवार, 4 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती

#व्योमवार्ता/ यह सड़क मेरे गांव को नही जाती / व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 4मार्च 2021


कल सायं प्रख्यात हिन्दी समीक्षक,लेखक और गुरूवर डाॅ०राम सुधार सिंह सर Ram Sudhar Singh ने फोन कर यह सड़क मेरे गांव को नही जाती के लिये यह कहते हुये बधाई दिया कि "अभी तुम्हारी किताब पढ़ के उठा हूँ,आज से पहले ग्रामीण जीवन पर इससे सुंदर व भावप्रधान संस्मरण मैने नही पढ़ा था।" लगे हाथ मैने सर से समीक्षा की माँग कर डाली तो सर ने आश्वस्त किया है कि हफ्ते दस दिन मे वे लिख देगें।

राम सुधार सर के समीक्षा की प्रतीक्षा की हमारी उत्सुकता इसलिये महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे मेरे शुरूआती लेखन को ऊंगली पकड़ कर सिखाने और सुधारने वालों मे से हैं। विश्वास है कि सर की समीक्षा फिर कुछ नया सिखलायेगी।
🙏आपके स्नेह से अभिभूत हूँ सर🙏
(बनारस,4 मार्च 2021, गुरूवार)
#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती
#व्योमवार्ता



शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

व्योमवार्ता/ हमारे विद्वान मित्र

व्योमवार्ता /व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27फरवरी 2021, शुक्रवार

हमारे मित्र एक नामालूम से बहुत बड़ी पार्टी के मण्डल महासचिव पद पर है। खुद को बौद्ध धर्मावलंबी मानते हैं पर मानने के अतिरिक्त कुछ नही करते। विधायकी के चुनाव में तीन अंकों में वोट पा चुके हैं। उन्हें इस बात का भ्रम बराबर बना रहता है कि देश के लिए बनने वाली नीतियां मूलतः उनकी ही हैं जिन्हें सरकारी मुलाजिम चुरा कर सत्ता वाली सरकारी पार्टी के नाम लागू कर देते हैं। उम्दा ज्ञान रखते हैं पर उस ज्ञान का स्त्रोत इस लिए नही बताते कि कहीं  उनके नीतियों की तरह लोग उनके ज्ञान स्त्रोत को भी न चुरा लिया जाए। किसी तथ्य के प्रामाणिकता के संबंध में पूछने पर यह कह कर बरी होने की कोशिश करते हैं कि प्रमाण वह नही बतायेगें क्योंकि उससे मौलिकता चोरी हो सकती है,आप को चाहिए तो आप ढूंढिए। तीन विरोधाभासी शब्दों के संयुक्त नाम राशि वाले ये सज्जन पुरुष बावजूद इसके हमें इस लिए प्रिय हैं क्योंकि वे हमारे मित्र हैं।
कल उन्होंने एक नई जानकारी यह दिया कि सिद्धार्थ गौतम बुद्ध रामायण काल के पहले थे क्योंकि रामायण में बुद्ध क‌ई बार लिखा हुआ मिलता है।
अब मैं उन्हें क्या समझाऊं क्योंकि वे अपने पार्टी में बड़े विद्वान माने जाते  हैं।
(बनारस, 27फरवरी 2021, शुक्रवार)
http://chitravansh.blogspot.in
#व्योमवार्ता
#हमारे_विद्वान_मित्र