बुधवार, 9 नवंबर 2016

बनारस टॉकीज, शानदार जबर्दस्त जिन्दाबाद : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 मई 2016 शनिवार, नई दिल्ली


सुना है लोग उसे ऑख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त हैं उसको खराब हालों से
सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं

        अस्सी घाट। दक्षिण से उत्तर की ओर जाते हुये पहला घाट। वरूणा और अस्सी नदियों के संगम का घाट। संतों का घाट। चंटों का घाट। कवियों का घाट। छवियों का घाट। गँजेड़ियों का घाट। भँगेड़ियों का घाट। मेरा घाट। दादा का घाट। हमारा घाट।

       मंडुआडीह-नईदिल्ली स्पेशल गाजियाबाद स्टेशन से गुजर रही है और मै अभी तक बनारस टॉकीज के हँसते, गुदगुदाते, मुस्कराते, खिलखिलाते, किलकते कथानक मे डूब उतरा रहा हूँ। कल रात मंडुआडीह रेलव् स्टेशन पर बुक स्टाल पर बनारस टॉकीज नाम देख सत्य व्यास का यह बेस्ट सेलर उपन्यास खरीद लिया। ट्रेन में बैठते ही जब पहला पन्ना पढ़ना शुरू किया तो यह मुझे बिलकुल अपनी कहानी लगी। उपन्यास के कहानी के साथ साथ खुद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे बीताये गये अपने पुराने दिन याद आते गये। पूरा उपन्यास चलती ट्रेन, मन मे चलती यादों के साथ कब तक आखिरी पेज पर चलते हुये पहुँच गया पता ही नही चला।

         “अच्छा, तो कहानी में interest आ रहा है? पूरी कहानी सुननी है? तो बैठिये; थोड़ा टाइम लगेगा। पेप्सी और चिप्स मँगवा लीजिये।” 
अब आपसे क्या छुपाना बाऊ साहब। जब कहानी सुनानी ही है तो कहानी शुरू करने से पहले बता दूँ कि इस कहानी का सूत्रधार मैं हूँ- मैं यानी सूरज। अरे वही! Girl’s hostel and all that. किसी से कहियेगा मत! कसम से, अपना समझ के बता रहे हैं आपको।
तारीख़ी तौर पर बंधी इस कहानी का दौर इक्कीसवीं सदी का पहला दशक है। कहानी उन दिनों शुरू होती है जब तेरह टांगों वाली सरकार जा चुकी थी। सुनामी के लहरों से कहर दिखा दिया था और देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई बम विस्फोटों के बीच जीना सीख रही थी।
लेकिन यह कहानी तो देश के सांस्कृतिक राजधानी की है- बनारस। और बनारस की भी क्या है साहब! यह तो भगवानदास होस्टल की कहानी है; जो बनारस के हृदय बी एच यू का छत्तीसवाँ होस्टल है। वकीलों का होस्टल।
हाँ! तो भगवानदास होस्टल जाने के लिये आपको बनारस चलना होगा। अरे, वहीं है ना- सर्व विद्या की राजधानी। बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी; जिसे आप बी.एच.यू. भी कहते हैं। आइये चलें :
       बनारस हिंदु यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल भगवानदास में रहने वाले तीन दोस्तों सूरज उर्फ बाबा, अनुराग डे उर्फ दादा और जयबर्धन शर्मा के हॉस्टल में बिताए उन खास दिनों की यह कहानी कमोबेस बीएचयू के हर बंदे की कहानी है। थोड़ी मिलती जुलती, थोड़ी ट्विस्ट ले कर बदलती हुई, जिसे सत्य व्यास ने बेहद खूबसूरती से अपने कलम से पिरो कर बनारस टॉकीज तैयार किया है। सत्य व्यास से हमारी कोई सीधी मुलाकात नही है न ही कभी आमना सामना ही हुआ। समय के सतरों मे देखा जाय तो वे हमसे काफी जूनियर होगें। संभवत: हम लोगो के बीएचयू से निकलने के दो तीन सालों बाद उन्होने प्रवेश ही किया होगा पर उनके बताये व चर्चा किये गये एक एक जगह लंका, माडर्न पेन कंपनी, पिज्जेरिया, अस्सीघाट, प्रताप होटल, बनारस बर्गर सेंटर, गोपाल मैंगो शेक , केशव पान , एट्टीज, टडन जी गार्जियन की टी शाप, अस्सी पर चचियवा की कचौड़ी सब्जी, पहलवान दूध, गुपुतनाथ की चाय, वीटी के समोसे व कोल्डकाफी, एग्रो कैफे, मैत्री जलपान, मधुबन जैसे स्थान बीएचयू के छात्र जीवन मे ऐसे रच बस जाते है मानो वे स्थान न होकर जिन्दगी के हिस्से है। इन्ही जगहों का ताना बाना लेकर और बनारस मे हुये आतंकी विस्फोट के मसाले का छौंका देकर सत्य व्यास ने बनारस टॉकीज को बनाया है जो एक सीटिंग मे पढ़ी जाने वाली मस्तमौला अल्हड़ कहानी है, बनारस के काशिका बोली का विशेष अंदाज मे इस्तेमाल, हास्टल लाईफ की बेबाक रूमानियत व महामना के बगिया मे पढ़ने का अभिमान उन पाठकों को ज्यादा आनंद देगा जिन्होने इस जीवन को, बनारस को जीया है, साथ ही उन्हे भी भरपूर मजा देगा जो एक निर्दोष सरल व सरस कहानी पढ़ना चाहते हैं।

अच्छा दादा, एक बात बताओ तुम कभी किसी लड़की को प्रपोज किए हो?” मैने दादा के हाथ से चाय लेते हुए कहा।

“B.Com में एगो को बोले थे, I Love You” दादा ने कहा।

“फिर?”, मैने पूछा।

“फिर लड़की बोली OK। साला! हमको आज तक समझ नहीं आया कि I Love You का जवाब OK कैसे हुआ। यस नो, कुत्ता, कमीना, जानू, पागल कुछ भी बोलती; आइने में शक्ल या पांव का चप्पल दिखाती; लेकिन OK का क्या मतलब?” दादा ने चाय पीते हुए कहा।

“अबे हंसाओ मत, मर जाएंगे।“ चाय मेरे नाक तक चली गई थी।

“हां। हंस लो साले। अभी तुम्हारा फंसा है ना। अब हम हंसेंगे। पूरा भगवानदास हंसेगा।“ दादा ने चास का कुल्हड़ फेंकते हुए कहा।“

          यह किस्सा बीएचयू के भगवानदास हॉस्टल लाइफ में दिन रात चलने वाले इश्क, रोमांच और जीवन बदलने वाले अनुभव की एक बानगी भर है। बनारस टॉकीज आपको ऐसे-ऐसे मोड़़ों से लेकर गुजरेगी जहां पर आप कभी खुद को खुल कर हंसने से रोक नहीं पाएंगे तो कहीं पर बाबा और दादा के तनाव का हिस्सा बनते नजर आएंगे। कहीं सुना था कि किताबें भी ट्रेन की तरह होती हैं जो आपको आपकी मंजिल के बींच आने वाले हर मोड़ से रुबरू कराते हुए आगे बढ़ती हैं। बनारस टॉकीज भी एक जीवंत ट्रेन की तरह है जो आपको हंसाती है रुलाती है और कभी-कभी आंखे नम भी कर देती है। तो पढ़ें क्‍यों‍कि पढ़ना जरूरी है....
http://chitravansh.blogspot.com

रविवार, 6 नवंबर 2016

Cetan Bhagat's One Indian Girl : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 6नवंबर2016,रविवार

Just completed Chetan's new nowel ONE INDIAN GIRL. No doubt it is a good plot, the story is interesting and based on indian middle class society who dreams a lot for her new generation. They invest thier money their time, thier dedication for success of thier children, but they do not success to seed the social indian traditional and family values in thier children, about which once India was famous. The story of One Indian Girl reveales those differences which are created a major gap berween money and moral, values and modness, Now a days it is so called faminism, this what Bhagat wants Indian women to do as well? To agree with him, to accept his definition of feminism and hail him as ‘progressive’ just because he has ‘represented’ a female voice and talked about women’s issues (from his very male perspective). But here’s the problem: Bhagat is telling an entire generation of Indian readers that a woman who’s successful still cares the most about male validation; that for her, professional success and marital bliss are still mutually exclusive; that she can feel beautiful only by comparing herself to other women. Oh, and most importantly, that ‘feminism’ should be renamed ‘humanism’.
          Well, we still can’t ignore that Bhagat is one of India’s highest-selling novelists and has tremendous influence. And now, due to “One Indian Girl”, countless readers will be exposed to this thoroughly warped version of feminism and will go along with it. In a country like India, where rape culture, the gender pay gap, moral policing, fat-shaming and various other kinds of oppression is rampant in the most horrific of ways, we need feminism more than anything else, and this One Indian Mansplainer is making things worse by painting it in the most dangerous light.
     One thing more, what I feels that chetan is now becoming the fully businessman, for the better selling of the novel, Chetan followed some cheap tactices those were not necessary for the story. Like page number 57 ( which became the issue for twitter also) was a cheapest and sadakchhap masala part which might be presented as symbolic and simple way but it creates a mastram   looks which should be condemed.
       But all through this is good intersting and complete matrimonial family drama.

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

जीवन का यथार्थ भीड़ मे अकेलापन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 02 नवंबर 2016 बुधवार

जीवन का यथार्थ भीड़ मे अकेलापन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 02 नवंबर 2016 बुधवार

                    हजारों की भीड़ में चलता मानव, आज एक अकेला सा ही चला जा रहा है, इसका अनुभव कभी भी किया जा सकता है। कहने को कह सकते है, आप अपने आप को अकेला, न समझे, हम आपके साथ है। पर, हकीकत में क्या ऐसा होता है ? आइये आज इसी दृष्टिकोण पर कुछ चिंतन करते है। सर्व प्रथम हम भारत की संस्कृति पर जरा गौर करते है, जिसमे हमारे पूर्वजों ने इस अकेलेपन के दर्द को बड़ी सहजता से समझा, और कई तरह के उपाय से इसे कम करने की चेष्टा की, दोस्ती, सम्बन्ध, परिवार और समाज में कोई भी इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हो, इसका ख्याल रखा गया। उस समय के चिंतक भी सभी को यही हिदायत देते, “सर्व सुखाय, सर्व हिताय” यानी सबका हित ही सबका सुख हो सकता है। एक का हित और दूसरे का दुःख कम ही स्वीकार्य होता, और इस विचारधारा को नगण्य समर्थन मिलता। आज कि स्थिति के सन्दर्भ में इतना ही कहा जा सकता है, यह चिंतन भारतीय संस्कृति की अब सिर्फ विरासत ही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ, अचानक हमारी सामाजिक चेतना से यह चिंतन क्यों विलुप्त हो रहा ? ऊपरी सतह से देखे, तो समय कि कमी और अर्थ की बढ़ती जरूरत ने आदमी की आत्मिक चेतना को निष्क्रिय कर दिया है, परन्तु इसे पूर्ण सत्यता का दर्जा हम नहीं दे सकते। अर्थ का महत्व कब नहीं था ?, रही समय की कमी, वो भी कैसे मानले, पहले भी जितने घण्टे के दिन रात थे, आज भी उतने के ही है। फिर आखिर क्या हुआ, आदमी अकेलेपन का अहसास क्यों कर रहा है, आजकल ? क्यों वो प्रेम की इतनी बाते करते हुए भी किसीका दर्द बांटने में असफल है ? सवाल संजीदगी से ओतप्रोत है, निश्चय ही उत्तर इतने आसानी से कैसे मिल सकता है ?
         ज्यादातर विचारक इसका उत्तर शायद यही देना चाहेंगे कि “मनुष्य का अति भोगवादी संस्कृति के प्रति हर दिन झुकाव बढ़ रहा है, वो इस जीवन के आगे सोचने की बात से कतरा रहा है, हकीकत में अपनी कमजोरियों को ही वो शक्ति समझ रहा है। भूल रहा है, कि समय का जो गलत प्रयोग वो कर रहा है, उसके कारण वो अपनों से भी निरस्त किया जा रहा है”। शायद उनके विचारों से हम कम ही सहमत हो, परन्तु उनकी इस बात में तो दम नजर आ रहा कि आदमी खुद से ही निरस्त हो रहा है, इसका ताजा उदाहरण आज के बिखरते परिवारों में बुजर्गो की दशा पर गौर करने से हमे मिल सकता है। शारीरक शक्ति का क्षय उम्र के अनुसार कम होना लाजमी है, परन्तु उनका मानसिक रुप से कमजोर होना, हर मानव के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि बुढ़ापा तो एक दिन सबके दरवाजे पर दस्तक देगा ही। समय की परख को झुठलाना आसान नहीं हो सकता, चाहे हम आज इसकी परवाह करे या नहीं। आज की नई पीढ़ी कितनी ही सफलता अपने खाते में जमा कर ले, परन्तु एक दिन तो उसे उस सहारे की तलाश जरुर होगी, जिसकी सेवा में प्रेम का अहसास हो। समझने की बात है, अर्थ और साधन जीवन को कुछ लम्बा कर सकते है, परन्तु उस सुख की अनुभूति तो अपनत्व में ही मिलेगा, जो दर्द का अहसास कम कर देता है। कुछ लोगों का चिंतन है, जीवन में सफलता पाने के लिए अकेलापन जरुरी है। कुछ क्षेत्र, कुछ विषयों को छोड़ कर यह भी सच नहीं है, तपस्या एक ऐसा क्षेत्र है, जहां नितांत अकेलापन आवश्यक बताया गया। तपस्या के नियम और विधान एक मनुष्य के लिए होते है, यह ठीक भी है, परन्तु उससे पानेवाला ज्ञान मानव को ही अर्पित किया जाता है। इस बात का पुष्टिकरण करने के लिए भगवान महावीर, बुद्ध, गुरु नानक, ईशा मसीह जैसे तपस्वियों की जीवनी पढ़ कर सकते है।
        हम भारतीय सन्दर्भ में ही अकेलेपन की चर्चा कर रहे है, उसी के अनुरुप हमारा आज से कुछ सालों पहले का जीवन और अभी के जीवन से तुलना करे तो शायद यह बात हमारी समझ में आ जानी चाहिए कि पिछले पाँच दसक का जीवन ज्यादातर गांव की गलियों के प्रेममय और संस्कारों से ओतप्रोत परम्परागत परिवारों में पलता था। फर्क इतना ही रहा, उस समय अर्थ और साधनों की कमी नजर आती, परन्तु संस्कारों की नहीं। बच्चों को पड़ोसी तक खिला सकता था, परन्तु आज हाथ लगाने में भी संकोच होता है। ज्यादातर बच्चे आया की गोद में ही खेलते है, माँ बाप तो इतनी ही देख रेख करते है, आया ठीक काम कर रही है, ना। सही भी है, आनेवाले एकाकी युग की ट्रेंनिग अभी से मिल जाए, तो अकेलापन समस्या नहीं रहेगा।
            पहले के जीवन और अभी हम जो जी रहे, उसकी तुलना करना सही नहीं है, पर जीवन है, तो हर दृष्टिकोण को नापना भी जरुरी है। आज योग की कितनी जरुरत हो गयी, जो की एक पुरानी पद्धति है। आखिर मानना तो पड़ेगा ही सोने की चमक कभी खत्म नहीं हो सकती। तब यह भी मानना होगा की मानव को आपसी सहयोग और अपनत्व की भी फिर जरुरत होगी। हंसने के लिए इंसानो में ही रहना होगा, हाँ रोने के लिए अकेलापन अच्छा है। चिंतन करे, सफलता सुंदर होती है, पर जब सत्य के साथ साथ चलती है। आँखों पर पट्टी बाँध स्वर्ग की कल्पना तो की जा सकती है, पर देखना मुश्किल ही होता है।

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

केवल शपथ लेने से शहर स्मार्ट नही बनेगा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01नवंबर 2015 रविवार

केवल शपथ लेने से शहर स्मार्ट नही बनेगा क्योंकि शपथ लेना इस देश मे सबसे आसान है।
   हमारी बात बुरी लग सकती है पर बात वैसे ही है जैसे हम गंगा की सफाई की बात बिसलेरी पी के करते हैं। एसी होटलो व हाल मे बैठ कर स्मार्ट सिटी के प्रारूप को नही समझा जा सकता। हमे बनारस की अतिक्रमण, गंदगी, चरमराती यातायात व्यवस्था और एक दूसरे पर लदे, चीखते चिल्लाते, दोषी बताते परेशीन हाल लोगो की समस्याओं को लेकर व्यापक नजरिये से स्मार्ट बनारस के संभावनाओं को देखना होगा।
     स्मार्ट सिटी बनने पर भोजूबीर, चंदुआ, चेतगंज , विसेसरगंज, दशासमेध, पक्कीबाजार, सरैया की सट्टीयॉ कहॉ जायेगी? ऐसा नही है कि उन्हे पूर्व मे स्थानान्तरित करने के प्रयास नही हुये। हुये पर उनमे ईमानदारी नही थी। लिहाजा सट्टी के जगह अ धिकारी स्थानान्तरित तो हो गये पर सट्टीयॉ ज्यो की त्यों बरकरार है।
     वही हाल अतिक्रमण का हुआ । कुछेक दृढ़ ईच्छा शक्ति वाले आये उनका प्रयास सार्थक भी हुआ पर उनके जाते ही वही ढाक के तीन पात।
          बनारस नगरनिगम से ये सवाल पूछा जाना चाहिये कि पिछले दो सालो मे कितनी बार उनकी हल्लागाड़ी कहॉ कहॉ कब कब चली और कितने अतिक्रमणकारियो के विरूद्ध का्यवाही की गयी?
     हर नये पुलिस कप्तान चार्ज लेते ही घोषणा करते है कि अतिक्रमण पाये जाने पर थानाप्रभारी जिम्मेदार होगें उन्हे पैदल कर के पुलिसलाईन भेज दिया जायेगा। हमे तो याद नही कि पिछले दस सालों मे अतिक्रमण कराने व अतिक्रमण न हटाने के आरोप मे किसी पुलिसवाले को बुला के पूछा भी गया हो।
        एसपी ट्रैफिक साब आज तक परेशान है कि जब परमिट सात हजार आटो की है तो शहर मे बीस हजार आटो कैसे चल रहे हैं। सर जी ये तो आपको शहर के इन्ट्री लाईन पर खड़ा होमगार्ड व उसका चेलवा भी बता देगा। आप ईमानदारी से  पूछ के तो देखिये।
   रोडवेज तो आज तक यह ही नही समझ पाया कि जेएनएनयूआर एम की बसें उसे शहर मे चलानी है कि शहर के बाहर?
       बिजली विभाग के अधिकारी कहते है कि यहॉ हर ट्रॉसफार्मर पर ओवरलोड है क्योकि बिजलीचोरी होती है। अब आपके आला अफसरान चोरी पकड़ने को  छापा नही डालेगें तो साहब हम तो आपके यहॉ आकर ये कहने से रहे कि हूजूर हम बिजलीचोरी करते हैहमे सम्मानित कर दो।
      आजकल बड़े बड़े अखबारों मे विग्यापनो सेजो जगह बच रही है उस पर स्मार्ट सिटी के शपथ कार्यक्रम की खूब चर्चा हो रही है पर इस बात पर कभी चर्चा नही हुई कि
शहर के कितने नर्सिगहोमो के पास पार्किग है? उनका मेडिकल वेस्टेज कहॉ निस्तारित होता है? उनके द्वारा कुछ विशेष पैथालाजी लैबो को ही क्यों तवज्जो दी जाती है? लगभग हर नर्सिग होम मे खुले हुये कितने दवा के दुकानो के पास लाईसेंस है और उन पर कितने फार्मेसिस्ट कब कब बैठते है?
        क्या कभी इस बात पर चर्चा हुई कि शहर मे प्रेस लिखी गाड़ी धारकों मे से कितने के पास प्रेस कार्ड है? प्रेस कार्ड पाने के लिये क्या अर्हता जरूरी है? प्रेस के नाम का दुरूपयोग करने वाले कितने लोगों के विरूद्ध पिछले पॉच सालो मे क्या कार्यवाही की गयी? और उस कार्यवाही मे प्रेस की क्या भूमिका रही?
        क्या कभी इस बात पर चर्चा की गयी कि सुबहसुबह देश व शहर के मिजाज को लेकर उत्सुक शहरी पाठक को अखबारों मे समातारो से ज्यादा विग्यापनो को परोसने के पीछे क्या वजह है? क्या ये आम पाठक के साथ छल नही है?
        क्या कभी इस बात पर चर्चा हुई कि कचहरी मे अधिवक्ताओ के लिये पार्किग बनाये जाने के बावजूद उसे खाली छोड़ कर पूरे कचहरी परिसर व आसपास के जगह को गाड़ियों से जाम क्यो करदिया जाता है और प्रशासन के नाक के नीचेचल रहे अवैध पार्किग चलाने वालो के खिलाफ किसके शह पर कार्यवाही नही की जाती?
        कचहरी पर दाना भूजा पंचर की दुकानो को जमीदोज करने के बाद भी न्यायालय परिसर की जमीन पर बड़ा रेस्टोरेंट आज भी चल रहा है?
     क्या इस बात पर चर्चा नही होनी चाहिये कि यातायात नियमो के उलंघन पर  गाड़ियो के चालान मे अब तक कुल कितने पुलिस लिखी गाड़ियो का, बिना कागज के गाड़ियॉ चला रहे , बिना हेलमेट पहने  व ट्रिपलिंग कर रहे पुलिस वालो का इस शहर मे कितनी बार चालान हुआ?
     क्या इस बात पर चर्चा नही होनी चाहिये कि न्यायालयो के आदेश के बावजूद वाराणसी विकास प्राधिकरण ने शहर के घनी बस्तियों, स्कूलों व अस्पतालो पर से विकरण फैला रहे कुल कितने  मोबाईल कंपनी के टावरों को आज तक हटवाया?
       क्या इस बात पर चर्चा नही होनी चाहिये कि कुण्ड पोखरो मे मुर्तियो को विसर्जित करने के बाद वहॉ मर रही मछलियो को देखने बचाने नगरनिगम व जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी वहॉ जाकर समस्या के समाधान का प्रयास किये?
      गंगा, रेलवे, हवाईजहाज कूड़ा निस्तारण, फोरलेन, सीवर ट्रीटमेण्ट पर बड़ो को ही चर्चा करने दिया जाय तो भी इस शहर की मौलिक समस्यायें है जिन पर चर्चा होना  जरूरी है बिना इन को ध्यान दिये शहर स्मार्ट नही बन सकता।
       इस शहर की जो सबसे बड़ी खासियत है वह हर नयेपन को खुले मन से स्वीकार करने की है। बस जरूरत है ईमानदारी के प्रयास की। हम बनारसियो ने भूरेलाल का भय खाया तो हरदेव सिंह को बाबा कहा। अजय मिश्र को सलाम किया तो प्रॉजल को दिल से सराहा।
हूजूर हम आपके साथ है बस आप ईमानदारी व साहस भरा दो कदम हमारी ओर चल के तो देखें। हम आपके साथ साथ चलेगें और स्मार्ट बनारस बना के दम लेगें।
         जहॉ तक शपथ व चर्चा की बात है वह अखबारों मे ही अच्छी लगती है। असली व ईमानदारी का काम कागजों पर नही जमीन पर होता है।

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

दीवाली की बातें :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 29 अक्टूबर 2016)

अपना ऑगन कुछ कहता है : दीवाली की बातें (व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 29 अक्टूबर 2016)

जाना, फिर जाना,
उस तट पर भी जा कर दिया जला आना,
पर पहले अपना यह आँगन कुछ कहता है,
उस उड़ते आँचल से गुड़हल की डाल
बार-बार उलझ जाती हैं,
एक दिया वहाँ भी जलाना;
जाना, फिर जाना,
एक दिया वहाँ जहाँ नई-नई दूबों ने कल्ले फोड़े हैं,
एक दिया वहाँ जहाँ उस नन्हें गेंदे ने
अभी-अभी पहली ही पंखड़ी बस खोली है,
एक दिया उस लौकी के नीचे
जिसकी हर लतर तुम्हें छूने को आकुल है
एक दिया वहाँ जहाँ गगरी रक्खी है,
एक दिया वहाँ जहाँ बर्तन मँजने से
गड्ढा-सा दिखता है,
एक दिया वहाँ जहाँ अभी-अभी धुले
नये चावल का गंधभरा पानी फैला है,
एक दिया उस घर में -
जहाँ नई फसलों की गंध छटपटाती हैं,
एक दिया उस जंगले पर जिससे
दूर नदी की नाव अक्सर दिख जाती हैं
एक दिया वहाँ जहाँ झबरा बँधता है,
एक दिया वहाँ जहाँ पियरी दुहती है,
एक दिया वहाँ जहाँ अपना प्यारा झबरा
दिन-दिन भर सोता है,
एक दिया उस पगडंडी पर
जो अनजाने कुहरों के पार डूब जाती है,
एक दिया उस चौराहे पर
जो मन की सारी राहें
विवश छीन लेता है,
एक दिया इस चौखट,
एक दिया उस ताखे,
एक दिया उस बरगद के तले जलाना,
जाना, फिर जाना,
उस तट पर भी जा कर दिया जला आना,
पर पहले अपना यह आँगन कुछ कहता है,
जाना, फिर जाना!
                                - केदारनाथ सिंह

            आज छोटी दीवाली है। सॉझ जब टहल कर यूपी कालेज से आ रहा था, तो घूरे पर यम का दीया जल चुका था। वैसे तो अब घूर दिखते ही नही, तो लोगों ने अपने घर के दरवाजे पर ही यम का दीया निकाल दिया है। कहीं-कहीं नगरनिगम के कृपा या लापरवाही जो भी कह लें कूड़ा दिख जाता है पर उनके बजबजाते बदबू मे अपने घर के पिछवाड़े वाले घूरे की बात नही. हवा में एक बारूदी महक फैली है, और सड़कों पर हल्की से लेकर तेज आवाज वाले बम पटाखे चलाते बच्चे। घर पहुँच कर टीवी खोलते ही अपने एक जवान के शहीद होने की खबर , मन कहीं विचलित हो जाता है और दूर पीछे कहीं गॉव मे जा कर भटकने लगता है। पिछले रविवार को गॉव गया था। खुद से घर का ताला खोल कर अंदर जाने पर एक उदासी भरा सन्नाटा। ऑगन मे फैली हुई सूखी उड़ कर आई नीम की पीली सुनहली पत्तियॉ, चारो कोने मे उग आये खर पतवार और अंदर कमरों मे सिंकसिकाये से सीढ़न लगे बिस्तर। मॉ की तबियत खराब होने से पिछले पॉच छह महीनों से गॉव वाले घर में ताला बंद है। बाड़े मे सूरन बोया गया था , सोचा थोड़ा खोद लूँ तो दीवाली पर काम आयेगा। बाड़ा भी झाड़ झंखाड़ खर पतवार से भरा था। थोड़ी साफ सफाई कर फरसा चलाना शुरू किया तो अगल बगल के कुछेक बच्चे व चाहने वाले आ गये। बात चीत शुरू हुई। तभी बगल के बच्चे लौटन ने बताया कि कहीं से तीन सेंहुआर गॉव मे आ गये है और वे सब मेरे बाड़े मे खूब धमाल मचाते है, सोचा कि जब लोग बाग नही रहेगें तो सेन्हुआर ही धमाल मचायेगें। खाली हो के गॉव मे निकला तो लगभग पूरे गॉव मे अपने घर जैसे ही स्थिति देखने को मिली। ज्यादातर लोग रोटी रोजगार, पढ़ाई दवाई के जरूरतो के कारण बनारस, दिल्ली, लखनऊ, मुंबई मे बस गये है। दिल्ली, मुंबई व दूर वाले तो साल छमाही गॉव आ जाते है पर बनारस वाले जिन्होने अपना मकान बनवा लिया है वे बनारस के ही हो कर रह गये है। हर घर का कमोबेस यही हालत है। घर के आगे दुआर, व दुआरे पर बंधी हुई गाय बस फिल्मो मे देखने मे आती है। पगडण्डियॉ अब खडंजा व इंटरलाक में तब्दील हो गयी है। अब वे कुहॉसे मे नही डूबती बल्कि बिजली के खंभों पर जल रहे लट्टूओं से प्रकाशवान रहती है. गॉव अब बाहर वाले रोड पर खुले मधुशाला के नये ठीके के चलते देर रात तक गाली गलौज से गुलजार रहता है। गगरी बस माता मैय्या के पूजे पर शुभ के लिये रखी जाती है। लोहे व अल्यूमुनियम के साथ प्लास्टिक के बाल्टी व ड्रम ने गगरी के रखने के निसान वाले गड्ढों को ढक लिया है। कुँओ पर अब रस्सी के बजाय वाटर पंपो के पाईप व तार नजर आते है। अब आपस मे मिलने पर जयरम्मी व बंदगी के मीठे प्यारे बोलों के बजाय हाथ मे दबे मोबाईल के हैलो ने ले लिया है। मैदान मे कबड्डी व सुटुरिया पटर के पहाड़े नही सुनाई पड़ते न ही मैदान मे अब बच्चो की तूतू मैमै सुनने को मिलती है। हॉ इसके बजाय वे बच्चे शाम को टीवी डिस के पास बैठे मिलते है।
गॉव का चौबारा कहीं खो गया है , बरगद भी सूखने लगा है। मै बार बार अपना गॉव ढूढ़ना चाहता हूँ पर वो लगता है कि शहरों के चकाचौंध से प्रभावित हो के कहीं खो गया है।
मै फिर से एक दीया जलाना चाहता हूँ पर घर के ऑगन का तुलसी का बिरवा, पियरी की चन्नी, झबरा का दरबा ,गॉव का शिवाला, चौरा माई का देवथान,सब तीतर बीतर हो गये है। गॉव का चौघट्टा, सीवान, मैदान ,चौबारा सब हम लोगो  के साथ साथ अपना स्वरूप व स्वभाव बदल चुके है। कैसे दीया जले और कैसे मन का कलुष मिटे?
      बारूदी गंध, टीवी की बोझिल खबरों व बम पटाखों के शोर शराबे मे मेरे ही समान यूपीकालेज के ही पुराने छात्र रहे डॉ० केदार नाथ सिंह की शायद इसी मनस्थिति मे लिखी कविता बार बार याद आ रही है। मन कहीं न कहीं गॉव की शांत ज्योतिमय दीवाली को खोज रहा है ऐसे मे एक नये मित्र का फोन आया कि रात मे आईये पत्तों के साथ बढ़ियॉ प्रोग्राम है। मैने क्षमा याचना किया कि भाई हमे तो पत्ते खेलने ही नही आते। इस पर उन्होने उपहास उड़ाते हुये कहा" क्या वकील साहब, आप भी किस युग मे जीते है। पत्ते नही खेलने पर अगला जनम छछुंदर का होगा।" मै क्या जबाब देता पर अब यह सोच रहा हूँ कि अगर दीवाली पर मन का कलुष न मिटा पाये , किसी गरीब जरूरतमंद के होठों पर मुस्कान नही ला पाये और अपने गॉव के उस अपनापन भरे त्यौहार के बजाय शहर के इस दिखावटीपन के चकाचौंध मे अपने ऑगन मे उजियाला न फैला सके तो हमे छंछुदर का जनम ही सहज रूप से स्वीकार है।
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शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

बदल रहा है बनारस, मिट रहा है बनारसीपन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी 15 जुलाई 2016

           एक वक़्त था जब हम बचपन में अपने घर से निकलते थे और फ़िक्र इस बात की होती थी की कचौड़ी जलेबी भर के पैसे जेब में  हैं या नहीं. गोलगप्पे के पैसों के लिए घर पे लात जूते खाने से भी गुरेज़ नहीं किया. घाट ही हमारा गोवा और बैंकॉक था. नाटी इमली का भरत मिलाप ही हमारे लिए ऑस्कर था. ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सपना पेट भर मलइय्यो खाना था. ख्वाहिशें छोटी थी, और बनारस से उम्मीदे कम. शायद इसीलिए हम सुखी थे और बनारस ने भी हमे कभी निराश नहीं किया. जितना हमने चाहा, बनारस ने हमेशा उससे बढ़ कर दिया. बनारस ने घाट पे बैठ के चीलम फूकने वाले को भी स्वीकारा और सड़क पे शान से भांग पीने वाले को भी. घाट पे नग्न बैठे अघोरी साधू को भी सम्मान दिया और मंदिरों में बैठे पंडितों की आस्था को भी पाला पोसा. बनारस ने डोम को भी राजा की उपाधि दे कर साम्राज्यवादियों के मुह पर तमाचा भी मारा. ये कमाल भी सिर्फ बनारस के बस की बात थी.
लेकिन अब चीजे बदल रही हैं. हमेशा मस्त हो कर भी शांत रहने वाला बनारस, अल्हड होते हुए भी संभ्रांत बनारस अब भागा भागा फिर रहा है. परेशां भी है और विचलित भी. इसका दिल अब गलियों से ऊब रहा है. इसे अब आसमानी इमारतों में रहना है. धड़ाधड़ बन रही इमारते यही बयान करती हैं. कोई फ्लैट बनाने में  परेशां है, कोई बेचने में और कोई खरीदने में. बनानेवाले भी बनारसी, बेचने वाले भी और  खरीदने वाला भी. हर रोज़ एक पुरानी इमारत गिरा दी जाती है एक नयी इमारत की  तामीर के लिए. और उसी के साथ गिर जाता है हम पर बनारस का भरोसा. चाट दलित सी हो रही है जिसकी तारीफ़ हर कोई करता है लेकिन साथ खाने की मेज़ पर कोई  नहीं बिठाना चाहता. आज का नया बनारसी पान नहीं खाता बल्कि पान की दूकान के पीछे मुंह छुपा के सिगरेट पीता है. मॉल की चमक और होटल की मदहोशी देखने और सुनने की सकत को ख़त्म कर रही है. जो बनारस अपने आप में पूर्ण था वो अब किसी और की तरह बनना चाहता है. भौतिकता और सांसारिक इच्छाओ का अंतिम पड़ाव समझा जाने वाला बनारस अब उसी में लिप्त होने को तड़प रहा है. सारनाथ, गोदौलिया, विश्वनाथ गली और हथुआ मार्किट तो चीप लोगो का बाजार हो गया. अब तो शादी के कपडे भी तभी जचते हैंजब दिल्ली या मुम्बई से आये हों. अब औरते माई से मम्मी और मम्मी से मॉम हो गयी हैं. सब्ज़ी अब वही स्वादिष्ट बना पाती हैं जोबिग बाजार से आयी हो. किटी पार्टियां इतनी होती हैं जितने बाप दादा ने रामायण नहीं कराये होंगे.
इन सब के बीच में हौले हौले सांस लेता बनारस आज भी शांत  है, और सब कुछ देख रहा है. शायद हमसे ये कहने की कोशिश कर रहा की "अपनी तहज़ीब को मस्ख  करने पे तहज़ीब का कुछ नहीं जाएगा, लेकिन एक दिन  वो तुम्हे मस्ख कर देगी"...हर हर महादेव...आप लोग नये बनारसी है या पुराने...?