शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

एक और सॉझ ढल गई.....

और
एक और सॉझ ढल गयी
आहिस्ता आहिस्ता
आँखों मे उदास सपने लिये
कभी खुली आँखों में तो
कभी बंद पलकों में
पर सभी सपनों का रंग
फीका फीका एक जैसा
दर्द और पीड़ा से भरा
पर उस विवसता के पीछे
एक अकुलाहटऔर बेचैनी
कुछ करने की कुछ कर गुजरने की
पर मन ही सब कुछ नही होता
क्योंकि मन को तन का
वास्तविक बोध नही होता
कसमसाहट में बंद पलको के
कोरों मे सिमट आई नमी
बावजूद मानस केअन्तर से
उठती है आवाज
यह अंधेरा छँट रहा है
कल आने वाली सुबह के लिये.......
       -व्योमेश १४.०७.१३ रविवार

(यह कविता मैने जुलाई २०१३ मे लिखा था, जब पैर टूटने पर प्लास्टर लगवा कर पूरी तरह बिस्तर पर पड़ा था। मन मे आशा को जगाने के लिये कवि कर्म ही मेरा विश्वास था।)

गुरुवार, 19 मई 2016

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

है जुड़ी वरूणा हमारी आस्था के गीत से
और काशी की संजोई साधना की रीति से
लोक के अनुराग की शुभरागिनी के प्रण सी
पीढीयो से गा रहा यह शहर वाराणसी।
राग रंजित कामनायें,रास रस की प्रीति से।
है जुड़ी........
पंचक्रोसी की परिधि मे जो तुम्हारा नाम है
है वही महिमा सनातन  लोक का सम्मान है
प्रकृति को तुमने सँवारा है नरम नवनीत से
है बसी.....
गति तुम्हारी देख ऑखे आज डबडब हो रही
देख अवजल का मिलन निष्ठा बिचारी को रही
यह समय सहमा हुआ कुछ कह न सके अतीत से
है जुड़ी.....

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

मंगलवार, 17 मई 2016

हमारी वरूणा अभियान (३): व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17मई2016 मंगलवार

हमारी वरूणा अभियान: दिल मे आवाज एक उठी थी कभी (३),

                         और तीन दिन बाद ही रविवार आ गया। जिन थोड़ा से  मित्रों को हम सूचना दे पाये थे वे उत्साह से लबालब थे। लेकिन श्रमदान के नाम पर हमारी कोई तैयारी नही थी। हमे पूर्व मे श्रमदान का कोई अनुभव भी नही था। बहर हाल हम श्रमदान के नियत समय ३ बजे सायं से लगभग डेढ़ घंटे पहले ये सोच कर शास्त्री घाट पहुँचे कि चल कर वहॉ जरूरत के पुताबिक व्यवस्था किया जायेगा। पर यह क्या? हमारे पहुँचने के पहले ही ज्यादातर श्रमदाता वहॉ पहुँच चुके थे। यानि समय से डेढ़ दो घंटे पहले ही। उनमे अधिकांसत: यूपी कालेज के छात्र थे जो डॉ० कुलदीप जी के आवाह्न पर मॉ वरूणा के लिये कुछ करने का जज्बा लेकर आये थे। मीरापुर बसहीं के सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय के अजय यादव जी एवं उनके सहयोगी, प्रिन्स कम्प्यूटर एकाडमी के मनोज जी व उनके छात्र, अशोक पाण्डेय, अजीत व दिनेश सिंह की अंकित व अंकुर विश्वकर्मा के साथ जीनियस कोचिंग की पूरी टीम, प्रेमचंद मार्गदर्शन केन्द्र मढ़वा लमही के राजीव, जितेन्द्र, दिलीप व प्रमोद जी, वरूणा तट पर रहने वाले लक्ष्मन सिंह प्रवक्ता,हम लोगो के प्रेरक डॉ० अरविन्द भैया , मुसीर भाई ,हम सबका प्रिय के के श्रीवास्तव उर्फ कृष्ण जैसे लगभग साठ सत्तर की संख्या मे लोग जुट चुके थे। हमारे साथी सूर्यभान सिंह विह्वल थे कि उनका प्रण साकार रूप ले रहा है। आज तक की हमारी जानकारी मे शायद यह पहला श्रमदान रहा होगा जो अपने नियत समय से पौन घंटा पहले ही शुरू हो गया। हमे लोगो ने मात्र दो फावड़े और दो टोकरी की व्यवस्था की थी। सच कहे तो हमे चार छ: से अधिक श्रमदाताओं के जुटने की उम्मीद भी नही थी। पर हमारे सारे अनुमानो को ध्वस्त करते हुये इन स्वैच्छिक श्रमदाताओं की भीड़ जब वरूणा मे सफाई के लिये उसकी तो हमारे व सूर्यभान की ऑखो मे खुशी के ऑसू आ गये। अरविंद भैया ने हमे विश्वास दिलाया कि प्रचार प्रसार से दूर अच्छे काम करने वालो की आज भी कोई कमी नही है। सत्तर की संख्या के लिये दो फावड़े और दो टोकरी नही के बराबर थी। हम लोगो के अनुभवहीनता व कयास को देखने कर डॉ० कुलदीप ने तुरंत अपने कालेज के फार्म हाउस से छ: फाचड़े, तीन बेलचे व दो पॉचा व छ: टोकरियॉ मंगवाया। अरविंद भैया भी अपने घर से दो टोकऱी व एक फावड़े की व्यवस्था की। फिर भी उत्साह व संख्या के सामने ये संसाधन कम ही थे। जिन लोगो को फावड़े, पॉचे टोकरियॉ नही मिली वे सीधे ही वरूणा मे उतर गये और वरूणा के पेटे से ढेर के ढेर पालिथीन व कूड़े निकलने लगे। अद्भुत दृश्य आज भी ऑखो के सामने है। लोगो का उत्साह देख उस समय एक दुर्घटना मे बुरा तरह घायल हो कर स्वास्थ्य लाभ कर रहे खुद किसी तरह वैसाखी के सहारे वरूणा तट तक आये डॉ० कुलदीप व लमही के हमारे दिव्यांग मित्र एक हाथ से जीवन यापन करने वाले प्रमोद मौर्य भाई भी केवल खड़े हो कर दर्शक की भूमिका निभाने को तैयार नही थे। कुलदीप भाई ने टोकरी सँभाली तो प्रमोद नदी के पेटे मे घुसी हाथ से ही करता निकालने लगे। वरूणा मे कचरे की स्थिति यह थी कि सीढ़ीयो तक केवल प्लास्टिक की बोरियो मे कूड़े व पालिथीन मे भरे कचरे से पटी थी। जीवनदायिनी कही जाने वाली वरूणा स्वयं जीवन के लिये शुद्ध सॉस के लिये कराह रही थी। हम लोगो को नदी मे साफ सफाई करते देख  एक दो स्थानीय तो एक दो अन्य राहगीर भी आ गये व हमारे प्रयास को जान कर अपनी सहयोग दिया।शाम के  साढ़े पॉच बजे तक हम लोग लगभग तीन कुन्तल से अधिक कचरा व पालिथीन वरूणा के पेटे से निकाल चुके थे।जबकि अभी हम नदी मे मुश्किल से दो मीटर या उससे थोडा सा कम अधिक ही घुस पाये थे। 
    अब हमारे सामने दूसरी समस्या यह थी कि नदी के पेटे से निकाले गये कूड़े कचरे को निस्तारित कहॉ किया जाय? अंतत: यह तय हुआ कि फिलहाल इस कचरे व कूड़े को पालिथीन से अलग कर हमे लोग पुराने पुल के नीचे कचहरी छोर पर एक किनारे ऱख दें और दूसरे दिन नगरनिगम से मिल कर उसके निस्तारण के लिये व अगले श्रमदान मे उनसे एक कूड़ागाड़ी अथवा व्यवस्था के लिये अनुरोध किया जाये। 
सूरज ढलने वाला था पर वरूणा पुत्रों के उत्साह मे कोई कमी नही थी। अंतत: हमे अरविन्द भैया व कुलदीप भाई के माध्यम से बार बार आज का काम बंद किये जाने का अनुऱोध करना पड़ा तब जा कर पहले दिन का श्रमदान समाप्त हुआ । कचहरी पर कुलदीप भाई के सौजन्य से पहलवान की चाय के साथ अगले रविवार को पुन: मिलने के विश्वास के साथ  अक अच्छी शुरूआत के पहले दिन का समापन हुआ।
        इसी श्रमदान के दौरान हमारी कई नये साथियो से मुलाकात हुई जो आज तक हमारे सहयोग मे सदैव तत्पर रहते है और बिना प्रचार प्रसार के वरूणा के पुनरूद्धार के बारे मे सिद्दत से सोचते महसूस करने के साथ ही कुछ करने के बारे मे सोचते है। ऐसे ही लोगो मे कृष्ण के के, अंकुर व अंकित , राजीव मढ़वा जैसे बच्चे थे जिनकी निष्ठा व समर्पण के माध्यम से हमारी वरूणा अभियान को बहुत बल मिला, जिसकी चर्चा आने वाले दिनो में।            (क्रमश:)
http:hamarivarunavaranasi.blogspot.com                                                        व   http://chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 14 मई 2016

हमारी वरूणा अभियान: दिल मे आवाज एक उठी थी कभी (२)

           यूँ ही चर्चा करते करते अक्टूबर का महीना  आ चुका था। हम लोगो के साथ कुछेक मित्र भी जुड़ने लगे थे। सबसे पहला सहयोग हमे हम लोगो के बड़े भाई उदय प्रताप इण्टर कालेज वाराणसी के भूगोल के प्रवक्ता व एनसीसी अधिकारी डॉ० अरविंद कुमार सिंह व दूरदर्शन भदोही के संवाददाता हमारे पत्रकार मित्र संजय श्रीवास्तव का मिला । इन दोनो व्यक्तियों ने हमारी पूरी समस्या, यात्रा वृतान्तव समाधान पर हमारा दृष्टिकोण सब ध्यान से सुनने के साथ एक कार्य योजना बनाने पर बल दिया। वैचारिक सहयोगी के रूप मे हमारे मित्र गण हमसे जुड़ते जा रहे थे पर हमारे पास संसाधनो के नाम पर कुछ भी नही थी।अगर साथ मे पूँजी थी तो मित्रों का हमारे प्रति विश्वास की, शक्ति थी तो हमारी संकल्प शक्ति की और विश्वास था कि हम बनारस की जीवनदायिनी रही मॉ वरूणा के लिये कुछ अवश्य करेगें। हम रोज शाम टहलते हुये वरूणा तट पर आ जाते थे। वकालत की शुरूआत थी तो मुवक्किल व चैम्बर का झंझट भी कम ही था। यदि किसी ने मिलने के लिये कहा भी तो उसे वरूणा तट शास्त्री घाट पर ही बुला लिया। मिलने जुलने वालो मित्रों को भी वह स्थान पता था तो वे भी वही आ जाते थे और हम अनायास ही घाट किनारे देर तक बैठे रहते। आपस मे योजनाये बनाते । नये लोगो को अपने बातो विचारो से अवगत कराते । और जाने अनजाने रोज दो चार की संख्या मे अपने सहयोगी व समर्थको का ईजाफा करते।
                            इसी दौरान एक महत्वपूर्ण घटना हुई जिसने हमारे  विचारो को एक झटके के साथ ही धरातल पर ला दिया । हुआ यूँ कि नवरात्रि समाप्त हुआ था। लोग अपने घरों मे रखे कलस, पूजन सामग्री, फूलमाला एवं पूजन सामग्री के अवशेष बड़े बड़े पालिथीन पैकेटो मे भर कर लाते और मॉ वरूणा को प्रणाम कर पूरा पूजन अवशेष पालिथीन सहित ही नदी मे फेंक देते। शाम को हमारे रहने के दौरान हमने लोगो ने किसी को प्यार से किसी को मनुहार से हाथ जोड़ कर ऐसा करने से रोकते हुये उनकी श्रद्धा को प्रणाम करने के साथ पालिथीन न फेकते हुये सामग्री को पालिथीन से बाहर निकाल कर एक किनारे रखने का अनुऱोध प्रारंभ किया। ज्यादातर लोग हमारी बातो से सहमत होते थे। कुछेक बहस भी करते थे। कुछ मन मे गाली देते हुये चले जाते थे पर हमने अपना प्रयास जारी रखा। ऐसे ही एक सॉझ पुराने वाले पुल पर एक कार  खड़ी कर दो सज्जन उतरे और डिग्गी खोल दो बड़ी प्लास्टिक की बोरी निकाल कर नदी मे फेकने की मंसा से बढ़े ही थे कि सूर्यभान ने उन्हे टोंकते हुये अवशिष्ट सामग्री को बोरी से बाहर निकाल कर फेकने के लिये कहा , इस पर वो दोनो व्यक्ति उग्र हो गये और उन्होने सूर्यभान के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया। फिर सूर्यभान की भी ठकुरैती जगी और उन्होने सीधे चैलेंज किया कि अब मेरे रहते आप इस बोरी को वरूणा मे ऩही फेक सकते। बात बढ़ गई और गुस्से मे सूर्यभान ने कहा कि यह मेरी वरूणा मॉ है मै यहॉ अपने उपस्थिति मे मॉ का ऑचल नही गंदा करने दूगॉ। हम लोगो के दबाव व सूर्यभान के गुस्से के चलते वे दोनो लोग नदी मे बिना अवशिष्ट डाले ही चले गये पर सूर्यभान का गुस्सा शांत नही हुआ था। हम सब नीचे आये और एकाएक सूर्यभान वरूणा मे एकदम तीन चार कदम अंदर घुस कर वरूणा जल हाथ मे ले कर यह कसम खा बैठे कि आज से मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य वरूणा पुनरूद्धार व इसे पुनर्जीवित करना होगा।
      सूर्यभान के प्रण के साथ ही यह तय हुआ कि अब यह लड़ाई वैचारिक न होकर वास्तविक धरातल पर चलने चाहिये।
    इसी समय हमारी मुलाकात उदय प्रताप कालेज के तत्कालीन कृषि छात्र अशोक कुमार पाण्डेय व दिनेश सिंह के माध्यम से डॉ० कुलदीप सिंह जी से हुई। डॉ० कुलदीप सिंह यूपी कालेज मे असिस्टेंट प्रोफेसर है । उम्र मे हमसे छोटे कुलदीप भाई ने पूरा बात सुनते ही कहा कि भैया अपनो व जीवजन्तुओ के लिये तो सब बहुत करते है पर नदी तालाब पेड़ के लिये कुछ करना ज्यादा जरूरी है क्योकि ये हमे जीवन तत्व हमेसा देते है चलिये हम लोग श्रमदान करते है। दूसरो के लिये नही कम से कम हमे तो इस बात का संतोष रहेगा कि हमने अपने हिस्से का एक छोटा प्रयास वरूणा के लिये किया। और उसके अगले रविवार से वरूणा तट पर श्रमदान प्रारंभ हुआ।
                                                      (क्रमश:)
http/:hamarivarunavaranasi.blogspot.com , फेसबुक पर hamari varuna का अवलोकन करें

रविवार, 8 मई 2016

हिन्दुस्तान मे प्रकाशित वरूणा के बारे मे , वर्ष 2009 की एक खबर

आज जब वरूणा नदी के जीर्णोद्घार का कार्य प्रारंभ हो चुका है और रोज ढेरो नये वरूणा प्रेमी अखबार की फोटो मे दिखता है ऐसे मे लगभग एक दसक पूर्व सूर्यभान सिंह के साथ देखा सपना याद आया है। तब न लोग थे न ही उनके पास वरणा मॉ के लिये समय। कुछ खास मित्र जिन्हे चर्चा व प्रचार से कोई मतलब नही था जो सच्चे अर्थो मे वरूणा को उसके अच्छे रूप मे देखना चाहते थे। बस वे हम लोगो के साथ थे। रविवार को अपने स्वान्त: सुखाय के लिये श्रमदान। आपस मे चर्चा और वरूणा को पुनर्जीवित करने का संकल्प ।
जो आज एक साकार रूप मे दिखने लगा है।
धन्यवाद हमारे अपने मित्रों। आज भले ही कोई आपको न जाने पर मॉ वरूणा जानती है।उन्हे आपकी श्रद्धा का अहसास है क्योकि आप नींव के वो पत्थर है जिन पर ईमारते बुलंद होती है। आप वरूणा के वो मानस पुत्र है जो उसके साफ व अविरल जल मे तलहटी के छोटे कण बन नजर आयेगें बस देखने के लिये वो नजर चहिये।
बहुत बहुत शुक्रिया डा० अरविन्द भैया, कैप्टन प्रवीण, मेजर ओ पी, डा० कुलदीप, सुनील करंडा, राजीव मढ़वा, मनोज प्रिन्स, मनोज सीआईएमएस, अजय श्रीवास्तव भैया, राजीव एसआरए, फादर आनंद,आशीष एडवोकेट, ओपी पाण्डेय एडवोकेट, प्रमोद आर्य जी एवं यूपी कालेज एनसीसी के ढेर सारे कैडेट्स व अव्यवस्था मित्रो जिनका नाम अभी याद नही आ रहा है, आप सब की बीते व स्मृति ये http:hamarivarunavaranasi.blogspot.com पर दर्ज है।
पुन: धन्यवाद ।

रविवार, 1 मई 2016

बनारस के गर्ल्स हास्टल मे संवेदनहीनता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 01 मई 2016,रविवार

आज सुबह मै वसंत कन्या इण्टर कालेज के हास्टल पूरे घटना की जानकारी लेने पहुँचा। मेरे साथ बच्ची के लोकल गार्जियन सूर्यभान सिंह जी भी थे। हास्टल मे सबसे पहले हमे डिग्री सेक्शन की मेस इंचार्ज सोनू मैम मिली। बेहद सौम्यता से उन्होने हमारी बाते सुनी और यह स्वीकार किया कि किसी भी बच्ची को मारना पीटना गलत है, अनुशासन बनाये रखने हेतु थोड़ी डॉट डपट हम भी करते है ।  पीड़िता बच्ची व हास्टल की बाकी बच्चियो ने उन्हे कल शाम की घटना की जानकारी दी  जिससे वे बेचारी खुद काफी दुखी हुई । उन्होने अपने मोबाईल से मैनेजर  व उक्त इण्टर सेक्शन की वार्डेन को फोन कर के बुलवाया। इण्टर सेक्शन के  वार्डेन महोदया का नाम संभवत: लीपी पाल राय चौधरी है। वे पहले नही आई। जानकारी मिली कि उनसे चपरासी वगैरह भी डरते है और बुलाने का साहस नही कर पाते।
      मैनेजर महोदया ने पूरी बात सुन कर लीपी मैडम को बुलवाया। मैनेजर महोदया को परेशानी यह थी कि उन्हे पूजा के तुरंत बाद आना पड़ा। बहरहाल पीपी मैडम आई। पीड़िता बच्ची ने सबके सामने कल शाम की घटना के बारे मे तफसील से बताया। यह भी बताया कि मैडम उसे जबर्दस्ती कोई रहस्यमयी प्रसाद खिलाती है जिसके लिये उसने एक दो बार मना कर दिया था। कल शाम वह पेट दर्द व उल्टी आने के वजह से अपने कमरे मे ही थी जहॉ उसे बाकी बच्चियो के साथ शाम की घंटी नही सुनाई पड़ी। मैडम उसे खोजती हुई आई और उसे एक सीनियर द्वारा बुलाई, जब वह अपने कमरे के दरवाजे पर पहुँची तो मैडम ने उसे सीधे गाल पर थप्पड़ थप्पड़ पीटा।
        मैनेजर महोदया ने जब लीपि पाल मैडम से पूछा तो उन्होने मुस्कराते हुये बताया कि उन्होने तो बच्ची को बस एक ही थप्पड़ मारा था। रहस्यमयी प्रसाद के बारे मे उन्होने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। लिपि मैडम की मुस्कराहट बता रही थी कि उन्हे इस बात का कोई अहसास नही है कि उन्होने बच्ची को पीटा। बल्कि बेहग संवेदनारहित ढंग से उन्होने कहा क् बच्ची के गाल पर के निशान तो मिट गये है। अब हम उनकी इस संवेदनहीनता को क्या कहें कि महिला व जिम्मेदार अध्यापिका हो कर वे यह उम्मीद करती है कि गाल पर थप्पड़ के निशान १६ घंटे बाद भी बने रहें। जब हम लोगो ने यह कहा कि मैम किसी बच्ची को मारना पीटना कहॉ तक उचित है, तो उनका कहना था कि बस एक ही थप्पड़ तो मारा था तो क्या हुआ? अब उन्हे कौन समझाये कि आदमी की जान भी एक ही बार मे एक ही वार मे जा सकती है। और बच्ची के गाल पर पड़े लिपि मैम के उंगलियो के स्प्ष्ट निशान क्या उनकी मंसा को बयॉ नही करते?
   मैनेजर मैडम ने लिपि मैडम से ये तो कहा कि वे आगे से बच्चियो पर हाथ न उठायें पर साथ साथ हम लोगो पर भड़क गयी कि हम शिकायत ले कर क्यों आये? मैनेजर मैडम का गुस्सा इस बात पर भी था कि हमारे चलते उन्हे पूजा के बाद तुरंत आना पड़ा। मतलब यह कि किसी बच्ची के साथ प्रताड़ना का उनके समय के आगे कोई महत्व नही है। उन्होने यहॉ तक कहा कि कोई मरता है तो मरे हम अपना समय उसके लिये नही जाया कर सकते।
      लोकल गार्जियन सूर्यभान जी ने जब उनसे बच्ची के मानसिक स्थिति और संवेदना को समझते हुये भविष्य मे इस तरह की घटनाओ को न होने देने व वार्डेन के व्यवहार मे तब्दीली लाने की गुजारिस की तो वे गुस्से से लाल पीली होती हुई पागल, बदतमीज जैसे शब्दो से सूर्यभान जी को अलंकृत करते हुये उनके लोकल गार्जियन होने के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान उठा दिया कि एक बिहार निवासी चौबे छात्रा का लोकल गार्जियन बनारस का कोई ठाकुर कैसे हो सकता है?  उन्होने पीड़िता बच्ची को भी डॉटते हुये उसे अनुशासनहीन छात्रा का दर्जा देते हुये हास्टल व विद्यालय मे न रहने की चेतावनी दे डाली। अब इन पढ़े लिखे, अतिसय बुद्धिमान व उच्च धार्मिक आचरण वाले भद्र  समाज के लोगो को कौन समझाये कि इंसानियत , मित्रता व संबध नाम के शब्द इसी धरती पर पाये जाते है।
       बहरहाल घटना के संपूर्ण तहकीकात व तथ्यो की जानकारी से लब्बोलुआब ये पता चला कि वसंत कन्या इण्टर कालेज के हास्टल मे बच्ची की पिटाई की घटना हुई है। और पीटने वाली महिला वार्डेन इस घटना के प्रति इतनी ही संवेदित है कि उन्होने बच्ची को केवल एक ही थप्पड़ मारा था। मैनेजर मैम केवल पिता को ही गार्जियन मानती है और वे कल पिता के आने पर ही बात करेगी।  उनकी निगाहो मे बच्ची हास्टल व विद्यालय मे रहने योग्य नही है क्योंकि वह इस तरह की बातों का शिकायत करती है।
         अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप पीड़िता बच्ची के मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना को किस रूप मे लेते है? क्या संवेदनहीनता के हद तक जा चुके उक्त महिला वार्डेन के द्वारा की गई पिटाई का दण्ड उस मासूम बच्ची को विद्यालय व हास्टल से निष्काषित कर उसका दो वर्ष की पढ़ाई व भविष्य को बर्बाद कर के किया जा सकता है?
आप स्वयं सोचिये।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

जरा झॉकिये इन ऑखों मे गौर से : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28अप्रैल 2016, गुरूवार

  28 अप्रैल 2016, गुरूवार


जरा झॉकिये इन ऑखों मे गौर से 

इस 42 से 48 डिग्री तापमान में सड़कें जल रहीं..गर्म हवा और लूह से हाल बेहाल है.
वहीं कुछ लोग हैं जो बिना धूप-छाँव की परवाह किये सड़क पर अपने काम में लगे हैं... धूप में जल रहे हैं...कन्धे पर फटा गमछा..और पैरों में टूटी चप्पल पहने धीरे से पूछ रहे.."कहाँ चलना है भइया..आईपी मॉल."?
आइये तीस रुपया ही दिजियेगा।"
इसी बीच कोई आईफोन धारी आता है अपने ब्युटीफुल गरलफ्रेंड के साथ..और अकड़ के कहता है.."अरे..हम जनवरी में आये थे तब बीस रुपया दिए थे बे....कइसे तीस रुपया होगा"
चलो पच्चीस लेना"
गर्लफ्रेंड मुस्कराती है..मानों उनके ब्वायफ़्रेंड जी ने 5 रुपया नहीं 5 करोड़ डूबने से बचा लिया हो..वो हाथ पकड़ के रिक्शे पर बैठतीं हैं..और बहुत ही प्राउड फील करती हैं...
यही ब्वायफ़्रेंड जी जब केएफसी ,मैकडोनाल्ड और पिज़्ज़ा हट में उसी गर्लफ्रेंड के साथ कोल्ड काफी पीने जाते हैं.तो बैरा को 50 रुपया एक्स्ट्रा देकर चले आते हैं..
वही गर्लफ्रेंड जी अपने बवायफ्रेंड जी की इस उदारता पर मुग्ध हो जातीं हैं...वाह..कितना इंटेलिजेंट हैं न.
इस गर्मी में कई बार ये सब सोचकर मैं असहिष्णु होने लगता हूँ..
आदमी कितनी बारीक चीजें इग्नोर कर देता है..जाहिर सी बात है की जो बैरा को पचास दे सकता है..वो किसी गरीब बुजुर्ग रिक्शे वाले को दस रुपया अधिक भी तो दे सकता है..
लेकिन सामन्यतया आदमी का स्वभाव इतना लचीला नहीं हो पाता..
क्योंकि अपने आप को दूसरे की जगह रखकर किसी चीज को देखने की कला हमें कभी नहीँ सिखाई गयी।
और आज सलेक्टिव संवेदनशीलता के दौर में ये सब सोचने की फुर्सत किसे है.
कई बातें हैं...बस यही कहूंगा की..इस प्रचण्ड गर्मी में रिक्शे वालों से ज्यादा मोल भाव मत करिये..
जब बैरा को पचास देने से आप गरीब नहीं होते तो रिक्शे वाले को पांच रुपया अधिक देने से आप गरीब नहीं हो जायेंगे..
हो सकता है..आपके इस पैसे से वो आज अपनी चार साल की बेटी के लिये चॉकलेट लेकर जाए...तब बाप-बेटी की ख़ुशी देखने लायक होगी न। कल्पना करियेगा जरा।
जरा सडक़ों पर आइए..एक दिन पेप्सी कोक मत पीजिये...मत जाइये.केएफसी,मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट।
देखिये न कोई गाजीपुर का लल्लन,कोई बलिया का मुनेसर, कोई सीवान का खेदन..अपना घर-दुआर छोड़ बेल का शरबत, दही की लस्सी,आम का पन्ना, और सतुई बेच रहा है..एक सेल्फ़ी उस लस्सी वाले के साथ भी तो लिजिये।
जरा झांकिए इनकी आँखों में एक बार गौर से...
इसके पीछे..इनकी माँ बहन बेटा बेटी की हजारों उम्मीदें आपको उम्मीद से घूरती मिलेंगी..
केएफसी कोक और मैकडोनाल्ड का पैसा पता न कहाँ जाता होगा.. लेकिन आपके इस बीस रुपया के लस्सी से.और दस रुपया के बेल के शरबत से .5 रुपये के नींबू पानी से किसी खेदन का तीन साल का बबलुआ इस साल पहली बार स्कूल जाएगा.
किसी मुनेसर के बहन की अगले लगन में शादी होगी.
किसी खेदन की मेहरारू कई साल बाद अपने लिए नया पायल खरीदेगी..
क्या है की हम आज तक लेने का ही सुख जान पाएं हैं..खाने का ही सुख महसूस कर पाये हैं.
लेकिन इतना जानिये की लेने से ज्यादा देने में आनंद है।
खाने से ज्यादा खिलाने में सुख है।
इतनी गर्मी में इतनी सी संवेदना बची रहे..
हम इन्सान बने रहेंगे।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

बैंक का एक कटु अनुभव : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22अप्रैल 2016, शुक्रवार

22 अप्रैल 2016, शुक्रवार
बैंक का एक कटु अनुभव
          आज एक परिचित के साथ काशी गोमती संयुक्त ग्रामीण बैंक मीरापुर बसहीं शाखा, वाराणसी मे जाना हुआ। परिचित को कुछ पैसा निकालना था ताकि वे अपने बच्चो की फीस समय से जमा कर सकें। मुश्किल यह था कि नये सरकारी नियमो के अनुसार इस सप्ताह  में केवल दो दिन बैंक खुले थे। पहले महावीर जयन्ती फिर हजरल अली जयन्ती और चौथा शनिवार। बैंक मे भीड़ ठसाठस भरी थी और काउंटर पर बैठी दो महिला कर्मचारियो मे से एक तो हर बात पर दूसरी वाली मैडम से इंस्ट्रक्शन ले कर काम कर रही थी, शायद नई रही हो। पर दूसरी मैडम ग्राहको को भी लगातार तेज तेज आवाज मे इंस्ट्रक्शन ही दे रही थी। उनके लहजे मे व्यवसायिकता के बजाय डिक्टेटरशिप ज्यादा थी। बेचारी एक अधेड़ महिला ग्राहक ने अपने बारी की स्थिति जानने की कोशिस क्या किया, मैडम जी आपे से बाहर । अब वो बेचारी अधेड़ महिला यह जान ही नही पा रही थी कि उन्होने ऐसी क्या गलती कर दिया जिसके लिये उनकी पोती की उम्र की मैडम जी उन पर भड़क रही है? मुझसे आदतन नही रहा गया तो मैने पूछ ही लिया कि आखिर इस बात को सम्मानित व सांस्कारिक लहजे मे भी  कहा जा सकता है और यह शाखा अगर हैवी टर्नओवर की बैक ब्रॉच मानी जाती है तो उसमे कही हम ग्राहको का योगदान है। आप का होना हमारी मजबूरी नही है बल्कि ध्यान रखिये कि हमारा यहॉ न होना आपके लिये समस्या बन सकती है। मैडम जी ने पहले एक्सरे वाले निगाहो से हमे घूरा फिर पूछा आप बताइये आप क्यो खड़े है हम आपका काम कर देते है?
         मेरे यह बताने पर कि हम तो इस शाखा के ग्राहक ही नही बस परिचित के साथ आ गये है, मैडम जी की निगाहे मुझ पर उपेक्षित जैसे हो गयी। मुँह से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनकी नजरो मे हमे खुद के प्रति वितृष्णा साफ नजर आयी, "जाने कहॉ कहॉ से आ जाते है" वाली। और वे अपनी सीट छोड़ कर कैश केबिन मे बैठी अपनी सहकर्मी के पास जा बैठी। विलंब होने के कारण मेरे परिचित ने कहा कि चलिये अब शाम को देखेगें। कुछ जरूरी काम निपटा के हम लोग वापस ३.२५ पर वापस आये तो बैंक के शटर मे ताला लगा था, खटखटाने पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने अंदर वाले शीसे के दरवाजे से हमे झॉका और बताया कि अब सोमवार को आइये, बैंक बंद हो चुका है। हमने दरियाफ्त किया कि अभी तो ३.२५ हो रहे है । कामकाज तो ३.३० तक लिखा हुआ है। चतुर्थ श्रेणी महोदय ने बेहद रूखेपन से जबाब दिया कि हम बैंक अपनी घड़ी से खोलते बंद करते है, आपकी घड़ी से नही। हमारी घड़ी मे साढ़े तीन बज गया है।
       अब हमारे पास कोई उत्तर ही नही था उन माननीय के जबाब का? परिचित बोले चलिये चला जाय, यहॉ ऐसी ही व्यवस्था चलती रहती है। मुझे किसी बैंक मे ही देखे महात्मा गॉधी के प्रचार वाली होर्डिंग याद आ रही थी कि ग्रहक हमारे लिये भगवान है ,अब अगर ऐसा व्यवहार बैंक कर्मियों का ग्राहक के प्रति है  तो ये क्या कहा जायेगा।
सारे प्रकरण को दूसरे नजरिये से भी देखते है। मीरापुर बसहीं शाखा अरेक्षाकृत दूसरी शाखाओ से ज्यादा भीड़भाड़ वाली शाखा है जहॉ अधिकतर कर्मचारी महिला है, छुट्टीयॉ के बाद बैंक खुलने से ग्राहको का थोड़ा दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। आजकल के गर्मी के हालात मे चिढचिढाहट भी स्वाभाविक है पर क्या कुर्सी पर बैठ जाने के बाद हमारे अंदर की इतनी आदमियत भी नही रहनी चाहिये कि सामने खड़े अपने सम्मानित ग्राहक के उम्र व मजबूरी का भी लिहाज न करें? यह एक सोचनीय सवाल है।
आजकल बैंक वाले कहते है कि आप एटीएम कार्ड ले लो। पर क्या सभी  समस्यायो का जबाब सिर्फ एटीएम कार्ड है । मेरी व्यक्तिगत जानकारी मे अब तक जितने भी धोखाधड़ी की घटनाये एटीएम कार्ड के द्वारा हुई उनमे आज तक किसी भी जालसाज या अपराधी को नही पकड़ा जा सका। और तो और बैंक भी इस जालसाजी को पकड़ने मे कोई सकारात्मक रूख नही दिखाता। औरो की बात जाने दें मेरे पास कम से कम तीन चार बार फोन के द्वारा मेरा एटीएम पिन जानने के लिये फोन आये, हर बार मैने अपने बैंक को, पुलिस को और फेसबुक के पोस्ट के माध्यम से लोगो को उक्त फोन नंबर की व सारी घटना की जानकारी दिया पर न तो कभी बैंक ने न ही पुलिस ने उन नंबरो के छानबीन का प्रयास व कार्यवाही किया।
  जहॉ तक छुट्टीयों की हालत है बैंक अब उत्तर प्रदेश सरकार के परिषदीय विद्यालय जैसे हो गये हैं, हर छोटी छोटी बात पर छुट्टीयॉ । हर दूसरे व चौथे शनिवार की बंदी का औचित्य अभी तक हम नही समझ सके। अगर यही छुट्टीयॉ दूसरे शनिवार के बजाय पहले या तीसरे को होती तो दूसरे शनिवार को बंदी की सुविधा प्राप्त करने वाले ढेरो राजकीय कर्मचारी, अधिवक्ता एव अन्य लोग बैंक मे अपने कामकाज को उस दिन कर लेते लिहाजा तीसरे सोमवार को बैंक पर पड़ने वाला दबाव निश्चित ही थोड़ी कम होता।
पर हमारे देश मे नियमो को लागू करने से पूर्व कभी भी उनका व्यवहारिक औचित्य समझने का प्रयास ही नही किया जाता। परिणाम भीड़ व अव्यवस्था सिर्फ बैंक ही नही और जगह भी दिखती है। इसीलिये यहॉ दादी मॉ की उम्र की महिला अपने तीसरी पीढ़ी के उम्र वाली कर्मचारी से अनायास की डॉट खाती है और मुस्तंडा जैसा नवयुवक अपने संबंधो का अनुचित लाभ उठाते हुये काउंटर के अंदर बैठ अपना काम आसानी से करा लेता है व दूसरो के काम को प्रभावित करता है।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

हमारी वरूणा अभियान, एक आवाज दिल मे उठी थी कभी (१) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08मई 2016, रविवार

                     वो शायद सन२००३ का रक्षा बंधन था, जब मै अपनी पौने चार साल की बिटिया को लेकरअपने चाचा जी के मकान पर मानस नगर दुर्गाकुण्ड जा रहा था.बाईक पर उसे नींद ना आये  इसलिये उससे बाते भी करता जा रहा था, वह बचपन से बेहद जिग्यासु व बातूनी होने के साथ किसी भी विषय के बारे मे ढेर सारे सवाल पूछना उसकी आदत रही है, मैने उसे वरूणा पुल से गुजरते हुये वाराणसी के नामकरण के बारे मे बताया तो उसने  वाराणसी नाम के दूसरे भाग अस्सी नदी के बारे मे पूछा, इसलिये मै उसे दिखाने के गरजसे दुर्गाकुण्ड से अपनी बाईक अस्सी लंका वाले रास्ते पर पुराने पुल की ओर बढ़ा दिया, तब रविन्द्रपुरी पुल नही बना था. वहॉ जा के मैने बेटी को बीएचयू मे पढ़ने के दौरान रोज आने जाने का रास्ता व अस्सी नदी दिखाया, अस्सी  नदी उसी समय धीरे धीरे नाले से नाली का रूप लेने लगी थी, बिटिया को पुल के नीचे दूर दूर तक नदी के बजाय नाली दिखने पर जिग्यासा होना स्वाभाविक था, उसने पलटते ही मुझसे सवाल किया कि लेकिन यहॉ नदी कहॉ है? उसके सवाल के जबाब मे जब मैने कनु के बाल मन को बताया कि अगल बगल रहने वालो ने नदी पाट कर उसे समाप्त कर दिया, आदतन दूसरा सवाल हाजिर था कि जब नदी पाटी जा रही थी तो आप लोगो ने उसे रोका क्यों नही ? बात उस समय आयी गयी हो गई, कार्यक्रम से लौटते समय वरूणा पुल पर कनु का एक दूसरा सवाल कि" वरूणा को कब पाटा जायेगा?'' बेहद मासूमियत से पूछे गये इन दोनो सवालो का जबाब मेरे पास वाकई नही था. लेकिन इन दोनो बेहद मासूम सवालो ने मुझे झकझोर डाला. कई कई राते ये दोनो सवाल मुझे परेशान करते रहे. बहुत सोच विचार कर मैने अपने दिल की बात और विचारो को अपने मित्र सूर्यभान सिंह के साथ बॉटा. फिर हम दोनो मित्रो की शाामे वहीं वरूणाकिनारे शास्त्री घाट पर बितने लगी. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री बनारस के सपूत  स्व० लाल  बहादुर शास्त्री के नाम पर नया नया शास्त्री घाट बना था, उक्त  घाट को बनवाने मे तत्कालीन मंत्री व क्षेत्रीय विधायक वीरेन्द्र सिंह  जी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.वीरेन्द्र सिंह के प्रयासो से ही घाट पर वरूणा महोत्सव की शुरूआत हुई थी . जिसके दो आयोजन हो चुके थे. हम दोनो  लोग नये विचार करते और उनके कार्यान्यवन के संभावनाओ पर सोचते . सबसे पहले वरूणा को जानने व समझने की बात उठी, फिर हम लोगो ने बाईक उठाया और वरूणा की भौगोलिक रचना समझने के लिये हम लोग फूलपुर इलाहाबाद वरूणा ताल तक गये.वहॉ फैले विशाल पर लगभग तीन चौधाई से अधिक सूख चुका वरूणा ताल काे देख कर लगा कि किसी तरह हमने प्राकृतिक अविरल व संचरण व्यवस्था मे हस्तक्षेप कर अपनी खुद की समस्यायो बढ़ा रखा है। बाईक से वरूणा के संग यात्रा के दौरान हमने यह महसूस किया कि इस तरह वरूणा किनारे सड़को पर चलने से हम अपने उद्देश्य के प्रतिष्ठित सही न्याय नही कर पायेगें लिहाजा यह तय हुआकि वरूणा तट पर पदयात्रा कर के ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठी करनी पड़ेगी। मित्र सूर्यभान जी  की लंबी टॉगो ने यह काम बखूबी से किया । हम लोगो के पास सूर्यभान जी के दो बार के पदयात्रा के बाद वरूणा के संबध मे काफी व्यवहारिक जानकारियॉ थी। वरूणा की पीड़ा, उसके तटवासियो की पीड़ा, समस्या व उसकी संभावित समाधान की एक सूची थी।  पर  समस्या यह था कि इन व्यवहारिक समाघान को किसी तरह धरातल पर लाया जाय। क्योकि हम लोगो के पास न तो सामर्थ्य था न ही अधिकार ।
कुछ और मित्रों को हम लोगो ने अपने सरकारो मे शामिल किया तो उनके इनुभव, संबंधो व विचारो का लाभ मिलने के साथ ही हमारे सामर्थ्य का विस्तार हुआ।तय हुआ कि वरूणा के भौगोलिक अध्ययन के साथ वरूणा का सांस्कृतिकर्मी पौराणिक व ऐतहासिक महत्व व वानस्पतिक प्रभाव के साथ पारिस्थितिकी अध्ययन भी किया जाये।
अगली रणनीति इस संबंध मे बनने लगी ।

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

बड़े शहरो मे रोजगार व बच्चों से दूर होते बृद्धजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 16 अप्रैल 2016 शनिवार


16 अप्रैल 2016, शनिवार।

बड़े शहरो मे रोजगार व बच्चों से दूर होते बृद्धजन

एक प्रयास ईमानदारी से हो तो हमारी काफी कुछ समस्याये दूर हो सकती है।  कल हम लोगों के बुजुर्गवार सुरेन्दर चाचा जी से बातचीत हो रही थी। उन्होने पूछा कि ठीक है बनारस मे सिक्स लेन रोड, इंटरनल रिंगरोड, एक्सटर्नल रिंगरोड, मेट्रो रेल, इंटरनेशनल हाईक्लास हवाईअड्डा बन रहा है , अच्छी बात है पर इससे आमजन को क्या फायदा होगा? नौजवान इन यातायात माध्यमो का उपयोग दिल्ली बंगलोर हैदराबाद पूणे जैसे इम्लायमेंट हब शहरो मे आने जाने के लिये करेगें पर इस शहर का आम बनारसी (जो बच्चे को पाल पोस इसलिये रहा है कि वे बुढ़ापे मे उसके साथ रहेगें) किस लाभ मे रहेगा? बनारस मे रहने वाले लोगो की हालत उस गॉव के लोगो जैसी होती जा रही है जहॉ के लोग शहरीकरण के भुलावे मे अड़ोस पड़ोस के शहरो की ओर भाग रहे हैं। और बनारस जैसे शहर के लोग इन इम्लायमेंट हबसिटी की ओर। वहॉ के लोग अमेरिका इंगलैण्ड आष्ट्रेलिया। यह क्रम आगे भी चलता रहता दिख रहा है।
सुरेन्द्र चाचा जी उद्योग विभाग से अवकासप्राप्ति के पश्चात बनारस मे ही रहते हैं। दोनो बेटियॉ दिल्ली मे तो  बेटा इनके साथ ही बनारस में। बेटा हनी भी बेहद सांस्कारिक व सभ्य। फिलहाल खाली। इसलिये नही कि उसमे योग्यता की कमी है, बल्कि इसलिये कि बनारस शहर ने अभी उसे उपयुक्त अवसर नही दिया है। हनी का ड्रीमप्रोजेक्ट पाईपलाईन मे है और उसके प्रयासो से शीघ्र ही साकार होगा।
लगे हाथ बात कल की भी ।अखबार मे एक खबर थी कि समाज मे बृद्धजन की संख्या बढ़ी है पर परिवार के साथ रहने वाले बुजुर्गों की संख्या मे गिरावट आयी है। देखा जाय तो दोनो समस्यायो के मूल एक ही जगह से जुड़े है। एक पढ़ा लिखा नौजवान बेहद बुझे मन से अपने शहर, अपने मॉ बाप, दोस्तो को छोड़ कर बड़े शहर मे धक्के खाने, संघर्ष करने, कदम दर कदम धोखा खा के भी खुद की पहचान बनाने इस लिये जाने को मजबूर होता है क्योकि उसे अपने बेहद अपने शहर मे रोजगार के लिये कोई मौका ही नही मिलता। अब औरों की देखादेखी नये शहर मे एक संघर्ष के बाद वह लोन ईएमआई पर दो या तीन कमरे का फ्लैट, एसी गाड़ी, अच्छी ब्रांडेड लाईफ स्टाईल , ऱिसार्ट मे छुट्टीयॉ, एयर टिकट, ट्रेन मे प्रीमियम क्लास या एसी क्लास जौसी सुविधाये तो पाता है पर इस परफ्यूम्ड व कलर्ड लाईफस्टाईल के लिये जिन अंधियारे को वह ढँकते तोपते है वह उनकी मजबूरी भी है और बहाना भी। नतीजा बीपी सुगर कैलोस्ट्राल थायराईड हाईपरटेन्सन और इन सब का परिणाम अल्पायु।
बहरहाल मुद्दे से न भटकते हुये बात सुरेन्द्र चाचाजी के सुझाव की। उनका मानना है कि यदि सरकार छोटे छोटे शहरों मे रोजगार के बेहतरी के लिये इंतजाम करें तो बच्चो को अपने बूढ़े मॉ बाप को छोड़ कर जाने की जरूरत ही क्या है? बात को स्थानीय स्तर पर व्यवहारिक रूप से देखते है पिछले बीस पचीस वर्षो से बनारस व आसपास जैसे शहर मे कोई कल कारखाना नही लगाया गया बल्कि जो कल कारखाने थे उन्हे भी बंद कर दिया गया। औराई चीनी मिल, कालीन कारखाने, बनारसी साड़ी बुनकरी, कंक्रीट स्लीपर कारखाना खालिसपुर, खिलौना उद्योग, एशिया साइकिल कारखाना , शंकरगढ़ सीसा कारखाना, चावल मिल , कुकिंग कोल कारखाना एक के बाद एक बंद होते गये। मजदूर, बुनकर, वर्कर बेरोजगार होते गये। आज बनारस व आसपास के युवको के पास मार्केटिंग व ईंस्योरेंस के अलावा कोई काम ही नही है ऐसे मे उनकी मजबूरी है कि वे अपने रोजी रोटी के लिये बड़े शहरो का रूख करते है।
अगर सरकार मनरेगा, पीएमआरवाई जैसे घोटालों से भरपूर व बेहद खर्चिली योजनाओ के बजाय प्रतिवर्ष एक विधानसभा क्षेत्र मे २ से ५ हजार लोगो को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने वाली क्षेत्रिय जरूरत व संसाधनो पर एक कारखाना लगाये तो प्रतिवर्ष लगभग १० से २५ हजार लोगो की आजीविका आराम से चलायी जा सकेगी और शहरो की तरफ पलायन रूकेगा।
बड़ा सवाल यह है क्या हमारी सरकार ईमानदारी से इस दिशा मे कोई कदम उठाने को इच्छुक होगी?