शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

हम न मरब मरिहै संसारा.../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 30 अप्रैल 2021/व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/ #हम_न_मरब_मरिहैं_संसारा.....

          इस बीमारी से मचे हाहाकार के बीच गांवों में पेड़ों से महुआ टपकने लगा है। सारे पेड़ नयी पत्तियों से लद कर बताने लगे हैं कि प्रकृति ने उनके लिये नया वस्त्राभूषण भेज दिया है।
भोर में मादक हवा वैसे बह रही है जैसे हर वर्ष बहती है। भोर मे आँख खुलते ही कानों मे चीड़ियों के ची ची ची ची के #सुप्रभाती संदेश के आगे व्हाट्सएप्प फेसबुक के #फर्जी_गुडमार्निंग फीके और औचित्यहीन लगते हैं। सुबह सुबह गेंहू काटती महिला मजदूर जब हँसुआ खिंचती हैं तो एकसाथ तीन ध्वनियां निकलती हैं। हँसुआ की सरसराहट और बालियों की खनखनाहट के बीच यदि काटने वाली के हाथ की चूड़ियाँ भी खनक उठें तो मान लीजिये, यही प्रकृति का महा-रास है।
      सम्पूर्ण संसार में पसरी इस महामारी से मनुष्य को छोड़ कर और कोई भी जीव प्रभावित नहीं है। क्यों? इस क्यों का उत्तर बहुत कठोर है, पर...
     आम के पेड़ों पर टिकोरे जवाँ हो रहे हैं और उनको देख कर मचल उठने वाला बालमन भी! जिन बच्चों का बचपन अंग्रेजी स्कूलों में गिरवी रख दिया गया है, उन्हें छोड़ दें तो सचमुच के बच्चे अब भी बगीचों में सुतुही (ब्लेड) और नमक ले कर मंडराने लगे हैं। और घर के बड़े यह सोच कर खुश हैं कि गेंहू की फसल इस साल शानदार हुई है। तो क्या आपको नहीं लगता कि ये  नववर्ष भी सचमुच बहुत सुंदर है?
      आशुतोष भगवान शिव के ही इस अविमुक्त काशी से सदियों पूर्व #बनारस के अलमस्त फक्कड़ #कबीर ने कहा था, "हम न मरब मरिहैं संसारा..." । बस अपने अंदर के उसी अविमुक्तेश्वर कल्याणकारी शिव और #फक्कड़ कबीर को जगाने की जरूरत है।
अखबार  सोशल मीडिया और समाचार चैनल बताते हैं कि रोज सैकड़ों लोग मर रहे हैं। मैं रोज बस यह खोज कर पढ़ता हूँ कि प्रतिदिन लाखों लोग इस बीमारी को हरा कर ठीक हो रहे हैं। 97%सकारात्मकता पर 3%नकारात्मकता भारी नहीं पड़नी चाहिये। मैं प्रतिदिन यही प्रार्थना करता हूँ कि हम सब उन लाखों ठीक होने वालों में रहें, सैकड़ों में नहीं...
     महामारी का भय प्रबल है, पर इस डर के आगे जीत है!! हम इससे बचने का हर प्रयत्न करेंगे, पर डरेंगे नहीं। मास्क, सेनेटाइजर, दूरी, वैक्सीन, जो भी उपाय सम्भव है उसे अपनाया जाय, पर भय नहीं...
ऐसी जाने कितनी आपदाओं को अनेकों बार अपने साहस के बल पर पैरों तले रौंदा है हमने। अगर एक दिन चले जाना ही सृष्टि का नियम है तो यह महामारी भी जाएगी। सम्भव है कि कल  कुछ लोग न रहें, पर जो रहेंगे वे देखेंगे कि कुछ खास नहीं बदला...
संसार का सौंदर्य जब भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के धराधाम छोड़ने से नहीं घटा तो हम क्या चीज हैं भाई...
      जीव अपनी जिजीविषा के बल पर दीर्घायु होते हैं। जो लड़ेगा वह जीतेगा...
आइए मिलकर लड़ते हैं इस सुनिश्चित जीत के लिए परमपिता परमेश्वर से इस कामना के साथ कि अब और नहीं भगवन, अब तो आंखो के रीत भी सूख चले हैं।
          सौ साल पहले हमारे बुजुर्गों ने बिना किसी दवा और वैक्सीन के ही प्लेग को हराया था, फिर हम तो तब की तुलना में आज बहुत शक्तिशाली हैं। और हम तो बनारस वाले हैं जो मसान मे होली खेलते हुये भी अलख जगाते है #हम_न_मरब_मरिहैं_संसारा......
          आईये, इस प्रकृति के सौन्दर्य और स्वरूप का आनंद लेते हुये भगवान ने जो हमारे लिये दे रखा है उसी मे संतुष्ट हो कर सुखपूर्वक जीवन का आनंद लें। पहले आई ढेरों महामारियों की तरह #कोरोना भी जैसे आया है वैसे ही चला जायेगा।
#व्योमवार्ता
#कोविड_19
(बनारस, 30अप्रैल 2021,शुक्रवार)
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शनिवार, 24 अप्रैल 2021

वर्तमान आपदा काल में आध्यात्मिक पहलू

वर्तमान आपदा काल में आध्यात्मिक पहलू।

एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे :-
*"कहो राम !  सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ  ?"*
राम मुस्कुराए :- 
*"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य ?"*
*"जानते हो राम !   तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्में भी नहीं थे|*  
यह भी नहीं जानती थी,
कि तुम कौन हो ?
कैसे दिखते हो ?
क्यों आओगे मेरे पास ?  
*बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा|*
राम ने कहा :-
*"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है”|*
"एक बात बताऊँ प्रभु !  
*भक्ति के दो भाव होते हैं |   पहला  ‘मर्कट भाव’,   और दूसरा  ‘मार्जार भाव’*|
*”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है,   और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है|  दिन रात उसकी आराधना करता है...”* (मर्कट भाव)
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया|  *”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी,   जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न,   वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है...   मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना..."* (मार्जार भाव)
राम मुस्कुरा कर रह गए |
भीलनी ने पुनः कहा :-  
*"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न...   “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं”|   तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य,   मैं वन की भीलनी...   यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते ?”*
राम गम्भीर हुए | कहा :-
*भ्रम में न पड़ो मां !   “राम क्या रावण का वध करने आया है” ?*
*रावण का वध तो,  लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है|*
*राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है,   तो केवल तुमसे मिलने आया है मां,   ताकि “सहस्त्रों वर्षों बाद,  जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे,   कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था”|*
*जब कोई  भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं !   यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ,   एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है|*
*राम वन में बस इसलिए आया है,   ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय,   तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है”|*
(अंत्योदय)
*राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं|   राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया हैं  मां|*
माता सबरी एकटक राम को निहारती रहीं |
राम ने फिर कहा :-
*राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता ! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है,   भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए”|*
*राम निकला है,   ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है”|*
*राम निकला है,   कि ताकि “भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है”|*
*राम आया है,   ताकि “भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है”|*
*राम आया है,   ताकि “युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय”|*
और
*राम आया है,   ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं”|*
सबरी की आँखों में जल भर आया था|
उसने बात बदलकर कहा :-  *"बेर खाओगे राम” ?*
राम मुस्कुराए,   *"बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां"*
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया|
राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :-
*"बेर मीठे हैं न प्रभु” ?*
*"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां ! बस इतना समझ रहा हूँ,  कि यही अमृत है”|*
सबरी मुस्कुराईं, बोलीं :-   *"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम"*
हिम्मत ना हारिए।
ना हारने देंगे श्री राम।
🙏अपने राम पर भरोसा रखें।वे हमारे साथ हैं। जो ईच्छा करिहौ़ मन माही।
प्रभु प्रताप कुछ दुर्लभ नाही।।🙏
(बनारस, २४ अप्रैल २०२१, शनिवार)
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मंगलवार, 16 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर व्योमेश चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब

#यह_सड़क_मेरे गांव_को_नही_जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर #व्योमेश_चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब

          एक लंबे अंतराल के बाद एक किताब पढ़ने को मिली जिसने गांव की यात्रा करवाई,जिसका शीर्षक वाकई एक रहस्य और दर्द को छुपाये हुये है कि सड़क (लेखक के संग ही समस्त पाठकों के) गांव को नही जाती ,जो खुद अपने गांवों से बिछुड़ गये है।आज वो गांव मिल जाने पर भी या यूं कहे दिख जाने पर भी अनजान सा लगता है। हालांकि अब उस गांव के खेत खलिहानों मे अब बैल की जगह ट्रैक्टर  नजर आते हैं। प्राईमरी स्कूल जहां टाटपट्टी  की जगह मेज कुर्सी दिखती है। अवसरविशेष पर लगने वाले मेले  की जगह माल और मल्टी मार्ट ने ले लिया है। गांव के दादा,दादी,बूढ़ी काकी तो अभी भी है पर उनके गोंद मे खेलने वाले वो नाती,पोते और हुड़दंग मचाने वाली बच्चा मण्डली  नजर नही आती ।
        किताब के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये गांव मे बिताये गये जीवन के हिस्से किसी एलबम की तस्वीरों की तरह जीवन्त हो उठते है जैसे अपने जीवन का ही कोई चलचित्र चल रहा हो। हर कहनी हर किस्से के अंत मे बहती पुरवईया जैसा महसूस हो रहा है, जिसके कारण पुरानी यादों का दर्द व टीस ऊभर आता है। यह लेखक की सफलता है कि उसने अपने मन की पीड़ा के साथ पाठक के संवेदना को ऊभारा है ,जो कही खो गया था या स्मृति से विलुप्त हो गया था ।
सचमुच आज की सड़क उस गांव को नही जाती जहां भारत गांवों का देश होता था। विडंबना यह है कि शहर तो कंक्रीट के ज़गल बनते जा रहे हैं और सरकर गांव का भौतिक विकास कर रही है भले वह कंक्रीट व कोलतार से ही क्यों न हो, पर यह भी कडुआ सच है कि कंक्रीट व कोलतार वातावरण मे जीने के लिये सांस नही मुहैय्या करा पाते ।
                किताब के किस्से गुदगुदाते हुये हंसाते है और हंसाते हंसाते आँसू  निकाल देते है पर किस्से का अंत होते होते  यही हँसी किस्से मे उठाये गये सवालो के साथ गले को रू़धते हुये सिसकियों मे बदल जाती है । पाठक कुछ कहना चाह कर भी भीगे मन और रोते दिल से कुछ बोल नही पाता । वह खुद से सवाल पूछता है कि उसने इन बीते सालों मे क्या खो दिया? उसका सब कुछ उसके आस पास दिख रहा है गांव भी, मगर हकीकत मे  ये वो गांव नही जो गरीब होने के बावजूद दिल से अमीर था। कमजोर और बदरंग  दिखता था मगर वो  मजबूत और सतरंगी स्वभाव को अपने मे समेटा था जैसा कि लेखक अपनी किताब के भूमिका मे अपनी बात मे ही कह देते हैं। लेखक की बात से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ और मै ही नही गांव से रिश्ता रखने वाला हर पाठक सहमत ही होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।
लेखक को सौ सौ बार साधुवाद जो पाठक के मनोभावों को उसकी अपनी मन की भाषा के साथ बहुत गहरे तक पकड़ा है और उसे कलमबद्ध किया है। किताब को पढ़ते समय मेरे जेहन मे  किसी शायर की नज्म याद  आती है ," यादों का एक झोंका आया , मिलने हमसे बरसों बाद......"
एक बार पुन: लेखक व्योमेश चित्रवंश जी को बधाई। हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों म उनकी अगली किताब भी हमे जिन्दगी के ऐसे बिछुड़े लम्हों को जोड़ने मे सफल होगी।

-सूर्य भान सिंह
(सूर्य भान सिंह 'पृथ्वीमित्र' प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता है| वाराणसी को पहचान देने वाली आदि पौराणिक नदी #वरूणा के पुनरूद्धार और पुनर्जीवन देने मे आपका महती योगदान रहा है। देश के उत्तरी छोर पर स्थित कारदुंगला के रोमांचक यात्रा मे अनजाने मे ही रिकार्ड अपने नाम दर्ज कराने वाले सूर्यभान जी का कार्यक्षेत्र  पूर्वोत्तर के बागडोगरा और सिलीगुड़ी के पहाड़ भी रहे हैं। इनके पर्यावरण के क्षेत्र मे योगदान के फलस्वरूप दि अर्थ फाऊण्डेशन ने 'पृथ्वीमित्र' सम्मान दिया | वर्तमान मे बनारस मे रह कर जल और शिक्षा के क्षेत्र मे अपना योगदान दे रहे #सूर्य_भान_सिंह_पृथ्वीमित्र' साहित्य व संस्कृति के गभीर अध्यासु हैं|)

शनिवार, 6 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती की समीक्षा मित्र सूर्यभान सिंह की लेखनी से

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर व्योमेश चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब
          एक लंबे अंतराल के बाद एक किताब पढ़ने को मिली जिसने गांव की यात्रा करवाई,जिसका शीर्षक वाकई एक रहस्य और दर्द को छुपाये हुये है कि सड़क (लेखक के संग ही समस्त पाठकों के) गांव को नही जाती ,जो खुद अपने गांवों से बिछुड़ गये है।आज वो गांव मिल जाने पर भी या यूं कहे दिख जाने पर भी अनजान सा लगता है। हालांकि अब उस गांव के खेत खलिहानों मे अब बैल की जगह ट्रैक्टर  नजर आते हैं। प्राईमरी स्कूल जहां टाटपट्टी  की जगह मेज कुर्सी दिखती है। अवसरविशेष पर लगने वाले मेले  की जगह माल और मल्टी मार्ट ने ले लिया है। गांव के दादा,दादी,बूढ़ी काकी तो अभी भी है पर उनके गोंद मे खेलने वाले वो नाती,पोते और हुड़दंग मचाने वाली बच्चा मण्डली  नजर नही आती ।
        किताब के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये गांव मे बिताये गये जीवन के हिस्से किसी एलबम की तस्वीरों की तरह जीवन्त हो उठते है जैसे अपने जीवन का ही कोई चलचित्र चल रहा हो। हर कहनी हर किस्से के अंत मे बहती पुरवईया जैसा महसूस हो रहा है, जिसके कारण पुरानी यादों का दर्द व टीस ऊभर आता है। यह लेखक की सफलता है कि उसने अपने मन की पीड़ा के साथ पाठक के संवेदना को ऊभारा है ,जो कही खो गया था या स्मृति से विलुप्त हो गया था ।
सचमुच आज की सड़क उस गांव को नही जाती जहां भारत गांवों का देश होता था। विडंबना यह है कि शहर तो कंक्रीट के ज़गल बनते जा रहे हैं और सरकर गांव का भौतिक विकास कर रही है भले वह कंक्रीट व कोलतार से ही क्यों न हो, पर यह भी कडुआ सच है कि कंक्रीट व कोलतार वातावरण मे जीने के लिये सांस नही मुहैय्या करा पाते ।
                किताब के किस्से गुदगुदाते हुये हंसाते है और हंसाते हंसाते आँसू  निकाल देते है पर किस्से का अंत होते होते  यही हँसी किस्से मे उठाये गये सवालो के साथ गले को रू़धते हुये सिसकियों मे बदल जाती है । पाठक कुछ कहना चाह कर भी भीगे मन और रोते दिल से कुछ बोल नही पाता । वह खुद से सवाल पूछता है कि उसने इन बीते सालों मे क्या खो दिया? उसका सब कुछ उसके आस पास दिख रहा है गांव भी, मगर हकीकत मे  ये वो गांव नही जो गरीब होने के बावजूद दिल से अमीर था। कमजोर और बदरंग  दिखता था मगर वो  मजबूत और सतरंगी स्वभाव को अपने मे समेटा था जैसा कि लेखक अपनी किताब के भूमिका मे अपनी बात मे ही कह देते हैं। लेखक की बात से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ और मै ही नही गांव से रिश्ता रखने वाला हर पाठक सहमत ही होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।
लेखक को सौ सौ बार साधुवाद जो पाठक के मनोभावों को उसकी अपनी मन की भाषा के साथ बहुत गहरे तक पकड़ा है और उसे कलमबद्ध किया है। किताब को पढ़ते समय मेरे जेहन मे  किसी शायर की नज्म याद  आती है ," यादों का एक झोंका आया , मिलने हमसे बरसों बाद......"
एक बार पुन: लेखक व्योमेश चित्रवंश जी को बधाई। हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों म उनकी अगली किताब भी हमें जिन्दगी के ऐसे बिछुड़े लम्हों को जोड़ने मे सफल होगी।

-सूर्यभान सिंह

गुरुवार, 4 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती

#व्योमवार्ता/ यह सड़क मेरे गांव को नही जाती / व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 4मार्च 2021


कल सायं प्रख्यात हिन्दी समीक्षक,लेखक और गुरूवर डाॅ०राम सुधार सिंह सर Ram Sudhar Singh ने फोन कर यह सड़क मेरे गांव को नही जाती के लिये यह कहते हुये बधाई दिया कि "अभी तुम्हारी किताब पढ़ के उठा हूँ,आज से पहले ग्रामीण जीवन पर इससे सुंदर व भावप्रधान संस्मरण मैने नही पढ़ा था।" लगे हाथ मैने सर से समीक्षा की माँग कर डाली तो सर ने आश्वस्त किया है कि हफ्ते दस दिन मे वे लिख देगें।

राम सुधार सर के समीक्षा की प्रतीक्षा की हमारी उत्सुकता इसलिये महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे मेरे शुरूआती लेखन को ऊंगली पकड़ कर सिखाने और सुधारने वालों मे से हैं। विश्वास है कि सर की समीक्षा फिर कुछ नया सिखलायेगी।
🙏आपके स्नेह से अभिभूत हूँ सर🙏
(बनारस,4 मार्च 2021, गुरूवार)
#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती
#व्योमवार्ता



शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

व्योमवार्ता/ हमारे विद्वान मित्र

व्योमवार्ता /व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27फरवरी 2021, शुक्रवार

हमारे मित्र एक नामालूम से बहुत बड़ी पार्टी के मण्डल महासचिव पद पर है। खुद को बौद्ध धर्मावलंबी मानते हैं पर मानने के अतिरिक्त कुछ नही करते। विधायकी के चुनाव में तीन अंकों में वोट पा चुके हैं। उन्हें इस बात का भ्रम बराबर बना रहता है कि देश के लिए बनने वाली नीतियां मूलतः उनकी ही हैं जिन्हें सरकारी मुलाजिम चुरा कर सत्ता वाली सरकारी पार्टी के नाम लागू कर देते हैं। उम्दा ज्ञान रखते हैं पर उस ज्ञान का स्त्रोत इस लिए नही बताते कि कहीं  उनके नीतियों की तरह लोग उनके ज्ञान स्त्रोत को भी न चुरा लिया जाए। किसी तथ्य के प्रामाणिकता के संबंध में पूछने पर यह कह कर बरी होने की कोशिश करते हैं कि प्रमाण वह नही बतायेगें क्योंकि उससे मौलिकता चोरी हो सकती है,आप को चाहिए तो आप ढूंढिए। तीन विरोधाभासी शब्दों के संयुक्त नाम राशि वाले ये सज्जन पुरुष बावजूद इसके हमें इस लिए प्रिय हैं क्योंकि वे हमारे मित्र हैं।
कल उन्होंने एक नई जानकारी यह दिया कि सिद्धार्थ गौतम बुद्ध रामायण काल के पहले थे क्योंकि रामायण में बुद्ध क‌ई बार लिखा हुआ मिलता है।
अब मैं उन्हें क्या समझाऊं क्योंकि वे अपने पार्टी में बड़े विद्वान माने जाते  हैं।
(बनारस, 27फरवरी 2021, शुक्रवार)
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#हमारे_विद्वान_मित्र

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

नीति सिन्हा जी द्वारा 'यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती' की समीक्षा

साहित्य की अध्यासु मेरी सहपाठी नीति सिन्हा जी द्वारा बेहद गंभीर व हृदय की गहराई से की गई समीक्षा

"यह सड़क मेरे गाँव को नहीं जाती"
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जब पुस्तक का नाम ही ऐसा हो.. तो कहने को कहाँ रह जाता है कुछ... और जब मुखपृष्ठ ही सब बयां कर रहा हो.. तो लगता है कि पढ़ने की भी क्या आवश्यकता....
पर नहीं... पुस्तक पढ़ने के साथ साथ ही विचारों की जो श्रृंखला चली... उसने मेरी लेखनी को चुप ना बैठने दिया...

लेखक ने बिलकुल सही कहा कि यह सड़क मेरे गाँव को नहीं जाती... बल्कि किसी के भी गाँव को नहीं जाती.... फिर जा कहाँ रही है ये सड़क...
क्या गाँव खिसक गये.. ज़मीन खा गई... या आसमान निगल गये उसे...
जानने के लिये इस पुस्तक को पढ़ना पड़ेगा... जिसे लिखा है मेरे पूर्व में सहपाठी रहे _ व्योमेश चित्रवंश ने...

दावा है मेरा कि भले ही "यह सड़क मेरे गाँव को नहीं जाती" पर यह पुस्तक  सभी के गाँव से अवश्य ही गुजरेगी...जैसे मेरे गाँव के भी बहुत पास से गुजरी है और कभी खुशी तो कभी ग़म के आँसुओं से सराबोर करती हुई... कभी हँसाती तो कभी आश्चर्य जगाती हुई बचपन  यौवन की दहलीज से होते हुए वर्तमान तक का सफर तय करती है पर भविष्य से आँख चुराती सी बचती बचाती खुद भी निकलना चाहती है और हम सबको भी निकालना चाहती है..... पर बीते हुए लम्हों की कसक साथ छोड़ जाती है...

किन किनको पढ़ना चाहिए ये पुस्तक?

1- हमारी पूर्व पीढ़ी_ जो अभी तक ग्रामीण भारत को याद करते हुए आँखों में मायूसी लिए बाट जोह रहे अपने पुराने गाँव को गले लगाने हेतु... ये पुस्तक उन्हें अपने पुराने गाँव अवश्य ले जायेगी... उन्हें उनकी कुछ गलतियों का अहसास भी करायेगी.. पर, उनके मन मयूर को सोंधी मिट्टी की खुशबू संग नाचने को भी मजबूर करेगी...

2- हमारी पीढ़ी- के वो लोग जो कभी न कभी किसी न किसी रूप में गाँव से जुड़े रहे हैं... उन्हें यहाँ अपना अल्हड़ बचपन और यौवन जीने का एक सुनहरा अवसर मिलेगा.... साथ ही मिलेगी एक टीस कि हमने क्या खोया... कहाँ गये हमारे वो संस्कार जो हमें अमीरी के अभाव में भी एक सूत्र में बाँधे रहते थे...घर कचहरी मुकदमेबाजी करते हुए भी एक माला में पिरोये रहते थे और सुख दुःख के अवसरों पर सब भूलकर एक हो जाया करते थे....कहाँ गये हमारे मेहनतकश मदारी, नट नटी, या जादूगर, या हम सबके पसंदीदा बाइस्कोप....और  भी बहुत सी मीठी स्मृतियों से गुजरते हुए एक टीस भी मिलेगी...और शायद यही टीस  हमें हमारे गाँव की ओर पुनः उन्मुख कर पाये...

3- हमारी अगली पीढ़ी- हमारे बच्चे, हमारा भविष्य जिन्हें हमने गाँव से दूर कर दिया... शहरों की चकाचौंध में घुसा दिया.... या फिर वे बच्चे भी जो अभी भी गाँव में ही रह तो रहे हैं पर उन्हें भी गाँव की दरिद्रता की ही कहानियाँ सुनाकर शहरों की ओर पलायन हेतु मजबूर किया जा रहा...

सभी को यह समझने की आवश्यकता है कि आधुनिक सहूलियतें नगण्य होते हुए भी ग्रामीण भारत कितना समृद्ध था...

बिना अर्थ के भी जनतंत्र गणतंत्र मनतंत्र फलीभूत हो रहा था वहाँ और इन सबने मिलकर लोकतंत्र को अपनी बाहों में कसकर सँभाला हुआ था....

फिर चूक कहाँ हुई....

4- हमारे नीति नियंता- जी हाँ, ये पुस्तक इन्हें अवश्य ही पढ़नी चाहिए कि नीति निर्माण करते समय पूर्व में जाने अनजाने किन बातों की अनदेखी हो गई.... भ्रष्टाचार ग्रामीण भारत में कैसे घुसा... सहज सरल समझे जाने वाले ग्रामीण कुटिल चालें कहाँ से सीखने लगे.. किसी भी योजना का असर गाँवों के विकास में नज़र क्यों नहीं आया... पलायन क्योंकर होने लगा...अर्थतंत्र हर तंत्र पर हावी कैसे हो गया...और ग्रामीण भारत में सुराज का सपना कैसे धराशायी हो गया....

विकास कभी भी ऊपर से नीचे नहीं होता जबकि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की ओर ही दौड़ता है....
पर स्वतंत्र भारत ने सर्वप्रथम महानगरों के विकास पर ध्यान दिया... फिर नगरों, शहरों पर और अन्तिम पायदान पर गाँवो को रखा गया....
परिणाम हम सबके सामने ही है... जितनी भी योजनाये लाई गई... गाँव बद से बदतर ही होते चले गये...
आज ग्रामीण भारत के विकास की जो बातें की जा रही हैं... नई तकनीक और ज्ञान विज्ञान गाँव में पहुँचाने हेतु योजनायें बन रहीं... क्या सच में ही ग्रामीण भारत का अभ्युदय काल माना जायेगा या हमारे गाँव पिछड़े शहरों की कतारों में खड़े हो जायेंगे...
सोचना होगा...

यह पुस्तक शायद नीति नियंताओं का कुछ मार्गदर्शन कर पाये....

लेखक से क्षमाप्रार्थना-
यूँ तो जैसे ही आपने फेसबुक पर इस पुस्तक का लिंक साझा किया, मुझे ये पुस्तक मँगा ही लेना चाहिए था... पर, मेरी गन्दी आदतों में शुमार है कि यदि कोई पुस्तक मेरे हाथों में आये तो पूरा पढ़े बिना उठने का मन ही नहीं होता... तो खामियाजा ये भुगतना पड़ता कि घर के बाकी कर्तव्यों की इतिश्री होने लगती... सो मैंने पुस्तक मँगाना और पढ़ना दोनों ही बन्द कर दिया...
बस इसी वजह से यह पुस्तक भी नज़र अंदाज हो गई हालांकि इसका मुख पृष्ठ और उससे भी बढ़कर शीर्षक मुझे बार बार आकर्षित कर रहा था...

और जब आपने व्हाट्सएप पर पीडीएफ ही उपलब्ध करा दिया तो पढ़े बिना कैसे रोक पाती खुद को... पर न चाहते हुए भी बीच बीच में मुझे उठना ही पडा ... कल ही  अपना पाठक धर्म पूरा कर पाई हूँ...

हर अध्याय के अन्तिम पैराग्राफ की तरह ही अन्तिम पृष्ठ भी आँखों को भिंगो रहा था और जैसे खुद से बिछड़ जाने का अहसास करा रहा था...
पर अब साथ छोड़ने वाली नहीं मै... एक बार फिर से लिंक साझा कर दीजिए... अब यह मेरी संग्रहणीय पुस्तकों में शामिल हो जायेगी...

अपने नाम के अनुरूप आकाश के गुण लिये साक्षी भाव से धरती की पड़ताल करने वाले लेखक को बहुत बहुत साधुवाद....

हाँ... "यह सड़क मेरे गाँव को नहीं जाती"....  पर गाँव को मेरी यादों में बसा जाती है...

एक अच्छी कृति हेतु हार्दिक बधाई और अशेष शुभकामनाएँ....

बुधवार, 20 जनवरी 2021

यह सड़क मेरे गॉव को नहीं जाती पर डाॅ० सीमान्त प्रियदर्शी की लघु समीक्षा

सद्य: प्रकाशित पुस्तक 'यह सड़क मेरे गांव को नहीं जाती' पैंतीस - चालीस वर्षों में गाँवों में आये बदलाव को बखूबी बयां करती है। इस पुस्तक को पढ़ते समय महसूस होता है कि लेखक ने गांव को अंतर्मन की गहराइयों से जिया है। व्योमेश जी पेशे से तो वकील हैं लेकिन हृदय से संवेदनशील रचनाकार। ऐसा रचनाकार जिसका मन लोक संस्कृति, कला, परंपरा, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, व्यवसाय, किस्सा -कहानी, खान-पान, वेशभूषा, खेल -कूद , शिक्षा आदि में ऐसा रमा हुआ है कि  वह शहर जिंदगी अपनाने के बाद भी भागकर गाँव में रमता है। लेखक शहरी संस्कृति के वर्चस्व को गांव में फैलता देख बेचैन है। वह बचपन की उन सुवास स्मृतियों को ढूंढ रहा है, जिसे उसने कभी खेत - खलिहानों में, पेड़ों की डालियों पर, नदियों- पोखरों के तट पर ,  डीह बाबा के टीले पर , स्कूल की चौहद्दी में बिताए थे। वह ढूंढ़ रहा है उस सामाजिक समरसता को जो ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा हुआ करती थी  वह तलाश रहा है सामाजिक सरोकार को, सामूहिकता के भाव को । जिन्हें वह भावी पीढ़ी को केवल बता सकता है, दिखा नही।
लेखक शहर की भागमभाग, व्यस्तता से उकता कर तलाश रहा है गांव के ठहराव को, सुकून को जो अब प्रायोजित करने के पश्चात भी महरूम है। लेखक ने बिल्कुल आम बोल चाल की भाषा में अपने भाव को सहजता के साथ व्यक्त किया है। हिंदी भाषा में लिखी इस पुस्तक में अंग्रेजी, ऊर्दू, भोजपुरी के शब्दों का भी खुलकर प्रयोग किया गया है।
- डॉ०सीमान्त प्रियदर्शी
20जनवरी2021