मंगलवार, 14 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यूपी कालेज की .....(३). : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १४ जुलाई २०२०

व्योमवार्ता/ यादें यूपी कालेज की.....(३)

         एडमिशन के बाद लगभग बारह दिन बीतने के बाद पॉच अगस्त भी आ गया । मंगलवार  का दिन।  हमने आशा जताई कि पहला दिन शुभ ही रहेगा। मंगलामुखी सदा सुखी। गॉव से विदा ले दही गुड़ खा डीह बाबा को प्रणाम कर हम चल पड़े जीवन मे उच्च शिक्षा के मुकाम पर यू पी कालेज। संतोष और मेरी राहें आज से अलग होनी थी। एक ही कालेज मे एक ही कक्षा मे पढ़ते हुये हम दोनों के विषय अलग अलग थे। तो बस एक साथ बैठने उठने पढ़ने के बजाय आगे से बस मिलना ही रह जाना था। हम दोनो पहली बार अपने मॉ के ऑचल के छाँव से अलग हो रहे थे ,  इसके पहले गोल गोल रोटी कौन कहे, हमने कभी चाय तक नही बनाया था। तो पढ़ने के लिये मै अपने चाचा जो गिलट बाजार मे रहते थे ,के यहॉ और संतोष ने सरसौली मे राजा मामा लाज मे अपना नया बसेरा बनाया। चाचा के यहॉ कपड़े वाली अटैची रख नहा धो नाश्ता कर  भगवान जी का नाम ले चल पड़ा यू पी कालेज मे पढ़ने। आज पहली बार अकेले पढ़ने जा रहा था इसलिये कुछ अजीब भी लग रहा था। कालेज गेट पर आ कर उदय प्रताप कालेज लिखे दो पतले रजिस्टर वाली कापियॉ खरीदते समय पहली बार ध्यान से कालेज के सिंहद्वार को देखा अब यहीं से जीवन के भविष्य का निर्माण होना था। विशाल सिंह द्वार केसरिया मिश्रित पीले रंग मे रंगा हुआ साफ सुथरा । गेट के ठीक ऊपर कालचक्र के दो पहियों के मध्यअर्द्ध चंद्राकार संगमरमर पट्टी पर लिखा 'उदय प्रताप कालेज' और ठीक उसके नीचे वृत्त मे लिखा कालेज का ध्येयवाक्य "दृढ़ राष्ट्रभक्ति पराक्रमश्च"  खुद को गौरव बोध करा गया। सन १९०९ मे  यह कालेज काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना के सात वर्ष पूर्व स्थापित हो चुका था आवासीय विद्यालय के रूप मे। आज भी इण्टर कालेज का मुख्य भवन , संध्याहाल और इण्टर कालेज के सभी छात्रावास उसी जमाने के है जो स्वयं मे सुदृढ़ है। कापी ले कर कला संकाय मे पहुंचा तो यह पता चला कि मेरा प्रवेश अर्थशास्त्र के बी सेक्शन मे हुआ है, मेरे विषयों के समायोजन के आधार पर । समय सारिणी के हिसाब से १२.१५ से १ बजे वाली अर्थशास्त्र की कक्षा का समय थोड़ी देर मे होने ही वाला था। कला संकाय के प्रथम तल पर बरामदे साईड वाला कक्ष। लगभग ४० छात्र और १२-१३ छात्रायें। यू पी कालेज मे पहला पीरियेड पढ़ने का सौभाग्य मिला डॉ० विनोद कुमार सर से। सौभाग्य से सर आज भी हमारे लिये मार्गदर्शक के रूप मे सदैव पूज्य है और दूसरे तीसरे उनसे आज भी आशीर्वाद प्राप्त हो ही जाता है। डॉ० विनोद कुमार जी ने प्रथमत: अपना परिचय देते हुये इस कालेज की परंपरा और इतिहास के बारे मे बताया ।सन १९०९ के हिवैट क्षत्रिया स्कूल से लेकर उदय प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय बनने तक का सफर और उसमे राजर्षि से लेकर बाबू प्रशिद्ध नारायण सिंह, इण्टर के अद्भुत प्राचार्य जे पी सिंह , डिग्री कालेज के पुनरूद्धारक राजनाथ सिंह लेकर अब तक का एक लेखाजोखा । साथ ही विद्यालय का ध्येयवाक्य दृढ़ राष्ट्रभक्ति के लिये पराक्रम होना जरूरी है। यह पराक्रम हमे अपने अध्ययन और अनुशासन से प्राप्त करना है तभी हम इस राष्ट्र को मजबूत बना सकेगें। स्वागत और शुभकामना के साथ उन्होने इस शैक्षिक सत्र का शुभारंभ किया तो मै उनके सहज और सरल वक्तव्य की तुलना प्रवेश के दिन वाले कटु अनुभव से कर रहा है। फिर मन को यह कह कर संतोष दिया कि भले बुरे दोनो लोग हर कहीं होते हैं कौन सा मुझे अपना अहंकार पोषण करने यहॉ रहना है,हमें तो अपना अध्ययन और अनुशासनरूपी पराक्रम दिखा कर अपने भविष्यनिर्माण के पथ पर आगे बढ़ना है। जाहिर था कि अभी अभी कक्षा मे पाये व्याख्यान को मै गहनता से समझने का प्रयास कर रहाथा। कक्षा समाप्ति के पश्चात छात्र छात्राये बिखर कर अलग अलग हो गये। जब हम पढ़ कर नीचे आये तो भीड़ लगभग नही के ही बराबर थी। विज्ञान व वाणिज्य की कक्षायें अभी प्रारंभ नही हुई थी। कृषि वालो का समय सुबह ही होता था।
           हम जब नीचे आ रहे थे तभी डीन साहब डॉ० विश्वनाथ प्रसाद नीचे खड़े कुछ छात्रों को नीचे के क्लासरूम मे बैठने का निर्देश रहे थे । सीढ़ी से उतरते मुझे देख उन्होने मुझसे भी कहा कि कमरें मे चलों। भूतल वाले बॉये पहले कमरे मे ही काफी छात्र छात्रायें बैठे थे और अध्यापन मंच पर डॉ० विश्वनाथ प्रसाद, डॉ० राम सुधार सिंह(जो बाद के वर्षों मे मेरे अध्यापक संरक्षक भी रहे) के साथ दो अन्य लोग। कुछ गुरूजन और गुरूजन समान लोग छात्रों के साथ सामने  ही बैठे थे। हमे यह बैठने पर पता चला कि  यहॉ हिन्दी साहित्य कार्यक्रम चल रहा था जिसमें बाहर के शोरगुल से व्यवधान होने के कारण डीन साहेब ने बाहर टहल घूम रहे सभी बच्चों को बुला कर अंदर बैठा लिया। मै पीछे की सीट पर अनजान अपरिचित नये चेहरों के बीच बैठे इस फिजूल के बेकारबाजीके लिये कूढ़ना शुरू ही किया था कि मेरे जीवन मे वह क्षण आया जिसने मेरे भविष्य के शौक को एक नई दिशा दी। मंच पर बैठे कुर्ता पाजामा और सदरी पहने मध्यम कद के गौरवर्णीय आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी सज्जन के स्वरों मे जैसे मॉ सरस्वती विराजमान हो अपनी मधुर रागिनी बजा रही हो -

" गीत जिस दिन मोहब्बत के मर जायेगें,
टूट कर हम उसी दिन बिखर जायेगें।
सामने बैठिये आईने की तरह,
आपको देख के हम सँवर जायेगे।
आदमी के ज़हर का असर देखने ,
साँप भी गाँव से अब शहर जायेंगे ! "

              वह सज्जन थे हिन्दी के प्रख्यात गीतकार पं० श्री कृष्ण तिवारी और यह हिन्दी विभाग मे उनके अकस्मात आगमन पर परास्नातक हिन्दी के छात्रों के अनुरोध पर यह आशुकविगोष्ठी आयोजित थी । मेरे लिये टीवी के अलावा किसी कविगोष्ठी मे कवि से रूबरू होने का यह पहला अवसर था।  सधे हुये स्वरों मे डूबते उतराते गीत के बोलों मे मुझे तालियों की आवाजों से वर्तमान का अहसास हुआ। छात्र श्रोताओं के मॉग पर पंडित जी ने  आपातकाल मे लिखा हुआ अपना मशहूर  गीत सुनाया -

भीलों ने बाँट लिए वन
राजा को खबर तक नहीं

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं।

यह मेरे जीवन की प्रथम सुनी  कविता थी और यूपी कालेज के पढ़ाई के पहले दिन की कापी पर लिखी नोट्स भी , जो मैने सुनते हुये जल्दी जल्दी आखिरी पन्ने पर लिख लिया था। वह पन्ना आज भी मेरी पुरानी डायरी के पन्नों मे कहीं सुरक्षित है। संभवतः यही वह दिन था जिसने मुझ उडण्ड और खिलंदड़े लड़के को साहित्य की ओर आकर्षित किया। कालेज से चाचा के घर पहुंचने तक मै बार बार यही गीत गुनगनाता रहा।चाची ने आज की पढ़ाई के बारे मे पूछा तो बरबस ही होठों पर मुस्कराहट आ गई कि मै पढ़ने अर्थशास्त्र गया था और पढ़ आया हिन्दी की कविता।
         पूरे दिन और रात मेरे ऊपर अर्थशास्त्र के बजाय उस  कविता का प्रभाव बना रहा। दूसरे दिन से बाकी नियमित कक्षाएँ भी चलने लगी। कल की तरह आज भी कक्षा से निकलते ही सभी छात्र तितर बितर हो कर बिखर गये,पर यह बिखराव हम जैसों पर ज्यादा भारी था। क्योंकि इसके पूूूूर्व के छात्र जीवन मे कभी भी न हम अकेले रहे न ही एकाकी जीवन ही जीया था। इस बिखराव के बाद भी छात्र छात्राओं के दो गुट तो स्पष्टत: दिख रहे थे। पहले गुट मे वे छात्र छात्रायें जो इसी कालेज परिसर के अंग रहे उदय प्रताप इण्टर कालेज और रानी मुरार से पढ़ कर आये थे वे आपस मे पूर्व परिचय के कारण घुले मिले थे। दूसरे गुट मे वे छात्र छात्रायें जो यू पी कालेज मे पहली बार प्रवेश लेने के बावजूद कालेज परिसर, परिवेश और लोगों से परिचित थे , इस गुट मे शहर के छात्र विशेषकर अर्दली बाजार, शिवपुर, पाण्डेपुर, वरूणापुल,पहड़िया और आस पास के थे। इन दोनो गुटों से उपेक्षित हम लोग थे जो यू पी कालेज मे पढ़ने दूर दराज और दूसरे शहरों गॉवों से आये थे। हमारे जैसे लोग दोनो गुटों से अलग थलग छितराये हुये थे और कालेज परिसर और परिवेश को समझने का एकाकी प्रयास कर रहे थे। मेरे लिये यह एक कष्ट मय प्रक्रिया थी क्योंकि मुझे याद नही कि मैने कभी बिना संगी साथी के जीवन का कोई दिन व्यतीत किया हो। बरामदें मे गुटों से अलग थलग खड़े एक पतले दुबले छात्र को मैने अपना परिचय देते हुये उससे उसके विषय पूछ दोस्ती की शुरूआत की। वह अरविन्द था, लखनऊ से केन्द्रीय विद्यालय मे पढ़ने के बाद यहॉ नाम लिखाया था। उसे भी किसी साथी की ही तलाश थी। तभी हम लोगों से राजेश भी आ मिले, वे मेरे बचपन के मित्र  होने के साथ रिश्ते मे भाई लगते है और उसने भी यहीं प्रवेश लिया था। फिर तो दोनो गुटों से अलग थलग पड़े हम गुटनिरपेक्ष छात्र छात्राओं का तीसरा गुट धीरे धीरे प्रभावी होता गया और एक स्थिति यह हो गई कि दोनो गुट हम लोगों से जुड़ने लगे। सीनियर्स के क्लासेज भी शुरू हो चुके थे। अब बड़े छोटे का आपसी तालमेल भी दिखने लगा था। कहीं कोई रैगिंग नही। कहीं कोई जाति प्रभुत्व नही। क्लास कर के दोस्तों के संग कैण्टीन मे जा कर समोसा चाय लालपेड़ा खाते किसी सीनियर के आने पर सम्मान के साथ उनके लिये सीट छोड़ देना और उस सम्मान के बदले पैसा न देने की नसीहत पाते हुये अब कालेज लाईफ पूरे रौ मे चलने लगी।
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क्रमश: .....
अगले अंक मे  वार्षिक संस्थापन समारोह और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन.....

रविवार, 12 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की ,,,(२) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १२जुलाई२०२०

यादें यू पी कालेज की ....(२)

            बहरहाल तीन दिन बाद शुक्रवार भी आ गया। हम और संतोष तीन दिनों से इस शुक्रवार का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। एक तरफ तो मन मे उत्साह था नये माने जाने कालेज मे पढ़ने का, वहीं दूसरी ओर तीन दिन रात तक मन मे धुकधुकी भी लगी हुई थी कि कहीं तीन दिन मे किसी क्षत्रिय छात्र को प्रवेश देने के लिये मेरा एडमिशन न कैंसिल हो गया हो। मन को यह भरोसा था कि जब बिना किसी सोर्स सिफारिश के नाम लिस्ट मे आ गया तो कटना नही चाहिये। फूलपुर बाजार मे हमें और संतोष को मिलना था वहीं से बस से बनारस आना था। बाजार मे संतोष मिले तो उन्होने कहा कि " यार सुनते है कि यू पी कालेज मे रैगिंग भी होती है और नये लड़कों को सब बड़ा मारते है।" अब यह एक नयी मुसीबत का नाम सुना हम लोगों ने, जिससे आज तक पाला नही पड़ा था। आपस मे तय किया कि चलो जहॉ तक हो सकेगा सह लिया जायेगा, और अति होने पर मूंछ वाले रामयाद सर हैं ही।  शायद इसीलिये उन्होने कहा ही है कि कोई दिक्कत पर मेरे पास आ जाना। बजरंगबली हनुमान जी का नाम ले कर हम लोग बस मे बैठे और भोजूबीर उतर कर यूपी कालेज पहुंच गये। आज भीड़भाड़ कुछ ज्यादा ही थी। लड़कों के साथ लड़कियॉ भी दिख रही थी। इतनी लड़कियों को एक साथ देखने का हमारा पहला अनुभव था क्योंकि  कक्षा ६ से लेकर इण्टर तक की हम लोगों की शिक्षा दीक्षा लड़को के स्कूल मे हुई थी। कला संकाय के भूतल पर संकाय का कार्यालय था । भवन मे प्रवेश करते दॉयी ओर,सीढ़ीयों के पहले। हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान समालोचक डॉ० विश्वनाथ प्रसाद जी संकाय प्रमुख थे और उन्ही के द्वारा कौसिंलिंग ली जा रही थी। हाईस्कूल इण्टर का मार्कशीट, सनद, टीसी, चरित्र प्रमाण पत्र का ओरिजिनल से मिलान कर फार्म के एक हिस्से को फाड़ कर छात्रों को दे दिया जाता और उसे ले जा कर विज्ञान भवन मे प्रथमतल के गलियारे मे स्थित फीस काउंटर पर फीस जमा करना था। यह संपूर्ण प्रक्रिया हम ने तीन चार छात्रों की कौंसिलिंग को देख कर समझ लिया था। बाहर भीड़ लगे रहने पर भी क्या मजाल कि कमरे मे दो के बजाय तीन लड़के घुस जाये। इतना सख्त अनुशासन हम लोगों के लिये नया ही नही अनोखा भी था। लगभग एक घंटा इंतजार करने के बाद संतोष का नंबर आया। मेरा नंबर लिस्ट मे उनसे पांच लाईन नीचे था। संतोष अंदर गये तो सब कुछ जॉच कर ये पता चला कि हाईस्कूल के सनद की कापी नही है। तुरंत बगल मे बैठे कुर्ता पजामा पहने हुये पतले दुबले गूरूजी ने ( बाद मे हम लोग उनको सतीश बाबू के नाम से जाने) एकदम से आदेश दिया कि जाओ  भोजूबीर से सनद फोटो कापी करा के ले आओ। अब बेचारे संतोष परेशान । हम लोगों के लिये  भोजूबीर भी उस दिन आक्सफोर्ड लेन से कम नही था। बाहर निकलने पर मैने संतोष से कहा कि थोड़ी देर रूक कर हमारी कौंसिलिंग के बाद दोनो जन चल के फोटोकापी करवा लेगें। पांच लड़को बाद बस मेरा नंबर है । मेरी बारी में अंदर  जब मेरे डाकूमेण्ट्स का मिलान हो रहा था तो संतोष बाहर  दरवाजे के पास खड़े हो उत्सुकतावश यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि कहीं मेरे मे भी कुछ कमी तो नही रह गई है तभी एकदम सफेद झकाझक सफारी मे विराजमान  डॉ० विश्वनाथ प्रासाद की दृष्टि उन पर पड़ गई और उन्होने कस कर संतोष को वहॉ खड़े होने पर डॉट दिया। रामकसम हम लोग अंदर से बुरी तरह सहम गये पर इस  बात की गॉठ बुरी तरह मन मे बैठ गई। बेचारे संतोष और हम सहमे सकुचाये भकुआये से फोटोकापी कराने दुकान पूछते पूछते हुये भोजूबीर पहुंचे। भोजूबीर भी अजीब जगह है । यहॉ १०० मीटर के अंदर मे तीन तिराहा  और दो चौराहा है और सब का नाम भोजूबीर ही है। तब यूपी कालेज से निकल कर दाहिने हाथ पकड़ कर कचहरी जाने वाले रास्ते पर चौराहे के पास कुंये के सामने कोने मे शव विश्राम स्थल का तबूतरा था और उसी के पास सरस्वती टाईपिंग एण्ड फोटोस्टेट की दुकान थी। पूरे कमरे मे लगी बड़ी सी मसीन मे पहले सीधे प्लेट निकाल कर  फिर गोल गोल आगे पीछे करते हुये फोटोकाफी हुआ करती थी वहॉ।  ५० पैसा कापी पहला पन्ना फिर ३० पैसा कापी दूसरा पन्ना की दर से। हम लोगों ने अपने सारे डाकूमेण्ट जो तब संख्या मे कुल चार थे  फोटो कापी करवा लिया।जेब के फुटकर दो रूपये उसे देकर वापस आर्ट्स फैकल्टी पहुंचे। डरते डरते संतोष के "मे आई कम इन सर?" कह कर अनुमति मॉगने पर डीन साहब ने ऐसे देखा जैसे उससे कोई गुनाह हो गया हो। थोड़ी देर पहले संतोष को मिली डॉट का सबक याद रखते हुये मै दरवाजे से हट कर खिड़की के सामने खड़ा था जहॉ से अंदर की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। डाकूमेण्ट चेक कराते समय संतोष थोड़ा टेबुल पर झुक कर कुछ बता रहा था कि ढीले ढाले कुर्ते पजामे मे अपने को सेट किये हुये पतले दुबले सतीश बाबू ने फिर हड़का दिया, "सीधे खड़े नही हो सकते, ऊपर बिछे जा रहे हो।" अब बेचारे सीधे साधे संतोष खुद की गलती भी नही समझ पाये और पहले ही दिन दो बार डॉट खा गये। खैर कौंसिलिंग की औपचारिकता पूरी कर एडमिशन फार्म का पन्ना हम लोगों को मिल गया फीस जमा करने के लिये। आर्ट्स फैकल्टी से विज्ञान भवन फीस काउंटर तक हम लोग मौन ही रहे। अंदर से दोनो जन महाविद्यालय मे हुये इस पहले साक्षात्कार से खुश नही थे पर एक दूसरे से कुछ कह नही रहे थे।

           शुक्र था कि शुल्क पटल प्रत्येक संकाय के लिये अलग अलग थे। कला संकाय वाले पटल पर आठ नौ छात्र पहले से लाईन मे थे।हम भी लाईन मे लग गये। हमे क्या पता कि असली मुश्किल तो अब होनी थी। हमारी फीस ₹६४१/- और संतोष की ₹५४१/- रूपये लगनी थी, यानि कुल ₹११८२/- रूपये । काउंटर पर पहुंच कर दोनो फार्म दिये तो काउंटर क्लर्क ने कहा कि एक छात्र से एक फार्म। जब पीछे पलट के संतोष का फार्म उसे पकड़ाने लगा तो पता नही क्यों क्लर्क महोदय को दया आ गई उन्होने कहा" अच्छा लाईन मे हो तो दे दो दोनो साथ ही।" हमने सौ सौ के बारह नोट उन्हे पकड़ाये तो फुटकर देने को कहा, तुरंत पीछे से संतोष ने पचास बीस के एक एक और दस के दो नोट बढ़ा कर मामला सेट करने की कोशिश की तो उन्होने दो रूपये फुटकर की डिमांड रख दी। यह कहते ही कि दो रूपये फुटकर नही है , वे महोदय भड़क गये, "नही है से क्या , एडमिशन कराने आये हो तो फुटकर ले के आना चाहिये था न, अब मै कहॉ से ले आँऊ आठ रूपये?" मै कभी खुद को कोस रहा था फुटकर न रखने के लिये कभी फोटोस्टेट वाले को जो उसने फुटकर दो रूपये ले लिये थे। " सर देख लिजिये" पीछे से संतोष ने याचना की। "अरे देख कहॉ से ले? यहॉ क्या हम रेचकारी की दुकान लगा के बैठे हैं।" काउंटर बाबू एकदम असहयोगात्मक मुद्रा मे थे।और हम दोनो काउंटर के बाहर विपन्न दीन हीन जैसे। समस्या यह भी थी कि उसी दिन फीस न जमा करने पर एडमिशन कैंसिल हो जाता। ऐसे मे कोई और सूरत न देख हमने लाईन मे अगल बगल वालों से फुटकर के लिये पूछना शुरू किया पर अंदर के रवैये को देख बाकी लोग भी  अपने अपने फुटकर से सावधान हो गये थे। बगल वाला काउंटर कृषि संकाय का था उस पर भी तीन चार लोग लाईन लगाये थे ,हमने उनसे भी फुटकर के लिये मदद मॉगी। पर सभी ने ना ना कह दिया। तभी उस लाईन मे खड़े तीसरे छात्र जो हम लोगों से वय मे बड़े और अच्छी कद काठी वाले थे, ने पूछा "कितना पैसा कम हो रहा है?" हम लोगों ने कहा कि "सर दो रूपये देना है इन्हे।" उन्होने तुरंत अपने जेब से एक रूपये के दो सिक्के निकाले और देते हुये कहा" कि फुटकर तो नही है, ये लो जमा कर दो।" 

                चलो ये समस्या तो निपटी। हमने ₹११८२ रूपये जमा कर रसीद ले कर औपचारिक प्रवेश पा लिया। तब तक फुटकर दो रूपये देने वाले सज्जन अपना काम निबटा कर के जा चुके थे। पुन: कला संकाय आ कर देखा तो नोटिस बोर्ड पर ५ अगस्त से कक्षाएँ चलने की नोटिस लगी थी। सुबह से लाईन लगाये और खड़े खड़े हम लोग थक गये थे । मन हुआ कुछ चाय चुक्कड़ कर लिया जाये। हमारी जानकारी मे दुकान भोजूबीर थी पर संतोष ने सुझाया कि उस दिन हम लोगों ने एनसीसी के बगल मे कैण्टीन देखा था और वहॉ बैठ कर कुछ चाय नाश्ता करते लोगों को भी। तो हम लोग कैण्टीन पहुंच गये। वहॉ ६० पैसे का समोसा और चालीस पैसे की चाय पी कर निकलने वाले ही थे कि  दो रूपये फुटकर देने वाले सज्जन कैण्टीन मे आते दिखे। हम लोगों ने सोचा बढ़िया है ये यही मिल गये नही तो बिना नाम पता के इनका भी पैसा लौटाना मुश्किल होता। अब हम लोगो के  पास फुटकर भी था । संतोष तुरंत उनके पास पहुंच कर दो रूपये देते हुये कहे "सर, वो आपका पैसा।" उन्होने दो क्षण संतोष और हमे देखा फिर बैठने को कह हम लोगों के बारे मे, विषय, पिछला कालेज, घर दुआर पूछने लगे। फिर बताया कि "इस कालेज मे सर कहने की परंपरा नही है, हम सभी एक परिवार के हैं , यहॉ बड़ो को भईया कह कर सम्मान देते है और अपनापन पाते है।" सुबह से तल्ख व्यवहार झेल रहे हम लोगों ने मुंहदेखी सहमति मे सिर हिलाया। और चलने को हुये। संतोष ने एक बार फिर दो रुपया उनकी ओर बढ़ाते हुये कहा" सर वो आपका दो रूपया।" इतना सुनते ही वो भड़क गये " तुम लोगो को एतना देर से समझा रहे है, बुझा नईखै रहा है। दूई रूपिया अपने छोटे भाई के फीस मे हम जोड़ देगें तो कर्जा मॉगेगें? और ई सर सर का होता है, कायदे से भईया कहे मे शरम आ रहा है तो अरून कहो।रखो पईसा। बड़े आये पईसा देने वाले?"

         आज सुबह से अनजाने लोगों से डॉट खाते हम लोगो का यह तीसरा मौका था। क्या जगह है यार, नये बच्चों को पा के जिसका मन हो रहा है वही हड़का दे रहा है। हम लोगों के मुंह लटक गये। जिसे तुरंत उन्होने ताड़ लिया, फिर बड़े प्यार से बोले " अरे पागल, अब हम भईया हो के तुमसे दो रूपया लेगें , मेरी तरफ से एडमिशन की खुशी मे लाल पेड़ा खा लेना", फिर जैसे उन्हे याद आया कि हम लोग तो पहली बार कालेज आये हैं हम तो लाल पेड़ा से अनजान होगें, तो तुरंत उन्होने कैंटीन काउंटर पर आवाज दिया " ऐ बाऊसाब, तीन गो लालपेड़ा भेजियेगा तो।"उस प्यार भरे डॉट के स्वाद से लालपेड़ा आज तक हमारे पसंदीदा मिठाई मे शामिल है।

         वह सज्जन अरूण भईया थे। मोहनिया रामगढ़ के रहने वाले बीएससी थर्ड ईयर के छात्र। अरूण भईया जब तक रहे, हम लोगों के लिये कालेज मे छॉव बने रहे। फिर जाने कितने बार उनके साथ लालपेड़ा खाने का मौका मिला और हर बार पैसा उन्होने ही दिया। बड़े भाई की मौजूदगी मे डॉट खाने के डर से हमने कभी पैसा देने की कोशिश भी नही की।और वो दो रूपया, वह अभी तक मूल धन के रूप मे अरून भईया के धरोहर रूप मे हमारे खाते मे दर्ज चला आ रहा है।😀😀😀

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क्रमश:.........

अगली बार----,'कालेज मे कक्षा चलने पर तीन छात्र गुट......


शनिवार, 11 जुलाई 2020

व्योमवार्ता/ यादें यू पी कालेज की (१) ; व्योमेश चित्रवंश की डायरी

यादें यू पी कालेज की........(१)

उदय प्रताप कालेज यानि छत्रिया कालेज।,यही धाऱणा थी यूपी कालेज के प्रति  हमारे अध्ययन से पूर्व हमारे जानने पहचानने और गॉव वालों के मन मे कि वहॉ केवल छत्रिय लोग ही पढ़ते है। वहॉ के अध्यापक दबंग होते है जो रिवाल्वर पिस्टल खोंस के चलते है, और छात्रों को दौड़ा दौड़ा कर मारते है। बाकी जातियों के बच्चों को फेल कर देते हैं। नकल करने पर रेस्टिकेट कर देते हैं। वगैरह वगैरह।
  वर्ष 1986 मे जब हमने अपने गॉव के कालेज से इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण कर लिया तो उच्च शिक्षा के लिये बनारस में कहॉ प्रवेश ले यह विकट समस्या थी। उस समय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अराजकता चरम पर थी। शैक्षणिक सत्र दो वर्ष बिलंब से चल रहे थे। काशी विद्यापीठ मे पढ़ाई के अतिरिक्त सब कुछ होता था। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संबंध मे न तो कोई जानकारी थी, न ही वहॉ पढ़ने की ईच्छा, क्योंकि संस्कृत विषय मे हम पैदल क्या घसीटामार भी नही थे। तब ले दे के बचा उदय प्रताप कालेज और हरिश्चंद्र कालेज। इन दोनो कालेजो के विषय मे मेरे परिवार सहित गॉव के लोग भी तब बिलकुल अंजान थे क्योंकि मेरे परिवार के सभी लोगों ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अध्ययन प्राप्त किया था और गांव के लोगों ने काशी विद्यापीठ से। मेरे इण्टर के सहपाठी मित्र संतोष कुमार सिंह (एसोसियेट प्रोफेसर, विधि, टीडी कालेज जौनपुर) ने सुझाया कि यूपी कालेज मे एडमिशन लेते है। दूसरे दिन हम दोनों जन यूपी कालेज आये और संभवत: चालीस रूपये का फार्म खरीद कर भर दिया गया। वह हम दोनो के लिये यूपी कालेज मे पैर रखने का पहला दिन था। फार्म भरने के पश्चात हम लोग विद्यालय परिसर देखने को निकले ।डिग्री कालेज से न्यू हास्टल होते हुये एनसीसी ,पुरानी लाईब्रेरी होते हुये कोआपरेटिव से घूमते हुये जिम और नंबर लिखे हुये हास्टलों को देखते हुये राजर्षि शिशु विहार रानी मुरार से आगे बढ़ते हुये इण्टर कालेज के लाल बिल्डिंग तक। बाप रे , कितना बड़ा कालेज ? हम लोग इण्टर कालेज के सामने पहुंचे ही थे कि पीछे से एक गरजती हुई आवाज आई ," रूको, कहॉ जा रहे हो? किस सेक्शन में हो? ड्रेस क्यों नही पहने हो?" हमने पीछे घूम कर देखा तो प्रभावशाली व विशाल व्यक्तित्व के सज्जन बड़ी बड़ी डरावनी मूंछे और बड़ी बड़ी ऑखों से सवाल करते हमे घूर रहे थे।

" जी हम लोग एडमिशन के लिये फार्म लेने आये थे।" हमारी व संतोष दोनों की हवा खिसक चुकी थी। छत्रिया कालेज के बारे मे सुने गये सारे किस्से कहानी हम लोगों को याद आने लगे थे।

"फार्म? किस चीज का फार्म?" उसी तल्ख असरदार आवाज मे अगला सवाल।

"जी, वह बी ए मे एडमिशन के लिये।" संतोष मिनमिनाये।

"तो यहॉ क्या कर रहे हो? डिग्री कालेज जाओ।"

"जी वह देख रहे......." संतोष वाक्य पूरा करें कि हमने मौके को संभाला " जी सर वह रास्ता भूल गये थे।"

"अच्छा,अच्छा, पहली बार आये हो। बेटा इधर से सीधे जा कर मेन गेट से बॉये घूम जाना तो डिग्री कालेज पहुंच जाओगे। यह इण्टर कालेज है। अब चले जाओगे न?" आवाज मे असर वही पर अब लहजा समझाने वाला हो गया था।

"जी सर।" हमने तत्काल उस लंबे चौड़े रोबीले काया का चरण छुआ। देखा देखी संतोष ने भी।

" खूब खुश रहो, मेहनत से पढ़ो। कोई समस्या हो तो आ जाना, उस कोने वाले कमरे मे बैठता हूँ मै।"

अब लहजा समझाने से बढ़ कर प्यार दुलार वाला हो गया था। बेहद अपनो जैसा, पर आवाज मे वही असर।

"जी", कह कर हम लोग वहॉ से जल्दी से निकल पड़े , जान बची तो लाखों पाये। लगभग भागने के अंदाज मे चलते हुये हम लोग मेन गेट से बाहर आ कर भरपूर सांस लिये होगें। संतोष ने तत्कालिक एलान कर दिया कि भाई मै तो यहॉ नही पढ़ूगॉ, अंदर से मै भी हिला हुआ था। संतोष तो फिर भी क्षत्रिय हैं, मेरा क्या होगा, मै भी ये सोच के परेशान था। ठीक है भाई , चलो हरिश्चंद का भी फार्म भर देते है। वहॉ से हम लोग निकल कर भोजूबीर केशरी मंदिर के पीछे अपने नाना के मकान पर पहुंचे वहॉ भोजन कर दोनो जन हरिश्चंद्र कालेज पहुंच गये। वहॉ फार्म लेने के बाद हमने पाया कि यह तो हमारे पुराने इण्टर कालेज से भी छोटा है। मुर्गी के दरबे के माफिक। बहरहाल वहॉ भी पचास रूपये का फार्म खरीद कर हम लोग गांव लौट आये, पर यू पी कालेज का वह खुला खुला हरा भरा परिसर हमारी आंखो पर चढ़ा रहा और  बार बार बुलाते हुये ललचाता रहा। एक सप्ताह बाद हम दोनो लिस्ट निकलने पर पुन: मन को समझाते यूपी कालेज पहुंचे ये मान कर कि हम लोगों का नाम तो आया नही होगा पर आशा के विपरीत दूसरी लिस्ट मे हम दोनो लोगों का नाम था। काफी भीड़ भाड़ ,गहमा गहमी और लिस्ट मे नाम न आये ढेर सारे निऱाश चेहरों को देखते हुये पुन: डिग्री कालेज के पीले रंग वाले कला भवन के बरामदें की रेलिंग पर आपस मे सोच विचार कर हम लोगों ने निर्णय लिया कि अब प्रवेश तो यहीं लिया जायेगा। 

एडमिशन के लिये तीन दिन बाद की तिथि मिली थी सारे ओरिजनल डाकूमेण्ट्स व फीस ले कर आने के लिये। साथ मे दो लिफाफे पर पॉच पॉच रूपये का डाक टिकट लगा कर भी जमा करना था शहर से बाहर के नव प्रवेशार्थियों को। हम लोग तीसरे दिन आने का निश्चय कर मेन गेट से लगे पोस्ट आफिस मे से टिकट खरीद कर निकले कि वही पहले दिन वाले रोबीले व्यक्तित्व व काया के स्वामी बुलेट पर से उतरते मिले। और हम लोगों के कुछ करने से पहले ही उन्होने पहचान लिया, " क्या बेटा , कैसे हो? क्या हुआ एडमिशन का?

हम लोगों ने आगे बढ़ कर पुन: चरणस्पर्श किया।
" जी सर, शुक्रवार को बुलाया है कौन्सिलिंग के लिये।"

"बहुत अच्छे, ठीक है एडमिशन ले लो। मेहनत से पढ़ोगे तो बहुत आगे जाओगे। कोई भी दिक्कत हो तो मेरे पास चले आना। मेरा कमरा देखे ही हो?"

" जी सर।" हम ने पुन: चरणस्पर्श कर उनसे विदा लिया। मैने संतोष से कहा " यार संतोष, जहॉ, इतने सहयोगी भाव वाले टीचर है,  न हम से जान न पहचान तब भी हमारे लिये इतना करने को तैयार है तो वहॉ छत्रियता के नाम पर भेदभाव कैसे हो सकता है? मुझे लगता है कि वे सब कही सुनी बाते हैं।" संतोष ने भी मेरी बात से सहमति जताई और कहा कि "अरे यार उस गुरूजी का नाम तो पता करना था जो हम लोगों के लिये यहॉ पहले गार्जियन व मार्गदर्शक के रूप मे मिले हैं।" हम लोग वही बाहर किताब की दुकान पर सिलेबस और विषय की जानकारी ले रहे थे कि अंदर से धड़धड़ाती हुई बुलेट पर पुन; रोबीले चेहरे और मूंछ वाले गुरूजी निकले। हमने दुकान वाले से ही पूछा "क्यों भईया , वो जो बुलेट से गुरूजी जा रहे हैं, उनका क्या नाम है?"

" वो, वो तो रामयाद सर थे।" दुकानवाले ने बताया।

      .........क्रमश;

  (एडमिशन और शेष प्रक्रिया अगले अंक में)

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व्योमवार्ता/ #गुलेलन चच्चा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, ११ जुलाई २०२०

व्योमवार्ता/आज की पोस्ट #गुलेलन चच्चा पर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,११जुलाई२०२०

लगभग डेढ़ साल पहले मैने #गुलेलन चच्चा की पोस्ट फेसबुक पर डालना शुरू किया। कुछ मित्रों ने आलोचना किया तो कुछ ने पसंद भी किया। पसंद करने वालों की संख्या आलोचना करने वालों से पचासो गुना ज्यादा थी तो #गुलेलन चच्चा की पोस्ट जारी रही। सुबह सुबह #गुलेलन चच्चा के तीखे सवाल से जहॉ व्यवस्था और पार्टी के कुछ लोग तिलमिला जाते तो बहुतेरे मुझे फोन कर इस तरह के सवाल उठाने के लिये प्रोत्साहित करते हुये शाबासी भी देते। बहुत सारे मित्रों ने #गुलेलन चच्चा को खोजने की भी कोशिश की।तो एक दो जनों ने #गुलेलन नाम पर ऐतराज जताया, मुस्लिम बंधुओं को यह नाम मुस्लिम तो हिन्दू मित्रों को इसमे तिरस्कृत हिन्दू की झलक मिली। पर #गुलेलन चच्चा इस हिन्दू मुस्लिम के पचड़े से दूर अपनी बेबाक राय देते रहे। इधर हाल मे फिर कुछ मित्रों ने #गुलेलन चच्चा के बारे मे जानने की ईच्छा और जिज्ञासा जाहिर किया तो मैने भी सोचा कि आज फुरसत मे #गुलेलन चच्चा के चरित्र को आप के समक्ष उजागिर कर ही देते हैं।
#गुलेलन चच्चा एक आम मध्यआयवर्गीय सामान्य जाति के भारतीय नागरिक है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से  बी.ए. करने के बाद उनकी नौकरी भारतीय जीवन बीमा निगम मे लग गई। तबियत से आरामपसंद और नीयत से ईमानदार इंसान #गुलेलन चच्चा १० से ५ की नौकरी करते हुये तीन साल पहले सहायक प्रशासनिक अधिकारी पद से सेवामुक्त हो कर आजकल अवकाशप्राप्त जीवन बिता रहे है। पूरी नौकरी मे ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर के सिद्धान्त पर चलते हुये दोस्तों के साथ कभी कभी चाय और खैनी शेयर करने वाले #गुलेलन चच्चा पिछली सदी के आखिरी साल जब ट्रांस्फर प्रमोशन ले कर बाबा भोलेनाथ की नगरी मे बनारस आये तो बाकी जिन्दगी यही काटने का निर्णय ले कर विभागीय आवासीय ऋण ले डेढ़ बिस्वा जमीन मे एक छोटा सा घरौंदा भी बनवा लिया। बाबा के आशीर्वाद से यहीं रह बच्चों को पढ़ाया लिखाया और बिटिया की शादी भी निबटा दी। बेटा प्राईवेट कालेज से समय और फैशन के अनुरूप बीटेक कर के कोई टेढ़े मेढ़े से नाम वाली मल्टीनेशनल कंपनी मे साफ्टवेयर इंजीनियर है,वो कुछ टीम हेड या ग्रुप हेड जैसे पद पर।#गुलेलन चच्चा ने जितना पैसा कभी एक साथ अपने बैंक एकाउंट मे देखा नही था उससे कहीं ज्यादा उसका एक महीने का सीटीसी है।#गुलेलन चच्चा बताते है कि ४०-४२ के पैकेज पर है अभी, उसकी एक टांग हैदराबाद मे तो दूसरी हमेशा उड़ते जहाज मे रहती है। अब बनारस मे रह गये #गुलेलन चच्चा और उनकी पत्नी तो दोनो मे दिन भर टीवी पर महादेव, सास बहू, ससुराल या आजतक और आर भारत देखने को लेकर चैनल बदलने व रिमोट लेने देने को ले कर टुन्न पुन्न लगी रहती है। #गुलेलन चच्चा डायबिटिक है तो पत्नी बीपी पेसेंट। बस इसी तरह ड्राइंगरूम से लेकर खाने से लेकर बतियाने तक का काम हाल मे लगे डाइनिंग टेबुल करते हुये जिन्दगी काढ़ा, टैब्लेट और नित्यम पर कट जा रही है।
#गुलेलन चच्चा की देशभक्ति (आप इसे मोदीभक्ति भी कहें तो कोई दिक्कत नही) मे कोई कसर नही पर कालोनी मे झाड़ू मारने वाले से लेकर सभासद मेयर विधायक डीएम कमिश्नर तक के कार्यप्रणाली से उन्हे संतुष्टि नही है। असंतोष तो उन्हे चीन अमेरिका नेपाल पाकिस्तान से भी है पर वे इन सारी बातों को अपनी पत्नी से साझा नही कर पाते। सुबह जब दूध लेने आते है तो वहॉ उनके जैसे कई वरिष्ठ नागरिक भी इसी मनोदशा और मनोव्यथा मे अपने अपने विचार रखते है। वहॉ पर दूध वाले यादव जी भी उन्हे नही टोंकते क्योंकि जब चर्चा जवान होती है तभी यादव जी भी बचपन से सिखाया हुआ जवानी मे प्रैक्टिस किया अपना निरामयी करतब का खेल दूध मे अकसर कर देते है और #गुलेलन चच्चा तथा बाकी लोग थन से निकले शुद्ध दूध के जुमले मे अपनी संतुष्टि पा जाते है। और #गुलेलन चच्चा जैसे लोग वही पर अपने विचारों को अभिव्यक्त कर के अपने को राष्ट्रीय विचारक समझते है। पर यह हर आम औ खास देशवासी नागरिक की ईमानदार अभिव्यक्ति होती है।
जिसे हम #गुलेलन चच्चा के बेबाक पोस्ट पर लिखते हैं।
शुक्रिया #गुलेलन चच्चा और उनके सभी चाहने वालों का।
(बनारस, ११जुलाई२०२०,शनिवार)
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शनिवार, 20 जून 2020

व्योमवार्ता / षडयंत्र को समझिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2020

व्योमवार्ता / षडयंत्र को समझिये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 20 जून 2020

*कल One+ 8 Pro लॉन्च हुआ 1 घण्टे में सारा बिक गया ऑनलाइन भारतीयों को जलील करने का ये एक नया ड्रामा शुरू हुआ है।*

*मेरे किसी मित्र ने खरीदा नहीं,आप भी पूछ कर देख लो, 1000 % आपके भी किसी मित्र ने नहीं खरीदा होगा फिर सारा माल गया कहा??*

*अब आप सच्चाई सुने- चीनी कंपनीज One+,Redme  आदि फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे ऑनलाइन स्टोर्स से पेड प्रमोशन करातीं हैं।*

*मात्र 1 घण्टे के प्रमोशन के लिए कम से कम 10 लाख रुपये सिर्फ इस बात के दिये जाते हैं कि यूजर हॉट सेल बटन को जब दबाए तो उसको मैसेज मिले - sold out, out of stock....*

*इसलिए किसी भारतीय को अपशब्द मत बोलना, किसी ने नहीं खरीदा है ये भारत की मिट्टी है।यहाँ इतना कमजोर कोई नही है जब देश पर बन जाये तो बड़ी से बड़ी आहूति देने के लिए हर भारतीय तैयार रहता है... ये paid promotion था*

*चीन हमें हतोत्साहित करने की हर सम्भव कोशिश कर रहा है  कि हम भारतीय कुछ नहीं कर सकते...न युद्ध न आर्थिक बहिष्कार।*

*ग्लोबल टाइम्स जैसा अख़बार भी अगर इस खबर को छाप रहा तो इसका मतलब चोट सही जगह लगी है बहिष्कार जारी रहना चाहिए .*

*साथियो चीन के इस चालाकी को हम सभी मिल कर समाप्तकर देंगे।इस तरह के भ्रामक अफवाहों को फैलने न दे।*
(बनारस, २० जून २०२०, शनिवार)
#व्योमवार्ता
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