गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/ गण के तंत्र का उत्सव रामसमुझ की छब्बीस जनवरी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 दिसम्बर 2018

व्योमवार्ता/ गण के तंत्र का उत्सव रामसमुझ की छब्बीस जनवरी: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 27 दिसम्बर 2018

                     रामसमुझ की नींद रोज की तरह आज भी पॉच बजे सुबह खुल गई, अब नींद खुल गई तो वह नहा निपट के खाली भी हो गया। अभी सुरज देवता नही उगे थे। रामसमुझ को नहा धो के बैठा देख उसकी पत्नी परभौतिया ने जले चूल्हे पर चार गो मोटी मोटी हथुई रोटी सेक मसालेदार आलूदम और गरम गरम काली चाय के साथ उसके आगे कलेवा रख दिया।कलेवा देने के बाद परभवतिया रोज की तरह ऑख पोछते, नाक सुकड़ते रामसमुझ के सामने बैठ गई। यह परभौतिया का रोज का नियम था, इसमे कोई शिकवा शिकायत या मजबूरी की बात नही बल्कि रोज सुबह सुबह चुल्हे को फूंकने व धूये के  तीखेपन का असर है। परभौतिया कई बार टी वी पर सुनी थी कि सरकार और मोदी जी सबको गैस कनेक्शन बॉट रहे है पर अभी तक उसे कोई कनेक्शन नहीं मिला। ऐसा नहीं है कि परभवतिया व रामसमुझ ने इसके लिये प्रयास नहीं किया पर गैस एजेंसी वालो ने बताया कि कनेक्शन उनके आधार कार्ड पर लिखे पता पर ही मिलेगा। अब परभवतिया का घर तो यहॉ है नही, वह तो बिहार मे है कोसी नदी के किनारे सड़क से दो कोस अंदर जाने पर। यहाँ तो वह उसी बिल्डर के अधूरी बनी बिल्डिंग के कंपाउंड मे किनारे बने टेम्परवारी ईंट की झोपड़ी मे रहती है जिसमे पहले वह व रामसमुझ दोनो काम किया करते थे। पता नहीं क्यों बीच मे ही बिल्डिंग का काम बंद हो गया लेकिन बिल्डर के मेठ ने उन दोनो को और लेबरो के साथ पॉच सो रूपये महीने पर उन्हे रहने दिया था।एक बार रामसमुझ ने मेठ से पूछा भी था कि काम क्यों बंद हो गया तो मेठ ने बताया कि नोटबंदी से सब कुछ ठप्प हो गया है परभवतिया आज तक नही समझ पाई कि अगर नोटबंदी हो चुकी है तो रोज दिखने वाले नोट कहॉ से आते है। बल्कि अब तो हरे पीले बैगनी बादामी कत्थई रंग के रिकम रिकम के नोट दिखते है उसे। पिछले बार जब एकांउट मैडम जी ने उसे पगार दिया था तो वह तो पहचान ही नही पाई थी हरे रंग के पचास कत्थई रंग के सौ और पीले रंग के दो सौ रूपये के नोट को। मैडम जी ने ही उसे पहचनवाया था । एकाउंट मैडम जी ने उसे एगो छोटका चूल्हा मुंह वाला सिलेण्डर दिया है पर वो भी न भरवाने से खाली पड़ा है। तो आधार न होने के काऱण परभवतिया को कनेक्शन नही मिला गैस का, और वह आज भी ईंटे वाले चुल्हे पर ही अपना रोटी कलेवा तैयार कर लेती है। परभवतिया की भी दिनचर्या बड़ी टाईट है वह रामसमुझ से भी पहिले उठ के मुँहअंधेरे ही थोड़ी दूर पर से गुजर रही रेलवे लाईन के किनारे फरचंगा हो आती है। शुरू शुरू मे तो परभवतिया को बड़ा अजीब लगता था जब वह लाईन किनारे घुटने मे सिर गाड़े बैठी रहती और कोई रेलगाड़ी उधर से गुजरती पर अब वह आदती हो गई है । मेलगाड़ी आये या मालगाड़ी कौन सा उसमै बैठने वाले पसिंजर परभवतिया को पहचानते है,और गर पहचानते भी होगें तो परभवतिया अपना मुँह थोड़ा सा और नीचे झुका लेती है कि उसे कोई देख ही न सके। साल डेढ़ साल पहिले बड़ी दिक्कत हो गई थी कोई नया लड़का कलेट्टर आया था वह सबेरे सबेरे खुले मे फरचंगा हेने वालों को सीटी बजा के पकड़वाता था। सुन सुन कर परभवतिया को कई दिन तक खुलाशा ही नही हुआ था। लेकिन यही अच्छा रहा कि रेलवे लाईन किनारे कोई सीटी बजाने वाला नही आया बाद मे सुना कि उस लड़के कलेट्टर की यहॉ से बदली हो गई।
अरे हम भी कहॉ की बात करने लगे , बात परभवतिया के दिनचर्या की हो रही थी, तो परभवतिया जब तक रेलवे लाईन से वापस आती है तब तक हाते मे लगे सरकारी नल का पानी आना शुरू हो जाता है, बस चटपट वहीं पर राखी से रात के बर्तन मॉजने के बाद चुल्हे की मुलायम राखी से ही दंत मॉज कर नहाने के बाद परभवतिया झोपड़े मे आती है और चूल्हा मे आगी दे कलेवा तैयार करने को रख देती है। परभवतिया को कभी कोई आसकत नही लगता अपने इस सबेरे के नेम मे।हॉ कभी कभार जब सरकारी नल मे पानी नही आता तब सरकारी नल की ही तरह परभवतिया को भी अपना नियम तोड़ना पड़ता है क्योंकि तब पानी के लिये बिल्डिंग के समर्सेबुल पंप का बाट देखना पड़ता है, और वह बिल्डिंग का चौकीदार तभी चलाता है जब बिल्डिंग के सारे लोग एक साथ पानी लेने आयें। अब ऐसे मे नहाया तो जा नही सकता तब परभवतिया बिना नहाये धोये अपने काम मे लग जाती है। कामधाम का मतलब रामसमुझ को कलेवा खिला के काम पे भेजना  फिर अपना कलेवा जल्दी से निपटा कर बगल वाले अपाटमिंट मे झाडू पोछा, बरतन करने जाना। कुल चार घरों मे झाड़ू पोछा बर्तन करती है परभवतिया। एकाउंट मैडम के यहॉ, उनके साहब वीडीए मे एकांउंटेन है, प्रोफेसर मैडम के यहॉ,वकील साहेब के यहॉ और वो बलकटी मैडम के यहॉ जिनके साहेब पानी वाले जहाज पे रहते हैं, सबसे बढ़िया वही मैडम है, खूब सुंदर भी है और अभी नई उमर की भी।अकसर परभवतिया को अपने पुराने कपड़े लत्ते और सामान देती है और कुछ नया बनाती है तो वो भी। उनके यहॉ काम भी कम ही होता है गिन के तीन मुर्गी, उस पर भी अकसर खाने पीने की चीजे मोबाइल कर के मंगा लेती है दूर दूर से भी, जब उनके पति आते है तो अकसर खाना पीना बाहर, परभवतिया को आराम ही आराम, लेकिन वकिलाईन मैडम को ले लो ,बाप रे हमेशा नकचढ़ी और रोज न रोज घर पर दोस्तों को बुला कर पार्टी करती रहती है। एक तो खुद कहीं बाहर जाती नही बल्कि उसके यहॉ लोग ही आते रहते है, अब लोग आयेगें तो बरतन निकलेगा और परभवतिया का काम बढ़ेगा। बस गर्मियों मे छुट्टी मनाने बाहर जायेगी तो सौ ठो हुकुम बजा के, परभावती रोज शाम को लाईट जला देना, किचन मे ऱोज झाड़ू लगा देना। सौ तरह के नखरे इन बड़े लोगों के होते है लेकिन परभावती सब कुछ कर लेती है बिना शिकायत, बिना बोले। आखिर उसकी कमाई तो झीरा है हर महीना मिल जाती है नही तो रामसमुझ के लेबराना का क्या भरोसा , कभी बरसात से बंद तो कभी काम न मिलने से। कभी कभी दस दिन भी बैठना ही पड़ जाता है। रामसमुझ और परभवतिया को चार लड़कियॉ है, लड़के के इंतजार मे एक के बाद एक करते हुये जब चार की लाईन लग गई तो मेडवाईफ बहिन जी के कहने पर परभवतिया ने आपरेशन करवा लिया तीन हजार रूपया  मिला था उस वक्त । चारों को उन दोनो ने सास ससुर के पास बिहार छोड़ दिया है  दो पढ़ने जाती है दो दर्जा आठ पास कर के घर का काम धाम देखती है अपने बब्बा आजी के पास। इन्ही की शादी की चिन्ता लगी रहती है परभवतिया को। इसलिये वह दोनो की कमाई से बचा के चार हजार रूपये अपने ससुर को भेज देती है , पॉच सौ रूपये कोठरी का भाड़ा चौकीदार के हाथ पर हर महीने के दो तारीख को रखना पड़ता है, उस भाड़े मे बिजली का एक लट्टू, छोटी वाली टीवी, एक फर्राटा पंखा, मोबाइल चार्जिंग और बाहर वाले नल का खर्चा शामिल है। दो ढाई हजार के आसपास राशन, कोईला, लकड़ी मे लग जाते है। गॉव से ससुर या कोई और दवा ईलाज घूमनेे या मिलने आ गया तो हजार पॉच सौ खातिरदारी लग जाते है पर इसी बहाने मटन मुर्गा आ जाता है । उस दिन रामसमुझ नूरी या मसालेदार सीसी ले आता है तो महीने मे एकाध दिन जश्न हो जाता है।
हम फिर लाईन से भटक गये। बात रामसमुझ से शुरू हुई थी और हम परभवतिया के लपेटे मे उलझ गये। हॉ, तो कल रामसमुझ के ठीकेदार ने कहा था कि कल छब्बीस जनवरी है काम नही होगा। अब छब्बीस जनवरी कोई हिन्दू मुस्लिम तीज त्योहार तो है नही जो काम बंद करना पड़े पर ठीकेदार ने बताया कि यह राष्ट्रीय त्यौहार है काम होता दिखा तो लेबर विभाग वाले उस पर फाईन ठोंक देंगे, तब रामसमुझ के समझ मे आया कि ठीकेदार अपने को बचाने के लिये काम बंद कर रहा है।
  आज कल रामसमुझ कचहरी मे काम कर रहा है, बहुत ऊँची बिल्डिंग बन रही है कचहरी मे, ठीकेदार बता रहा था कि मोदी जी बनवा रहे है, वे यहॉ से जीते है इसलिये। कोई बनवाये रामसमुझ को क्या? उसे तो बस काम से मतलब है। इधर तीन महीने से वह इसी बिल्डिंग मे काम कर रहा है। दिन भर भीड़ भाड़ रहती है यहॉ . लगता है सारा बनारस यही आ गया हो। अनगिनत काला कोट पहने वकील साहब लोग तो फटे कुर्ता लुंगी धोती से लेकर नये चमकते सूट टाई मे लोग, नई नई शरमाती अपने दुल्हे का हाथ थामे शादीसुदा लड़कियॉ तो उनसे ज्यादा तेजी दिखाती इधर उधर भागती महिलायें। मोटरसाइकिल की तो कोई गिनती ही नही और चारो तरफ लगी कार मोटर, किसी भी ओर से सीधे घुसने की गुंजाइश ही नही। वकील से लेकर पुलिस वाले, फेरी वाले, खोमचे वाले, फल वाले सभी तो दिखते है कचहरी में।इन तीन चार महीनो से कचहरी के कई रंग देखे है रामसमुझ ने।रोते कलपते लोगों को, ठहाके लगाते लेगों को। घर से कुर्ते की जेब मे अखबार के टुकड़े मे लपेटी रोटी को आचार के साथ खा कर सरकारी नल पर पानी पीते लोगों को और कचहरी के दुकानों मे बैठ एक के बाद मालपुये उड़ाते लोगों को। कभी अपनी धोती की गॉठ से मुड़े तुड़े नोटों को निकाल कर देते और वकील साहब के पैरों को छूती निराश ऑखे तो अटैची से नयी नोटों की गड्डियों को वकील साहेब के मेज पर पटकती सपने बुन रही ऑखो को। अभी पिछले महीने ही तो कचहरी मे वकील साहब लोगो का 'एलेकसन' था। बाप रे बाप , क्या क्या रूप और किस किस दशा मे  देखा था वकीलसाहब लोगों का रामसमुझ ने। अब ये सब बातें रामसमुझ परभवतिया को बताता है तो वह समझ नही पाती । समझ तो रामसमुझ भी नही पाता पर वह अचरज करता है इन सब चीजों को देख कर।
आजकल रामसमुझ बिल्डिंग के ऑठवी मंजिल पर काम कर रहा है। ठीकेदार ने चारो तरफ हरा तिरपाल लटकवा दिया है ऊपर से नीचे तलक ताकि कोई ईंट पत्थर का टुकड़ा नीचे न गिर सके। ठीकेदार साहेब कहते है कि वकीलो से कौन उलझे? कुछ हो गया तो नाहक बवाल कर देगें ये लोग। उन्होने सारे लेबरों से भी वकीलों से बात चीत करने से मना कर रखा है बल्कि कोशिश ये करते है कि दिन का काम कचहरी चलने के दौरान भीतर भीतर ही हो। रामसमुझ कभी कभी इस बिल्डिंग से पूरे बनारस को देखता है। टीवी टावर से लेकर कैण्ट स्टेशन का उपर वाला चक्का, बड़े बड़े एपाटमिन्ट, रजिस्ट्री आफिस , शिवपुर वाली बिल्डिंग सब छोटे छोटे दिखते है , तब उसे लगता  कि वह बहुत  ऊँचा हो गया है, बड़ा आदमी।
बहरहाल कलेवा करने के बाद थोड़ी देर रामसमुझ ईधर उधर करता रहा। परभवतिया ने कहा भी कि घर मे रह के टीवी देखे दिल्ली से प्रोग्राम आयेगा पर परभवतिया तो काम पर चली जायेगी फिर वह अकेला क्या टीवी देखेगा। परभवतिया को छब्बीस जनवरी की छुट्टी क्यो नही है, क्या उसके एपाटमिंट मे लेबर विभाग वाले नही छापा डालते। आखिर मन नही मानता वह अपना गमछा कानो पर बॉध निकल पड़ता है। आज की सुबह थोड़ी सी अलग सी है। सड़क के किनारे खड़े बच्चे आज बिना स्कूल का बस्ता लिये चमकती ड्रेसो मे अपने स्कूल की गाड़ियों का इंतजार कर रहे हैं। कई गो टैम्पो वाले अपने टैम्पो पर भी झंडा लगाये हैं कई ने आगे सीसे पर मेरा भारत महान भी लिख रखा है चूने से। ये टैम्पो वालों की ही जिन्दगी मस्त होती है, रामसमुझ सोचता है, नये साल संक्रान्ति होली दीवाली पर टैम्पो को सजा के घूमाते है खूब जोर जोर गाना बजा के। रेलवे फाटक पर सब्जी वालो की भीड़ वैसे ही है। आज गाहक कुछ ज्यादा ही दिख रहे है फुरसत से सब्जी खरीदते हुये।आज छब्बीस जनवरी जो है, इनकी भी छुट्टी ही होगी, लेबर विभाग के छापे का डर। ये बड़े लोग भी किसी से डरते तो है, ये ख्याल आते ही रामसमुझ का मन खुश हो जाता है।फाटक के बॉये हाथ वाला बड़ा कटरा किसी मंत्री जी का है, जब यह बन रहा था तब रामसमुझ ने इसमे भी लेबरई किया था। अंदर शादी का मैदान भी है इसमे। ये मंत्री जी लोगो के ऊपर क्या नोटबंदी नही होती, बरबस ही रामसमुझ के मन मे सवाल उठता है। चलते चलते वह बाईपास आ जाता है, वाह आज बाईपास पचमुहानी के गोलंबर मे भी बड़ा सा झंडा लहरा रहा है।बगल के स्कूल की सारी बसे सड़क किनारे खड़ी है, ये रोज ऐसे ही खड़ी रहती है, पता नही क्यों इनका चालान नही होता? बाकी तो सड़क पर गाड़ी खड़ी करते ही पुलिस वाले चालान कर देते है। सुना है कोई बड़े अफसर है विशनाथ मंदिल के, उन्ही का स्कूल है यह। फिर पुलिस वाले क्यों चालान करेगें।उत्तर तरफ नया वाला पीला पुल है,इसे भी हाल मे मोदी जी ने बनवाया । रातो रात पुल कैसे सड़क के ऊपर टंग गया यह रामसमुझ के लिये अचरज की बात है। वह बहुत दिनो से इस पर चढ़ कर नीचे आती जाती गाड़ियों को देखना चाहता था। आज खलिहर है तो ये भी कर लेते है। रामसमुझ लपक कर पीले पुल पर चढ़ जाता है , हल्के कोहरे मे सूरज अभी तक नही निकले हैं। उत्तर की ओर दूर तक जाती सड़क पर आती जाती सीधी लाईन मे गाड़ियॉ, बीच मे जलते लाईट के खंभो के बीच खजूर के छोटे छोटे पेड़ अच्छे लग रहे हैं। अरे ये क्या ? सब्जी लाद कर आ रही छोटे हाथी को चौकी के सिपाही ने रोक के किनारे खड़ा करा दिया है। और किसी बात पर झेंझ कर रहा है।ऊपर से सब दिख रहा है, काश रामसमुझ के पास कैमरा वाला मोबाईल होता तो वह आज सिपाही राम की पूरी रामकहानी खेंच लेता। काफी देर तक हाथ पैर जोड़ने के बाद छोटा हाथी का ड्राईवर पहले पचास रूपये फिर सौ रूपये सिपाही को देता है तब बेचारा अपनी सब्जी लदी गाड़ी को ले के जा पाता है। उसके लिये कोई छब्बीस जनवरी नही है न ही सिपाही जी के लिये।उसके ख्यालो को  हल्की गड़गड़ाहट तोड़ती है। ऊपर एक हवाई जहाज पूरूब ओर चला जा रहा है, जब से मोदी जी बनारस से परधानमंत्री हुए है तब से बनारस मे हवाईजहाज खूब आ गये हैं। वह पुल से ऊतर कर पचकोसी पकड़ कर यूपी कालेज  गेट होते हुये भोजूबीर आता है। वहॉ टैम्पो स्टैण्ड पर ही टैम्पो वाले छब्बीस जनवरी मना रहे है,  आपस मे हंसी मजाक ठिठोली करते। रामसमुझ वही चाय पीने राजा उदेप्रताप की मूर्ति के नीचे खड़ा हो जाता है तभी एक स्कूटी पर आये साहब उसे बुलाते है "ऐ सुनो काम करोगे?" "लेकिन साहब, आज तो छब्बीस जनवरी है।"
"अरे यार कौन सा तुम्हे संविधान लिखना है, कुछ कमाना है तो बताओ, दस मिनट का काम है ,सौ रूपये दूगॉ।" रामसमुझ को लगता है छुट्टी मे कुछ मिल ही तो रहा है चलो कर लेते है। काम पूछने पर पता चलता है कि साहब के मर चुके कुत्ते की लाश को लाद कर बरना नदी मे फेंकना है। मामला दो सौ रूपये से चलते चलते डेढ़ सौ रूपये मे तय हुआ । एक बार तो रामसमुझ को लगा कि नहाने धोने के बाद मरे कुत्ते को उठाना सही नही है फिर सोचा कि छुट्टी के दिन दस मिनट के काम के लिये डेढ़ सौ रूपये कमाने मे कोई बुराई नहीं । दिन दूपहरी घर चल कर फिर से नहा लेगा। वह साहेब के साथ चल देता है। साहब के आलीशान घर मे सीढ़ी के नीचे पड़े कुत्ते की लाश को मेमसाहेब के दिये सफेद कपड़े मे लपेट बोरे मे भर लेता है। मेम साहेब लगातार रो रही है। जब रामसमुझ कुत्ते की लाश को साहेब के कार की डिग्गी मे रख कर जोर से डिग्गी का दरवाजा बंद करता है तो मेमसाहेब चीख पड़ती है"संभाल के, ब्रूनो को चोट लग जायेगी।" हक्का बक्का रामसमुझ देखता है कि ब्रूनो कौन है।साहब रामसमुझ की परेशानी समझ जाते है और फफक कर रोती मेमसाहेब को संभालते हुए अंदर ले जाते है। रामसमुझ सकुचाता सा साहेब की गाड़ी मे बैठ जाता है और बरूना पुल से बॉये कार उतार कर इंकमटैक्स के पिछवाड़े साइड मे खाली जगह देख कर डिग्गी से कुत्ते की लाश उठा कर नदी मे फेंक देता है। नदी मे पानी न होने से बोरा बस वैसे ही उतरा गया। साहेब ने हाथ जोड़ कर अपने ब्रूनो को प्रणाम किया और वापस चल दिये।कचहरी पर आ कर रामसमुझ वहीं उतर गया अपना डेढ़ सौ रूपया ले के।वह बार बार कभी खुद को कुकुरगंध मे सना महसूस करता है कभी ब्रूनो की किस्मत पर सोचने लगा कि मरने के बाद भी कार से खुद साहेब उसे ले के प्रवाहित करने गये।यही किस्मत है जो साली बार बार बड़े लेगो को ही मिलती है। उसका दिमाग भन्ना गया था और भोजूबीर तक आते आते उसके कदम देशी ठीके के तरफ घूम गये। ठीका बाहर से बंद है पर रामसमुझ को मालूम है कि छुट्टी मे भी ठीका के पीछे की खिड़की खुली रहती है। दो नमकीन भुजिया पाऊच दो सीसी नूरी ले के वह वापस कोठरी की ओर चल दिया। अभी घर पर परभवतिया नही आयी है। वह तब तक नल पर जा कर नहा धो के फारिग हो जाता है। अभी भी परभवतिया नही आई । वह कोठरी के दरवाजे पर बैठा परभवतिया के काम वाले एपाटमिंट की ओर नजर डालता है और एक पाऊच व एक नूरी खोल लेता है। परभवतिया के एपाटमिंट पर बड़ा सा झंडा लहरा है । रामसमुझ भी जोश मे खड़ा हो जाता है, उसके हाथ खुद बखुद सलामी के मुद्रा मे आ जाते है और उसे पिराईमरी स्कूल मे याद कराया गया गाना याद आ जाता है "जनगन मन अधिनायक जय हे........।
  (बनारस, २७ दिसम्बर २०१८, गुरूवार)
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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/ कर्जमाफी कर्मपरायणता और हमारा नैतिक चरित्र : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/ कर्जमाफी कर्मपरायणता और हमारा नैतिक चरित्र : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22दिसंबर 2018

सोशल मीडिया पर आज से छ:माह पूर्व पढ़ी जापान की एक घटना याद आ रही थी। यह 20 जून 2018 की घटना है । टोक्यो (जापान) में एक प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी लंच से महज 3 मिनट पहले अपनी डेस्क से उठ जाता है।
           दोपहर को 1 बजे उस कंपनी में लंच ब्रेक होता था और वो कर्मचारी 12.57 बजे अपनी डेस्क से उठ जाता है जिस पर उस कंपनी के सीनियर अधिकारियों नें शाम को छुटी के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और बाकायदा नेशनल Tv चेनल पर देश के सामने झुक कर माफी मांगी कि उसकी कंपनी के एक कर्मचारी की वजह से राष्ट्र का नुकसान हुआ है....!!
यह कदाचार हुआ है हम राष्ट्र के हुए इस नुकसान के लिए क्षमा मांगते है और राष्ट्र के नुकसान की भरपाई के लिए 3 मिनट के बदले उस कर्मचारी की एक दिन की तनख्वाह में से आधे दिन की तनख्वाह काट कर भरपाई करेंगे।
            मै यह सोच रहा था कि यह वही जापान देश और ये उसी जापान देश की देशभक्त जनता है जो दो-दो परमाणु हमले झेल कर तबाह हो चुका है। यह वही जापान जो 2011 की सुनामी से बुरी तरह प्रभावित हो चुका है और इन सब के बावजूद फिर से उठ खड़ा हुआ और अनुमानतः आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में खुद को स्थापित कर चुका है।
इस सब के बावजूद जापान दुनियां का 7 वां सबसे ताकतवर देश है!! जापान की इस ताकत के पीछे वहां की सरकार से ज्यादा जापान की राष्ट्रभक्त जनता है, वहीं दूसरी ओर हम है जो आज अपने व्यकिक्तिगत करिजे को माफ करने के लिये सरकार और पार्टसीियों का मुँह ताक रहे हैं। जापान मे तीन मिनट पहले ड्यूटी छोड़ने पर कंपनी पूरे देश से सार्वजनिक माफी मॉगते हुये उस तीन मिनट के बदले आधे दिन का पगार काट कर नुकसान का भरपाई करती है। और दूसरी ओर हमारे देश की जनता जो अपने व्यक्तिगत कर्ज़ को माफ करने के लिये सरकार बदल देती है और नई सरकार के अर्थव्यवस्था पर एक लंबा कभी न पटने वाला निरर्थक बोझ डाल देती है। यही अंतर है हमारे कर्मपरायणता जापान की कर्तव्यपरायणता में ।
     किसी देश की अर्थव्यवस्था का उसकी ताकत का आधार उसकी जनता और जनता द्वारा दिया जाने वाला टैक्स होता है। जापान में टैक्स दर 55.59 फीसदी है जबकि हमारे देश मे टैक्स की अधिकतम दर 28 % है। #आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 31 अगस्त 2018 तक 5.42 करोड़ लोगों नें टैक्स भरा है इसका मतलब यह है कि इन 5.42 करोड़ टैक्स भरने वाले लोगों के कंधों पर हमारे देश के 130 करोड़ लोगों का भार है।
                इन्ही नियमित करदाताओं के कंधों पर हमारी मुफ्तखोरी का भार है, कर्जमाफी का भार है, छात्रवृत्ति का भार है, सब्सिडी का भार है मुफ्त राशन का भार है, मुफ्त चिकित्सा का भार है, सस्ती_यात्रा का भार है, फ्री शिक्षा मुफ्त खाद बीज का भार है।
          इन सब के अलावा हमें अगर मुफ्त में बिजली मिल जाए तो सोने पर सुहागा है और नहीं मिलती है तो बिजली चोरी करने का हुनर तो हमारे पास है ही लिहाजा बढ़ रहे बिजली घाटे की भरपाई करने का भार भी 5.42 करोड़ लोगों पर ही है। आज हमें पेट्रोल_डीजल सस्ता चाहिए, अगर दाल 80 से 90 रुपये किलो हो जाए तो हम सरकार गिराने को तैयार हो जाते है।
             फिर भी हम गर्व से कहते है कि हम देशभक्त है पर ? है क्या हममें से कोई एक भी जो जापानियों जैसा देशभक्त है? है क्या कोई जिसने 3 मिनट तो छोड़ो 3 दिन अनुपस्थित रहने के बाद देश की जगह अपने सीनियर से भी माफी मांगी हो?
        आज वोटों के लिए सरकारें जोर शोर से कर्ज माफी कर रही है माना कि किसान हित में फैसला है पर जिस देश में बच्चों के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा, चिकित्सा, और शादी यहां तक कि बूढ़े होने पर पेंशन और मुफ्त तीर्थ तक की सेवाएं मुफ्त में मिलती हो। खाद बीज से लेकर कृषि उपकरणों तक पर सब्सिडी मिलती हो उस देश मे आखिर किसान क्यों मात्र 10 हजार से लेकर 2 लाख तक का कर्ज नहीं चुका सकते??
         वो देश जो चावल, गेहूं, फलों, सब्जियों के उत्पादन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है उस देश में वो कौनसे किसान है जो इतना उत्पादन करते है और उसके बाद भी कर्जदार है?
           आज हमें कोई गरीब या दलित कहे तो हमारा खून खौलता है पर सरकार के आगे हमें गरीब, शोषित, दलित, पीड़ित ही रहना है क्योंकि हमें हर चीज मुफ्त में मिलेगी। इन सब के बावजूद हमें अच्छी सड़कें, उन्नत इंफ्रास्ट्रक्चर, मॉडर्न फैसिलिटी सहित तमाम विकास भी चाहिए उसके बाद हम चीन - पाकिस्तान से भी दो-दो हाथ करने की इच्छा भी रखते है।
ये वो देश है जिसमें ऐसे भी उदाहरण है जहां सामान्य वर्ग का आदमी सड़क पर और आरक्षित वर्ग का आदमी महल में सोता है। ये वो देश है जहां गरीबी जाति देख कर आती है।
         मै किसी पार्टी, वर्ग या किसी अन्य के खिलाफ नहीं हूं पर जरा सोचिए कि जिस देश में 130 करोड़ में से सिर्फ 5.5 करोड़ लोग ही टैक्स भरते हो और ऊपर से इतनी सब सुविधाएं मुफ्त की हो वो देश कैसे विश्वगुरु बन पाएगा?
           कैसा लगता होगा उन मेहनतकश 5.5 करोड़ लोगों को जिनकी मेहनत के बल पर इस देश की अर्थव्यवस्था टिकी हुई है ??  अगर यही सब चलता रहा तो हम कभी चीन, अमेरिका, रूस, जापान की बराबरी नहीं कर पाएंगे यहां तक कि बांग्लादेश जैसे देश भी हमसे आगे निकल जाएंगे।      
           यह मात्र मुफ्तखोरी नहीं है बल्कि हम जिस शाख पर बैठे है उसी शाख को काट रहे है ।फिर बजाते रहना झुनझुना कि किसी समय हमारा देश विश्वगुरु था,सोने की चिड़िया था।
(बनारस, 22 दिसंबर 2018, शनिवार)
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बुधवार, 19 दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/सोशल मीडिया से मिली एक आध्यात्मिक कथा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १९ दिसंबर २०१८

व्योमवार्ता/सोशल मीडिया से मिली एक आध्यात्मिक कथा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १९ दिसंबर २०१८

                  एक नौजवान अपने बीमार पिता से मिलने के लिये आधी रात को अपनी बेहद पुरानी जिप्सी लेकर निकला, हाइ-वे तक जल्दी पहुंचने के लिये वो  कस्बे के शार्ट कट रास्ते से गुजरते हुए शहर से बाहर निकला और जिप्सी को एक सुनसान कच्ची सड़क पर दौड़ा दिया। वो रास्ता कम समय मे  हाई-वे से जुड़ता था..!

शहर से ३० किमी दूर जिप्सी १०० की जानलेवा स्पीड पर गंतव्य की ओर दौड़े जा रही थी तभी अचानक जिप्सी के पिछले हिस्से से फटाक् फुश्श्श~~~~ की आवाज आई और जिप्सी डगमगाने लगी।
नौजवान की पेशानी पर हताशा  पसीना बनकर बहने लगा सुनसान सड़क के दोनो ओर घुप्प अंधेरा.....!
कहीं कोई आवाज नही!
जेब मे मोबाइल टटोला मगर नदारद संभवतः लेना भूल गया था।
लाइटर जलाकर देखा तो पिछला टायर पंचर हो चुका था...!

जिप्सी की चाबी निकालकर वो बेतहाशा गंतव्य की ओर बढने लगा, कुछ दूर पैदल चलने पर सड़क के एक ओर एक जगह पर आग जल रही थी, नौजवान उस अनजान उबड़खाबड़ रास्ते से किसी तरह उस आग तक पहुँचा तो वहां छप्पर था और एक  साधु महराज धुनि जमाये बैठे थे...!
नौजवान ने एक ही सांस मे साधु से अपनी व्यथा कह डाली....!

साधु महाराज पूरी बात सुनने के बाद कुछ देर मौन रहे तत्पश्चात उन्होंने शांत मुद्रा मे पूछा-"भोजन  किया या नही..!

जी नही!

महराज ने एक लकड़ी से आग के नीचे कुरेदा और दो शकरकंद नौजवान को थमा दिए और बोले -" यहां से राजमार्ग बीस कोस दूर है, बेहद सुनसान, जा पाओगे......????
नौजवान ने असमंजसता मे साधु को देखा...!
साधु बोले -"जिस जगह तुम खड़े हो वहां से पचास कदम दाहिने से एक पगडंडी जाती है जो एक मील दूर पक्की सड़क से जुड़ती है वहां भोर मे एक सरकारी बस उस रास्ते से गुजरती है जो तुम्हे गंतव्य तक पहुंचा देगी,,अभी वक्त है तुम कुछ देर भीतर विश्राम कर लो...!

नौजवान को उचित लगा भीतर बांस की मचान थी जिस पर पुराना फटा कंबल बिछा हुआ था नौजवान उस लेट गया मगर चिंता व्यग्रता से नींद गायब..!
कोई दो या तीन घंटे बाद साधु ने आवाज लगाई -"बच्चा उठो, समय हो गया..!

नौजवान बाहर निकला तो साधु बोले कुछ समय बाद बस सडक से गुजरेगी जल्दी से वहां पहुंचो,राम भला करें" !

तब युवक ने कहा-"बाबा क्या आप मुझे सड़क तक पहुंचा दोगे?
साधु ने एक दीया जलाया और उसे साथ लेकर चले। और जब दोनो सड़क पर पहुँचे तो साधु
ने कहा-" अब मैं जाता हूँ.. ये कहकर उन्होंने उनके हाथ के दीये को भी फूंककर बुझा दिया...!

घुप्प अंधेरा.....!!
नौजवान हैरान होकर बोला यह क्या किये महाराज? अभी तो बस भी नही आई  आपने मेरा साथ भी छोड़ दिया और दीया भी बुझा दिया।

साधु महराज बोले-"कोई किसी का साथ नहीं कर सकता है और अच्छा है कि तुम इसके आदी हो जाओ, इसके पहले मैं विदा हो जाऊं तुम खुद विदा हो जाओ।
नौजवान ने कहा -"मगर दीया क्यो बुझा दिया आपने..?

साधु-"दूसरों के जलाये हुए दीये का कोई मूल्य नहीं है। अपना ही दीया हो तो अंधेरे में काम देता है, किसी दूसरे के दीये काम नहीं देते। खुद के भीतर से प्रकाश निकले तो ही रास्ता प्रकाशित होता है और किसी तरह रास्ता प्रकाशित नहीं होता।

अंधेरे मे युवक साधु को देख नही पा रहा था मगर  उनकी दार्शनिकता सुन हतप्रभ रह गया.....!

साधु पुन: बोले-- "लोग सोचते होंगे कि उनके हाथ में कोई दीया दे दे, जिससे उनका रास्ता प्रकाशित हो जायेगा तो वो गलती में हैं। तुम्हारे हाथ में दीया होगा तो कोई भी उसे बड़ी निर्ममता से फूंककर बुझा सकता है। मेरी मंशा और मेरा इरादा यही है कि तुम्हारे हाथ में, अगर कोई दूसरे का दिया हुआ प्रकाश हो तो मैं उसे फूंक दूं, उसे बुझा दूं। तुम अंधरे में अकेले छूट जाओ, कोई तुम्हारे संगी-साथी हो तो उसे छीन लूं। और तभी, जब तुम्हारे पास दूसरों का जलाया हुआ प्रकाश न रह जाये और दूसरों का साथ न रह जाये, तब तुम जिस रास्ते चलोगे , उस रास्ते पर परमात्मा तुम्हारे साथ हो जाता है और तुम्हारी आत्मा के दीये के जलने की सम्भावना अधिक हो जाती है।

सारी ज़मीन पर ऐसा हुआ है, सत्य की तो बहुत खोज है, परमात्मा की बहुत चर्चा है। लेकिन-लेकिन ये सारे कमजोर लोग कर रहे हैं, न दीया बुझाने को राजी हैं। अंधेरे में जो अकेले चलने का साहस करता है, बिना प्रकाश के, उसके भीतर साहस का प्रकाश पैदा होना शुरू हो जाता है और जो सहारा खोजता हैं, वह निरन्तर कमजोर होता चला जाता है। भगवान को तुम सहारा न समझो। और जो लोग भगवान को सहारा समझते होंगे वे गलती में हैं, उन्हें भगवान का सहारा उपलब्ध नहीं हो सकेगा।

कमजोरों के लिए जगत्‌ में कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। और जो शक्तिहीन हैं और जिनमें साहस की कमी है, धर्म उनका रास्ता नहीं है। दिखता उल्टा है। दिखता यह है कि जितने कमजोर हैं, उतने साहसहीन हैं, वे सभी धार्मिक होते हुए दिखाई पड़ते हैं। कमजोरों को, साहसहीनों को, जिनकी मृत्यु करीब आ रही हो, उनको घबराहट में, भय में धर्म ही मार्ग मालूम होता है। इसलिए धर्म के आस-पास कमजोर और साहसहीन लोग इकट्ठे हो जाते हैं, जबकि बात उल्टी हैं धर्म तो उनके लिए हें, जिनके भीतर साहस हो, जिनके भीतर शक्ति हो, जिनके भीतर अदम्य हिम्मत हो और जो खुद अंधेरे में अकेले, बिना प्रकाश के चलने का दुस्साहस करते हों।

यह मैं प्राथमिक रूप से तुमसे कहूं-दुनिया में यही वजह है कि जबसे कमजोरों ने धर्म को चुना है तबसे धर्म कमजोर हो गया है और अब तो सारी दुनिया में कमजारे लोग ही धार्मिक हैं। जिनमे थोड़ी-सी भी हिम्मत हैं, वे धार्मिक नहीं हैं। जिनमें थोड़ा-सा साहस है, वे नास्तिक हैं और जिनमें साहस की कमी है, वे सब आस्तिक हैं। भगवान की तरफ सारे कमजोर लोग इकट्ठे हो गये, इसलिए दुनिया में से धर्म नष्ट होता चला जाता हैं इन कमजोरों को भगवान तो बचा ही नहीं सकता, ये कमजोर भगवान को कैसे बचायेंगे? कमजोरों की कोई सुरक्षा नहीं है और कमजोर लोग किसी की रक्षा कैसे करेंगे?

तभी सड़क पर सामने से तेज रोशनी आती हुई दिखी.....।
संभवतः बस ही थी। सड़क पर हल्की रोशनी बिखर रही थी।
युवक ने अपने दोनो हाथ हिलाकर रोकने का इशारा किया....
तत्क्षण पलट कर देखा कोई नजर नही आया साधु महराज जा चुके थे...!
(बनारस,19 दिसंबर 2018, बुधवार)
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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

व्योमवार्ता/एक खत मोदी जी के नाम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १३ दिसंबर २०१८, गुरूवार

व्योमवार्ता/एक खत मोदी जी के नाम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, १३ दिसंबर २०१८, गुरूवार

श्री नरेन्द्र मोदी जी,
प्रधान सेवक, भारत गणतंत्र, नई दिल्ली

प्रिय मोदी जी,

                       अब जब पॉचो विधानवसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं, भाजपा तीनो हिन्दी प्रदेशों मे से सत्ताच्युत हो चुकी है तो एक बार इस हार के कारणों पर  विचार करना जरूरी हो गया है। भाजपा का समर्थक होने के वजह से मै दुखी हूँ और चिंतित भी । मेरी चिन्ता कांग्रेस के बढ़ते जनाधार को लेकर नही है न ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान मे चुनाव को  हारने को लेकर है । मेरी चिंता भाजपा के उस मूल वोटर के रूझान को ले कर है जो निराश हो नोटा के पक्ष मे खड़े होने को तैयार है। यह वोटर खुद को छला हुआ महसूस कर रहा है पर वह विकल्प के रूप मे कांग्रेस के पास या अन्य किसी के पास नही जाना चाहता बल्कि उसका विश्ववास निर्दलियों के प्रति बढ़ा है। वह आप को भी अपना न होता हुआ देख राजनीति के किनारे नोटा तट पर खड़ा है । अगर आपको ये लगतावहै कि भाजपालके पक्ष मे पड़े वोट आपकी विदेश नीति और विकास के चलते मिले है तो क्षमा किजियेगा मुझे यह कहने मे कोई संकोच नही कि मेरी दृष्टि मे आप गलत है क्योंकि कहीं भी विकास के नाम पर वोट नही पड़ा प्रधान सेवक जी..
वोट पड़े जातिवाद,निजी स्वार्थ, लालच और अवसरवाद पर, जिन समुदाय के लिए आप तीन तलाक अध्यादेश लाये,
जिस वर्ग को खुश करने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ ST/S C कानून अध्यदेश लाये
जिस गरीब आदिवासी वर्ग को हर सरकारी योजना का लाभ सबसे पहले दिया 200 रु में बिजली बांटी, अरे नुकसान भी हमारे बिल में जोड़ा ।
शौचालय बनवाए और स्वच्छता कर हम मध्यम वर्गीय और छोटे दुकान दारों से वसूला। वो सब कुछ हराम में लेकर हिन्दू देवताओं की तस्वीरों पर थूकते हुए वीडियो भेजते रहे। इन सभी ने भाजपा को वोट दिया क्या ??
इन्होंने वोट नही दिया मोदीजी... भाजपा को वोट दिया उन लोगो ने जिसके लिए आपकी भाजपा की सरकारे कुछ नही करती हैं और तो और राशन की दुकान पर भी उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर होनें की वजह से लाभ नहीं मिलेगा ऐसा बताया।
वो समर्पित वोटर जिन्हें आपने गुंडे तक कह डाला लेकिन फिर भी उसने वोट दिया
वो व्यापारी वर्ग जिसकी कमर आपने नोटबन्दी, GST लेकर तोड़ दी  फिर भी आपको वोट दिया....
क्यों कि इनके लिए राष्ट्र प्रथम हैं भारत देश और सनातन धर्म की रक्षा की चिंता में सिर्फ भाजपा से आशा लगाए बैठे है मध्यम वर्ग के सामान्य जन की आपने उपेक्षा ही कि , हमेशा उसका वोट लेकर भूल गए , इस समर्पित जनता का अपमान मत कीजिये मोदीजी !
विकास विकास विकास होता रहेगा विकास आगे भी,लेकिन अपने समर्थकों की भावनाओ का भी सम्मान कीजिये राम मंदिर धारा 370, आरक्षण आर्थिक आधार पर एवं जनसंख्या नियंत्रण कानून , समान नागरिक संहिता के मुद्दों पर काम कीजिये और सदियों तक अपने समर्थकों के दिल मे बसिए..
ये आम नागरिक की व्यथा है, अभी भी कुछ नही बिगड़ा है। बाकी आप समझदार है।
थोड़े लिखे को ज्यादा समझियेगा। बाकी कहा सुना माफ करियेगा।
आपका,
व्योमेश चित्रवंश,
बनारस
13.122018, गुरूवार
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