व्योमवार्ता / आज के समाज मे काल्पनिक कथा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,17 मई 2018,गुरूवार
विकास की कल्पना मे ही आज सहज भाव से संस्कार की एक कहानी गढ़ती चली गयी. आज के दौर मे यह कल्पना ही है पर काश यह कल्पना सच होती.
एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।
बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।
छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने लव मैरीज की थी।
बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।
आखीर दो भाई डाक्टर इंजीनियर जो थे।
अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।
बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।
वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी किये बिना बाप गुजर गये ।
माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।
शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।
दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।
चंदू - आज नहीं फिर कभी
दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया?
चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज
कल और होगा।घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है।मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । उसकी पत्नी भी अपने किस्मत को स्वीकार कर बिना किसी शिकायत के अपने पति व सासु मॉ की सेवा करती.
इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।
मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।
चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।
बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें
मां- अरे चंदू आज रूक जा।
बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।
और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है
तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।
अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?
दोनों भाई हंसकर बोलते हैं
अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।
चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।
ठीक है आप दोनों ऐसा करो।
मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।
दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं ।
और तू?
चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है
मेरे हिस्से में माँ है न......
फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा?
चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।
बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।
बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।
चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।
बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।
माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।
दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं
आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।
(बनारस, 17मई 2018, गुरूवार)
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अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
रविवार, 20 मई 2018
व्योमवार्ता / आज के समाज मे काल्पनिक कथा : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,17 मई 2018,गुरूवार
व्योमवार्ता : बाबूजी की आत्मा को शांति, व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17मई 2018
बाबूजी की आत्मा को शांति (आज के सच की त्रासद कहानी ) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,17 मई 2018,गुरूवार
आज हम मानव विकास के उच्चतम स्तर तक पहुँच गये है जो सदैव कल्पनातीत रहा. हर हाथ मे दूर देश मे बैठे अपनो से क्षण भर मे विडियो कालिंग, पूरी दुनिया का ग्यान नेट पर उंगलियों मे, चॉद को लॉघ कर मंगल तक पहुँच चुके हमारे खोजी यान और शब्दभेदी अस्त्र वाले हमारे गाईडेड सटीक मिसाईल. पर इन सारी विकास की हदों मे हम ने अपने संस्कारो को जितना अधोगति होते देखा वह भी अकल्पनीय है, पैसे के लिये मॉ बाप की हत्या, भौतिक विकास के अंधी दौड़ मे तेजी से पीछे छुटते रिश्ते, न्यूक्लियस फैमिली के स्व वाले अवधारणा मे बोझ बनते मॉ बाप, वानप्रस्थ व संन्यास आश्रम के प्रति नमित देश मे तेजी से आवश्यकता बनते जा रहे बृद्धाश्रम. कभी कभी यह प्रश्न मन को विचलित कर देता है कि हम विकास के सोपान पर बढ़ते हुये अपना संस्कारिक विनाश का रास्ता तो नही तय कर रहे हैं. यह कटु सत्य है कि आज की युवा पीढ़ी अपने मॉ बाप से पुश्तैनी धन संपदा, जेवर, नगद अपना अधिकार समझ कर लेना तो चाहती है पर कर्तव्य और सेवा के नाम पर वह अपनी व्यस्तता, घर मे शांति और जरूरत के नाम पर मुँह मोड़ रही है. यह एक कटु सत्य है, कल एक मित्र अपने एक परिचिता के साथ हुई घटना का जिक्र कर भावुक हो गये, उनके भर्राये गले से निकलती व्यथा हमे भी काफी देर तक सालती रही, पर यह आज का सच है, काश विकास के इस दौर मे हम अपने मन की भावनाओं को भी बस थोड़ा सा विस्तार दे पाते. मित्र के जाने के बाद भी बहुत देर तक मन अस्थिर बना रहा. फिर लगा शायद औरों से सॉझा कर मन को थोड़ा सा सूकून मिल जाये. मित्र के परिचिता होने के वजह से इस असली कहानी मे पात्रों के नाम को वास्तविक रूप मे लिखने का साहस नही जुटा पा रहा हूँ, पर यह कहानी हम सब के घरों की हमारे आस पास की हमारे मित्रों रिश्तेदारों परिचितो की हो सकती है. घटना या कहानी की सहमति असहमति से आपकी भावनाये यदि कहीं से आहत होती हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ.
मनीषा काम निपटा कर बैठी ही थी की फोन की घंटी बजने लगी। पापा के शहर से बिन्दू चाची का फोन था ,”बिटिया अपने बाबू जी को आकर ले जाओ यहां से। बीमार रहने लगे है , बहुत कमजोर हो गए हैं। हम भी कोई जवान तो हो नहीं रहें है,अब उनका करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। वैसे भी आखिरी समय अपने बच्चों के साथ बिताना चाहिए।”
मनीषा बोली,”ठीक है चाची जी इस रविवार को आतें हैं, बाबू जी को हम दिल्ली ले आएंगे।” फिर इधर उधर की बातें करके फोन काट दिया।
बाबूजी तीन भाई है , पुश्तैनी मकान है तीनों वहीं रहते हैं। मनीषा और उसका छोटा भाई मनीष दिल्ली में रहते हैं अपने अपने परिवार के साथ। तीन चार साल पहले मनीष को फ्लैट खरीदने की लिए पैसे की आवश्यकता पड़ी तो बाबूजी ने पुस्तैनी भाईयों से मकान के अपने एक तिहाई हिस्से का पैसा लेकर मनीष को दे दिया था, कुछ खाने पहनने के लिए अपने लायक रखकर। दिल्ली आना नहीं चाहते थे इसलिए भाईयों से कह कर अपने लिये एक छोटा सा कमरा मॉग लिया था जब तक जीवित थे तब तक के लिए। मनीषा को लगता था कि अम्मा के जाने के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गए होंगे बाबूजी लेकिन वहां पुराने परिचितों के बीच उनका मन लगता था। दोनों चाचियां भी ध्यान रखती थी। दिल्ली में दोनों भाई बहन की गृहस्थी भी मज़े से चल रही थी।
रविवार को मनीषा व मनीष का ही कार्यक्रम बन पाया बाबूजी के शहर जाने का। मनीषा के पति अानंद एक व्यस्त डाक्टर माने हुये सर्जन है, महीने की लाखों की कमाई है उनका इस तरह से छुट्टी लेकर निकलना बहुत मुश्किल है, मरीजों की बीमारी न रविवार देखती है न सोमवार कब आपरेशन के लिये सर्जरी करना पड़े। सबसे बड़ी बात यह कि सर्जरी की तात्कालिक जरूरत मुंहमागॉ फीस वाली रकम दिलाता है. उधर मनीष सीपीडब्लूडी मे इंजीनियर है, उस की पत्नी रूबी की अपनी जिंदगी है उच्च वर्गीय परिवारों में, शहर के माने हुये क्लबों में उठना बैठना है उसका , इस तरह के छोटे मोटे पारिवारिक पचड़ों में पड़ना उसे पसंद नहीं।
रास्ते भर मनीषा को लगा मनीष कुछ अनमना , गुमसुम सा बैठा है। वह बोली,”इतना परेशान मत हो, ऐसी कोई चिंता की बात नहीं है, उम्र हो रही है, थोड़े कमजोर हो गए हैं ठीक हो जाएंगे।”
मनीष झींकते हुए बोला,”अच्छा खासा चल रहा था,पता नहीं चाचाजी को एेसी क्या मुसीबत आ गई दो चार साल और रख लेते तो। सब स्वार्थी है, उस समय बाबूजी को बहला फुसला कर तब कितने कम पैसों में अपने नाम करवा लिया तीसरा हिस्सा, अब देखो वही हिस्सा करोड़ो का हो गया।”
मनीषा शान्त करने की मन्शा से बोली,”ठीक है न उस समय जितने भाव थे बाजार में उस हिसाब से दे दिए। और बाबूजी आखरी समय अपने बच्चों के बीच बिताएंगे तो उन्हें अच्छा लगेगा।”
मनीष उत्तेजित हो गया , बोला,”दीदी तेरे लिए यह सब कहना बहुत आसान है। तीन कमरों के फ्लैट में कहां रखूंगा उन्हें। रूबी से किचकिच लगी रहेगी सो अलग, उसने तो साफ़ मना कर दिया है वह बाबूजी का कोई काम नहीं करेंगी | वैसे तो दीदी लड़कियां हक़ मांग ने तो बडी जल्दी खड़ी हो जाती हैं , करने के नाम पर क्यों पीछे हट जाती है। आज कल लड़कियों की शिक्षा और शादी के समय में अच्छा खासा खर्च हो जाता है।तू क्यों नहीं ले जाती बाबूजी को अपने घर, इतनी बड़ी कोठी है ,जीजाजी की लाखों की कमाई है?”
मनीषा को मनीष का इस तरह बोलना ठीक नहीं लगा। पैसे लेते हुए कैसे वादा कर रहा था बाबूजी से,”आपको किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो आप निसंकोच फोन कर देना मैं तुरंत लेकर आ जाऊंगा। बस इस समय हाथ थोड़ा तंग है।” नाममात्र पैसे छोडे थे बाबूजी के पास, और फिर कभी फटका भी नहीं उनकी सुध लेने।
मनीषा :”तू चिंता मत कर मैं ले जाऊंगी बाबूजी को अपने घर।” सही है उसे क्या परेशानी, इतना बड़ा घर फिर पति रात दिन मरीजों की सेवा करते है, एक पिता तुल्य ससुर को आश्रय तो दे ही सकते हैं।
बाबूजी को देख कर उसकी आंखें भर आईं। इतने दुबले और बेबस दिख रहे थे,गले लगते हुए बोली,”पहले फोन करवा देते पहले लेने आ जाती।” बाबूजी बोलें,” तुम्हारी अपनी जिंदगी है क्या परेशान करता। वैसे भी दिल्ली में बिल्कुल तुम लोगों पर आश्रित हो जाऊंगा।”
रात को डाक्टर साहब बहुत देर से आएं,तब तक पिता और बच्चे सो चुके थे। खाना खाने के बाद सुकून से बैठते हुएं मनीषा ने डाक्टर साहब से कहा,” बाबूजी को मैं यहां ले आईं हूं। मनीष का घर बहुत छोटा है, उसे उन्हें रखने में थोड़ी परेशानी होती।” आनंद के एक दम तेवर बदल गए,वह सख्त लहजे में बोला,” यहां ले आईं हूं से क्या मतलब है तुम्हारा? तुम्हारे पिताजी तुम्हारे भाई की जिम्मेदारी है। मैंने बड़ा घर वृद्धाश्रम खोलने के लिए नहीं लिया था , अपने रहने के लिए लिया है। जायदाद के पैसे हड़पते हुए नहीं सोचा था साले साहब ने कि पिता की करनी भी पड़ेगी। रात दिन मेहनत करके पैसा कमाता हूं फालतू लुटाने के लिए नहीं है मेरे पास।”
पति के इस रूप से अनभिज्ञ थी मनीषा। “रात दिन मरीजों की सेवा करते हो मेरे पिता के लिए क्या आपके घर और दिल में इतना सा स्थान भी नहीं है।”
अानंद के चेहरे की नसें तनीं हुईं थीं,वह लगभग चीखते हुए बोला,” मरीज़ बीमार पड़ता है पैसे देता है ठीक होने के लिए, मैं इलाज करता हूं पैसे लेता हूं। यह व्यापारिक समझोता है इसमें सेवा जैसा कुछ नहीं है।यह मेरा काम है मेरी रोजी-रोटी है। बेहतर होगा तुम एक दो दिन में अपने पिता को मनीष के घर छोड़ आओ।”
मनीषा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिस पति की वह इतनी इज्जत करती है वें ऐसा बोल सकते हैं। क्यों उसने अपने भाई और पति पर इतना विश्वास किया? क्यों उसने शुरू से ही एक एक पैसा का हिसाब नहीं रखा? वो खुद अच्छी खासी नौकरी करती थी , पहले पुत्र के जन्म पर अानंद ने यह कह कर छुड़वा दी कि मैं इतना कमाता हूं तुम्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है। तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं रहेगी आराम से घर रहकर बच्चों की देखभाल करो।
आज अगर नौकरी कर रही होती तो अलग से कुछ पैसे होते उसके पास या दस साल से घर में सारा दिन काम करने के बदले में पैसे की मांग करती तो इतने तो हो ही जाते की पिता जी की देखभाल अपने दम पर कर पाती। कहने को तो हर महीने बैंक में उसके नाम के खाते में पैसे जमा होते हैं लेकिन उन्हें खर्च करने की बिना पूछे उसे इजाज़त नहीं थी।भाई से भी मन कर रहा था कह दे शादी में जो खर्च हुआ था वह निकाल कर जो बचता है उसका आधा आधा कर दे।कम से कम पिता इज्जत से तो जी पाएंगे। पति और भाई दोनों को पंक्ति में खड़ा कर के बहुत से सवाल करने का मन कर रहा था, जानती थी जवाब कुछ न कुछ तो अवश्य होंगे। लेकिन इन सवाल जवाब में रिश्तों की परतें दर परतें उखड़ जाएंगी और जो नग्नता सामने आएगी उसके बाद रिश्ते ढोने मुश्किल हो जाएंगे। सामने तस्वीर में से झांकती दो जोड़ी आंखें जिव्हा पर ताला डाल रहीं थीं।
अगले दिन आनंद के हस्पताल जाने के बाद जब नाश्ता लेकर मनीषा बाबूजी के पास पहुंची तो वे समान बांधे बैठें थे।उदासी भरे स्वर में बोले,” मेरे कारण अपनी गृहस्थी मत ख़राब कर।पता नहीं कितने दिन है मेरे पास कितने नहीं। मैंने इस वृद्धाश्रम में बात कर ली है जितने पैसे मेरे पास है, उसमें मुझे वे लोग रखने को तैयार है। ये ले पता तू मुझे वहां छोड़ आ , और निश्चित होकर अपनी गृहस्थी सम्भाल।”
मनीषा समझ गई कि बाबूजी ने कल रात उसका व आनंद का झगड़ा सुन लिया है. जाहिर था कि बाबूजी की देह कमजोर हो गई है दिमाग नहीं।दामाद उनके आने के बाद से लेकर आज काम पर जाने से पहले मिलने भी नहीं आया साफ़ बात है ससुर का आना उसे अच्छा नहीं लगा। क्या सफाई देती चुप चाप टैक्सी बुलाकर उनके दिए पते पर उन्हें छोड़ने चल दी। नजरें नहीं मिला पा रही थी,न कुछ बोलते बन रहा था। बाबूजी ने ही उसका हाथ दबाते हुए कहा,” परेशान मत हो बिटिया, परिस्थितियों पर कब हमारा बस चलता है। मैं यहां अपने हम उम्र लोगों के बीच खुश रहूंगा।”
तीन दिन हो गए थे बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़कर आए हुए। मनीषा का न किसी से बोलने का मन कर रहा था न कुछ खाने का। फोन करके पूछने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी वे कैसे हैं? इतनी ग्लानि हो रही थी कि किस मुंह से पूछे। तीसरे दिन वृद्धाश्रम से ही फोन आ गया कि बाबूजी अब इस दुनिया में नहीं रहे।दस बजे थे बच्चे पिकनिक पर गए थे आठ नौ बजे तक आएंगे, अानंद तो आतें ही दस बजे रात तक है। किसी की भी दिनचर्या पर कोई असर नहीं पड़ेगा, किसी को सूचना भी क्या देना। मनीष आफिस चला गया होगा बेकार छुट्टी लेनी पड़ेगी।
रास्ते भर अविरल अश्रु धारा बहती रही कहना मुश्किल था पिता के जाने के ग़म में या अपनी बेबसी पर आखिरी समय पर पिता के लिए कुछ नहीं कर पायी। तीन दिन केवल तीन दिन आनंद ने उसके पिता को मान और आश्रय दे दिया होता तो वह हृदय से अपने पति आनंद को परमेश्वर का मान लेती।
वृद्धाश्रम के संचालक महोदय के साथ मिलकर उसने औपचारिकताएं पूर्ण की। वह बोल रहे थे,” इनके बहू , बेटा और दमाद भी है रिकॉर्ड के हिसाब से।उनको भी सूचना दे देते तो अच्छा रहता।वह कुछ सम्भल चुकी थी बोली, नहीं इनका कोई नहीं है न बहू न बेटा और न दामाद।बस एक बेटी है वह भी नाम के लिए ।”
सन्चालक महोदय अपनी ही धुन में बोल रहे थे,” परिवार वालों को सांत्वना और बाबूजी की आत्मा को शांति मिलगीे।”
मनीषा सोच रही थी ‘ बाबूजी की आत्मा को शांति मिल ही गई होगी। जाने से पहले सबसे मोह भंग हो गया था। समझ गये होंगे कोई किसी का नहीं होता, फिर क्यों आत्मा अशान्त होगी।’
” हां, परमात्मा उसको इतनी शक्ति दें कि किसी तरह वह बहन और पत्नी का रिश्ता निभा सकें | “
(बनारस, 17मई 2018,गुरूवार)
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शुक्रवार, 18 मई 2018
व्योमवार्ता / पारिवारिक बाल मजदूर, छुट्टियों मे परेशान घर के बच्चे : खाली बैठे रहने की निठल्ली सोच
पारिवारिक बाल मजदूर, छुट्टियों मे परेशान घर के बच्चे : खाली बैठे रहने की निठल्ली सोच
व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15 मई 2018, मंगलवार
आजकल मेरे पुत्र कृस्ना जी गर्मियों की छुट्टियों मे शाम को संपूर्णानंद सिगरा स्टेडियम मे समर स्विमिंग कैम्प मे तैराकी सीख रहे है तो सुबह के समय एक्टिविटीज समर कैम्प मे एक्टिंग व गिटार बजाना,बाकी समय उछलकूद, धमाचौकड़ी व हंगामा के साथ अपनी दीदी से लड़ाई. ऐसे मे अकसर उनकी मॉ कुछ घरेलू काम उन्हे दे देती है जिसमे वे व्यस्त रहें पर यह घरेलू व्यस्तता भी उन्हे कम ही बॉध पाती है. यही हाल लगभग सभी घरों मे बच्चो का है, पर इनके बारे मे कोई नही सोचता.
कल स्टेडियम मे बैठा मै भी खलिहर दिमाग से निठल्लेपन के साथ यही सोच रहा था तो समस्या की विकरालता समझ मे आयी, सोचा आप से भी यह विचार साझा करूँ क्योंकि कहीं न कहीं आप भी इसमे शामिल है.
गर्मियों का समय आ गया है. ये वो समय है जब क्रैश कोर्स कराने वाले सेंटर, कोल्ड ड्रिंक की कैन्स, मच्छर, काले चश्मे और विदेशी क्रिकेटर देश में अचानक से बढ़ जाते हैं.
जंगल से ज्यादा लकड़ियां आइसक्रीम के ठेलों पर डंडी और चम्मच के रूप में मिलने लगती हैं.
अपना भविष्य बर्बाद कर चुके लोग परिचितों के घर बैठते हैं और राय दे-देकर टीनएजर्स के भविष्य के साथ खेलते हैं. शहरों में भी गमछे बढ़ जाते हैं और नेताओं के पीछे घूमने वाले चमचे घट जाते हैं. खलिहर से खलिहर आदमी व्यस्त हो जाता है क्योंकि हर शाम उसे तीन जगह शादियों में जाना होता है.
ये वो समय होता है, जब सबसे ज्यादा मौज मिस्त्रियों और इस्त्रियों से काम लेने वालों की होती है. क्योंकि गर्मी में ढेर सा बिजली का सामान फुंकता है और इस्त्री करने वालों के पास बारातों में पहनने के लिए रोज़ धुले कपड़ों का ढेर पहुंचता है.
लेकिन एक कौम अब भी है जो गर्मी से परेशान होती है, ये पसीने में तर पांच रुपये के लिए झिकझिक करने वाले रिक्शावाले नहीं होते. न वो सब्जी वाले होते हैं, जिनके पास 'सब्जी एक दिन में सूख जाती है' वाली शिकायत आती है. न ये वो एम्प्लोई होते हैं, जो ऑफिस के अंदर शिमला की ठंड झेलते हैं और ऑफिस से निकलते ही अलवर की गर्मी का सामना करते हैं. ये हर घर में पाए जाने वाले लड़के होते हैं. मन ही मन मान लिया जाता है कि अगर ये लड़के हैं तो बलिष्ठ भी होंगे और अगर बलिष्ठ हैं तो कूलर में पानी भर ही सकते हैं. इसलिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि इनसे बाल्टियों में भरवा-भरवाकर कूलर में पानी डलवाया जाए.
कई जगह ऐसी प्रथा भी है कि अगर कूलर तक पाइप पहुंच सकती है तो कूलर को जान-बूझकर ऐसी जगह पर रख दिया जाता है, जहां बाल्टी लेकर ही पहुंचा जा सके. कहा जाता है कि एक बार एक लड़के ने जुगाड़ से कूलर तक पाइप पहुंचा दी थी. इस अनहोनी घटना के बाद उसके घरवालों ने कूलर को बाहरी खिड़की पर ऐसी जगह पर फिट करा दिया, जहां पहुंचने मात्र के लिए घर का आधा चक्कर लगाना पड़ता था.
इस बात का विशेष ध्यान दिया जाता है कि कूलर के आसपास ढेर से मच्छर हों, आठ साल की उम्र से कूलर में पानी भर रहे कूलेंद्र बताते हैं कि उनके घर वाले तो कूलर के पानी में ही मच्छर पाल लेते हैं ताकि कूलर खोलते ही वो उन्हें काट सकें.
मच्छरों के काटने पर लड़कों के हाथ से अक्सर पानी छलक जाया करता है. ऐसे मौकों पर "एक काम ढंग से नहीं कर सकता नालायक" कहने के लिए विशेष तौर पर बड़ी बहन या मां वहीं कहीं खड़ी रहती हैं. प्रताड़ना का दौर यहीं ख़त्म नहीं होता, इस प्लास्टिक युग में लड़कों से जान-बूझकर स्टील या लोहे की बाल्टी में पानी भरवाया जाता है. जिन बाल्टियों का वजन, उनमें आने वाले कुल पानी के वजन से भी दुगुना होता है.
नाम न बताने की शर्त पर एक युवक ने हमें ये बताया कि कई बार घर वाले और क्रूर हो जाते हैं. बजाय कूलर में सीधे पानी उड़ेलवाने के वो मग्गे से एक-एक मग्गा पानी जाली पर बने सुराख से डालने को कहते हैं. बदले में घरवालों की ये दलील होती है कि बार-बार साइड से खोलने से कूलर में लगी जाली झड़ने लगती है. ऐसी परिस्थिति में उन्हें कूलर के पास देर तक झुककर खड़े रहना पड़ता है और कमरदर्द के अलावा देर तक मच्छर उन्हें काट पाते हैं.
कुछ लड़कों का अनुभव और भी बुरा है, वो बताते हैं कि मुश्किल तब होती है जब एक तरफ आप कूलर भर रहे हों और दूसरी तरफ बाथरूम में भरने को दूसरी बाल्टी लगा आए हों. समय के साथ न चल पाने पर अगर एक चुल्लू पानी भी बाल्टी से बह जाए तो वैश्विक जल संकट पर आधे घंटे का भाषण सुनने को अलग मिल जाता है.
हमारी आत्मा तो ये जानकर कांप गई कि इतना सब करने के बाद भी अगर कभी कूलर जल गया तो लड़कों को ये सुनने को मिलता है कि तुमने ही मोटर पर पानी उड़ेल दिया होगा.
अब तक इस बड़े मुद्दे पर दुनिया के किसी नेता का ध्यान नहीं गया, न मीडिया या मानवाधिकार संगठनों ने ही इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाई. युवावर्ग खुद इसके खिलाफ आगे नहीं आ पा रहा है क्योंकि जैसे ही वो कूलर में पानी भर कर ठंडी हवा में सांस लेना चाहता है. उसे फ्रिज की बोतलें भरने में लगा दिया जाता है.
आप भी सोचिये, कहीं आप इस शोषक वर्ग मे शामिल तो नही हैं , यदि नही तो क्या आप पारिवारिक व्यवस्था को धता बताते हुये इस पारिवारिक बाल मजदूरी के खिलाफ आवाज उठाने का माद्दा रखते है. 🙄😟😾🙆🙏🙋🤕🤑💜❤👣👇🆑🐔🐀🙃😅🐵😆😀😄😊😁😂
बनारस,15 मई 2018, मंगलवार
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