शनिवार, 12 अगस्त 2017

व्योमवार्ता / भारत वंदना : व्योमेश चित्रवंश की पुरानी डायरी के पन्ने

भारत वंदना : व्योमेश चित्रवंश की पुरानी डायरी के पन्ने , 12 अगस्त 2017,शनिवार

हे भारत तुझे प्रणाम, माँ भारत तुझे प्रणाम
तेरे चरणों का वंदन करते हम तेरे संतान ।
वो तुम ही हो भारत भूमि,जहाँ संस्कृति का निर्माण हुआ
गीता का उपदेश हुआ, भारत का संग्राम हुआ
रामायण युग धर्म हुआ ,सभ्यता का संचार हुआ
जब जब तुझ पे संकटआया , अवतार लिए भगवान।
तुम ही वो जननी हो माँ जो वीरो को जनती है
तेरी संताने तुझ पे माँ सर्वस्व निछावर करती है
राणा, शिवा, आजाद, भगत जैसे कितने वीर हुए
गाँधी, नेहरू, शास्त्री, सुभाष ने किया स्वयं बलिदान।
तेरी शांत प्रकृति के बेटे ,माँ हम शान्ति दूत कहलाते है
पर उठे कोई ऊँगली तुझ पर ,हम कालदूत बन जाते है
रंगभेद मिटला कर हम , विश्वबंधु कहलाये है
तेरी धरती पे जन्म लिए ,हमको है अभिमान।
कश्मीर से कन्याकुमारी, तुम एक अखंड मूर्ति हो माँ
भारत के हर जन जन के मन में बसी छवि हो माँ
तुझ पे गर कोई हाथ उठा, वो हाथ वहीं कट जाएगा
तेरी खातिर दे देंगे हम कोटि कोटि जन प्राण.
(गणतंत्र दिवस विशेषांक, दैनिक आज , २६ जनवरी १९८८, वाराणसी के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित मेरी पहली कविता)
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मंगलवार, 8 अगस्त 2017

व्योमवार्ता / संवेदनहीन समाज के लिये शर्मिंदा हूँ मै : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08अगस्त 2017, मंगलवार

संवेदनहीन समाज के लिये शर्मिंदा हूँ मै : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08अगस्त 2017, मंगलवार

               आज सुबह अखबार  मे एक खबर पढ़ी,  तब से खींझ आ रही है कभी खुद पर, कभी समाज पर,  कभी आज के इस भौतिकवादी वातावरण पर. दु:ख इस बात का है कि मै इस पूरे प्रकरण पर दुखी हो कर खीझने के अलावा कुछ कर भी नही सकता हूँ सिवाय इसके कि मै भी अखबार  पढ़ना छोड़  दूँ,  मेरे पड़ोसी इंजीनियर चाचाजी प्राय: मुझसे कहते है " वकील साहब,  सुबह सुबह अखबार  पढ़ने के बजाय मेरे साथ ब्रह्मकुमारी आश्रम  चल कर पुरूषार्थ  किया किजीये,  अखबार  पढ़ने से नकारात्मकता आती है", पर मै सोचता हूँ कि यह तो तूफान आने पर शुतुरमुर्ग  की तरह रेत मे सिर गाड़ कर तूफान के अस्तित्व  को भूलाने की बातें होगी,  क्योंकि हम इस समाज का हिस्सा है और समाज के अच्छे बुरे के लिये हमारी भी जिम्मेदारियॉ है, पर  एलपीजी लिबराईजेशन, प्राईवेटाईजेशन, ग्लोबनाईजेशन (उदारीकरण, निजीकरण व वैश्विकरण) के सरकारी नीति के चलते जल्दी से जल्दी पैसा कमाने और सारे सुखसुविधाओ को भोगने के प्रवृत्ति ने पिछले ढाई  दशक से  हमारे भारतीय जीवन पद्धति का ताना बाना ही छिन्न भिन्न कर दिया है, पैसों व सुखसुविधाओं से बने इस नव प्रगाढ़  रिश्ते ने खून के रिश्तों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. मै सोचता हूँ कि रिश्तो को सौदे के तराजू पर नफा नुकसान देख कर तौलने वाली इस भौतिकवादी  पीढ़ी के आने वाले समय व आने वाली पीढ़ी के बारे मे सोचते ही अंधकूप सा घना तिमिर दिखता है जहॉ दूर दूर तक सूरज के किरणों की कोई ऊम्मीद नही.
                 आज की खबर मुझे अभी तक  विचलित कर रही है, क्योंकि मेरे लिये यह सिर्फ  एक  बुज़ुर्ग की नहीं, पूरे समाज की मौत है! मुम्बई से जुड़ी एक ख़बर आज शायद आप ने भी पढ़ा होगा,  टीवी चैनल्स पर भी उससे जुड़ी एक-आध रिपोर्ट भी देखा होगा.  एक युवा डेढ़ साल बाद जब अमेरिका से घर लौटा तो देखा कि उसका फ्लैट अंदर से बंद है। उसकी मां उस घर में अकेली रह रहीं थी। जब बार-बार घंटी बजाने पर भी दरवाज़ा नहीं खोला, तो दरवाज़ा तोड़कर वो अंदर घुसा। उसने देखा कि फ्लैट के अंदर उसकी मां की जगह उसका कंकाल पड़ा है। पिता की मौत चार साल पहले ही हो चुकी थी।
           आख़िरी बार डेढ़ साल पहले उसने मां से बात की तो उन्होंने कहा था कि वो अकेले नहीं रह सकतीं। वो बहुत डिप्रेशन में है। वो वृद्धाश्रम चली जाएगी। बावजूद इसके बेटे पर इसका कोई असर नहीं हुआ। अप्रेल 2016 में फोन पर हुई उस आख़िरी बातचीत के बाद लड़के की कभी मां से बात नहीं हुई। तकरीबन डेढ़ साल बाद जब आज वो घर आया तो उसे मां की जगह उसका कंकाल मिला। पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही है और तभी वो बता पाएगी कि महिला ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई। मैंने इस ख़बर को एक नहीं, कई बार पढ़ा और बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मेरे दिमाग में कौंध रही हैं।
              महिला ने जब डेढ़ साल पहले अपने बेटे को फोन पर कहा होगा कि बेटे मैं बहुत अकेली हूं। ये अकेलापन मुझे खाए जा रहा है। मेरा दम घुट रहा है और बेटे ने यहां-वहां की कुछ बात कर फोन रख दिया उसके बाद क्या हुआ होगा?
          बेटे ने अगली बार मां को कॉल किया होगा। मां ने फोन नहीं उठाया, तो क्या बेटे को फिक्र नहीं हुई? क्या उसके मन में ये ख़्याल नहीं आया कि मां आख़िरी बात इतनी दुखी लग रही थी। अकेली भी है, उसे कुछ हो तो नहीं गया?
               एक बार ऐसा नहीं लगा, मगर दो दिन बाद फिर फोन किया, तब भी उन्होंने नहीं उठाया या फोन नहीं लगा, उसके बाद भी वो इत्मीनान से कैसे रहा?  क्या मुम्बई शहर में जिसका कि वो रहने वाला था, उसका एक भी ऐसा रिश्तेदार-दोस्त नहीं था जिसे वो कह सके कि पता करो क्या हुआ...मां से बात नहीं हो रही।
            इस महानगरीय रिहाईस मे उस सोसाइटी में जहां वो महिला इतने सालों से रह रही थी, वहां भी किसी ने डेढ़ साल तक उसके गायब होने को नोट नहीं किया। बेटे और सोसाइटी के अलावा पूरे शहर मे, पूरी रिश्तेदारी में एक भी ऐसा इंसान नहीं था जिसने उस महिला से सम्पर्क करने की कोशिश की हो और बात न होने पर वो घबराया हो।
                मैंने सुना है कि उत्तराखंड में कुछ साल पहले चारधाम यात्रा के दौरान आई बाढ़ में मारे गए लोगों के परिजन आज भी उन पहाड़ियों में अपने परिजनों के अवशेष ढूंढते हैं। उन्हें पता है कि वो ज़िंदा नहीं है। बस इस उम्मीद में वहां भटकते हैं कि शायद उनसे जुड़ी कोई निशानी मिल जाए। उनका कोई अवेशष मिल जाए और वो कायदे से उनका संस्कार कर पाएं। सिर्फ इसलिए ताकि वो अवशेष भी यूं ही कहीं लावारिस न पड़े रहें। इतने सालों बाद भी बहुत से ऐसे लोग सिर्फ इस उम्मीद में वहां भटक रहे हैं।
           मगर यहां एक बुज़ुर्ग औरत अपने घर में डेढ़ साल पहले मर गई। उसे किसी को ढूंढना भी नहीं था। वो उसी पते पर थी जहां उसे होना थी मगर फिर भी डेढ़ साल तक उसके मरने का किसी को पता नहीं लगा। उसे किसी ने ढूंढा नहीं। बगल में रहने वाले पड़ोसियों तक ने नहीं। जिन्हें वो दिन में एक-आध बार दिख भी जाती होंगी। दरवाज़ा बंद देखकर किसी ने सोचा भी नहीं कि क्या हुआ...वो महिला कहां गईं!
          यह वही मुंबई है जहॉ आज से ठीक 75 साल पहले अगस्तक्रॉति का जयघोष  हुआ था जब देश की आजादी के लिये बिना एक दूसरे को जाने हजारो हजार लोग देश के आजादी व ऐका के नाम पर एक दूसरे को बचाने के लिये हाथों मे हाथ थामे खड़े थे,  उसी मुंबई  मे एक आलीशान  सोसाईटी के एक फ्लैट  मे डेढ़ साल से एक बूढ़ी मरी पड़ कर कंकाल बन गई और पड़ोसी तक को खबर नही, या पड़ोसी ने खबर लेने की जरूरत ही नही समझी. महज 75 सालों मे आदमियत के रिश्ते मे कितना फर्क पैदा कर दिया है हमने?
              ये अहसास कि दुनिया में मेरा कोई नहीं है। किसी को मेरी ज़रूरत नहीं है। मैं कुछ भी होने की वजह नहीं हूं। इससे बड़ी बदनसीबी किसी भी इंसान के लिए और कुछ भी नहीं। और यहां तो बात एक मां की थी। वो मां जिसे गर्भावस्था में अगर डॉक्टर ये भी बता दे कि आप उस पॉजिशन में मत सोइएगा, वरना बच्चे को तकलीफ होगी, तो वो सारी रात करवट नहीं बदलती। मां बन जाने पर जिसके लिए बच्चे का अच्छे से रोटी खाना दुनिया की सबसे बड़ी खुशी होता है।
          अब्बास ताबिश एक मशहूर शेर है, एक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई 'ताबिश' मैनें इक बार कहा था मुझे डर लगता है और एक मां ने जब कहा कि उसे डर लग रहा है, वो अकेले नहीं रह सकती, तो वो बेटा डेढ़ साल तक इतनी रातें सो कैसे गया। वो समाज, वो रिश्तेदार, वो सोसाइटी वाले...वो सब कैसे अपनी-अपनी ज़िंदगियों में इतने व्यस्त थे कि साल तक एक महिला का गायब होना ही नहीं जान पाए। फ्लैट में कंकाल ज़रूर बुज़ुर्ग औरत का मिला है मगर मौत शायद पूरे समाज की हुई है। और इसी समाज का हिस्सा होने पर मैं भी शर्मिंदा हूं।
(बनारस, 08अगस्त 2017,मंगलवार)
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सोमवार, 7 अगस्त 2017

व्योमवार्ता / बनारस, अजब मिजाज का गजब शहर, बाबा कालभैरो : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 अगस्त 2017, सोमवार

बनारस, अजब मिजाज का गजब शहर ,बाबा कालभैरो : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 07 अगस्त 2017, सोमवार
          हमारा बनारस भी गजब का शहर है, मार्क ट्वेन ने कहा था कि बनारस इतिहास से प्राचीन,  परम्पर से परे और काल के सीमा परिधि से बाहर है, "Benaras is older than history, older than tradition, older even than legend and looks twice as old as all of them put together."अभी तक बनारस की स्थापना  के  बारे मे इतिहासकार कोई समय नही निश्चित  बता पाये हैं. बनारस अड़बंगी महादेव भोले नाथ की नगरी है, तो यहॉ के मिथक व इतिहास  भी अजब गजब है,  इन मिथक कहानियों  के पीछे छिपे ऐतहासिक रहस्य  व प्रमाणिकता क्या है किसी को नही मालूम पर हम बनारस वाले अपने पूर्वजों द्वारा सहेजी गई परम्पराओं  का पालन पूरे आस्था व विश्वास  के साथ करते हैं.  कमाल तो यह है कि हमारे साथ हमारे देवी देवता भी इसी मे प्रसन्नता अनुभव करते हैं. ये परम्पराये औरों के लिये कहानियों  होगी परहमारे लिये हमारी आस्था हैं हमारा विश्वास  है हमारी श्रद्धा  है. हम इन परम्पराओं मे कोई छेड़छाड़  नही रकरते न ही करना ही चाहते हैं न करने देते है क्योंकि यही हमारे बनारसीपन के रग रग मे समाया है और यही हमारा मिजाज भी है. इसी मे हमारी मस्ती है, दुनिया जहॉ चूल्हे भाड़ मे जाये हमारे ठेगे (बनारसी पाठक अपने लिहाज से सही शब्द का प्रयोग करने के लिये स्वतंत्र  है) से. हमारी तो अपनी वाली चलेगी, इसी को बनारसी मे अड़ना कहते हैं,  और अपनी बातें पर अड़ने से ही बनारसी अड़ी शब्द प्रचलन मे आया. तो साहब आपको इन अड़ीयों पर बनारसी अड़ीबाज मिल जायेगें, मुँह मे पान घुलाये आसमान की ओर मुँह उठा कर बिना एक बूँद पान चुआये मोहल्ले की राजनीति से लेकर ट्रम्प, पुतिन, शिंजो व गिलपिंग के इण्टरनेशनल राजनीति की मॉ बहन एक कर अपने सांसद प्रधानमन्त्री  के पालिसी का पोलिटिकल पोस्टमार्टम  करते हुये. दम तोड़ती ट्रैफिक व्यवस्था, चिद्दी चिद्दी ऊधरा रह सड़के,   साल छ महीना पहले बनी हुई पर आज धरती मे समाती हुई सड़के, सीवर के पुनरूद्धार के नाम पर दसकों से शहर को तालतलैया बनायी गई जल निगम की अराजक व्यवस्था और नगर को नरक बनाता नरक निगम को गरियाते कोसते हुये, पर इन सब के बावजूद बनारसी होने पर गौरवान्वित. इनकी लाईफस्टाईल बस एक " चना चबैना गंगाजल जो पुरवै करतार,  काशी कबहुँ न छोड़िये विश्वनाथ दरबार "
               इसी बनारस में एक पुलिस स्टेशन ऐसा है, जहां ऑफिसर की कुर्सी पर बाबा काल भैरव विराजते हैं। अफसर बगल में कुर्सी लगाकर बैठते हैं। सालों से इस स्टेशन के निरीक्षण के लिए कोई IAS, IPS नहीं आया. क्योंकि मान्यता यह है कि इस थाने के कोतवाल साक्षात  बाबा कालभैरव है. वे स्वयं थाना क्षेत्र  की कानून व्यवस्था  देखते है तो इसलिए अपनी कुर्सी पर नहीं बैठते थानेदार.
           वाराणसी के विश्वेश्वरगंज स्थित कोतवाली पुलिस स्टेशन के प्रभारी राजेश सिंह ने बताया, ''ये परंपरा सालों से चली आ रही है। यहां कोई भी थानेदार जब पोस्टिंग होकर आया, तो वो अपनी कुर्सी पर नहीं बैठा। कोतवाल की कुर्सी पर हमेशा काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव विराजते हैं।''
- ''क्राइम कंट्रोल के साथ-साथ सामाजिक मेल-मिलाप, आने-जाने वालों पर बाबा खुद नजर बनाए रखते हैं। वो शहर के रक्षक हैं। इसीलिए इन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। बाबा की पूजा के बाद ही यहां तैनात पुलिसकर्मी काम शुरू करता है।''
- ''ऐसा माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ ने पूरी काशी नगरी का लेखा-जोखा का जिम्मा काल भैरव बाबा को सौंप रखा है। शहर में बिना काल भैरव की इजाजत के कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता। शहर की सुरक्षा के लिए थानेदार की कुर्सी पर बाबा काल भैरव को विराजा गया है।''
- कांस्टेबल सूर्यनाथ चंदेल ने बताया, ''मैं 18 साल से खुद इस थाने में तैनात हूं। मैंने अभी तक किसी भी थानेदार को अपनी कुर्सी पर बैठते नहीं देखा। बगल में चेयर लगाकर ही प्रभारी निरीक्षक बैठता है। हालांकि, इस परंपरा की शुरुआत कब और किसने की, ये कोई नहीं जानता। लेकिन माना जाता है कि अंग्रेजों के समय से ही ये परंपरा चली आ रही है।''
ऐसा है बाबा काल भैरव का महत्व
- साल 1715 में बाजीराव पेशवा ने काल भैरव मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया था। वास्तुशास्त्र के अनुसार बना यह मंदिर आज तक वैसा ही है। बाबा काल भैरव मंदिर के महंत-पंडित नवीन गिरी ने बताया, हमेशा से एक खास परंपरा रही है। यहां आने वाला हर बड़ा प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी सबसे पहले बाबा के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेता है।
काल भैरव मंदिर में रोजाना 4 बार आरती होती है। रात की शयन आरती सबसे प्रमुख है। आरती से पहले बाबा को स्नान कराकर उनका श्रृंगार किया जाता है। मगर उस दौरान पुजारी के अलावा मंदिर के अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं होती। बाबा को सरसों का तेल चढ़ता है। एक अखंड दीप हमेशा जलता रहता है।
   मान्यत है कि ''ब्रह्मा ने पंचमुखी के एक मुख से शिव निंदा की थी। इससे नाराज कालभैरव ने ब्रह्मा का मुख ही अपने नाखून से काट दिया था। कालभैरव के नाखून में ब्रह्मा का मुख अंश चिपका रह गया, जो हट नहीं रही था।''
- ''भैरव ने परेशान होकर सारे लोको की यात्रा कर ली, लेकिन ब्रह्म हत्या से मुक्ति नहीं मिल सकी। तब भगवान विष्णु ने कालभैरव को काशी भेजा। काशी पहुंच कर उन्हें ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति मिली और उसके बाद वे यहीं स्थापित हो गए।''
(बनारस,07 अगस्त 2017, सोमवार)
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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

व्योमवार्ता / जरूरत जिसको, सहयोग उसी को : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 03 अगस्त 2017, गुरूवार

  जरूरतजिसको सहयोग  उसी को : व्योमेेश चित्रवंश की डायरी, 03 अगस्त 2017, गुरूवार

          सिटी बस स्टाप पर रूकी, बस मे भीड़ तो नही थी पर कोई सीट खाली भी नही थी. स्टाप पर एक डिजाईनर टीशर्ट और आज के दौर के हिसाब से फैशन कही जाने वाली जगह जगह से फटी जीन्स पहन कर ऑखों पर गागल्स और कानों मे ईयरफोन चढ़ाये एक माडगर्ल बस मे चढ़ी. उसके चढ़ते ही बस मे डियोडरेन्ट के खूशबू का एक झोंका सा आ गया. बस के माहौल मे भी उस झोंके का असर होना ही था. माहौल पर असर बस दो चार मिनट मे ही दिखने लगा.
   "ऐ मिस्टर ...एक लेडीज खड़ी है और तुम इतने हट्टे कट्टे होकर आराम से बैठे हो,, बड़े ही शर्म की बात है,". 45 की उम्र में 50 के दिखने वाले ( शारीरिक रूप से ठीक - ठाक ) अंकल टाइप आदमी ने साईड वाली दूसरी सीट पर बैठे सारा दिन धूप में भाग दौड़ करने के बाद थके हुए 25-26 साल के लड़के को हूबहू 'आदेश' जैसा लग रहा 'आग्रह' किया .
.पर लड़के ने जरा भी रिस्पॉन्स ना दिया, एक तो वो बहुत थका हुआ भी था, दूसरा कुछ अंकल के ज्ञान को अनदेखा भी कर रहा था, आखिर में अंकल ने - सामने खड़ी आधुनिका लड़की के अधिकार के लिए ( मोबाइल में व्यस्त ) लड़के को जोर से हिलाया
और मोबाइल फोन को छीन लेने का उपक्रम किया 'सुनाई नहीं देता है तुझे ? कह रहा हूँ लेडीज है, बैठने दो उनको ... ..".
      और इसी सब चक्कर में लड़के का मोबाइल हाथ से छूटकर नीचे जा गिरा . एक तो लड़के की खुद की भी कुछ समस्याएँ हो सकती हैं .ऊपर से अंकल की बकलोली, आखिर  खून हर समय इतना सहिष्णु थोड़े ही हो सकता है.
     अब लड़का बिगड़ पड़ा ... 'तुम वकील हो इसके ,, हाँ ?? तब से चेपो चेपो करे जा रहे हो ,, मैं साला तुम्हारी उम्र का लिहाज कर के बोल नहीं रहा कुछ तो तुम सर पर चढ़ जाओगे ???
और काहे दूँ मैं सीट अपना किसी को ? टिकट मैं नहीं लिया हूँ क्या ?? या कि तुम्हारी तरह स्टाफ कहकर फ्री में चढ़ा हूँ ??  ये लड़की अपाहिज है या उसको चक्कर आ रहा है जो सीट छोड़ दूँ ?
साला रोज नारी सशक्तिकरण का नया नारा ले कर जलूस पर जलूस निकलता जा रहा है और तुम हो कि कहते हो लड़की है कमजोर है,,सीट छोड़ दो ... और इतना ही तुमको दिक्कत है तो साला ...तुम छोड़ दो ना सीट ,,, या इतना भैंसा जैसा शरीर लेकर अचार डालोगे इसका ?और ये बताओ इतना नारीवादी काहे हुए जा रहे हो ??अब मुझे टोके तो साला सारा नारीवाद मैं घुसा दूँगा यहीं पर' ..."
   लड़के का रौद्र रूप देख अंकल एक कोने में दुबक कर बैठ गए ,
,
फिर वापस एक शब्द ना निकला उनके मुँह से .....
दो स्टाॅप के बाद बस रुकी ..!!
कुछ सवारियाँ उतरीं , कुछ नई चढ़ी ...
कंडक्टर के चिल्लाने की आवाज आई - " ऐ बुढ़ीयाँ चढ़ना है तो चढ़ो जल्दी ... इतना टाइम नहीं है हमारे पास' ..!
बस के गेट से एक बूढ़ी अम्मा चढ़ी जिनकी देह एकदम पसीने में भीगी थी, उम्र का असर उनके हाँफने में दिख रहा था, खुद का भार संभालना मुश्किल हो रहा था ऊपर से इतना बड़ा थैला भी उठाई थी वो ,,
उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था सिवाय उस लड़के के ...
.
बस में गियर लगते ही झटका लगा जिसने बूढ़ी अम्मा को लगभग गिरा ही दिया था अगर वो लड़का झट से खड़ा हो कर उन्हें संभाल ना लेता...
संभालने के साथ ही लड़के ने उसे अपनी सीट बूढ़ी अम्मा को ये कहते दे दी 'यहाँ आराम से बैठो अम्मा,, और टिकट मत लेना मैं जा के ले लूँगा' ,,
     शायद अम्मा यही दुआ कर रही थी की कोई उसकी टिकट कटा कर देदे इसीलिए बिना दाँतों वाली प्यारी सी मुस्कुराहट बिखेरते बैठ गयीं .
सामने बैठे अंकल लड़के की तरफ गौर से देख रहे थे जैसे कह रहे हो 'हम कहे तो नहीं दिए ..और अब सीट भी दे दिए और टिकट भी कटा लिए बूढ़ी का"
     इधर से लड़का भी मुस्कुराकर अंकल को ऐसे देख रहा था जैसे
उत्तर दे रहा हो कि 'उसे सीट की जरूरत ही ना थी लेकिन
बूढ़ी अम्मा को जरूरत थी सीट की भी और टिकट की भी व्यवस्था  करि रहे हैं"
खैर ...
  लगभग आधे घंटे बाद अम्मा का गंतव्य आ गया .
      बूढ़ी अम्मा सीट से उठीं तो लड़के को थोड़ा झुकने का इशारा किया,, लड़का झुका तो अम्मा ने माथे को चूमते हुए कहा,, 'खूब खुस रहौ लल्ला , जुग जुग जीओ, हिंयैं रहित हैं हम,  हमार घर आइ गवा".  लड़के ने बूढ़ी अम्मा का झोला उठाया और उन्हे सहारा देकर बस से नीचे उतार कर वापस जब अपने सीट पर आया तब तक आधुनिका  को भी सीट मिल चुकी थी,  उसने लड़के को गागल्स के अंदर से देखते हुये हल्की सी स्माईल दी, और वह अंकल जी और जल भुन गये. लड़के ने स्माईल को और चौड़ा करते हुये उन्हे दिखा.
मै पीछे बैठा सारी घटनाओ को साक्षी भाव से देखते हुये संपूर्ण  घटनाक्रम  पर विचार कर रहा था कि दिखावे से ज्यादा जरूरी है ये महसूस करना कि जरूरत किसकी बड़ी है,, कई बार एक भिखारी जिसपर तरस खाकर हम पचास रुपए भी दे देते हैं वो पहले से जेब में पाँच हजार दबाए बैठा होता है
और ...
कई बार कोई अच्छे कपड़े पहना हुआ आदमी खाली जेब लिए परेशान घूम रहा होता है ...
भेड़चाल में चलते हुए नहीं बल्कि अपनी समझ से किसी की सहायता करना अधिक उपयुक्त है , जिसे भी जरूरत होगी वो अपनी जरूरत आपको बिना बोले महसूस करा लेगा ...
(बनारस, 03अगस्त2017, गुरूवार)
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बुधवार, 2 अगस्त 2017

मेरा प्रधानमंत्री, मेरा अभिमान : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 02 अगस्त 2017, मंगलवार

मेरा प्रधानमंत्री मेरा अभिमान : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 02 अगस्त 2017, मंगलवार)

एक व्यक्ति 350 सांसदों को लेकर आपके सामने आँशु बहाकर समर्थन माँग रहा और किस बात के लिये कालाधन खत्म करने के लिये??विश्व की तमाम राजधानी मे जाकर भारतवंशियों से सहायता माँग रहा??20 घँटे काम कर रहा , होली  दीपावली , ईद सैनिकों के बीच मना रहा हैं*
*3 सालो से हर रविवार आपकी छोटी - छोटी बातो पर बात कर रहा हैं" जिसकी माँ 8×10 कमरे और भाई किराना की दुकान चलता हो क्या चाहते हैं आप?? किस पैगम्बर की तलाश है??*

*एक बात जान लीजिये यदि मोदी आंतकवाद, काला धन , भरष्टाचार नही खत्म कर पाये तो कोई  माई का लाल कर भी नही पायेगा वहीँ जंतर मन्तर पर कैंडिल लेके चक्कर काटोगे,*

*प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे जीवट वाले व्यक्ति ने जिस अंदाज़ में सार्वजनिक मंच से कहा है....*
*कि "ये लोग मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे..."*
*इससे यह स्पष्ट हो गया है कि स्थिति बहुत भयंकर और असहनीय रूप ले चुकी है..*

*एक अकेला व्यक्ति 125 करोड़ हिंदुस्तानियों के हिस्से का ज़हर "नीलकण्ठ" महादेव बनकर पी रहा है...*
.
*एक अकेला व्यक्ति देश के अंदर मौजूद सारे राक्षसों के साथ-साथ अनगिनत विदेशी दुश्मनों (पाकिस्तान सरकार, पाकिस्तान की सेना, आई एस आई, दाऊद इब्राहिम, हाफिज सईद, चीन......) के निशाने पर है......*
*क्योंकि देश के इतिहास में पहली बार किसी अकेले आदमी ने इतने सारे दुश्मनों की एक साथ नींद हराम कर दी है...*

*ये अच्छाई और बुराई का महासंग्राम है, हमको तैयार रहना है और अपने प्रधान मंत्री का साथ देना है, क्योंकि अगर इन सभी राक्षसों ने प्रधान मंत्री को अगर अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया तो फिर सदियों तक कोई दूसरा ऐसा नेता पैदा नहीं होगा...*

* मेरे प्रधानमंत्री जी मेरे देश के सम्मान है, वे मेरा अभिमान है, मुझे गर्व है मेरे देश पर, मेरे प्रधानमंत्री  पर.
मैं अपने प्रधानमंत्रीजी के साथ हूँ, क्या आप भी हैं ?
(बनारस, 02 अगस्त 2017,बुधवार)
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शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

व्योमवार्ता / बनारस मे नाग पंचमी, त्यौहारों का शुरूआती महापर्व :// व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28 जुलाई 2017, शुक्रवार

बनारस मे त्योहारों का शुरूआती महापर्व, नाग पंंचैया : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28जुलाई 2017, शुक्रवार (2)

            हमारा बनारस मौज-मस्ती का शहर है,  हम बनारसी अपनी जरूरत  के हिसाब से मौज करने के लिये वजह जगह और समय का चौचक इंतजाम  कर ही लेते है,  इंतजाम  भी एकदम चकाचक, दिव्य निपटान से लेकर खाने पीने की मुकम्मल व्यवस्था  तक. चाहे वह गंगा जी का पेटा हो या गंगा ओप्पार, सारनाथ का बगैचा हो या रामनगर का पोखरा, मूड पानी जमा नही कि परोगराम टाईट, फिर चाहे वह भगवान भोलेनाथ  का मंदिर हो चाहे भूतनाथ का महाश्मशान, हमारे लिये सब आनंदकानन काशी बन जाता है.
             उसके बाद भी तीज त्यौहार  के लिये कोई बहाना चाहिये तो हमने हर दिन को ही त्यौहार  बवा डाला,  कहते है तीन वार तेरह त्यौहार  की काशी, यानि हमारे बनारस का हर वार रविवार लगायत शनिवार  तक त्यौहार  है बस मन चंगा,  मिजाज मस्त, और खलीते मे रोकड़ा होना चाहिए. बावजूद कुछ त्यौहार ऐसे है जो सर्वकालिक व सर्वसम्मति  से मनाये जाते है,  जिन्हे मनाने के लिये किसी बहाने की या किसी कारण की जरूरत नही पड़ती, इन्ही त्यौहारों मे एक त्यौहार  नागपंचमी भी है जिसे बनारस मे पंचैय्या के नाम से ज्यादा जाना जाता है.  कहते है पंचैया का त्यौहार  साल भर के त्यौहारों का गेट वे आफ इंडिया है. इसी से साल भर के बड़े त्यौहारो का स्टेटस व डाइरेक्शन पता चलता है. पुरनियो ने कहा है कि" जेहि दिन रहै पंचैया नाग, वही दिन पड़ै दीवाली फाग, " कमाल है कि आज तक यह व्यवहारिक सिद्धांत  कभी गलत नही हुआ.
           पंचैय्या का त्यौहार बनारस मे अखाड़े और दंगल का त्यौहार  है,  पहलवान हो या विद्वान,  कलाकार हो या जादूगर सभी एक दूसरे की औकात नापने के लिये भिड़ते है.  लब्बोलुआब ये कि आज का भिड़ना साल भर के लिये जरूरी है और आज से शुरू हो जाती है कजरी, जो  पड़ोसी जिले मिर्जापुर की आयातित माल है. अब तो कम पहले कजरी के दंगल भी होते है,  हलकी बौछारों के बीच किसी नीम के तले बने चौघट्टे पर गोल गोल चक्कर मे घूमते हुये कजरी के बोल, सुबह शाम पेंग पड़ते हुये झूले तो अब देखने को नही मिलते पर अखाड़ो मे पहलवानों ने और नागकूप तथा अन्य गुरू स्थानों पर विद्वानो ने भिड़न्त  वाली परंपरा कायम रखा है.
            बनारस मे नाग पंचमी के त्यौहार  मे बड़े गुरू व छोटे गुरू के नाम से नागपूजन होता है. इसके पीछे की पौराणिक  कहानी व मिथक को हमारे छोटे भाई राजीव श्रीवास्तव एडवोकेट  जी ने अपने वाल पर निम्न पोस्ट किया है

काशी में नागपंचमी और बड़े –गुरु, छोटे-गुरु के नाग –
         
                    काशी का जैतपुरा स्थित नागकूप एक ऐसा स्थल है जिसका महर्षि पतंजलि और महर्षि पाणिनि से गहरा सम्बन्ध रहा है | यह महर्षि पतंजलि की तपोस्थली है |उन्हें शेषावतार भी माना जाता है | स्कन्द पुराण के अनुसार यह वह स्थान है जहाँ से पाताल लोक जाने का रास्ता है | यहाँ नागकूपेश्वर महादेव स्थापित हैं |   ऐसी मान्यता है कि पतंजलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर महाभाष्य की रचना की थी | पतंजलि को शेषावतार माना जाता है | कथा है कि एक बार श्रावण शुक्ल पंचमी (जिसे बाद में नाग पंचमी कहा गया )के दिन काशी के जैतपुरा स्थित इसी कूप पर पाणिनि कुछ विद्वान ब्राह्मणों के साथ शास्त्र चर्चा कर रहे थे तभी पतंजलि एक विशाल सर्प के रूप में वहां प्रकट हुए | इतने बड़े सर्प को देख कर पाणिनि घबरा गए और उन्होंने “को भवान्” (अर्थात आप कौन )के स्थान पर  “कोर्भवान्” कहा | जिसके उत्तर में सर्प रूपधारी पतंजलि ने उत्तर दिया- “सपोऽहम्”| इसपर पाणिनि मुनि ने पूछा-  “ रेफः कुतो गतः”? सर्प ने उत्तर दिया- “ तव मुखे “ | इसपर पाणिनि और वहां बैठे ब्राह्मण विद्वानों को सर्प की विद्वता पर घोर आश्चर्य हुआ और वे एक साथ प्रश्न करने लगे | इसपर सर्प रूपी पतंजलि ने सबके उत्तर एक साथ देने के लिए शर्त लगाई की वे चादर की आड़ के पीछे रहकर एक साथ सभी के प्रश्नों का समाधान करेंगे | इस चादर की आड़ के पीछे से शेषनाग पतंजलि अपने सहस्रों मुखों द्वारा एक साथ सभी प्रश्नकर्ताओं के उत्तर देने लगे | पतंजलि द्वारा दिए गए सभी उत्तरों को विद्वानों ने  लिख लिया और महाभाष्य तैयार हो गया लेकिन एक ब्राह्मण से रहा नहीं गया और उन्होंने चादर की आड़ हटा कर देखना चाहा कि इसकी ओट से कौन उत्तर दे रहा है , लेकिन इससे शर्त का उल्लंघन हो गया और विद्वानों द्वारा लिखा गया पूरा भाष्य जल गया और शेषनाग रूपी पतंजलि अदृश्य हो गए  | इसपर सभी बड़े दुखी हुए | जिस समय ये शास्त्रार्थ चल रहा था , उसी समय समीप के एक वृक्ष पर एक यक्ष भी बैठा था और उसने ये पूरा भाष्य वृक्ष के पत्तों पर लिख लिया था | विद्वानों के दुखी होने पर उसने वृक्ष से ही लिखे हुए सारे  पत्तों को उनकी और फेंका लेकिन इकठ्ठा करते -करते कुछ पत्तों को बकरियां खा गईं | इसलिए महाभाष्य में विसंगतियां आ गईं | इस शास्त्रार्थ के बाद पतंजलि बड़े -गुरु और पाणिनि छोटे -गुरु कहलाये और उनके अनुयायी सर्पों को बड़े- गुरु और छोटे –गुरु का नाग कहा गया | इस प्राचीन समय से पतंजलि और पाणिनि के स्मरण में  श्रावण शुक्ल पंचमी (नागपंचमी) पर शास्त्रार्थ की परंपरा रही है जो बीच में विलुप्त हो गई थी लेकिन कुछ विद्वानो के अथक प्रयास से ये परंपरा पुनर्जीवित है.
(बनारस, 28जुलाई 2017, शुक्रवार)
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व्योमवार्ता / सेक्यूलरिज्म व थाईलैंड पर जय बख्शी जी की पोस्ट : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28जुलाई 2017,शुक्रवार

सेक्यूलरिज्म व थाईलैंड पर जय बख्शी जी की पोस्ट : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 28जुलाई 2017,शुक्रवार

        जब ही हम देश के विकास की बात करते है तो  हमारे देश के कुछ स्वनामधन्य बुद्धिजीवी धर्मनिरपेक्षता सेकुलरिज्म की बात करने लगते हैं उन्हें हर चीज को सेकूलर चश्मे से देखने की आदत पड़ गई है , वे आम जनता का हित व विकास भी सेकलरिज्म के तराजू पर तौल कर अरना नफा नुकसान जोखते है. कमाल तो यह है अगर आप कहो की हम पूरब की तरफ इसलिए मुँह करके खड़े हो कर धूप सेकेगें क्योकि उससे ऊष्मा व उर्जा प्राप्त होती है,  हम पूरब दिशा को इसलिये महत्व देते हैं क्योंकि उधर से प्रकृति शक्ति सूरज निकलता है जिससे हमें प्रकाश मिलता है प्रकाश से हमें ग्यान मिलता है ज्ञान से हम विवेक प्राप्त करते हैं विवेक हमें सही अर्थों में मानव बनने में मदद करता है परंतु यह तथाकथित बुद्धिजीवी जो अपने आप को सेकुलर करते हैं वह तुरंत हाथ उठाएंगे कि नहीं सूरज की बात वेदों में कही गई है सूरज की बात रामायण में कही गई है इसलिए सूरज एक धर्म से जुड़ा हुआ है और  सूरज निकलने की दिशा पूरब की तरफ मुंह करके खड़ा होना संविधान व सेकूलरिज्म के विपरीत है इसलिए हम पूरब की तरफ मुँह करके नही खड़े हो सकते.  हिंदुस्तान के बाहर के अनेक देशों ने  अपने संस्कृति और इतिहास को ध्यान में रखते हुए धर्म जाति मतभेदों से दूर अपनी एक पहचान बनाई है और अपने इस ऐतहासिक,  पौराणिक  व सॉस्कृतिक पहचान पर वे कोई समझौता नही करना चाहते. इन्ही देशों मे एक है थाईलैंड. थाईलैंड नेआज भी हिंदू संस्कृति और सनातन परंपरा को अपनी विरासत बना रखा है जिसके बारे में आदरणीय श्री जय बख्शी जी एक बहुत ही सुंदर पोस्ट लिखी है आज की डायरी उसी पोस्ट को समर्पित.

#थाईलैंड क्या है ये जाने।
भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है l वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है l

-भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास-
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे , रामायण के बालकाण्ड के सर्ग ,70 . 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है , जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे , जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था , जिनकी पुत्री सीता जी थीं , जिनका विवाह राम से हुआ था l
राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे l इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी
उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थीl

केशव दास रचित ” रामचन्द्रिका “-पृष्ठ 354 ( प्रकाशन संवत 1715 ) .के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे l

भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा इस प्रकार हुआ था —
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावतीl कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था l थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है , और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम ” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

थाईलैंड की अयोध्या–
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं , क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है –

“क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह l इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

असली राम राज्य थाईलैंड में है-
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं , इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं , फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है l जिसे थाई भाषा में ” राम-कियेन ” कहते हैं l जिसका अर्थ राम-कीर्ति होता है , जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी , जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ ,क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है ,जो नाम के हिन्दू हैं, हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग हैं l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है l राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-

राम (राम), 2 लक (लक्ष्मण), 3 पाली (बाली), 4 सुक्रीप (सुग्रीव), 5 ओन्कोट (अंगद), 6 खोम्पून ( जाम्बवन्त ) ,7 बिपेक ( विभीषण ), 8 तोतस कन ( दशकण्ठ ) रावण, 9 सदायु ( जटायु ), 10 सुपन मच्छा ( शूर्पणखा ) 11मारित ( मारीच ),12इन्द्रचित ( इंद्रजीत )मेघनाद , 13 फ्र पाई( वायुदेव ), इत्यादि l थाई राम कियेन में हनुमान की पुत्री और विभीषण की पत्नी का नाम भी है, जो यहाँ के लोग नहीं जानते l

थाईलैंड में हिन्दू देवी देवता
थाईलैंड में बौद्ध बहुसंख्यक और हिन्दू अल्प संख्यक हैं l वहां कभी सम्प्रदायवादी दंगे नहीं हुए l थाई लैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते है , उनके नाम इस प्रकार हैं
1 . ईसुअन ( ईश्वन ) ईश्वर शिव , 2 नाराइ ( नारायण ) विष्णु , 3 फ्रॉम ( ब्रह्म ) ब्रह्मा, 4 . इन ( इंद्र ), 5 . आथित ( आदित्य ) सूर्य , 6 . पाय ( पवन ) वायु l

थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है , जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The brahminy kite ) कहा जाता है , इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur indus ” है l फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा थाl इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है l इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है l चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं , और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है , और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं , इसलिए उन्होंने ” गरुड़ ” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है l यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

सुवर्णभूमि हवाई अड्डा
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य , क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पार हैं l जैसे हुमायूँ रोड , अकबर रोड , औरंगजेब रोड इत्यादि , इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि हैl यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है l इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ हैl पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो l
(  बनारस 28 जुलाई 2017 शुक्रवार)
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