मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

भगतसिंह : कुछ अधखुले पन्ने > व्योमेश चित्रवंश की डायरी 17अक्टूबर2016

दिल से न निकलेगी मर कर भी वतन की उल्फत
मेरी मिट्टी से भी खूशबू ए वतन आयेगी ।
           
              आजकल राजशेखर व्यास की लिखी किताब भगतसिंह: कुछ अधखुले पन्ने पढ़ रहा हूँ। बेहद बेबाकी और ईमानदारी से भगतसिंह पर लिखी गई इस शोधपरक किताब  ने सही अर्थों मे यह साबित किया है कि जीवनीकारों औऱ इतिहासकारों ने सही मायने मे भगत सिंह के साथ न्याय नही किया। भगतसिंह  की सच्ची और संपूर्ण कहानी लिखने वाला कभी न कभी कोई होगा भी? कभी कभी लगता है कि अगर भगतसिंह कुछ और समय जीवित रह गये होते  तो अपनी आत्मकथा स्वयं कहते। भगतसिंह जैसी शख्सियत बार बार नही होती। ऐसे लोग सदियों युगों मे एकाध बार होते है, सच है कि भगतसिंह ने स्वयं मृत्यु का वरण किया ताकि हम सब सुख से जी सके। पर यह हमारा दुर्भाग्य भी है कि हम भगतसिंह के बारे मे ज्यादा नही जानते बल्कि उतना ही जानते है जितना जनाया गया है। यह भगतसिंह ही नही बल्कि हमारे इतिहास के साथ, हमारे सम़य काल के साथ एक छल है जिसे साजिशन रचा गया और हमे जानबूझ कर अपने इस युगदृष्टा महान भारतीय , जांबाज क्रान्तिकारी के इतिहासबोध से परे रखा गया।
अपने समय के सभी क्रांतिकारियों मे भगतसिंह निसंदेह सर्वश्रेष्ठ चिंतक,विचारक व दृष्टा थे। वे सिर्फ आदर्शवादी भावुक व्यक्ति ही नही वरन यथार्थवादी विचारक थे और इसीलिये उन्होने आजादी के  बाद के भारत की परिकल्पना आजादी मिलने के लगभग डेढ़ दशक पहले ही कर ली थी जबकि उनके समकालिको के पास ऐसी कोई दृष्टि या सोच नही थी। यही वजह है कि भगतसिंह  आज भी सामयिक व प्रासंगिक है। आज भगतसिंह को महज कामरेड या सरदार के रूप मे देखने व मानने वालो को निकट दृष्टिदोष से पीड़ित ही कहा जायेगा कि उन्हे भगतसिंह एक समग्र भारतीय के रूप मे नजर नही आते।
   २६ सितंबर १९०७ को बंगा गॉव के चक नं० १०५, जरानेवाला तहसील जिला लायलपुर ( वर्तमान मे पाकिस्तान) मे जन्म लेने वाले भगतसिंह कुल २३ साल ५ महीने २६ दिन की उम्र पूरी कर २३ मार्च १९३१ को लाहौर सेण्ट्रल जेल मे अंग्रेजो द्वारा फॉसी की नियमविरूद्ध सजा को पूरा करने के लिये राजगुरू व सुखदेव के साथ फॉसी पर झूल गये। अंग्रेजी शासन से तो न्याय की आशा नही की जा सकती थी पर हम भारतीयों व हमारे देश के नेताओं ने क्या भगतसिंह के साथ न्याय किया? यह राजशेखर जी ने बहुत ही संतुलित ढंग से लिखा है। जब भगतसिंह फॉसी के पहले जेल मे थे तो नेताजी, मोतीलाल नेहरू, रफी अहमद किदवई, जवाहर लाल नेहरू उनसे मिलने गये पर गॉधी जी नही गये, यह सवाल मुझे पूरे समय कचोटता रहता है कि क्या एक ही उद्देश्य को पाने के लिये दो विचारधाराओं के बीच इतना अंतर स्वाभाविक हो सकता है अथवा यह गॉधी जी के छद्म महात्मावाद की एक पराकाष्ठा है। ऐसा ही सवाल गॉधी इरविन समझौते वार्ता के दौरान इरविन से अति मधुर संबंध मे बँध चुके गॉधी जी के स्वभाव व जिद पर पुन: उठता है कि जब पूरा देश यह चाहता था कि गॉधी जी भगतसिंह के सजामाफी हेतु इरविन से कहे वहॉ गॉधी द्वारा माफी की बात करने के बजाय केवल फॉसी के तारीख पर वह भी समझौते के लिहाज से हामी भरना मेरे मन मे उनकी महानता के प्रति सवाल उठाते हैं। जबकि इसके पहले गॉधी खुद ही अपील कर स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे की सजा माफ करा चुके थे, तो क्या गॉधी जी की सारी करूणा व सारी प्रेम व सहिष्णुता कुछ विशेष लोगो के लिये ही थी? क्या यह तुष्टिकरण व अंध महात्मावाद की स्वार्थपरक दबाव वाले राजनीति की शुरूआत नही थी ? ये सवाल किताब पढ़ने के दौरान भी व बाद मे भी मुझे उलझाते रहते है। हो सकता है कि मै गलत होऊँ पर मेरे सवाल अपने जगह वाजिब है जिनका जबाब तमाम महानताओं के रेत के बनते बिगड़ते टीलो के समान बदस्तूर कायम है।
         हालॉकि मुझे नही लगता कि किसी तरह की सजामाफी को भगतसिंह स्वीकार करते क्योंकि भगतसिह के उनके पिता जी द्वारा  फॉसी से बचाने के लिये दिये गये हलफनामे की जिस तरह से भर्त्सना उन्होने की थी व उनके लिखे लेखो मे देश व अपने मिशन के प्रति कटिबद्धता से यह स्पष्ट जाहिर होता है कि भगतसिंह अंग्रेजो के किसी भी एहसान को स्वीकार करने को शायद ही तैयार होते।
         कुछ इसी तरह की साजिश भगतसिंह के लेखन सामग्री के साथ भी हुई। मात्र २३ वर्ष की अल्पायु मे हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिस भाषा के मर्मग्य चिंतक व विचारक भगतसिंह ने फॉसी की कोठरी मे बैठे बैठे भीअनेक पत्र, लेख,दस्तावेज व पर्चे लिखे साथ ही साथ कई पुस्तक व पुस्तिकाये लिखी व कई विदेशी भाषा की पुस्तको का अनुवाद भी किया। बताते है जब उन्हे फॉसी पर चढ़ना था तो कालकोठरी से निकलने तक वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। उनकी जेल मे लिखी पुस्तकों मे Idea of socialism, the door to death, autobiography, the revolutionary movement of india with short biographic sketch of the revolutionaries आदि थी। पर वे पुस्तके आम भारतीयो के हाथों तक पहुँचने के बजाय तितिर बितिर हो गई, बल्कि जानबूझ कर तितिर बितिर  कर दी गई। दुर्भागयत: इसमे भी हमारे कुछ बड़े नेताओ व  भगतसिंह के कुछेक बेहद करीबी माने जाने वालो का हाथ रहा। यह भगतसिंह के आम भारतीय के प्रति स्वीकार्यता व लोकप्रियता है जिसे प्रखर न होने देने के लिये चंद लोग हमेशा शंकालु रहे कि कही जन जन मे बसे इस देदिप्तमान सूर्य भगतसिंह के आगे उनकी छवि ऩ धूमिल हो जाये।
      फिर भी आज आजादी के लगभग ८ दशको के बाद भी भगतसिंह उतने ही प्रासंगिक व सामयिक लगते है तो उसके पीछे वजह उनके विचारो की ताजगी ही है, वर्तमान मे देश मे जो अफरातफरी दिख रही है  उसके बीच भगतसिंह याद आये बिना रह भी नही सकते। ये दूसरी बात है कि इतिहास ने उनके साथ न्याय नही किया क्योंकि इतिहास के नियन्ताओ ने समय के शिला पर उसे स्पष्ट सच लिखने की अनुमति ही नही दिया। आज जब पाकिस्तान पर सेना द्वारा किये गये सर्जिकल आपरेशन के बाद हमारे अपने नेताओं द्वारा आरोप प्रत्यारोप सबूत सेहरा को लेकर बेमतलब की बहस जारी है तो ऐसे मे भगत सिंह और भी महत्वपूर्ण हो जाते है तभी तो भगतसिंह ने कहा था
जिन्हे मर जाना चाहिये,
वे धरती पर बोझ बने हुये है
जिन्हे जिंदा रहना चाहिये
वो हर पल शहीद हो रहे हैं।

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

कानून बनाम कानून : व्योमेश चित्रवंश की डायरी 12अक्टूबर 2016 बुधवार

गालिबपुरा में कल "नसीम पंचर वाले" ने दारू पी कर अपनी "साली" को बुरी नज़र से दबोच लिया, लौडिया जोर से चिल्लाई, चीख पुकार सुनकर नसीम की बीबी "फरजाना" दौड़ी-दौड़ी वहाँ पहुँची और नसीम की गिरफ्त से अपनी बहन को छुड़ाया।
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नसीम ने पहले तो "फरजाना" को ख़ूब लतियाया और साली को अपने पास छोड़कर फरजाना को वहाँ से चले जाने को कहा । लेकिन तब तक अड़ोसियों-पड़ोसियों के आ जाने से मामला बिगड़ गया। तो अपने मकसद में नाकाम नसीम ने "फरजाना" को बोला : "तलाक तलाक तलाक" !
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मुहल्ला गालिबपुरा की मस्जिद तक बात पहुँची.. सबने नसीम को लानत मलानत दी, लेकिन चाचा अजमेरी ने कहा कि - "शरीया कानून" के हिसाब से फरजाना का तलाक हो गया है..
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वहाँ खड़े एक लड़के ने कहा कि :- अगर "शरिया कानून" से नसीम का दिया तलाक सही है तो फिर "शरिया कानून" के तहत नसीम के दोनो हाथ और लिंग भी काटा जाए क्योंकि इसने एक नाबालिग लड़की का बलात्कार किया है। "शरिया कानून" के तहत बलात्कारी की यहीं सजा होती है ।
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पूरी भीड़ में सन्नाटा छा गया ! सब चुप !! तभी चचा अजमेरी ने उस लड़के को घुड़काते हुए कहा :- "ये हिन्दुस्तान है यहाँ "शरिया कानून" की हुकूमत नहीं चलती, यहाँ "भारतीय कानून" का शासन है, "संविधान" नाम की भी कोई चीज होती है मियाँ, बड़े आये "शरीयत-शरीयत" करने।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2016

गँवई रामलीला की एक शाम: रनिंग कमेन्ट्री चालू आहे

राजा दशरथ बैठकर अभी बीड़ी पी रहें हैं..
बगल में सीता जी से कुम्भकर्ण ने कहा है कि
“थोड़ा मोबाइलवा चार्ज में लगा दो न..सरवा टावरे नहीं पकड़ रहा है इधर..मेहरारु को फोन करना है..खिसिया रही होगी..”

उधर लक्ष्मण जी को बहुत तेज से दो नम्बर लगा है..निपटने के लिए गये हैं.. उनको मेघनाद जोर से डांट रहे हैं….
” दिन भर काहें खाते रहते हो बे..जवने मिलता है तवने खा लेते हो..?..पेट ठीक नहीं रह रहा तो बाबा रामदेव का दिव्य चूर्ण खाया करो..”

लक्ष्मण जी सूपर्णखा जैसा मुंह बनाकर मेघनाद को समझा रहें हैं……”चुप रहो बे उ तनी काल्ह तुम्हारी भौजी ने लिटी चोखा बना दिया था…बुझाया नहीं…उरेब खा लिए हैं।
दूसरी ओर भरत से शत्रुघ्न जी कह रहें हैं..”जरा अपना  whats app नम्बर दो न यार..कल वाला फ़ोटो सब साली को भेजना है”

अब लिजिये राजा जनक तो आज आये ही नहीं …पता चलल है कि उनकी ससुरारी में किसी का तबियत खराब है…अब का होगा? तो बगल के मुखदेव चौधरी को आज राजा जनक का पार्ट मिला है…चौधरी जी समाजवादी नेता भी हैं….आज अभिनेता का पार्ट मिला है तो मारे ख़ुशी के उछल रहें हैं…उनको डाइरेक्टर साहेब समझा रहे हैं..

“देखो…माइक के सामने जाना त इ मत समझ लेना की धरती पुत्र मुलायम सींग जी आ रहें हैं…याद रखना की तुम राजा जनक हो मुखदेव नेता नही.”…
चौधरी एकदम मूछ पर ताव देकर कहतें हैं…”अरे ना महराज का आप बात कर दिए..उ तनी दिन  भर दिन दूध बेचे हैं तो तनी जम्हाई ले रहें हैं…बाकी सब ठीक है”

मंच सजकर तैयार है..दस बारह चौकी पर  टेंट  समियाना तम्बू लगा है…..बांस-बल्ली केला से जैसे तैसे गाँव के सधे हुए बीटेक्स छाप इंजीनियरो ने मंच को शानदार बनाने का असफल प्रयास किया  है….डाइरेक्टर साहेब  स्क्रिप्ट लेकर तैयार हैं…लग रहा कि रामानंद सागर मरने के पहले अपनी सारी वसीयत इन्हीं को  लिखकर  गये थे..कभी इधर जातें हैं कभी उधर..कभी अंदर कभी  बाहर..कभी लक्ष्मण को नसीहत दे रहे तो कभी सीता को समझा रहें हैं….

“देखो संवाद बोलते हो तो कहीं से नहीं लगता है कि तुम्हारे हसबैंड अब वन में जा रहें हैं..थोड़ा सा फिलिंग और यार. सिचुएसन समझो…..”

लिजिये..एतने में  हरमुनिया मास्टर ने धुन छेड़ दिया है…
“दिल दिया है जान भी देंगे ए वतन तेरे लिए……”
ढोलक वाले भाई लग रहे कि आज मेहरारु से मार खाकर आएं हैं…माइक वाले पर खिसियाते हुए कहरवा ताल की ऐसी की तैसी कर रहें हैं..

दर्शक भी तैयार हैं…कुछ लौंडे कभी मोबाइल में देखते हैं तो कभी  महिला दीर्घा में कुछ सर्च करतें हैं….उनको रामलीला से क्या मतलब..उनको रासलीला सूझ रहा है… अपनी वाली आई है की नहीं आज कन्फर्म कर रहें हैं…
मुनेसर आ पतिराम आ सुकबिलास बाबा भी चौकी पर लाठी लेकर जमें हैं।
आ हेने लीलावती,कलावती ,परमेसरी
रिंकी आ नेहवा को लेकर आ गयी हैं….लीलावती  पियर रंग की छिट वाली साडी पहनी हैं…लाल लाल चूड़ी आ बड़की बिंदी लगाकर जब घूंघट से ताक कर हंसती है तो लगता है  मानो सावन के रात में  अँजोरिया उग गया है।.

अब  परदा गिरता है…कोई जोर से माइक में कोई चिल्लाता है..

“हर वर्ष की भाँती इस वर्ष भी आदर्श रामलीला कमेटी आपका हार्दिक स्वागत अभिनंदन बंदन करती है….”

माहौल एकदम भक्तिमय…
हरमुनिया मास्टर ने धुन बदल दिया..
“कहाँ बितवला ना…रतिया कहाँ बितवला ना”
ढोलक मास्टर एक जमका के “धाक तिनक धिन ताक धिनक धिन”बजा कर सम पर आ गए हैं।
माहौल शांत….अब मङ्गलाचरण शुरु.

“मंगल भवन अमंगल हारी..”

क्या दिव्य माहौल हो गया….आज वन गमन का प्रसंग है… आह रस परिवर्तन.
एक लाइन में राम लक्ष्मण सीता चले जा रहें हैं…. देखो तो जरा राम चन्द्र जी को…कितना दिव्य स्वरूप…. तनिक भी नही लग रहा की ई मनोहर पांडे हैं….सब आँख बन्द कर हाथ जोड़ लेते हैं.

“प्रेम से बोलिये सियावर  रामचन्द्र की जय..”

गायक जी बाबा तुलसी की चौपाई गा रहे हैं..

“उभय बीच सिय सोहति ऐसे
ब्रह्म जीव बीच माया जैसे”

वाह..क्या कह दिया तुलसी बाबा ने न?..बाबा को नमन..
तब तक कोई कमबख्त अनाउंस करता है…”किसुन मेडिकल स्टोर की तरफ से ग्यारह रुपया का पुरस्कार आया है…आदर्श रामलीला कमेटी हार्दिक स्वागत वंदन करती है ।”

अब मुझे एक बार नहीं कई बार हंसने का मन करता है…..लेकिन…नहीं..क्यों हँसू..?
पचास साल पहले चला जाता हूँ…..सोचता हूँ..उस वक्त क्या वातावरण होता होगा न ..उत्साह एक रोमांच रामलीला का….जब ले दे के रेडियो टीवी भी गांवो में नहीं थे..तब रामलीला देखने के लिए लोग बैलगाड़ी से दूर दूर जाते थे.ऊँगली पर दिन गिनते।
अचानक से गम्भीर होता हूँ…तब समझ में आता है कि भरत ने तीसरी सदी में लिखे अपने नाट्य शास्त्र में 28 से ज्यादा अध्याय नाट्य कला पर ही क्यों लिखा.

दूसरी ओर सोचता हूँ..इन गाँव के भोले-भाले कलाकारों से बड़ी अपेक्षा करना मेरी मूर्खता होगी न..?
इनको नमन करना चाहिए की घर-घर डिश टीवी और सांस्कृतिक प्रदूषण के दौर  में आज भी लोग अपनी इस महान पौराणिक परम्परा को ज़िंदा तो रखें हैं..

अरे !इसी रामलीला ने न जाने कितने स्टार कलाकारों को पैदा किया है…इसी रामलीला ने भोजपुरी को उसका शेक्सपियर दिया है.

इसी रामलीला ने गंगा जमुनी तहजीब  और सामाजिक समरसता , प्रेम को जिंदा रखा था..हर जाति-वर्ग के लोग दिन रात मेहनत करते कि उनके गाँव की रामलीला सबसे अच्छी हो..

सबके प्रतिष्ठा का सवाल था..इसके लिए गाँव के  इद्रीस मियां पांच हजार चन्दा देते तो शकील खान राम जी की झांकी बनाने के लिए दिन भर मेहनत करते…..आज लाख माहौल खराब है लेकिन  कई जगह ये परम्परा चल रही है।

ये सोचिये जरा हमारी महान सांस्कृतिक परम्परा को टेलीविजन और स्मार्टफोन ने कितना नुकसान किया है।
लेकिन लोग नहीं जानते कि इसकी जड़ो में मर्यादा पुरुषोत्तम की लीला ही नहीं वरन समाज को एकसूत्र में  बाँधना की एक ड़ोर भी छिपी थी….जो गांव के रामलीला के साथ  ही कमजोर होकर टूट रही है…अब किसे फुर्सत है..जब एक क्लीक पर ही रामायण और महाभारत हाजिर है तक  रामलीला देखे चार घण्टा।

समय ने संगीत और मनोरंजन को इसलिए फास्ट कर दिया की आदमी के पास वक्त नहीं।..
तभी तो लोग आज अपनी जड़ों से अपनी माटी से उखड़ते जा रहे…
इन बचाने वालों को बारम्बार नमन.

बस एक छोटा सा निवेदन…
रामलीला में क्या होता है सबको पता है…लेकिन आपके आस पास रामलीला हो रही हो तो जरूर देखने जाएँ…कुछ न करें तो कम से कम ताली बजाकर कलाकारों का उत्साह तो बढ़ाएं.
कलाकारों को ही नहीं..आपको भी अच्छा लगेगा..पक्का।

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

हमारे देश का किसान : भादों की डायरी 24 सितंबर 2016, शनिवार

             उत्तरा और हथिया नखत का सन्धिकाल। कुआर माह में इतना पानी आज कई सालों बाद बरसा ।हमारी भी कई मेड (खांवां)अतिरिक्त पानी का दबाव झेल नही पाये। टूट गए । मोहर फूट गयी । धान के खेत से पानी बाहर न जाय इसी उपक्रम में हम सब लगे है । थोड़ी देर के लिए पानी निबुस गया था,लेकिन अब फिर बरसने लगा . आज तारीख है ।जाना तो होगा ही ।लेकिन फिलहाल निकलने की स्थिति नही है।पानी बरसने लगा फिर। अब हथिया का झपसा बजरी पकाने के लिए ठीक होता है ।धान की बढ़ी हुई पौध गिर गयी । धान फूटने भी लगा है।अब जो पौध गिर गया वह उठ नही पायेगा। उरद, मक्का की फसल कट गई ।लेकिन धूप के आभाव में भुकस जाने का भय सताने लगा है ।तिल्ली अभी खेत में खड़ी है । बाजरा भी काला पड़ गया है। एक सप्ताह के लिए पानी निबुस जाय तो सब अ इति में आ जाय । आज मौसम अच्छा/मनोरम लग रहां है।लेकिन जिनके पास जानवर/पशु हैं उनकी तो सामत है ।जानवरो के लिए कोयर-काँटा करना बहुत मशक्कत है भाई । चारा-पानी इतना आसान नही । जानवर सुबह से खूंटे पर ताक रहे हैं। अपने तो भूखे रहा जा सकता है,लेकिन ये बेजुबान जानवर ?
जरा सा पानी निबुसा की नन्हकू की छेड़ लगी मेमिआने । घूमने की तलब लगी है । सूर्यबली भी ढोर,डांगर लेकर निकल पड़े।जिव आन मान हो जायेगा -अपना भी और जानवरों का भी।
         भगवान ! अब तो निबुस जाओ। हमे बनारस भी जाना है। आज की कचहरी तो यहीं हो गयी ।
                   राजपत सीवान के ओरी वीले बाड़े से कुछ सब्जियॉ तोड़ लाये कोहड़ा,नेनुआ,भिन्डी । आजकल घड़रोज कुछ कम हुए हैं । अब बड़े झुण्ड में नही आते। फुटकरिया को आसानी से हांका जा सकता है। एक किसी ने पडरु छोड़ दिया है-भैसा । अब उसको कइसे हांका जाय ।बहुत ही जिद्दी है।निकलता ही नही,खेत से । उसे मार सकते नही। जिस दिन किसी कसाई के हत्थे चढ़ जाएंगे बच्चू,उसी दिन निजात मिल पाएगी इनसे। अब तो भैस गाभिन करने के लिए हैं  भैसे की जरूरत ही कहॉ हैं? डाग्डर साहब चट से गरम भैंस को सूई लगा कर बीज चढ़ा देते है. दूई मिनट मे भैंस गाभिन. लेकिन ई बेजुबान पशु को जरूरत न होने पर भी तो हम पहेंट नही सकते कसाईबाड़े में. राम राम ई तो जीवहत्या हो जायेगी.
चलो जईसे कुल वैसेही ये भी. कभी किस्मत का लेखा थोड़े ही बदल सकता है. बाकी तो सब रामजी के ऊप्पर है.

यही है किसान की दिनचर्या ।
रोजही की चिन्ता
अनिश्चित भविष्य ।
फिर भी अलमस्त ।
जो होगा देखा जायेगा ।

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मेरी अपनी पीड़ा

मेरी व्यक्तिगत पीड़ा

(पिछले कई महीनो से नेट के मोहजाल ने मेरे पढ़ने के वक्त पर डाका डाल रखा है। चाह के भी नही पढ़ पाता हूँ अपनी पसंदीदा किताबों को, वे पड़ी रहती है कई कई दिन मेरे पढ़ने की मेज पर। जब भी उन पर निगाह पड़ती है तभी मोबाईल मे बजती घंटियॉ व आभाषी दुनिया के नोटिफिकेसन मेरा ध्यान खींच लेते है, और मेज पर पड़ी हुई किताबे कई दिनो तक इंतजारी के बाद फिर से आलमारी मे चली जाती हैं।
आज किताबो पर विचार करते समय बरबस ही गुलजार साहब की कविता याद आ गई, जो आज मेरी अपनी पीड़ा है।)

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,
बड़ी हसरत से तकती हैं.......
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं !
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं,
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्प्यूटर के पर्दों पर,
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें,
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है !
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं,
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है !
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं,
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़,
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते !
जबां पर जो ज़ायका आता था सफ़ा पलटने का,
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है !
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है,
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे,
कभी गोदी में लेते थे,
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर,
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से !
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी,
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल,
और महके हुए रुक्के,
किताबें मँगाने, गिरने-उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे,
उनका क्या होगा..............
वो शायद अब नहीं होंगे !!
                                     -  गुलज़ार

रविवार, 28 अगस्त 2016

एक अप्रसंगिक कहानी

एक अप्रसंगिक कहानी

गली मे एक परकटी पतंग के लिये दो बच्चे काफिर व सज्जन आपस मेे लड़ रहे थे, सज्जन का तर्क  था कि पतंग मेरी है पर काफिर का मानना था कि अब सज्जन यहॉ नही रहता तो पतंग उसकी क्यो होगी? काफिर जो शकल व अकल से ही काईयॉ दिख रहा था एकाएक भाग कर गली के मोड़ पर अपने घर मे घुस गया और छत पर चढ़ के तीन चार ईंटे सज्जन पर चला दिया। सज्जन को काफी चोटें आई उसका सिर फट गया वह भाग कर बचने को पेड़ के पीछे छिप गया। वह भी काफिर को सबक सिखाना चाहता था पर उसे मौका नही मिल रहा था। एकाएक उसे अपने कमर मे खोंसे गुलेल की याद आई। बस फिर क्या था उसने पेड़ की आड़ से मौका पाते ही छत पर से झॉक रहे काफिर पर निसाना साधा और गुलेल की कंकड़ी सीधे काफिर के बॉयी ऑख से जरा सी नीचे लगी। काफिर के समझ मे आ गया कि चोट क्या होती है?
पर यह क्या ? काफिर के बुक्का फोड़ कर रोते ही उसके घर वाले आ के सज्जन को बुरा भला कहने लगे। उनके पक्ष मे कुछ सेकूलर मीडिया चैनल भी आ गये। और तो और  दूसरे गॉव मोहल्ले के लोग जिन्होने कभी ये गली देखी भी नही थी, न ही उन्हे झगड़े का कारण पता था वे भी काफिर के लिये अपना माथा पीटने लगे, उनके साथ की महिलाये अपना सिंधूर पोछ पोछ के सज्जन के गुलेल पर सवाल उठाते हुये अपना विधवा प्रलाप करने लगी। दूसरे गॉव के सरपंच ने सवाल उठाया कि इस गॉव व गली मे गुलेल जैसे खतरनाक खिलौने बिल्कुल प्रतिबंधित होने चाहिये। बेचारा सज्जन सोच रहा था कि अगर उसके मॉ बाप को काफिर के खानदान के लोगो ने यह गली छोड़ने को मजबूर नही किया होता तो आज उसके तरफ से भी को ई बोलने वाला होता। वह इन सभी शकलो को पहचान रहा था, इनमे से तब कोई भी सज्जन के परिवार के बेदखली पर बोल नही रहा था। तब इन सेकूलर चैनलो व रांडपन व विधवा प्रलाप कर रही महिलाओ व अपने को गमजदा दिखा रहे मानवाधिकार वादी भी नही दिखे थे।
बहरहाल बात बच्चो के गाली से शुरू हुई गली से निकलते हुये अदालत तक जा पहुँची। फिर मानवाधिकारवादियों ने सज्जन के गुलेल जैसे खतरनाक हथियार को गॉव की उस गली मे प्रतिबँधित करने हेतु सबसे बड़े अदालत मे सवाल उठाय। अर्जी डाली।
सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दिया कि भले सज्जन काफिर के फेके गये ईंट पत्थर से मर गया होता पर उसे गुलेल जैसे खतरनाक खिलौने से काफिर की बॉयी ऑख पर निसाना बिलकुल नही साधना चाहिये , उसे इस सेकूलर देश की न्याय व्यवस्था मानवाधिकार के हित मे ऐसे किसी किस्म के खिलौने से खेलने की अनुमति नही दी जा सकती।
नन्हा सज्जन बेचारा हैरान परेशान है उसका गुलेल छीन लिया गया है। उसे नही मालूम कि मानवाधिकार क्या है, सेकूलरिज्म क्या है? काफिर को जरा सा चोट लगते ही दूसरी गली मोहल्ले मे रहने वाले सच से अनजाने लोग क्यो कुकुर की तरह भौ भौ और सियार की तरह हुऑ हुऑ क्यो करने लगते है? और देश की अदालत कभी उसके बारे मे क्यो नही सोचती बल्कि सियारो की हुऑ हुऑ सुन मरते हुये लाशो पर गिद्घ की तरह मडराते हुये केवल सड़ॉध ही क्यो सूँघ पाते है।

कहानी अब बदल रही है, सज्जन भी अब इसके पीछे की राजनीति समझने लगा है क्योकि जंगल के पार से कहीं कोने मे बसे सताये लोगो की मिली जुली आवाजे उसे सुनाई पड़ने लगी है। सज्जन को भरोसा हो रहा है कि अब इन नासपीटे कुकुरो के सेकूलरी भौभौ व मानवाधिकारनवादी विधवा प्रलाप कर रहे सियारो के हुऑ हुऑ से उसकी आवाज देर तक नही दबाई जा सकती भले ही फारेन फंडो पर पलने वाले चारित्रिक भ्रष्ट मीडिया वाले इस सियापे मे  ऱूदाली क्रंदन करते रहें।
             - व्योमेश चित्रवंश, 28 अगस्त 2016