रविवार, 14 सितंबर 2008

व्योमेश की कविताये : शिवपुर संवासिनी काण्ड


ओ मम्मी
पनपा था एक रिश्ता हम दोनों के बीच ,
नही था वह खून का ,मुंह बोला ही सही ,
पर तुने कर डाला उस रिश्ते का खून ,
कलंकित ऐसा कि सडांध आती है
नाम लेते हुए भी उस रिश्ते की ,
तुने ये भी नही सोचा की यदि तेरी बेटी होती
तो वह भी होती मेरी ही उमर की,
जाने कितनी बार बांटा होता तुमने उससे उसकी बातो को ,
कितनी बार बनी होती तुम उसकी माँ से बढ़ कर सहेली
तूने तो उस के बदले सौदा कर डाला हमारा ,
अपने उन ढेर सारे सफेदपोश दोस्तों के संग
जो साँझ ढले आ जाते थे तुम्हारे आलिशान दफ्तर में,
उनसे भी रखवाया था रिश्ता तुमने चाचा,भाई और ताऊ का ,
हर शाम हो जाती थी तुम्हारी हथेलियाँ गर्म,
कड़े नए नोटों से,
जिन पर बापू की फोटो होती थी,
पर सहना पड़ता था जलालत हमे
तुम्हारे उन्ही दोस्तों के साथ,
जो दिन में होते थे हमारे चाचा, भइया, ताऊ
मम्मी,
तुम जो आज छिपा रही हो अपना चेहरा,
लोगो की निगाहों से,
नही छुपाना पड़ता तुम्हे उसे ,
यदि एक बार भी सोचा होता
हम भी बेटी है किसी माँ के
तुम्हारे जैसे.


( यह कविता वर्ष 2000 मे वाराणसी के चर्चित शिवपुर संवासिनी गृह काण्ड पर लिखी गई थी जो गुड़िया, दैनिक जागऱण, व पहरूआ के साथ अन्य कई पत्र पत्रिकाओं मे प्रकाशित हुई थी।)


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