मंगलवार, 31 जुलाई 2018

व्योमवार्ता /एक महान बनारसी प्रेमचंद जी को उनके जन्मदिन पर नमन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी ,

व्योमवार्ता /एक महान बनारसी को उनके जन्मदिन पर नमन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी , 31 जुलाई 2018, मंगलवार।

प्रेमचंद के फटे जूते- परसाई जी

            प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियाँ उभर आई हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं।

पाँवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं।

दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।

मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ—फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी—इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है।

मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फोटोग्राफर ने जब ‘रेडी-प्लीज़’ कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुसकान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुसकान को धीरे-धीरे खींचकर उपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही ‘क्लिक’ करके फोटोग्राफर ने ‘थैंक यू’ कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुसकान। यह मुसकान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है!

यह कैसा आदमी है, जो खुद तो फटे जूते पहने फोटो खिचा रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है!

फोटो ही खिचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते, या न खिचाते। फोटो न खिचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, ‘अच्छा, चल भई’ कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी ‘ट्रेजडी’ है कि आदमी के पास फोटो खिचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है।

तुम फोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फोटो खिचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं। और माँगे की मोटर से बारात निकालते हैं। फोटो खिचाने के लिए तो बीवी तक माँग ली जाती है, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम फोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए! गंदे-से-गंदे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है!

टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस ज़माने में भी पाँच रुपये से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास-सम्राट, युग-प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फोटो में भी तुम्हारा जूता फटा हुआ है!

मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों उपर से अच्छा दिखता है। अँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला फट गया है। अँगूठा ज़मीन से घिसता है और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्षित है। मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम परदे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं!

तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फोटो तो ज़िंदगी भर इस तरह नहीं खिचाउँ, चाहे कोई जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे।

तुम्हारी यह व्यंग्य-मुसकान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुसकान है यह?

—क्या होरी का गोदान हो गया?

—क्या पूस की रात में नीलगाय हलकू का खेत चर गई?

—क्या सुजान भगत का लड़का मर गया; क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?

नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कफ़न के चंदे की शराब पी गया। वही मुसकान मालूम होती है।

मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक?

क्या बहुत चक्कर काटते रहे?

क्या बनिये के तगादे से बचने के लिए मील-दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे?

चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं है, घिस जाता है। कुंभनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा- ‘आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।’

और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा था—‘जिनके देखे दुख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!’

चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?

मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज़ को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आज़माया।

तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।

तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमज़ोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम-धरम’ वाली कमज़ोरी? ‘नेम-धरम’ उसकी भी ज़ंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुसकरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम-धरम’ तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी!

तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?

तुम क्या उसकी तरफ़ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?

मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य-मुसकान भी समझता हूँ।

तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो, उन पर जो अँगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो—मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आई, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे?

मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ, तुम्हारी व्यंग्य-मुसकान समझता हूँ!एक महान बनारसी को उनके जन्मदिन पर नमन।

प्रेमचंद के फटे जूते- परसाई जी

#प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुरता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियाँ उभर आई हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं।

पाँवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं।

दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।

मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ—फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी—इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है।

मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फोटोग्राफर ने जब ‘रेडी-प्लीज़’ कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुसकान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुसकान को धीरे-धीरे खींचकर उपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही ‘क्लिक’ करके फोटोग्राफर ने ‘थैंक यू’ कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुसकान। यह मुसकान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है!

यह कैसा आदमी है, जो खुद तो फटे जूते पहने फोटो खिचा रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है!

फोटो ही खिचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते, या न खिचाते। फोटो न खिचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, ‘अच्छा, चल भई’ कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी ‘ट्रेजडी’ है कि आदमी के पास फोटो खिचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है।

तुम फोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फोटो खिचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं। और माँगे की मोटर से बारात निकालते हैं। फोटो खिचाने के लिए तो बीवी तक माँग ली जाती है, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम फोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए! गंदे-से-गंदे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है!

टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस ज़माने में भी पाँच रुपये से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास-सम्राट, युग-प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फोटो में भी तुम्हारा जूता फटा हुआ है!

मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों उपर से अच्छा दिखता है। अँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला फट गया है। अँगूठा ज़मीन से घिसता है और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्षित है। मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम परदे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं!

तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फोटो तो ज़िंदगी भर इस तरह नहीं खिचाउँ, चाहे कोई जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे।

तुम्हारी यह व्यंग्य-मुसकान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुसकान है यह?

—क्या होरी का गोदान हो गया?

—क्या पूस की रात में नीलगाय हलकू का खेत चर गई?

—क्या सुजान भगत का लड़का मर गया; क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?

नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कफ़न के चंदे की शराब पी गया। वही मुसकान मालूम होती है।

मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक?

क्या बहुत चक्कर काटते रहे?

क्या बनिये के तगादे से बचने के लिए मील-दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे?

चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं है, घिस जाता है। कुंभनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा- ‘आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।’

और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा था—‘जिनके देखे दुख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!’

चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?

मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज़ को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आज़माया।

तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।

तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमज़ोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम-धरम’ वाली कमज़ोरी? ‘नेम-धरम’ उसकी भी ज़ंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुसकरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम-धरम’ तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी!

तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?

तुम क्या उसकी तरफ़ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?

मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य-मुसकान भी समझता हूँ।

तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो, उन पर जो अँगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो—मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आई, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे?

मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ, तुम्हारी व्यंग्य-मुसकान समझता हूँ!
(बनारस, 31 जुलाई 2018, मंगलवार )
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मंगलवार, 24 जुलाई 2018

व्योमवार्ता/ एम्स मे आपरेशन की तारीख मिली 17जनवरी 2024, क्या हम चिकित्सा सेवा मे संवेदनशील नही हो सकते :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24जुलाई 2017, मंगलवार

व्योमवार्ता/ एम्स मे आपरेशन की तारीख मिली 17जनवरी 2024, क्या हम चिकित्सा सेवा मे संवेदनशील नही हो सकते :व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24जुलाई 2017, मंगलवार

आज सुबह सुबह दैनिक जागरण के मुखपृष्ठ पर एक खबर पढ़ा कि काशी के अंकित को आपरेशन के लिये मिली 2024 की डेट. मै अंकित को नही जानता, आप भी नही जानते होगें. अंकित 13साल का बच्चा है, उसके दिल मे छेद है, शायद हर्ट का एक वाल्व भी खराब है,उसके पिता दौलतपुर के रहने वाले बेलदार है, बीएचयू द्वारा रेफर किये जाने के बाद जब वे हृदय के आपरेशन के लिये एम्स दिल्ली गये तो छह माह तक ओपीडी व जॉच कार्यवाही के बाद उसके आपरेशन के लिये तारीख दी गई 17जनवरी 2024. अंकित को अभी समय के प्रतीक्षा का अनुभव नही पर उसके पिता को है, वे हताश है साथ ही निराश भी, उन्हे नही मतलब कि सन 24 तक क्या होगा? पता नही गंगा साफ भी हो पायेगीं कि नही? पता नही बनारस स्मार्ट सिटी बन पायेगा कि नही, पता नही राहुल गांधी अविश्वास प्रस्ताव ले कर आने की स्थिति मे होगे या नही, उसे तो अपने बेटे अंकित की चिंता है,
कब इस देश मे हम मेडिकल ईमरजेंसी की बढ़ियॉ और त्वरित सुविधायें दे सकेगें यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शिक्षा, आवास ,रोजगार जैसे बाकी बुनियादी जरूरतें.
आज अंकित के बारे मे सोचते हुये दो साल पहले एक मित्र द्वारा बताई व देखी गयी एम्स की ही एक घटना याद आ गई, मन अभी तक सोच कर उदास हो जाता है.
एक बाप स्ट्रेचर पर तडपते हुए अपने बेटे को दिलासा दिला रहा था कि
"बेटा मैं हूँ न ,
सब ठीक हो जाएगा
बस तुम्हारी MRI होना बाकी है
फिर डॉक्टर तुम्हारा इलाज शुरू कर ,
वो बदकिस्मत बाप अपनी बात पूरी कर पाता उस से पहले ही स्ट्रेचर पर पड़े उसके बेटे को एक भयानक दौरा पड़ा
बात बीच में छोड़ कर वो उसकी पीठ पर थप्पी मारने लगा
अपने इक्लोते बेटे को यूँ तडपते हुए देख उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे।
6 फिट लम्बाई
लम्बा चोडा शरीर था उसका
लेकिन अपने बेटे की दुर्दशा देख उसका सारा पोरुष पिघल गया।
बच्चो की माफिक रोने लगा।
उसे उम्मीद थी कि जल्द उसके बेटे की MRI हो जायेगी।
फिर उसको हुई बिमारी का पता चल जाएगा
और उसका काम हो जाएगा।
होगा क्यों नहीं ?
देश के सबसे बड़े अस्पताल में जो आया था
सारी उम्मीद लेकर आया था।
लेकिन पिछले 1 घंटे से उसका नंबर न आया।
आता भी कैसे ?
अन्दर पहले से MRI करवाने वालो की भीड़ जो थी।
एक MRI में करीब आधा घंटा लगता है।
और 50 संवेदनहीन लोग उस से पहले लाइन लगा के बेठे थे।
और मशीन 24 घंटे चलती तब भी उसका नंबर शायद 2वे दिन आता।
देश का सबसे बड़ा अस्पताल !!
देश के नामी गिरामी विशेषज्ञों से लेस अस्पताल !!
क्या यही हमारी चिकित्सा व्यवस्थायें हैं आज हम 21वीं सदी में हैं
हमारी GDP की रफ़्तार सभी देशो को मात दे रही है।
हमने सबसे सस्ता मंगल यान अन्तरिक्ष में भेज दिया।
हर महीने हर सप्ताह हमारा इसरो नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।
हमें न्युक्लिर मिसाइल ग्रुप की सदस्यता मिलने वाली है।
हम तेजस जैसे हलके लड़ाकू विमान बना रहे हैं।
पंडूबियाँ बना रहे हैं।
लेकिन हमारे अस्पतालों में Xray मशीन नहीं हैं
MRI मशीन नहीं हैं।
होंगी भी कैसे ?
यहाँ MRI मशीन बनाने की तकनीक है ही नहीं
न ही उसके खराब होने पर उसे सुधारने की कोई तकनीक है।
आपको बता दूँ एक उम्दा गुणवत्ता की MRI मशीन करीब 1 करोड़ की आती है और ये चीन जापान कोरिया जैसे देशो से आयात की जाती हैं खराब होने पर या तो मशीन चाइना जायेगी या वहां से टीम यहाँ आएगी इसकी मरम्मत का खर्च लगभग लाखो में आएगा।
अब ये जानकर आपको अमृतानंद की अनुभूति होगी कि 3600 करोड़ की शिवाजी की मूर्ती और लगभग 2100 करोड़ की सरदार पटेल की मूर्ति क्रमश: मुंबई और गुजरात में बन रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है ये दोनों हमारे गौरव थे हैं सदा रहेंगे।इनका मोल इन पैसो से कहीं बढ़कर था।
लेकिन ये भी होते तो कहते कि"अस्पताल बनाओ जरुरी व्यवस्था उपलब्ध कराओ।
उनकी जरुरत की चीजे बनाओ।"
ज्यादा दूर न जाकर नजदीक आते हैं
मेट्रो के अगले चरण में कुल 4 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। और ये उक्त सभी प्रोजेक्ट अपनी अपनी जगह ठीक हैं। लेकिन प्राथमिकताए जैसे रोटी कपडा मकान स्वस्थ्य पीने का पानी ये तो पूरी हों। सबसे बड़े अस्पताल में कम से कम 10 MRI मशीन हो जाए तो किसका क्या बिगड़ जाएगा ?
मेक इन इंडिया के तहत यहाँ ऐसी जरुरत की चीजे बनने सुधरने लगेंगी तो किसका क्या बिगड़ जाएगा ?
लेकिन नहीं !!
हमें सबसे ज्यादा जरुरत अभी 36 राफेल लड़ाकू विमानों की है
जिनकी कीमत करीब 36000 करोड़ है
आखिर में वो बिलखता हुआ बाप स्ट्रेचर पे लेटे हुए अपने बच्चे को रोते हुए बाहर ले गया।
शायद हिम्मत टूट गयी थी उसकी
या उस बच्चे की साँसे !
लेकिन रोज मोत देखने वाले अस्पताल की संवेदनाये तो मर चुकी थी
उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि कोई मरे या जिए
आज दान की जरूरत मंदिरो से ज्यादा अस्पतालों को है ,
पर क्या हमारी प्राथमिकता मे अस्पताल और चिकित्सकीय सुविधाये क्या प्रथम सोपान पर ऱखे जायेगें ?
(बनारस, 24 जुलाई 2018, मंगलवार)
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गुरुवार, 12 जुलाई 2018

व्योमवार्ता / रोजगार चाहिये या सरकारी नौकरी??: व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 15अक्टूबर 2018,सोमवार

रोजगार चाहिये या सरकारी नौकरी??

देश मे कहीं भी चले जाओ , किसी भी सड़क पे ।
काम लगा है । पुरानी सड़क चौड़ी हो रही है , नई सड़क बन रही है , 2 Lane वाली 4 lane हो रही है । नए Expressway बनाये जा रहे हैं ।शहरों में flyover बन रहे हैं ।

शायद ही कोई रेलवे स्टेशन ऐसा होगा जहां काम न लगा हो । नई रेलवे लाइनें बिछ रही हैं । जो single Track थे उनको Double और Electrify किया जा रहा है ........ देश मे 4 तो नए DFC बोले तो Dedicated Freight Corridor बोले तो वो नई रेल लाइन बनाई जा रही हैं जिनपे सिर्फ मालगाड़ियां दौड़ेंगी ........
देश की जितनी भी Unmanned Railway Crossing बोले तो मानव रहित रेलवे फाटक थे उनके नीचे से अंडरपास बनाये जा रहे हैं ।
100 से ज़्यादा शहरों में तो स्मार्ट सिटी का ही निर्माण कार्य चल रहा है ।
नमामि गंगे में ही गंगा और उनकी सभी सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों में य्ये बड़े बड़े गहरे सीवर पाइप लाइन बिछा के Sewage Treatment Plant बनाये जा रहे हैं ........ बनारस का Sewage Treatment Plant बनारस से 30 Km दूर 30 एकड़ जमीन पे बनाया जा रहा है । पूरे बनारस शहर का Sewage वहां पाइप लाइन से जाएगा और ट्रीट हो के उस पानी को कृषि कार्यों में उपयोग होगा ....... ये सैकड़ों करोड़ का प्रोजेक्ट है और ऐसे ही Sewage Treatment Plants लगभग हर शहर कस्बे में बन रहे हैं ...........
भारत माला , सागर माला जैसे वृहद प्रोजेक्ट्स पे कार्य चल रहा है ।
Bullet Train प्रोजेक्ट पे काम चल रहा है ।
देश मे 1000 से ज़्यादा Airports और हवाई पट्टी अपग्रेड की जा रही हैं ।
देश मे 5 करोड़ शौचालय और 1 करोड़ मकान बन गए प्रधान मंत्री आवास योजना में ............. ये जो मैंने काम गिनाए ये देश मे समानांतर चल रहे कुल बिकास / निर्माण कार्यों का 1% भी नही है .......
गांव गिरांव में आ के देखिये , एक जेसीबी खाली नही है ......... सब किसी न किसी हाईवे निर्माण में लगी है ..........

अब मेरे को ये समझ नही आ रहा कि ये जो देश भर में इतना निर्माण कार्य चल रहा है ये बना कौन रहा है ? ये सब काम कर कौन रहा है ........ अलादीन का जिन्न या Santa Clause ?
कांग्रेसी और रविश कुमार रूपी मीडिया कहता है कि सरकार रोज़गार देने में विफल रही .......... आखिर ये सब निर्माण कार्य करने वाले कामगार जापान सिंगापुर से आये ?
सड़क पे काम मे लगी जेसीबी कौन चला रहा है ? अडानी या अम्बानी ?????

रोज़गार कहते किसे हैं ?
लोगों को रोजगार चाहिए या सरकारी नौकरी ???????
(बनारस,15अक्टूबर 2018, सोमवार)
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रविवार, 8 जुलाई 2018

व्योमवार्ता / कैप्टन विक्रम बत्रा का बलिदान दिवस : व्योमेश चित्रवंश की डायरी

कैप्टन विक्रम वर्मा का बलिदान  दिवस /व्योमवार्ता : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,  07जुलाई 2018,
             मैं या तो जीत का भारतीय तिरंगा लहराकर लौटूँगा या उसमें लिपटा हुआ आऊँगा, पर इतना निश्चित है कि मैं आऊँगा जरूर।'
       कैप्टन बत्रा ने अपने साथी को यह कहकर किनारे धकेल दिया कि तुम्हें अपने परिवार की देखभाल करनी है और अपने सीने पर गोलियाँ झेल गए।
कैप्टन बत्रा आज ही के दिन अर्थात 7 जुलाई, 1999 को कारगिल युद्ध में अपने देश के लिए लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। बेहद कठिन चुनौतियों और दुर्गम इलाके के बावजूद, विक्रम ने असाधारण व्यक्तिगत वीरता तथा नेतृत्व का परिचय देते हुए पॉइंट 5140 और 4875 पर फिर से कब्जा जमाया।
हिमालय की बर्फीली चोटियों पर लड़ी गयी दहकती कारगिल जंग के नामी योद्धा और आज राष्ट्रभक्त युवाओं के हीरो बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा का आज अर्थात 7 जुलाई को बलिदान दिवस है।
इस परमवीर का जन्म 9 सितंबर 1974 को देवभूमि हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। कारगिल विजय के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा की जांबाजी के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे। हम सभी देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले उस हीरो की जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं को जानना चाहते हैं। 1997 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से नौकरी की कॉल आई लेकिन उन्होंने यह नौकरी छोड़ लेफ्टिनेंट की नौकरी को चुना। पालमपुर में जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म दिया। उन्होंने दोनों का नाम लव-कुश रखा. लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल।
विक्रम का एडमिशन पहले डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में करवाया। पर सेना छावनी में स्कूल होने से सेना के अनुशासन को देख और पिता से देश प्रेम की कहानियां सुनने पर विक्रम में स्कूल के समय से ही देश प्रेम जाग उठा। विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। जुलाई, 1996 में उन्होंने भारतीय सेना अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। दिसंबर 1997 में शिक्षा समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली।
उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। 1 जून, 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को कैप्टन बना दिया गया।
इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून, 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। कारगिल वॉर में 13 जेएके राइफल्‍स के ऑफिसर कैप्‍टन विक्रम बत्रा के साथियों की मानें तो कैप्‍टन बत्रा युद्ध मैदान में रणनीति का एक ऐसा योद्धा था जो अपने दुश्‍मनों को अपनी चाल से मात दे सकता था। यह कैप्‍टन बत्रा की अगुवाई में उनकी डेल्‍टा कंपनी ने कारगिल वॉर के समय प्‍वाइंट 5140, प्‍वाइंट 4750 और प्‍वाइंट 4875 को दुश्‍मन के कब्‍जे से छुड़ाने में अहम भूमिका अदा की थी।
बत्रा 7 जुलाई 1999 को इस मिशन के शुरुआती घंटों में दुश्मन के जवाबी हमले के दौरान घायल हुए एक अधिकारी को बचाने के प्रयास में भारतीय सेना की एक टुकड़ी का कमान संभाले हुए थे।
ऐसा कहा जाता है कि इस बचाव कार्य के दौरान उन्होंने घायल अधिकारी को सुरक्षित पोज़िशन पर धकेलते हुए यह कहा था कि "तुम्हारे बच्चे हैं, तुम एक तरफ हट जाओ"। कैप्टन बत्रा को अपने मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए तो जाना ही जाता है। साथ ही युद्ध के दौरान उनके द्वारा दिया गया नारा "ये दिल मांगे मोर" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 19 जून, 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने दुश्मन के नाक के नीचे से 5140 प्वाइंट पर क़ब्ज़ा कायम करने में सफल हुई थी। 5140 प्वाइंट पर क़ब्ज़ा करने के बाद कैप्टन बत्रा ने स्वेच्छा से अगले मिशन के रूप में 4875 प्वाइंट पर भी क़ब्ज़ा करने निर्णय लिया था।
यह प्वाइंट समुद्र स्तर से 17,000 फुट की उँचाई पर और 80 डिग्री सीधी खड़ी चोटी पर है। आज ही के दिन अर्थात सात जुलाई 1999 को प्‍वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्‍मनों को कैप्‍टन बत्रा ने मार गिराया लेकिन इसके साथ ही तड़के अपने घायल साथियों को इलाज़ के लिए ले जाते समय दुश्मन की एक गोली इस वीर को लगी और ये सदा सदा के लिए अमर हो गये ..बलिदान के उपरान्त इन्हें योद्धा के सर्वोच्च मेडल परमवीर चक्र दिया गया।
आज शौर्य की उस महान हुंकार को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन करते हुए भारतीय सेना के इस परमवीर की गौरवगाथा को सदा सदा के लिए गाते रहने का संकल्प कृतज्ञ राष्ट्र  लेता है।
      विक्रम बत्रा अमर रहें .. जय हिन्द की सेना।
(बनारस, 07जुलाई,2018, रविवार)
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