कितना सुखमय होता है
बन्दानो से मुक्त होना
तोड़ना बेडियों का
स्वयं पे किशी के अधीनता का
स्वस्थ्य के लिए लाभप्रद
खुली हवा में साँस लेना
बंद कमरों की सडांध से निकल कर
कितनी मीठी होती है स्वंत्रता से
स्वयं की कमी
जो हाथ से मेहनत कर कमी गई हो
बजे आप को बंधक कर के
रखने के एवज में
कितना संतोष मिलता है
कागज के सफ़ेद सल्फो पर
कलि सतरों के बीच उभरती
अपनी कविताओ को देखना
बल्कि इन सबसे उपर
सबसे सुखद ,शांतिपूर्ण,गरिमामय होती है
ख़ुद की मर्जी
ख़ुद का निर्णय और
अपनी आजादी
जहाँ किसी का जोर नही
किसी का बोझ नही
बस मई और मेरी कविता
कविता लिखती कालम
आजादी से स्याही उगलती हुई.
अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे.
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गुरुवार, 11 सितंबर 2008
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