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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बनारस / काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....... व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....

                                                                  *व्योमेश चित्रवंश
                    
             मोक्ष नगरी काशी के बारे में कहा जाता है कि यहां देह त्यागने वाली आत्मा को मोक्ष मिल जाता है। जिसकी मृत्यु काशी के बाहर होती है उसका महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से भी उसे मुक्ति मिल जाती है। काशी में एक तीर्थ ऐसा भी है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां प्रेत आत्माओं को मुक्ति मिलती है। यह तीर्थ पिशाच मोचन कुंड के नाम से विख्यात है। कुंड के महत्व के बारे में यहां के पुरोहितों का कहना है कि यह कुंड मां गंगा के पृथ्वी पर आने से पहले का है। और पितृ पक्ष में यहां प्रतों का मेला लगता है। साथ ही यहां पितरों के साथ ही प्रेत आत्माओं को भी मुक्ति मिलती है। इसके लिए यहां त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराए जाते है।
मृत्यु को भी उत्सव मानने वाले  मोक्ष की नगरी काशी का पिशाच मोचन कुंड  रहस्यमय पौराणिक स्थल कहा जाता है. यह कोई साधारण जलकुंड नहीं, बल्कि आत्माओं के उद्धार का केंद्र है. कहा जाता है कि जो आत्माएं अकाल मृत्यु का शिकार होती है या जो अधूरी इच्छाओं के साथ इस संसार से जाती हैं, वे भटकती रहती हैं. गीता में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा अजर है, अमर है. “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...” लेकिन अकाल मृत्यु होने वाले इंसान की आत्मा सालों भटकती रहती है. बाबा श्री काशी विश्वनाथ के त्रिशूल पर टिकी नगरी में भटकती आत्मा को भी यहां मोक्ष मिल जाता है. गरुण पुराण के काशी खंड में भी  पिशाच मोचन कुंड का उल्लेख मिलता है, जहां पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है. मान्यता है कि यहां पर आत्माओं का उधार भी चुकाया जाता है
काशी खंड के अनुसार पिशाच कुंड को मूल रूप से “विमल तीर्थ व विमलोदक तीर्थ” के नाम से जाना जाता है। कपर्दि नामक एक शिव गण ने एक जल निकाय- “विमल तीर्थ” बनाया और इस स्थान पर शिव की पूजा की, जिससे कपर्दीश्वर महादेव अस्तित्व में आए। समय के साथ, यह स्थान तपस्या के लिए एक स्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया। भगवान कपर्दीश्वर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर, खोपड़ियों से सुसज्जित द्वार और ब्रह्म को समर्पित विभिन्न छोटे मंदिरों के साथ एक जलाशय का शांत वातावरण, आपको अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना के समय में स्वागत करता है, जो निषिद्ध अवस्था से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे काशी के हृदय में प्रवेश करके मोक्ष प्राप्त कर सके।कथा है कि एक बार एक पाशुपत ऋषि विमल तीर्थ के तट पर ध्यान कर रहे थे, अचानक एक पिशाच जो एक ब्राह्मण था, और अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण पिशाच (भूत) योनि को प्राप्त कर गया। पहले तो उसने ऋषि वाल्मीकि को डराने की कोशिश की लेकिन बहुत प्रयास के बाद, उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे मुक्ति मांगी। ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा। इस प्रकार पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली तब से पिशाच मोचन तीर्थ बिहार के गया के अतिरिक्त पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए एक प्रसिद्ध स्थान बन गया। हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पितृलोक में निवास करती है – स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का क्षेत्र, जो यम "मृत्यु के देवता" द्वारा शासित है। पूर्वजों की तीन पीढ़ियाँ पितृलोक में रहती हैं और पितृ पक्ष (भाद्रपद का चंद्र महीना) के दौरान पृथ्वी का दौरा करती हैं ताकि उन्हें अपने वंश से जल, तर्पण मिल सके। अगर उन्हें यह मिल जाता है, तो उन्हें मुक्ति मिल जाती है लेकिन अगर उन्हें तर्पण नहीं मिलता है, तो उन्हें पुनर्जन्म की सजा मिलती है। जब अगली पीढ़ी का व्यक्ति मर जाता है, तो पहली पीढ़ी स्वर्ग चली जाती है और कर्म और उपरोक्त कारण के आधार पर मोक्ष/पुनर्जन्म प्राप्त करती है। इसीलिए सह्रद कर्मकांड पूर्वजों की केवल तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है। यदि पितरों की परेशान आत्माएं पितृलोक में खुश नहीं हैं तो उनका प्रभाव पृथ्वी पर उनके प्रियजनों पर पड़ता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अनुष्ठानों की एक श्रृंखला में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा शामिल है, जिन्हें क्रमशः सफेद, पीले और काले कपड़े के मिट्टी के पानी के बर्तन- कलश द्वारा दर्शाया जाता है ताकि वे पूर्वजों को मुक्ति दे सकें। पितृपक्ष के महीने में पिशाच कुंड इन अनुष्ठानों के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है और दुनिया भर से लोग अपने प्रियजनों को मुक्ति दिलाने के लिए इस स्थान पर आते हैं। कुंड के आस-पास का पूरा इलाका सफेद कपड़े पहने और मुंडा सिर वाले लोगों की भारी भीड़ को देखता है जो ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गया के बाद पिशाच मोचन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ ऐसी पूजा की जा सकती है जो पूर्वजों के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है। गरुण पुराण में भी इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। इस जगह से जुड़ी किंवदंती के कारण यह जगह बहुत ही अजीबोगरीब माहौल देती है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अनगिनत कीलें लगी हुई हैं, कुछ पर सिक्के लगे हुए हैं और कई लोगों की तस्वीरें हैं, जिनकी शायद असामयिक मृत्यु हुई हो। एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि यह किसी परेशान आत्मा के लिए अंतिम उपाय है, हो सकता है कि यह अंधविश्वास हो या वास्तविकता, यह किसी की आस्था पर निर्भर करता है। मुख्य मंदिर परिसर एक कुंड के किनारे स्थित है, आप कपरदीश्वर महादेव के साथ-साथ कपरदी विनायक (मंदिर पंचक्रोशी यात्रा के अंतर्गत भी आता है) के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर के ठीक बगल में भगवान हनुमान और विष्णु के साथ ब्रह्म की एक छोटी सी जटिल मूर्ति की पूजा की जाती है। पास ही वाल्मीकि टीला पर पिशाचेश्वर महादेव और ऋषि वाल्मीकि का मंदिर है। कुंड के आसपास के क्षेत्र में पंडा/ब्राह्मण द्वारा संचालित कई छोटे मंदिर हैं, जिनके अपने-अपने ईष्टदेव हैं। पास में एक अखाड़ा है, यह एक शांतिपूर्ण परिसर है जिसमें छोटे मंदिर और चित्रकूट रामलीला के लिए समर्पित स्थान हैं, जिसे मेघा भगत “गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य” द्वारा शुरू किया गया था।
पिशाच मोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि यह रामा अवतार के पहले की बात है। जब पृथ्वी पर गंगा अवतरित नहीं हुई थी उससे पहले का यह सरोवर है। यह विमलोदत्त तीर्थ है। यहां पूरे भारत वर्ष से लोग आते है। जो भी प्रेत योनि से पीड़ित है उसे यहां मुक्ति मिल जाती है। वह कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि रामा अवतार के समय पिशाच नाम का एक ब्राम्हण था। जो दान नहीं देता था। वह सिर्फ लोगों से दान लिया करता था। और इतना दान ले लिया कि उसकी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी। एकबार जब वाल्मीकि जी कुंड पर पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण यहां पहुंचे और उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि महराज मेरी आत्मा को शांति नहीं मिल रही। मेरा भी कल्यण करें। जिसके बाद उन्होंने पिशाच ब्राम्हण को तालाब में नहाने के लिए बोला। पिचाश ब्राह्मण जैसे ही स्नान के लिए कुंड में उतरे तो पानी भागने लगा। वह एक कदम आगे बढ़ते तो पानी दो कदम पीछे भाग जाता। इसके बाद उन्होंने पानी गिलास में पानी लिया तो वो भी सूख गया।इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वाल्मीकि जी से आग्रह किया कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें। उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने उनसे कहा महाराज उपाय करें नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां भगवान शंकर और विष्णु जी की तपस्या करने को कहा। आखिर में शंकर उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और यहां आए और पिशाच ब्राम्हण से पूछा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे और उनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। साथ ही कुंड के महत्व से एक घटना और जुड़ी हुई है। बताते है कि शंकर जी के बाद गणेश जी यहां एक ज्ञानदस नामक प्रेत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए लेकर आए थे। वह बताते है कि ज्ञानदस को मुक्ति नहीं मिल रही थी। जिसके बाद उन्होंने भगवान गणेश कार्तिकेय जी से मुक्ति के लिए आग्रह किया। तो उन्होंने ज्ञानदस से कहा कि काशी में तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन जब ज्ञानदस काशी पहुंचे तो मां गंगा से उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। आखिर में मां गंगा से प्रार्थना करने के बाद कहा कि उत्तर दिशा में स्थित पिशाच मोचन कुंड पर जाओं वहां तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।तब से प्रेत आत्माओं की मुक्ति, पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पितृ पक्ष में लोग आते है। साथ ही मान्यता है कि पितृ पक्ष में यहा प्रेतों का मेला लगता है। तीर्थ पुरोहित बताते है कि यहां पितृरों, प्रेतों, आकाल मौत से मोक्ष व जो प्रेत परिवार की सुख शांति में बाधक बने हुए उनकी मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराऐ जाते हैं।
त्रिपिंडी श्राद्ध पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का पिंडदान हैं. इस पूजन में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है. मान्यता है कि पूर्वज की असंतुष्ट आत्मा आने वाली पीढ़ियों के सुख में बाधा डालती है. ऐसे में इन आत्माओं को शांत करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है.। “गरुण पुराण के काशीखंड में वर्णित है कि पवित्र गंगा नदी के धरती आगमन से पहले ही पिशाच मोचन कुंड का अस्तित्व था. कुंड के पास पीपल का एक पुराना वृक्ष है और इसी पर भटकती आत्माओं को बैठाया जाता है. उनका ऋण उतारने के लिए वृक्ष पर सिक्का भी बांधा जाता है. इस कर्म से पितरों के सभी उधार उतर जाते हैं और वे बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं. पिशाचमोचन कुंड का पीपल पेड़ मान्यता का साक्षी है। पेड़ में ठोंके गए असंख्य सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्मा का ठिकाना है। 
मान्यता है कि किसी व्यक्ति की अकाल या असामयिक मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है. ऐसे में उन आत्माओं को मोक्ष पिशाच मोचन कुंड दिलाता है. कुंड का नामकरण के पीछे भी कथा है. पिशाच मोचन कुंड का नाम पिशाच नाम के व्यक्ति से पड़ा था, जिसने कई पाप किए थे. हालांकि, इसी जगह पर उसे मोक्ष मिला था. जिनके घर में अकाल मृत्यु होती है, उनके परिजन यहां पर विशेष पूजन, तर्पण करते हैं.। इस कुंड का वर्णन न केवल गरुड़ पुराण बल्कि स्कंद पुराण समेत कई शास्त्रों में मिलता है. यह स्थान सदियों से पितृ-स्मरण, त्रिपिंडी श्राद्ध तथा आत्मिक शांति और मनः चेतना से जुड़ी लोक-आस्थाओं का जीवंत केंद्र रहा है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और स्मृति के बीच संबंधों को समझने का एक अवसर भी है।
घर-परिवार के बुजुर्गों और पुरोहितों की परंपरागत मान्यता के अनुसार यह अनुष्ठान उन जन्मे, पूर्वजन्मे अथवा अजन्मे जीवनों की स्मृति और शांति के लिए किया जाता है, जिनकी उपस्थिति भले ही हमारे जीवन में प्रत्यक्ष न रही हो, लेकिन जिनसे जुड़ी कोई अधूरी कड़ी पीढ़ियों के भीतर कहीं न कहीं गहरे दुख का कारण बनी रह जाती है।
मैं नहीं जानता कि जीवन की हर कठिनाई का संबंध अदृश्य कारणों से होता है या नहीं। न ही मैं हर बात को भय, दोष या चमत्कार के चश्मे से देखता हूँ। लेकिन इतना अवश्य मानता हूँ कि मनुष्य केवल स्वयं कर्ता नहीं होता। वह अपने साथ स्मृतियों, संस्कारों, रिश्तों और अनेक अनकहे इतिहासों को भी साथ लेकर चलता है। कभी-कभी उन अनदेखे संबंधों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना भी एक आध्यात्मिक कर्म बन जाता है। शायद हमारे पूर्वजों ने त्रिपिंडी जैसे श्राद्धों के माध्यम से इसी आध्यात्मिक पक्ष को सहज करने के लिए शुरुआत किया हो..! हमारे लोक और धर्म में पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद के जीवन पर बहुत कुछ लिखा गया है। हमारे पुराणों और उपनिषद् सहित जितने भी आध्यात्मिक ग्रन्थों के टीका और भाष्य मिलते है उतना किसी धर्म में नहीं लिखा गया है..इस परा विज्ञान पर आपके तर्क और संशय के लिए बहुत जगह है..आप पढ़िए और डूब जाइए एक ऐसे संसार में जहाँ अपूर्णता और अतृप्ता के सारे सूत्र आपको पूर्ण तो नहीं करेंगे पर चेतना से जरूर भर देंगे.यह पिशाचमोचन भी आपके वैसे ही अनसुलझे तर्कों को नई दृष्टि देता है जैसा  यहाँ आकर...यहां के शांत सरोवर के किनारे जब आप बैठ कर महसूस किया जा सकता है। तो यही विचार बार-बार मन में आता है वहाँ कोई भय का वातावरण नहीं, न ही ऐसा कुछ जिसमें रहस्य हो ..वहाँ सैकड़ों परिवार जो अपने दिवंगत प्रियजनों की स्मृतियों के साथ उन पिण्डों में अपने पूर्वजों का आह्वान करते हुए.. यहां मंत्रों की गूंज के साथ साथ वहां पूर्वजों की स्मृतियां भी गूंज रही थी, जल में चमकती धूप के बीच जो तरंग उठ रहे थे शायद उसमें हमारे पूर्वजों के आह्वान के बाद का विदा गीत की तरंगें थी जिसपर उन लोगों के चेहरे उभर और मिट रहे थे जो अपने भीतर किसी अधूरे भाव को शांत करने आए थे।
पिशाचमोचन के बारे में प्रचलित मान्यताएँ प्रेतत्व, पितृदोष और आत्माओं की शांति जैसे विषयों से जुड़ी हैं, लेकिन वहाँ बैठकर  इसका एक दूसरा अर्थ भी दिखाई दिया। मुझे लगा कि शायद इस तीर्थ का वास्तविक महत्व किसी अदृश्य भय में नहीं, बल्कि स्मरण की उस संस्कृति में है जिसे भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों से सहेज कर रखा है। आधुनिक जीवन हमें वर्तमान में जीना सिखाता है, लेकिन भारतीय परंपरा हमें यह भी याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अपने पूर्वजों की निरंतरता हैं, अपने परिवार की कहानी का एक अध्याय हैं। संभवतः त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे संस्कार इसी गहरे बोध को अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं।
काशी की महिमा शायद इसी में है कि वह जीवन और मृत्यु को दो अलग-अलग छोरों की तरह नहीं देखती। यहाँ मृत्यु भी स्मरण का विषय है, करुणा का विषय है और अंततः शांति का विषय है। पिशाचमोचन इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की यात्रा केवल देह तक सीमित नहीं है। वह अपने पूर्वजों, अपने परिवार और उन असंख्य स्मृतियों से भी जुड़ा है जिन्होंने उसे गढ़ा है।
काशी, 25सितम्बर2026,शुक्रवार
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रविवार, 20 सितंबर 2026

बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला...../व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला.....                                                                                 *व्योमेश चित्रवंश

पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास काशी में आतिथ्य की उपेक्षा से रुष्ट होकर गंगा के पूर्वी तट पर लोलार्क के आग्नेय कोण में स्थित तपोवन में नई काशी बनाने को उद्यत हुए तब शिवजी ने विनती कर उन्हें रोका तथा आदर के साथ काशीवास की अनुमति प्रदान की। तब से यह स्थान व्यासकाशी नाम से प्रतिष्ठित हुआ तथा कालांतर में रामनगर नाम से जाना गया। आजादी से पूर्व 200 वर्षों तक रामनगर काशी की राजधानी रही। काशी के इस पूर्व राजधानी में होने वाली रामनगर की रामलीला का पूरी दुनिया में अपना एक अलग ही महत्व है। यह रामलीला विश्व में होने वाली सभी रामलीलाओं से अलग एवं अद्वितीय है। विश्वप्रसिद्ध रामलीला रामनगर, जिसे रामायण के नाटकीय प्रस्तुति के रूप में जाना जाता है, यह भारत की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है।रामलीला और रामनगर इस तरह से एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं कि अक्सर ही लोग "रामलीला मंचन की वजह से इस नगर का नाम रामनगर पड़ा होगा " ऐसा मान लेते हैं।
रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग 230 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। वाराणसी में गंगा नदी के समीप स्थित रामनगर में आयोजित होने वाली रामलीला का आयोजन काशी नरेश द्वारा किया जाता है। यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित है। रामनगर की रामलीला का इतिहास बेहद समृद्ध और रोचक है परंतु इसकी शुरुआत कैसे हुई इसकी सटीक जानकारी किसी को भी नहीं पता है। आम जनमानस में रामनगर में रामलीला की शुरुआत को लेकर  कई सारी कथा कहानियां प्रचलित है, परंतु इनमें से दो कथाएं लोगों के बीच सबसे अधिक प्रचलित है। जिसमें पहली कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है की रामलीला की शुरुआत रामनगर से थोड़ी दूर काशी मे होता था जिसका संचालन गोस्वामी तुलसीदास के  समकालीन उनके शिष्य मेधा भगत जी करते थे।उन्होंने आजीवन इस लीला को श्रद्धापूर्वक करवाया, परंतु वृद्धावस्था के कारण उन्होंने तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह से रामलीला को संरक्षण प्रदान करने एवं उसे रामनगर की ओर स्थानांतरित करने का आग्रह किया। परंतु उस समय युवराज बीमार चल रहे थे जिस कारण उस समय महाराज इस कार्य पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे थे। तब मेघा भगत ने कहा कि यदि आप यह कार्य कर लेंगे तो युवराज स्वतः ही स्वस्थ हो जाएंगे और अंत में यही हुआ महाराज ने जैसे ही रामलीला की स्वीकृति दी युवराज भी स्वस्थ हो गए और तभी से रामनगर में रामलीला की शुरुआत हो गई।
एक और ज्यादा प्रचलित दूसरी  कथा है कि रामनगर से पहले यह रामलीला छोटा मिर्जापुर स्थित एक गांव में भोनू साहू और विट्ठल साहू नाम के दो साहूकार भाई करवाते थे। क्योंकि काशी के राजा श्री राम भक्त थे अतः उन्हें रामलीला देखना काफी प्रिय लगता था। वे प्रतिवर्ष नियमित रूप से प्रतिदिन रामलीला देखने जाया करते थे, एवं रामलीला में अपना सहयोग भी दिया करते थे। महाराज के सम्मान में रामलीला उनके आने के पश्चात ही शुरू की जाती थी। एक दिन महाराज को आने में थोड़ी देर हो गई, तो लोगों ने सोचा कि महाराज नहीं आएंगे एवं उस दिन धनुष यज्ञ की लीला बिना महाराज के ही करवा दी गई। महाराज लीला स्थल के लिये निकल पड़े थे परंतु रास्ते में ही उन्हें किसी से पता चला की रामलीला तो शुरू हो चुकी है, यह सुनकर उन्हें काफी दुख हुआ और वे बीच रास्ते से ही लौट आए। उन्होंने उसे दिन से रामलीला में जाना छोड़ दिया। परंतु रामलीला में न जाने के कारण वह काफी उदास भी रहते थे।एक दिन महारानी ने उनसे उनके उदासी का कारण पूछा जहां उन्होंने सारी बातें महारानी जी को बताई। इस पर महारानी जी ने उन्हें तंज कसते हुए कहा कि, जब बिट्ठल और भोनू बनिया होकर रामलीला करवा सकते हैं तो आप महाराज होकर क्यों नहीं करवा सकते? उन्होंने महाराज को रामनगर किले में ही रामलीला करवाने का प्रस्ताव दिया, जिससे महारानी भी रामलीला को देख सकती थी, और रामनगर के किले से शुरू हुई इस रामलीला का विस्तार धीरे-धीरे किले के बाहर तक होने लगा। 
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रामनगर की रामलीला पूर्णत: स्थान भाषा तिथि आदि के शोधोपरान्त प्रारंभ की गई थी एवं उसी शोध के निष्कर्ष व परंपरानुसार आज भी प्रचलित है।रामलीला के शोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी थे। विशुद्धानंद सरस्वती इन्हें अपना गुरु मानते थे। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर ईश्वरी नारायण सिंह ने इनसे मिलकर इनको अपना गुरु बना लिया। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरी नारायण सिंह ने हिंदी के उन्नायक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह और संत काष्ठ जिह्वा स्वामी जी का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त किया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल ,संवाद और मंचन का वैज्ञानिक, व्यावहारिक व यथोक्त ढंग से निर्धारण व शोधन किया। इन तीनों महानुभावों के अतिरिक्त स्वामी महादेव आश्रम, गायघाट के स्वामी जी, तुलसी दत्त झा, पंडित मथुरानाथ, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पंडित इत्यादि महानुभाव ने भी इस पुनीत कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान अर्पित किया। काष्ठ जिह्वा स्वामी द्वारा रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई हस्तलिखित पुस्तिका आज भी रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। इसकी प्रतिलिपि के सहारे वर्तमान व्यास - गण लीला का निर्देशन करते हैं । काष्ठजिह्वा स्वामी ने रामनगर में लीला स्थल का भी शोधन किया,एवं उन स्थलों का नामकरण रामायण के प्रसंगों पर किया जिससे यह स्थल वास्तविक रामयात्रा के स्थलों के समान हो गया। रामनगर की रामलीला का मंचन यथारूप विभिन्न शोधित स्थलों पर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर की परिधि में किया जाता है। प्रसंगानुसार अयोध्या ,जनकपुर ,पंचवटी ,लंका, चित्रकूट ,निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका ,रामबाग, पंपासर इत्यादि सभी स्थल निर्धारित किए गए हैं। रामचरितमानस के संवादों को भी काष्ठजिह्वा स्वामी ने शोधित किया था, जिसमें उनके द्वारा रचित पदों को भी संकलित किया गया। यह संवाद और अभिनय प्रशिक्षण के दौरान ही श्रीराम से छोटे अन्य पात्र स्वाभाविक बातचीत या हाव-भाव के दौरान श्रीराम को सम्मान देने लगते हैं।रामचरितमानस का शोधन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह रामनगर की रामलीला की विशिष्टता को भी दर्शाता है। यह शोधन रामलीला के पात्रों और दर्शकों के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करता है, जिससे लीला के दौरान होने वाली देवानुभूति का अनुभव होता है। रामनगर की रामलीला की एक विशेषता यह है कि इसे 31 दिनों तक विस्तारित किया जाता है। अधिकांश रामलीलाएं 10-15 दिनों में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन रामनगर की रामलीला में रामचरित मानस के हर प्रसंग को बहुत विस्तार से और बिना किसी जल्दबाजी के प्रस्तुत किया जाता है। इससे दर्शक भगवान राम के जीवन और उनके आदर्शों को अधिक गहराई से समझ सकते हैं।
यूं तो रामलीला मंचन की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी ) से होती है, किंतु इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला के महा अनुष्ठान के निमित्त पात्रों के चयन, प्रशिक्षण, रामलीला में प्रयुक्त औजारों - उपकरणों तथा मुखौटों व वस्त्रों इत्यादि की साज-सज्जा , प्रथम व द्वितीय गणेश पूजन आदि अनेक उपक्रमों के माध्यम से यह तैयारी महीनों पूर्व शुरू हो जाती है।यह रामलीला आज भी उसी पारंपरिक अंदाज में होती है, जैसे कि 230 साल पहले होती थी। रामनगर की रामलीला का मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। इसमें बिजली की रोशनी और लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि पेट्रोमेक्स (पंचलाईट) और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज़ के दम पर यह लीला प्रस्तुत की जाती है। रामनगर की रामलीला में विभिन्न स्थलों का मंचन होता है, जैसे कि अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग। रामनगर की रामलीला की तैयारी सावन महीने से ही शुरू हो जाती है और भादों में अनंत चतुर्दशी से लीला का प्रारंभ होता है। यह लीला आश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा को समाप्त होती है। रामलीला के दौरान परंपरा के अनुसार रोज़ाना ‘काशी नरेश’ भी हाथी पर सवार होकर आते हैं और उनके आने के बाद ही रामलीला शुरू होती है।
रामनगर की रामलीला में महिला पात्रों  की भी भूमिका लड़के ही निभाते हैं। इस लीला में कुल 27 किरदार होते हैं और 12-14 बच्चे इसमें हिस्सा लेते हैं। रामलीला के दौरान रामचरितमानस की चौपाइयों का नारदी स्वर में दो रामायनी दल द्वारा पाठ होता है और लीला संवाद के साथ आगे बढ़ती है।
रामलीला स्थलों के अतिरिक्त रामलीला से संबंधित तिथियां एवं समय , रामलीला के व्यास एवं पात्रों की वंशानुगत परंपरा व समर्पण, रामलीला में रामायणी दल की महत्वपूर्ण भूमिका व निष्ठा, परंपरा व अनुशासन के अद्वितीय उदाहरण, रामलीला के साधु संत एवं नेमीजन, रामलीला का मंचीय पक्ष एवम् नेपथ्य इस महागाथा के बड़े अध्याय हैं। कहने को इतना कुछ है कि इसे एक निर्धारित लेख की सीमा में बांध पाना सर्वथा असंभव है।
संक्षेप में कहना चाहें तो , रामनगर की रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक साथ तमाम कारक हैं। लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक मंच पर प्रसंगानुसार चलायमान यह मंचन बहुत ही सहजता के साथ बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के तथा बिजली के बड़े रोशनी करने वाले उपकरणों के स्थान पर पुराने समय के पंचलाइट और मशाल की रोशनी में प्रत्येक दिन न्यूनतम दस हजार की भीड़ को मात्र राम लीला व्यास के "चुप रहो! सावधान!" स्वर के द्वारा अनुशासित किया जाता है। यह रामलीला की विशिष्टता के कुछ सहज उदाहरण हैं। इसी प्रकार की सहजता इस रामलीला की श्रेष्ठता है और यह सौम्य श्रेष्ठता ही इसकी विश्वप्रसिद्धि का निर्विवाद कारण है।
रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन आने वाले नेमी, साधु-संतों की समर्पित व अनुशासित टोलियां श्रद्धा और समर्पण के बड़े अध्याय हैं। यहां दर्शक मात्र दर्शक न होकर पात्रों और परिस्थितियों, मंचन व प्रसंग के अनुसार खुद भी रामलीला में भूमिका निभा रहा दिखाई देता है । नेमी अपने साथ एक लकड़ी का पीढ़ा, ताड़ पत्र का हांकने वाला पंखा, छोटी टार्च ले कंधे पर गमछा रखे दांये हाथ मे तुलसी कृत श्री रामचरितमानस का गुटका लिये रामलीला के संग संग अपनी पोथी से लीला के रामायणियों के संग सुर मिलाता हुआ स्वयं बिना किसी भूमिका के पात्र बन जाते है। पात्रों का पीढ़ी - दर- पीढ़ी समर्पण, नेमी - प्रेमी जनों का श्रद्धा और भक्ति भाव, रामलीला प्रसंगों का मौलिक मंचन, संवाद अदायगी, लीला मंचन में सूक्ष्म तत्वों का भी समावेश ; ऐसे अनेकानेक चित्र नए दर्शकों के लिए कौतूहल और नेमी जनों के लिए श्रद्धा के सागर हैं । एक माह तक चलने वाली इस अद्भुत रामलीला में न केवल मंच पर ही अपितु नेपथ्य में भी मजबूत भूमिका अदा करने वाले ऐसे तमाम चरित्र हैं जो कई पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं।
रामनगर की रामलीला की एक सबसे अनूठी विशेषता इसकी चलायमान प्रदर्शन शैली है। आमतौर पर जहाँ एक नाटकीय प्रस्तुति में दर्शक एक स्थान पर बैठे रहते हैं, यहाँ पर दर्शक अभिनेता के साथ-साथ, अलग-अलग स्थानों पर जाते हैं, जहाँ-जहाँ दृश्य बदलते हैं। यह एक प्रकार की तीर्थयात्रा की तरह होता है, जहाँ दर्शक अभिनेताओं के साथ चलते हैं और दिन में कई किलोमीटर तक का सफ़र तय करते हैं।
रामनगर के विभिन्न स्थान रामायण की कथा के प्रमुख स्थलों का प्रतीक होते हैं। जैसे कि अशोक वाटिका, जहाँ सीता को रावण ने बंदी बनाकर रखा था, रामनगर के एक सुंदर उद्यान में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि राम और रावण के बीच का युद्ध एक विशाल मैदान में होता है—जहाँ घोड़े और रथ का प्रयोग किया जाता है, जिससे दृश्य और भी सजीव लगते हैं।
रामनगर की गलियाँ, घाट और खुले मैदान पौराणिक स्थलों में तब्दील हो जाते हैं और अभिनेता रामायण की कथा को जीवंत कर देते हैं। इन परिवर्तित स्थानों के साथ दर्शकों को भगवान राम की दुनिया में ले जाया जाता है। इस पूरी प्रस्तुति में कोई कृत्रिम प्रकाश या आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग नहीं होता; इसकी जड़ें अपनी पुरानी शैली में बनी हुई हैं। मशालों और अभिनेता की प्रबल आवाज़ों से ही यह दर्शकों को बाँधकर रखता है।
इस पूरे अनुभव को और भी ख़ास बनाती है—काशी नरेश की उपस्थिति। काशी की पौराणिक मान्यताओं मे यह हरि हर का संयुक्त स्वरूप दर्शन है।काशी नरेश भगवान शिव के प्रतीकात्मक प्रतिनिधि के रूप में इस आयोजन की अध्यक्षता करते हैं। बोलिये राजा रामचंद्र की जय का उद्घोष करती भावविभोर जनता काशीनरेश को शिव स्वरूप अपने बीच पाते ही बनारस के परम्परागत हर हर महादेव का नारा लगाने से खुद को रोक नही पाती है। हर शाम, चाँदी के सिंहासन पर बैठकर काशी नरेश इस प्रदर्शन को देखते हैं, उनके साथ उनके दरबारी और पुजारी होते हैं। उनकी उपस्थिति इस आयोजन को एक दिव्य स्वीकृति प्रदान करती है, जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और भी बढ़ावा देती है।
सामुदायिक भागीदारी और परंपरा का संरक्षण
रामनगर की रामलीला की एक और विशिष्टता इसकी उच्च स्तर की सामुदायिक भागीदारी है। अधिकांश अभिनेता पेशेवर नहीं होते, बल्कि स्थानीय नागरिक होते हैं—किसान, दुकानदार और छात्र—जो अपनी भूमिका निभाने के लिए अपना समय और ऊर्जा समर्पित करते हैं। इन प्रतिभागियों में से कई ने अपनी भूमिकाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में पाई हैं और वे इसमें गर्व महसूस करते हैं। उनके लिए रामायण के किसी पात्र का अभिनय करना एक गहन आध्यात्मिक कार्य होता है, जो उन्हें अपने विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर के क़रीब लाता है।
यह सामुदायिक भागीदारी केवल अभिनेताओं तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि रामनगर के पूरे नगर में व्याप्त होती है।रामलीला में प्रदर्शन करने वाले कलाकार ज़्यादातर स्थानीय होते हैं और पेशेवर अभिनेता नहीं होते। ये लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते इसमें भाग लेते हैं। हालाँकि यह आयोजन वैश्विक स्तर पर सम्मानित है, लेकिन कलाकारों को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें आर्थिक रूप से बहुत कम सहयोग मिलता है, जबकि वे कठोर प्रशिक्षण और महीनों की तैयारी में लगे रहते हैं। इसके कारण नई पीढ़ी के बीच इस परंपरा को जारी रखने में रुचि कम होती जा रही है, क्योंकि इसमें न तो उन्हें कोई पेशेवर अवसर मिलता है और न ही उचित आर्थिक लाभ। स्थानीय कारीगर सेट तैयार करने और पोशाकें बनाने में मेहनत करते हैं, जबकि निवासी आगंतुकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था करते हैं। इस आयोजन के दौरान पूरा नगर एकजुट होकर इसे सफल बनाने में योगदान देता है, जिससे यह लोगों की सामूहिक सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का प्रतिबिंब बनता है।
तेज़ी से आधुनिक हो रही दुनिया में, रामनगर की रामलीला ने व्यवसायीकरण और तकनीकी उन्नति के दबावों का विरोध करते हुए अपनी प्राचीनता को बनाए रखा है। यह आज भी उसी पारंपरिक ढंग से आयोजित होती है, जैसे सदियों पहले होती थी, जिसने इसकी प्रामाणिकता और पवित्रता को बनाए रखा है। हर साल यहाँ आने वाले हज़ारों दर्शक, जिनमें विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं, इस आयोजन की स्थायी लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्त्व का प्रमाण हैं।
रामनगर, वाराणसी की रामलीला आज भी एक भव्य सांस्कृतिक आयोजन के रूप में प्रसिद्ध है, जो अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। हालाँकि आधुनिकता का असर दिखने लगा है, फिर भी यह आयोजन अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और हर साल दुनिया भर से बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता है।
रामनगर की रामलीला को यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिली है, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और सम्मान में वृद्धि हुई है। 31 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन वाराणसी के सांस्कृतिक आकर्षणों में से एक है, जहाँ पूरे रामनगर को एक विशाल मंच में तब्दील कर दिया जाता है। विभिन्न स्थानों पर रामायण के दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं और इसमें स्थानीय लोग बड़ी आस्था के साथ शामिल होते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामनगर की रामलीला को पर्याप्त सम्मान प्राप्त है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या कलाकारों और आयोजकों को पर्याप्त समर्थन मिल रहा है? आधुनिकता ने इसमें कुछ बदलाव जैसे ध्वनि प्रणाली और न्यूनतम प्रकाश व्यवस्था को शामिल किया है, लेकिन परंपरा का मूल स्वरूप जस-का-तस बना हुआ है। फिर भी, कलाकारों और आयोजकों की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि उनके योगदान को सही पहचान मिले और यह परंपरा बिना किसी कठिनाई के आगे बढ़ती रहे। इसे ख़ासकर वित्तीय सहयोग और संस्थागत समर्थन की ज़रूरत है ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर भविष्य में भी फलती-फूलती रहे।
कुल मिलाकर, रामलीला को लेकर आधुनिक और पारंपरिक पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कलाकारों की बेहतरी और इस आयोजन की दीर्घकालिकता को सुनिश्चित करने के लिए अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
काशी, 20सितंबर2026, रविवार
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मंगलवार, 28 जून 2022

व्योम वार्ता / वे चिट्ठीयां.........

वे चिट्ठियाँ.......

वो चिट्ठियाँ कहाँ खो गईं,
जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे,
कुशलता की कामना से शुरू होते थे,
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे…
और बीच में लिखी होती थी जिन्दगी..
नन्हें के आने की खबर,
माँ की तबीयत का दर्दं,
और पैसे भेजने का अनुनय,
अपनी गाय गौरी व कुत्ते शेरू के हाल
फसलों के खराब होने की वजह।
कितना कुछ सिमट जाता था,
एक नीले से कागज में,
जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती,
और अकेले में आँखों से आँसू बहाती।
माँ की आस थीं ये चिट्ठियाँ,
पिता का सम्बल थीं ये चिट्ठियाँ,
बच्चों का भविष्य थीं ये चिट्ठियाँ,
और गाँव का गौरव थीं ये चिट्ठियाँ…
डाकिया चिट्ठी लाएगा
कोई बाँच कर सुनाएगा
देख-देख कर चिट्ठी को,
कई-कई बार छू कर चिठ्ठी को,
अनपढ़ भी अपनों के
एहसासों को पढ़ लेते थे
अब नही आती वे चिट्ठीयां,
न ही रहता है डाकिये भैया का इंतजार
जो सिर्फ चिट्ढी ही नही लाते थे 
बल्कि ले आते थे रिश्तों की गरमाहट
मन की ढेरों संवेदनायें
और चिट्ठियों के संग ढेर सारी खुशियाँ
अपनों संग बीतने वाली सुख दुख की आशंकायें

अब तो स्क्रीन पर अँगूठा दौड़ता है,
और अक्सर ही दिल तोड़ता है,
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो,
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है,
सब कुछ सिमट गया छै इंच में,
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में,
जज्बात सिमट गए मैसेजों में,
चूल्हे सिमट गए गैसों में,
और इंसान सिमट गया पैसों में...!!
(वाराणसी,28जून2022,मंगलवार)
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सोमवार, 2 जनवरी 2017

एक और जिम्मेदारी के लिये धन्यवाद : व्योमेश चित्रवंश की डायरी 02 जनवरी 2017, सोमवार

एक और जिम्मेदारी के लिये धन्यवाद

उपजा वाराणसी इकाई का 2017-18, 2018-19  द्विवार्षिक चुनाव शिवपुर उपजा कार्यालय में सम्पन्न हुआ। उपजा सदस्यों की मौजूदगी में सर्वसम्मत से विनोद बागी को अध्यक्ष, सुबोध त्रिपाठी को महामंत्री चुना गया। उपाध्यक्ष सुशील श्रीवास्तव, अमन सिद्दकी, रामनरेश जी, डॉक्टर रुद्रानंद चुने गए।
मंत्री पद पर रविंद्र गिरी, विजय शंकर चौबे, व्योमेश चित्रवंश और कोषाध्यक्ष  अतुलेश उपाध्याय चुने गए। कार्यकारिणी में 11 सदस्य चुने गए।
सभी नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

शनिवार, 23 जुलाई 2016

अपनों के अव्यवस्था से जूझता ट्रौमा सेण्टर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जुलाई 2016

तीन दिन से ट्रौमा सेण्टर बीएचयू मे हूँ और  एक नेक नीयत से शुरू की गई व्यवस्था को उसके अपनो द्वारा जानबूझ कर ध्वस्त होते हुये देख रहा हूँ। बनारस के लिये एक अनुपम भेंट को ध्वस्त करने वाले कोई और नही यही के कर्मचारीगण हैं। ज्यादातर कॉन्ट्रैक्ट सेलरी पर रखे गये कर्मचारियों का आपस मे कोई तालमेल नही है, ऐसे मे उनसे मरीजो की तीमारदारी की उम्मीद करना बेमानी है।
स्थिति यह है कि अगर आपने एक स्टाफ नर्स को कुछ करने को बोला है तो दूसरी स्टाफनर्स आपके ऊपर ध्यान नही ही दे सकती भले ही आप कितने भी पीड़ा या परेशानी मे क्यों न हो?
      वरिष्ठ चिकित्सको को इन तीन दिनो मे हमने वार्ड का विजिट करते हुये शायद ही देखा, पर उनके अंडर मे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रेजिडेण्ट्स डाक्टर्स जरूर मौजूद मिलते दिखते थे। पर उनका आपसी व्यवहार  इतना तल्ख व अमानवीय होता है जो सामान्य स्तर पर भी उचित नही कहा जा सकता ।  हम लोगो के वार्ड मे तमिलनाडु का एक लड़का डाक्टर है, फर्स्ट ईयर रेजिडेण्ट, नाम देना उचित नही होगा, जब से हम आये है उस बंदे क लगातार काम पर देखा है २४ घंटे रात दिन। बेहद सुलझा और मेहनती। हम मजाक मे उससे पूछते भी है कि डाक्टर साहब आप सोते कब हो, बेचारा मुस्करा के जबाब देता है, सोते कहॉ है सर जी, दोपहर मे दो घंटे रेस्ट करते है तो पूरे वार्ड मे शोर हो जाता है। ऐसे बेचारे जूनियर डाक्टर को उसके सीनियर्स इस बुरी तरह लताड़ लगा के मॉ बहन की गाली देते है कि हम लोगो को सुन कर नागवार लगता है। मजा यह है कि गलती किसी की भी हो , डॉट उसी बेचारे जूनियर रेजिडेण्ट को सुननी है। चाहे वह नर्स ने किया हो चाहे मरीज ने या खुद सीनियर ने पर डॉट जूनियर को इसलिये पड़नी है कि उसने देखा क्योंं नही अथवा बताया क्यो नही।
एक बार तो उस जूनियर रेज्डेण्ट को अनायास डॉट व गाली गलौज सुनते हुये देख मुझसे नही रहा गया मैने उस जूनियर से इतना सब कुछ सहने का कारण पूछा तो उसने बेहद मासूमियत से जबाब देते हुये कहा कि छोड़िये न सर। कौन सा ये लोग जिन्दगी भर हमारे सीनियर बने रहेगें?  पर मै स्वयं एक व्यवसायगत पेशे का हिस्सा होकर भी यह समझ पाने मे असमर्थ हूँ कि अपने जूनियर्स को सिखाने का यह कौन सा तरीका है जहॉ उसे व्यक्तिगत प्रताड़ना व सार्वजनिक बेईज्जती सहते हुये इस तरह की व्यवसायिक जानतारियॉ सिखनी पड़ती है?
बहरहाल बात अव्यवस्था की हो रही थी । कहने को तो ट्रौमा सेण्टर व सुपर स्पेशियल्टी हास्पिटल  बना दिया गया पर दोनो के रखरखाव की व्यवस्थाये परले सिरे से ही नदारद है। न तो सेण्टर मे साफ सफाई की पूरी व्यवस्था है न ही बिजली पानी की। एक फ्लोर पर लगभग ६० मरीजो के बीच एक वाटर कूलर। तीन सामान्य शौचालय दो बेसिन वे भी साफ सफाई से कोसो दूर। कहने को तो औपचारिकताओं के नाम पर कई बार झाडू पोछा किया जाता है पर वह केवल गैलरी के फर्श पर ही नजर आता है।

बदहाल बीएचयू ट्रौमा सेण्टर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी

बीएचयू ट्रौमा सेण्टर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 18 सितंबर 2015 को किया था यह वही समय था जब मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत जोर शोर से हो चुकी थी। देश मे स्वच्छ भारत का असर दिखने भी लगा है पर मोदी जी द्वारा उद्घाटित ट्रौमा सेण्टर की सफाई व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ज्यादातर वाटर वेसिन गंदगी से पटे और जाम पड़े हैं। ज्यादातर लैट्रीन के कमोड्स व सीट बदरंग व गंदे है। वाटर कूलर पर धूल व गंदगी का अंबार लगा है।कुछ सर्विस मास्टर क्लीनर की वर्दी वाले सफाईकर्मी साफसफाई करते नजर आते रहते है पर उनके कामो की देख रेख करने वाला कोई नही। स्थिति यह है कि चौथे मंजिल पर आर्थोपेडिक वार्ड में वेसिन की टोटियॉ रस्सी से बॉधी गई है और बाथरूम की हालत यह है कि आप उसका प्रयोग करना तो दूर वहॉ खड़े तक नही हो सकते। हमने इस संबन्ध मे जब आन ड्यूटी नर्सेज से बात किया तो उनका सीधा जबाब था कि यह देखना उनकी ड्यूटी मे नही हैं। मौजूदा डाक्टर्स तो ज्यादातर प्रथम वर्ष के रेजिडेण्ट है जो स्वयं अपने सीनियर्स के व्यवहार व थोपे गये कार्यो से त्रस्त है वे बेचारे इस संबन्ध मे क्या बता पायेगें।
    हमने इस संबन्ध मे ट्रौमा सेण्टर के विशेष कार्याधिकारी व उप चिकित्सा अधीक्षक से मिल कर शिकायत करने की कोशिश की पर वे दोनो अधिकारी हमे अपने कमरे मे नही मिले।
   पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के साथ साथ छत्तीसगढ व झारखण्ड के लिये एम्स जैसा एकमात्र जीवनदायी माने जाने वाले बीएचयू के अत्याधुनिक ट्रौमासेण्टर की बदहाली को बढ़ाने मे कुछ निहित शक्तियॉ अपने स्वार्थवश बदनाम व ध्वस्त करने मे लगी है क्या उनके मायाजाल से आमजन के बनाये ट्रौमासेण्टर मुक्त हो सकेगा?

गुरुवार, 19 मई 2016

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

है जुड़ी वरूणा हमारी आस्था के गीत से
और काशी की संजोई साधना की रीति से
लोक के अनुराग की शुभरागिनी के प्रण सी
पीढीयो से गा रहा यह शहर वाराणसी।
राग रंजित कामनायें,रास रस की प्रीति से।
है जुड़ी........
पंचक्रोसी की परिधि मे जो तुम्हारा नाम है
है वही महिमा सनातन  लोक का सम्मान है
प्रकृति को तुमने सँवारा है नरम नवनीत से
है बसी.....
गति तुम्हारी देख ऑखे आज डबडब हो रही
देख अवजल का मिलन निष्ठा बिचारी को रही
यह समय सहमा हुआ कुछ कह न सके अतीत से
है जुड़ी.....

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

हमारी वरूणा अभियान, एक आवाज दिल मे उठी थी कभी (१) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08मई 2016, रविवार

                     वो शायद सन२००३ का रक्षा बंधन था, जब मै अपनी पौने चार साल की बिटिया को लेकरअपने चाचा जी के मकान पर मानस नगर दुर्गाकुण्ड जा रहा था.बाईक पर उसे नींद ना आये  इसलिये उससे बाते भी करता जा रहा था, वह बचपन से बेहद जिग्यासु व बातूनी होने के साथ किसी भी विषय के बारे मे ढेर सारे सवाल पूछना उसकी आदत रही है, मैने उसे वरूणा पुल से गुजरते हुये वाराणसी के नामकरण के बारे मे बताया तो उसने  वाराणसी नाम के दूसरे भाग अस्सी नदी के बारे मे पूछा, इसलिये मै उसे दिखाने के गरजसे दुर्गाकुण्ड से अपनी बाईक अस्सी लंका वाले रास्ते पर पुराने पुल की ओर बढ़ा दिया, तब रविन्द्रपुरी पुल नही बना था. वहॉ जा के मैने बेटी को बीएचयू मे पढ़ने के दौरान रोज आने जाने का रास्ता व अस्सी नदी दिखाया, अस्सी  नदी उसी समय धीरे धीरे नाले से नाली का रूप लेने लगी थी, बिटिया को पुल के नीचे दूर दूर तक नदी के बजाय नाली दिखने पर जिग्यासा होना स्वाभाविक था, उसने पलटते ही मुझसे सवाल किया कि लेकिन यहॉ नदी कहॉ है? उसके सवाल के जबाब मे जब मैने कनु के बाल मन को बताया कि अगल बगल रहने वालो ने नदी पाट कर उसे समाप्त कर दिया, आदतन दूसरा सवाल हाजिर था कि जब नदी पाटी जा रही थी तो आप लोगो ने उसे रोका क्यों नही ? बात उस समय आयी गयी हो गई, कार्यक्रम से लौटते समय वरूणा पुल पर कनु का एक दूसरा सवाल कि" वरूणा को कब पाटा जायेगा?'' बेहद मासूमियत से पूछे गये इन दोनो सवालो का जबाब मेरे पास वाकई नही था. लेकिन इन दोनो बेहद मासूम सवालो ने मुझे झकझोर डाला. कई कई राते ये दोनो सवाल मुझे परेशान करते रहे. बहुत सोच विचार कर मैने अपने दिल की बात और विचारो को अपने मित्र सूर्यभान सिंह के साथ बॉटा. फिर हम दोनो मित्रो की शाामे वहीं वरूणाकिनारे शास्त्री घाट पर बितने लगी. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री बनारस के सपूत  स्व० लाल  बहादुर शास्त्री के नाम पर नया नया शास्त्री घाट बना था, उक्त  घाट को बनवाने मे तत्कालीन मंत्री व क्षेत्रीय विधायक वीरेन्द्र सिंह  जी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.वीरेन्द्र सिंह के प्रयासो से ही घाट पर वरूणा महोत्सव की शुरूआत हुई थी . जिसके दो आयोजन हो चुके थे. हम दोनो  लोग नये विचार करते और उनके कार्यान्यवन के संभावनाओ पर सोचते . सबसे पहले वरूणा को जानने व समझने की बात उठी, फिर हम लोगो ने बाईक उठाया और वरूणा की भौगोलिक रचना समझने के लिये हम लोग फूलपुर इलाहाबाद वरूणा ताल तक गये.वहॉ फैले विशाल पर लगभग तीन चौधाई से अधिक सूख चुका वरूणा ताल काे देख कर लगा कि किसी तरह हमने प्राकृतिक अविरल व संचरण व्यवस्था मे हस्तक्षेप कर अपनी खुद की समस्यायो बढ़ा रखा है। बाईक से वरूणा के संग यात्रा के दौरान हमने यह महसूस किया कि इस तरह वरूणा किनारे सड़को पर चलने से हम अपने उद्देश्य के प्रतिष्ठित सही न्याय नही कर पायेगें लिहाजा यह तय हुआकि वरूणा तट पर पदयात्रा कर के ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठी करनी पड़ेगी। मित्र सूर्यभान जी  की लंबी टॉगो ने यह काम बखूबी से किया । हम लोगो के पास सूर्यभान जी के दो बार के पदयात्रा के बाद वरूणा के संबध मे काफी व्यवहारिक जानकारियॉ थी। वरूणा की पीड़ा, उसके तटवासियो की पीड़ा, समस्या व उसकी संभावित समाधान की एक सूची थी।  पर  समस्या यह था कि इन व्यवहारिक समाघान को किसी तरह धरातल पर लाया जाय। क्योकि हम लोगो के पास न तो सामर्थ्य था न ही अधिकार ।
कुछ और मित्रों को हम लोगो ने अपने सरकारो मे शामिल किया तो उनके इनुभव, संबंधो व विचारो का लाभ मिलने के साथ ही हमारे सामर्थ्य का विस्तार हुआ।तय हुआ कि वरूणा के भौगोलिक अध्ययन के साथ वरूणा का सांस्कृतिकर्मी पौराणिक व ऐतहासिक महत्व व वानस्पतिक प्रभाव के साथ पारिस्थितिकी अध्ययन भी किया जाये।
अगली रणनीति इस संबंध मे बनने लगी ।