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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ वैश्विक खात्मे की ओर बढ़ता इंसान

वैश्विक खात्मे की ओर बढ़ रहा इंसान, 19 साल में नर्क हो जाएगी जिंदगी

    दुनिया को खत्म करने के लिए इंसान एकदम सही रास्ते पर चल रहा है. अब से मात्र 19 साल बाद यानी 2040 में इंसानों की जिंदगी नर्क हो जाएगी. ये दावा किया जा रहा है 1972 में बनाई गई एक रिपोर्ट का दोबारा विश्लेषण करने के बाद. क्योंकि इंसान लगातार अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों से भाग रहा है. आइए जानते हैं कि इस रिपोर्ट में इंसानों की जिंदगी को क्यों नर्क बनाने की बात कही गई है. ये क्यों कहा गया है कि इंसान वैश्विक खात्मे की ओर बढ़ रहा है.                    
              1972 में एक किताब छपी थी द लिमिट्स टू ग्रोथ (The Limits to Growth). इसमें मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि औद्योगिक सभ्यता हर कीमत पर लगातार आर्थिक विकास की ओर बढ़ती रही तो एक दिन सरकारें गिर जाएंगी. सहयोग खत्म हो जाएगा. इसकी वजह से भविष्य में 12 संभावित भयावह स्थितियां बन सकती हैं, जो किसी भी इंसान, समुदाय या देश और धरती के लिए फायदेमंद नहीं होंगी.
        इस रिपोर्ट में बताई गई 12 संभावित खतरनाक स्थितियों में से एक सबसे भयावह स्थिति ये थी कि साल 2040 तक दुनिया का आर्थिक विकास तेजी से होगा. यह अपने पीक पर रहेगा. उसके बाद एकदम तेजी से नीचे गिरेगा. इसके साथ ही वैश्विक आबादी कम होगी. खाना की कमी होगी. साथ ही प्राकृतिक संसाधनों की भारी किल्लत होगी. इसे बिजनेस ऐज यूजुअल (Business As Usual - BAU) सीनेरियो कहा गया।
इस वैश्विक गिरावट से इंसानों की नस्ल तो खत्म नहीं होगी, लेकिन बिना पैसे, बिना खाने और बिना प्राकृतिक संसाधनों के इनकी जिदंगी नर्क हो जाएगी. स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग पूरी दुनिया में गिर जाएगा. अब इस बात की पुष्टि और वर्तमान परिस्थितियों में क्या होगा भविष्य में यह जानने के लिए MIT की सस्टेनिबिलिटी और डायनेमिक सिस्टम एनालिसिस रिसर्चर गैरी हैरिंग्टन ने इस रिपोर्ट का आज के अनुसार फिर से विश्लेषण किया. जिसकी रिपोर्ट येल जर्नल ऑफ इंडस्ट्रियल इकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है. 
पिछले साल ही हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट हुई हैं. वो आज के रियल वर्ल्ड डेटा के साथ द लिमिट्स टू ग्रोथ (The Limits to Growth) का एनालिसिस कर रही हैं. इस एनालिसिस में गैरी ने 10 फैक्टर्स पर ध्यान दिया. जिनमें आबादी, प्रजनन दर, प्रदूषण स्तर, खाद्य उत्पादन और औद्योगिक आउटपुट प्रमुख हैं. उन्होंने देखा कि इस एनालिसिस के परिणाम बहुत हद तक 1972 में प्रस्तावित BAU सीनेरियो से मिलते-जुलते हैं. हालांकि, एक जगह रियायत मिलने की संभावना है.
गैरी ने बताया कि एक सीनेरियो उस रिपोर्ट  में बताई गई थी, जिसे कॉम्प्रिहेंसिव टेक्नोलॉजी (CT) कहा गया. यानी तकनीकी रूप से इतना ज्यादा विकास हो जाए कि प्रदूषण कम किया जा सके और खाद्य सामग्रियों का उत्पादन बढ़ाया जा सके. ताकि प्राकृतिक संसाधनों की कमी भी हो तो खाने की कमी न हो. लेकिन इससे बढ़ती हुई वैश्विक आबादी और व्यक्तिगत कल्याण की भावना को नुकसान पहुंचता है. 
     इसके पीछे वजह ये है कि जब प्राकृतिक संसाधनों की कमी होगी, तब आर्थिक विकास तेजी से नीचे की ओर गिरेगा. यानी आज के औद्योगिक सभ्यता का तेजी से पतन होगा. गैरी कहती है कि आज से करीब 10 साल बाद ही BAU और CT सीनेरियो के विकास में बाधा आने लगेगी. ये रुक जाएंगे. यानी लगातार विकास की कोई भी अवधारणा पूरी नहीं होगी. इससे इंसानों को नुकसान होने लगेगा. 
गैरी ने कहा फिलहाल अच्छी खबर ये है कि अब भी देर नहीं हुई है. इन दोनों परिस्थितियों से बचने के लिए इंसानी समाज को सही दिशा और दशा में काम करना होगा. इसका विकल्प है - स्टैबलाइज्ड वर्ल्ड सीनेरियो (Stablilized World Scenario) यानी स्थिर दुनिया परिस्थिति. इस स्थिति में आबादी, प्रदूषण, आर्थिक विकास तो बढ़ेंगे लेकिन प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे कम होंगे. इससे फायदा ये होगा कि जैसे ही प्राकृतिक संसाधनों की कमी दिखे, आप बाकी को रोक दें या सीमित कर दें. 
तकनीकी विकास के साथ स्टैबलाइज्ड वर्ल्ड सीनेरियो को चलाएं तो उससे वैश्विक समाज की प्राथमिकताएं बदलेंगी. गैरी ने कहा कि लोगों को अपने मूल्यों पर काम करना होगा. नीतियां बनानी होंगी. परिवार छोटे रखने होंगे. चाहतें और जरूरतें कम करनी होंगी. जन्म दर को नियंत्रित करना होगा. औद्योगिक आउटपुट को सीमित करना होगा, सेहत और शिक्षा को प्राथमिकता से चलाना होगा. इससे प्राकृतिक संसाधन सीमित तरीके से खर्च होंगे. तब धरती बचेगी, इससे इंसान और उसके देश बचेंगे.
स्टैबलाइज्ड वर्ल्ड सीनेरियो (Stablilized World Scenario) के ग्राफ को देखें तो इससे पता चलता है कि उस समय यानी 20 साल बाद भी वैश्विक आबादी के हिसाब से खाद्य सामग्री रहेगी. प्रदूषण कम होगा. प्राकृतिक संसाधनों की कमी स्थिर हो जाएगी. सामाजिक खात्मे को बचाया जा सकेगा. ये एक काल्पनिक परिस्थिति लगती है क्योंकि उस समय तक कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ चुकी होगी. लेकिन अगर इस सीनेरियो के हिसाब से चले तो वह भी कम होगा. 
गैरी ने बताया कि कैसे इंसान ने वैश्विक स्तर पर एकता दिखाई है. कोविड-19 के समय में जब वैक्सीन विकसित करने और उसे पूरी दुनिया में पहुंचाने की बात आई तो इंसानों ने एकता दिखाई. सामुदायिक और वैश्विक जिम्मेदारी निभाई है. इसी तरह अगर हर देश का इंसान जलवायु समस्या को एकसाथ मिलकर खत्म करने की कोशिश करे तो कुछ भी संभव है. हम अपना भविष्य किसी भी समय सुधार सकते हैं. 
गैरी हैरिंग्टन कहती हैं कि अभी देर नहीं हुई है. अगर इंसान अपनी आबादी, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और औद्योगिक विकास की रफ्तार को सीमित करे तो वह 20 साल बाद भी सुरक्षित रह सकता है. इसके लिए जरूरी है कि इंसानियत अपनी सीमा तय करें. या फिर किसी बिंदु पर पहुंच कर सीमा बना दें. ताकि मानव कल्याण की भावना धरती से खत्म न होने पाए.
(आजतक ब्लाग पर प्रकाशित एक लेख)
#व्योमवार्ता
काशी, 22जुलाई 2021, गुरूवार
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रविवार, 11 जुलाई 2021

व्योमवार्ता/ आर्य सनातनी ही भारत के मूल निवासी है़ंं

व्योमवार्ता/आर्य(सनातनी) ही भारत के मूल निवासी है/ व्योमेश चित्रवंश की डायरी 11जुलाई2021

     नये नये नेता बने एक मित्र कभी कभी हमसे #राजनीतिक_बहस करना चाहते हैं।आजकल के राजनीतिक गणित के जमाने के हिसाब से खुद को #नवबौद्ध कहते है। नेता है तो अब तक चल रहे सभी स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाना लाजमी है।सत्ता के विरोध मे है तो भारतीय जनता पार्टी के साथ साथ #भारतीय_संस्कृति, #भारतीय_इतिहास के विरोघ मे बोलना व #कम्यूनिष्ट_विचारधारा का समर्थन करना उनका राजनीतिक घर्म व कर्तव्य बन गया  है । कल बहस कर रहे थे कि केवल #आदिम_जनजातिया़ ही #भारतीय है बाकी सभी बाहरी है। #आर्य बाहर से आये। मै आज तक ये नही समझ पाया कि ये कथित नेता, नवबौद्ध , #धर्मांतरित_ईसाई, पांच सात पीढ़ी #इस्लाम बने कतिपय लोग कैसे यहां के आर्य #मूल_निवासियो़ से स्वयं  को पृथक कर किस #डीएनए_विश्लेषण के आधार पर  अपने को मूल #आदिम_भारतीय बताते हैं?
         बहरहाल इस तरह के  लोगों से मैं प्राय: सुना करता हूं कि आर्य बाहर से आये । पर ये लोग #रोमिलाथापर, #ईरफानहबीब, #मैक्समूलर के #स्वविरोधाभाषी व #भ्रामक सिद्धान्तो को भी स्पष्ट नही कर पाते। मैं आज उनसे एक बेहद व्यवहारिक बात पूछना चाहता हूँ।
                  #सिकंदर बाहर से आया, राजा #पुरु से युद्ध हुआ । #मुहम्मद_बिन_कासिम आया, राजा #दाहिर से युद्ध हुआ । मुहम्मद #गौरी आया, #पृथ्वीराज से युद्ध हुआ । #बाबर आया, #राणासांगा से युद्ध हुआ । #अकबर से #महाराणाप्रताप का युद्ध हुआ और अकबर से ही रानी #दुर्गावती का भी युद्ध हुआ । #औरंगजेब से #शिवाजी का युद्ध हुआ ।
  अब #अंग्रेजों पर आते हैं ।
अंग्रेजों से रानी #लक्ष्मीबाई का युद्ध हुआ । अंग्रेजों से #तात्याटोपे का युद्ध हुआ । अंग्रेजों से #नानासाहेब का युद्ध हुआ । उसके बाद बहुत से क्रांतिकारी हैं जो हमसब जानते होंगे ।
सवाल ये है कि
अगर आर्य बाहर से आये ! तो कौन सा #आर्य राजा या #हमलावर आया?
    किसी एक का नाम बता दीजिए, उससे जिसने युद्ध किया होगा उसका भी नाम बता दीजिए।
या फिर !
#झूठी_अफवाह, फैलाना बन्द करिए।
     #आर्यों को विदेशी बताना, अंग्रेजो और #वामपंथी_लेखको का षड्यंत्र था । आर्यों के विदेशी होने की झूठी बाते #NCERT की किताबों में इस देश की आर्य(हिंदू)जाति को बतायी जाती है, पढ़ाई जाती है और इस देश के युवा बिना सोचे समझे उसी को सच मान बैठते हैं ।
          इस देश में सैकड़ों ऐसी #खुदाई हो चुकी हैं जिनसे साफ हो चुका है कि आर्य #विदेशी नहीं, इसी देश के #मूल_निवासी हैं । #हड़प्पा और #मोहनजोदड़ो की श्रेष्ठ #सभ्यता भी आर्यो द्वारा ही बसाई गयी हैं । विश्वास ना हो तो #राखीगढ़ी में जो खुदाईयाँ हुई हैं,  उन्हे देखिये।उनसे साफ हो चुका है कि आर्य (सनातनी) भारत के ही मूलनिवासी हैं ।
#व्योमवार्ता
(काशी, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा, सं०२०७८वि० तदनुसार 11जुलाई 2021, रविवार)
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शुक्रवार, 18 जून 2021

मेरे लिये गौरव का क्षण / #यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती का विमोचन प्रख्यात चि्तक व विधानसभाध्यक्ष पं०हृदय नारायण दीक्षित जी के करकमलों से

मेरे लिये गौरव का क्षण
(व्योमेश चित्रवंश की डायरी,17जून2021)

आज नवगीत के उन्नायक सुप्रशिद्ध साहित्यकार डाॅ०शभुनाथ सिंह जी के १०५वीं जयन्ती पर आभाषी समारोह मे उत्तर प्रदेश के #विधानसभाध्यक्ष व चिंतक आदरणीय पं० हृदय नारायण दीक्षित जी के कर कमलों द्वारा मेरी कृति '#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती' का विमोचन होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उनके आशीर्वाद व प्रशंसात्मक प्रोत्साहन के लिये आह्लादित हूं।
बहुत बहुत आभार #डाॅ०_शंभुनाथसिंह_रिसर्च_फाऊण्डेशन के राजीव भैया Rajeev Kumar Singh  व रोली भाभी Rolee Singh , इस बरसात मे भी स्वयं प्रयास कर मेरा सपना सच करने के लिये।
आदरणीय गुरूवर डाॅ०राम सुधार सिंह सर Ramsudhar Singh का जिन्होने संक्षिप्त परिचय मे पूरी पुस्तक का भाव व्यक्त किया। फाऊण्डेशन की अध्यक्षा विजयश्री दीदी Vijayshree Singh , प्रशिद्ध नवगीतकार आदरणीय डाॅ०बुद्धिनाथ मिश्र जी, हिन्दुस्तानी अकादमी प्रयागराज के अध्यक्ष डाॅ उदय प्रताप सिंह व वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ० इंदीवर जी एवं सभी शुभेच्छुओं के प्रति आभार।
आप सब का स्नेह बना रहे🙏
(काशी,17 जून2021, गुरूवार)
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सोमवार, 31 मई 2021

व्योमवार्ता / कोरोना के आगे......



#कोरोना के आगे........
  
( कोरोना 2 लाकडाऊन मे प्रेमचंद पथ पत्रिका द्वारा आयोजित राष्ट्रीय आनलाईन संगोष्ठी "विश्वास रखें सब अच्छा होगा" मे व्यक्त विचार,03मई 2021सोमवार)
                         वर्तमान समय बड़े मुश्किलों का है। इस तरह की आपदा के बारे मे संभवतः हम मे से किसी ने कल्पना भी नही की थी। फिल्मों व उपन्यासों की बात छोड़ दिया जाए तो यह चीन जनित मानव आपदा कोरोना हमारे देश ही नही मानव जाति की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई है जिसके समक्ष वर्तमान मे हम असहाय है। विज्ञान के नए आविष्कारों पर चढ़ कर मंगल और चंद्रमा तक यात्रा करने की क्षमता रखते हुए भी हम एक अति सूक्ष्म अदृश्य विषाणु के प्रकोप के आगे स्वयं को किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में मान नतमस्तक हो चुके हैं। कोरोना वाईरस ने जहां राष्ट्र व समाज को आर्थिक क्षति पहुंचाई उससे कहीं अधिक सामाजिक सांस्कृतिक  व पारिवारिक क्षति किया है। इस बीमारी ने मानवीय संवेदनाओं व संबंधों को तार-तार कर दिया। ऐसा नहीं कि मानवीय संवेदनाएं हमसे हमारे अंतस से समाप्त हो गई वरन स्वयं के प्राणरक्षा के भय ने इन संवेदनाओं की भ्रूणहत्या कर दी। संबंधों के तराजू पर स्वयं के प्राणों के आगे दूसरे पलड़े पर  संवेदना का कोई वजन कोई मूल्य चाह कर भी नहीं रहने दिया।       
                   जब वर्ष भर पहले कोरोना की पहली लहर आई थी तब यह मानवीय संवेदनाएं बेबसी में खुद को कसमसाते हुए इस आशा और उम्मीद से जी रही थी कि यह बुरा वक्त है चला जाएगा देश की जनता सरकार के प्रत्येक कदम में सहयोग की भावना के साथ कभी ताली बजाने से लेकर शंख घड़ियाल बजाती रही, कभी कोरोना से जूझ रहे फ्रण्टलाईन वारियर्स डाक्टर्स,पैरामेडिकल्स,पुलिस वालो का हौसला बढ़ाने के लिये दीपक जला कर उनका हौसला बढ़ाती रही। मनोवैज्ञानिक व सामरिक दृष्टि से देखें तो इसका लाभ भी हमें मिला। एक डेढ़ माह के कंप्लीट लॉकडाउन ने हमारे देश को कोरोना से लड़ने की प्राथमिक तैयारी का मौका दिया। मास्क से लेकर सैनिटाइजर, वेंटीलेटर जैसी जरूरी चीजों को तैयार कर हम कोरोना से लड़ने मैदान में आ गए तो सरकार ने आम गरीब जनता के राशन पानी तक की व्यवस्था की। पुलिस का संवेदनशील व सहयोगात्मक व्यवहार आम जन ने पहली बार महसूस किया। कोरोना वाईरस से इस पहली लड़ाई में पूरी तैयारी के साथ उतरने का लाभ यह रहा कि हम कोरोना के पहले युद्ध में विजई हुए। हमारे लड़ने के ढंग से लेकर मनोवैज्ञानिक सामरिकी तक की तारीफ पूरी दुनिया ने किया। इस मुश्किल वक्त मे एक दूसरे से हाथ में हाथ मिला कर जहां हमने एक दूसरे के बिखरे बिछड़े साथियों को ढूंढ़ना शुरू किया जहां हमने जमीन पर करोना को हराया वही अपने अंशदान से पीएम केयर्स फंड को समृद्ध किया। कोरोना के आपदा काल में शारीरिक और भौतिक दूरियां काफी होने के बावजूद हमने एक दूसरे के बिखरे बिछुड़े साथियों को ढूंढ़ ढूंढ कर एक माला में पिरोने का काम बड़े करीने से किया। स्कूली जमाने के दोस्तों से लेकर विश्वविद्यालय और संघर्ष के दिनों के बिखरे हुये साथी एक एक कर प्लेटफार्म पर इकट्ठे हुए और फेसबुक व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर कई कई ग्रुप बन गए। इन सोशल मीडिया ग्रुप ने केवल आभासी स्तर पर नहीं बल्कि वास्तविक धरातल पर भी आपस में एक समझदारी व साझेदारी कायम किया। आपसी संबंध भौतिक रूप से दूर रहने के बावजूद मन से जुड़ते गये, जिंदगी फिर वैसे ही चलने लगी जैसे कोरोना के पहले चलती थी। सरकार लगायत वैश्विक संगठन हमें बार-बार चेतावनी देते रहे पर हम फिर अपने रंग में रंग गए 'हम न मरब  मरिहै संसारा' के तर्ज पर ।
         भूल तो यही हो गई जो हमने काशी के गूढ़वादी फक्कड़ अलमस्त कबीर के 'हम न मरब मरिहै संसारा' का अर्थ न समझ खुद को ही  स्वयं संप्रभु मान बैठे। हमने यह नहीं सोचा, एक क्षण के लिए भी नहीं कि हम अपने अंदर के 'अहं' का प्रतीक है और यदि हमने अपने 'हम' अर्थात 'अहंकार' को नहीं मारा तो हम अपने 'जियावनहारा' अर्थात परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकते। यह परमात्मा ही कल्याणकारी हमारा सुख है हमारी शांति है हमारी संतुष्टि है।  परंतु हमने करोना के बाद अपने अहंकार को बस में नहीं किया , दिशानिर्देश नही माने, संकल्पबद्ध नही किये। मास्क सावधानी भीड़ सब को अनदेखा कर दिया हमने तो हमारे अहंकार को मारने प्रकृत को आना ही था। परिणाम सामने है आज करोना कि दूसरी लहर के आगे हम असहाय हैं। जिस भारत की पूरे विश्व में कोरोनावायरस के लिए प्रशंसा हो रही थी आज वही अपनी गलतियों से संपूर्ण विश्व का दयापात्र बना हुआ है। गलती कहां हुई? यह आत्मआलोचना व आत्मनिरीक्षण का विषय है पर कड़ुआ सच यह है कि हम में से कोई भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।चाहे वह प्रधानमंत्री हो या प्रधान सचिव ग्राम प्रधान हो या गांव के पटवारी। वास्तविकता यह है कि हम सब ने बेहद गैर जिम्मेदाराना तरीके से अपनी लापरवाही प्रदर्शित किया है।आज बंगाल तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम के विधानसभा चुनाव के लिए न्यायपालिका हाई कोर्ट मद्रास चुनाव आयोग को हत्या जैसे अपराध का दोषी बताती है। वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट पंचायत चुनाव पर उत्तर प्रदेश सरकार को अप्रैल के आखिरी तारीख तक अनिवार्य रूप से चुनाव कराने का आदेश देकर स्वयं को साफ पाक कैसे कह सकती है?वही देश के सर्वोच्च जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री, मुख्यमंत्री सहित बड़े-बड़े राजनेताओं द्वारा की जाने वाली चुनाव रैलियों में 'दो गज की दूरी मास्क है जरूरी' का सिद्धांत चुनावी प्रचार पार्टियों मे चुनावी पम्फलेट की तरह उड़ता नजर आया। देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री और सरकार कोरोना की सुनामी को झेलने के बावजूद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पाँच सर्वाधिक प्रभावित जिलों में लॉकडाउन लगाने के निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर स्टे ले आए और हमारा सर्वोच्च न्यायालय दूसरे प्रदेशों में हो रही घोर लापरवाही प्राणवायु और अस्पतालों में पेड़ों और श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए तीन-तीन दिनों से लाइन में लगे लोगों के सहूलियत के लिए कड़ी टिप्पणी जारी करने के बावजूद उच्च न्यायालय के निर्देश को स्थगित कर दें तो आमजन अपने अपनों की सेवा चिकित्सा और प्राण रक्षा के लिए कहां जाएं ? जनता की दृष्टि मे इस कागजी कवायद ने न्यायपालिका पर भी मूकप्रश्न उठाया है। बार-बार चिकित्सा सेवा और सुविधाओं के विस्तारीकरण की आवश्यकता और आवश्यक धनराशि होने के बावजूद हमारे सर्वशक्तिमान सत्तानियंता व अधिकारीगण पूरे साल में 1000 वेंटिलेटर और हर जनपद में ऑक्सीजन प्लांट भी नहीं लगा पाए तो दूसरों को सामाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश देने वाले न्यायालयों में सोशल डिस्टेंसिंग का कितना अनुपालन हुआ यह किसी से छिपा नहीं है फिर आम जनता तो नियम कानून ना मानने को अपना जन्मसिद्ध मूल अधिकार ही मानती है उसके लिए '2 गज की दूरी मास्क है जरूरी' सैनिटाइजेशन सोशल डिस्टेंसिंग जैसी बातें ही बेमानी थी। कुल मिला जुला कर अगर हम पूरे कोरोना सुनामी के दूसरे लहर के लिए किसी पर उंगली उठाने की स्थिति में है तो वह शीश महल में पत्थर फेंक कर उसके किरिचों मे खुद का बिगड़ता चेहरा देखने वाली बात होगी।
             परन्तु कोरोना का जो सर्वाधिक दुखद पहलू है आपसी संवेदनाओं और संबंधों की तिलांजलि। कोरोनावायरस आज के समय में अश्पृश्य जैसे हो गए जहां पुत्र पिता की, व्यक्ति अपने निकटतम परिजनों की अंत्येष्टि भी नहीं कर पाया। छोटी-छोटी घटनाओं पर एक दूसरे से कंधा मिलाने वाले लोग आज मृत्यु जैसे संस्कारों पर भी साथ नहीं दे पा रहे हैं। आपदा मे अवसर के नाम पर मानव गिद्धों ने दो रूपये की दवायें बीस रूपये और 899/- का रेमडेसिवर ७५ हजार एक लाख मे बेंचने से बाज नही आये।  अस्पतालों ने कोरोना के नाम पर बिना किसी सुविधा के १५००/- वाले  बेड पर डेढ़ लाख रूपये तक वसूला तो लाशों को कंधा देने के नाम पर दस कदम तक लाश पहुंचाने के आठ से सोलह हजार , एंबुलेंस के किराये  दो दो लाख रूपये तक वसूले गये। नकली दवा इंजेक्सन डाक्टर ड्राईवर एंबुलेंस की तो बात ही छोड़ दिजिये। किस मानसिक आर्थिक आध्यात्मिक विकास की ओर बढ़ रहा है हमारा भारतीय समाज? कैसे बचा जाय इन मानव गिद्धों से यह प्रश्न तो सदैव खड़ा रहेगा।
                      हम निराशाजनक और नकारात्मक पहलू को छोड़ दें तो हर व्यक्ति मन से एक दूसरे के पीड़ा में शरीक हैं यदि वह भौतिक रूप से अपनों के लिए उपस्थित नहीं हो पा रहा है तो यह उसकी मर्जी या मनोदशा नहीं है वरन आज की दुर्गम परिस्थितियां हैं। मैं फेसबुक व्हाट्सएप और अखबारों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम देखता हूं कि इस आपदा काल में अपनी आवास से ही मृत आत्मा को श्रद्धांजलि दें तो सोचता हूं यह विनम्र निवेदन है या सूचना की औपचारिकता?कभी हमने ऐसे परिवेश और परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी पर जो सच हमारे सामने हैं हम उसे अस्वीकार नही कर सकते । आज हमें उसमें ही स्वयं को समायोजित करने के अतिरिक्त कोई पर्याय भी नहीं है । आवश्यकता परिस्थितियों को सकारात्मक रूप से लेने की है। माल्थस ने कहा था प्रकृति अपने आवश्यकतानुसार जनसंख्या को नियंत्रित करती है संभवत यह प्रकृति का ही स्व नियंत्रण हो, पर प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया भी है उसका भी हमें धन्यवाद देना चाहिए कभी-कभी किसी पेड़ के नीचे बैठकर उस पर चहचहाती चिड़ियों की आवाज सुनिए और पेड़ के पत्तों से बहते हुए सनसनाहट को महसूस करिए तब आपको पता चलेगा की प्रकृति ने हमें कितनी प्यारी चीजें दी है। कभी किसी तालाब के किनारे चुपचाप बैठ उसमें भागती उछलती मछलियों को देखिए और उन पर ध्यान लगाए बगूले की एकाग्रता को महसूस कीजिए तब पता चलेगा कि संसार में कोरोनावायरस केअतिरिक्त भी बहुत कुछ है जोअच्छा है बस उसे देखने की जरूरत है। जीवन की आपाधापी में हमने उसके लिए दो पल का वक्त ही नहीं निकाला । कुछ नहीं तो घर के बाहर एक छोटे खुले डिब्बे में चिड़ियों के लिए पानी रखकर गमले में खुद के लगाए पौधे को ध्यान से देखिए तब लगेगा कि जीवन बहुत खुशनुमा है और कोरोनावायरस कुछ भी नही बल्कि इससे हट के जिन्दगी बहुत कुछ है जिसे जीना है महसूस करना है आनंद लेना है।

-व्योमेश चित्रवंश
संपर्क सूत्रः 9450960851
(लेखक विधि व्यवसायी व पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता है।)
http://chitravansh.blogspot.com














मंगलवार, 16 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर व्योमेश चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब

#यह_सड़क_मेरे गांव_को_नही_जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर #व्योमेश_चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब

          एक लंबे अंतराल के बाद एक किताब पढ़ने को मिली जिसने गांव की यात्रा करवाई,जिसका शीर्षक वाकई एक रहस्य और दर्द को छुपाये हुये है कि सड़क (लेखक के संग ही समस्त पाठकों के) गांव को नही जाती ,जो खुद अपने गांवों से बिछुड़ गये है।आज वो गांव मिल जाने पर भी या यूं कहे दिख जाने पर भी अनजान सा लगता है। हालांकि अब उस गांव के खेत खलिहानों मे अब बैल की जगह ट्रैक्टर  नजर आते हैं। प्राईमरी स्कूल जहां टाटपट्टी  की जगह मेज कुर्सी दिखती है। अवसरविशेष पर लगने वाले मेले  की जगह माल और मल्टी मार्ट ने ले लिया है। गांव के दादा,दादी,बूढ़ी काकी तो अभी भी है पर उनके गोंद मे खेलने वाले वो नाती,पोते और हुड़दंग मचाने वाली बच्चा मण्डली  नजर नही आती ।
        किताब के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये गांव मे बिताये गये जीवन के हिस्से किसी एलबम की तस्वीरों की तरह जीवन्त हो उठते है जैसे अपने जीवन का ही कोई चलचित्र चल रहा हो। हर कहनी हर किस्से के अंत मे बहती पुरवईया जैसा महसूस हो रहा है, जिसके कारण पुरानी यादों का दर्द व टीस ऊभर आता है। यह लेखक की सफलता है कि उसने अपने मन की पीड़ा के साथ पाठक के संवेदना को ऊभारा है ,जो कही खो गया था या स्मृति से विलुप्त हो गया था ।
सचमुच आज की सड़क उस गांव को नही जाती जहां भारत गांवों का देश होता था। विडंबना यह है कि शहर तो कंक्रीट के ज़गल बनते जा रहे हैं और सरकर गांव का भौतिक विकास कर रही है भले वह कंक्रीट व कोलतार से ही क्यों न हो, पर यह भी कडुआ सच है कि कंक्रीट व कोलतार वातावरण मे जीने के लिये सांस नही मुहैय्या करा पाते ।
                किताब के किस्से गुदगुदाते हुये हंसाते है और हंसाते हंसाते आँसू  निकाल देते है पर किस्से का अंत होते होते  यही हँसी किस्से मे उठाये गये सवालो के साथ गले को रू़धते हुये सिसकियों मे बदल जाती है । पाठक कुछ कहना चाह कर भी भीगे मन और रोते दिल से कुछ बोल नही पाता । वह खुद से सवाल पूछता है कि उसने इन बीते सालों मे क्या खो दिया? उसका सब कुछ उसके आस पास दिख रहा है गांव भी, मगर हकीकत मे  ये वो गांव नही जो गरीब होने के बावजूद दिल से अमीर था। कमजोर और बदरंग  दिखता था मगर वो  मजबूत और सतरंगी स्वभाव को अपने मे समेटा था जैसा कि लेखक अपनी किताब के भूमिका मे अपनी बात मे ही कह देते हैं। लेखक की बात से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ और मै ही नही गांव से रिश्ता रखने वाला हर पाठक सहमत ही होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।
लेखक को सौ सौ बार साधुवाद जो पाठक के मनोभावों को उसकी अपनी मन की भाषा के साथ बहुत गहरे तक पकड़ा है और उसे कलमबद्ध किया है। किताब को पढ़ते समय मेरे जेहन मे  किसी शायर की नज्म याद  आती है ," यादों का एक झोंका आया , मिलने हमसे बरसों बाद......"
एक बार पुन: लेखक व्योमेश चित्रवंश जी को बधाई। हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों म उनकी अगली किताब भी हमे जिन्दगी के ऐसे बिछुड़े लम्हों को जोड़ने मे सफल होगी।

-सूर्य भान सिंह
(सूर्य भान सिंह 'पृथ्वीमित्र' प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता है| वाराणसी को पहचान देने वाली आदि पौराणिक नदी #वरूणा के पुनरूद्धार और पुनर्जीवन देने मे आपका महती योगदान रहा है। देश के उत्तरी छोर पर स्थित कारदुंगला के रोमांचक यात्रा मे अनजाने मे ही रिकार्ड अपने नाम दर्ज कराने वाले सूर्यभान जी का कार्यक्षेत्र  पूर्वोत्तर के बागडोगरा और सिलीगुड़ी के पहाड़ भी रहे हैं। इनके पर्यावरण के क्षेत्र मे योगदान के फलस्वरूप दि अर्थ फाऊण्डेशन ने 'पृथ्वीमित्र' सम्मान दिया | वर्तमान मे बनारस मे रह कर जल और शिक्षा के क्षेत्र मे अपना योगदान दे रहे #सूर्य_भान_सिंह_पृथ्वीमित्र' साहित्य व संस्कृति के गभीर अध्यासु हैं|)

शनिवार, 6 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती की समीक्षा मित्र सूर्यभान सिंह की लेखनी से

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती : बदलते ग्रामीण परिवेश पर व्योमेश चित्रवंश की एक बेहतरीन किताब
          एक लंबे अंतराल के बाद एक किताब पढ़ने को मिली जिसने गांव की यात्रा करवाई,जिसका शीर्षक वाकई एक रहस्य और दर्द को छुपाये हुये है कि सड़क (लेखक के संग ही समस्त पाठकों के) गांव को नही जाती ,जो खुद अपने गांवों से बिछुड़ गये है।आज वो गांव मिल जाने पर भी या यूं कहे दिख जाने पर भी अनजान सा लगता है। हालांकि अब उस गांव के खेत खलिहानों मे अब बैल की जगह ट्रैक्टर  नजर आते हैं। प्राईमरी स्कूल जहां टाटपट्टी  की जगह मेज कुर्सी दिखती है। अवसरविशेष पर लगने वाले मेले  की जगह माल और मल्टी मार्ट ने ले लिया है। गांव के दादा,दादी,बूढ़ी काकी तो अभी भी है पर उनके गोंद मे खेलने वाले वो नाती,पोते और हुड़दंग मचाने वाली बच्चा मण्डली  नजर नही आती ।
        किताब के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये गांव मे बिताये गये जीवन के हिस्से किसी एलबम की तस्वीरों की तरह जीवन्त हो उठते है जैसे अपने जीवन का ही कोई चलचित्र चल रहा हो। हर कहनी हर किस्से के अंत मे बहती पुरवईया जैसा महसूस हो रहा है, जिसके कारण पुरानी यादों का दर्द व टीस ऊभर आता है। यह लेखक की सफलता है कि उसने अपने मन की पीड़ा के साथ पाठक के संवेदना को ऊभारा है ,जो कही खो गया था या स्मृति से विलुप्त हो गया था ।
सचमुच आज की सड़क उस गांव को नही जाती जहां भारत गांवों का देश होता था। विडंबना यह है कि शहर तो कंक्रीट के ज़गल बनते जा रहे हैं और सरकर गांव का भौतिक विकास कर रही है भले वह कंक्रीट व कोलतार से ही क्यों न हो, पर यह भी कडुआ सच है कि कंक्रीट व कोलतार वातावरण मे जीने के लिये सांस नही मुहैय्या करा पाते ।
                किताब के किस्से गुदगुदाते हुये हंसाते है और हंसाते हंसाते आँसू  निकाल देते है पर किस्से का अंत होते होते  यही हँसी किस्से मे उठाये गये सवालो के साथ गले को रू़धते हुये सिसकियों मे बदल जाती है । पाठक कुछ कहना चाह कर भी भीगे मन और रोते दिल से कुछ बोल नही पाता । वह खुद से सवाल पूछता है कि उसने इन बीते सालों मे क्या खो दिया? उसका सब कुछ उसके आस पास दिख रहा है गांव भी, मगर हकीकत मे  ये वो गांव नही जो गरीब होने के बावजूद दिल से अमीर था। कमजोर और बदरंग  दिखता था मगर वो  मजबूत और सतरंगी स्वभाव को अपने मे समेटा था जैसा कि लेखक अपनी किताब के भूमिका मे अपनी बात मे ही कह देते हैं। लेखक की बात से मै शत प्रतिशत सहमत हूँ और मै ही नही गांव से रिश्ता रखने वाला हर पाठक सहमत ही होगा। ऐसा मुझे विश्वास है।
लेखक को सौ सौ बार साधुवाद जो पाठक के मनोभावों को उसकी अपनी मन की भाषा के साथ बहुत गहरे तक पकड़ा है और उसे कलमबद्ध किया है। किताब को पढ़ते समय मेरे जेहन मे  किसी शायर की नज्म याद  आती है ," यादों का एक झोंका आया , मिलने हमसे बरसों बाद......"
एक बार पुन: लेखक व्योमेश चित्रवंश जी को बधाई। हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों म उनकी अगली किताब भी हमें जिन्दगी के ऐसे बिछुड़े लम्हों को जोड़ने मे सफल होगी।

-सूर्यभान सिंह

गुरुवार, 4 मार्च 2021

यह सड़क मेरे गांव को नही जाती

#व्योमवार्ता/ यह सड़क मेरे गांव को नही जाती / व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 4मार्च 2021


कल सायं प्रख्यात हिन्दी समीक्षक,लेखक और गुरूवर डाॅ०राम सुधार सिंह सर Ram Sudhar Singh ने फोन कर यह सड़क मेरे गांव को नही जाती के लिये यह कहते हुये बधाई दिया कि "अभी तुम्हारी किताब पढ़ के उठा हूँ,आज से पहले ग्रामीण जीवन पर इससे सुंदर व भावप्रधान संस्मरण मैने नही पढ़ा था।" लगे हाथ मैने सर से समीक्षा की माँग कर डाली तो सर ने आश्वस्त किया है कि हफ्ते दस दिन मे वे लिख देगें।

राम सुधार सर के समीक्षा की प्रतीक्षा की हमारी उत्सुकता इसलिये महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे मेरे शुरूआती लेखन को ऊंगली पकड़ कर सिखाने और सुधारने वालों मे से हैं। विश्वास है कि सर की समीक्षा फिर कुछ नया सिखलायेगी।
🙏आपके स्नेह से अभिभूत हूँ सर🙏
(बनारस,4 मार्च 2021, गुरूवार)
#यह_सड़क_मेरे_गांव_को_नही_जाती
#व्योमवार्ता



रविवार, 16 अगस्त 2020

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती........(लेखक की बात)

 

कहने को तो बहुत कुछ है........................ 

 

                परम्परा तो लेखक के दो शब्द लिखने की है पर मेरे लिए आज बहुत कुछ कहने को है। आज भी मैं अपने अन्दर खुद के गांव को खोजता हॅू उसे याद करता हॅू और मेरा गांव मुझे बुलाता है। जब गांव की बात हो तो गांव की पंगडंडियों की याद आ जाती है। एक दूसरे से जुड़ी हुई पंगडंडियां, कभी न खत्म होनेवाली पंगडंडियाॅ इस सड़क से उस सड़क से जुड़ती और जोड़ती पंगडंडियां। गाॅव की बात भी बस वैसे ही है कभी न खत्म होने वाली। बिना किसी सूत्र के जहाॅ से उठा लो वही एक कहानी और यादों का हिस्सा निकल जाता है। हमारे देश के गांवों का स्वभाव बाजारवादी व्यवस्था 1991 में एल पी जी आने के पहले कमोवेस एक जैसा था। एलपीजी यानि लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाईजेशन, ग्लोबलाइजेशन (उदारीकरण, नीजीकरण और वैश्वीकरण) के पहले गांव आर्थिक रूप से गरीब होकर भी आत्म निर्भर थे। अस्पताल, अंग्रेजी, प्राइवेट पब्लिक स्कूल, कम्प्यूटर, टी.वी. बिजली, पाईप वाले पानी से महरूम, कच्ची सड़क पर शहर से दूर, शहर के चालबाजियों से दूर अपने चैपाल में, अपनी पंचायत में, खेतीबारी की बातों में व्यस्त रहने वाले गाॅव, जिसे अपने टाटी पर चढ़ते नेनुयें, सरपुतियों की फिक्र थी जिसे ट्रांसफार्मर जलने पर शाम के धुंधलेपन में घिरते बादलों को देख अपने फसल के घर के कोठरी में धरने की चिन्ता थी। आद्रा से अश्लेषा नखत तक आसमान से पानी न चूने पर उसके पेशानी से पानी चूने लगता था। वह गांव रेडियों पर सात बीस के प्रादेशिक समाचार में मौसम की खबर सुनने को परेशान रहता था पर इन चिन्ता परेशानी और तनाव में भी वह खुश रहता था। सन्तोष करता था। गांव की शादी बारात मिलजुलकर हो जाते थे। किसी की खटिया, किसी का गद्दा, तकिया माॅग कर बारातियों को सुला देते तो अपने-अपने घर से चैका बेलना ले जाकर अड़ोस-पड़ोस की चाची, बुआ, दादी मिलकर पूरे बारात और घरातियों के लिए पूड़िया बेल देती। ऐसे में लड़के कहाॅ पीछे रहने वाले थे। सुबह-सुबह दरवाजे पर आकर वे शादी के दिन खाने के लिए कोहड़ा, कटहल, आलू, बैगन, साग काट लेते तो सलाद में उनके काटे मूली, प्याज, मिर्चा काटने की कलाकारी से लेकर पत्तल परोसने से लेकर खाने के बाद हाथ धुलाने तक में उनकी तत्परता देखते ही बनती थी। वहीं लड़के जिन्हें पूरा गांव दिन भर गांव के उबड़-खाबड़ मैदान में खड़ी दुपहरिया में बैट बल्ला खेलने के लिए कोसते रहता। तब गांव के ख्वाब छोटे से थे इसलिए ज्यादातर पूरे हो जाते थे। जो पूरे नही होते थे उसे किस्मत मानकर सन्तोष कर लिया जाता था। साइकिल की दो पहिया की सवारी के बाद गांव का बन्दा रेल के सैकड़ों पहिये वाली सवारी में ही अपना सुख पाता था। छोटे सपने को अपनी नींद में देखने वाला गांव खुद में एक व्यवहारिक वास्तविकता थी जो परदेश में रहकर कमाने वालों को भी अपने गांव के सपने को जीते हुए गांव खींच लाती थी।

                            पर एलपीजी आने के बाद गांव के सपनों को पंख बन गये। धूलभरी सड़कें काली बनने लगी तो शहर की सुविधाएं भागते हुए गांव आने लगी और गांव के मुस्तकबिल माने जाने वाली वे सपनें भरी आँखें उन्हीं सड़कों को नापती हुई शहर की ओर भागने लगी। गांव में पेट्रोल पम्प, बिजली पावरहाउस, शराब के ठीके, सैलून, कोचिंग, ब्यूटीपारलर, जिम, फार्म हाउस, जनरल स्टोर, कम्प्यूटर सेन्टर खुल गये। टेण्ट हाउस से लेकर ट्रवेल एजेन्सी, मिनरल वाटर डिलीवरी आन होम तक की सुख सुविधाएं अब बस मोबाईल काल भर की दूरी पर रह गयी। रूपये के बदले सेवा देने वाली इस बाजारू व्यवस्था ने गांव वालों को सब कुछ तो व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करा दिया पर वह सुकून और सामूहिक निर्भरता छीन लिया, जिन पर पूरे गांव का सामाजिक ताना बाना था। इन तानों बानों में रिश्ते थे और उनमें अपनापन था। उलाहना, डाॅट डपट, अधिकार और स्नेह था। मनरेगा, प्रधानमन्त्री आवास, हैण्ड पम्प, सोलर लाईट जैसी योजनाओं ने गांव का आर्थिक विकास भले न किया हो पर भ्रष्टाचार, राजनीतिक, वैमनस्यता, ईष्र्या और सम्बन्धों में पूर्वाग्रह और दुराग्रह खूब विकसित किया। आज के गांव में मुख्य परिवर्तन बीसवीं सदी के अन्तिम दशकों से लेकर अब तक होते जा रहे है।

      सच तो ये है कि बीसवीं सदी के आखिरी तीन दशकों में गांव में जन्मी, पली, पढ़ी, बढ़ी वह पीढ़ी परिवर्तन की उस दौर की साक्षी है जिसने लकड़ी की पटरी पर चाक वाली दुधिया (खड़िया) घोलकर अपना सुलेख लिखना सीखा था। वह पीढ़ी जिसने फाउन्डेनपेन ने स्याही की बोतल से स्याही भरने में कईबार अपने हाथ स्याही से नीले काले किया था। लंगड़ी फिर कैची और पैडल के धूरी पर एक पैर रखकर सीट पर उचक-उचक कर साइकिल चलाना सीखने से लेकर घिर्र-घिर्र गोल डायल पर घूमने वाले टेलीफोन से उॅगलियों के छूने और मुॅह से बोलने पर चलने वाले मोबाइल के प्रयोग करने वाली छत पर चढ़ टेलीविजन के एन्टीना को दूरदर्शन के सही सिग्नल पकड़वाने वाली वह पीढ़ी जो अब वेडरूम के विस्तर पर बैठे-बैठे रिमोट के दो तीन बटनों को दबाकर दुनिया के जहाॅ के न्यूज, इण्टरटेनमेन्ट, मूवी, म्यूजिक, आध्यात्म, धर्म, फैशन, विज्ञान और खेल की दुनिया को क्षणांश में अपने आँॅखों के सामने लगे बेड से दूर स्मार्ट टीवी सेट के स्क्रीन को नचाती है। आगे पीछे ऊपर-नीचे घूमा-घूमाकर ब्लैक एण्ड व्हाईट डुप्लीकेट कापी निकालने वाली बड़ी सी फोटोस्टेट मशीन पर कापी के लिए घण्टों इन्तजार करने वाली वह पीढ़ी जो अब नाखुन साईज के मेमोरी कार्ड में सैकड़ों मोटी-मोटी किताबों को लेकर आती है और इलेक्ट्रोस्टेट कलर कापी लेकर चली जाती है। सावन भादों में बरसाती पानी से भरे ताल तलैया पोखरे में नहाकर अपने भाई व पूरे परिवार से कजरी गाकर कुशल क्षेम माॅगने वाली वह पीढ़ी जो अब यू ट्यूब पर लोकगीतों को सुनती तो बच्चों के आ जाने पर ओल्ड फैशन और अनहाइजेनिक कहकर उसे बन्द कर दी है। खाली खेत के खलिहान में बास पर टंगे सफेद कपड़े पर घूमती रील से सिनेमा देखने वाली वह पीढ़ी जो अब मोबाईलों के छोटे से स्कीन पर वेवसीरिज देखने के लिए मुश्किल से समय निकाल लेती है। स्टेशन पर रिजर्वेशन के लिए लम्बी लाईन में खड़ी बड़े चैड़े रजिस्टरों में खुद के लिए सीट बुक कराने वाली वह पीढ़ी जो अब मोबाईल में अंगुलियों से फटाफट सीट रिजर्ब करके आनलाईन ई-टिकट ले लेती है। सांझ ढलते ही चूल्हे में आग सुलगाती कोयले के भट्ठियों का हवा हौकती और उनसे निकलने वाले धुएं से अपना आँख और नाक से बहते यानी को सुड़कती और धोती या चुन्नी के पल्लू से बार-बार पोछती झटपट खाना बनाने वाली वह पीढ़ी जो अब गैस, इंडक्शन, कुकटाप और माइक्रोवेव ओवन में भी खाना बनाते समय जो मैटो और स्वैगी के डिलीवर का इन्तजार करती है। टाईपराईटर के खट-खट में उॅगलियों को तेजी से चलाकर स्पीड बनाती हुई स्टेनोग्राफर बनने के सपने देखने वाली युवा पीढ़ी जो अब फोर्थ, फिफ्थ जेनरेशन के लैपी और नोटपैड पर मुॅह से बोलकर टाइप करने की आदी हो रही है। वह पीढ़ी गाॅव की आखिरी पीढ़ी थी जिसने अपने सपनों को पंख लगते उड़ते ही नही अपनी कल्पनाओं को हकीकत में बदलते देखा। हाॅ यह वही पीढ़ी थी जिसने पेट्रोमेक्स की रोशनी में पाती में बैठकर और टाट बिछाकर पेड़ के पत्तों से बने पत्तल दोनों में खाने-खिलाने का सुख पाया था।

                यह पीढ़ी सपनों के पीछे गाॅव से भाग कर शहर तो आ गयी पर अपने पत्नी और बच्चों की आँखों में नये सपने को पूरा करने में गाॅव को भूलती गयी। भौतिक रूप से उसने खुद को शहर में स्थापित कर लिया। ईएमआई, हाउसिंग लोन, पीएफ, जीपीएफ शार्ट टर्म लांग टर्म लोन, माईक्रो-मैक्रोसेविंग्स से की सहूलियतों से शहर के भीड़भाड़ में सौ गज दौ-सौ गज में घर बनवा लिया या फ्लैट में रहने लगी पर आज भी अकेले होने पर उसका मन भाग कर वन-टू-थ्री बी एच के गाॅव चला जाता है। वही गाॅव जिसे वह पीछे छोड़ आया है। साथ में छोड़ आया है अपने बूढ़े माँॅ-बाप के सूनी आॅँखों में उमड़ता दुलार, और दर्द भरा प्यार बड़ा सा घर और दुआर, खेत खलिहान और वे हरे मैदान। वह भागना चाहता है वापस दुआर पर लगे नीम आम जामुन के उन्हीं पेड़ों की छाॅव में, तुलसी के चैरे के पास अपने बेहद अपने लोगों के पास। पर अब उसके थकते कन्धों पर टंगी जिम्मेदारियों का बोझ, पत्नी की डायबिटीज, खुद का ब्लडप्रेशर, बच्चों के कैरियर और कोचिंग, हर महीने तनख्वाह से कटनेवाली ईएमआई सौ गज का मुर्गी के दरबे जैसा फ्लैट और नीचे गैरेज में खड़ी कार उसे जाने के बजाय रोक लेती है।

                यह गाॅव के सड़क से आने वाले किस्से उसी पीढ़ी के है उनके यादों के है जिन्हें वह तन्हा होते ही ढूढ़ता है और उसमें सुकून पाता है। ये किस्से उसके तन्हा मौन मुस्कराहट के वजह है। सच कहे तो यह लिखा भी उन्ही के लिए गया है । किस्सों के किरदार हममें से ही है। हम खुद। हमारे आस-पास रहने वाले चाचा, ताऊ, बाबा, अम्मा, दोस्त। जो आपको हर कहीं मिलते है हर गाॅव में। क्योंकि गाॅव का मूल स्वभाव तो आज भी वैसा ही है। इन किस्सों को पढ़ते समय अगरचे आपके जेहन में कोई अपना परिचित किरदार नजर आये तो बेहद संजीदगी से उसके बारे में सोचियेगा। यकीन मानिये वह आपका अपना किस्सा ही निकलेगा।

                     शहर जाकर बस गया हर शख्स पैसे के लिए,                          ख्वाहिशों ने मेरा पूरा गाॅव खाली कर दिया। 

                                                          -व्योमेश चित्रवंश,                                      बनारस, शारदीय नवरात्रि, संवत २०७७

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