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सोमवार, 31 मई 2021

व्योमवार्ता / कोरोना के आगे......



#कोरोना के आगे........
  
( कोरोना 2 लाकडाऊन मे प्रेमचंद पथ पत्रिका द्वारा आयोजित राष्ट्रीय आनलाईन संगोष्ठी "विश्वास रखें सब अच्छा होगा" मे व्यक्त विचार,03मई 2021सोमवार)
                         वर्तमान समय बड़े मुश्किलों का है। इस तरह की आपदा के बारे मे संभवतः हम मे से किसी ने कल्पना भी नही की थी। फिल्मों व उपन्यासों की बात छोड़ दिया जाए तो यह चीन जनित मानव आपदा कोरोना हमारे देश ही नही मानव जाति की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई है जिसके समक्ष वर्तमान मे हम असहाय है। विज्ञान के नए आविष्कारों पर चढ़ कर मंगल और चंद्रमा तक यात्रा करने की क्षमता रखते हुए भी हम एक अति सूक्ष्म अदृश्य विषाणु के प्रकोप के आगे स्वयं को किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में मान नतमस्तक हो चुके हैं। कोरोना वाईरस ने जहां राष्ट्र व समाज को आर्थिक क्षति पहुंचाई उससे कहीं अधिक सामाजिक सांस्कृतिक  व पारिवारिक क्षति किया है। इस बीमारी ने मानवीय संवेदनाओं व संबंधों को तार-तार कर दिया। ऐसा नहीं कि मानवीय संवेदनाएं हमसे हमारे अंतस से समाप्त हो गई वरन स्वयं के प्राणरक्षा के भय ने इन संवेदनाओं की भ्रूणहत्या कर दी। संबंधों के तराजू पर स्वयं के प्राणों के आगे दूसरे पलड़े पर  संवेदना का कोई वजन कोई मूल्य चाह कर भी नहीं रहने दिया।       
                   जब वर्ष भर पहले कोरोना की पहली लहर आई थी तब यह मानवीय संवेदनाएं बेबसी में खुद को कसमसाते हुए इस आशा और उम्मीद से जी रही थी कि यह बुरा वक्त है चला जाएगा देश की जनता सरकार के प्रत्येक कदम में सहयोग की भावना के साथ कभी ताली बजाने से लेकर शंख घड़ियाल बजाती रही, कभी कोरोना से जूझ रहे फ्रण्टलाईन वारियर्स डाक्टर्स,पैरामेडिकल्स,पुलिस वालो का हौसला बढ़ाने के लिये दीपक जला कर उनका हौसला बढ़ाती रही। मनोवैज्ञानिक व सामरिक दृष्टि से देखें तो इसका लाभ भी हमें मिला। एक डेढ़ माह के कंप्लीट लॉकडाउन ने हमारे देश को कोरोना से लड़ने की प्राथमिक तैयारी का मौका दिया। मास्क से लेकर सैनिटाइजर, वेंटीलेटर जैसी जरूरी चीजों को तैयार कर हम कोरोना से लड़ने मैदान में आ गए तो सरकार ने आम गरीब जनता के राशन पानी तक की व्यवस्था की। पुलिस का संवेदनशील व सहयोगात्मक व्यवहार आम जन ने पहली बार महसूस किया। कोरोना वाईरस से इस पहली लड़ाई में पूरी तैयारी के साथ उतरने का लाभ यह रहा कि हम कोरोना के पहले युद्ध में विजई हुए। हमारे लड़ने के ढंग से लेकर मनोवैज्ञानिक सामरिकी तक की तारीफ पूरी दुनिया ने किया। इस मुश्किल वक्त मे एक दूसरे से हाथ में हाथ मिला कर जहां हमने एक दूसरे के बिखरे बिछड़े साथियों को ढूंढ़ना शुरू किया जहां हमने जमीन पर करोना को हराया वही अपने अंशदान से पीएम केयर्स फंड को समृद्ध किया। कोरोना के आपदा काल में शारीरिक और भौतिक दूरियां काफी होने के बावजूद हमने एक दूसरे के बिखरे बिछुड़े साथियों को ढूंढ़ ढूंढ कर एक माला में पिरोने का काम बड़े करीने से किया। स्कूली जमाने के दोस्तों से लेकर विश्वविद्यालय और संघर्ष के दिनों के बिखरे हुये साथी एक एक कर प्लेटफार्म पर इकट्ठे हुए और फेसबुक व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर कई कई ग्रुप बन गए। इन सोशल मीडिया ग्रुप ने केवल आभासी स्तर पर नहीं बल्कि वास्तविक धरातल पर भी आपस में एक समझदारी व साझेदारी कायम किया। आपसी संबंध भौतिक रूप से दूर रहने के बावजूद मन से जुड़ते गये, जिंदगी फिर वैसे ही चलने लगी जैसे कोरोना के पहले चलती थी। सरकार लगायत वैश्विक संगठन हमें बार-बार चेतावनी देते रहे पर हम फिर अपने रंग में रंग गए 'हम न मरब  मरिहै संसारा' के तर्ज पर ।
         भूल तो यही हो गई जो हमने काशी के गूढ़वादी फक्कड़ अलमस्त कबीर के 'हम न मरब मरिहै संसारा' का अर्थ न समझ खुद को ही  स्वयं संप्रभु मान बैठे। हमने यह नहीं सोचा, एक क्षण के लिए भी नहीं कि हम अपने अंदर के 'अहं' का प्रतीक है और यदि हमने अपने 'हम' अर्थात 'अहंकार' को नहीं मारा तो हम अपने 'जियावनहारा' अर्थात परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकते। यह परमात्मा ही कल्याणकारी हमारा सुख है हमारी शांति है हमारी संतुष्टि है।  परंतु हमने करोना के बाद अपने अहंकार को बस में नहीं किया , दिशानिर्देश नही माने, संकल्पबद्ध नही किये। मास्क सावधानी भीड़ सब को अनदेखा कर दिया हमने तो हमारे अहंकार को मारने प्रकृत को आना ही था। परिणाम सामने है आज करोना कि दूसरी लहर के आगे हम असहाय हैं। जिस भारत की पूरे विश्व में कोरोनावायरस के लिए प्रशंसा हो रही थी आज वही अपनी गलतियों से संपूर्ण विश्व का दयापात्र बना हुआ है। गलती कहां हुई? यह आत्मआलोचना व आत्मनिरीक्षण का विषय है पर कड़ुआ सच यह है कि हम में से कोई भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।चाहे वह प्रधानमंत्री हो या प्रधान सचिव ग्राम प्रधान हो या गांव के पटवारी। वास्तविकता यह है कि हम सब ने बेहद गैर जिम्मेदाराना तरीके से अपनी लापरवाही प्रदर्शित किया है।आज बंगाल तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम के विधानसभा चुनाव के लिए न्यायपालिका हाई कोर्ट मद्रास चुनाव आयोग को हत्या जैसे अपराध का दोषी बताती है। वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट पंचायत चुनाव पर उत्तर प्रदेश सरकार को अप्रैल के आखिरी तारीख तक अनिवार्य रूप से चुनाव कराने का आदेश देकर स्वयं को साफ पाक कैसे कह सकती है?वही देश के सर्वोच्च जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री, मुख्यमंत्री सहित बड़े-बड़े राजनेताओं द्वारा की जाने वाली चुनाव रैलियों में 'दो गज की दूरी मास्क है जरूरी' का सिद्धांत चुनावी प्रचार पार्टियों मे चुनावी पम्फलेट की तरह उड़ता नजर आया। देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री और सरकार कोरोना की सुनामी को झेलने के बावजूद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पाँच सर्वाधिक प्रभावित जिलों में लॉकडाउन लगाने के निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर स्टे ले आए और हमारा सर्वोच्च न्यायालय दूसरे प्रदेशों में हो रही घोर लापरवाही प्राणवायु और अस्पतालों में पेड़ों और श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए तीन-तीन दिनों से लाइन में लगे लोगों के सहूलियत के लिए कड़ी टिप्पणी जारी करने के बावजूद उच्च न्यायालय के निर्देश को स्थगित कर दें तो आमजन अपने अपनों की सेवा चिकित्सा और प्राण रक्षा के लिए कहां जाएं ? जनता की दृष्टि मे इस कागजी कवायद ने न्यायपालिका पर भी मूकप्रश्न उठाया है। बार-बार चिकित्सा सेवा और सुविधाओं के विस्तारीकरण की आवश्यकता और आवश्यक धनराशि होने के बावजूद हमारे सर्वशक्तिमान सत्तानियंता व अधिकारीगण पूरे साल में 1000 वेंटिलेटर और हर जनपद में ऑक्सीजन प्लांट भी नहीं लगा पाए तो दूसरों को सामाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश देने वाले न्यायालयों में सोशल डिस्टेंसिंग का कितना अनुपालन हुआ यह किसी से छिपा नहीं है फिर आम जनता तो नियम कानून ना मानने को अपना जन्मसिद्ध मूल अधिकार ही मानती है उसके लिए '2 गज की दूरी मास्क है जरूरी' सैनिटाइजेशन सोशल डिस्टेंसिंग जैसी बातें ही बेमानी थी। कुल मिला जुला कर अगर हम पूरे कोरोना सुनामी के दूसरे लहर के लिए किसी पर उंगली उठाने की स्थिति में है तो वह शीश महल में पत्थर फेंक कर उसके किरिचों मे खुद का बिगड़ता चेहरा देखने वाली बात होगी।
             परन्तु कोरोना का जो सर्वाधिक दुखद पहलू है आपसी संवेदनाओं और संबंधों की तिलांजलि। कोरोनावायरस आज के समय में अश्पृश्य जैसे हो गए जहां पुत्र पिता की, व्यक्ति अपने निकटतम परिजनों की अंत्येष्टि भी नहीं कर पाया। छोटी-छोटी घटनाओं पर एक दूसरे से कंधा मिलाने वाले लोग आज मृत्यु जैसे संस्कारों पर भी साथ नहीं दे पा रहे हैं। आपदा मे अवसर के नाम पर मानव गिद्धों ने दो रूपये की दवायें बीस रूपये और 899/- का रेमडेसिवर ७५ हजार एक लाख मे बेंचने से बाज नही आये।  अस्पतालों ने कोरोना के नाम पर बिना किसी सुविधा के १५००/- वाले  बेड पर डेढ़ लाख रूपये तक वसूला तो लाशों को कंधा देने के नाम पर दस कदम तक लाश पहुंचाने के आठ से सोलह हजार , एंबुलेंस के किराये  दो दो लाख रूपये तक वसूले गये। नकली दवा इंजेक्सन डाक्टर ड्राईवर एंबुलेंस की तो बात ही छोड़ दिजिये। किस मानसिक आर्थिक आध्यात्मिक विकास की ओर बढ़ रहा है हमारा भारतीय समाज? कैसे बचा जाय इन मानव गिद्धों से यह प्रश्न तो सदैव खड़ा रहेगा।
                      हम निराशाजनक और नकारात्मक पहलू को छोड़ दें तो हर व्यक्ति मन से एक दूसरे के पीड़ा में शरीक हैं यदि वह भौतिक रूप से अपनों के लिए उपस्थित नहीं हो पा रहा है तो यह उसकी मर्जी या मनोदशा नहीं है वरन आज की दुर्गम परिस्थितियां हैं। मैं फेसबुक व्हाट्सएप और अखबारों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम देखता हूं कि इस आपदा काल में अपनी आवास से ही मृत आत्मा को श्रद्धांजलि दें तो सोचता हूं यह विनम्र निवेदन है या सूचना की औपचारिकता?कभी हमने ऐसे परिवेश और परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी पर जो सच हमारे सामने हैं हम उसे अस्वीकार नही कर सकते । आज हमें उसमें ही स्वयं को समायोजित करने के अतिरिक्त कोई पर्याय भी नहीं है । आवश्यकता परिस्थितियों को सकारात्मक रूप से लेने की है। माल्थस ने कहा था प्रकृति अपने आवश्यकतानुसार जनसंख्या को नियंत्रित करती है संभवत यह प्रकृति का ही स्व नियंत्रण हो, पर प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया भी है उसका भी हमें धन्यवाद देना चाहिए कभी-कभी किसी पेड़ के नीचे बैठकर उस पर चहचहाती चिड़ियों की आवाज सुनिए और पेड़ के पत्तों से बहते हुए सनसनाहट को महसूस करिए तब आपको पता चलेगा की प्रकृति ने हमें कितनी प्यारी चीजें दी है। कभी किसी तालाब के किनारे चुपचाप बैठ उसमें भागती उछलती मछलियों को देखिए और उन पर ध्यान लगाए बगूले की एकाग्रता को महसूस कीजिए तब पता चलेगा कि संसार में कोरोनावायरस केअतिरिक्त भी बहुत कुछ है जोअच्छा है बस उसे देखने की जरूरत है। जीवन की आपाधापी में हमने उसके लिए दो पल का वक्त ही नहीं निकाला । कुछ नहीं तो घर के बाहर एक छोटे खुले डिब्बे में चिड़ियों के लिए पानी रखकर गमले में खुद के लगाए पौधे को ध्यान से देखिए तब लगेगा कि जीवन बहुत खुशनुमा है और कोरोनावायरस कुछ भी नही बल्कि इससे हट के जिन्दगी बहुत कुछ है जिसे जीना है महसूस करना है आनंद लेना है।

-व्योमेश चित्रवंश
संपर्क सूत्रः 9450960851
(लेखक विधि व्यवसायी व पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता है।)
http://chitravansh.blogspot.com














शनिवार, 25 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / जीत जायेगें हम ........

व्योमवार्ता/ जीत जायेगें हम...........:व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24अप्रैल 2020

             कोरोना से जंग जारी है, यह जंग अनोखी है, शायद इतिहास मे पहली बार। जिसे जीतने के लिये घर से बाहर निकल कर रणभूमि मे लड़ने के बजाय घरों मे रह कर जीतना है। ऐसी जंग जहॉ जीत के लिये सेना की जरूरत नही बल्कि खुद मे सेना बनना है। ऐसी जंग जिसमे जीतने के लिये "जीत जायेगे हम, तू अगर संग है" के बजाय तेरे बगैर अकेले ही जूझना है। इस जंग मे मोर्चे पर लड़ रहे कोरोना वारियर्स को सहयोग देने हमे बस खुद पर नियंत्रण रख अपने को सोशल डिस्टेंसिग मे बनाये रखना है, यहॉ तक कि हम कोरोना वारियर्स से हाथ मिला कर उन्हे बधाई देने मे उनके मोर्चे को कमजोर कर सकते है। बस जरूरत इस बात की है कि हम खुद पर भरोसा रख अपने नीति नियंताओं के निर्देशों का पालन करते रहे। एक अनुमान के अनुसार यदि देश मे समय से लाकडाऊन नही हुआ होता तो शायद स्थिति की भयावहता की कल्पना भी हम नही कर सकते। इटली, स्पेन, इंग्लैंड की स्थिति हम सब देख रहे हैं । अमेरिका जैसी महाशक्ति भी कोरोना से हिल गई है ऐसे मे विश्व के दूसरे  सबसे बड़ी जनसंख्या वाले हमारे देश से कोरोना हार रहा है तो उसके लिये सिर्फ़ हमारी संकल्प शक्ति, एकता व अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है।  अपवाद स्वरूप अवमानना की  छिटपुट घटनाएँ हुई है पर इस समय उन्हे चर्चा का मुद्दा न बना कर आगे बढ़ने की जरूरत है।
       आज का जो सबसे मुश्किल सवाल है वह कोरोना के बाद हमारे भविष्य का है। कोरोना के चलते उद्योग धंधे बंद होने से सेवा क्षेत्र ठप्प होने से बेरोजगारी की संख्या पहले की तुलना मे दो से ढाई गुनी बढ़ सकती है। व्यवसाय आधारित सेवायें  भी नकद प्रवाह कम होने से प्रतिगामी होगीं। मध्यवर्गीय जनसंख्या स्वयं के जीवनस्तर को बरकरार रखने के लिये परेशान होगी ऐसी स्थिति मे एकमात्र विकल्प मात्र हमारे देश भारत के ही पास है। भारतीय संस्कृति मे बताये गये सादा जीवन उच्च विचार वाली परंपरा को हमें अपने व्यवहारिक जीवन मे उतारना होगा। ऐसे मे प्रोफेसर जे०के०मेहता के ईच्छा विहीनता के सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वयं को संतुष्टि के उच्चतम स्तर तक प्राप्त कर सकेगें। निश्चित ही आज के भौतिकवादी एवं स्वसंतुष्टि को सर्वोपरि मानने वाले जीवनशैली व परिवेश मे यह दुष्कर है पर यदि हमे स्वयं को मानसिक हताशा, आर्थिक समस्या और अनिश्चित भविष्य के मकड़जाल से स्वयं को निकालना है तो इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय भी नही। प्रो० मेहता ने मनुष्य की आवश्यकता को अनन्त माना है जिसमें एक आवश्यकता की पूर्ति होने पर दूसरी आवश्यकता तुरंत जन्म ले लेती है और यह अवचेतन आवश्यकताओं की होने की स्थिति बन जाती है। यदि हम अपनी आवश्यकता को सीमित मानते हुये मानसिक सुख को भौतिक सुख के ऊपर मान लें और स्वयं को अपने ,अपने परिवार अपने समाज के आत्मिक व आध्यात्मिक कल्याण के लिये एक तंतु के रूप मे स्वीकार करते हुये कल्याण के उद्देश्य को प्रथम मान लें तो निश्चित ही इस हताशा के दौर से हम सफलतापूर्वक विजयी हो कर निकलेगें।
             कोरोना ने हमे एक चुनौती दिया है और लाकडाऊन ने एक अवसर। पिछले एक महीने से हम अपने घरों मे परिवार के साथ रह कर अभूतपूर्व स्थिति मे कार्य करते या न करते हुये रह रहे हैं इससे दुनिया पर कोई फर्क नही पड़ा है। यह लाकडाऊन हमे बताता है कि आने वाले दिनो मे भी दुनिया पर कोई फर्क नही पड़ने वाला। अगर कहीं फर्क पड़ना है तो वह सिर्फ़ व सिर्फ हम पर, हमारे सोच पर, हमारे मानसिक अवस्था पर और हमारे द्वारा बनाये गये परिस्थितियों पर। आज जरूरत इसी बात की है कि हम स्वयं के अंदर झॉक कर स्वयं को ढूढ़े। स्वयं के हिसाब से परिस्थितियों का निर्माण करें तो निश्चित ही भविष्य हमारा है। हम अपने जीवनचर्या का आत्मनिरीक्षण करते हुये  आत्मसंयम व आत्मनियंत्रण के द्वारा उसे आत्मकल्यार्थ परिवर्तित कर अपना सके तो कोरोना का दौर भी मुश्किल नही।
(बनारस,24अप्रैल 2020,शुक्रवार)
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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता/ न्याय दिलाने वालों का वर्तमान संघर्ष : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 24 अप्रैल 2020

न्याय दिलाने वालों का वर्तमान संघर्ष

                                                                      *व्योमेश चित्रवंश

          कोरोना संकट से देश को लाकडाऊन हुये एक महीने से ऊपर हो गया है, पर देश की अदालतों मे यह लाकडाऊन उससे भी दो तीन दिन पहले ही शुरू हो गया था यदि हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहॉ की अदालतें कमोबेस होली की छुट्टियों से ही लाकडाऊन का दंश झेलने लगी थी। होली की छुट्टी के बाद 14 व 15 मार्च को दूसरे शनिवार व रविवार का अवकाश था।16 मार्च को प्रदेश बार कौंसिल के आह्वान पर अधिवक्तागण न्यायिक सेवा से विरत रहे। 17 मार्च से उच्च न्यायालय के आदेश से केवल अत्यावश्यक मामलों , स्टे व जमानत पर सुनवाई किये जाने के आदेश के साथ ही न्यायिक प्रक्रिया मे किसी भी कागजात का आदान प्रदान, पत्रावलियों पर हस्ताक्षर आदि बंद कर दिये गये और 23 मार्च की आधी रात से पूरे देश मे लाकडाऊन के चलते अदालतों के ताले बंद कर दिये गये। तब से यह व्यवस्था फिलहाल 27अप्रैल तक जारी है और उम्मीद है कि अभी कम से कम 3 मई तक, और आवश्यकतानुसार आगे भी अदालतों मे यह लाकडाऊन जारी रहेगा। कोरोना से बचाव के लिये यह आवश्यक भी था क्योंकि न्यायालय परिसर किसी जनपद का वह महत्वपूर्ण और सबसे भीड़ भाड़ वाला स्थान है जहॉ पूरे जनपद से विभिन्न वर्ग के लोग विभिन्न स्थानों से विभिन्न प्रकार से आते है ऐसे मे संक्रमण की सबसे ज्यादा संभावनाएं वहॉ मिल सकती है। परन्तु इस लाकडाऊन ने न्यायालयों पर आधारित सेवा से आय उपाार्जन करने वालों के समक्ष घोर अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है । यह संकट मात्र आर्थिक नही वरन मनोवैज्ञानिक व सामाजिक भी है, साथ ही साथ इसके सांस्कृतिक पहलू भी है जो हमारे समावेशी आश्रित जीवन व्यस्था पर प्रभाव डाल सकते हैं। यह एक व्यापक सोच का विषय है।
            अदालतों मे काम कर रहे सेवारत सरकारी या न्यायिक कर्मचारियों के अतिरिक्त शेष सभी रोज कमाओ रोज खाओ वाली आय व्यय व्यवस्था पर निर्भर है। इनमे प्रशिक्षु से लेकर वरिष्ठ अधिवक्तागण, उनके मुंशी के अतिरिक्त कचहरी मे टाईप , फोटोस्टेट करने वाले, स्टांप वेन्डर, फोटोग्राफर, स्टेशनरी विक्रेता, मुहर बनाने वाले, चाय पान फल विक्रेता, कोट बैण्ड बेचने वाले, किताब बेचने वाले, साईकिल स्टैण्ड चलाने वाले, मोबाईल रिचार्ज करने वाले, जमीन व बाकी चीजों के दलाल सभी शामिल है। इसके अलावा भी इन न्यायिक परिसरों पर अपने पेट के लिये आश्रित एक वर्ग और है जो कचहरी का हिस्सा न होते हुये भी कचहरी से रोजी रोटी पाता है। इनमें घूम घूम के जूता पालिस करने वालों से लेकर परिसर के किसी कोने मे बैठ कर जादू मदारी दिखाने वाले, घूम घूम कर सामान बेचने वाले, भीखमंगे, और कुछ भी नही कर के केवल चौकी चौकी घूम कर सलाम कर सौ पचास रूपये पाने वाले भी है। एक महत्वपूर्ण वर्ग आउटसाईडर के संख्या को भी इसी मे सम्मिलित करने की जरूरत है जो न्यायालयों के बाबूओं से लेकर, रिकार्डरूम, डीएम कार्यालयों लगायत तहसील के लेखपालों के अवैधानिक सहायकों के रूप मे लिखने पढ़ने से लेकर फील्ड ड्यूटी तक के सभी कार्य करती है। आज की तारीख मे यह संपूर्ण व्यवस्था व लोग हाँथ पर हाँथ धरे बैठे हुये है। दुर्भाग्य यह है कि यह पूरा वर्ग असंगठित है जिसमे मात्र अधिवक्ताओं व स्टांपवेंडरों को छोड़ न तो किसी का पंजीकरण न है न संगठन। ईमानदारी से अपने कौशल व मेहनत से काम करने वाले ये ज्यादातर लोग समाज के उस वर्ग से है जिनके पास न तो राशन कार्ड है न ही कोई सरकारी सुविधा वाली व्यवस्था। ऐसे मे रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाला यह वर्ग अपने जीवन के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। अब उनके ऑखों के सपने भी मरने लगे है। आर्थिक वर्ष के शुरूआत मे ही यह बुरा दौर उनके लिये तब आया है जब उन्हे अपने आने वाले भविष्य के लिये अपने बच्चों के लिये नये सत्र मे प्रवेश लेना था। नये यूनिफार्म बनवाना था, नयी किताब कापी खरीदनी थी नये सपने देखने थे पर अब ये अब सूनी ऑखों के सपने है। वह स्वयं के अंतस से ही जूझ रहा है। आर्थिक तंगी के साथ वह मानसिक रूप से परेशान है जिससे निकलने का रास्ता वह नही ढूढ़ पा रहा है ।
      इस पूरी व्यवस्था के सबसे बड़े अंग और व्यवस्था की धूरी अधिवक्ता वर्ग की भी स्थिति बहुत अच्छी नही है। अपने अपने घर परिवार मे बैठे अधिवक्ता आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं । आलमारी मे जमा मुकदमों की पत्रावलियॉ और हैंगर मे लटके कोट आज उन्हे बोझ लग रहे है जो उनके पारिवारिक बोझ को हल्का करने मे अक्षम हो गये हैं। 'वकील साहब' का सम्मान बचाने के लिये वह स्वयं के  प्रति खुद को बेचारा अनुभव कर रहा है। उसकी मुश्किल यह है कि वह अपनी व्यक्तिगत दुश्वारियों को खुल कर किसी से कह भी नही सकता। सरकार इस वर्ग से अधिवक्ता कल्याण के नाम पर शुल्क, कोर्ट फीस, सहयोग राशि लेती तो है पर इस वर्ग पर वह उन्ही की राशि को खर्च नही करना चाहती। अधिवक्ता अधिनियम के  अन्तर्गत भी इस तरह के किसी आकस्मिक संकट के लिये कोई विशेष प्रावधान नही है और स्थानीय बार संघ आपसी राजनीति और स्वयं के विरोधाभासों मे इस तरह उलझे है कि उनसे किसी तरह की सहायता की उम्मीद ही बेमानी है। दुर्भाग्य यह है कि राजनीति मे शुरू से दबदबा व दखलन्दाजी रखने वाले  इस व्यवसाय के प्रतिनिधि जो वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था मे असरदार व अच्छे पदों पर है वे भी अपने लोगों के प्रति उदासीन है। अधिवक्ता वर्ग के साथ एक और बड़ी समस्या है समाज मे उनके प्रति अविश्वास, इसी कारण बैंक एवं वित्तीय संस्थान उन्हे ऋण आदि देने से कतराते है ।उनके लिये स्वयं की कोई सहकारी संस्था नही है जो वक्त बेवक्त उन्हे आवश्यक वित्तीय सहायता कर सके। और तो और उनके व परिजनों के  स्वास्थ्य और चिकित्सा हेतु भी सरकारी अथवा गैरसरकारी रूप से कोई योजनाएं नही है।
                       विधि व्यवसाय बेहद गलैमरस होने के बावजूद बहुत कठिन तपस्या एवं त्याग वाला व्यवसाय है । दूसरो को न्याय दिलाने के लिये प्रतिदिन संघर्ष करने वाला अधिवक्ता समाज स्वयं को स्थापित करने के लिये जो संघर्ष करता है वह पेशापर्यन्त चलता रहता है। कनिष्ठ अधिवक्ता से वरिष्ठ अधिवक्ता तक चलने वाले संघर्ष से इतर आज इस संकट से सभी अधिवक्ता समान रूप से जूझ रहे हैं।वर्तमान समय मे मुकदमों के प्रस्तुतीकरण को देखा जाय तो न्यायालय मे चलने वाले साठ प्रतिशत मुकदमे कचहरी के बीस प्रतिशत वरिष्ठ अधिवक्ताओं के डायरियों मे हैं। शेष चालीस प्रतिशत मुकदमें बाकी अधिवक्ताओं के पास है ऐसी स्थिति मे चालीस प्रतिशत अधिवक्ता लगभग सदैव कार्य के अभाव मे रहते है। इनमे भी कनिष्ठ अधिवक्ताओं के लिये बड़ी विषम स्थिति होती है। यह भी देखा जा रहा है कि पिछले दशक मे विधि संस्थाओं के भारी संख्या मे बिना गुणवत्ता के पनपने से पेशे के प्रति अगंभीर अधिवक्ताओं का भी इस पेशे मे प्रवेश हुआ है। इसके लिये भारतीय एवं प्रादेशिक विधिज्ञ परिषद को विचार करना होगा पर फिलहाल वह विचारणीय तथ्य नही है।
                                  आज की समस्या यह है कि समाज मे इस सम्मानित व रसूखदार व्यवसाय की अंदरूनी समस्याओं का समाधान किस तरह हो, कुछ स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ एवं सक्षम अधिवक्तागण इस आपदा मे सहयोग देने के लिये अपने स्तर से प्रयास कर रहे है पर वह नाकाफी है ।अधिवक्ता की गरिमा,आत्मसम्मान एवं आत्मस्वाभिमान भी उन्हे इस तरह के सहायता लेने मे आड़े लग रहे है। वे अपने  संठनों अपने विधिज्ञ परिषदों व सरकार से अवश्य सहयोग की प्रत्याशा मे है जो उनके स्वाभिमान का सम्मान करते हुये एक उचित सहायता वृत्ति देकर उन्हे इस आर्थिक संकट से उबार सके। यह संकट मात्र आर्थिक ही नही , आने वाले निकट भविष्य मे आर्थिक अनिश्चितता के प्रति भी उन्हे डरा रहा है। निश्चित ही अदालते खुलने पर उन्हे व्यवस्थित होने मे थोड़ा समय लगेगा ओर मुकदमे लड़ रहे मुवक्किल जो स्वयं आर्थिक संकट और नकदी मुद्रा का अभाव झेल रहे है वे अधिवक्ताओं को उनका विधिक शुल्क पर्याप्त रूप से दे पायेगें ऐसी संभावना दूर दूर तक दिखाई नही देती। यह स्थिति तब तक चलती रहेगी जब तक जनसामान्य मे नकदी मुद्रा सामान्य तौर पर प्रसारित व प्रचालित न  होने लगे। जिस तरह से सारे कारोबार उद्योगधंधे बंद पड़े है उससे अभी इस तरह के सुचालित नकदी  मुद्रा के प्रसार की संभावनाएं दूर दिख रही है। संतोष इस बात का है कि कृषि क्षेत्र के कार्य चल रहे है जिससे आने वाले दिनों मे उद्योग व सेवा की गति  को त्वरा दिया जा सकता है। सरकार भी जब संगठित से लेकर असंगठित क्षेत्रों पर ध्यान देते हुये उनके लिये विशेष पैकेज एवं अवसर दे रही है ऐसे मे उसे अधिवक्ताओं एवं उनसे जुड़े कर्मचारियों एवं आश्रित कर्मियों पर ध्यान देना होगा ताकि समाज को न्याय दिलाने वाला यह वर्ग अपने स्वाभिमान को बरकरार रखते हुये अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
(बनारस, 24 अप्रैल 2020, शुक्रवार)
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शनिवार, 18 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / भूख का ईमान (लघुकथा) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17अप्रैल 2020

लघुकथा/

                        भूख का ईमान

                                               -व्योमेश चित्रवंश

"आज तुम्हारे तरफ तो सामान बॉटने वाली गाड़ी गई थी ?" बर्तन मॉजने वाली के आते ही मेरी पत्नी ने उत्सुकता जताई।

"जी भाभी, सबको राशन का पैकेट दिया था।"

"तुम्हे मिला?" पत्नी ने पूछा।

"नही, हमें नही मिला भाभी, जिन लोगो के पास राशन नही था , पूछ कर उनको दे रहे थे।"

         कल सुबह जब मेरी पत्नी ने बताया था कि अपनी बर्तन करने वाली के पास खाना बनाने के लिये कुछ भी नही है तो मैने अपने मित्र मुसीर भाई से कहवा कर उसके लिये एक किट राशन सामग्री की व्यवस्था करवाया था।

" तुम्हे भी बता देना था कि तुम्हारे पास नही है, ले कर रखी रहती। काम आता। " पत्नी ने उसे ज्ञान देते हुये कहा।

" कैसे कह देते भाभी, ये तो झूठ होता न, फिर और लोगों को भी तो जरूरत है, वे इस बंदी में कैसे राशन पायेगें जब हम लोग झूठ बोल कर दो दो तीन पाकेट रख लेगें।" वो बहुत सरलता से बोली।

       हम और पत्नी उसकी इमानदारी सुन एक दूसरे का मुँह देख रहे थे और वह हमारे भावों से बेखबर चुपचाप बर्तन धोने में व्यस्त थी।

(बनारस, 17अप्रैल 2020, शुक्रवार)

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता /आज कुरुक्षेत्र को पुन: समझते हुये : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,16अप्रैल2020

व्योमवार्ता /आज कुरुक्षेत्र को पुन: समझते हुये

पर सको सुन तो सुनो, मंगल जगत के लोग!
तुम्हे छूने को रहा जो जीव कर उद्योग,
वह अभी पशु है; निरा पशु, हिंस्र, रक्त-पिपासु,
बुद्धि उसकी दानवी है स्थूल की जिज्ञासु।
कड़कता उसमें किसी का जब कभी अभिमान,
फूँकने लगते सभी हो मत्त मृत्यु-विषाण।

       कोरोना को प्रसारित करने वाले उत्पातियों पर कुरुक्षेत्र की यह पंक्तियॉ अक्षरस: सत्य प्रतीत होती है। वास्तव मे चिकित्सकों, सुरक्षाकर्मियों पर आक्रमण करना, रोग को बढ़ाने के उद्देश्य से स्थान स्थान पर थूकना, मलमूत्र त्यागना इनके मानव रूपी हिंस्र पशु होने को ही सिद्ध करता है।
(बनारस,१६अप्रैल २०२०, गुरूवार)
#कोरोना  #कुरूक्षेत्र  #Vyomvarta
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व्योमवार्ता/ वो बेचारा सा बड़ा आदमी.....(कहानी, १६अप्रैल २०२०)


 व्योमवार्ता/ कहानी,

   वो बेचारा सा बड़ा आदमी................                                                                  * व्योमेश चित्रवंश

                                              उनका नाम पंडित डॉ0 चन्द्रकेतु उपाध्याय, त्रिकालदर्शी ज्योतिषाचार्य,एम0ए0 (ज्योतिष), पीएच0डी0 है ।साई मंदिर के पास उनका आफिस कम चैम्बर है। मन्दिर वाली गली में मिठाई व पूजन सामग्री के शामिलात दुकान के बगल में 8 बाई 10 के कमरे में। मिठाई और पूजन सामग्री वाले दुकान का पहले हिस्सा था पर वक्त की नजाकत और ग्राहकों का मिजाज सही ढंग से मापने वाले गुप्ता जी ने साई मन्दिर बनने के बाद अपने घर के सामने वाले हिस्से में दुकान बनवाते समय उसे बीच में पार्टीशन दीवार डालकर अलग कर दिया था। सबसे पहले गुप्ता जी ने उसमें मिठाई की दुकान खोली। बृहस्पतिवार के दिन साईबाबा का दिन होने के कारण अपनी पत्नी भी साथ बैठाना शुरू किया। फिर दुकान के अगले भाग में पीले गेंदों की माला लगाकर खुद बैठने लगे और मिठाई की दुकान पूरी तरह अपनी धर्मपत्नी को ही सुपुर्द कर दिया। उसी समय पं0 चन्द्रकेतु जी ने उनसे मिलकर बगल वाले खाली 8 बाई 10 वाले दुकान को भाड़े पर लेने की इच्छा जताई तो गुप्ता जी ने चार हजार रूपये प्रतिमाह के भाड़े पर बिना कोई सिक्योरिटी राशि लिये इस शर्त के साथ पंडित जी को किराये पर रखा कि वे अपने पूजापाठ की सारी सामग्री गुप्ता जी की ही दुकान से खरीदवायेंगे। पंडित जी भी सही जगह की उपयोगिता समझ कर राजी हो गये। धीरे-धीरे पंडित जी के कारण गुप्ता जी की और गुप्ता जी के  वजह से पंडित जी की दुकान जम गयी। गुरूवार को तो गुप्ता जी उनकी पत्नी और पंडित जी तीनों लोग व्यस्त रहते। बाकी दिनों भी पंडित जी के आफिस कम चैम्बर में दो चार महिला पुरूष ग्राहकों को हमेशा देखा जाने लगा।
              पंडित डा0 चन्द्रकेतु उपाध्याय जी मूलतः मध्य प्रदेश के उत्तरी नीमच के रहने वाले हैं। वे कक्षा आठ की परीक्षा देने के बाद काशी के संकठा मन्दिर वाली गली में स्थित गुरूकुल में पढ़ने के उद्देश्य से आये तो गुरूकुल पाठशाला से पूर्व व उत्तर मध्यमा करने के बाद भी वापस मध्य प्रदेश नहीं गये। गुरूकुल में ही भण्डारी जी से सेटिंग करके उन्होंने दोनों समय के भोजन व्यवस्था का प्रबन्ध कर लिया और वहीं सिद्धेश्वरी गली में एक गुजराती परिवार के यहॉ किराये पर कमरा लेकर रहने लगे। चन्द्रकेतु ने स्वयं की पहचान बनाने की एक ललक थी वे अपनी पहचान नीमच के बजाय काशी के पढ़े लिखे विद्वान ब्राह्मण के रूप में बनाना चाहते थे सो उन्होंने अपना सारा ध्यान कर्म धर्म ध्यान साधना के अपने पढ़ाई में लगाया और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और फिर ज्योतिष में आचार्य करके यहीं के होकर रह गये। आचार्य के अध्ययन के दौरान ही वे अपने गुरूजी के साथ रूद्राभिषेक आदि कर्मकाण्डों में उनके सहयोगी बनकर जाने लगे थे और गुरूजी कृपा से धनोपार्जन भी होने लगा था। उसी दौरान परिवार वालों ने विवाह के लिए दबाव बनाना प्रारम्भ कर दिया। प्रारब्ध को स्वीकार करते हुए चन्द्रकेतु ने नीमच के ही एक कुलीन परिवार के ब्राह्मण इण्टर पास कन्या से विवाह कर लिया और विवाहोपरान्त पत्नी को लेकर काशी ही आ गये। आचार्य पाठ्यक्रम पूर्व होने तक गुरू जी ने उन्हें पूर्णतया कर्मकाण्डी ब्राह्मण के रूप में प्रतिस्थापित करा दिया था। तो बहुत तो नही, पर आवश्यकतानुसार संतोषजनकआय प्राप्ति भी होने लगी थी। कर्मकाण्ड करते हुए एवं विभिन्न जजमानों के यहॉ उनके भाग्य पत्रिका का ऑकलन करते-करते समय के आवश्यकतानुसार गुरू जी के ही परामर्थ पर चन्द्रकेतु ने चक्रवर्ती (पीएच.डी.) पाठ्यक्रम में अध्ययन के लिए नामांकन लिया एवं तीन वर्ष में पीएच डी. की उपाधि भी प्राप्त कर लिया। इस मध्य उनकी पत्नी ने उन्हें दो बार पिता की उपाधि से भी अलंकृत करा दिया। बढ़ते परिवार, बढ़ती महगाई गुरूजी का अन्य शिष्यों पर ध्यान, आवास समस्या आदि को दृष्टिगत रखते हुए चन्द्रकेतु ने एक बार यू ही अपने एक जजमान से चर्चा किया तो उसने पंडित जी को वरूणापार के नयी बसती हुई कालोनियों में रहने का सुझाव दिया। उसी जजमान ने यह भी बताया कि उसका स्वयं का एक फ्लैट अयोध्याधाम कालोनी के नये अपार्टमेण्ट में रिक्त पड़ा है। पंडित जी चाहे तो वह वहॉ किराये पर रह सकते है, हॉ किराया आदि के सम्बन्ध में पंडित जी उसे जजमान न मानकर फ्लैट का मालिक मानते हुए हर महीने के प्रथम सप्ताह में किराये का भुगतान करते रहेंगे तो उसे अपने बैंक के ईएमआई (मासिक किश्त) को भरने में सुविधा रहेगी। चन्द्रकेतु ने अपनी पत्नी से बात किया तो उसकी बाहें खिल गयी। वह स्वयं अब मोहल्ले के बसाहट वाले कई किरायेदारों के ऑगन वाले घर से निकल कर टी.वी.धारावाहिक में दिखाये जाने वाले एकाकी फ्लैट और उससे बनते अपार्टमेण्ट के परिवार का हिस्सा बनने को आतुर थी। साथ ही उसे बच्चों के विषय में भी तो सोचना था। अगले अप्रैल में माही का नाम सेण्ट मेरी या सेण्ट जोसेफ में लिखवाने का कोई फायदा तब तक नही मिलना था जब कि इस आठ किरायेदारों वाले ऑगन के किराये वाला घर न छोड़ा जाये। 
अस्तु, चन्द्रकेतु पक्के महाल के गली कूूंचे वाले बनारस को छोड़कर सहित वरूणापार वाले शहरी वाराणसी में आ गये। पर यहॉ आने के बाद पता चला कि पुराने मोहल्ले जैसा आदर और पहचान यहॉ नही है। यहॉ रास्ते में आते-जाते हर कोई उन्हें पंडित जी जय-जय, पालागी या महादेव का जयकारा नही लगता। यहॉ हर तीसरे चौथे किसी अड़ोसी-पड़ोसी या दुकानदार, सेठ जी का बुलावा नही आता। ऐसे वक्त में चन्द्रकेतु की पत्नी ने उन्हें समझाया और अपार्टमेण्ट कल्चर के तौर तरीके बताते हुए उन्हें  खुद के रंग-ढंग परम्परागत पद्धति से बदल कर आधुनिक करने की सलाह देते हुए आशान्वित किया कि उसने टी.वी. में बहुत सारे ज्योतिष गुरूओं को देखा है जिन्हें पूरा देश उनके श्रद्धालुओं सहित देखता है और लक्ष्मी की ज्योतिषी महाराज सहित भक्तजनों पर कृपा आती है। पत्नी अब अपार्टमेण्ट वाले अपने किटी क्लब की सहेलियों के साथ रोज शाम कालेज के मैदान में टहलने और बृहस्पतिवार को साई बाबा के मन्दिर जाने लगी थी। हालांकि चन्द्रकेतु पर अभी तक जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द द्वारा साई बाबा के ऊपर उठाये गये सवालों का प्रभाव व्याप्त था। ऐसी स्थिति में जब पत्नी गुरूवार को देर तक अपनी किटी सहेलियों के संग साई बाबा मन्दिर में रहती तो माही और सिमरन को देखने के लिए उन्हें विवशतः घर पर रहना होता। ऐसे में एक दिन उन्होंने मार्केटिंग चैनल पर ज्योतिष की शतप्रतिशत फल देने वाले आश्चर्यजनक वस्तुओं पिरामिड, कच्छप, बम्बू, पाथरा फायर, फार्च्यून विश, लक्ष्मी नारियल, गोमती चक्र, रूद्राक्ष को देखा और पत्नी की बातों में दम पाकर उन्होंने इस दिशा में प्रयास प्रारम्भ किया। पत्नी द्वारा ही उन्हें गुप्ता जी के खाली दुकान की जानकारी मिली तो गुप्ता जी से बातचीत कर उनके शर्तो पर राजी हो, चन्द्रकेतु जी ने अपनी ज्योतिष दुकान नही (क्षमा कीजिएगा चन्द्रकेतु जी को उसे दुकान कहना कदापि पसन्द नही) ज्योतिष कार्यालय और परामर्श केन्द्र का उद्घाटन किया। उद्घाटन के पूर्व कार्यालय में बड़ा सा नियोन लाईट वाला बोर्ड लगाया गया। ज्योतिष विचार कार्यालय एवं परामर्श केन्द्र, त्रिकालदर्शी, ज्योतिषाचार्य चक्रवर्ती  पं0 डॉ0 चन्द्रकेतु उपाध्याय जी एम.ए. (संस्कृत एवं ज्योतिष) पीएच डी (सं.सं.वि.) कुण्डली, वास्तु सामुद्रिक एवं अंकशास्त्र। कार्यालय के अन्दर एक डबल कैबिनेट वाली शानदार मेज के साथ ऊँचे पुस्तवाली बड़ी सी रिवाल्विंग चेयर और उस पर गेरूये रंग का तौलिया बिछा दिया गया। पंडित जी ने नया एचपी का लैपटाप सामने टेबुल पर रखा और उसका कनेक्शन लक्ष्मी गणेश के मूर्ति वाले छोटे से लकड़ी वाले पूजाघर के नीचे साइड टेबुल पर रखे प्रिन्टर से कनेक्ट कर दिया। कार्यालय में घुसते ही गेरूये रंग का वालटूवाल पर्दा ठीक सामने खूब बड़े से डबल फ्रेम में लगाया हुआ लाल सनील के पृष्ठभूमि में उभरता हुआ श्रीयन्त्र। सामने रखी हुई चार आरामदेह कुर्सियां। पंडित जी की पत्नी ने आरती उतार कर अपनी किटी पार्टी की समस्त सहेलियों के साथ कार्यालय में प्रवेश किया और नारियल फोड़ शंख बजाकर पं0 डॉ. चन्द्रकेतू उपाध्याय जी का ज्योतिष विचार केन्द्र की औपचारिक शुरूआत हो गयी। 
अब इसे श्रीयन्त्र का चमत्कार कहिये या मन्दिर के बगल में स्थित गुप्ता जी के दुकान पर साईबाबा का प्रभाव, पंडित जी की ज्योतिषी भी चल निकली। सुबह कार्यालय खुलते ही दो चार लोग आना शुरू करते और देर शाम तक कार्यालय में परामर्श लेने वाले आते रहते। पंडित जी के बताये उपाय यथा यन्त्र, वास्तु सामान आदि गुप्ता जी के यहॉ मिल जाते जिसके लिए अब उन्हें हर हफ्ता दालमण्डी और हड़हा सराय जाना भी भारी नही लगता। एक ग्राहक एजेण्ट के सलाह औथ सहयोग से ईएमआई सिस्टम से पंडित जी के हाथ में अब उनके पुराने वीवो मोबाइल के बदले सैमसंग का नया माडल ए 80 फैण्टम और एप्पल का नये ब्राण्ड वाला दो मोबाइल आ गया था। पिछले नवरात्रि में उन्होंने एक्टिवा की 5 जी माडल वाली स्कूटी लिया था। जिन्दगी महादेव के कृपा से मस्त चल रही थी। ईएमआई सही समय पर खाते से कट जाती। सिमरन का नाम भी अच्छे अंग्रेजी स्कूल मे लिखवा दिया था। इस होली बीतने के बाद  उनकी योजना हवाई जहाज से दक्षिण घूमने जाने की थी, पत्नी कई महीनों से इसके लिये कह रही थी।
                   इस बार आय अच्छी होने की संभावना थी। राशि एवं गोचर फल भी अनुकूल थे। चैत्र नवरात्रि में उन्होंने कई लोगों के यहॉ अनुष्ठान कराने को स्वीकरोक्ति भी दिया था। जिससे अच्छी कमाई होने की आशा में साई बाबा के कृपा से सब बढि़या चल रहा था।भगवान ने चाहा तो स्थिर जीवन प्रणाली सहज ढंग से चलने लगेगी। पर यह कोरोना ..........................
                  अभी होली के पहले ही तो उन्होंने एक जजमान को बताया था कि इस वर्ष प्रमादी संबत का राजा बुध और मन्त्री चन्द्रमा होंगे जो कृषि व अनाज के लिए बहुत शुभ है। व्यापारिक व आर्थिक क्षेत्रों में तेजी आयेगी पर लोगों मे लड़ाई-झगड़े व आपसी असन्तोष बढ़ेगा और वर्षा अच्छी होगी। महगाई पर नियन्त्रण होगा वगैरह-वगैरह। 
          एक पखवाड़े पूर्व एकाएक प्रधानमन्त्री जी ने आठ बजे रात आकर उसी रात बारह बजे से पूरे देश में सारी व्यवस्था बन्द कर दिया। पंडित जी का कार्यालय, गुप्ता जी की दुकान, साई बाबा का मन्दिर, अपने अपार्टमेण्ट का गेट सब कुछ। पंडित जी परेशान हैं। एक सप्ताह तक तो किसी तरह खान पान की व्यवस्था चलती रही। पर अब अपार्टमेण्ट में पत्नी की किटी सहेलियों से कहना तो अपनी प्रतिष्ठा धूमिल करना है और गुप्ता, वह तो पहले अपना ही रोना रोते हुए किराया मॉगने लगेगा। अखबार में रोज निकल रहा है कि कन्ट्रोल की दुकान से निःशुल्क चावल आटा, दाल मिलने की व्यवस्था की है सरकार ने। पर इसके लिए राशन कार्ड दिखाना होगा। वे तो राशन कार्ड के पात्रों की श्रेणी में आते नही। ऊपर से सवर्ण और पढ़े-लिखे एम.ए., पीएच.डी। पंडित जी की पत्नी ने बताया कि आज घर में चावल, आटा, आलू सब समाप्त हो गया है। कल रात को तो हल्दीराम की भुजिया खाकर और पानी पीकर सभी सो गये थे। माही व सिमरन तो यह समस्या जानती नही, वे बार-बार खाने के लिए जिद कर रही है वो तो भला हो दूध वाले का, कि वह दूध देता जा रहा है। बिल्डिंग की लिफ्ट बन्द कर दी गयी है और सीढि़यों से चलकर दो बार से ज्यादा चौथे मंजिले पर चढ़ना उतरना भी अपने आप में एक समस्या है। अखबारों में छपा हे कि कुछ एनजीओ वाले साईबाबा मन्दिर पर आकर खाने के लिए पैक डिब्बे और आटा आलू चावल दाल बॉटेंगे। इसी आशा से पंडित जी उतर कर साई बाबा गये। वहॉ एक मैजिक वाहन खड़ा करके मोहल्ले के कुछ लड़के राशन का पैकेट बॉट रहे थे। पंडित जी बड़ी उम्मीदों से वहॉ तक भी गये तभी उनमें से दो तीन लड़कों ने पंडित जी को देख कर प्रणाम किया और पंडित जी जबरदस्ती मुस्कराते हुए वहॉ से लौट आये। कल भी यही हुआ था। आज भी यही हुआ। पंडित जी समझ नहीं पा रहे थे कि वे राहत स्वयं सेवकों के प्रणाम के बदले किस तरह अपने खाली पड़े रसोई के लिए राशन मॉगे क्योंकि वे तो बेचारे से बड़े आदमी थे........... । 

(बनारस, 15अप्रैल 2020,बुधवार)

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बुधवार, 15 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / वास्तव मे गरीब कौन है ? : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,15 अप्रैल 2020

व्योमवार्ता / वास्तव में आज गरीब कौन है?

       कोरोना के चलते लाकडाऊन ने  आज एक बार यह सवाल सिद्दत से खड़ा कर दिया है कि हमारे आज के समाज मे जरूरत के लिहाज से गरीब कौन है? समय से पचीस दिन पीछे चलते है, देश के प्रधानमंत्री  श्री नरेन्द्र मोदी जी २३ मार्च की रात आठ बजे देश को संबोधित करते हुये रात के १२ बजे से पूरे देश मे लाकडाऊन घोषित कर देते हैं। देश की जनता पूरे मन से अपने प्रधानमंत्री का साथ देती है। महीने के अंतिम सप्ताह होने के कारण घरों मे राशन का बजट सीमित मात्रा मे है। दो दिन बाद नवरात्रि का  त्योहार भी प्रारंभ हो गया है, मान्यतानुसार भारत की बहुसंख्यक जनता नवरात्रि के नौ दिनो तक व्रत उपवास के साथ विभिन्न मंदिरो मे शक्तिस्वरूपा नौ दुर्गा के नौ स्वरूप का दर्शन करती है। मंदिर के आसपास के दुकानदारों सहित पौराहित्व एवं धार्मिक कर्मकाण्ड करने वालो को इसका इंतजार रहता है।
       रोजाना कुऑ खोदने और पानी पीने वाले छोटे दुकानदार, चाय पान, फास्टफूड, रेहड़ी, गुमटियॉ, मजदूर, ठेके या रोज के मजदूरी पर कार्य करने वाले प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, पेन्टर, कारपेन्टर, राजगीर जैसे सेवाओं मे लगे श्रमिक शक्ति जहॉ रात के आठ बजे तक अपने कल के लिये अपने ईमानदारी एवं मेहनत पर आश्रित थी वह एकझटके से २४ मार्च के सुबह से बेरोजगार ही नही जीवन संघर्ष मे हवा मे त्रिशंकू की तरह हो गई।
पर जिस वर्ग पर किसी ने ध्यान नही दिया न ही आज तक दे रहा है वह था  यशपाल के कहानी 'पर्दा' का  परिवार। जी हॉ, निम्न मध्यवर्ग एवं मध्य आय वाला मध्यवर्ग। जो अपने भविष्य के सुनहरे सपने देखता हुआ अपने ग्रामीण अतीत या पुराने कस्बे मोहल्ले  से रिश्ता भूला कर अपने भविष्य को बनाने के लिये वर्तमान की  निरंतर आहुति देता रहता है। यह भविष्य के सपनो मे जीने वाला वह परिवार है जो अपने बच्चों के भविष्य बनाने के लिये अपने अतीत के परिवार अपने माता पिता को छोड़ एकाकी फैमिली मे रह रहे है। इन अधिकांश एकाकी परिवारों मे मुखिया किसी प्राईवेट फर्म , स्कूल, कोचिंग ,दुकान,कंपनियों मे नौकरी करता है, कहीं रेहड़ी लगाता है,ट्यूशन करता है, आटो , बस चलाता है या ऐसे ही कामों को कर के अपने और परिवार का खर्च चलाता है। बहुतेरे इसमे ऐसे भी है जो महानगरों से लेकर आसपास के शहरों तक मे किराये के मकान या हजार पॉच सौ गज के जमीन का टुकड़ा खरीद अपना छोटा सा मकान बनवा कर गुजर बसर कर रहा है। अगर गॉव पर इस मकान बनवाने और जमीन खरीदने के बाद पुरखों के बचाये हुये थोड़े से खेत बचा पाया है तो  वह अपने मोटे अनाजों जैसे गेहूं चावल के लिये अपने गॉव मे मौजूद उन्ही खेतों पर निर्भर है। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि यह वही वर्ग है जिसमे दूसरों से तुलना कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति व्याकुलता के हद तक व्याप्त है। इसलिये उसके शहर वाले घरों मे खुद को खुश दिखाने वाले  और अब जरूरत भी बन गये ज्यादातर उपकरण जैसे एसी, वासिंग मसीन, ऱूम थियेटर , प्लाज्मा एलईडी स्मार्ट टीवी, कार, बाईक जैसी चीजें ईएमआई पर चल रही हैं। यह वर्ग अपने को निम्नवर्ग से ऊपर और ऊच्चवर्ग के नजदीक दिखाने की कसमकस मे जूझते हुये पर्दा कहानी का वर्तमान विशिष्ट और परिष्कृत रूप है।
        वर्तमान मे यही वर्ग सबसे अधिक समस्याग्रस्त है। वह सरकारी व्यवस्था हेल्पलाईन और स्वयंसेवी संस्थाओं तो अपनी वास्तविक  कल मस्थिति बता कर दूसरों ते नजरों मे गरीब व बेचारा  भी नही दिखना चाहता और रोजमर्रा के वास्तविक अभावों से मुंह भी नही मोड़ पा रहा। इसमे प्राईवेट स्कूल मे काम करने वाले शिक्षक, कर्मचारी, कोचिंग चलाने वाले, छोटे दुकानदार, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक सहित अप्रशिद्ध व अस्थापित डाक्टर्स, वकील,  नये वास्तुकार, प्राईवेट इंजीनियर, कंम्प्यूटर आपरेटर,कांट्रैक्ट सेवारत कर्मी, कर्मकाण्डी पंडित, ज्योतिष, बीमा एजेंट जैसे लोग शामिल है। कल मुझसे एक परिचित ने फोन कर के अपना मोबाइल रिचार्ज कराने और उनके घऱ चार पैकेट ब्रेड और दूध पहुंचाने का अनुरोध करते हुये बताया कि उनके पास रखे नकद पैसे खर्च हो गये है और फिलहाल कहीं से कोई पैसा आने की उम्मीद नही है, उनकी समस्या यह है कि फिलहाल वे अपने गॉव भी नही जा सकते जहॉ उनकी गेहूं और सरसो की फसल तैयार है। यह एक मात्र उदाहरण नही है बल्कि ऐसे उदाहरण इसलिये नही आ पा रहे है क्योंकि उन्होने स्वयं को अपना ईज्जत बचाने के लिये कमरों मे बंद कर रखा है। उनकी मानसिक स्थिति कितनी तनावपूर्ण है इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि उन्हे लाकडाऊन खत्म होने के बाद स्कूलो मे प्रवेश शुल्क, घर का किराया, बिजली का बिल, ईएमआई देने की चिंता है।
      जरूरत है कि इन मूक पीड़ा झेल रहे वास्तविक गरीबों के लिये कोई बेहतर व्यवस्था किया जाये अन्यथा आने वाले दिनों मे हमारे देश को इस बीमारी के दुष्प्रभाव के रूप मे एक नये मानसिक तनाव पीड़ितों का सामना करना पड़ेगा।
(बनारस, 15अप्रैल 2020, बुधवार)
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