रविवार, 27 सितंबर 2026

व्योमवार्ता/ काशी की नवरात्रि यात्रा : स्त्री चेतना से ब्रह्म चेतना तक.......

व्योमवार्ता/

काशी मे नवरात्रि यात्रा: स्त्री चेतना से ब्रह्म चेतना तक.......
                                                       *व्योमेश चित्रवंश
नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। देवी दुर्गा के सम्मान में नौ रातों और दस दिनों तक मनाया जाने वाला यह पर्व, शक्ति की उपासना का महापर्व है। हिंदू धर्म में इन नौ दिनों में देवी शक्ति के नौ रूपों की पूजा और उपवास किया जाता है। यह पर्व पूरे भारत और नेपाल में मनाया जाता है, पर काशी में इसका स्वरूप सबसे विलक्षण है। प्रायः माँ दुर्गा के नौ रूपों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़कर देखा जाता है, पर इसके पीछे जीवन-चक्र, प्रकृति और मानसिक चेतना के विकास का एक गहरा क्रम छिपा है। भारतीय दर्शन में माँ दुर्गा के नौ रूप केवल पूजनीय देवियाँ नहीं, वे नारी जीवन की अंतःचेतना के नौ चरण हैं। हर स्त्री अपने जीवन में इन नवदुर्गा रूपों से गुजरती है। कभी वह शैलपुत्री होती है, कभी कालरात्रि, और अंततः सिद्धिदात्री। ये नौ रूप केवल पौराणिक गाथाएँ नहीं,बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई शक्ति के जागने और पूर्णता तक पहुँचने का एकआध्यात्मिक रोडमैप हैं। दुर्गा,अजेय मातृ देवी का एक रूप ही नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा का एक स्पेक्ट्रम हैं जो नौ रूपों में व्यक्त होती है।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

यदि हम ध्यान से देखें, तो इन्हीं दिव्य गुणों को एक स्त्री के जीवन के विभिन्न चरणों में — बचपन से लेकर परिपक्वावस्था तक — प्रतिबिंबित होते हुए देख सकते हैं। यह हमारे पौराणिक मान्यताओं के पीछे छिपा वैज्ञानिक और सामाजिक सत्य है कि नवदुर्गा के ये नौ स्वरूप महिला के जीवन-विकास और उसकी चेतना के स्तरों से गहरे जुड़े हैं।
         वाराणसी में शारदीय नवरात्र में जहां एक ओर आकर्षक पूजा पंडाल सजाए जाते हैं और मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है वहीं, दूसरी ओर नौ देवियों की पूजा पाठ का क्रम पूरे नौ दिन चलता रहता है। काशी इकलौती ऐसी नगरी है जहां सभी नौ दुर्गा देवियों और नौ गौरियों का अलग अलग मंदिर है। शारदीय नवरात्रि मे स्थानीय मान्यताओं व परंपराओं के अनुसार नौ दुर्गा देवी के दर्शन व यात्रा का विधान है वहीं बासंतिक नवरात्रि मे नौ गौरियों का । दोनो नवरात्र के अलग अलग दिन इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। काशी के अंतर्गृही यात्रायों  के क्रम मे नवरात्रि मे नौ दुर्गा के दर्शन के उद्देश्य व महात्म्य से नवदुर्गा यात्रा का विशेष महत्व है। लगभग पूरे वाराणसी नगर के चारों दिशाओं को समेटने वाली यह नवदुर्गा यात्रा मानव जीवन के विकास और आध्यात्मिक चेतना के उत्थान का प्रतीक है—शैलपुत्री के रूप में 'जड़ और प्रकृति' से शुरू होकर सिद्धिदात्री के रूप में 'पूर्ण ज्ञान और मोक्ष' पर जाकर यह यात्रा समाप्त होती है। मान्यता है कि यदि कोई श्रद्धालु इन नौ दिनों में रोज़ाना नियमपूर्वक सुबह-सुबह बनारस की गलियों और घाटों को लांघते हुए इन विग्रहों के सम्मुख शीश नवाता है, तो उसे न केवल पुण्यफल मिलता है, बल्कि वह बनारस के उस प्राचीन ताने-बाने को जी लेता है जो आधुनिक चकाचौंध से आज भी अछूता है। यह यात्रा अंतरात्मा को पवित्र कर जीवन को असीम सकारात्मकता से भर देती है। नवरात्रि के नौ दिनों के नौ देवियों के प्रति श्रद्धा व आस्था से प्रतिपदा से लेकर नवमी तक अलग अलग रूपों के दर्शन होते हैं। इन नौ देवी स्वरूपों मे मानव स्वभाव का द्योतक है।
नवरात्रि के प्रथम दिवस प्रतिपदा पर घटस्थापना के साथ ही नवदुर्गा यात्रा का प्रारंभ होती है। यह  प्रथम दिवस मां के शैलपुत्री स्वरूप को समर्पित है। शैलपुत्री को देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में प्रथम माना गया है। शैलपुत्री रूप जीवन के आरंभ,बाल्यावस्था और सरलता ,मासूमियत और प्रकृति से जुड़ी शुद्ध चेतना का प्रतीक है।'शैल' का अर्थ है हिमालय यानी दृढ़ता। जीवन या किसी भी विचार की शुरुआत में संकल्प और स्थिरता सबसे पहली आवश्यकता होती है। कथा है कि हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण देवी का नाम शैलपुत्री पड़ा। कथा के अनुसार दक्षप्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया। उसमें समस्त देवताओं को आमंत्रित किया किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया। सती यज्ञ में जाने के लिए आतुर हो उठीं। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण यज्ञ में जाने से मना किया लेकिन सती के आग्रह पर उन्होंने जाने की अनुमति दे दी। वहां जाने पर सती का अपमान हुआ। इससे दुखी होकर सती ने स्वयं को यज्ञाग्नि में भस्म कर लिया। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ को तहस नहस कर दिया। वही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। काशी खण्ड अध्याय 70 के अनुसार काशी में इनका स्थान शैलेश्वर टीला के निकट था। इसलिये इनका एक नाम शैलेश्वरी देवी भी है। वर्तमान मे शैलपुत्री देवी का मंदिर जैतपुरा थाना क्षेत्र के अलईपुर में वरूणा नदी के किनारे मढिया घाट पर मकान नंबर के 40/11 मे स्थित है। मंदिर मे देवी का विग्रह एवं दरबार है।
शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन अर्थात् द्वितीया तिथि पर देवी दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी के दर्शन पूजन का है।ब्रह्म का अर्थ तप है और चारिणी का अर्थ धर्म व सत्य का आचरण करने वाली, आश्रम में निवास करने वाली और पवित्र धार्मिक ज्ञान की खोज करने वाली स्त्री। । तप का आचरण करने वाली देवी के रूप में भगवती दुर्गा के द्वितीय स्वरूप का नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। देवी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया था। देवी दुर्गा के तपस्विनी स्वरूप के दर्शन-पूजन से भक्तों और साधकों को अनंत शुभफल प्राप्त होते हैं। संन्यासियों के लिए इस स्वरूप की पूजा विशेष फलदायी है।ब्रह्मचारिणी विद्या और संयम की देवी है। देवी की यह अवस्था विद्यार्थी जीवन, ज्ञान की खोज, तपस्या और आत्म-अनुशासन को दर्शाती है देवी सफेद वस्त्र धारण करती हैं।काशीखण्ड के अध्याय 70 में वर्णित ब्रह्मेश्वर मंदिर के परिसर मे ब्रह्म देवी (ब्रह्मचारिणी देवी) है। चौखंबा क्षेत्र में स्थित देवी ब्रह्मचारिणी का मंदिर काल भैरवमंदिर के पीछे सब्जी मंडी से दाहिनी तरफ गली वर्तमान दुर्गा घाट के ऊपर मकान नंबर के 22/71 है। 
              शारदीय नवरात्र की तृतीया तिथि पर काशी में देवी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा होती है।इन्हे चित्रघण्टा देवी के नाम से भी जाना जाता है। चंद्रघंटा युवावस्था में प्रवेश और जीवन की चुनौतियों का सामना करने वाले साहस व शालीनता का प्रतीक है। देवी पुराण के अनुसार देवी के चंद्रघंटा स्वरूप का ध्यान करने से भक्त का इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है। शारदीय नवरात्र की तृतीया तिथि पर देवी के दर्शन से सद्गति की प्राप्ति होती है। देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र शुभोभित है इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा।देवी दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है, जिसका अर्थ है घंटी के आकार का अर्धचंद्र। चंद्रघंटा को चंडिका के नाम से भी जाना जाता है और वे वीरता और साहस की देवी हैं। यह मंदिर वाराणसी के मध्य  क्षेत्र चौक में मकान नंबर सीके 23/34 मे है। लिंंगपुराण के कथन ‘चंद्रघंटा च मध्यत:’ के अनुसार देवी चंद्रघंटा ही वाराणसी क्षेत्र के रक्षा करती हैं। देवी का मंदिर चौक थाने के निकट मजार के सामने वाली गली मे लक्खीचौतरा के सामने ऊपर गली में है।
                  नवरात्र में देवी दर्शन के क्रम में चतुर्थी तिथि पर देवी के कूष्मांडा स्वरूप का दर्शन-पूजन करने का विधान है। देवी की यह अवस्था नई ऊर्जा, रचनात्मकता और संसार या परिवार के सृजन-पोषण के दायित्व को दिखाती है। काशी खण्ड के अध्याय 71 में कुष्मांडा देवी के कथा और उनके द्वारा दुर्गासुर असुर से युद्ध और उसके संहार का वर्णन मिलता है।शारदीय नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर देवी के कुष्मांडा स्वरूप का दर्शन-पूजन करने से मनुष्य के समस्त पापों का क्षय हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि अपनी मंद मुस्कान  से पिंड से ब्रहमांड तक का सृजन  देवी ने कूष्मांडा स्वरूप में ही किया था। देवी के कुष्मांडा स्वरूप के   दर्शन पूजन करने रोग और शोक का हरण होता है साथ ही साथ यश और धन में भी अपेक्षित वृद्धि होती है।  काशी में देवी के प्रकट होने की कथा राजा सुबाहु से जुड़ी हुई है। काशी में देवी देवी कुष्मांडा का मंदिर दुर्गाकुंड इलाके में विशाल कुंड के निकट मकान नंबर बी 27/2 पर है। माना जाता है कि इस कुंड का सीधा संबंध मां गंगा से है। इसका जल कभी नहीं सूखता है।  इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी मे नाटौर (बंगाल) की रानी भवानी ने करवाया था बाद मे पेशवा बाजीराव द्वितीय ने मंदिर के चारो ओर बरामदें बनवाये।उत्तर भारतीय नागर शैली मे लाल और गेरूये पत्थरों से बना यह मंदिर तंत्र साधना के बीसा यंत्र पर आधारित है। बनारस मे इस मंदिर की महत्ता बड़ी दुर्गा के नाम से भी प्रसिद्ध है।
           शादरीय नवरात्र के पंचमी तिथि तिथि पर देवी दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप का दर्शन पूजन होता है। यह मातृत्व, स्नेह, ममता और अपनों की रक्षा करने वाले निःस्वार्थ प्रेम की अवस्था है। यह देवी पार्वती का ही मातृत्व रूप है जब उन्होंने कार्तिकेय को जन्म दिया था। स्कंद कार्तिकेय की माता होने के कारण ही देवी के इस स्वरूप को स्कंदमाता नाम मिला है। माँ स्कंदमाता सिंह (शेर) पर सवार होती हैं और कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं। माता की गोद में बाल कार्तिकेय होते हैं। ऊपरी दो हाथों में वे कमल का फूल थामती हैं और एक हाथ से अपने पुत्र को संभालती हैं तथा चौथा हाथ अभय मुद्रा में रहता है। देवी के इस स्वरूप की आराधना से जहां व्यक्ति की संपूर्ण सद्कामनाएं पूर्ण होती हैं वहीं उसके मोक्ष का मार्ग भी सुगम्य हो जाता है। काशी खंड, देवी पुराण और स्कंदपुराण में देवी के स्कंदमाता स्वरूप का विराट वर्णन किया गया है। काशी में स्कंदमाता का मंदिर जैतपुरा स्थित बागेश्वरी देवी मंदिर के नाम से मकान नंबर जे6/33 परिसर में है। 
शारदीय नवरात्र के छठे दिन षष्ठी तिथि को देवी के कात्यायनी स्वरूप की पूजा होती है।कात्यायनी दृढ़ता और न्याय की प्रतीक है । यह प्रौढ़ावस्था या मध्य-जीवन का वह रूप है जहाँ मनुष्य अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है और निर्भय बनता है। देवी दुर्गा के छठे स्वरूप का दर्शन साधकों को सद्गति प्रदान करने वाला कहा गया है। शारदीय नवरात्र में षष्ठी तिथि पर देवी के दर्शन पूजन का विशेष महात्म्य देवी पुराण और स्कंदपुराण में बताया गया है। स्कंद पुराण के काशीखण्ड के अध्याय 82 में कहा गया है कि भगवती के इस स्वरूप की महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन ने कठिन तपस्या करके भगवती परांबा से अपनी पुत्री के रूप में जन्म लेने का वरदान मांगा था। उनकी पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। कात्यायनी देवी को काशी मे विकटा देवी के नाम से भी जानते हैं। कात्यायनी देवी का मंदिर सिन्धिया घाट पर मकान नंबर सीके 7/158आत्मविश्वेश्वर मंदिर परिसर मे  है।
                     शारदीय नवरात्र में सप्तमी तिथि पर देवी के कालरात्रि स्वरूप के दर्शन पूजन का विधान है। इनके स्वरूप, स्वभाव और प्रभाव का आभास उनके नाम से ही हो जाता है। कालरात्रि जीवन के कठिन समय, क्रोध और भीतर के विकारों व अज्ञान को समाप्त करने वाली उग्र चेतना है।अंधकारमय परिस्थितियों का नाश करने वाली देवी अपने भक्त की  काल से भी रक्षा करती हैं।  देवी कालरात्रि के दर्शन पूजन नौ ग्रहों द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाएं दूर हो  जाती हैं। देवी कृष्णवर्ण की, प्रत्येक दिन के रात्रि भाग की देवी हैं। कालरात्रि सवरूप के उपासना करने से अष्ट सिद्धियां और नौ निधियों की प्राप्ति होती है। देवी कालरात्रि का मंदिर विश्वनाथ मंदिर के निकट अन्नपूर्णा गली के समानान्तर कालिका गली के मकान नंबर डी 8/3 में है।
               शारदीय नवरात्र की अष्टमी तिथि पर देवी दुर्गा के महागौरी का संबंध देवी गंगा से भी है। काशीवासी महागौरी के रूप को मॉं अन्नपूर्णा और मॉं भवानी के रूप मे देखते हैं।महागौरी शांति और पवित्रता की स्वरूप है। जो स्त्री जीवन के अनुभव के बाद आने वाली परिपक्वता, निर्मलता, क्षमाशीलता और आंतरिक शांति की अवस्था है। धर्म ग्रंथों में देवी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि इस स्वरूप के दर्शन मात्र से पूर्व संचित समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। देवी की साधना करने वालों को समस्त लौकिक एवं अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं। पति रूप में शिव को पाने के लिए कठोर तप से देवी कृष्णवर्ण की हो गई थीं तब शिव ने मां गंगा के जल से अभिषेक कर देवी की कांति लौटाई और वह महागौरी कहलाईं। काशी में देवी अन्नपूर्णा ही महागौरी का स्वरूप मे मंदिर श्री काशी विश्वनाथ धाम परिसर मे है।
       सिद्धिदात्री ज्ञान और पूर्णता प्राप्त जीवन के अंतिम चरण की वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति को ज्ञान, संतोष और पूर्णता की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के अंतिम दिन नवमी को पूजित देवी का यह स्वरूप समस्त प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाला है। इसी आधार पर देवी का नामकरण हुआ और उन्हें सिद्धिदात्रि कहा गया। हिमाचल के नंदा पर्वत पर देवी का मूल स्थान है। देवी की कृपा से उनका उपासक कठिन से कठिन कार्य भी सरलता पूर्वक संपादित कर लेता है। देवी की साधना से समस्त प्रकार की सद्कामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान शिव को भी सिद्धिदात्रि की कृपा से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त हुईं। काशी में देवी सिद्धिदात्रि के दो मंदिर माने जाते है। मैदागिन क्षेत्र में गोलघर क्षेत्र कालभैरो मंदिर के निकट सिद्धमाता गली में मकान नंबर के 60/29 मे देवी का मंदिर है। परंतु ज्यादा प्रचलित व प्रसिद्ध मंदिर सिद्धेश्वरी महाल के मकान सीके 7/124 में विद्यमान है। चौकके निकट स्थित इस मंदिर परिसर मे चंद्रकूप और चंद्रेश्वर महादेव भी है।
इस प्रकार काशी की नवदुर्गा यात्रा केवल नौ मंदिरों की परिक्रमा नहीं है, यह स्वयं के भीतर की यात्रा है। शारदीय नवरात्रि प्रतिपदा को वरुणा तट के शैलपुत्री से जो यात्रा शुरू होती है, वह जड़ता और प्रकृति से जुड़ी मासूम बालिका की चेतना है। दुर्गाघाट की ब्रह्मचारिणी में वह विद्या, संयम और तप बन जाती है, तो चौक की चंद्रघंटा में वही चेतना युवावस्था का साहस और शालीनता धारण करती है। दुर्गाकुंड की कूष्माण्डा सृजन की मुस्कान है, जैतपुरा की स्कंदमाता में वह ममता और वात्सल्य में बदल जाती है। काशी के हृदय में स्थित कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध खड़ी होने वाली दृढ़ न्याय-चेतना है, तो कालिका गली की कालरात्रि हमारे भीतर के अंधकार, भय और विकारों को भस्म करने वाली प्रचंड शक्ति। अन्नपूर्णा के रूप में विराजमान महागौरी वह परिपक्व शांति है जो तप के बाद मिलती है, और अंत में गोलघर की गली में स्थित सिद्धिदात्री — जहाँ यात्रा पूर्ण होती है — वह पूर्णता है, जहाँ स्त्री देह से आगे बढ़कर स्वयं सिद्धि बन जाती है।
इसीलिए काशी में कहा जाता है — नवरात्रि में नौ दिन तक जो साधक भोर में गंगा की हवा, घाटों की सीढ़ियों और गलियों की धूल को लांघते हुए इन नौ विग्रहों के सामने शीश झुकाता है, उसे केवल पुण्य नहीं मिलता, वह काशी के उस सनातन ताने-बाने को जी लेता है जो आज भी आधुनिक चकाचौंध से अछूता है। नवदुर्गा के ये नौ रूप पौराणिक कथाएँ मात्र नहीं, बल्कि हर स्त्री के जीवन का, हर मनुष्य की चेतना का विकास-क्रम हैं — नौ रातों में अपने भीतर सोई हुई शक्ति को जगाते हुये शैल से सिद्धि तक, जड़ से मोक्ष तक, देह से ब्रह्म तक की नवरात्रि यात्रा का यही वास्तविक अर्थ है।
काशी, 27सितंबर2026,रविवार
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बनारस / काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....... व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....

                                                                  *व्योमेश चित्रवंश
                    
             मोक्ष नगरी काशी के बारे में कहा जाता है कि यहां देह त्यागने वाली आत्मा को मोक्ष मिल जाता है। जिसकी मृत्यु काशी के बाहर होती है उसका महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से भी उसे मुक्ति मिल जाती है। काशी में एक तीर्थ ऐसा भी है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां प्रेत आत्माओं को मुक्ति मिलती है। यह तीर्थ पिशाच मोचन कुंड के नाम से विख्यात है। कुंड के महत्व के बारे में यहां के पुरोहितों का कहना है कि यह कुंड मां गंगा के पृथ्वी पर आने से पहले का है। और पितृ पक्ष में यहां प्रतों का मेला लगता है। साथ ही यहां पितरों के साथ ही प्रेत आत्माओं को भी मुक्ति मिलती है। इसके लिए यहां त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराए जाते है।
मृत्यु को भी उत्सव मानने वाले  मोक्ष की नगरी काशी का पिशाच मोचन कुंड  रहस्यमय पौराणिक स्थल कहा जाता है. यह कोई साधारण जलकुंड नहीं, बल्कि आत्माओं के उद्धार का केंद्र है. कहा जाता है कि जो आत्माएं अकाल मृत्यु का शिकार होती है या जो अधूरी इच्छाओं के साथ इस संसार से जाती हैं, वे भटकती रहती हैं. गीता में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा अजर है, अमर है. “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...” लेकिन अकाल मृत्यु होने वाले इंसान की आत्मा सालों भटकती रहती है. बाबा श्री काशी विश्वनाथ के त्रिशूल पर टिकी नगरी में भटकती आत्मा को भी यहां मोक्ष मिल जाता है. गरुण पुराण के काशी खंड में भी  पिशाच मोचन कुंड का उल्लेख मिलता है, जहां पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है. मान्यता है कि यहां पर आत्माओं का उधार भी चुकाया जाता है
काशी खंड के अनुसार पिशाच कुंड को मूल रूप से “विमल तीर्थ व विमलोदक तीर्थ” के नाम से जाना जाता है। कपर्दि नामक एक शिव गण ने एक जल निकाय- “विमल तीर्थ” बनाया और इस स्थान पर शिव की पूजा की, जिससे कपर्दीश्वर महादेव अस्तित्व में आए। समय के साथ, यह स्थान तपस्या के लिए एक स्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया। भगवान कपर्दीश्वर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर, खोपड़ियों से सुसज्जित द्वार और ब्रह्म को समर्पित विभिन्न छोटे मंदिरों के साथ एक जलाशय का शांत वातावरण, आपको अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना के समय में स्वागत करता है, जो निषिद्ध अवस्था से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे काशी के हृदय में प्रवेश करके मोक्ष प्राप्त कर सके।कथा है कि एक बार एक पाशुपत ऋषि विमल तीर्थ के तट पर ध्यान कर रहे थे, अचानक एक पिशाच जो एक ब्राह्मण था, और अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण पिशाच (भूत) योनि को प्राप्त कर गया। पहले तो उसने ऋषि वाल्मीकि को डराने की कोशिश की लेकिन बहुत प्रयास के बाद, उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे मुक्ति मांगी। ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा। इस प्रकार पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली तब से पिशाच मोचन तीर्थ बिहार के गया के अतिरिक्त पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए एक प्रसिद्ध स्थान बन गया। हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पितृलोक में निवास करती है – स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का क्षेत्र, जो यम "मृत्यु के देवता" द्वारा शासित है। पूर्वजों की तीन पीढ़ियाँ पितृलोक में रहती हैं और पितृ पक्ष (भाद्रपद का चंद्र महीना) के दौरान पृथ्वी का दौरा करती हैं ताकि उन्हें अपने वंश से जल, तर्पण मिल सके। अगर उन्हें यह मिल जाता है, तो उन्हें मुक्ति मिल जाती है लेकिन अगर उन्हें तर्पण नहीं मिलता है, तो उन्हें पुनर्जन्म की सजा मिलती है। जब अगली पीढ़ी का व्यक्ति मर जाता है, तो पहली पीढ़ी स्वर्ग चली जाती है और कर्म और उपरोक्त कारण के आधार पर मोक्ष/पुनर्जन्म प्राप्त करती है। इसीलिए सह्रद कर्मकांड पूर्वजों की केवल तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है। यदि पितरों की परेशान आत्माएं पितृलोक में खुश नहीं हैं तो उनका प्रभाव पृथ्वी पर उनके प्रियजनों पर पड़ता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अनुष्ठानों की एक श्रृंखला में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा शामिल है, जिन्हें क्रमशः सफेद, पीले और काले कपड़े के मिट्टी के पानी के बर्तन- कलश द्वारा दर्शाया जाता है ताकि वे पूर्वजों को मुक्ति दे सकें। पितृपक्ष के महीने में पिशाच कुंड इन अनुष्ठानों के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है और दुनिया भर से लोग अपने प्रियजनों को मुक्ति दिलाने के लिए इस स्थान पर आते हैं। कुंड के आस-पास का पूरा इलाका सफेद कपड़े पहने और मुंडा सिर वाले लोगों की भारी भीड़ को देखता है जो ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गया के बाद पिशाच मोचन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ ऐसी पूजा की जा सकती है जो पूर्वजों के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है। गरुण पुराण में भी इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। इस जगह से जुड़ी किंवदंती के कारण यह जगह बहुत ही अजीबोगरीब माहौल देती है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अनगिनत कीलें लगी हुई हैं, कुछ पर सिक्के लगे हुए हैं और कई लोगों की तस्वीरें हैं, जिनकी शायद असामयिक मृत्यु हुई हो। एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि यह किसी परेशान आत्मा के लिए अंतिम उपाय है, हो सकता है कि यह अंधविश्वास हो या वास्तविकता, यह किसी की आस्था पर निर्भर करता है। मुख्य मंदिर परिसर एक कुंड के किनारे स्थित है, आप कपरदीश्वर महादेव के साथ-साथ कपरदी विनायक (मंदिर पंचक्रोशी यात्रा के अंतर्गत भी आता है) के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर के ठीक बगल में भगवान हनुमान और विष्णु के साथ ब्रह्म की एक छोटी सी जटिल मूर्ति की पूजा की जाती है। पास ही वाल्मीकि टीला पर पिशाचेश्वर महादेव और ऋषि वाल्मीकि का मंदिर है। कुंड के आसपास के क्षेत्र में पंडा/ब्राह्मण द्वारा संचालित कई छोटे मंदिर हैं, जिनके अपने-अपने ईष्टदेव हैं। पास में एक अखाड़ा है, यह एक शांतिपूर्ण परिसर है जिसमें छोटे मंदिर और चित्रकूट रामलीला के लिए समर्पित स्थान हैं, जिसे मेघा भगत “गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य” द्वारा शुरू किया गया था।
पिशाच मोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि यह रामा अवतार के पहले की बात है। जब पृथ्वी पर गंगा अवतरित नहीं हुई थी उससे पहले का यह सरोवर है। यह विमलोदत्त तीर्थ है। यहां पूरे भारत वर्ष से लोग आते है। जो भी प्रेत योनि से पीड़ित है उसे यहां मुक्ति मिल जाती है। वह कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि रामा अवतार के समय पिशाच नाम का एक ब्राम्हण था। जो दान नहीं देता था। वह सिर्फ लोगों से दान लिया करता था। और इतना दान ले लिया कि उसकी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी। एकबार जब वाल्मीकि जी कुंड पर पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण यहां पहुंचे और उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि महराज मेरी आत्मा को शांति नहीं मिल रही। मेरा भी कल्यण करें। जिसके बाद उन्होंने पिशाच ब्राम्हण को तालाब में नहाने के लिए बोला। पिचाश ब्राह्मण जैसे ही स्नान के लिए कुंड में उतरे तो पानी भागने लगा। वह एक कदम आगे बढ़ते तो पानी दो कदम पीछे भाग जाता। इसके बाद उन्होंने पानी गिलास में पानी लिया तो वो भी सूख गया।इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वाल्मीकि जी से आग्रह किया कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें। उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने उनसे कहा महाराज उपाय करें नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां भगवान शंकर और विष्णु जी की तपस्या करने को कहा। आखिर में शंकर उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और यहां आए और पिशाच ब्राम्हण से पूछा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे और उनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। साथ ही कुंड के महत्व से एक घटना और जुड़ी हुई है। बताते है कि शंकर जी के बाद गणेश जी यहां एक ज्ञानदस नामक प्रेत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए लेकर आए थे। वह बताते है कि ज्ञानदस को मुक्ति नहीं मिल रही थी। जिसके बाद उन्होंने भगवान गणेश कार्तिकेय जी से मुक्ति के लिए आग्रह किया। तो उन्होंने ज्ञानदस से कहा कि काशी में तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन जब ज्ञानदस काशी पहुंचे तो मां गंगा से उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। आखिर में मां गंगा से प्रार्थना करने के बाद कहा कि उत्तर दिशा में स्थित पिशाच मोचन कुंड पर जाओं वहां तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।तब से प्रेत आत्माओं की मुक्ति, पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पितृ पक्ष में लोग आते है। साथ ही मान्यता है कि पितृ पक्ष में यहा प्रेतों का मेला लगता है। तीर्थ पुरोहित बताते है कि यहां पितृरों, प्रेतों, आकाल मौत से मोक्ष व जो प्रेत परिवार की सुख शांति में बाधक बने हुए उनकी मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराऐ जाते हैं।
त्रिपिंडी श्राद्ध पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का पिंडदान हैं. इस पूजन में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है. मान्यता है कि पूर्वज की असंतुष्ट आत्मा आने वाली पीढ़ियों के सुख में बाधा डालती है. ऐसे में इन आत्माओं को शांत करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है.। “गरुण पुराण के काशीखंड में वर्णित है कि पवित्र गंगा नदी के धरती आगमन से पहले ही पिशाच मोचन कुंड का अस्तित्व था. कुंड के पास पीपल का एक पुराना वृक्ष है और इसी पर भटकती आत्माओं को बैठाया जाता है. उनका ऋण उतारने के लिए वृक्ष पर सिक्का भी बांधा जाता है. इस कर्म से पितरों के सभी उधार उतर जाते हैं और वे बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं. पिशाचमोचन कुंड का पीपल पेड़ मान्यता का साक्षी है। पेड़ में ठोंके गए असंख्य सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्मा का ठिकाना है। 
मान्यता है कि किसी व्यक्ति की अकाल या असामयिक मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है. ऐसे में उन आत्माओं को मोक्ष पिशाच मोचन कुंड दिलाता है. कुंड का नामकरण के पीछे भी कथा है. पिशाच मोचन कुंड का नाम पिशाच नाम के व्यक्ति से पड़ा था, जिसने कई पाप किए थे. हालांकि, इसी जगह पर उसे मोक्ष मिला था. जिनके घर में अकाल मृत्यु होती है, उनके परिजन यहां पर विशेष पूजन, तर्पण करते हैं.। इस कुंड का वर्णन न केवल गरुड़ पुराण बल्कि स्कंद पुराण समेत कई शास्त्रों में मिलता है. यह स्थान सदियों से पितृ-स्मरण, त्रिपिंडी श्राद्ध तथा आत्मिक शांति और मनः चेतना से जुड़ी लोक-आस्थाओं का जीवंत केंद्र रहा है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और स्मृति के बीच संबंधों को समझने का एक अवसर भी है।
घर-परिवार के बुजुर्गों और पुरोहितों की परंपरागत मान्यता के अनुसार यह अनुष्ठान उन जन्मे, पूर्वजन्मे अथवा अजन्मे जीवनों की स्मृति और शांति के लिए किया जाता है, जिनकी उपस्थिति भले ही हमारे जीवन में प्रत्यक्ष न रही हो, लेकिन जिनसे जुड़ी कोई अधूरी कड़ी पीढ़ियों के भीतर कहीं न कहीं गहरे दुख का कारण बनी रह जाती है।
मैं नहीं जानता कि जीवन की हर कठिनाई का संबंध अदृश्य कारणों से होता है या नहीं। न ही मैं हर बात को भय, दोष या चमत्कार के चश्मे से देखता हूँ। लेकिन इतना अवश्य मानता हूँ कि मनुष्य केवल स्वयं कर्ता नहीं होता। वह अपने साथ स्मृतियों, संस्कारों, रिश्तों और अनेक अनकहे इतिहासों को भी साथ लेकर चलता है। कभी-कभी उन अनदेखे संबंधों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना भी एक आध्यात्मिक कर्म बन जाता है। शायद हमारे पूर्वजों ने त्रिपिंडी जैसे श्राद्धों के माध्यम से इसी आध्यात्मिक पक्ष को सहज करने के लिए शुरुआत किया हो..! हमारे लोक और धर्म में पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद के जीवन पर बहुत कुछ लिखा गया है। हमारे पुराणों और उपनिषद् सहित जितने भी आध्यात्मिक ग्रन्थों के टीका और भाष्य मिलते है उतना किसी धर्म में नहीं लिखा गया है..इस परा विज्ञान पर आपके तर्क और संशय के लिए बहुत जगह है..आप पढ़िए और डूब जाइए एक ऐसे संसार में जहाँ अपूर्णता और अतृप्ता के सारे सूत्र आपको पूर्ण तो नहीं करेंगे पर चेतना से जरूर भर देंगे.यह पिशाचमोचन भी आपके वैसे ही अनसुलझे तर्कों को नई दृष्टि देता है जैसा  यहाँ आकर...यहां के शांत सरोवर के किनारे जब आप बैठ कर महसूस किया जा सकता है। तो यही विचार बार-बार मन में आता है वहाँ कोई भय का वातावरण नहीं, न ही ऐसा कुछ जिसमें रहस्य हो ..वहाँ सैकड़ों परिवार जो अपने दिवंगत प्रियजनों की स्मृतियों के साथ उन पिण्डों में अपने पूर्वजों का आह्वान करते हुए.. यहां मंत्रों की गूंज के साथ साथ वहां पूर्वजों की स्मृतियां भी गूंज रही थी, जल में चमकती धूप के बीच जो तरंग उठ रहे थे शायद उसमें हमारे पूर्वजों के आह्वान के बाद का विदा गीत की तरंगें थी जिसपर उन लोगों के चेहरे उभर और मिट रहे थे जो अपने भीतर किसी अधूरे भाव को शांत करने आए थे।
पिशाचमोचन के बारे में प्रचलित मान्यताएँ प्रेतत्व, पितृदोष और आत्माओं की शांति जैसे विषयों से जुड़ी हैं, लेकिन वहाँ बैठकर  इसका एक दूसरा अर्थ भी दिखाई दिया। मुझे लगा कि शायद इस तीर्थ का वास्तविक महत्व किसी अदृश्य भय में नहीं, बल्कि स्मरण की उस संस्कृति में है जिसे भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों से सहेज कर रखा है। आधुनिक जीवन हमें वर्तमान में जीना सिखाता है, लेकिन भारतीय परंपरा हमें यह भी याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अपने पूर्वजों की निरंतरता हैं, अपने परिवार की कहानी का एक अध्याय हैं। संभवतः त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे संस्कार इसी गहरे बोध को अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं।
काशी की महिमा शायद इसी में है कि वह जीवन और मृत्यु को दो अलग-अलग छोरों की तरह नहीं देखती। यहाँ मृत्यु भी स्मरण का विषय है, करुणा का विषय है और अंततः शांति का विषय है। पिशाचमोचन इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की यात्रा केवल देह तक सीमित नहीं है। वह अपने पूर्वजों, अपने परिवार और उन असंख्य स्मृतियों से भी जुड़ा है जिन्होंने उसे गढ़ा है।
काशी, 25सितम्बर2026,शुक्रवार
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रविवार, 20 सितंबर 2026

बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला...../व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला.....                                                                                 *व्योमेश चित्रवंश

पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास काशी में आतिथ्य की उपेक्षा से रुष्ट होकर गंगा के पूर्वी तट पर लोलार्क के आग्नेय कोण में स्थित तपोवन में नई काशी बनाने को उद्यत हुए तब शिवजी ने विनती कर उन्हें रोका तथा आदर के साथ काशीवास की अनुमति प्रदान की। तब से यह स्थान व्यासकाशी नाम से प्रतिष्ठित हुआ तथा कालांतर में रामनगर नाम से जाना गया। आजादी से पूर्व 200 वर्षों तक रामनगर काशी की राजधानी रही। काशी के इस पूर्व राजधानी में होने वाली रामनगर की रामलीला का पूरी दुनिया में अपना एक अलग ही महत्व है। यह रामलीला विश्व में होने वाली सभी रामलीलाओं से अलग एवं अद्वितीय है। विश्वप्रसिद्ध रामलीला रामनगर, जिसे रामायण के नाटकीय प्रस्तुति के रूप में जाना जाता है, यह भारत की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है।रामलीला और रामनगर इस तरह से एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं कि अक्सर ही लोग "रामलीला मंचन की वजह से इस नगर का नाम रामनगर पड़ा होगा " ऐसा मान लेते हैं।
रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग 230 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। वाराणसी में गंगा नदी के समीप स्थित रामनगर में आयोजित होने वाली रामलीला का आयोजन काशी नरेश द्वारा किया जाता है। यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित है। रामनगर की रामलीला का इतिहास बेहद समृद्ध और रोचक है परंतु इसकी शुरुआत कैसे हुई इसकी सटीक जानकारी किसी को भी नहीं पता है। आम जनमानस में रामनगर में रामलीला की शुरुआत को लेकर  कई सारी कथा कहानियां प्रचलित है, परंतु इनमें से दो कथाएं लोगों के बीच सबसे अधिक प्रचलित है। जिसमें पहली कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है की रामलीला की शुरुआत रामनगर से थोड़ी दूर काशी मे होता था जिसका संचालन गोस्वामी तुलसीदास के  समकालीन उनके शिष्य मेधा भगत जी करते थे।उन्होंने आजीवन इस लीला को श्रद्धापूर्वक करवाया, परंतु वृद्धावस्था के कारण उन्होंने तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह से रामलीला को संरक्षण प्रदान करने एवं उसे रामनगर की ओर स्थानांतरित करने का आग्रह किया। परंतु उस समय युवराज बीमार चल रहे थे जिस कारण उस समय महाराज इस कार्य पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे थे। तब मेघा भगत ने कहा कि यदि आप यह कार्य कर लेंगे तो युवराज स्वतः ही स्वस्थ हो जाएंगे और अंत में यही हुआ महाराज ने जैसे ही रामलीला की स्वीकृति दी युवराज भी स्वस्थ हो गए और तभी से रामनगर में रामलीला की शुरुआत हो गई।
एक और ज्यादा प्रचलित दूसरी  कथा है कि रामनगर से पहले यह रामलीला छोटा मिर्जापुर स्थित एक गांव में भोनू साहू और विट्ठल साहू नाम के दो साहूकार भाई करवाते थे। क्योंकि काशी के राजा श्री राम भक्त थे अतः उन्हें रामलीला देखना काफी प्रिय लगता था। वे प्रतिवर्ष नियमित रूप से प्रतिदिन रामलीला देखने जाया करते थे, एवं रामलीला में अपना सहयोग भी दिया करते थे। महाराज के सम्मान में रामलीला उनके आने के पश्चात ही शुरू की जाती थी। एक दिन महाराज को आने में थोड़ी देर हो गई, तो लोगों ने सोचा कि महाराज नहीं आएंगे एवं उस दिन धनुष यज्ञ की लीला बिना महाराज के ही करवा दी गई। महाराज लीला स्थल के लिये निकल पड़े थे परंतु रास्ते में ही उन्हें किसी से पता चला की रामलीला तो शुरू हो चुकी है, यह सुनकर उन्हें काफी दुख हुआ और वे बीच रास्ते से ही लौट आए। उन्होंने उसे दिन से रामलीला में जाना छोड़ दिया। परंतु रामलीला में न जाने के कारण वह काफी उदास भी रहते थे।एक दिन महारानी ने उनसे उनके उदासी का कारण पूछा जहां उन्होंने सारी बातें महारानी जी को बताई। इस पर महारानी जी ने उन्हें तंज कसते हुए कहा कि, जब बिट्ठल और भोनू बनिया होकर रामलीला करवा सकते हैं तो आप महाराज होकर क्यों नहीं करवा सकते? उन्होंने महाराज को रामनगर किले में ही रामलीला करवाने का प्रस्ताव दिया, जिससे महारानी भी रामलीला को देख सकती थी, और रामनगर के किले से शुरू हुई इस रामलीला का विस्तार धीरे-धीरे किले के बाहर तक होने लगा। 
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रामनगर की रामलीला पूर्णत: स्थान भाषा तिथि आदि के शोधोपरान्त प्रारंभ की गई थी एवं उसी शोध के निष्कर्ष व परंपरानुसार आज भी प्रचलित है।रामलीला के शोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी थे। विशुद्धानंद सरस्वती इन्हें अपना गुरु मानते थे। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर ईश्वरी नारायण सिंह ने इनसे मिलकर इनको अपना गुरु बना लिया। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरी नारायण सिंह ने हिंदी के उन्नायक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह और संत काष्ठ जिह्वा स्वामी जी का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त किया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल ,संवाद और मंचन का वैज्ञानिक, व्यावहारिक व यथोक्त ढंग से निर्धारण व शोधन किया। इन तीनों महानुभावों के अतिरिक्त स्वामी महादेव आश्रम, गायघाट के स्वामी जी, तुलसी दत्त झा, पंडित मथुरानाथ, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पंडित इत्यादि महानुभाव ने भी इस पुनीत कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान अर्पित किया। काष्ठ जिह्वा स्वामी द्वारा रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई हस्तलिखित पुस्तिका आज भी रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। इसकी प्रतिलिपि के सहारे वर्तमान व्यास - गण लीला का निर्देशन करते हैं । काष्ठजिह्वा स्वामी ने रामनगर में लीला स्थल का भी शोधन किया,एवं उन स्थलों का नामकरण रामायण के प्रसंगों पर किया जिससे यह स्थल वास्तविक रामयात्रा के स्थलों के समान हो गया। रामनगर की रामलीला का मंचन यथारूप विभिन्न शोधित स्थलों पर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर की परिधि में किया जाता है। प्रसंगानुसार अयोध्या ,जनकपुर ,पंचवटी ,लंका, चित्रकूट ,निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका ,रामबाग, पंपासर इत्यादि सभी स्थल निर्धारित किए गए हैं। रामचरितमानस के संवादों को भी काष्ठजिह्वा स्वामी ने शोधित किया था, जिसमें उनके द्वारा रचित पदों को भी संकलित किया गया। यह संवाद और अभिनय प्रशिक्षण के दौरान ही श्रीराम से छोटे अन्य पात्र स्वाभाविक बातचीत या हाव-भाव के दौरान श्रीराम को सम्मान देने लगते हैं।रामचरितमानस का शोधन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह रामनगर की रामलीला की विशिष्टता को भी दर्शाता है। यह शोधन रामलीला के पात्रों और दर्शकों के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करता है, जिससे लीला के दौरान होने वाली देवानुभूति का अनुभव होता है। रामनगर की रामलीला की एक विशेषता यह है कि इसे 31 दिनों तक विस्तारित किया जाता है। अधिकांश रामलीलाएं 10-15 दिनों में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन रामनगर की रामलीला में रामचरित मानस के हर प्रसंग को बहुत विस्तार से और बिना किसी जल्दबाजी के प्रस्तुत किया जाता है। इससे दर्शक भगवान राम के जीवन और उनके आदर्शों को अधिक गहराई से समझ सकते हैं।
यूं तो रामलीला मंचन की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी ) से होती है, किंतु इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला के महा अनुष्ठान के निमित्त पात्रों के चयन, प्रशिक्षण, रामलीला में प्रयुक्त औजारों - उपकरणों तथा मुखौटों व वस्त्रों इत्यादि की साज-सज्जा , प्रथम व द्वितीय गणेश पूजन आदि अनेक उपक्रमों के माध्यम से यह तैयारी महीनों पूर्व शुरू हो जाती है।यह रामलीला आज भी उसी पारंपरिक अंदाज में होती है, जैसे कि 230 साल पहले होती थी। रामनगर की रामलीला का मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। इसमें बिजली की रोशनी और लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि पेट्रोमेक्स (पंचलाईट) और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज़ के दम पर यह लीला प्रस्तुत की जाती है। रामनगर की रामलीला में विभिन्न स्थलों का मंचन होता है, जैसे कि अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग। रामनगर की रामलीला की तैयारी सावन महीने से ही शुरू हो जाती है और भादों में अनंत चतुर्दशी से लीला का प्रारंभ होता है। यह लीला आश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा को समाप्त होती है। रामलीला के दौरान परंपरा के अनुसार रोज़ाना ‘काशी नरेश’ भी हाथी पर सवार होकर आते हैं और उनके आने के बाद ही रामलीला शुरू होती है।
रामनगर की रामलीला में महिला पात्रों  की भी भूमिका लड़के ही निभाते हैं। इस लीला में कुल 27 किरदार होते हैं और 12-14 बच्चे इसमें हिस्सा लेते हैं। रामलीला के दौरान रामचरितमानस की चौपाइयों का नारदी स्वर में दो रामायनी दल द्वारा पाठ होता है और लीला संवाद के साथ आगे बढ़ती है।
रामलीला स्थलों के अतिरिक्त रामलीला से संबंधित तिथियां एवं समय , रामलीला के व्यास एवं पात्रों की वंशानुगत परंपरा व समर्पण, रामलीला में रामायणी दल की महत्वपूर्ण भूमिका व निष्ठा, परंपरा व अनुशासन के अद्वितीय उदाहरण, रामलीला के साधु संत एवं नेमीजन, रामलीला का मंचीय पक्ष एवम् नेपथ्य इस महागाथा के बड़े अध्याय हैं। कहने को इतना कुछ है कि इसे एक निर्धारित लेख की सीमा में बांध पाना सर्वथा असंभव है।
संक्षेप में कहना चाहें तो , रामनगर की रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक साथ तमाम कारक हैं। लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक मंच पर प्रसंगानुसार चलायमान यह मंचन बहुत ही सहजता के साथ बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के तथा बिजली के बड़े रोशनी करने वाले उपकरणों के स्थान पर पुराने समय के पंचलाइट और मशाल की रोशनी में प्रत्येक दिन न्यूनतम दस हजार की भीड़ को मात्र राम लीला व्यास के "चुप रहो! सावधान!" स्वर के द्वारा अनुशासित किया जाता है। यह रामलीला की विशिष्टता के कुछ सहज उदाहरण हैं। इसी प्रकार की सहजता इस रामलीला की श्रेष्ठता है और यह सौम्य श्रेष्ठता ही इसकी विश्वप्रसिद्धि का निर्विवाद कारण है।
रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन आने वाले नेमी, साधु-संतों की समर्पित व अनुशासित टोलियां श्रद्धा और समर्पण के बड़े अध्याय हैं। यहां दर्शक मात्र दर्शक न होकर पात्रों और परिस्थितियों, मंचन व प्रसंग के अनुसार खुद भी रामलीला में भूमिका निभा रहा दिखाई देता है । नेमी अपने साथ एक लकड़ी का पीढ़ा, ताड़ पत्र का हांकने वाला पंखा, छोटी टार्च ले कंधे पर गमछा रखे दांये हाथ मे तुलसी कृत श्री रामचरितमानस का गुटका लिये रामलीला के संग संग अपनी पोथी से लीला के रामायणियों के संग सुर मिलाता हुआ स्वयं बिना किसी भूमिका के पात्र बन जाते है। पात्रों का पीढ़ी - दर- पीढ़ी समर्पण, नेमी - प्रेमी जनों का श्रद्धा और भक्ति भाव, रामलीला प्रसंगों का मौलिक मंचन, संवाद अदायगी, लीला मंचन में सूक्ष्म तत्वों का भी समावेश ; ऐसे अनेकानेक चित्र नए दर्शकों के लिए कौतूहल और नेमी जनों के लिए श्रद्धा के सागर हैं । एक माह तक चलने वाली इस अद्भुत रामलीला में न केवल मंच पर ही अपितु नेपथ्य में भी मजबूत भूमिका अदा करने वाले ऐसे तमाम चरित्र हैं जो कई पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं।
रामनगर की रामलीला की एक सबसे अनूठी विशेषता इसकी चलायमान प्रदर्शन शैली है। आमतौर पर जहाँ एक नाटकीय प्रस्तुति में दर्शक एक स्थान पर बैठे रहते हैं, यहाँ पर दर्शक अभिनेता के साथ-साथ, अलग-अलग स्थानों पर जाते हैं, जहाँ-जहाँ दृश्य बदलते हैं। यह एक प्रकार की तीर्थयात्रा की तरह होता है, जहाँ दर्शक अभिनेताओं के साथ चलते हैं और दिन में कई किलोमीटर तक का सफ़र तय करते हैं।
रामनगर के विभिन्न स्थान रामायण की कथा के प्रमुख स्थलों का प्रतीक होते हैं। जैसे कि अशोक वाटिका, जहाँ सीता को रावण ने बंदी बनाकर रखा था, रामनगर के एक सुंदर उद्यान में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि राम और रावण के बीच का युद्ध एक विशाल मैदान में होता है—जहाँ घोड़े और रथ का प्रयोग किया जाता है, जिससे दृश्य और भी सजीव लगते हैं।
रामनगर की गलियाँ, घाट और खुले मैदान पौराणिक स्थलों में तब्दील हो जाते हैं और अभिनेता रामायण की कथा को जीवंत कर देते हैं। इन परिवर्तित स्थानों के साथ दर्शकों को भगवान राम की दुनिया में ले जाया जाता है। इस पूरी प्रस्तुति में कोई कृत्रिम प्रकाश या आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग नहीं होता; इसकी जड़ें अपनी पुरानी शैली में बनी हुई हैं। मशालों और अभिनेता की प्रबल आवाज़ों से ही यह दर्शकों को बाँधकर रखता है।
इस पूरे अनुभव को और भी ख़ास बनाती है—काशी नरेश की उपस्थिति। काशी की पौराणिक मान्यताओं मे यह हरि हर का संयुक्त स्वरूप दर्शन है।काशी नरेश भगवान शिव के प्रतीकात्मक प्रतिनिधि के रूप में इस आयोजन की अध्यक्षता करते हैं। बोलिये राजा रामचंद्र की जय का उद्घोष करती भावविभोर जनता काशीनरेश को शिव स्वरूप अपने बीच पाते ही बनारस के परम्परागत हर हर महादेव का नारा लगाने से खुद को रोक नही पाती है। हर शाम, चाँदी के सिंहासन पर बैठकर काशी नरेश इस प्रदर्शन को देखते हैं, उनके साथ उनके दरबारी और पुजारी होते हैं। उनकी उपस्थिति इस आयोजन को एक दिव्य स्वीकृति प्रदान करती है, जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और भी बढ़ावा देती है।
सामुदायिक भागीदारी और परंपरा का संरक्षण
रामनगर की रामलीला की एक और विशिष्टता इसकी उच्च स्तर की सामुदायिक भागीदारी है। अधिकांश अभिनेता पेशेवर नहीं होते, बल्कि स्थानीय नागरिक होते हैं—किसान, दुकानदार और छात्र—जो अपनी भूमिका निभाने के लिए अपना समय और ऊर्जा समर्पित करते हैं। इन प्रतिभागियों में से कई ने अपनी भूमिकाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में पाई हैं और वे इसमें गर्व महसूस करते हैं। उनके लिए रामायण के किसी पात्र का अभिनय करना एक गहन आध्यात्मिक कार्य होता है, जो उन्हें अपने विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर के क़रीब लाता है।
यह सामुदायिक भागीदारी केवल अभिनेताओं तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि रामनगर के पूरे नगर में व्याप्त होती है।रामलीला में प्रदर्शन करने वाले कलाकार ज़्यादातर स्थानीय होते हैं और पेशेवर अभिनेता नहीं होते। ये लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते इसमें भाग लेते हैं। हालाँकि यह आयोजन वैश्विक स्तर पर सम्मानित है, लेकिन कलाकारों को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें आर्थिक रूप से बहुत कम सहयोग मिलता है, जबकि वे कठोर प्रशिक्षण और महीनों की तैयारी में लगे रहते हैं। इसके कारण नई पीढ़ी के बीच इस परंपरा को जारी रखने में रुचि कम होती जा रही है, क्योंकि इसमें न तो उन्हें कोई पेशेवर अवसर मिलता है और न ही उचित आर्थिक लाभ। स्थानीय कारीगर सेट तैयार करने और पोशाकें बनाने में मेहनत करते हैं, जबकि निवासी आगंतुकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था करते हैं। इस आयोजन के दौरान पूरा नगर एकजुट होकर इसे सफल बनाने में योगदान देता है, जिससे यह लोगों की सामूहिक सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का प्रतिबिंब बनता है।
तेज़ी से आधुनिक हो रही दुनिया में, रामनगर की रामलीला ने व्यवसायीकरण और तकनीकी उन्नति के दबावों का विरोध करते हुए अपनी प्राचीनता को बनाए रखा है। यह आज भी उसी पारंपरिक ढंग से आयोजित होती है, जैसे सदियों पहले होती थी, जिसने इसकी प्रामाणिकता और पवित्रता को बनाए रखा है। हर साल यहाँ आने वाले हज़ारों दर्शक, जिनमें विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं, इस आयोजन की स्थायी लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्त्व का प्रमाण हैं।
रामनगर, वाराणसी की रामलीला आज भी एक भव्य सांस्कृतिक आयोजन के रूप में प्रसिद्ध है, जो अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। हालाँकि आधुनिकता का असर दिखने लगा है, फिर भी यह आयोजन अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और हर साल दुनिया भर से बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता है।
रामनगर की रामलीला को यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिली है, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और सम्मान में वृद्धि हुई है। 31 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन वाराणसी के सांस्कृतिक आकर्षणों में से एक है, जहाँ पूरे रामनगर को एक विशाल मंच में तब्दील कर दिया जाता है। विभिन्न स्थानों पर रामायण के दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं और इसमें स्थानीय लोग बड़ी आस्था के साथ शामिल होते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामनगर की रामलीला को पर्याप्त सम्मान प्राप्त है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या कलाकारों और आयोजकों को पर्याप्त समर्थन मिल रहा है? आधुनिकता ने इसमें कुछ बदलाव जैसे ध्वनि प्रणाली और न्यूनतम प्रकाश व्यवस्था को शामिल किया है, लेकिन परंपरा का मूल स्वरूप जस-का-तस बना हुआ है। फिर भी, कलाकारों और आयोजकों की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि उनके योगदान को सही पहचान मिले और यह परंपरा बिना किसी कठिनाई के आगे बढ़ती रहे। इसे ख़ासकर वित्तीय सहयोग और संस्थागत समर्थन की ज़रूरत है ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर भविष्य में भी फलती-फूलती रहे।
कुल मिलाकर, रामलीला को लेकर आधुनिक और पारंपरिक पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कलाकारों की बेहतरी और इस आयोजन की दीर्घकालिकता को सुनिश्चित करने के लिए अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
काशी, 20सितंबर2026, रविवार
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सोमवार, 14 सितंबर 2026

BANARAS : Varanasi's Derailed Traffic System.........../Vyomvarta

Varanasi's Derailed Traffic System......

                                                                                                                         *Vyomesh Chitravansh

                           Today, as we stand on the ground of 2026 in the third decade of the 21st century and look at Kashi's traffic system, it is clearly visible that this oldest living city in the world stands on the brink of an unprecedented and highly horrific crisis of a completely paralyzed traffic system. In recent years, especially after the historic and grand rejuvenation of the Kashi Vishwanath Dham Corridor, the number of domestic and foreign pilgrims, spiritual tourists, and researchers visiting Varanasi has recorded an unprecedented multi-hundredfold increase. Where crowds used to gather only during Shravan or special festivals earlier, a sea of people now floods the city's streets every normal weekend. Practically, this cultural and tourism renaissance should be welcomed, and it is indeed being welcomed, but the city's physical and infrastructural framework is proving completely incapable of handling this global pressure. Kashi is essentially known for its narrow alleys, traditional mixed land-use markets, and settlements developed parallel to the Ganges River. When a surge of modern, fast, heavy four-wheelers and uncontrolled e-rickshaws descends upon these ancient and narrow streets, the entire city transforms into a massive 'open-air parking lot'.
Traffic congestion in Varanasi is not merely an event of vehicles stopping on the roads; it is a continuous, invisible assault on the fundamental rights, health, time, and economic productivity of its citizens. A working professional, student, or businessman wishing to travel from Cantt Station to Lanka or Godowlia has to waste an average of 1 to 1.5 hours to cover a distance of just 5 to 6 kilometers. Every day, millions of man-hours are being destroyed at intersections amidst exhaust smoke and the blaring of horns. Due to the continuous, uncontrolled honking at crossroads, noise pollution has reached far above the generally accepted decibel limits. As a result, ailments like high blood pressure, irritability, deafness, and chronic stress are taking the form of an epidemic among local shopkeepers, traffic policemen, and daily commuters. The toxic gases continuously emitted from the engines of vehicles trapped in traffic jams—such as carbon monoxide, nitrogen oxides, and particulate matter—keep the city's Air Quality Index (AQI) at dangerous levels. This poisonous smoke is not only wasting fuel but also damaging people's lungs. Varanasi's BHU Trauma Center is considered a lifesaver for patients from Purvanchal, Bihar, and even Nepal. However, when an ambulance carrying a critical patient gets stuck in the horrific traffic jams of Cantt, Lahartara, or Lanka, the patient sometimes breathes their last before even reaching the hospital gates. This situation is a serious human rights crisis for any civilized society.
Whenever Varanasi's traffic problem is reviewed, focus is often centered only on vehicles and wide roads, but one of the most painful roots of this entire crisis is the complete disappearance of footpaths. From the time of the city's Jawaharlal Nehru National Urban Renewal Mission (JNNURM) to the modern Smart City projects, pedestrians are continuously being ignored.
"The footpath is ours" has remained merely an administrative slogan. Whether it is the route from Kachehri to Ardali Bazar and Bhojubir, or the Godowlia-Dashashwamedh route, everything except pedestrians can be found on the footpaths here. The truth is, at the time of constructing most of the city's old roads, there was simply no vision for modern pedestrian pathways. Roads were widened, but not an inch of space was left for pedestrians. Even where the administration did build footpaths (such as under the Varanasi Smart City project), local shopkeepers extended their shop counters 2 to 3 feet forward, turning the footpaths into their private property. Beyond this, illegal parking of two-wheelers for another three to four feet completely blocks the pavement. When no safe space is left for walking for the elderly, women, children, and tourists, they are forced to walk on the main road among vehicles, risking their lives. This automatically narrows the road's 'carriage-way' (the space meant for vehicles) and reduces the speed of the entire road to less than 10 km/h.
              Most of Varanasi's major markets—such as Dalmandi, Hanuman Ganj, Chowk, Lanka, and Rath Yatra—are decades old. These markets developed in an era when the main modes of transport were bullock carts, horse carriages (ikkas), bicycles, or walking. At present, however, multi-story commercial complexes, large malls, diagnostic centers, and hospitals have been opened recklessly within these very narrow markets. More than 80% of these commercial establishments do not have any basement or dedicated parking facilities of their own. Even if basement parking is shown somewhere on paper, builders and businessmen have colluded with local authorities to convert that parking space into warehouses, shops, or restaurants. Consequently, the vehicles (both two-wheelers and four-wheelers) of customers and patients visiting these shops or hospitals are parked directly on the footpaths and the main road. When vehicles are parked on both sides of a busy four-lane road, it effectively turns into a mere one-lane or two-lane road, creating a bottleneck.
In Varanasi, keeping with the city’s inherent nature, the level of respect and fear toward traffic rules appears to be almost zero. Vehicles here do not move according to the white lanes painted on the roads, but rather driven with a tendency to shove the vehicle wherever even a tiny bit of space is visible. To save just a few meters of distance or a U-turn, heavy vehicles, motorcycles, and especially e-rickshaws drive at high speeds in the opposite direction against oncoming traffic on the main road. In the name of employment, particularly after the COVID-19 pandemic, thousands of unauthorized and unregistered e-rickshaws have been deployed onto the city's streets. The moment they spot a passenger, they slam on their brakes suddenly right in the middle of the road or at the bends of intersections without giving any signal, bringing the entire traffic behind them to a complete standstill.
In a highly religious and sensitive city like Varanasi, "encroachment under the guise of faith" is a bitter truth that administrative and social circles often avoid discussing on public platforms. Religious sentiments in India are so intense that law-breaking elements use them as a 'protective shield.' If a person opens a tea or betel (paan) shop at a busy intersection or footpath, the municipal corporation squad can immediately demolish it under an anti-encroachment drive. However, if a small platform is quietly built under a tree at the exact same spot to install a religious idol, or a sheet (chadar) is placed over an old structure to give it the form of a shrine (mazaar), the situation changes completely. As soon as the name of 'religion' is attached to a structure, the local administration goes on the backfoot for fear of law-and-order breakdown, communal tension, or hurting religious sentiments. Gradually, iron grills are installed around that small platform, then a permanent concrete room is built, and subsequently, in the name of serving or protecting that religious site, shops selling flowers, offerings,chadars, or religious books crop up by occupying the surrounding footpaths. This commercial expansion eventually becomes the epicenter of large and permanent traffic jams.
There have been many areas in Varanasi where religious encroachment emerged as a major obstacle in the path of development and smooth traffic flow, but recent years have also witnessed some strict administrative and legal steps. Located right next to the Kashi Vishwanath Dham, the Dalmandi market is known for its narrow alleys and dense population. The width of the roads and footpaths here had reduced so much that even walking was difficult. To clear traffic from this core area of the city, the government launched the ₹222-crore Dalmandi Road Widening Project. Under this project, the roads were to be widened up to 17.5 meters, which brought around 146 illegal and partial structures into its scope. Following legal procedures, the administration initiated action to remove these encroachments, which was also greenlit by the Allahabad High Court. Similarly, under the plan to develop the Kashi Railway Station as a world-class 'Integrated Transport Hub,' illegal encroachments standing on land acquired and owned by the railways were removed. The biggest feature and a commendable aspect of this campaign was that it was completely secular and impartial. While on one hand, unauthorized structures built on railway land (the illegal portion of a shrine) were demolished, an illegal Hanuman temple falling in the path of the same corridor was also removed or relocated peacefully after full legal procedures and notices.
The most tragic and paradoxical aspect of the traffic and congestion problem in Varanasi is that the very police department, administrative machinery, and legal fraternity legally bound to clear roads and footpaths of encroachments have their own feet unlawfully planted on public land. In Varanasi, massive encroachment of footpaths and roads has been carried out by the police in the name of building police stations and outposts, and by lawyers and clients in the name of lining up vehicles haphazardly outside the court premises. This is an administrative irony where the protectors of the law (the police) and the advocates of the law (lawyers) themselves appear to be violating the law. The thought-provoking point is: when permanent police structures and illegal parking stands for lawyers' cars stand on the main roads and footpaths themselves, with what face can the administration give moral or legal instructions to a common street vendor to remove their encroachment? Kachehri, Varanasi's administrative, police, and judicial headquarters area, is the biggest example of administrative mismanagement and organized encroachment. A modern multi-level parking lot worth crores of rupees has been constructed by the government right near Kachehri so that the roads can remain clear. However, reality is exactly the opposite. To save parking fees or avoid a short walking distance, most advocates, clients, and others coming to court park their vehicles directly on the main road and footpath instead of using the multi-level parking. Apart from this, tea andpaanshops permanently occupy the footpaths, while notary lawyers' wooden benches, chairs, and typists' illegal cabins permanently hold ground on the Zila Panchayat route inside Kachehri. Two to three rows of vehicles line up from the Circuit House to the Collectorate gate. Due to the clout and influence of the organized unity among lawyers, no junior traffic policeman or municipal corporation squad gathers the courage to tow these vehicles or issue fines to them. Because of this, a beautifully wide road and its footpath have effectively been turned into a tight 6 to 8 feet 'single-lane bottleneck.' Along with Kachehri, police infrastructure has also choked the city's main intersections, footpaths, and paths. A part of the main building of the Bhelupur police station, its boundary wall, and the vehicles parked right outside the station on the road and footpath reduce the width of the main route by up to 40%. Similarly, in front of the Chetganj police station, the boundary wall extending up to twelve feet onto the road, the haphazard parking of police vehicles, and heavy iron barricades permanently placed on the roads and footpaths in the name of security make it impossible for pedestrians to walk. Due to the expansion of the Sigra police station, along with theVajravehicles (riot control vehicles), police cranes, and trucks and cars seized in various cases parked there, the left lane of the road and the footpath have completely turned into a junkyard. The police outposts of Kachehri, Teliabag, Lahurabir, and Gilat Bazar are not built on vast government plots, but right at the mouth of intersections, on triangular turns, or by cutting into footpaths. Due to the permanent construction of these outposts and the area cordoned off outside them in the name of security, the turning radius for vehicles and the path for pedestrians are completely wiped out.
The irony is that even the historic judgments of the High Court and the Supreme Court do not serve as a precedent in the city of Bhole Baba; instead, they lie forgotten, locked away in bundles of paperwork.
In the landmark case ofUnion of India v. State of Gujarat (2009), the Supreme Court issued strict orders to all states in the country that no new construction of any religious structure would be permitted on public roads, footpaths, streets, and public parks. Similarly, in theOlga Tellis v. Bombay Municipal Corporation (1985)judgment, a five-judge Constitution Bench of the Supreme Court explicitly stated that under Article 21 of the Constitution (Right to Life), the primary and sole purpose of footpaths and roads is the movement of pedestrians and vehicles. No individual, institution, bar association, or government department has any fundamental or legal right to occupy this public space.
Taking a tough stance on illegal religious structures, the Allahabad High Court in 2016 directed the Government of Uttar Pradesh to remove all illegal structures built on public roads and footpaths without any delay. The Court had remarked that obstructing a public pathway is a living unrighteousness (Adharma). The Allahabad High Court has also laid down a clear legal principle regarding government and police encroachments, stating that "the police cannot violate the law themselves under the guise of maintaining security and law and order." If a police station or an outpost obstructs public traffic or a footpath, it is the duty of the state government to immediately relocate it to another suitable place. However, all these observations exist in Banaras only within the thick pages of law books.
Today, to pull Varanasi out of this multi-dimensional traffic hell, there is a need for a long-term master plan backed by strict administrative willpower, modern technology, and legal enforcement—one that is not just drafted but strictly executed. By implementing "The Footpath is Ours" or the 'Right to Walk', the construction of modern, elevated, and barrier-free footpaths on both sides of all major city roads should be made mandatory. Ramps should be built for the differently-abled to access footpaths, and bollards should be installed to prevent the entry of vehicles. The licenses of shopkeepers who spread their goods onto the footpaths should be suspended with immediate effect. Dedicated 'Smart Vending Zones' away from the main roads should be developed for street vendors and cart-pullers. Implementing special 'legal enforcement' for the Kachehri area, the entire road and footpath from the Circuit House to the Collectorate and District Court gates should be declared a 'Zero-Tolerance No-Parking Zone'. The use of multi-level parking must be made mandatory, and heavy financial fines should be imposed on any vehicle parked on the road, regardless of whether it says 'Advocate', 'Police', or 'Press' on it.
Police stations like Bhelupur, Sigra, and Chetganj should be removed from their current roadside locations and shifted nearby into multi-story 'Vertical Police Station' buildings on government orNazul(state) land. Similarly, concrete outposts built right at the mouth of intersections (such as Kachehri, Lahurabir, Maidagin, Gilat Bazar, Teliabag) should be demolished immediately. In their place, space-saving prefabricated kiosks made of fiber or steel should be set up away from the crossroads. To immediately clear vehicles that are turning into scrap outside police stations, a massive central dumping yard should be built on the outskirts of the city (such as near the main Ring Road). The entry of heavy and medium commercial goods vehicles into the inner and busy commercial areas of the city should be completely banned during the day. The loading and unloading of goods in the markets must be ensured only between 11:00 PM and 6:00 AM. Auto-rickshaws should be divided and categorized zone-wise by issuing a fixed number of permits. To reduce the heavy rush of private vehicles in the city, time-bound public city buses should be operated. Only then might we get some relief from the sudden crowding, jostling, and traffic jams on the roads of Banaras.
In this rapid race for development, providing a modern, smooth, and pollution-free infrastructure while preserving Kashi's antiquity, its heritage, and its soul is the greatest call of the hour. The solution to this horrific problem of traffic and congestion cannot be achieved through civil engineering alone. It demands strict administrative will, the rigorous grassroots implementation of judicial orders without any appeasement or influence of status, the complete restoration of footpaths, and the awakening of a responsible civic sense among the citizens. Only when the protectors of the law (the police), the advocates of the law (lawyers), and the seekers of faith (the public) collectively respect the roads and footpaths, will the true beauty and global glory of this 'Anand Kanan' (Forest of Bliss) remain intact.
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Banaras, 13September2026,Sunday

वाराणसी की बे-पटरी यातायात व्यवस्था.........../ व्योमवार्ता

  वाराणसी की बे-पटरी यातायात व्यवस्था...... 
                                             *व्योमेश चित्रवंश
        आज जब हम २१वीं सदी के तीसरे दशक में,२०२६ के धरातल पर खड़े हो कर काशी की यातायात व्यवस्था देखते हैं  तो स्पष्ट दिखता है कि विश्व की यह प्राचीनतम नगरी अपने  यातायात व्यवस्था के पूर्णतः पंगु हो जाने के एक अभूतपूर्व और अत्यंत वीभत्स संकट के मुहाने पर खड़ी है। हाल के वर्षों में, विशेषकर काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के ऐतिहासिक और भव्य कायाकल्प के बाद, वाराणसी में आने वाले देश-विदेशी तीर्थयात्रियों, आध्यात्मिक पर्यटकों और शोधकर्ताओं की संख्या में अप्रत्याशित रूप से कई सौ गुना की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां पहले सावन या विशेष त्योहारों पर ही भीड़ उमड़ती थी, वहीं अब प्रत्येक सामान्य सप्ताहांत पर शहर की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है। व्यवहारत: इस सांस्कृतिक और पर्यटन पुनर्जागरण का स्वागत किया जाना चाहिए और यह स्वागत हो भी रहा है  परंतु शहर का भौतिक और ढांचागत स्वरूप इस वैश्विक दबाव को संभालने में पूरी तरह अक्षम सिद्ध हो रहा है। काशी मूलतः अपनी संकरी गलियों, पारंपरिक मिश्रित भू-उपयोग वाले बाजारों और गंगा नदी के समानांतर विकसित बस्तियों के लिए जानी जाती है। जब इन प्राचीन और संकरी सड़कों पर आधुनिक, तीव्रगामी, भारी-भरकम चारपहिया वाहन और अनियंत्रित ई-रिक्शा का रेला उतरता है, तो पूरा शहर एक विशाल 'ओपन-एयर पार्किंग लॉट' में तब्दील हो जाता है।
             वाराणसी में जाम केवल सड़कों पर गाड़ियों के रुकने की घटना नहीं है; यह यहाँ के नागरिकों के मौलिक अधिकारों, उनके स्वास्थ्य, समय और शहर की आर्थिक उत्पादकता पर एक निरंतर होने वाला अदृश्य प्रहार है। एक कामकाजी पेशेवर, छात्र या व्यापारी जो कैंट स्टेशन से लंका या गोदौलिया जाना चाहता है, उसे महज ५ से ६ किलोमीटर की दूरी तय करने में औसतन १ से १.५ घंटे का समय गवाना पड़ता है। रोजाना लाखों मानव-घंटे चौराहों पर धुएं और हॉर्न के शोर के बीच नष्ट हो रहे हैं। चौराहों पर लगातार बजने वाले अनियंत्रित हॉर्न के कारण ध्वनि प्रदूषण सामान्य स्वीकृत डेसिबल सीमाओं से कहीं ऊपर पहुंच चुका है। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय दुकानदारों, यातायात पुलिसकर्मियों और दैनिक यात्रियों में उच्च रक्तचाप, चिड़चिड़ापन, बहरापन और क्रोनिक स्ट्रेस जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं। जाम में फंसे वाहनों के इंजनों से लगातार निकलने वाली जहरीली गैसें (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर शहर के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) को खतरनाक स्तर पर बनाए रखती हैं। यह जहरीला धुआं न केवल इंजनों की बर्बादी कर रहा है, बल्कि फेफड़ों को भी नुकसान पहुँचा रहा है। वाराणसी का बीएचयू  ट्रॉमा सेंटर पूर्वांचल, बिहार और नेपाल तक के मरीजों के लिए जीवनदायिनी माना जाता है। परंतु, जब कोई गंभीर एम्बुलेंस कैंट, लहरतारा या लंका के भीषण जाम में फंसती है, तो कई बार मरीज अस्पताल की दहलीज तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए एक गंभीर मानवाधिकार संकट है।
          वाराणसी की यातायात समस्या की जब भी समीक्षा की जाती है, तो अक्सर वाहनों और चौड़ी सड़कों पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है, परंतु इस पूरे संकट की एक सबसे मर्मांतक जड़ फुटपाथों का पूर्णतः लोप हो जाना  है। शहर के जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण योजना (जे एनएनआरयूएम) के समय से लेकर आधुनिक स्मार्ट सिटी योजनाओं में भी पैदल यात्रियों की अनदेखी हो रही है।
"फुटपाथ हमारा है" केवल एक प्रशासनिक स्लोगन बनकर रह गया है। कचहरी से अर्दली बाजार व भोजूबीर मार्ग हो या गोदौलिया-दशाश्वमेध मार्ग, यहाँ फुटपाथों पर पैदल चलने वालों के अलावा सब कुछ मिलता है। सच तो यह है कि शहर की अधिकांश पुरानी सड़कों के निर्माण के समय आधुनिक 'पेडस्ट्रियन पाथवे' का कोई विजन ही नहीं रखा गया। सड़कें तो चौड़ी की गईं, लेकिन पैदल चलने वालों के लिए एक इंच जगह नहीं छोड़ी गई। जहाँ प्रशासन ने फुटपाथ बनाए भी (जैसे वाराणसी स्मार्ट सिटी के तहत), वहां स्थानीय दुकानदारों ने अपनी दुकानों के काउंटर २ से ३ फीट आगे बढ़ाकर फुटपाथों को अपनी निजी जागीर बना लिया है। इसके आगे तीन चार फीट तक  दोपहिया वाहनों की अवैध पार्किंग फुटपाथ को पूरी तरह अवरुद्ध कर देती है। जब पैदल चलने वाले वृद्धों, महिलाओं, बच्चों और पर्यटकों के लिए चलने की कोई सुरक्षित जगह नहीं बचती, तो वे अपनी जान हथेली पर रखकर मुख्य सड़क पर वाहनों के बीच चलने को मजबूर होते हैं। इससे सड़क का 'कैरिज-वे' (वाहनों के चलने की जगह) स्वतः संकरा हो जाता है और पूरी सड़क की गति १० किमी/घंटा से भी कम हो जाती है।
        बनारस के अधिकांश प्रमुख बाजार—जैसे दालमंडी, हनुमानगंज, चौक, लंका, और रथयात्रा—दशकों पुराने हैं। इन बाजारों का विकास उस दौर में हुआ था जब परिवहन का मुख्य साधन बैलगाड़ी, इक्का, साइकिल या पैदल चलना था। परंतु वर्तमान में, इन्हीं संकरे बाजारों में बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, बड़े मॉल, डायग्नोस्टिक सेंटर्स और अस्पताल धड़ल्ले से खोल दिए गए हैं। इनमें से ८०% से अधिक व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पास अपनी कोई बेसमेंट या समर्पित पार्किंग व्यवस्था नहीं है। यदि कहीं कागजों पर बेसमेंट पार्किंग दिखाई भी गई है, तो बिल्डरों और व्यापारियों ने स्थानीय प्राधिकरणों से सांठगांठ कर उस पार्किंग स्पेस को गोदाम, दुकान या रेस्टोरेंट में तब्दील कर दिया है। परिणामस्वरूप, इन दुकानों या अस्पतालों में आने वाले ग्राहकों और मरीजों के वाहन (दोपहिया और चारपहिया दोनों) सीधे फुटपाथों और मुख्य सड़क पर पार्क करा दिए जाते हैं। जब एक व्यस्त चार-लेन की सड़क के दोनों ओर गाड़ियां खड़ी हो जाती हैं, तो वह प्रभावी रूप से केवल एक-लेन या दो-लेन की सड़क बनकर रह जाती है, जिससे 'बॉटलनेक'  की स्थिति पैदा होती है।
               वाराणसी में शहर के मौलिक स्वभाव के अनुरूप यातायात नियमों के प्रति सम्मान और भय का स्तर लगभग शून्य दिखाई देता है। यहाँ गाड़ियां सड़कों पर बनी सफेद पट्टियों  के अनुसार नहीं, बल्कि जहां थोड़ी सी भी जगह दिखे, वहां गाड़ी घुसा देने की प्रवृत्ति से चलती हैं। चंद मीटर की दूरी या यू-टर्न बचाने के चक्कर में भारी वाहन, मोटरसाइकिल और विशेष रूप से ई-रिक्शा मुख्य सड़क पर सामने से आ रहे ट्रैफिक के विपरीत दिशा में तेज गति से चलते हैं। रोजगार के नाम पर विशेषकर कोरोना के बाद शहर में हजारों की संख्या में अनाधिकृत और अपंजीकृत ई-रिक्शा सड़कों पर उतार दिए गए हैं। सवारी देखते ही ये  बिना कोई सिग्नल दिये सड़क के ठीक बीच में या चौराहों के मोड़ों पर अचानक ब्रेक लगा देते हैं, जिससे पीछे आ रहा पूरा ट्रैफिक ठप हो जाता है।
         वाराणसी जैसे अत्यधिक धार्मिक और संवेदनशील शहर में 'आस्था की आड़ में अतिक्रमण' एक ऐसा कड़वा सच है जिस पर सार्वजनिक मंचों पर बात करने से अक्सर प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर बचा जाता है। भारत में धार्मिक भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं कि कानून तोड़ने वाले तत्व इसे एक 'सुरक्षा कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यस्त चौराहे या फुटपाथ पर चाय या पान की दुकान खोलता है, तो नगर निगम का दस्ता उसे अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत तुरंत ध्वस्त कर सकता है। परंतु, यदि उसी स्थान पर किसी पेड़ के नीचे चुपके से एक छोटा सा चबूतरा बनाकर कोई धार्मिक प्रतिमा स्थापित कर दी जाए, या किसी पुरानी संरचना पर चादर चढ़ाकर उसे मजार का रूप दे दिया जाए, तो स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। जैसे ही किसी संरचना के साथ 'धर्म' का नाम जुड़ता है, स्थानीय प्रशासन कानून-व्यवस्था बिगड़ने, सांप्रदायिक तनाव फैलने या धार्मिक भावनाओं के आहत होने के डर से बैकफुट पर आ जाता है। धीरे-धीरे उस छोटे से चबूतरे के चारों ओर लोहे की ग्रिल लग जाती है, फिर एक पक्का कमरा बन जाता है, और उसके बाद उस धार्मिक स्थल की सेवा या सुरक्षा के नाम पर उसके आस-पास फुटपाथों को घेरकर फूल-प्रसाद, चादर, या मजहबी किताबों की दुकानें सज जाती हैं। यह व्यावसायिक विस्तार अंततः एक बड़े और स्थायी जाम का केंद्र बन जाता है।
वाराणसी में ऐसे कई क्षेत्र रहे हैं जहाँ विकास और सुगम यातायात के मार्ग में धार्मिक अतिक्रमण एक बड़ी बाधा बनकर उभरा, परंतु हाल के वर्षों में कुछ कड़े प्रशासनिक और विधिक कदम भी देखने को मिले हैं। काशी विश्वनाथ धाम के ठीक बगल में स्थित दालमंडी बाजार अपनी संकरी गलियों और सघन आबादी के लिए जाना जाता है। यहाँ सड़कों और फुटपाथों की चौड़ाई इतनी कम हो चुकी थी कि पैदल चलना भी दूभर था। सरकार ने शहर के इस कोर एरिया को जाम-मुक्त करने के लिए ₹२२२ करोड़ की दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण परियोजना शुरू की। इस परियोजना के तहत सड़कों को १७.५ मीटर तक चौड़ा किया जाना था, जिसके दायरे में लगभग १४६ अवैध और आंशिक ढांचे आ रहे थे। प्रशासन ने विधिक प्रक्रियाओं के तहत इन अतिक्रमणों को हटाने की कार्रवाई शुरू की, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी हरी झंडी दी। इसी तरह काशी रेलवे स्टेशन को एक वैश्विक स्तर के 'इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट हब' के रूप में विकसित करने की योजना पर रेलवे की अधिग्रहित और स्वामित्व वाली भूमि पर खड़े अवैध कब्जों को हटाया गया। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता  और एक अच्छी बात यह थी कि यह पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और निष्पक्ष था। जहां एक ओर रेलवे की जमीन पर अनधिकृत रूप से बनी संरचनाओं (मजार का अवैध हिस्सा) को ध्वस्त किया गया, वहीं उसी कॉरिडोर के मार्ग में आने वाले अवैध हनुमान मंदिर को भी पूरी विधिक प्रक्रिया और नोटिस के बाद शांतिपूर्ण ढंग से हटाया या स्थानांतरित किया गया।
वाराणसी मे यातायात और जाम की समस्या का सबसे दुखद और विरोधाभासी पहलू यह है कि जो पुलिस विभाग, प्रशासनिक अमला और विधिक बिरादरी सड़कों व फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए कानूनन बाध्य है, उसके स्वयं के पैर सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से जमे हुए हैं। वाराणसी में पुलिस द्वारा थाना और पुलिस चौकी बनाने के नाम पर तथा वकीलों व मुवक्किलों द्वारा कचहरी के बाहर बेतरतीब वाहनों की कतारें लगाने के नाम पर फुटपाथों और सड़कों का भीषण अतिक्रमण किया गया है। यह एक ऐसी प्रशासनिक विडंबना है जहाँ कानून के रक्षक (पुलिस) और कानून के पैरोकार (अधिवक्ता) स्वयं कानून का उल्लंघन करते हुए प्रतीत होते हैं। सोचने वाली बात यह है कि जब मुख्य सड़कों और फुटपाथों पर ही पुलिस का पक्का ढांचा और वकीलों की गाड़ियों का अवैध स्टैंड खड़ा हो, तो प्रशासन किसी आम रेहड़ी-पट्टी वाले को अतिक्रमण हटाने की नैतिक या कानूनी हिदायत किस मुंह से दे सकता है? वाराणसी का प्रशासनिक, पुलिस और न्यायिक मुख्यालय क्षेत्र कचहरी  प्रशासनिक अव्यवस्था और संगठित अतिक्रमण का सबसे बड़ा उदाहरण है।  शासन द्वारा कचहरी के ठीक पास करोड़ों रुपये की लागत से आधुनिक मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण कराया गया है, ताकि सड़कें खाली रह सकें। परंतु, वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। न्यायालय आने वाले अधिकांश अधिवक्ता, मुवक्किल और अन्य लोग पार्किंग शुल्क बचाने या थोड़ी सी पैदल दूरी से बचने के लिए अपने वाहनों को मल्टी-लेवल पार्किंग में पार्क करने की जगह सीधे मुख्य सड़क और फुटपाथ पर खड़ा कर देते हैं। इसके अलावा, फुटपाथों पर चाय पान की दुकानें, कचहरी मे जिलापंचायत मार्ग पर नोटरी वकीलों के तख्त, कुर्सियां और टाइपिस्टों के अवैध केबिन स्थायी रूप से काबिज हैं। सर्किट हाउस से लेकर कलेक्ट्रेट गेट तक वाहनों की दो-दो, तीन-तीन कतारें लग जाती हैं। वकीलों के संगठित एकता के रसूख और प्रभाव के कारण कोई भी जूनियर ट्रैफिक पुलिसकर्मी या नगर निगम का दस्ता इन गाड़ियों को टो  करने या उन पर चालान काटने का साहस नहीं जुटा पाता। इसके चलते एक शानदार चौड़ी सड़क और उसका फुटपाथ प्रभावी रूप से महज ६ से ८ फीट के 'सिंगल-लेन बॉटलनेक' में तब्दील हो गया है। कचहरी के साथ-साथ पुलिस अवसंरचना ने भी शहर के मुख्य चौराहों, फुटपाथों और रास्तों का गला घोंट रखा है। भेलूपुर  थाने की मुख्य इमारत का एक हिस्सा, उसकी बाउंड्री वॉल और थाने के ठीक बाहर सड़क व फुटपाथ पर खड़े किए गए वाहन'  मुख्य मार्ग की चौड़ाई को ४०% तक कम कर देते हैं। इसी तरह चेतगंज थाने के सामने सड़क पर आगेबारह फीट तक बढ़ कर बनाये गये बाउंड्रीवाल पुलिस की गाड़ियों की बेतरतीब पार्किंग, सुरक्षा के नाम पर सड़कों और फुटपाथों पर स्थायी रूप से लगाए गए भारी लोहे के बैरिकेड्स के कारण राहगीरों का चलना असंभव हो जाता है।सिगरा थाने के विस्तार, वहां खड़ी रहने वाली वज्र वाहन, पुलिस क्रेन और विभिन्न मामलों में जब्त किए गए ट्रकों व कारों के कारण सड़क का बायां लेन और फुटपाथ पूरी तरह से एक 'कबाड़खाने' में तब्दील हो चुका है।कचहरी, तेलियाबाग, लहुराबीर और गिलटबाजार की पुलिस चौकियां किसी विशाल सरकारी भूखंड पर नहीं, बल्कि चौराहों के बिल्कुल मुहाने पर, त्रिकोणीय मोड़ों  पर या फुटपाथों को काटकर बनाई गई हैं। इन चौकियों के पक्के निर्माण और उनके बाहर सुरक्षा के नाम पर घेरे गए क्षेत्र के कारण वाहनों का टर्निंग रेडियस  और पैदल यात्रियों का रास्ता पूरी तरह खत्म हो जाता है।
मजेदार तो यह है कि  उच्च एवं उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय भी भोले बाबा के नगरी मे नजीर नही बनते बल्कि वे केवल कागजों के बस्ते में बंद हो कहीं पड़े रहते हैं।
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम स्टेट ऑफ गुजरात (२००९) के  ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को सख्त आदेश जारी किया था कि सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों, गलियों और सार्वजनिक पार्कों में किसी भी नए धार्मिक ढांचे के निर्माण की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाएगी। इसी तरह ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (१९८५) के निर्णय मे सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि संविधान के अनुच्छेद २१ (जीवन का अधिकार) के तहत फुटपाथों और सड़कों का प्राथमिक और एकमात्र उद्देश्य पैदल यात्रियों और वाहनों का आवागमन है। किसी भी व्यक्ति, संस्था, बार एसोसिएशन या सरकारी विभाग को इस सार्वजनिक स्थान पर कब्जा करने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
अवैध धार्मिक ढांचों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने कड़ा रूख अपनाते हुये 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों पर निर्मित सभी अवैध ढांचों को बिना किसी देरी के हटाया जाए। न्यायालय ने कहा था कि सार्वजनिक मार्ग को अवरुद्ध करना साक्षात अधर्म है।सरकारी और पुलिस अतिक्रमण पर  भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट विधिक सिद्धांत दिया है कि "सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में पुलिस स्वयं कानून का उल्लंघन नहीं कर सकती।" यदि किसी थाने या चौकी के कारण सार्वजनिक यातायात या फुटपाथ बाधित हो रहा है, तो राज्य सरकार का यह कर्तव्य है कि वह उसे तुरंत किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित करे। परंतु ये सभी नजारे बनारस मे केवल कानून की मोटी किताबों मे दर्ज है
           आज वाराणसी को इस बहुआयामी यातायात नरक से बाहर निकालने के लिए एक सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, आधुनिक तकनीक  और विधिक कड़ेपन से युक्त एक दीर्घकालिक महा-योजना  की आवश्यकता है, जिसे केवल निर्माण ही नही बल्कि सख्त ढंग से  क्रियान्वित किया जाना चाहिए। जैसे  फुटपाथ हमारा है या 'राइट टू वॉक' का क्रियान्वयन करते हुये शहर की सभी मुख्य सड़कों के दोनों तरफ आधुनिक, ऊंचे और बाधा-मुक्त फुटपाथों का निर्माण अनिवार्य किया जाए। फुटपाथों पर चढ़ने के लिए दिव्यांगों हेतु रैंप बनाए जाएं और वाहनों के प्रवेश को रोकने के लिए 'बोलार्ड्स' लगाए जाएं। जो दुकानदार फुटपाथ पर अपना सामान फैलाते हैं, उनका लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए। रेहड़ी-पटरी और ठेले वालों के लिए मुख्य सड़क से दूर समर्पित 'स्मार्ट वेंडिंग जोन' विकसित किए जाएं। कचहरी क्षेत्र के लिए विशेष 'विधिक प्रवर्तन' करते हुये सर्किट हाउस से लेकर कलेक्ट्रेट और जिला न्यायालय के गेट तक की पूरी सड़क और फुटपाथ को 'जीरो टॉलरेंस नो-पार्किंग ज़ोन' घोषित किया जाए। मल्टी-लेवल पार्किंग का उपयोग अनिवार्य हो और सड़क पर खड़ी किसी भी गाड़ी पर (चाहे उस पर 'अधिवक्ता' या 'पुलिस' 'प्रेस' ही क्यों न लिखा हो) भारी आर्थिक जुर्माना लगाया जाए। भेलूपुर, सिगरा और चेतगंज जैसे थानों को वर्तमान सड़क मार्ग से हटाकर, उनके नजदीक ही किसी सरकारी या नजूल भूमि पर बहुमंजिला 'वर्टिकल पुलिस स्टेशन' भवनों में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। इसी तरह चौराहों के मुहाने पर बनी कंक्रीट की चौकियों (जैसे कचहरी, लहुराबीर, मैदागिन, गिलटबाजार, तेलियाबाग) को तुरंत ध्वस्त किया जाना चाहिए। उनकी जगह चौराहों से दूर, कम जगह घेरने वाले फाइबर या स्टील के प्रीफैब्रिकेटेड कियोस्क स्थापित किए जाएं। थानों के बाहर कबाड़ बन रही गाड़ियों को तुरंत हटाने के लिए शहर के बाहरी हिस्से (जैसे मुख्य रिंग रोड के पास) एक विशाल केन्द्रीय डंपिंग यार्ड बनाया जाए। शहर के अंदरूनी व व्यस्त व्यापारिक इलाकों में माल ढोने वाले भारी और मध्यम कमर्शियल वाहनों का प्रवेश दिन के समय पूरी तरह प्रतिबंधित हो। बाजारों में माल की लोडिंग और अनलोडिंग केवल रात ११:०० बजे से सुबह ६:०० बजे के बीच ही सुनिश्चित की जाए। फोटो आटो को निश्चित मात्रा मे परमिट देकर उन्हे क्षेत्रवार विभाजित व वर्गीकृत किया जाय। शहर मे वाहनों के भारी भीड़ को कम करने के लिये सार्वजनिक समयबद्ध नगर बसें संचालित हों। तब शायद हम बनारस के सड़कों पर अनायास भीड़ धक्का मुक्की और जाम की समस्या से हम कुछ हदलतक निजात पा सकेगें।
विकास की इस तीव्र दौड़ में काशी की प्राचीनता, उसके हेरिटेज और उसकी आत्मा को बचाते हुए उसे एक आधुनिक, सुगम और प्रदूषण-मुक्त बुनियादी ढांचा प्रदान करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी पुकार है। यातायात और जाम की इस वीभत्स समस्या का समाधान केवल सिविल इंजीनियरिंग से नहीं होगा। इसके लिए सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, न्यायपालिका के आदेशों का बिना किसी तुष्टिकरण या पद-रसूख के कड़ाई से जमीनी क्रियान्वयन, फुटपाथों की पूर्ण बहाली और नागरिकों के भीतर एक जिम्मेदार नागरिक बोध का जाग्रत होना अनिवार्य है। जब कानून के रक्षक (पुलिस), कानून के पैरोकार (अधिवक्ता) और आस्था के साधक (जनता) तीनों मिलकर सड़कों और फुटपाथों का सम्मान करेंगे, तभी इस 'आनंद कानन' की वास्तविक सुंदरता और उसका वैश्विक गौरव अक्षुण्ण रह सकेगा।
काशी, 13सितंबर 2026, http://chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 12 सितंबर 2026

BANARAS : Banarasiyat is fading away......../vyomvarta


Banarasiyat is Fading Away...

By Vyomesh Chitravansh

There are two types of cities in this world. The first are those that appear on the global map merely through stones, cement, concrete, roads, and architectural designs—cities completely defined by geography. The second are those woven from the very fabric of human temperament, culture, and history; cities that even time cannot alter. They are living epics written upon the chest of time. Kashi is one such epic. In fact, Banaras has long been the crown jewel of this second category of living epics. It is the very city about which Mark Twain wrote that it is older than history, older than tradition, and older even than legend. Banaras is not just a geographical location, but a 'state of being,' a 'frame of mind'—an eternally living condition that the world recognizes by the name of 'Banarasiyat.' This Banarasiyat has traditionally breathed around the corners of narrow alleys, on the steps of the river ghats, in the velvet warmth of the morning sun, and within the carefree, non-conformist lifestyle (Fakkadpan) of its people.
Yet, it is equally true that when an ancient city alters its pace in the race for development and modernity, its soul often has to pay the price. Today, our Banaras stands at precisely this crossroad. The shift this eternal city has taken over the past years has brought us all to a point of serious introspection. Banaras stands at a crossroad where on one side lie the glittering heights of physical and economic progress, while on the other side reigns the quiet silence of a centuries-old cultural identity fracturing away. Today, walking through the alleys, ghats, and intersections of Banaras triggers a deep restlessness within the heart. The developmental turn this timeless city has experienced over the past twelve years has given birth to a profound ideological conflict within our minds. This conflict is the tug-of-war between the blinding glare of physical development and the scattering of cultural identity.
There are no two ways about the fact that Banaras has undergone a complete physical transformation over the last decade. From an economic and structural standpoint, the city has touched heights that would have been deemed impossible to imagine twenty years ago. There is no doubt that the physical overhaul of Banaras over the past decade has been unprecedented. On economic and infrastructural benchmarks, the city has taken a leap that was unthinkable two decades ago. The web of Ring Roads wrapping around the city, the modern network of six-lane and four-lane highways, and ambitious projects like the Phulwariya Four-Lane have significantly liberated Banaras from its ancient curse of gridlocks. The country's first urban ropeway project, taking shape between Cantt Railway Station and Godowlia, directly links this ancient city to the cutting-edge transit technology of the twenty-first century. This reinforcement of basic infrastructure has triggered an unprecedented boom in the tourism industry. The influx of capital into Banaras’s hotels, home-stays, boat-operating businesses, and handicraft industries has infused a lease of life into the local economy. The modern transit networks expanding across the city have given a new fluid accessibility to the traffic system, which is considered the very backbone of the city.
The grand blueprint of the Kashi Vishwanath Dham has captivated tourists from all corners of the globe. On physical and economic metrics, it paints the portrait of an exceptionally successful and developed city. However, today we must look beyond this glitter to confront the darkness and isolation that this city is paying as the ultimate price for this development.
The most prominent and symbolic epicenter of this physical transformation was the construction of the Kashi Vishwanath Dham Corridor. When the centuries-old, narrow, and winding—yet historically and emotionally vibrant—'Vishwanath Gali' was dismantled, it wasn't just concrete buildings and brick houses that were demolished. Along with them, the traditional sociology of Kashi, which had remained intact for generations, was buried under the rubble. The shops in that alley held more than just commercial value; those shopkeepers and the daily passersby were the living witnesses to each other’s joys and sorrows.
Previously, this alley possessed a distinct character. At these shops, acquaintances ran generations deep. The intimate closeness that devotees of Mahadeva experienced while navigating these narrow lanes has been entirely lost within this new, massive, stone-crafted, grand courtyard. A magnificent corridor has indeed risen for Sri Kashi Vishwanath Dham—no longer just for the Bhole Baba of the common local—but along with it, the traditional social fabric that was the true heartbeat of Kashi has unraveled.
Today, searching for those traditional 'Nemis' (devotees bound by a daily ritual), who would advance toward the court of Baba Vishwanath with the first ray of dawn after a dip in the Ganga, carrying a copper vessel of holy water while chanting "Har Har Mahadev Shambho, Kashi Vishwanath Gange," has become an impossible task. Amidst the overwhelming surge of tourists and an aggressive VIP culture, the effortless, spontaneous connection of Kashi's local devotees has been left far behind.
There are no two opinions that this project has bestowed global grandeur, cleanliness, and vastness upon Baba’s courtyard. Yet, the price paid to achieve this scale was a piece of Banaras's very soul. For a citizen of Kashi, this painful transition manifests most sharply as the displacement of their traditions. The morning of Banaras had an established code—bathing in the Ganga with the dawn's first light, taking a copper pot of Ganga water, flowers, and bael leaves, and walking barefoot toward the court of Baba Vishwanath. This pilgrimage was never dependent on a VIP pass or queue management systems; it was a spontaneous, informal, daily familial conversation between the devotee and the Divine.
These traditional Nemis—the local citizens bound by this daily spiritual discipline—were the actual soul of this city. Today, caught between a rigid VIP culture, strict security cordons, an unprecedented and relentless tide of tourists, defensive security labyrinths, and corporate-managed queues, these locals find themselves feeling cursed and neglected in their own home.
Built upon the debris of destroyed heritage and the displacement of intimate human connection, this new 'event management' model of pilgrimage and faith has reduced Banaras's core spiritual solitude into a chaotic tourism hub. Today, laser shows illuminate the ghats, music echoes over the wakes of luxury cruises, and there is a blinding glare of illumination. Yet, amidst this grand spectacle, the traditional, spiritual stillness of 'Subah-e-Banaras' has completely vanished—the very stillness where Kabir once attacked orthodox dogmas, Tulsidas composed the verses of the Ramcharitmanas, Ustad Bismillah Khan surrendered the notes of his Shehnai to the ripples of the Ganga, and Ratnakar, singing the Ganga Lahari through his poetic Lavani, ultimately dissolved his physical existence into the holy river. It was here that Adi Shankaracharya perceived Shiva in the form of a Chandala (Dom) and recognized the cosmic reality of 'Shivoham Shivoham' (I am Shiva, I am Shiva).
Today's Banaras is turning into an expensive showpiece displayed in the showroom of 'Heritage Tourism'—something tourists can admire from a distance, but whose inner, fluid essence they can never truly touch. Under the weight of commercialization, a spiritual practice that was once an effortless, intimate part of a daily routine has now been reduced to a structured 'event.' This commercialization of faith deals a deep, wounding blow to the foundational religious character of Banaras.
Lately, this new terminology has gained significant traction—'Heritage Tourism' or 'Cultural Tourism.' Banaras has emerged as its grandest capital. However, we must critically realize that marketing culture and living culture are two completely different things.
Today, while the ghats feature laser shows, cruising ships, and a dazzling display of lights, the traditional peace of the riverbank has been lost in the middle of this theatrical spectacle. The spiritual solitude of Subah-e-Banaras, where Kabir, Tulsidas, and Bismillah Khan once anchored their deepest spiritual practices (Sadhana), has been commodified like a display object behind a showroom window. Tourists flock here to witness 'Banarasiyat,' but what is being served to them is not the authentic Banaras—it is merely a polished, high-gloss 'version' of it.
The original Banarasi—the one who could find the ultimate truth of life simply by sitting on the steps of the ghats for hours, quietly staring at the waves of the Ganga—is now being pushed away from the riverfront, displaced by the chaotic crowds and aggressive commercialization.
Banaras is not merely a name given to grand buildings and wide roads; it is a unique temperament, a distinct way of living. The true identity of Banaras lay far more in its social lifestyle than in its architecture. Its core traits—the lighthearted carefreeness (Almasti), the non-conformism (Fakkadpan), and the pure joy of living (Mauj)—remained a complete riddle to any modern city in the world. Today, however, the towering multi-story apartment buildings rising from the city's outskirts into its main core are steadily devouring this traditional social fabric.
In the older neighborhoods of Banaras, the temple precincts and the Chabutras (raised stone platforms outside houses) were not just places to sit—they functioned as open-air parliaments. This Chabutra system was not a mere architectural feature; it was a deeply democratic, public assembly. It served as a common stage where every section of society—be it a university professor, a government clerk, a local weaver, or a common rickshaw puller—sat together without a shred of formal hesitation or discrimination.
Here, the neighborhood priest, freshly bathed from the Ganga after his morning prayers, would share the space with the municipal sweeper who swept those very streets daily. Wrapped in simple gamchhas, rubbing raw tobacco (Khaini) in their palms, or taking a pinch of snuff, these Banarasis would sit in the classic pose of a relaxed observer (Gappaji) to dissect the universe. They passed such candid, unflinching, and pinpoint commentary on contemporary politics, religion, literature, and philosophy that would leave leading international thinkers and modern think-tanks utterly bewildered. That dialogue was entirely pure, free from any commercial or personal interest. This practice of Gappaji and effortless banter (Batkahni) functioned as a robust local information network—a daily platform to catch up on the health, prosperity, struggles, and general well-being of every family in the neighborhood. This platform system was the communicative nervous system of the community. It was a space defined by lightheartedness, spontaneous smiles, and an unhurried search for contentment (Sukh) across the ghats and alleys.
Today, these open platforms have been replaced by the towering, closed walls of multi-story buildings, the isolation of elevator cultures, and locked doors. Modern apartments have brought people physically closer together, but they have stretched the mental and social distances between them into infinity. The collective laughter and the natural tendency to smile without a specific reason are fast vanishing from the neighborhoods. Modern apartment life has snuffed out that vibrant, spontaneous dialogue. The collective roar of laughter is no longer heard on the porches. The frantic rush of modern life, the pressure of corporate jobs, and the crippling anxiety of EMIs have systematically drained the carefree attitude out of the Banarasi temperament—a trait that was once the undisputed trademark of this city.
Over the past twelve years, Kashi has witnessed unprecedented economic and physical growth. The vast network of Ring Roads, six-lane and four-lane highways, the Phulwariya four-lane, and modern transit systems like the sky-bound urban ropeway have dramatically accelerated the city's pace. Towering residential complexes have reshaped Varanasi's skyline. Yet, behind this glittering concrete jungle, the centuries-old identity that we proudly termed 'Banarasiyat' has been lost somewhere.
While the established metrics of economics celebrate this rapid progress, a massive void is emerging on the fronts of sociology and culture. The burning question arises: in this rapid expansion of our geography, is our history not shrinking? Parallel to our widening roads, are the narrow lanes of our hearts and social interactions not turning narrower? While the primary columns of development look dazzling, the price paid for them is profoundly severe. It is true that infrastructural growth has boosted employment, given wings to tourism, and smoothened transit. But is it right to trade our cultural heritage and raw human connection for material prosperity? Today’s Banaras has undoubtedly become highly attractive for tourists, but it has started feeling a bit alien to the original Banarasis themselves.
Our objective is absolutely not to oppose development. Roads must be widened, traffic must be made smooth, and modern health and educational facilities must reach every single citizen. It is the need of the hour, and this progress must be welcomed.
But the foundational question remains: Must development always come at the absolute cost of one's identity? Can we not build a modern city that remains firmly anchored to its roots?
European nations have equipped their historic cities (such as Rome or Venice, or Kyoto in Japan) with cutting-edge modern amenities without altering or tampering with their ancient, traditional architecture. They preserved their old settlements, historic alleys, and social character by steering new, modern developments completely outside the old city boundaries. In the context of Banaras, it is precisely this 'balance' that we desperately needed—and still need today.
If our coming generations possess wide expressways, luxury cars, and magnificent high-rise apartments, but lose that classic Banarasi temperament, that 'shared culture' (Sanjha Sanskriti), that beautiful rustic carefreeness, and that proud refusal to bow down to a superficial pop-culture, then mark my words—they will be living in a very rich city, but they will have lost 'Kashi' forever.
It is absolutely crucial that this message reaches the policymakers who are driving the pace of this modern development: make Banaras a 'Smart City' by all means, but not at the altar of its 'Banarasiyat.' Concrete structures can always be rebuilt, but if cultures born from centuries of experience and spiritual devotion die once, reviving them will be impossible. Protecting the soul of Banaras is synonymous with protecting the very existence of this city. Development is necessary, and moving with the times is mandatory. However, if in this storm of progress, the carefree bliss (Almasti) of Kashi, the sweetness of the Banarasi paan, the tranquility of the ghats, and that intimate banter (gapsap) among loved ones disappear, this city will be reduced to a mere hollow shell. We must realize that the strength of Banaras lies not in its concrete, but in its 'Banarasiyat.' If we fail to save it, future generations will inherit a wealthy city, but they will have lost the 'living, breathing Kashi.'
It is true that to meet modern requirements, roads must be widened, sewage systems must be updated, and ropeways and airports must be constructed; this is the demand of the times and essential to make citizens' lives smoother. But the ultimate riddle remains: is development always possible only by sacrificing one's historical and cultural identity? Many ancient nations across the world (such as Rome and Venice in Italy, or Kyoto in Japan) developed entirely new suburbs outside their city limits without touching their ancient settlements, narrow lanes, or social character—thereby preserving their ancient core city as a living museum. In the context of Kashi, it is precisely this balance and 'Sustainable Development' that we needed.
If our future generations possess wide roads, luxury vehicles, and grand apartments, but lack that signature Banarasi warmth, that shared culture, and that untamed carefreeness, they might breathe in a prosperous city, but they will have lost 'Kashi' entirely. Policymakers and the enlightened sections of society must reflect deeply so that in our race to turn Banaras into a 'Smart City,' we do not choke the very life out of its 'Banarasiyat.' Concrete structures and asphalt roads can be rebuilt in a matter of months, but if lifestyles born out of centuries of shared cultural experiences go extinct once, it will be impossible to resurrect them using any technology in the world.
Kashi,Sunday, August 23, 2026.