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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बनारस / काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....... व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....

                                                                  *व्योमेश चित्रवंश
                    
             मोक्ष नगरी काशी के बारे में कहा जाता है कि यहां देह त्यागने वाली आत्मा को मोक्ष मिल जाता है। जिसकी मृत्यु काशी के बाहर होती है उसका महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से भी उसे मुक्ति मिल जाती है। काशी में एक तीर्थ ऐसा भी है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां प्रेत आत्माओं को मुक्ति मिलती है। यह तीर्थ पिशाच मोचन कुंड के नाम से विख्यात है। कुंड के महत्व के बारे में यहां के पुरोहितों का कहना है कि यह कुंड मां गंगा के पृथ्वी पर आने से पहले का है। और पितृ पक्ष में यहां प्रतों का मेला लगता है। साथ ही यहां पितरों के साथ ही प्रेत आत्माओं को भी मुक्ति मिलती है। इसके लिए यहां त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराए जाते है।
मृत्यु को भी उत्सव मानने वाले  मोक्ष की नगरी काशी का पिशाच मोचन कुंड  रहस्यमय पौराणिक स्थल कहा जाता है. यह कोई साधारण जलकुंड नहीं, बल्कि आत्माओं के उद्धार का केंद्र है. कहा जाता है कि जो आत्माएं अकाल मृत्यु का शिकार होती है या जो अधूरी इच्छाओं के साथ इस संसार से जाती हैं, वे भटकती रहती हैं. गीता में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा अजर है, अमर है. “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...” लेकिन अकाल मृत्यु होने वाले इंसान की आत्मा सालों भटकती रहती है. बाबा श्री काशी विश्वनाथ के त्रिशूल पर टिकी नगरी में भटकती आत्मा को भी यहां मोक्ष मिल जाता है. गरुण पुराण के काशी खंड में भी  पिशाच मोचन कुंड का उल्लेख मिलता है, जहां पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है. मान्यता है कि यहां पर आत्माओं का उधार भी चुकाया जाता है
काशी खंड के अनुसार पिशाच कुंड को मूल रूप से “विमल तीर्थ व विमलोदक तीर्थ” के नाम से जाना जाता है। कपर्दि नामक एक शिव गण ने एक जल निकाय- “विमल तीर्थ” बनाया और इस स्थान पर शिव की पूजा की, जिससे कपर्दीश्वर महादेव अस्तित्व में आए। समय के साथ, यह स्थान तपस्या के लिए एक स्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया। भगवान कपर्दीश्वर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर, खोपड़ियों से सुसज्जित द्वार और ब्रह्म को समर्पित विभिन्न छोटे मंदिरों के साथ एक जलाशय का शांत वातावरण, आपको अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना के समय में स्वागत करता है, जो निषिद्ध अवस्था से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे काशी के हृदय में प्रवेश करके मोक्ष प्राप्त कर सके।कथा है कि एक बार एक पाशुपत ऋषि विमल तीर्थ के तट पर ध्यान कर रहे थे, अचानक एक पिशाच जो एक ब्राह्मण था, और अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण पिशाच (भूत) योनि को प्राप्त कर गया। पहले तो उसने ऋषि वाल्मीकि को डराने की कोशिश की लेकिन बहुत प्रयास के बाद, उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे मुक्ति मांगी। ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा। इस प्रकार पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली तब से पिशाच मोचन तीर्थ बिहार के गया के अतिरिक्त पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए एक प्रसिद्ध स्थान बन गया। हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पितृलोक में निवास करती है – स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का क्षेत्र, जो यम "मृत्यु के देवता" द्वारा शासित है। पूर्वजों की तीन पीढ़ियाँ पितृलोक में रहती हैं और पितृ पक्ष (भाद्रपद का चंद्र महीना) के दौरान पृथ्वी का दौरा करती हैं ताकि उन्हें अपने वंश से जल, तर्पण मिल सके। अगर उन्हें यह मिल जाता है, तो उन्हें मुक्ति मिल जाती है लेकिन अगर उन्हें तर्पण नहीं मिलता है, तो उन्हें पुनर्जन्म की सजा मिलती है। जब अगली पीढ़ी का व्यक्ति मर जाता है, तो पहली पीढ़ी स्वर्ग चली जाती है और कर्म और उपरोक्त कारण के आधार पर मोक्ष/पुनर्जन्म प्राप्त करती है। इसीलिए सह्रद कर्मकांड पूर्वजों की केवल तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है। यदि पितरों की परेशान आत्माएं पितृलोक में खुश नहीं हैं तो उनका प्रभाव पृथ्वी पर उनके प्रियजनों पर पड़ता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अनुष्ठानों की एक श्रृंखला में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा शामिल है, जिन्हें क्रमशः सफेद, पीले और काले कपड़े के मिट्टी के पानी के बर्तन- कलश द्वारा दर्शाया जाता है ताकि वे पूर्वजों को मुक्ति दे सकें। पितृपक्ष के महीने में पिशाच कुंड इन अनुष्ठानों के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है और दुनिया भर से लोग अपने प्रियजनों को मुक्ति दिलाने के लिए इस स्थान पर आते हैं। कुंड के आस-पास का पूरा इलाका सफेद कपड़े पहने और मुंडा सिर वाले लोगों की भारी भीड़ को देखता है जो ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गया के बाद पिशाच मोचन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ ऐसी पूजा की जा सकती है जो पूर्वजों के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है। गरुण पुराण में भी इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। इस जगह से जुड़ी किंवदंती के कारण यह जगह बहुत ही अजीबोगरीब माहौल देती है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अनगिनत कीलें लगी हुई हैं, कुछ पर सिक्के लगे हुए हैं और कई लोगों की तस्वीरें हैं, जिनकी शायद असामयिक मृत्यु हुई हो। एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि यह किसी परेशान आत्मा के लिए अंतिम उपाय है, हो सकता है कि यह अंधविश्वास हो या वास्तविकता, यह किसी की आस्था पर निर्भर करता है। मुख्य मंदिर परिसर एक कुंड के किनारे स्थित है, आप कपरदीश्वर महादेव के साथ-साथ कपरदी विनायक (मंदिर पंचक्रोशी यात्रा के अंतर्गत भी आता है) के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर के ठीक बगल में भगवान हनुमान और विष्णु के साथ ब्रह्म की एक छोटी सी जटिल मूर्ति की पूजा की जाती है। पास ही वाल्मीकि टीला पर पिशाचेश्वर महादेव और ऋषि वाल्मीकि का मंदिर है। कुंड के आसपास के क्षेत्र में पंडा/ब्राह्मण द्वारा संचालित कई छोटे मंदिर हैं, जिनके अपने-अपने ईष्टदेव हैं। पास में एक अखाड़ा है, यह एक शांतिपूर्ण परिसर है जिसमें छोटे मंदिर और चित्रकूट रामलीला के लिए समर्पित स्थान हैं, जिसे मेघा भगत “गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य” द्वारा शुरू किया गया था।
पिशाच मोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि यह रामा अवतार के पहले की बात है। जब पृथ्वी पर गंगा अवतरित नहीं हुई थी उससे पहले का यह सरोवर है। यह विमलोदत्त तीर्थ है। यहां पूरे भारत वर्ष से लोग आते है। जो भी प्रेत योनि से पीड़ित है उसे यहां मुक्ति मिल जाती है। वह कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि रामा अवतार के समय पिशाच नाम का एक ब्राम्हण था। जो दान नहीं देता था। वह सिर्फ लोगों से दान लिया करता था। और इतना दान ले लिया कि उसकी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी। एकबार जब वाल्मीकि जी कुंड पर पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण यहां पहुंचे और उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि महराज मेरी आत्मा को शांति नहीं मिल रही। मेरा भी कल्यण करें। जिसके बाद उन्होंने पिशाच ब्राम्हण को तालाब में नहाने के लिए बोला। पिचाश ब्राह्मण जैसे ही स्नान के लिए कुंड में उतरे तो पानी भागने लगा। वह एक कदम आगे बढ़ते तो पानी दो कदम पीछे भाग जाता। इसके बाद उन्होंने पानी गिलास में पानी लिया तो वो भी सूख गया।इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वाल्मीकि जी से आग्रह किया कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें। उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने उनसे कहा महाराज उपाय करें नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां भगवान शंकर और विष्णु जी की तपस्या करने को कहा। आखिर में शंकर उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और यहां आए और पिशाच ब्राम्हण से पूछा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे और उनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। साथ ही कुंड के महत्व से एक घटना और जुड़ी हुई है। बताते है कि शंकर जी के बाद गणेश जी यहां एक ज्ञानदस नामक प्रेत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए लेकर आए थे। वह बताते है कि ज्ञानदस को मुक्ति नहीं मिल रही थी। जिसके बाद उन्होंने भगवान गणेश कार्तिकेय जी से मुक्ति के लिए आग्रह किया। तो उन्होंने ज्ञानदस से कहा कि काशी में तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन जब ज्ञानदस काशी पहुंचे तो मां गंगा से उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। आखिर में मां गंगा से प्रार्थना करने के बाद कहा कि उत्तर दिशा में स्थित पिशाच मोचन कुंड पर जाओं वहां तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।तब से प्रेत आत्माओं की मुक्ति, पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पितृ पक्ष में लोग आते है। साथ ही मान्यता है कि पितृ पक्ष में यहा प्रेतों का मेला लगता है। तीर्थ पुरोहित बताते है कि यहां पितृरों, प्रेतों, आकाल मौत से मोक्ष व जो प्रेत परिवार की सुख शांति में बाधक बने हुए उनकी मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराऐ जाते हैं।
त्रिपिंडी श्राद्ध पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का पिंडदान हैं. इस पूजन में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है. मान्यता है कि पूर्वज की असंतुष्ट आत्मा आने वाली पीढ़ियों के सुख में बाधा डालती है. ऐसे में इन आत्माओं को शांत करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है.। “गरुण पुराण के काशीखंड में वर्णित है कि पवित्र गंगा नदी के धरती आगमन से पहले ही पिशाच मोचन कुंड का अस्तित्व था. कुंड के पास पीपल का एक पुराना वृक्ष है और इसी पर भटकती आत्माओं को बैठाया जाता है. उनका ऋण उतारने के लिए वृक्ष पर सिक्का भी बांधा जाता है. इस कर्म से पितरों के सभी उधार उतर जाते हैं और वे बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं. पिशाचमोचन कुंड का पीपल पेड़ मान्यता का साक्षी है। पेड़ में ठोंके गए असंख्य सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्मा का ठिकाना है। 
मान्यता है कि किसी व्यक्ति की अकाल या असामयिक मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है. ऐसे में उन आत्माओं को मोक्ष पिशाच मोचन कुंड दिलाता है. कुंड का नामकरण के पीछे भी कथा है. पिशाच मोचन कुंड का नाम पिशाच नाम के व्यक्ति से पड़ा था, जिसने कई पाप किए थे. हालांकि, इसी जगह पर उसे मोक्ष मिला था. जिनके घर में अकाल मृत्यु होती है, उनके परिजन यहां पर विशेष पूजन, तर्पण करते हैं.। इस कुंड का वर्णन न केवल गरुड़ पुराण बल्कि स्कंद पुराण समेत कई शास्त्रों में मिलता है. यह स्थान सदियों से पितृ-स्मरण, त्रिपिंडी श्राद्ध तथा आत्मिक शांति और मनः चेतना से जुड़ी लोक-आस्थाओं का जीवंत केंद्र रहा है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और स्मृति के बीच संबंधों को समझने का एक अवसर भी है।
घर-परिवार के बुजुर्गों और पुरोहितों की परंपरागत मान्यता के अनुसार यह अनुष्ठान उन जन्मे, पूर्वजन्मे अथवा अजन्मे जीवनों की स्मृति और शांति के लिए किया जाता है, जिनकी उपस्थिति भले ही हमारे जीवन में प्रत्यक्ष न रही हो, लेकिन जिनसे जुड़ी कोई अधूरी कड़ी पीढ़ियों के भीतर कहीं न कहीं गहरे दुख का कारण बनी रह जाती है।
मैं नहीं जानता कि जीवन की हर कठिनाई का संबंध अदृश्य कारणों से होता है या नहीं। न ही मैं हर बात को भय, दोष या चमत्कार के चश्मे से देखता हूँ। लेकिन इतना अवश्य मानता हूँ कि मनुष्य केवल स्वयं कर्ता नहीं होता। वह अपने साथ स्मृतियों, संस्कारों, रिश्तों और अनेक अनकहे इतिहासों को भी साथ लेकर चलता है। कभी-कभी उन अनदेखे संबंधों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना भी एक आध्यात्मिक कर्म बन जाता है। शायद हमारे पूर्वजों ने त्रिपिंडी जैसे श्राद्धों के माध्यम से इसी आध्यात्मिक पक्ष को सहज करने के लिए शुरुआत किया हो..! हमारे लोक और धर्म में पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद के जीवन पर बहुत कुछ लिखा गया है। हमारे पुराणों और उपनिषद् सहित जितने भी आध्यात्मिक ग्रन्थों के टीका और भाष्य मिलते है उतना किसी धर्म में नहीं लिखा गया है..इस परा विज्ञान पर आपके तर्क और संशय के लिए बहुत जगह है..आप पढ़िए और डूब जाइए एक ऐसे संसार में जहाँ अपूर्णता और अतृप्ता के सारे सूत्र आपको पूर्ण तो नहीं करेंगे पर चेतना से जरूर भर देंगे.यह पिशाचमोचन भी आपके वैसे ही अनसुलझे तर्कों को नई दृष्टि देता है जैसा  यहाँ आकर...यहां के शांत सरोवर के किनारे जब आप बैठ कर महसूस किया जा सकता है। तो यही विचार बार-बार मन में आता है वहाँ कोई भय का वातावरण नहीं, न ही ऐसा कुछ जिसमें रहस्य हो ..वहाँ सैकड़ों परिवार जो अपने दिवंगत प्रियजनों की स्मृतियों के साथ उन पिण्डों में अपने पूर्वजों का आह्वान करते हुए.. यहां मंत्रों की गूंज के साथ साथ वहां पूर्वजों की स्मृतियां भी गूंज रही थी, जल में चमकती धूप के बीच जो तरंग उठ रहे थे शायद उसमें हमारे पूर्वजों के आह्वान के बाद का विदा गीत की तरंगें थी जिसपर उन लोगों के चेहरे उभर और मिट रहे थे जो अपने भीतर किसी अधूरे भाव को शांत करने आए थे।
पिशाचमोचन के बारे में प्रचलित मान्यताएँ प्रेतत्व, पितृदोष और आत्माओं की शांति जैसे विषयों से जुड़ी हैं, लेकिन वहाँ बैठकर  इसका एक दूसरा अर्थ भी दिखाई दिया। मुझे लगा कि शायद इस तीर्थ का वास्तविक महत्व किसी अदृश्य भय में नहीं, बल्कि स्मरण की उस संस्कृति में है जिसे भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों से सहेज कर रखा है। आधुनिक जीवन हमें वर्तमान में जीना सिखाता है, लेकिन भारतीय परंपरा हमें यह भी याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अपने पूर्वजों की निरंतरता हैं, अपने परिवार की कहानी का एक अध्याय हैं। संभवतः त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे संस्कार इसी गहरे बोध को अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं।
काशी की महिमा शायद इसी में है कि वह जीवन और मृत्यु को दो अलग-अलग छोरों की तरह नहीं देखती। यहाँ मृत्यु भी स्मरण का विषय है, करुणा का विषय है और अंततः शांति का विषय है। पिशाचमोचन इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की यात्रा केवल देह तक सीमित नहीं है। वह अपने पूर्वजों, अपने परिवार और उन असंख्य स्मृतियों से भी जुड़ा है जिन्होंने उसे गढ़ा है।
काशी, 25सितम्बर2026,शुक्रवार
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शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

व्योमवार्ता/ पितृ पक्ष वही जो हमें बुजुर्गों और अपनों के बीच ले जाये.....


#समाज_जिसमें_हम_रहते_हैं......

वह अमेरिका के एक बड़े अस्पताल में कामयाब चिकित्सक थे। अपने जन्मदिन पर उन्हें भारत से पिता के पत्र का इंतजार रहता था। उस साल उनका पत्र जन्मदिन के एक सप्ताह बाद मिला स्नेह से सराबोर पत्र में आदेश भी था,"अब तुम्हें भारत लौट आना चाहिए।आखिर अपने देश और समाज के प्रति भी तुम्हारे कुछ कर्तव्य हैं।' पुत्र ने स्वदेश लौटने का फैसला ले लिया। विदाई- पार्टी में जब इतनी आरामदायक जिंदगी छोड़कर भारत जाने से रोकने की चेष्टा हुई, तो डॉक्टर पुत्र का जवाब था, 'माता-पिता का आदेश क्या होता है, इसको महसूस करने के लिए भारत में पैदा होना होगा।' यह वाक्य डॉ प्रताप चंद्र रेड्डी का है, जो आज अपोलो अस्पताल समूह के मालिक हैं।
जो बात पहले जितनी आसान रही, वह आज उतनी ही मुश्किल होती जा रही है। जीते जी अपने मां-बाप की सेवा करना, घर के बुजुर्गों व पूर्वजों के प्रति सदैव आदर भाव रखना अब आसान नहीं रह गया। ऐसे दौर मे पितृपक्ष हमें एक संदेश देता है। हमें कुछ याद दिलाता है। लोग इन दिनों एक अलग ही भाव में रहते हैं और श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण करते हैं,ताक  अपने पूर्वजों से जुड़े रहें। मगर पितृ पक्ष हमसे कुछ सवाल भी करता आज के नौजवा है- क्या हम इसे एक घिसी-पिटी परंपरा मानकर भूल जाना चाहिये और  अपनी सामान्य  जिंदगी जीते रहें।क्या हमें यह नही सोचनाकि चाहिए कि पितृ पक्ष की कल्पना क्यों की गई थी ? क्या हम इससे सीखकर समाज को बेहतर बना सकते हैं? क्या हमारे अंदर भूखों- 'गरीबों का पेट भरने की करुणा इस पक्ष में आ सकती है? क्या हम दरिद्र नारायण के दर्द को समझ सकने की स्थिति में हैं? क्या हमारे अंदर ऐसा इंसान बचा है, जो किसी के एहसान नहीं भूलता ? हमारा देश बुजुगों व पूर्वजों के प्रति कितना संवेदनशील है?
अगर हम 2011 की जनगणना के आंकड़े देखें, तो देश में बुजुगों की आबादी दस करोड़ से भी अधिक हो चुकी है। यह संख्या करीब 13 करोड़, 80 लाख हो गई है, जिसके वर्ष 2031 तक 19.4 करोड़ हो जाने की संभावना है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह भी कम ध्यान देने योग्य नहीं है कि केवल 25 फीसदी कंपनियों के पास ही वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा सुविधाए हैं। ऐसे में, ज्यादातर ग्राहक अपने पर आश्रित माता-पिता और सास-ससुर के लिए स्वास्थ्य बीमा लेने में सक्षम नहीं हैं। एक पक्ष यह भी है कि माता-पिता का बीमा खरीदने
में सक्षम होने के बावजूद कई लोग मुंह मोड़ लेते हैं। भारत सरकार ने 'वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स ऐंड सीनियर सिटीजन्स ऐक्ट 2007' (माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों की देखरेख एवं कल्याण अधिनियम 2007) लागू किया है। बुजुर्ग या वरिष्ठ नागरिक आत्मसम्मान व शांति से जीवन-यापन कर सकें, इसी के लिए यह कानून बनाया गया है। वहीं संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) द्वारा जारी इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 ने भारत में बुजुर्ग जनसंख्या के बढ़ने और देश पर इसके प्रभावों कीपुष्टि भी की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष से अधिक) की संख्या सन 2022 में 10.5प्रतिशत थी तो 2050 तक यह 20.8 प्रतिशत हो जाएगी। देश मे 15करोड़ के बजाय 35 करोड़ बुजुर्ग हो जायेगें। ऐसे मे,पितृपक्ष के समय ही सही, आज के युवाओं को अपने भविष्य के बारे में जरूर सोचना चाहिए। भारतीयों को यह देखना चाहिए कि दूसरे देश अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं? अमेरिका में 'फैमिली मेडिकल केयर ऐक्ट' के मुताबिक, वरिष्ठ नागरिकों की सेवा के लिए सात दिन तक पेड लीव की सुविधा है। वहीं जापान की तो 40 प्रतिशत जनसंख्या 60 साल से ऊपर की है। वहां सरकार ने 40 साल से ऊपर के सभी लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा को जरूरी कर दिया है। कमाल की बात यह है कि माता-पिता की अच्छी सेवा करने वालों को जल्दी पदोन्नत करने का भी सरकारी प्रावधान है। फ्रांस में हरेक शख्स को अपने एक दिन का वेतन बुजुगों के कल्याण-कोष में देना पड़ता है।
पितृ पक्ष पर हमें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की वह कविता याद आ रही है, 'सूरज डूब रहा है। चारों तरफ अंधेरा छाने लगा है। एक वृद्ध चिंतित है कि अब भला कौन उन्हें संभालेगा। तभी एक युवा हाथ में एक छोटा- सा दिया लिए उठते हुए कहता है, मैं!'
साभार #नंदितेश_निलय
हिन्दुस्तान,6अक्टूबर2023,शुक्रवार
#व्योमवार्ता http;//chitravansh.blogspot.com

शनिवार, 23 जुलाई 2016

ट्रौमा सेण्टर के पार्किंग ठेकेदार खुद मे ही माफिया है।: व्योमेश चित्रवंश की डायरी ,19 जुलाई 2016

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल मे ही अपने सभी चिकित्सालयो मेे पार्किग सुविधा निशुल्क कर दिया उसके लिये बेहद जरूरी व वाजिबकारण बताते हुये यह कहा गया कि अस्पताल मे मरीजो की सुविधा के लिये सुविधाओं को निशुल्क अथवा बेहद मामूली शुल्क पर किया जाना चाहिये।
      वहीं दूसरी तरफ बीएचयू ट्रौमा सेण्टर मे अगर आप सीधे व सरल स्वभाव के है तो पार्किग वाला आपसे मनमाने तौर पर पार्किंग शुल्क वसूल करेगा और काऱण पूछने पर आप के साथ जबरदस्ती व गुंडई करने को बिलकुल स्वतंत्र है। उस पर से बड़ा तुर्रा यह कि वह माफिया है अगर आपको गाड़ी नही खड़ी करनी है तो मत खड़ी करिये। पार्किंग से मिलने वाले रसीद मे व्यौरा कुछ और ही दर्ज है।
पार्किंग स्थल की हालत यह है कि पूरे पार्किंग एरिया मे कीचड़ भरा है। जरा सा पानी बरसने पर वहॉ घुटने भर पानी भर जाता है। गलती से आपकी दूपहिया रह गयी तो फिर स्टार्ट  होने के लिये भगवान मालिक है।
यदि आपने अपनी गाड़ी भूलवश नो पार्किंग एरिया मे खड़ा कर दिया है तो हास्पिटल मैनेजमेण्ट सिस्टम बार बार एनाउंसमेण्ट कर आपको  इस गलती के लिये याद दिलाता रहेगा जब तक आप उसे पार्क करने जायेगे तब तक पार्किग वाले आपकी गाड़ी पंचर भी कर सकते है। और पूछने पर वही जबाब कि वे माफिया है कुछ भी कर सकते हैं।
जब हमने पार्किंग के कर्मचारियो की शिकायत ट्रौमा सेण्टर के सिक्यूरिटी सिस्टम से किया तो उन बेचारो ने अपनी बेबसी बताते हुये कहा कि साहब वे  माफिया लोग हैं वीसी व ओएसडी के खासमखास है हम कॉन्टैक्ट ड्यूटी वाले उन्है कैसे रोक सकते है?
कल रात को ११,३० बजे पार्क की हुई गाड़ी को आज सुबह ६ बजे निकालने पर पार्किंग कर्मचारी द्वारा ३०/- मॉगने पर फिर किचकिच हुई मैने जब शिफ्ट वाईज चार्ज पूछा तो कर्मचारी ने सरलता से गणित समझाया कि रोज 2000/- रूपये वीसी को व3000/- रूपये ओएसडी को देने के बाद हमारे भी बालबच्चो को पालने  के लिये खर्च निकालना पड़ता है।
पता नही कर्मचारी कितना सच बोल रहा था पर अगर इसमे रत्ती भर भी सच्चाई है तो यह पूज्य महामना के परित्राणाम दुखतप्तम्  जैसे पवित्र विचारों की सरेआम हत्या है जिसके प्रतिे बीएचयू के पूर्व छात्र रहे हम जैसे लोग प्रतिकार करते हैं।

अपनों के अव्यवस्था से जूझता ट्रौमा सेण्टर : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 17 जुलाई 2016

तीन दिन से ट्रौमा सेण्टर बीएचयू मे हूँ और  एक नेक नीयत से शुरू की गई व्यवस्था को उसके अपनो द्वारा जानबूझ कर ध्वस्त होते हुये देख रहा हूँ। बनारस के लिये एक अनुपम भेंट को ध्वस्त करने वाले कोई और नही यही के कर्मचारीगण हैं। ज्यादातर कॉन्ट्रैक्ट सेलरी पर रखे गये कर्मचारियों का आपस मे कोई तालमेल नही है, ऐसे मे उनसे मरीजो की तीमारदारी की उम्मीद करना बेमानी है।
स्थिति यह है कि अगर आपने एक स्टाफ नर्स को कुछ करने को बोला है तो दूसरी स्टाफनर्स आपके ऊपर ध्यान नही ही दे सकती भले ही आप कितने भी पीड़ा या परेशानी मे क्यों न हो?
      वरिष्ठ चिकित्सको को इन तीन दिनो मे हमने वार्ड का विजिट करते हुये शायद ही देखा, पर उनके अंडर मे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रेजिडेण्ट्स डाक्टर्स जरूर मौजूद मिलते दिखते थे। पर उनका आपसी व्यवहार  इतना तल्ख व अमानवीय होता है जो सामान्य स्तर पर भी उचित नही कहा जा सकता ।  हम लोगो के वार्ड मे तमिलनाडु का एक लड़का डाक्टर है, फर्स्ट ईयर रेजिडेण्ट, नाम देना उचित नही होगा, जब से हम आये है उस बंदे क लगातार काम पर देखा है २४ घंटे रात दिन। बेहद सुलझा और मेहनती। हम मजाक मे उससे पूछते भी है कि डाक्टर साहब आप सोते कब हो, बेचारा मुस्करा के जबाब देता है, सोते कहॉ है सर जी, दोपहर मे दो घंटे रेस्ट करते है तो पूरे वार्ड मे शोर हो जाता है। ऐसे बेचारे जूनियर डाक्टर को उसके सीनियर्स इस बुरी तरह लताड़ लगा के मॉ बहन की गाली देते है कि हम लोगो को सुन कर नागवार लगता है। मजा यह है कि गलती किसी की भी हो , डॉट उसी बेचारे जूनियर रेजिडेण्ट को सुननी है। चाहे वह नर्स ने किया हो चाहे मरीज ने या खुद सीनियर ने पर डॉट जूनियर को इसलिये पड़नी है कि उसने देखा क्योंं नही अथवा बताया क्यो नही।
एक बार तो उस जूनियर रेज्डेण्ट को अनायास डॉट व गाली गलौज सुनते हुये देख मुझसे नही रहा गया मैने उस जूनियर से इतना सब कुछ सहने का कारण पूछा तो उसने बेहद मासूमियत से जबाब देते हुये कहा कि छोड़िये न सर। कौन सा ये लोग जिन्दगी भर हमारे सीनियर बने रहेगें?  पर मै स्वयं एक व्यवसायगत पेशे का हिस्सा होकर भी यह समझ पाने मे असमर्थ हूँ कि अपने जूनियर्स को सिखाने का यह कौन सा तरीका है जहॉ उसे व्यक्तिगत प्रताड़ना व सार्वजनिक बेईज्जती सहते हुये इस तरह की व्यवसायिक जानतारियॉ सिखनी पड़ती है?
बहरहाल बात अव्यवस्था की हो रही थी । कहने को तो ट्रौमा सेण्टर व सुपर स्पेशियल्टी हास्पिटल  बना दिया गया पर दोनो के रखरखाव की व्यवस्थाये परले सिरे से ही नदारद है। न तो सेण्टर मे साफ सफाई की पूरी व्यवस्था है न ही बिजली पानी की। एक फ्लोर पर लगभग ६० मरीजो के बीच एक वाटर कूलर। तीन सामान्य शौचालय दो बेसिन वे भी साफ सफाई से कोसो दूर। कहने को तो औपचारिकताओं के नाम पर कई बार झाडू पोछा किया जाता है पर वह केवल गैलरी के फर्श पर ही नजर आता है।

बदहाल बीएचयू ट्रौमा सेण्टर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी

बीएचयू ट्रौमा सेण्टर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 18 सितंबर 2015 को किया था यह वही समय था जब मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत जोर शोर से हो चुकी थी। देश मे स्वच्छ भारत का असर दिखने भी लगा है पर मोदी जी द्वारा उद्घाटित ट्रौमा सेण्टर की सफाई व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ज्यादातर वाटर वेसिन गंदगी से पटे और जाम पड़े हैं। ज्यादातर लैट्रीन के कमोड्स व सीट बदरंग व गंदे है। वाटर कूलर पर धूल व गंदगी का अंबार लगा है।कुछ सर्विस मास्टर क्लीनर की वर्दी वाले सफाईकर्मी साफसफाई करते नजर आते रहते है पर उनके कामो की देख रेख करने वाला कोई नही। स्थिति यह है कि चौथे मंजिल पर आर्थोपेडिक वार्ड में वेसिन की टोटियॉ रस्सी से बॉधी गई है और बाथरूम की हालत यह है कि आप उसका प्रयोग करना तो दूर वहॉ खड़े तक नही हो सकते। हमने इस संबन्ध मे जब आन ड्यूटी नर्सेज से बात किया तो उनका सीधा जबाब था कि यह देखना उनकी ड्यूटी मे नही हैं। मौजूदा डाक्टर्स तो ज्यादातर प्रथम वर्ष के रेजिडेण्ट है जो स्वयं अपने सीनियर्स के व्यवहार व थोपे गये कार्यो से त्रस्त है वे बेचारे इस संबन्ध मे क्या बता पायेगें।
    हमने इस संबन्ध मे ट्रौमा सेण्टर के विशेष कार्याधिकारी व उप चिकित्सा अधीक्षक से मिल कर शिकायत करने की कोशिश की पर वे दोनो अधिकारी हमे अपने कमरे मे नही मिले।
   पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के साथ साथ छत्तीसगढ व झारखण्ड के लिये एम्स जैसा एकमात्र जीवनदायी माने जाने वाले बीएचयू के अत्याधुनिक ट्रौमासेण्टर की बदहाली को बढ़ाने मे कुछ निहित शक्तियॉ अपने स्वार्थवश बदनाम व ध्वस्त करने मे लगी है क्या उनके मायाजाल से आमजन के बनाये ट्रौमासेण्टर मुक्त हो सकेगा?

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

बैंक का एक कटु अनुभव : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 22अप्रैल 2016, शुक्रवार

22 अप्रैल 2016, शुक्रवार
बैंक का एक कटु अनुभव
          आज एक परिचित के साथ काशी गोमती संयुक्त ग्रामीण बैंक मीरापुर बसहीं शाखा, वाराणसी मे जाना हुआ। परिचित को कुछ पैसा निकालना था ताकि वे अपने बच्चो की फीस समय से जमा कर सकें। मुश्किल यह था कि नये सरकारी नियमो के अनुसार इस सप्ताह  में केवल दो दिन बैंक खुले थे। पहले महावीर जयन्ती फिर हजरल अली जयन्ती और चौथा शनिवार। बैंक मे भीड़ ठसाठस भरी थी और काउंटर पर बैठी दो महिला कर्मचारियो मे से एक तो हर बात पर दूसरी वाली मैडम से इंस्ट्रक्शन ले कर काम कर रही थी, शायद नई रही हो। पर दूसरी मैडम ग्राहको को भी लगातार तेज तेज आवाज मे इंस्ट्रक्शन ही दे रही थी। उनके लहजे मे व्यवसायिकता के बजाय डिक्टेटरशिप ज्यादा थी। बेचारी एक अधेड़ महिला ग्राहक ने अपने बारी की स्थिति जानने की कोशिस क्या किया, मैडम जी आपे से बाहर । अब वो बेचारी अधेड़ महिला यह जान ही नही पा रही थी कि उन्होने ऐसी क्या गलती कर दिया जिसके लिये उनकी पोती की उम्र की मैडम जी उन पर भड़क रही है? मुझसे आदतन नही रहा गया तो मैने पूछ ही लिया कि आखिर इस बात को सम्मानित व सांस्कारिक लहजे मे भी  कहा जा सकता है और यह शाखा अगर हैवी टर्नओवर की बैक ब्रॉच मानी जाती है तो उसमे कही हम ग्राहको का योगदान है। आप का होना हमारी मजबूरी नही है बल्कि ध्यान रखिये कि हमारा यहॉ न होना आपके लिये समस्या बन सकती है। मैडम जी ने पहले एक्सरे वाले निगाहो से हमे घूरा फिर पूछा आप बताइये आप क्यो खड़े है हम आपका काम कर देते है?
         मेरे यह बताने पर कि हम तो इस शाखा के ग्राहक ही नही बस परिचित के साथ आ गये है, मैडम जी की निगाहे मुझ पर उपेक्षित जैसे हो गयी। मुँह से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनकी नजरो मे हमे खुद के प्रति वितृष्णा साफ नजर आयी, "जाने कहॉ कहॉ से आ जाते है" वाली। और वे अपनी सीट छोड़ कर कैश केबिन मे बैठी अपनी सहकर्मी के पास जा बैठी। विलंब होने के कारण मेरे परिचित ने कहा कि चलिये अब शाम को देखेगें। कुछ जरूरी काम निपटा के हम लोग वापस ३.२५ पर वापस आये तो बैंक के शटर मे ताला लगा था, खटखटाने पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने अंदर वाले शीसे के दरवाजे से हमे झॉका और बताया कि अब सोमवार को आइये, बैंक बंद हो चुका है। हमने दरियाफ्त किया कि अभी तो ३.२५ हो रहे है । कामकाज तो ३.३० तक लिखा हुआ है। चतुर्थ श्रेणी महोदय ने बेहद रूखेपन से जबाब दिया कि हम बैंक अपनी घड़ी से खोलते बंद करते है, आपकी घड़ी से नही। हमारी घड़ी मे साढ़े तीन बज गया है।
       अब हमारे पास कोई उत्तर ही नही था उन माननीय के जबाब का? परिचित बोले चलिये चला जाय, यहॉ ऐसी ही व्यवस्था चलती रहती है। मुझे किसी बैंक मे ही देखे महात्मा गॉधी के प्रचार वाली होर्डिंग याद आ रही थी कि ग्रहक हमारे लिये भगवान है ,अब अगर ऐसा व्यवहार बैंक कर्मियों का ग्राहक के प्रति है  तो ये क्या कहा जायेगा।
सारे प्रकरण को दूसरे नजरिये से भी देखते है। मीरापुर बसहीं शाखा अरेक्षाकृत दूसरी शाखाओ से ज्यादा भीड़भाड़ वाली शाखा है जहॉ अधिकतर कर्मचारी महिला है, छुट्टीयॉ के बाद बैंक खुलने से ग्राहको का थोड़ा दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। आजकल के गर्मी के हालात मे चिढचिढाहट भी स्वाभाविक है पर क्या कुर्सी पर बैठ जाने के बाद हमारे अंदर की इतनी आदमियत भी नही रहनी चाहिये कि सामने खड़े अपने सम्मानित ग्राहक के उम्र व मजबूरी का भी लिहाज न करें? यह एक सोचनीय सवाल है।
आजकल बैंक वाले कहते है कि आप एटीएम कार्ड ले लो। पर क्या सभी  समस्यायो का जबाब सिर्फ एटीएम कार्ड है । मेरी व्यक्तिगत जानकारी मे अब तक जितने भी धोखाधड़ी की घटनाये एटीएम कार्ड के द्वारा हुई उनमे आज तक किसी भी जालसाज या अपराधी को नही पकड़ा जा सका। और तो और बैंक भी इस जालसाजी को पकड़ने मे कोई सकारात्मक रूख नही दिखाता। औरो की बात जाने दें मेरे पास कम से कम तीन चार बार फोन के द्वारा मेरा एटीएम पिन जानने के लिये फोन आये, हर बार मैने अपने बैंक को, पुलिस को और फेसबुक के पोस्ट के माध्यम से लोगो को उक्त फोन नंबर की व सारी घटना की जानकारी दिया पर न तो कभी बैंक ने न ही पुलिस ने उन नंबरो के छानबीन का प्रयास व कार्यवाही किया।
  जहॉ तक छुट्टीयों की हालत है बैंक अब उत्तर प्रदेश सरकार के परिषदीय विद्यालय जैसे हो गये हैं, हर छोटी छोटी बात पर छुट्टीयॉ । हर दूसरे व चौथे शनिवार की बंदी का औचित्य अभी तक हम नही समझ सके। अगर यही छुट्टीयॉ दूसरे शनिवार के बजाय पहले या तीसरे को होती तो दूसरे शनिवार को बंदी की सुविधा प्राप्त करने वाले ढेरो राजकीय कर्मचारी, अधिवक्ता एव अन्य लोग बैंक मे अपने कामकाज को उस दिन कर लेते लिहाजा तीसरे सोमवार को बैंक पर पड़ने वाला दबाव निश्चित ही थोड़ी कम होता।
पर हमारे देश मे नियमो को लागू करने से पूर्व कभी भी उनका व्यवहारिक औचित्य समझने का प्रयास ही नही किया जाता। परिणाम भीड़ व अव्यवस्था सिर्फ बैंक ही नही और जगह भी दिखती है। इसीलिये यहॉ दादी मॉ की उम्र की महिला अपने तीसरी पीढ़ी के उम्र वाली कर्मचारी से अनायास की डॉट खाती है और मुस्तंडा जैसा नवयुवक अपने संबंधो का अनुचित लाभ उठाते हुये काउंटर के अंदर बैठ अपना काम आसानी से करा लेता है व दूसरो के काम को प्रभावित करता है।