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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बनारस / काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....... व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

काशी का मोक्षकुण्ड : विमलतीर्थ पिशाच मोचन....

                                                                  *व्योमेश चित्रवंश
                    
             मोक्ष नगरी काशी के बारे में कहा जाता है कि यहां देह त्यागने वाली आत्मा को मोक्ष मिल जाता है। जिसकी मृत्यु काशी के बाहर होती है उसका महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने से भी उसे मुक्ति मिल जाती है। काशी में एक तीर्थ ऐसा भी है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां प्रेत आत्माओं को मुक्ति मिलती है। यह तीर्थ पिशाच मोचन कुंड के नाम से विख्यात है। कुंड के महत्व के बारे में यहां के पुरोहितों का कहना है कि यह कुंड मां गंगा के पृथ्वी पर आने से पहले का है। और पितृ पक्ष में यहां प्रतों का मेला लगता है। साथ ही यहां पितरों के साथ ही प्रेत आत्माओं को भी मुक्ति मिलती है। इसके लिए यहां त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराए जाते है।
मृत्यु को भी उत्सव मानने वाले  मोक्ष की नगरी काशी का पिशाच मोचन कुंड  रहस्यमय पौराणिक स्थल कहा जाता है. यह कोई साधारण जलकुंड नहीं, बल्कि आत्माओं के उद्धार का केंद्र है. कहा जाता है कि जो आत्माएं अकाल मृत्यु का शिकार होती है या जो अधूरी इच्छाओं के साथ इस संसार से जाती हैं, वे भटकती रहती हैं. गीता में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा अजर है, अमर है. “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि...” लेकिन अकाल मृत्यु होने वाले इंसान की आत्मा सालों भटकती रहती है. बाबा श्री काशी विश्वनाथ के त्रिशूल पर टिकी नगरी में भटकती आत्मा को भी यहां मोक्ष मिल जाता है. गरुण पुराण के काशी खंड में भी  पिशाच मोचन कुंड का उल्लेख मिलता है, जहां पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है. मान्यता है कि यहां पर आत्माओं का उधार भी चुकाया जाता है
काशी खंड के अनुसार पिशाच कुंड को मूल रूप से “विमल तीर्थ व विमलोदक तीर्थ” के नाम से जाना जाता है। कपर्दि नामक एक शिव गण ने एक जल निकाय- “विमल तीर्थ” बनाया और इस स्थान पर शिव की पूजा की, जिससे कपर्दीश्वर महादेव अस्तित्व में आए। समय के साथ, यह स्थान तपस्या के लिए एक स्थान के रूप में प्रसिद्ध हो गया। भगवान कपर्दीश्वर महादेव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर, खोपड़ियों से सुसज्जित द्वार और ब्रह्म को समर्पित विभिन्न छोटे मंदिरों के साथ एक जलाशय का शांत वातावरण, आपको अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना के समय में स्वागत करता है, जो निषिद्ध अवस्था से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि वे काशी के हृदय में प्रवेश करके मोक्ष प्राप्त कर सके।कथा है कि एक बार एक पाशुपत ऋषि विमल तीर्थ के तट पर ध्यान कर रहे थे, अचानक एक पिशाच जो एक ब्राह्मण था, और अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण पिशाच (भूत) योनि को प्राप्त कर गया। पहले तो उसने ऋषि वाल्मीकि को डराने की कोशिश की लेकिन बहुत प्रयास के बाद, उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे मुक्ति मांगी। ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा। इस प्रकार पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली तब से पिशाच मोचन तीर्थ बिहार के गया के अतिरिक्त पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए एक प्रसिद्ध स्थान बन गया। हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पितृलोक में निवास करती है – स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का क्षेत्र, जो यम "मृत्यु के देवता" द्वारा शासित है। पूर्वजों की तीन पीढ़ियाँ पितृलोक में रहती हैं और पितृ पक्ष (भाद्रपद का चंद्र महीना) के दौरान पृथ्वी का दौरा करती हैं ताकि उन्हें अपने वंश से जल, तर्पण मिल सके। अगर उन्हें यह मिल जाता है, तो उन्हें मुक्ति मिल जाती है लेकिन अगर उन्हें तर्पण नहीं मिलता है, तो उन्हें पुनर्जन्म की सजा मिलती है। जब अगली पीढ़ी का व्यक्ति मर जाता है, तो पहली पीढ़ी स्वर्ग चली जाती है और कर्म और उपरोक्त कारण के आधार पर मोक्ष/पुनर्जन्म प्राप्त करती है। इसीलिए सह्रद कर्मकांड पूर्वजों की केवल तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है। यदि पितरों की परेशान आत्माएं पितृलोक में खुश नहीं हैं तो उनका प्रभाव पृथ्वी पर उनके प्रियजनों पर पड़ता है। पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अनुष्ठानों की एक श्रृंखला में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा शामिल है, जिन्हें क्रमशः सफेद, पीले और काले कपड़े के मिट्टी के पानी के बर्तन- कलश द्वारा दर्शाया जाता है ताकि वे पूर्वजों को मुक्ति दे सकें। पितृपक्ष के महीने में पिशाच कुंड इन अनुष्ठानों के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है और दुनिया भर से लोग अपने प्रियजनों को मुक्ति दिलाने के लिए इस स्थान पर आते हैं। कुंड के आस-पास का पूरा इलाका सफेद कपड़े पहने और मुंडा सिर वाले लोगों की भारी भीड़ को देखता है जो ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गया के बाद पिशाच मोचन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ ऐसी पूजा की जा सकती है जो पूर्वजों के लिए मोक्ष का द्वार खोलती है। गरुण पुराण में भी इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख है। इस जगह से जुड़ी किंवदंती के कारण यह जगह बहुत ही अजीबोगरीब माहौल देती है। इस जगह पर एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अनगिनत कीलें लगी हुई हैं, कुछ पर सिक्के लगे हुए हैं और कई लोगों की तस्वीरें हैं, जिनकी शायद असामयिक मृत्यु हुई हो। एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि यह किसी परेशान आत्मा के लिए अंतिम उपाय है, हो सकता है कि यह अंधविश्वास हो या वास्तविकता, यह किसी की आस्था पर निर्भर करता है। मुख्य मंदिर परिसर एक कुंड के किनारे स्थित है, आप कपरदीश्वर महादेव के साथ-साथ कपरदी विनायक (मंदिर पंचक्रोशी यात्रा के अंतर्गत भी आता है) के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर के ठीक बगल में भगवान हनुमान और विष्णु के साथ ब्रह्म की एक छोटी सी जटिल मूर्ति की पूजा की जाती है। पास ही वाल्मीकि टीला पर पिशाचेश्वर महादेव और ऋषि वाल्मीकि का मंदिर है। कुंड के आसपास के क्षेत्र में पंडा/ब्राह्मण द्वारा संचालित कई छोटे मंदिर हैं, जिनके अपने-अपने ईष्टदेव हैं। पास में एक अखाड़ा है, यह एक शांतिपूर्ण परिसर है जिसमें छोटे मंदिर और चित्रकूट रामलीला के लिए समर्पित स्थान हैं, जिसे मेघा भगत “गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य” द्वारा शुरू किया गया था।
पिशाच मोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि यह रामा अवतार के पहले की बात है। जब पृथ्वी पर गंगा अवतरित नहीं हुई थी उससे पहले का यह सरोवर है। यह विमलोदत्त तीर्थ है। यहां पूरे भारत वर्ष से लोग आते है। जो भी प्रेत योनि से पीड़ित है उसे यहां मुक्ति मिल जाती है। वह कुंड के महत्व के बारे में बताते है कि रामा अवतार के समय पिशाच नाम का एक ब्राम्हण था। जो दान नहीं देता था। वह सिर्फ लोगों से दान लिया करता था। और इतना दान ले लिया कि उसकी आत्मा को शांति नहीं मिल रही थी। एकबार जब वाल्मीकि जी कुंड पर पूजा कर रहे थे तो पिशाच ब्राह्मण यहां पहुंचे और उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि महराज मेरी आत्मा को शांति नहीं मिल रही। मेरा भी कल्यण करें। जिसके बाद उन्होंने पिशाच ब्राम्हण को तालाब में नहाने के लिए बोला। पिचाश ब्राह्मण जैसे ही स्नान के लिए कुंड में उतरे तो पानी भागने लगा। वह एक कदम आगे बढ़ते तो पानी दो कदम पीछे भाग जाता। इसके बाद उन्होंने पानी गिलास में पानी लिया तो वो भी सूख गया।इसके बाद उन्होंने एक बार फिर वाल्मीकि जी से आग्रह किया कि महाराज हमारे कष्ट को दूर करें। उन्होंने कहा कि मैं ठीक नहीं कर पाऊंगा। इस पर पिशाच ब्राह्मण ने उनसे कहा महाराज उपाय करें नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। इसके बाद वाल्मिकी जी ने उन्हें यहां भगवान शंकर और विष्णु जी की तपस्या करने को कहा। आखिर में शंकर उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और यहां आए और पिशाच ब्राम्हण से पूछा कि क्या कष्ट है तो उन्होंने शिव जी को कष्ट बताया। शिव जी ने ब्राह्मण से पानी में उतरने को कहा। जब वो तालाब में उतरे और उनके शरीर पर तालाब का पानी पड़ा तो वो जलाशय हो गये। इसके बाद इन्होंने यहीं लोगों के मुक्ति के लिए उनसे आशिर्वाद मांगा और यही भोले शंकर के सामने विराजमान हो गए। साथ ही कुंड के महत्व से एक घटना और जुड़ी हुई है। बताते है कि शंकर जी के बाद गणेश जी यहां एक ज्ञानदस नामक प्रेत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए लेकर आए थे। वह बताते है कि ज्ञानदस को मुक्ति नहीं मिल रही थी। जिसके बाद उन्होंने भगवान गणेश कार्तिकेय जी से मुक्ति के लिए आग्रह किया। तो उन्होंने ज्ञानदस से कहा कि काशी में तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन जब ज्ञानदस काशी पहुंचे तो मां गंगा से उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। आखिर में मां गंगा से प्रार्थना करने के बाद कहा कि उत्तर दिशा में स्थित पिशाच मोचन कुंड पर जाओं वहां तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी।तब से प्रेत आत्माओं की मुक्ति, पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पितृ पक्ष में लोग आते है। साथ ही मान्यता है कि पितृ पक्ष में यहा प्रेतों का मेला लगता है। तीर्थ पुरोहित बताते है कि यहां पितृरों, प्रेतों, आकाल मौत से मोक्ष व जो प्रेत परिवार की सुख शांति में बाधक बने हुए उनकी मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण के अनुष्ठान कराऐ जाते हैं।
त्रिपिंडी श्राद्ध पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का पिंडदान हैं. इस पूजन में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है. मान्यता है कि पूर्वज की असंतुष्ट आत्मा आने वाली पीढ़ियों के सुख में बाधा डालती है. ऐसे में इन आत्माओं को शांत करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है.। “गरुण पुराण के काशीखंड में वर्णित है कि पवित्र गंगा नदी के धरती आगमन से पहले ही पिशाच मोचन कुंड का अस्तित्व था. कुंड के पास पीपल का एक पुराना वृक्ष है और इसी पर भटकती आत्माओं को बैठाया जाता है. उनका ऋण उतारने के लिए वृक्ष पर सिक्का भी बांधा जाता है. इस कर्म से पितरों के सभी उधार उतर जाते हैं और वे बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेते हैं. पिशाचमोचन कुंड का पीपल पेड़ मान्यता का साक्षी है। पेड़ में ठोंके गए असंख्य सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्मा का ठिकाना है। 
मान्यता है कि किसी व्यक्ति की अकाल या असामयिक मृत्यु हो जाती है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है. ऐसे में उन आत्माओं को मोक्ष पिशाच मोचन कुंड दिलाता है. कुंड का नामकरण के पीछे भी कथा है. पिशाच मोचन कुंड का नाम पिशाच नाम के व्यक्ति से पड़ा था, जिसने कई पाप किए थे. हालांकि, इसी जगह पर उसे मोक्ष मिला था. जिनके घर में अकाल मृत्यु होती है, उनके परिजन यहां पर विशेष पूजन, तर्पण करते हैं.। इस कुंड का वर्णन न केवल गरुड़ पुराण बल्कि स्कंद पुराण समेत कई शास्त्रों में मिलता है. यह स्थान सदियों से पितृ-स्मरण, त्रिपिंडी श्राद्ध तथा आत्मिक शांति और मनः चेतना से जुड़ी लोक-आस्थाओं का जीवंत केंद्र रहा है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और स्मृति के बीच संबंधों को समझने का एक अवसर भी है।
घर-परिवार के बुजुर्गों और पुरोहितों की परंपरागत मान्यता के अनुसार यह अनुष्ठान उन जन्मे, पूर्वजन्मे अथवा अजन्मे जीवनों की स्मृति और शांति के लिए किया जाता है, जिनकी उपस्थिति भले ही हमारे जीवन में प्रत्यक्ष न रही हो, लेकिन जिनसे जुड़ी कोई अधूरी कड़ी पीढ़ियों के भीतर कहीं न कहीं गहरे दुख का कारण बनी रह जाती है।
मैं नहीं जानता कि जीवन की हर कठिनाई का संबंध अदृश्य कारणों से होता है या नहीं। न ही मैं हर बात को भय, दोष या चमत्कार के चश्मे से देखता हूँ। लेकिन इतना अवश्य मानता हूँ कि मनुष्य केवल स्वयं कर्ता नहीं होता। वह अपने साथ स्मृतियों, संस्कारों, रिश्तों और अनेक अनकहे इतिहासों को भी साथ लेकर चलता है। कभी-कभी उन अनदेखे संबंधों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना भी एक आध्यात्मिक कर्म बन जाता है। शायद हमारे पूर्वजों ने त्रिपिंडी जैसे श्राद्धों के माध्यम से इसी आध्यात्मिक पक्ष को सहज करने के लिए शुरुआत किया हो..! हमारे लोक और धर्म में पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद के जीवन पर बहुत कुछ लिखा गया है। हमारे पुराणों और उपनिषद् सहित जितने भी आध्यात्मिक ग्रन्थों के टीका और भाष्य मिलते है उतना किसी धर्म में नहीं लिखा गया है..इस परा विज्ञान पर आपके तर्क और संशय के लिए बहुत जगह है..आप पढ़िए और डूब जाइए एक ऐसे संसार में जहाँ अपूर्णता और अतृप्ता के सारे सूत्र आपको पूर्ण तो नहीं करेंगे पर चेतना से जरूर भर देंगे.यह पिशाचमोचन भी आपके वैसे ही अनसुलझे तर्कों को नई दृष्टि देता है जैसा  यहाँ आकर...यहां के शांत सरोवर के किनारे जब आप बैठ कर महसूस किया जा सकता है। तो यही विचार बार-बार मन में आता है वहाँ कोई भय का वातावरण नहीं, न ही ऐसा कुछ जिसमें रहस्य हो ..वहाँ सैकड़ों परिवार जो अपने दिवंगत प्रियजनों की स्मृतियों के साथ उन पिण्डों में अपने पूर्वजों का आह्वान करते हुए.. यहां मंत्रों की गूंज के साथ साथ वहां पूर्वजों की स्मृतियां भी गूंज रही थी, जल में चमकती धूप के बीच जो तरंग उठ रहे थे शायद उसमें हमारे पूर्वजों के आह्वान के बाद का विदा गीत की तरंगें थी जिसपर उन लोगों के चेहरे उभर और मिट रहे थे जो अपने भीतर किसी अधूरे भाव को शांत करने आए थे।
पिशाचमोचन के बारे में प्रचलित मान्यताएँ प्रेतत्व, पितृदोष और आत्माओं की शांति जैसे विषयों से जुड़ी हैं, लेकिन वहाँ बैठकर  इसका एक दूसरा अर्थ भी दिखाई दिया। मुझे लगा कि शायद इस तीर्थ का वास्तविक महत्व किसी अदृश्य भय में नहीं, बल्कि स्मरण की उस संस्कृति में है जिसे भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों से सहेज कर रखा है। आधुनिक जीवन हमें वर्तमान में जीना सिखाता है, लेकिन भारतीय परंपरा हमें यह भी याद दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अपने पूर्वजों की निरंतरता हैं, अपने परिवार की कहानी का एक अध्याय हैं। संभवतः त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे संस्कार इसी गहरे बोध को अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं।
काशी की महिमा शायद इसी में है कि वह जीवन और मृत्यु को दो अलग-अलग छोरों की तरह नहीं देखती। यहाँ मृत्यु भी स्मरण का विषय है, करुणा का विषय है और अंततः शांति का विषय है। पिशाचमोचन इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की यात्रा केवल देह तक सीमित नहीं है। वह अपने पूर्वजों, अपने परिवार और उन असंख्य स्मृतियों से भी जुड़ा है जिन्होंने उसे गढ़ा है।
काशी, 25सितम्बर2026,शुक्रवार
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शनिवार, 29 मार्च 2025

व्योमवार्ता/ नये साल की पहली सुबह...../व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 1जनवरी 2023

नये साल की पहली सुबह/व्योमेश चित्रवंश की डायरी..

नये साल की पहली सुबह
ढेर सारे कुंहासे और धुंध से भरी
नही दिख रहे कोहरे से
सड़क पर चहलकदमी करते लोग
वे बच्चे भी नही
नये साल पर खुशियाँ मनाने वाले
आटो वाला टोपी पर मफलर बांधे
मुंह से धूंआ फेकते
कर रहा है सवारियों का इंतजार
धुले धुलाये आटो पर तिरंगा झण्डा संग
गैस वाला गुब्बारा लगाये
चूने से लिख कर 
हैप्पी न्यू ईयर 2023
चौराहे के एक कोने पर 
उजाड़ होते चितवन के नीचे 
जल रहे लकड़ी के बोटे के पास
खड़े बीट के सिपाहियों के संग
सिमटे सुकड़े बैठे है
काले भूरे कलुआ औ भूरा
उन्हे इंतजार है नुक्कड़ की दुकान पर
जलेबी कचौड़ी छनने और 
उसके फेंके हुये दोनो का
अखबार का बंडल बांधे 
निकल चुके है हाकर
मंदिर की सेवा करने वाले पंडितजी भी.
दोनो को जल्दी है खबरे पहुंचाने की
नेकी की दीवार के पास 
सोया पड़ा है मन्तोषवा
फिर कहीं से दारू पी कर
सब कुछ वैसे ही है
जैसे कल था
न कोरोना का खौफ
न कोई हड़बड़ी
घरों मे रजाई मे दुबके 
रविवार मना रहे लोगों को 
अब नही इंतजार है किसी 
बिग ब्रेकिंग का
सब कुछ सामान्य सा
हर कोई आराम से
चल रहा है
साल बदल रहा है
हम नही......
- #व्योमेश_चित्रवंश
(काशी,1जनवरी 2022, पौष शुक्ल दशमी सं०2079वि०)
#व्योमवार्ता




मंगलवार, 10 जनवरी 2023

व्योमवार्ता/ भारतीय इतिहास के नाम पर क्या परोसा गया....../व्योमेश चित्रवंश की डायरी,10जनवरी2023

🚩 *एक फिजिक्स के प्रोफेसर ने कक्षा 6 से 12 ncert की हिस्ट्री बुक्स के अध्ययन का निश्चय किया और उसने पाया कि लगभग 110 बातें ऐसी हैं जो संदिग्ध हैं!*  
       👉 जैसे कक्षा 6, सामाजिक विज्ञान के पृष्ठ 46 पर ऋग्वेद के आधार पर भारत के बारे में  लिखा है कि "आर्यों द्वारा कुछ लड़ाइयां मवेशी और जलस्रोतों की प्राप्ति के लिए लड़ी जाती थी। कुछ लड़ाइयां मनुष्यों को बंदी बनाकर बेचने खरीदने के लिए भी लड़ी जाती थी।"
स्पष्ट है कि किताब लिखने वाला यह साबित करना चाहता है कि भारत में भी गुलाम प्रथा थी और मनुष्यों को खरीदने बेचने की जो बातें बाइबल और कुरान में है वे कोई नई नहीं है, बल्कि वैसा ही अमानवीय व्यवहार भारत में भी होता था।
ऐसे ही वे आगे लिखते हैं "युद्ध में जीते गये धन का एक बड़ा हिस्सा सरदार और पुरोहित रख देते थे, शेष जनता में बांट दिया जाता था।" यहां भी मुहम्मद के गजवों को जस्टिफाई करने की भूमिका बनाई गई है।
आगे एक जगह लिखा है "पुरोहित यज्ञ करते थे और अग्नि में घी अन्न के साथ कभी कभी जानवरों की भी आहुति दी जाती थी।"
आगे पृष्ठ 60 पर लिखा है "खेती की कमरतोड़ मेहनत के लिए दास और दासी को उपयोग में लाया जाता था।"
तब उस प्रोफेसर ने पहले तो स्वयं अध्ययन किया, मेगस्थनीज की इंडिका आदि के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ये सब मनगढ़ंत लिखा जा रहा है, उसने ncert में आरटीआई डाली कि इन बातों का आधार क्या है? आप हिस्ट्री लिख रहे हैं, रेफरेंस कहाँ हैं? ऋग्वेद की सम्बंधित ऋचाएं, अनुवाद बताया जाए और यदि नहीं है तो खंडन या सुधार किया जाए।
जानकर आश्चर्य होगा कि ncert ने सभी 110 प्रश्नों का एक ही जवाब दिया कि हमारे पास इसका कोई प्रूफ नहीं है। इसके अलावा जवाब टालने और लटकाने का रवैया रखा। कई वर्ष ऐसे ही बीत गए। हारकर वे पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में गये कि ncert हमें इनका जवाब नहीं दे रही। कोर्ट ने पिटीशन स्वीकार कर लिया और ncert को जवाब देने के लिए कहा। तब ncert ने कहा कि हमारी सभी पुस्तकों का लेखन जेएनयू के हिस्ट्री के प्रोफेसर ने किया है और हमने उन्हें जवाब के लिए कह दिया है। लगभग एक वर्ष बाद जेएनयू के लेखकों ने जवाब दिया कि हमने इन बातों के लिए ऋग्वेद के अनुवाद का सहारा लिया है।
ऋग्वेद में इंद्र को एक यौद्धा बताया गया है और उसमें आये #नरजित शब्द से यह साबित होता है कि वे लूटपाट करते थे और मनुष्यों को गुलाम बनाते थे।
इस पर इस प्रोफेसर ने संस्कृत के जानकारों को वे मंत्र बताए कि क्या इनका यही अर्थ होता है जो  जेएनयू के प्रोफेसर ने किया है?
संस्कृत के विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि जेएनयू वालों का अर्थ मनमाना, कहीं कहीं तो मूल कथ्य से बिल्कुल उलटा है।
इस पर कोर्ट ने इन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत जानते हैं? आपने यह अनुवाद कहाँ से उठाया?
तो जेएनयू के कथित इतिहासकारों ने कहा कि वे संस्कृत का स भी नहीं जानते, उन्होंने एक बहुत पुराने अंग्रेज लेखक के ऋग्वेद के अनुवाद का इस्तेमाल किया है।
कोर्ट -"और जो आपने लिखा है कि लूट के माल को ब्राह्मण आदि आपस में बांट लेते थे, उसका आधार क्या है?"
जेएनयू -"चूंकि ऋग्वेद में अग्नि का वर्णन है और अग्नि को पुरोहित कहा गया है तो इसका अर्थ यही है कि जो जो अग्नि को समर्पित किया जा रहा है मतलब पुरोहित आपस में बांट रहे हैं।"
अब जेएनयू और ncert के इन तर्कों पर माथा पीटने के सिवाय कोई चारा नहीं है और वे शायद यही चाहते हैं कि हम माथा पीटते रहें!!
Ncert आगे कक्षा 11की हिस्ट्री में लिखती हैं "गुलामी प्रथा यूरोप की एक सच्चाई थी और ईसा की चतुर्थ शताब्दी में जबकि रोमन साम्राज्य का राजधर्म भी ईसाई था, गुलामों के सुधार पर #कुछ_खास_नहीं_कर_सका।
यहां ncert के लिखने के तरीके से छात्र यह समझते होंगे कि ईसाई धर्म गुलामी के खिलाफ है। जबकि सच्चाई यह है कि एक चौथाई बाइबल इन्हीं बातों से भरी हुई है कि गुलाम कैसे बनाने, उनके साथ कितना यौन व्यवहार करना, उन्हें कब कब मार सकते हैं, वगैरह वगैरह।
सच्चाई यह है कि ncert के 2006 के पाठ्यक्रम का एक मात्र उद्देश्य था हिन्दुधर्म को जबरदस्ती बदनाम करना, यानि जो नहीं है उसे भी हिंदुओं से जोड़कर प्रस्तुत करना और ईसाइयों की बुराइयों पर पर्दा डालकर भारत में उसके प्रचार के अनुकूल वातावरण बनाना।
सोनिया गांधी की तत्कालीन मंडली ने पूरी साजिश कर उक्त पाठ्यक्रम की रचना की थी और आज विगत 16 वर्ष से वही पुस्तकें चल रही है, एक अक्षर तक नहीं बदला गया।
और हां, उन प्रोफेसर का नाम आदरणीय नीरज अत्रि है। वे यूट्यूब पर हैं।
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(काशी,10जनवरी 2023,मंगलवार)
#नीरज_अत्री
#व्योमवार्ता

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

व्योमवार्ता /काँन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझे..

कान्वेंट शब्द के मायने.

                सोशल मीडिया भी अकसर महत्वपूर्ण जानकारियां व सूचनायें दे जाता है। आज ऐसे ही यह छोटा सा लेख फेसबुक पर किसी ने लगाया था। पढ़ कर जिज्ञासा हुई तो गुगल बाबा और विकीपिडिया से तथ्यों का सत्यापन किया। मेरा यह दावा नही है कि गुगल और विकिपीडिया पर तथ्य प्रामाणिक ही होगें पर तथ्यों के ऐतिहासिक संदर्भ उन्हे गलत भी नही सिद्ध करते। बहरहाल फेसबुक पर मिली पोस्ट ज्यों की त्यों रख रहा हूं  इसमे कोई तथ्यपरक जानकारी द्वारा सार्थक परिमार्जन, परिवर्द्धन, संशोधन होने पर संभवतः तथ्यों मे ज्ञानवृद्धि ही होगी।
    ‘काँन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।
ब्रिटेन में एक कानून था *लिव इन रिलेशनशिप* बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना। जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।
अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज _अवैध हैं उनके लिए काँन्वेंट बने।
                     उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है ना ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज। इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन् 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था। परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।
जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वो लिखता है कि:
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा।
इनको अपने मुहावरे नहीं मालुम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा। अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा?
लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”। दुनियाँ में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।
भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं। आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल, माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल। अब इन मूर्खो को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना?
दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजो का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने वो सभी चीजो को पोषित और संचित किया। और हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलामी सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।
(काशी,18मार्च2022,होली)
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सोमवार, 13 सितंबर 2021

व्योमवार्ता/धरती के भगवान (भाग-8)

व्योमवार्ता/धरती के भगवान (भाग-8) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 13सितंबर2021

            आज चर्चा उन चिकित्सकों की जो आज भी चिकित्सा धर्म के प्रति अपने समर्पण से वास्तव मे धरती के भगवान कहे जा सकते  हैं। ये नव दधिचि बिना प्रचार प्रसार के अपने मरीजों की सेवा करते हुये हिप्पोक्रित्ज के शपथ को आज भी अपने जीवनर्या  मे शामिल किये हैं। ऐसे ही एक युवा और समर्पित चिकित्सक है काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान मे मेडिसिन के प्रोफेसर डा० दीपक गौतम। डा० दीपक मेडिसिन विभाग के लगभग सभी ओपीडी मे अपनी सेवा दे चुके है चाहे वह किशोर चिकित्सा हो या जरायु चिकित्सा या माडर्न जनरल मेडिसिन, पर हर विभाग से दूसरे विभाग मे जाने के बाद भी उनके पुराने मरीजों की फेहरिस्त उनसे जुड़ी ही रहती है। डा० गौतम के बार बार विभाग बदलने के पीछे संस्थान की अंदरूनी राजनीति भी हो सकती है पर इससे उनके चिकित्सा धर्म पर कोई साईड इफेक्ट नही पड़ता। अपने चैम्बर मे भीड़ भरे पर  तनाव मुक्त माहौल मे  सबसे मुस्करा कर सबकी समस्यायें सुनते सबको सामान्य भाव से सबको समझाते रहते है। कोई तनाव नही कोई उलझन नही चेहरे पर एक आत्मसंतोष व मन मे सेवा भाव ही सामने बैठे मरीज के मन मे आत्मविश्वास भर देता है।
                 डॉ०दीपक गौतम के सेवा भाव का कायल मै पांच साल पहले हुआ। मेरी माँ के पाटस्पाईन के सर्जरी के बाद उन्हे मेडिसिन वार्ड मे भरती करना पड़ा था। डा० दीपक गौतम जी के देखरेख मे उन्हे प्राईवेट वार्ड मे भरती कराया गया। जो लोग बीएचयू हास्पीटल से परिचित होगें उन्हे मालूम होगा कि सर सुन्दर लाल अस्पताल का प्राईवेट वार्ड अस्पताल के बिलकुल किनारे है ठीक आईएमएस के सामने। मेडिसिन वार्ड से प्राईवेट वार्ड की अच्छी खासी दूरी। मिलने वाले और परिचितजन पूछते थे कि यहां प्राईवेट वार्ड मे क्यों भरती करा दिये यहां तो डाक्टर आते ही नही है।वार्ड से ही चले जाते है। यह सुन कर हम भी पहले दिन काफी परेशान हुये पर यह परेशानी मेरे लिये मात्र इसलिये नही खड़ी हुई क्योंकि मेरी माँ की चिकित्सा डॉ०दीपक गौतम कर रहे थे। दिन भर मे कम से कम चार बार स्वयं आने और हर दो घंटे पर अपने रेजिडेंट डाक्टरों को भेजने मे उनसे किसी दिन कोताही या लापरवाही हुई हो याद नही। ऐसा नही ये सिर्फ मेरी माँ के साथ हुआ हो बल्कि अपने हर मरीज के बारे मे उनकी जिम्मेदारी और फीडबैक लेना डा० दीपक गौतम का स्वभाव है।
       मॉ के डिस्चार्ज होने के दो महीने के बाद एक बार उनकी रिपोर्ट लेकर डा० दीपक गौतम जी को दिखाना था। मै कचहरी से होकर अपने मित्र सूर्यभान जी के साथ समय से निकलने के बावजूद  शहर के जाम मे उलझ कर जब तक उनके ओपीडी पहुंचा। ओपीडी बंद हो चुके काफी देर चुकी थी और वे निकल चुके थे। मैने उनके मोबाइल नंबर पर  एक बार संपर्क करने का प्रयास यह सोच कर किया कि संभवतः संस्थान मे मिल जायें तो मुझे फिर से पूरे शहर का चक्कर काट कर आना नही पड़ेगा। मोबाइल मिलते ही उन्होने बताया कि वे तो आवास पर पहुँच चुके है। मैने कोई बात नही कहते हुये फोन काट दिया। तभी पुन: उनका कालबैक आया "आप कहां पर है और कहां जाना है? " मेरे बताने पर कि अब हास्पीटल से निकल रहा हूँ, उन्होने पूछा कि "किधर से आप जायेगें।आप बृजइंक्लेव मेरे आवास पर आ सकते है तो आपको दूबारा नही आना होगा।" आश्चर्य यह कि तब तक मै उनके लिये एक अननोन नंबर ही था, जिसे वे शायद पहचानते भी नही थे। जब मै उनके बताये लेन मे बृजइंक्लेव पहुंचा तो वे लेन मे खड़े मेरा इंतजार कर रहे थे।उन्होने न सिर्फ रिपोर्ट देख कर दवाओं मे परिवर्तन किया बल्कि घर मे अकेले रहने होने के बावजूद स्वयं चाय बना कर भी हम लोगों को पिलाये।मेरे धन्यवाद देने पर वे और विनम्र हो गये, "अरे ये तो मेरा काम ही है। आपको केवल इसके लिये दूबारा इतनी दूर से आना पड़ता। "
     रास्ते मे लौटते समय हम और सूर्यभान जी यही बात कर रहे थे कि आज के चिकित्सा स्वार्थ के धंधे मे यह चिकित्सा धर्म बिरले ही देखने को मिलता है।ऐसा अनुभव मात्र हमारे साथ ही नही औरों के साथ भी हुआ है। जो भी डा० दीपक गौतम के यहां गया उनका कायल बन कर ही लौटा। यहीं कारण है कि उनके मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है और अपने मरीजों की सेवा  मे ही अपना सुख पाने वाले डॉ०दीपक गौतम के प्रशंसको का सूकून भी।
       आज भी ऐसे ही डाक्टरों से चिकित्सा धर्म की प्रतिष्ठा बनी हुई है जो आधुनिक दधिचि, चरक और सुश्रुत के रूप मे सेवा भाव मे लगे हुये है। धन्यवाद #डॉ०दीपक_गौतम।
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काशी, 13सितंबर 2021,सोमवार


सोमवार, 17 अगस्त 2020

यह सड़क मेरे गॉव को नही जाती...(२) पूर्वपीठिका

पूर्वपीठिका/

मेरे गॉव को जाने वाली सड़क
                                                                              यह कोई पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम नही था पर परिवार खानदान के लोगों मे यह इच्छा कई वर्ष से चल रही
थी।  समस्या यह थी कि सबको एक संग कैसे लाया जाय। अब हमारा खानदान गॉव से निकल कर महानगरों के रास्ते मुंबई, दिल्ली, पूने, लखनऊ होते हुये सात संमुदर पार सिंगापुर तक जा बसा था।पिछले दो ढाई दशक दशकों से खानदानी तनातनी नें परिवारों के मध्यएक अबूझ सा मौन अंतराल बना दिया था ऐसे मे किसी सामूहिक कार्यक्रम के लिये सबको एकराय कर एकमंच पर ले आना तराजू के एक पलड़े पर मेढक तौलने के समान था। पर इसे संयोग ही कहें कि बात चल निकली तो परिवार के ही रेलवे से अगले छमाही मे अवकाशप्राप्त करने वाले चाचा ने जजमान बनने के लिये हामी भरते हुये गया महायज्ञ कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने को कहा। अब सवाल यह था कि कार्यक्रम का अगुआ कौन बने?क्योंकि इसमे अगुआ की भूमिका ही संयोजक की थी जो गॉव से लेकर शहर तक ही नही बल्कि देश विदेश मे रहने वाले सबके साथ सामंजस्य बैठा सके।उसे सर्वमान्य होने के साथ साथ गॉव से संपर्क मे रहना भी आवश्यक था। इस तरह यह जिम्मेदारी मुझे दे दी गई। सारी व्यवस्थाओं को करने मे मै पिछले दो तीन महीने तक लगभग हर रविवार को गॉव जा कर गया महायज्ञ की व्यवस्थाओं को करता रहा चौकी से लेकर यज्ञ पूजा तक, मजदूर से लेकर हलवाई तक। गॉव पर रहने वाले हमारे खानदानी पटिदार रविकान्त मास्टर स्थानीय स्तर पर हमेसा मेरे लिये खड़े पैर सहयोगी बने रहे। टेन्ट,बुफे , चाय ,नास्ता, बिस्तर ,पूजा,  निमंत्रण ,आवागमन ,बिजली पानी के इंतजामात मे ही हमे यह महसूस होने लगा था कि अब गॉव पहले जैसा नही रहा। पर रविवार को जाकर दो घंटे मे वापस आ जाने पर इसके पीछे के कारण को समझना आसान नही था ।फिर दो महीने बाद 23 सितंबर आया जब गया जाने के पहले सप्ताह भर चलने वाले भागवत् कथा के लिये पूरा खानदान तीस चालीस बरस बाद एक साथ जमा होना था गॉव पर, सबके मन मे उत्साह था। मै खुद लगभग पचीस सालों बाद अपने गॉव रात रूकने और दस दिन वहॉ रूकने जा रहा था।पचीस  या शायद उससे भी ज्यादे, याद नही । हम अपने गॉव जा रहे
थे। अपना गाॅव जो अब भी मेरे मन में हमेशा जीता है, अकसर अकेले रहने पर चुभता है, पुचकारता है, गुदगुदी करता है। कभी आँखें नम हो जाती है और कभी अकेले में अनायास ही मुस्करा देता हॅू। मेरे द्वारा बार-बार बताये गये किस्से कहानियों का मेरा पुत्र कभी अचरज भी निगाहों से सुनता है, कभी न विश्वास करने वाले मन से गुनता है। इधर काफी दिनों से उसकी जिद थी कि हम भी देखें गाॅव कैसा होता है? वह क्या वैसा ही होता है जैसा रामायण, दूरदर्शन और बाकी सीरियलों में दिखाते है या जैसा आप बताते है। पत्नी और पुत्र भी साथ थे । मै उसे अपने गॉव के बारे मे बताता चल रहा था।
शहर पार करते ही मोदी जी की कृपा से बने शानदार फोरलेन हाइवे पर बाईस किमी कब बीत गये पता ही नही चला।मेरा मन कार की गति से भी तेज अतीत की टेढ़े-मेढ़े चलचित्र वाले रास्ते पर भाग रहा था। जब पिण्डरा बाजार से पहले बाबतपुर एयरपोर्ट से आगे बढ़ते ही अब दायी ओर निकलती सड़क पिण्डरा बाजार फूलपुर को चली जाती है। पहले यही मूल सड़क हुआ करती थी जो लखनऊ से आते हुए जौनपुर को त्रिलोचन महादेव से पार करती हुई डिग्घी पर अब करखियाॅव एग्रो पार्क में बनारस की सीमा में प्रवेश करती थी और फूलपुर मीरासाहब पिण्डरा, कैथोली होते हुए
बाबतपुर एयरपोर्ट के बगल राष्ट्रीय राजमार्ग 56 बनाती थी। पर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन एनडीए वाले मोदीसरकार में जब सड़कों का चौड़ीकरण होना प्रारम्भ हुआ तो बनारस लखनऊ राजमार्ग को भीड़भाड़ वाले बाजारों से बाहर सुगमयातायात योजनान्तर्गत इसे पिण्डरा, फूलपुर और त्रिलोचन बाजार के बाहर-बाहर पश्चिम की ओर से निकाल दिया गया तो पुरानी वाली मुख्य सड़क से जाते है हमारे गाॅव। मुख्य हाईवे छोड़ते ही उबड़-खाबड़ उखड़ी हुई सड़क ने पुनः गाॅवों के प्रति प्रशासनिक व्यवस्था के उदासीनता से मन खिन्न कर दिया। पिण्डरा बाजार की भीड़भाड़
अभी भी वैसी ही है जैसे पहले हुआ करती थी। हाॅ भीड़ में थोड़ा शहरीपन का प्रभाव दिखने लगा है। पिण्डरा बाजार के बाद नेशनल इण्टर कालेज से आगे पेट्रोल पम्प के पास से बायी ओंर अन्दर जनपद की नई तहसील पिण्डरा बन गयी है। पहले वहाॅ जमापुर नर्सरी हुआ करती थी जहाॅ से कई बार पौधे खरीद कर हमने गाॅव पर लगाया था और उनमें से ज्यादातर आज पेड़ बन गये है। कठिराॅव वाला मोड़ पार करते ही मीराशाह का बगीचा और पोखरा अभी भी वैसे ही है। शान्त निर्जन भूतहा जैसे। मेरा मन पुरानी यादों की तरफ फिर भागने लगता है। नाद नदी पार कर फूलपुर थाने से शुरू होता है फूलपुर बाजार। इसी फूलपुर से पूरब दिशा में एक सड़क निकलती है जो जाकर सिन्धोरा में बनारस केराकत रोड़ में मिल जाती है। दूसरी सड़क पर रेलवे लाईन को डाॅकने के बाद आगे एक और सड़क निकलती है जो सीधे मेरे गाॅव को जाती है।
मैं, फूलपुर बाजार की देर सारी बातें याद करता हुआ कार पूरब वाली सड़क पर मोड़ देता हॅू। अब यह मोड़ काफी भीड़ भरा हो गया। मुख्य सड़क के पश्चिम पटरी पर खुले नये बैंक के ठीक सामने से निकल रही सड़क पर ढेर सारे टैम्पो खड़े है जो अब सुबह के सात बजे से रात के सात आठ बजे तक फूलपुर सिन्धोरा के बीच चलते रहते हैं। टैम्पों को रिजर्व कर भाड़े पर उसे अन्दर के गाॅवों में भी ले जाया जा सकता है। मोड़ पर ही कई बड़े-बड़े मार्गदर्शक बोर्ड भी लगे हुए हे। नवोदय विद्यालय खालिसपुर रेलवे स्टेशन से लेकर पावर हाउस तक के। मोड़ पर दो-तीन मिठाई की दुकाने भी खुल गयी है और उन्हीं दुकानों की आड़ में उत्तर पटरी पर भारत सरकार की विशिष्ठ परियोजना का सामुदायिक स्वास्थ्य मातृ शिशु कल्याण केन्द्र जो अब स्वास्थ्य सेवाओं के देने के बदले में सार्वजनिक मूत्रालय के रूप में ज्यादा प्रयुक्त होता है। बाजार से सड़क पर आगे बढ़ते ही कंजड़ों की बस्ती है जहाॅ उनके परिवार की महिलाएं आज भी अपने
परम्परागत व्यवसाय कच्ची शराब उतारती है। सड़क से निकलते समय सड़ते हुए महुआ की महक और बीच-बीच में छोटी-छोटी मड़ईयों में सूअर के गोस्त की दुकानों से सिमटी सड़क। अच्छाई यही है कि यहाॅ सड़क पर बस सही लोग
रूकते है जो उन दुकानों के अथवा दुकानों के पीछे चलने वाले ठर्रा के ग्राहक है। अब फूलपुर से सिन्धोरा वाली रोड भी भर गयी है। सन् 1985 में राजीव गाॅधी के सत्ता से पहले यह रोड नही हुआ करती थी बल्कि कच्ची सड़क थी जो बरसात में कीचड़ और गर्मियों में कंकड़ पत्थर सिटकी रहित सफेद रेहटा से चमकती रहती थी। उजाड़ बीरान में किसी विधवा के खाली माॅग की तरफ। बाजार से निकलने के बाद एक किमी वाले पत्थर के पास ही बायीं तरफ अम्बेडकर जी की एक चबूतरे पर विद्यमान है और उनके चारों तरफ बने छोटे-छोटे कमरों के बीच से बने रास्ते पर एक नीला बोर्ड
लगा है भारतीय संविधान के निर्माता बोधिसत्व भारतरत्न बाबासाहब डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर आदिप्राथमिक बेसिक पाठशाला फूलपुर। जहाॅ तक मुझे जानकारी है यह सरकारी बेसिक प्राइमरी स्कूल है पर कब इसका नाम भारतीय संविधान के निर्माता बोधिसत्व भारतरत्न बाबा भीमराव अम्बेडकर के नाम पर हो गया। यह शायद शिक्षा विभाग केअधिकारी भी नही बता पायें। कभी-कभी मैं सोचता हॅू कि यह विडम्बना ही है कि मूर्तिपूजा के विरोध में प्रवर्तित किये गये बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध की मूर्ति विश्व में सर्वाधिक है। ठीक उसी तरह उनके अनुयायी भीमराव अम्बेडकर के साथ भी यही बिडम्बना दुहराई गयी। शायद ही भारत का कोई गाॅव बचा हो जहाॅ बाबा साहब अम्बेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कह कर उनकी मूर्ति स्थापित न की गयी हो। इस जातिगत राजनीति में हम इतने स्वार्थवादी हो गयी है कि अपने संविधान को भी बाबा साहब अम्बेडकर का संविधान कहकर छद्म तथ्यों वाले
इतिहास को प्रश्रय देते जा रहे हैं।
मेरा ध्यान रेलगाड़ी के लम्बे हार्न की आवाज से पुनः सड़क पर चला जाता है। सामने रेलवे फाटक बन्द है और धड़धड़ाते हुए एक एक्सप्रेस रेलगाड़ी बिना खालिसपुर स्टेशन पर रूके निकल जाती है। अब इस रेल लाईन का भी विद्युतीकरण हो गया है। हाबड़ा से पंजाब मेन लाईन की शुरूआत सन् 1872 ई0 में हुई थी।बनारस से लखनऊ मेन लाइन जफराबाद तक शुरू से ही डबल ट्रैक में विछाई गयी थी और समुद्रतल से लगभग 82
मीटर उचाई पर इस रेलवे ट्रैक पर शुरूआत से ही खालिसपुर (केएस एफ) स्टेशन बनाया गया था। भौगोलिक लिहाज से बनारस जनपद के उत्तरी छोर का आखिरी रेलवे मुकान और सामाजिक व वास्तविक दृष्टि से लगभग 50 वर्ग किमी के क्षेत्र में अकेले यातायात व परिवहन का सहारा था यह खालिसपुर रेलवे स्टेशन। स्टेशन भवन अंग्रेजी व पाश्चात्य शैली में बना है जो शायद 1872 का ही बना हो। पहले कोयले वाले इंजन फिर डीजल इंजन और अब बिजली से चालित रेलगाड़ियों का इतिहास समेट रखा है। खालिसपुर स्टेशन के इस पुराने भवन ने अंग्रेजों के जमाने की लाल पगड़ी
वाली पुलिस से लेकर भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग भी इस गुंबदवाले चन्द्राकार छत के जेहन में ताजा है। रेलवेफाटक पार करते ही बायी ओर कंक्रीट स्लीपर प्लान्ट है। सन् 1980 में जब पंडित कमलापति त्रिपाठी जब बनारस से सांसद बने थे तो रेलमन्त्री के रूप में उन्होंने यह तोहफा दिया था। इस विकास से भूले विसरे धूल धूसरित इलाके को। पर रेलवे के अफसरान की लापरवाही कहे या इस इलाके का दुर्भाग्य यह प्लान्ट अब बन्द हो चुका है। यहाॅ काम कर रहे मजदूरों, कर्मचारियों को अब कहीं और स्थानान्तरित कर दिया गया है। यहाॅ बचे है फैक्ट्री के चलने के समय के बने रेलवे के वीरान क्वाटर्स बन्द पड़ी फैक्टरी पर लगा बड़ा सा ताला और यहाॅ के बेरोजगारी भरी दुर्भाग्य। फैक्टरी के बनने और चलने का पश्चातवर्ती प्रभाव यह पड़ा कि कभी उजाड़ खण्ड में बियादान में डेढ़ दो किलोमीटर से दिखाई देने वाले खालिसपुर रेलवे स्टेशन और रेलवे सिग्नल ट्रैक पर चलने वाली रेलवे गाड़ियां अब यहाॅ बाजार रूपी दुकानों के मध्य स्थित होने से नजर नही आती। फाटक के दोनों तरफ कुल मिलाकर सौ दुकाने चलती फिरती घूमती टहलती भीड़ का माहौल को कस्बानुमा बनाती है। अब तो भारतीय स्टेट बैंक की नई शाखा भी खुल गयी है जो बताने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण है कि देष का विकास चल कर इस पिछड़े तिरस्कृत इलाके तक पहुॅच गया है। जहाॅ लोगों की जेब और
बैंक के काउन्टरों में आपसी तालमेल का एक रिश्ता बनकर आम जन को बचत एवं पॅूजी के महत्व को बताता है।बचत न रहने पर ऋण भी दिये जाते है जिसकी ईन्द्रजालिक व्यवस्था बैंक अधिकारी ऋणी एवं बीच का माध्यम दलाल वर्ग वखूबी से सम्पादित करता है। इसी सड़क पर फूलपुर से लगभग साढे चार किलोमीटर आगे चलने पर पंचवटी की पर्णकुटी जैसा वातावरण सूखे वीरान सड़क पर रेगिस्तान के बीच हरियाली के मिलने जैसा ही है। गाॅव देवजी का यह छोटा सा हरा भरा छायादार क्षेत्र पनवरिया के नाम से जाना जाता है। बताते है कि पहले यहाॅ देशी पान की खेती होती थी। पोखरे के किनारे लगे बसवांर के आड़ में सरपत की छोटी छोटी टाटियां बनाकर पान की खेती करते थे यहाॅ के बरई लोग। बस पनवरिया से बाये हाथ उतर जाती है हमारे गाॅव की सड़क। मैं मुड़ते हुए अगल-बगल के खेतों को पहचानने लगता हॅू। पचास मीटर थोड़ा सा आगे सिन्धोरा रोड पर नया-नया पेट्रोल पम्प खुल गया है। हमें याद आता है कि कैसे पन्द्रह साल पहले तक पेट्रोल डीजल के लिए हमारा गाॅव पिण्डरा बाजार या सिन्धोरा मरूई बाजार के पेट्रोल पम्पों पर आश्रित था। पन्द्रह वर्ष पूर्व जब गाजीपुर के पूर्व सांसद मनोज सिन्हा का पेट्रोल पम्प थाना
फूलपुर के बगल में खुला तो हमारे गाॅव के लोग बहुत खुश हुए थे और अब तो यह पेट्रोल पम्प लगभग गॅाव में खुल गया। मोड़ पर ही मुर्गा की कुछ दुकाने भी खुल गयी है। हाल में ही कोई बता रहा था कि अब बगल वाले गाॅव के बाजार में देशी दारू का ठीका भी खुल गया है। यह भी एक शोध का विषय है कि जैसे-जैसे इस देश में महगाई बढ़ती गयी उससे भी तेज गति से यहा शराब और मुर्गे मांस मछली की दुकाने खुली ही नही बथ्लक खुली फली भी और बार-बार मद्य निषेध विभाग द्वारा शराब मुक्ति और नशामुक्ति के लाख प्रयासों के बावजूद आबकारी विभाग किस तरह अपने लक्ष्य को हर वर्ष बढ़ाकर प्राप्त करने में सफल रहता है।
अपनी इस सोच पर खुद ही मुस्कराता हुआ मैं चारे वाली फैक्टरी के बगल से होता हुआ सड़क पर खुली रमजान मियां की नई दुकान से होते हुए गाॅव में घुस गया। वहाॅ भी गाॅव में घुसते ही बाये तरफ अम्बेडकर बाबा का नया मन्दिर बन गया है। संविधान बाये हाथ में थामे दूसरे हाथ को उठाये गौतम बुद्ध के मूर्ति पूजा विरोधी बौद्ध धर्म के अनुयायी डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर। मेरे गाॅव के अंबेडकर अनुयायियों ने मूर्ति व अपूर्ण मन्दिर के आस-पास गाॅव सभा की इस बंजर भूमि पर सात
आठ पेड़ लगा दिये हैं। चलो कम से कम इसी बहाने थोड़ी हरियाली तो हैं। मैने सड़क पर लगे पत्थर को देखा नदोय 1 किलोमीटर। सड़क सीधे गाॅव में चली गयी। हाॅ मेरे गाॅव में जाने वाली सड़क है ।यही सड़क मेरे गाॅव को चली जाती है।
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष ।

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष । व्योमेश चित्रवंश की डायरी,2४ मार्च २०२०, मंगलवार

अपनी मनपसंद दो किताबो को कल देर रात दुबारा पढ कर समाप्त किया। डेल कार्नेगी की किताब पिछली सदी मे 1993 मे खरीद कर पढ़ने के बाद आलमारी में रखी शोभायमान बन गई थी, हालॉकि उसके सिद्धान्त आज भी मेरे व्यवहार मे है। जबकि स्यालकोट सागा 2016 मे आते ही खरीद कर दो दिन तक लगातार पढ़ते हुये मिले रोमांच भरे एहसास के बाद कई लोगों को पढ़वाने के बाद रख दिया था।
जब सब कुछ लाकडाऊन है ऐसे मे खुद को व्यस्त रहने  का मेरे लिये एकमात्र तरीका किताबें पढ़ना ही है। आज  बड़े भाई मित्र राजीवअस्थाना Rajeeva Kumar Asthana वकील साहब ने के एम मुंशी की भगवान परशुराम और अशोक के बैंकर की दशाराजम भेजवाया है। उम्मीद है कि दो दिन की टाईम की खुराकी इससे पूरी हो जायेगी। और कल से नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हो जायेगा तो सोशल मीडिया से कट कर थोड़ा और समय मिलने पर यह खुराकी बढ़ भी सकती है।
कोरोना को भगाना है, कहीं नही जाना है।
घर मे रहना है, किताबें पढ़ना है।😊😊
(बनारस, 24मार्च2020, मंगलवार, 8.00बजे प्रात:)
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना  ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

                  पिछले सप्ताह अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के मित्र ओम प्रकाश राय यायावर का उपन्यास काशी टेल पढ़ा। इस किताब को पढ़ने की काफी दिनों से ईच्छा रहने के बावजूद किन्ही न किन्ही कारणों से यह पढ़ने से छूट जा रही थी। हालॉकि ओम प्रकाश जी ने भी इसके लिये एक बार उलाहना दे डाला, सो अबकी बार किताब उठाई तो पूरा पढ़ने के बाद ही दूसरे काम हाथ मे लिया। फिर किताब के बारे मे सोचते हुये लिखने मे देर हो गई। बहरहाल आज इस काम को भी पूरा करने का मन मिजाज बना के बैठा हूँ। ओम प्रकाश राय बिहार से बनारस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने आये तो औरों की तरह हमारी सर्व विद्या की राजधानी ने दोनो बॉहें फैलाये इन्हे स्वीकार कर लिया अभी वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे ही उच्च अध्ययनरत हैं।बनारस टेल इसी बीएचयू के शिक्षा संकाय की कथा है जिसमे बड़े बेबाकी से आज कल बीएड करने वाले छात्रों के मनस्थिति व परिस्थिति को दिखाते हुये यात्रा करती है, बिहार से  आये निहाल पाणे के साथ, तो रामनगर की आईपीएस मुस्लिम पिता व हिन्दू मॉ की पुत्री सदफ के साथ कमच्छा से गोदौलिया तक, रामनगर सामनेघाट से लंका तक, रेवड़ी तालाब के जय नारायण इंटर कालेज के खाली बीरान मैदान से दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर  चढ़ते उतरते ,बीएचयू की अमराईयों मे टहलते हुये सेण्ट्रल आफिस तक।
कभी सिविलसर्विस और पीसीएस के रिजल्ट मे अपना बड़ा सा घेरा बनाने वाले आक्सफोर्ड आफ ईस्ट के शहर कहे जाने वाले ईलाहाबाद अब प्रयागराज मे पीसीएस की तैयारी करने वाला बिहारी निम्न मध्यवर्गीय आय वाले परिवार का लड़का निहाल पाण्डेय, अपने पिता की उलाहनाओं से अाजिज आकर एक सिक्योर्ड नैकरी मास्टरी के  लिये बीएड करने  बीएचयू  आ जाता है। वहॉ उसकी मुलाकात उच्च आयवर्गीय मुस्लिम परिवार की सदफ से होती है। पहली मुलाकात के बाद दोनो के बीच दोस्ती से थोड़ा बढ़ कर मधुर रिश्ता बन जाता है। चंचल शोख सदफ के संगत मे अपने मे सिमटे रहने वाला निहाल भरपूर कालेज जीवन के दोस्ती का लुत्फ उठाने लगते है। इस दोस्ती ईश्क मोहब्बत के साथ साथ हास्टल जीवन की चुहलबाजिया, बदमासियॉ और बिन्दास अंदाज किताब की रोचकता को जीवन्त करते हैं। कहानी मे ठहराव आता है तो कहानी हाथ से फिसलती जान पड़ती है पर फिर से बिहार के अपने गॉव मे स्कूली शिक्षा मे अलख जगाने की कोशिश कर रहे निहाल पाणे बाबा कहानी के छोर को थाम लेते है।
कुल मिला कर ओम प्रकाश राय ने कथा को रोचक बनाने मे कोई कसर नही छोड़ा है और जो लोग बनारस, पश्चिम बिहार के भूगोल, और संस्कृति से परिचित है उनके लिये कहानी से जुड़ाव व अपनापन लगना स्वाभाविक है। बनारस टेल बेहतरीन कोशिश है इधर आये बनारस , बीएचयू, बिहार से जुड़े उपन्यासों की कड़ी में।
(बनारस, 18फरवरी,2020, मंगलवार)
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