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रविवार, 20 सितंबर 2026

बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला...../व्योमवार्ता

व्योमवार्ता/

बनारस : यूनेस्को का सांस्कृतिक धरोहर, रामनगर की रामलीला.....                                                                                 *व्योमेश चित्रवंश

पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब महर्षि वेदव्यास काशी में आतिथ्य की उपेक्षा से रुष्ट होकर गंगा के पूर्वी तट पर लोलार्क के आग्नेय कोण में स्थित तपोवन में नई काशी बनाने को उद्यत हुए तब शिवजी ने विनती कर उन्हें रोका तथा आदर के साथ काशीवास की अनुमति प्रदान की। तब से यह स्थान व्यासकाशी नाम से प्रतिष्ठित हुआ तथा कालांतर में रामनगर नाम से जाना गया। आजादी से पूर्व 200 वर्षों तक रामनगर काशी की राजधानी रही। काशी के इस पूर्व राजधानी में होने वाली रामनगर की रामलीला का पूरी दुनिया में अपना एक अलग ही महत्व है। यह रामलीला विश्व में होने वाली सभी रामलीलाओं से अलग एवं अद्वितीय है। विश्वप्रसिद्ध रामलीला रामनगर, जिसे रामायण के नाटकीय प्रस्तुति के रूप में जाना जाता है, यह भारत की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है।रामलीला और रामनगर इस तरह से एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं कि अक्सर ही लोग "रामलीला मंचन की वजह से इस नगर का नाम रामनगर पड़ा होगा " ऐसा मान लेते हैं।
रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग 230 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। वाराणसी में गंगा नदी के समीप स्थित रामनगर में आयोजित होने वाली रामलीला का आयोजन काशी नरेश द्वारा किया जाता है। यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस पर आधारित है। रामनगर की रामलीला का इतिहास बेहद समृद्ध और रोचक है परंतु इसकी शुरुआत कैसे हुई इसकी सटीक जानकारी किसी को भी नहीं पता है। आम जनमानस में रामनगर में रामलीला की शुरुआत को लेकर  कई सारी कथा कहानियां प्रचलित है, परंतु इनमें से दो कथाएं लोगों के बीच सबसे अधिक प्रचलित है। जिसमें पहली कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है की रामलीला की शुरुआत रामनगर से थोड़ी दूर काशी मे होता था जिसका संचालन गोस्वामी तुलसीदास के  समकालीन उनके शिष्य मेधा भगत जी करते थे।उन्होंने आजीवन इस लीला को श्रद्धापूर्वक करवाया, परंतु वृद्धावस्था के कारण उन्होंने तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह से रामलीला को संरक्षण प्रदान करने एवं उसे रामनगर की ओर स्थानांतरित करने का आग्रह किया। परंतु उस समय युवराज बीमार चल रहे थे जिस कारण उस समय महाराज इस कार्य पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे थे। तब मेघा भगत ने कहा कि यदि आप यह कार्य कर लेंगे तो युवराज स्वतः ही स्वस्थ हो जाएंगे और अंत में यही हुआ महाराज ने जैसे ही रामलीला की स्वीकृति दी युवराज भी स्वस्थ हो गए और तभी से रामनगर में रामलीला की शुरुआत हो गई।
एक और ज्यादा प्रचलित दूसरी  कथा है कि रामनगर से पहले यह रामलीला छोटा मिर्जापुर स्थित एक गांव में भोनू साहू और विट्ठल साहू नाम के दो साहूकार भाई करवाते थे। क्योंकि काशी के राजा श्री राम भक्त थे अतः उन्हें रामलीला देखना काफी प्रिय लगता था। वे प्रतिवर्ष नियमित रूप से प्रतिदिन रामलीला देखने जाया करते थे, एवं रामलीला में अपना सहयोग भी दिया करते थे। महाराज के सम्मान में रामलीला उनके आने के पश्चात ही शुरू की जाती थी। एक दिन महाराज को आने में थोड़ी देर हो गई, तो लोगों ने सोचा कि महाराज नहीं आएंगे एवं उस दिन धनुष यज्ञ की लीला बिना महाराज के ही करवा दी गई। महाराज लीला स्थल के लिये निकल पड़े थे परंतु रास्ते में ही उन्हें किसी से पता चला की रामलीला तो शुरू हो चुकी है, यह सुनकर उन्हें काफी दुख हुआ और वे बीच रास्ते से ही लौट आए। उन्होंने उसे दिन से रामलीला में जाना छोड़ दिया। परंतु रामलीला में न जाने के कारण वह काफी उदास भी रहते थे।एक दिन महारानी ने उनसे उनके उदासी का कारण पूछा जहां उन्होंने सारी बातें महारानी जी को बताई। इस पर महारानी जी ने उन्हें तंज कसते हुए कहा कि, जब बिट्ठल और भोनू बनिया होकर रामलीला करवा सकते हैं तो आप महाराज होकर क्यों नहीं करवा सकते? उन्होंने महाराज को रामनगर किले में ही रामलीला करवाने का प्रस्ताव दिया, जिससे महारानी भी रामलीला को देख सकती थी, और रामनगर के किले से शुरू हुई इस रामलीला का विस्तार धीरे-धीरे किले के बाहर तक होने लगा। 
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रामनगर की रामलीला पूर्णत: स्थान भाषा तिथि आदि के शोधोपरान्त प्रारंभ की गई थी एवं उसी शोध के निष्कर्ष व परंपरानुसार आज भी प्रचलित है।रामलीला के शोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी थे। विशुद्धानंद सरस्वती इन्हें अपना गुरु मानते थे। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर ईश्वरी नारायण सिंह ने इनसे मिलकर इनको अपना गुरु बना लिया। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरी नारायण सिंह ने हिंदी के उन्नायक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह और संत काष्ठ जिह्वा स्वामी जी का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त किया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल ,संवाद और मंचन का वैज्ञानिक, व्यावहारिक व यथोक्त ढंग से निर्धारण व शोधन किया। इन तीनों महानुभावों के अतिरिक्त स्वामी महादेव आश्रम, गायघाट के स्वामी जी, तुलसी दत्त झा, पंडित मथुरानाथ, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पंडित इत्यादि महानुभाव ने भी इस पुनीत कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान अर्पित किया। काष्ठ जिह्वा स्वामी द्वारा रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई हस्तलिखित पुस्तिका आज भी रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। इसकी प्रतिलिपि के सहारे वर्तमान व्यास - गण लीला का निर्देशन करते हैं । काष्ठजिह्वा स्वामी ने रामनगर में लीला स्थल का भी शोधन किया,एवं उन स्थलों का नामकरण रामायण के प्रसंगों पर किया जिससे यह स्थल वास्तविक रामयात्रा के स्थलों के समान हो गया। रामनगर की रामलीला का मंचन यथारूप विभिन्न शोधित स्थलों पर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर की परिधि में किया जाता है। प्रसंगानुसार अयोध्या ,जनकपुर ,पंचवटी ,लंका, चित्रकूट ,निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका ,रामबाग, पंपासर इत्यादि सभी स्थल निर्धारित किए गए हैं। रामचरितमानस के संवादों को भी काष्ठजिह्वा स्वामी ने शोधित किया था, जिसमें उनके द्वारा रचित पदों को भी संकलित किया गया। यह संवाद और अभिनय प्रशिक्षण के दौरान ही श्रीराम से छोटे अन्य पात्र स्वाभाविक बातचीत या हाव-भाव के दौरान श्रीराम को सम्मान देने लगते हैं।रामचरितमानस का शोधन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह रामनगर की रामलीला की विशिष्टता को भी दर्शाता है। यह शोधन रामलीला के पात्रों और दर्शकों के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करता है, जिससे लीला के दौरान होने वाली देवानुभूति का अनुभव होता है। रामनगर की रामलीला की एक विशेषता यह है कि इसे 31 दिनों तक विस्तारित किया जाता है। अधिकांश रामलीलाएं 10-15 दिनों में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन रामनगर की रामलीला में रामचरित मानस के हर प्रसंग को बहुत विस्तार से और बिना किसी जल्दबाजी के प्रस्तुत किया जाता है। इससे दर्शक भगवान राम के जीवन और उनके आदर्शों को अधिक गहराई से समझ सकते हैं।
यूं तो रामलीला मंचन की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी ) से होती है, किंतु इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला के महा अनुष्ठान के निमित्त पात्रों के चयन, प्रशिक्षण, रामलीला में प्रयुक्त औजारों - उपकरणों तथा मुखौटों व वस्त्रों इत्यादि की साज-सज्जा , प्रथम व द्वितीय गणेश पूजन आदि अनेक उपक्रमों के माध्यम से यह तैयारी महीनों पूर्व शुरू हो जाती है।यह रामलीला आज भी उसी पारंपरिक अंदाज में होती है, जैसे कि 230 साल पहले होती थी। रामनगर की रामलीला का मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। इसमें बिजली की रोशनी और लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि पेट्रोमेक्स (पंचलाईट) और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज़ के दम पर यह लीला प्रस्तुत की जाती है। रामनगर की रामलीला में विभिन्न स्थलों का मंचन होता है, जैसे कि अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग। रामनगर की रामलीला की तैयारी सावन महीने से ही शुरू हो जाती है और भादों में अनंत चतुर्दशी से लीला का प्रारंभ होता है। यह लीला आश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा को समाप्त होती है। रामलीला के दौरान परंपरा के अनुसार रोज़ाना ‘काशी नरेश’ भी हाथी पर सवार होकर आते हैं और उनके आने के बाद ही रामलीला शुरू होती है।
रामनगर की रामलीला में महिला पात्रों  की भी भूमिका लड़के ही निभाते हैं। इस लीला में कुल 27 किरदार होते हैं और 12-14 बच्चे इसमें हिस्सा लेते हैं। रामलीला के दौरान रामचरितमानस की चौपाइयों का नारदी स्वर में दो रामायनी दल द्वारा पाठ होता है और लीला संवाद के साथ आगे बढ़ती है।
रामलीला स्थलों के अतिरिक्त रामलीला से संबंधित तिथियां एवं समय , रामलीला के व्यास एवं पात्रों की वंशानुगत परंपरा व समर्पण, रामलीला में रामायणी दल की महत्वपूर्ण भूमिका व निष्ठा, परंपरा व अनुशासन के अद्वितीय उदाहरण, रामलीला के साधु संत एवं नेमीजन, रामलीला का मंचीय पक्ष एवम् नेपथ्य इस महागाथा के बड़े अध्याय हैं। कहने को इतना कुछ है कि इसे एक निर्धारित लेख की सीमा में बांध पाना सर्वथा असंभव है।
संक्षेप में कहना चाहें तो , रामनगर की रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक साथ तमाम कारक हैं। लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक मंच पर प्रसंगानुसार चलायमान यह मंचन बहुत ही सहजता के साथ बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के तथा बिजली के बड़े रोशनी करने वाले उपकरणों के स्थान पर पुराने समय के पंचलाइट और मशाल की रोशनी में प्रत्येक दिन न्यूनतम दस हजार की भीड़ को मात्र राम लीला व्यास के "चुप रहो! सावधान!" स्वर के द्वारा अनुशासित किया जाता है। यह रामलीला की विशिष्टता के कुछ सहज उदाहरण हैं। इसी प्रकार की सहजता इस रामलीला की श्रेष्ठता है और यह सौम्य श्रेष्ठता ही इसकी विश्वप्रसिद्धि का निर्विवाद कारण है।
रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन आने वाले नेमी, साधु-संतों की समर्पित व अनुशासित टोलियां श्रद्धा और समर्पण के बड़े अध्याय हैं। यहां दर्शक मात्र दर्शक न होकर पात्रों और परिस्थितियों, मंचन व प्रसंग के अनुसार खुद भी रामलीला में भूमिका निभा रहा दिखाई देता है । नेमी अपने साथ एक लकड़ी का पीढ़ा, ताड़ पत्र का हांकने वाला पंखा, छोटी टार्च ले कंधे पर गमछा रखे दांये हाथ मे तुलसी कृत श्री रामचरितमानस का गुटका लिये रामलीला के संग संग अपनी पोथी से लीला के रामायणियों के संग सुर मिलाता हुआ स्वयं बिना किसी भूमिका के पात्र बन जाते है। पात्रों का पीढ़ी - दर- पीढ़ी समर्पण, नेमी - प्रेमी जनों का श्रद्धा और भक्ति भाव, रामलीला प्रसंगों का मौलिक मंचन, संवाद अदायगी, लीला मंचन में सूक्ष्म तत्वों का भी समावेश ; ऐसे अनेकानेक चित्र नए दर्शकों के लिए कौतूहल और नेमी जनों के लिए श्रद्धा के सागर हैं । एक माह तक चलने वाली इस अद्भुत रामलीला में न केवल मंच पर ही अपितु नेपथ्य में भी मजबूत भूमिका अदा करने वाले ऐसे तमाम चरित्र हैं जो कई पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं।
रामनगर की रामलीला की एक सबसे अनूठी विशेषता इसकी चलायमान प्रदर्शन शैली है। आमतौर पर जहाँ एक नाटकीय प्रस्तुति में दर्शक एक स्थान पर बैठे रहते हैं, यहाँ पर दर्शक अभिनेता के साथ-साथ, अलग-अलग स्थानों पर जाते हैं, जहाँ-जहाँ दृश्य बदलते हैं। यह एक प्रकार की तीर्थयात्रा की तरह होता है, जहाँ दर्शक अभिनेताओं के साथ चलते हैं और दिन में कई किलोमीटर तक का सफ़र तय करते हैं।
रामनगर के विभिन्न स्थान रामायण की कथा के प्रमुख स्थलों का प्रतीक होते हैं। जैसे कि अशोक वाटिका, जहाँ सीता को रावण ने बंदी बनाकर रखा था, रामनगर के एक सुंदर उद्यान में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि राम और रावण के बीच का युद्ध एक विशाल मैदान में होता है—जहाँ घोड़े और रथ का प्रयोग किया जाता है, जिससे दृश्य और भी सजीव लगते हैं।
रामनगर की गलियाँ, घाट और खुले मैदान पौराणिक स्थलों में तब्दील हो जाते हैं और अभिनेता रामायण की कथा को जीवंत कर देते हैं। इन परिवर्तित स्थानों के साथ दर्शकों को भगवान राम की दुनिया में ले जाया जाता है। इस पूरी प्रस्तुति में कोई कृत्रिम प्रकाश या आधुनिक ध्वनि प्रणाली का उपयोग नहीं होता; इसकी जड़ें अपनी पुरानी शैली में बनी हुई हैं। मशालों और अभिनेता की प्रबल आवाज़ों से ही यह दर्शकों को बाँधकर रखता है।
इस पूरे अनुभव को और भी ख़ास बनाती है—काशी नरेश की उपस्थिति। काशी की पौराणिक मान्यताओं मे यह हरि हर का संयुक्त स्वरूप दर्शन है।काशी नरेश भगवान शिव के प्रतीकात्मक प्रतिनिधि के रूप में इस आयोजन की अध्यक्षता करते हैं। बोलिये राजा रामचंद्र की जय का उद्घोष करती भावविभोर जनता काशीनरेश को शिव स्वरूप अपने बीच पाते ही बनारस के परम्परागत हर हर महादेव का नारा लगाने से खुद को रोक नही पाती है। हर शाम, चाँदी के सिंहासन पर बैठकर काशी नरेश इस प्रदर्शन को देखते हैं, उनके साथ उनके दरबारी और पुजारी होते हैं। उनकी उपस्थिति इस आयोजन को एक दिव्य स्वीकृति प्रदान करती है, जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और भी बढ़ावा देती है।
सामुदायिक भागीदारी और परंपरा का संरक्षण
रामनगर की रामलीला की एक और विशिष्टता इसकी उच्च स्तर की सामुदायिक भागीदारी है। अधिकांश अभिनेता पेशेवर नहीं होते, बल्कि स्थानीय नागरिक होते हैं—किसान, दुकानदार और छात्र—जो अपनी भूमिका निभाने के लिए अपना समय और ऊर्जा समर्पित करते हैं। इन प्रतिभागियों में से कई ने अपनी भूमिकाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में पाई हैं और वे इसमें गर्व महसूस करते हैं। उनके लिए रामायण के किसी पात्र का अभिनय करना एक गहन आध्यात्मिक कार्य होता है, जो उन्हें अपने विश्वास और सांस्कृतिक धरोहर के क़रीब लाता है।
यह सामुदायिक भागीदारी केवल अभिनेताओं तक ही सीमित नहीं होती, बल्कि रामनगर के पूरे नगर में व्याप्त होती है।रामलीला में प्रदर्शन करने वाले कलाकार ज़्यादातर स्थानीय होते हैं और पेशेवर अभिनेता नहीं होते। ये लोग अपने धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के चलते इसमें भाग लेते हैं। हालाँकि यह आयोजन वैश्विक स्तर पर सम्मानित है, लेकिन कलाकारों को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें आर्थिक रूप से बहुत कम सहयोग मिलता है, जबकि वे कठोर प्रशिक्षण और महीनों की तैयारी में लगे रहते हैं। इसके कारण नई पीढ़ी के बीच इस परंपरा को जारी रखने में रुचि कम होती जा रही है, क्योंकि इसमें न तो उन्हें कोई पेशेवर अवसर मिलता है और न ही उचित आर्थिक लाभ। स्थानीय कारीगर सेट तैयार करने और पोशाकें बनाने में मेहनत करते हैं, जबकि निवासी आगंतुकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था करते हैं। इस आयोजन के दौरान पूरा नगर एकजुट होकर इसे सफल बनाने में योगदान देता है, जिससे यह लोगों की सामूहिक सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का प्रतिबिंब बनता है।
तेज़ी से आधुनिक हो रही दुनिया में, रामनगर की रामलीला ने व्यवसायीकरण और तकनीकी उन्नति के दबावों का विरोध करते हुए अपनी प्राचीनता को बनाए रखा है। यह आज भी उसी पारंपरिक ढंग से आयोजित होती है, जैसे सदियों पहले होती थी, जिसने इसकी प्रामाणिकता और पवित्रता को बनाए रखा है। हर साल यहाँ आने वाले हज़ारों दर्शक, जिनमें विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं, इस आयोजन की स्थायी लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्त्व का प्रमाण हैं।
रामनगर, वाराणसी की रामलीला आज भी एक भव्य सांस्कृतिक आयोजन के रूप में प्रसिद्ध है, जो अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। हालाँकि आधुनिकता का असर दिखने लगा है, फिर भी यह आयोजन अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और हर साल दुनिया भर से बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता है।
रामनगर की रामलीला को यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिली है, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और सम्मान में वृद्धि हुई है। 31 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन वाराणसी के सांस्कृतिक आकर्षणों में से एक है, जहाँ पूरे रामनगर को एक विशाल मंच में तब्दील कर दिया जाता है। विभिन्न स्थानों पर रामायण के दृश्य प्रस्तुत किए जाते हैं और इसमें स्थानीय लोग बड़ी आस्था के साथ शामिल होते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामनगर की रामलीला को पर्याप्त सम्मान प्राप्त है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या कलाकारों और आयोजकों को पर्याप्त समर्थन मिल रहा है? आधुनिकता ने इसमें कुछ बदलाव जैसे ध्वनि प्रणाली और न्यूनतम प्रकाश व्यवस्था को शामिल किया है, लेकिन परंपरा का मूल स्वरूप जस-का-तस बना हुआ है। फिर भी, कलाकारों और आयोजकों की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि उनके योगदान को सही पहचान मिले और यह परंपरा बिना किसी कठिनाई के आगे बढ़ती रहे। इसे ख़ासकर वित्तीय सहयोग और संस्थागत समर्थन की ज़रूरत है ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर भविष्य में भी फलती-फूलती रहे।
कुल मिलाकर, रामलीला को लेकर आधुनिक और पारंपरिक पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कलाकारों की बेहतरी और इस आयोजन की दीर्घकालिकता को सुनिश्चित करने के लिए अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
काशी, 20सितंबर2026, रविवार
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सोमवार, 14 सितंबर 2026

वाराणसी की बे-पटरी यातायात व्यवस्था.........../ व्योमवार्ता

  वाराणसी की बे-पटरी यातायात व्यवस्था...... 
                                             *व्योमेश चित्रवंश
        आज जब हम २१वीं सदी के तीसरे दशक में,२०२६ के धरातल पर खड़े हो कर काशी की यातायात व्यवस्था देखते हैं  तो स्पष्ट दिखता है कि विश्व की यह प्राचीनतम नगरी अपने  यातायात व्यवस्था के पूर्णतः पंगु हो जाने के एक अभूतपूर्व और अत्यंत वीभत्स संकट के मुहाने पर खड़ी है। हाल के वर्षों में, विशेषकर काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के ऐतिहासिक और भव्य कायाकल्प के बाद, वाराणसी में आने वाले देश-विदेशी तीर्थयात्रियों, आध्यात्मिक पर्यटकों और शोधकर्ताओं की संख्या में अप्रत्याशित रूप से कई सौ गुना की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां पहले सावन या विशेष त्योहारों पर ही भीड़ उमड़ती थी, वहीं अब प्रत्येक सामान्य सप्ताहांत पर शहर की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है। व्यवहारत: इस सांस्कृतिक और पर्यटन पुनर्जागरण का स्वागत किया जाना चाहिए और यह स्वागत हो भी रहा है  परंतु शहर का भौतिक और ढांचागत स्वरूप इस वैश्विक दबाव को संभालने में पूरी तरह अक्षम सिद्ध हो रहा है। काशी मूलतः अपनी संकरी गलियों, पारंपरिक मिश्रित भू-उपयोग वाले बाजारों और गंगा नदी के समानांतर विकसित बस्तियों के लिए जानी जाती है। जब इन प्राचीन और संकरी सड़कों पर आधुनिक, तीव्रगामी, भारी-भरकम चारपहिया वाहन और अनियंत्रित ई-रिक्शा का रेला उतरता है, तो पूरा शहर एक विशाल 'ओपन-एयर पार्किंग लॉट' में तब्दील हो जाता है।
             वाराणसी में जाम केवल सड़कों पर गाड़ियों के रुकने की घटना नहीं है; यह यहाँ के नागरिकों के मौलिक अधिकारों, उनके स्वास्थ्य, समय और शहर की आर्थिक उत्पादकता पर एक निरंतर होने वाला अदृश्य प्रहार है। एक कामकाजी पेशेवर, छात्र या व्यापारी जो कैंट स्टेशन से लंका या गोदौलिया जाना चाहता है, उसे महज ५ से ६ किलोमीटर की दूरी तय करने में औसतन १ से १.५ घंटे का समय गवाना पड़ता है। रोजाना लाखों मानव-घंटे चौराहों पर धुएं और हॉर्न के शोर के बीच नष्ट हो रहे हैं। चौराहों पर लगातार बजने वाले अनियंत्रित हॉर्न के कारण ध्वनि प्रदूषण सामान्य स्वीकृत डेसिबल सीमाओं से कहीं ऊपर पहुंच चुका है। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय दुकानदारों, यातायात पुलिसकर्मियों और दैनिक यात्रियों में उच्च रक्तचाप, चिड़चिड़ापन, बहरापन और क्रोनिक स्ट्रेस जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं। जाम में फंसे वाहनों के इंजनों से लगातार निकलने वाली जहरीली गैसें (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर शहर के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) को खतरनाक स्तर पर बनाए रखती हैं। यह जहरीला धुआं न केवल इंजनों की बर्बादी कर रहा है, बल्कि फेफड़ों को भी नुकसान पहुँचा रहा है। वाराणसी का बीएचयू  ट्रॉमा सेंटर पूर्वांचल, बिहार और नेपाल तक के मरीजों के लिए जीवनदायिनी माना जाता है। परंतु, जब कोई गंभीर एम्बुलेंस कैंट, लहरतारा या लंका के भीषण जाम में फंसती है, तो कई बार मरीज अस्पताल की दहलीज तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए एक गंभीर मानवाधिकार संकट है।
          वाराणसी की यातायात समस्या की जब भी समीक्षा की जाती है, तो अक्सर वाहनों और चौड़ी सड़कों पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है, परंतु इस पूरे संकट की एक सबसे मर्मांतक जड़ फुटपाथों का पूर्णतः लोप हो जाना  है। शहर के जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण योजना (जे एनएनआरयूएम) के समय से लेकर आधुनिक स्मार्ट सिटी योजनाओं में भी पैदल यात्रियों की अनदेखी हो रही है।
"फुटपाथ हमारा है" केवल एक प्रशासनिक स्लोगन बनकर रह गया है। कचहरी से अर्दली बाजार व भोजूबीर मार्ग हो या गोदौलिया-दशाश्वमेध मार्ग, यहाँ फुटपाथों पर पैदल चलने वालों के अलावा सब कुछ मिलता है। सच तो यह है कि शहर की अधिकांश पुरानी सड़कों के निर्माण के समय आधुनिक 'पेडस्ट्रियन पाथवे' का कोई विजन ही नहीं रखा गया। सड़कें तो चौड़ी की गईं, लेकिन पैदल चलने वालों के लिए एक इंच जगह नहीं छोड़ी गई। जहाँ प्रशासन ने फुटपाथ बनाए भी (जैसे वाराणसी स्मार्ट सिटी के तहत), वहां स्थानीय दुकानदारों ने अपनी दुकानों के काउंटर २ से ३ फीट आगे बढ़ाकर फुटपाथों को अपनी निजी जागीर बना लिया है। इसके आगे तीन चार फीट तक  दोपहिया वाहनों की अवैध पार्किंग फुटपाथ को पूरी तरह अवरुद्ध कर देती है। जब पैदल चलने वाले वृद्धों, महिलाओं, बच्चों और पर्यटकों के लिए चलने की कोई सुरक्षित जगह नहीं बचती, तो वे अपनी जान हथेली पर रखकर मुख्य सड़क पर वाहनों के बीच चलने को मजबूर होते हैं। इससे सड़क का 'कैरिज-वे' (वाहनों के चलने की जगह) स्वतः संकरा हो जाता है और पूरी सड़क की गति १० किमी/घंटा से भी कम हो जाती है।
        बनारस के अधिकांश प्रमुख बाजार—जैसे दालमंडी, हनुमानगंज, चौक, लंका, और रथयात्रा—दशकों पुराने हैं। इन बाजारों का विकास उस दौर में हुआ था जब परिवहन का मुख्य साधन बैलगाड़ी, इक्का, साइकिल या पैदल चलना था। परंतु वर्तमान में, इन्हीं संकरे बाजारों में बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, बड़े मॉल, डायग्नोस्टिक सेंटर्स और अस्पताल धड़ल्ले से खोल दिए गए हैं। इनमें से ८०% से अधिक व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पास अपनी कोई बेसमेंट या समर्पित पार्किंग व्यवस्था नहीं है। यदि कहीं कागजों पर बेसमेंट पार्किंग दिखाई भी गई है, तो बिल्डरों और व्यापारियों ने स्थानीय प्राधिकरणों से सांठगांठ कर उस पार्किंग स्पेस को गोदाम, दुकान या रेस्टोरेंट में तब्दील कर दिया है। परिणामस्वरूप, इन दुकानों या अस्पतालों में आने वाले ग्राहकों और मरीजों के वाहन (दोपहिया और चारपहिया दोनों) सीधे फुटपाथों और मुख्य सड़क पर पार्क करा दिए जाते हैं। जब एक व्यस्त चार-लेन की सड़क के दोनों ओर गाड़ियां खड़ी हो जाती हैं, तो वह प्रभावी रूप से केवल एक-लेन या दो-लेन की सड़क बनकर रह जाती है, जिससे 'बॉटलनेक'  की स्थिति पैदा होती है।
               वाराणसी में शहर के मौलिक स्वभाव के अनुरूप यातायात नियमों के प्रति सम्मान और भय का स्तर लगभग शून्य दिखाई देता है। यहाँ गाड़ियां सड़कों पर बनी सफेद पट्टियों  के अनुसार नहीं, बल्कि जहां थोड़ी सी भी जगह दिखे, वहां गाड़ी घुसा देने की प्रवृत्ति से चलती हैं। चंद मीटर की दूरी या यू-टर्न बचाने के चक्कर में भारी वाहन, मोटरसाइकिल और विशेष रूप से ई-रिक्शा मुख्य सड़क पर सामने से आ रहे ट्रैफिक के विपरीत दिशा में तेज गति से चलते हैं। रोजगार के नाम पर विशेषकर कोरोना के बाद शहर में हजारों की संख्या में अनाधिकृत और अपंजीकृत ई-रिक्शा सड़कों पर उतार दिए गए हैं। सवारी देखते ही ये  बिना कोई सिग्नल दिये सड़क के ठीक बीच में या चौराहों के मोड़ों पर अचानक ब्रेक लगा देते हैं, जिससे पीछे आ रहा पूरा ट्रैफिक ठप हो जाता है।
         वाराणसी जैसे अत्यधिक धार्मिक और संवेदनशील शहर में 'आस्था की आड़ में अतिक्रमण' एक ऐसा कड़वा सच है जिस पर सार्वजनिक मंचों पर बात करने से अक्सर प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर बचा जाता है। भारत में धार्मिक भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं कि कानून तोड़ने वाले तत्व इसे एक 'सुरक्षा कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यस्त चौराहे या फुटपाथ पर चाय या पान की दुकान खोलता है, तो नगर निगम का दस्ता उसे अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत तुरंत ध्वस्त कर सकता है। परंतु, यदि उसी स्थान पर किसी पेड़ के नीचे चुपके से एक छोटा सा चबूतरा बनाकर कोई धार्मिक प्रतिमा स्थापित कर दी जाए, या किसी पुरानी संरचना पर चादर चढ़ाकर उसे मजार का रूप दे दिया जाए, तो स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। जैसे ही किसी संरचना के साथ 'धर्म' का नाम जुड़ता है, स्थानीय प्रशासन कानून-व्यवस्था बिगड़ने, सांप्रदायिक तनाव फैलने या धार्मिक भावनाओं के आहत होने के डर से बैकफुट पर आ जाता है। धीरे-धीरे उस छोटे से चबूतरे के चारों ओर लोहे की ग्रिल लग जाती है, फिर एक पक्का कमरा बन जाता है, और उसके बाद उस धार्मिक स्थल की सेवा या सुरक्षा के नाम पर उसके आस-पास फुटपाथों को घेरकर फूल-प्रसाद, चादर, या मजहबी किताबों की दुकानें सज जाती हैं। यह व्यावसायिक विस्तार अंततः एक बड़े और स्थायी जाम का केंद्र बन जाता है।
वाराणसी में ऐसे कई क्षेत्र रहे हैं जहाँ विकास और सुगम यातायात के मार्ग में धार्मिक अतिक्रमण एक बड़ी बाधा बनकर उभरा, परंतु हाल के वर्षों में कुछ कड़े प्रशासनिक और विधिक कदम भी देखने को मिले हैं। काशी विश्वनाथ धाम के ठीक बगल में स्थित दालमंडी बाजार अपनी संकरी गलियों और सघन आबादी के लिए जाना जाता है। यहाँ सड़कों और फुटपाथों की चौड़ाई इतनी कम हो चुकी थी कि पैदल चलना भी दूभर था। सरकार ने शहर के इस कोर एरिया को जाम-मुक्त करने के लिए ₹२२२ करोड़ की दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण परियोजना शुरू की। इस परियोजना के तहत सड़कों को १७.५ मीटर तक चौड़ा किया जाना था, जिसके दायरे में लगभग १४६ अवैध और आंशिक ढांचे आ रहे थे। प्रशासन ने विधिक प्रक्रियाओं के तहत इन अतिक्रमणों को हटाने की कार्रवाई शुरू की, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी हरी झंडी दी। इसी तरह काशी रेलवे स्टेशन को एक वैश्विक स्तर के 'इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट हब' के रूप में विकसित करने की योजना पर रेलवे की अधिग्रहित और स्वामित्व वाली भूमि पर खड़े अवैध कब्जों को हटाया गया। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता  और एक अच्छी बात यह थी कि यह पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और निष्पक्ष था। जहां एक ओर रेलवे की जमीन पर अनधिकृत रूप से बनी संरचनाओं (मजार का अवैध हिस्सा) को ध्वस्त किया गया, वहीं उसी कॉरिडोर के मार्ग में आने वाले अवैध हनुमान मंदिर को भी पूरी विधिक प्रक्रिया और नोटिस के बाद शांतिपूर्ण ढंग से हटाया या स्थानांतरित किया गया।
वाराणसी मे यातायात और जाम की समस्या का सबसे दुखद और विरोधाभासी पहलू यह है कि जो पुलिस विभाग, प्रशासनिक अमला और विधिक बिरादरी सड़कों व फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए कानूनन बाध्य है, उसके स्वयं के पैर सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से जमे हुए हैं। वाराणसी में पुलिस द्वारा थाना और पुलिस चौकी बनाने के नाम पर तथा वकीलों व मुवक्किलों द्वारा कचहरी के बाहर बेतरतीब वाहनों की कतारें लगाने के नाम पर फुटपाथों और सड़कों का भीषण अतिक्रमण किया गया है। यह एक ऐसी प्रशासनिक विडंबना है जहाँ कानून के रक्षक (पुलिस) और कानून के पैरोकार (अधिवक्ता) स्वयं कानून का उल्लंघन करते हुए प्रतीत होते हैं। सोचने वाली बात यह है कि जब मुख्य सड़कों और फुटपाथों पर ही पुलिस का पक्का ढांचा और वकीलों की गाड़ियों का अवैध स्टैंड खड़ा हो, तो प्रशासन किसी आम रेहड़ी-पट्टी वाले को अतिक्रमण हटाने की नैतिक या कानूनी हिदायत किस मुंह से दे सकता है? वाराणसी का प्रशासनिक, पुलिस और न्यायिक मुख्यालय क्षेत्र कचहरी  प्रशासनिक अव्यवस्था और संगठित अतिक्रमण का सबसे बड़ा उदाहरण है।  शासन द्वारा कचहरी के ठीक पास करोड़ों रुपये की लागत से आधुनिक मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण कराया गया है, ताकि सड़कें खाली रह सकें। परंतु, वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। न्यायालय आने वाले अधिकांश अधिवक्ता, मुवक्किल और अन्य लोग पार्किंग शुल्क बचाने या थोड़ी सी पैदल दूरी से बचने के लिए अपने वाहनों को मल्टी-लेवल पार्किंग में पार्क करने की जगह सीधे मुख्य सड़क और फुटपाथ पर खड़ा कर देते हैं। इसके अलावा, फुटपाथों पर चाय पान की दुकानें, कचहरी मे जिलापंचायत मार्ग पर नोटरी वकीलों के तख्त, कुर्सियां और टाइपिस्टों के अवैध केबिन स्थायी रूप से काबिज हैं। सर्किट हाउस से लेकर कलेक्ट्रेट गेट तक वाहनों की दो-दो, तीन-तीन कतारें लग जाती हैं। वकीलों के संगठित एकता के रसूख और प्रभाव के कारण कोई भी जूनियर ट्रैफिक पुलिसकर्मी या नगर निगम का दस्ता इन गाड़ियों को टो  करने या उन पर चालान काटने का साहस नहीं जुटा पाता। इसके चलते एक शानदार चौड़ी सड़क और उसका फुटपाथ प्रभावी रूप से महज ६ से ८ फीट के 'सिंगल-लेन बॉटलनेक' में तब्दील हो गया है। कचहरी के साथ-साथ पुलिस अवसंरचना ने भी शहर के मुख्य चौराहों, फुटपाथों और रास्तों का गला घोंट रखा है। भेलूपुर  थाने की मुख्य इमारत का एक हिस्सा, उसकी बाउंड्री वॉल और थाने के ठीक बाहर सड़क व फुटपाथ पर खड़े किए गए वाहन'  मुख्य मार्ग की चौड़ाई को ४०% तक कम कर देते हैं। इसी तरह चेतगंज थाने के सामने सड़क पर आगेबारह फीट तक बढ़ कर बनाये गये बाउंड्रीवाल पुलिस की गाड़ियों की बेतरतीब पार्किंग, सुरक्षा के नाम पर सड़कों और फुटपाथों पर स्थायी रूप से लगाए गए भारी लोहे के बैरिकेड्स के कारण राहगीरों का चलना असंभव हो जाता है।सिगरा थाने के विस्तार, वहां खड़ी रहने वाली वज्र वाहन, पुलिस क्रेन और विभिन्न मामलों में जब्त किए गए ट्रकों व कारों के कारण सड़क का बायां लेन और फुटपाथ पूरी तरह से एक 'कबाड़खाने' में तब्दील हो चुका है।कचहरी, तेलियाबाग, लहुराबीर और गिलटबाजार की पुलिस चौकियां किसी विशाल सरकारी भूखंड पर नहीं, बल्कि चौराहों के बिल्कुल मुहाने पर, त्रिकोणीय मोड़ों  पर या फुटपाथों को काटकर बनाई गई हैं। इन चौकियों के पक्के निर्माण और उनके बाहर सुरक्षा के नाम पर घेरे गए क्षेत्र के कारण वाहनों का टर्निंग रेडियस  और पैदल यात्रियों का रास्ता पूरी तरह खत्म हो जाता है।
मजेदार तो यह है कि  उच्च एवं उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय भी भोले बाबा के नगरी मे नजीर नही बनते बल्कि वे केवल कागजों के बस्ते में बंद हो कहीं पड़े रहते हैं।
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम स्टेट ऑफ गुजरात (२००९) के  ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को सख्त आदेश जारी किया था कि सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों, गलियों और सार्वजनिक पार्कों में किसी भी नए धार्मिक ढांचे के निर्माण की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाएगी। इसी तरह ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (१९८५) के निर्णय मे सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि संविधान के अनुच्छेद २१ (जीवन का अधिकार) के तहत फुटपाथों और सड़कों का प्राथमिक और एकमात्र उद्देश्य पैदल यात्रियों और वाहनों का आवागमन है। किसी भी व्यक्ति, संस्था, बार एसोसिएशन या सरकारी विभाग को इस सार्वजनिक स्थान पर कब्जा करने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
अवैध धार्मिक ढांचों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) ने कड़ा रूख अपनाते हुये 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों पर निर्मित सभी अवैध ढांचों को बिना किसी देरी के हटाया जाए। न्यायालय ने कहा था कि सार्वजनिक मार्ग को अवरुद्ध करना साक्षात अधर्म है।सरकारी और पुलिस अतिक्रमण पर  भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट विधिक सिद्धांत दिया है कि "सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में पुलिस स्वयं कानून का उल्लंघन नहीं कर सकती।" यदि किसी थाने या चौकी के कारण सार्वजनिक यातायात या फुटपाथ बाधित हो रहा है, तो राज्य सरकार का यह कर्तव्य है कि वह उसे तुरंत किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित करे। परंतु ये सभी नजारे बनारस मे केवल कानून की मोटी किताबों मे दर्ज है
           आज वाराणसी को इस बहुआयामी यातायात नरक से बाहर निकालने के लिए एक सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, आधुनिक तकनीक  और विधिक कड़ेपन से युक्त एक दीर्घकालिक महा-योजना  की आवश्यकता है, जिसे केवल निर्माण ही नही बल्कि सख्त ढंग से  क्रियान्वित किया जाना चाहिए। जैसे  फुटपाथ हमारा है या 'राइट टू वॉक' का क्रियान्वयन करते हुये शहर की सभी मुख्य सड़कों के दोनों तरफ आधुनिक, ऊंचे और बाधा-मुक्त फुटपाथों का निर्माण अनिवार्य किया जाए। फुटपाथों पर चढ़ने के लिए दिव्यांगों हेतु रैंप बनाए जाएं और वाहनों के प्रवेश को रोकने के लिए 'बोलार्ड्स' लगाए जाएं। जो दुकानदार फुटपाथ पर अपना सामान फैलाते हैं, उनका लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए। रेहड़ी-पटरी और ठेले वालों के लिए मुख्य सड़क से दूर समर्पित 'स्मार्ट वेंडिंग जोन' विकसित किए जाएं। कचहरी क्षेत्र के लिए विशेष 'विधिक प्रवर्तन' करते हुये सर्किट हाउस से लेकर कलेक्ट्रेट और जिला न्यायालय के गेट तक की पूरी सड़क और फुटपाथ को 'जीरो टॉलरेंस नो-पार्किंग ज़ोन' घोषित किया जाए। मल्टी-लेवल पार्किंग का उपयोग अनिवार्य हो और सड़क पर खड़ी किसी भी गाड़ी पर (चाहे उस पर 'अधिवक्ता' या 'पुलिस' 'प्रेस' ही क्यों न लिखा हो) भारी आर्थिक जुर्माना लगाया जाए। भेलूपुर, सिगरा और चेतगंज जैसे थानों को वर्तमान सड़क मार्ग से हटाकर, उनके नजदीक ही किसी सरकारी या नजूल भूमि पर बहुमंजिला 'वर्टिकल पुलिस स्टेशन' भवनों में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। इसी तरह चौराहों के मुहाने पर बनी कंक्रीट की चौकियों (जैसे कचहरी, लहुराबीर, मैदागिन, गिलटबाजार, तेलियाबाग) को तुरंत ध्वस्त किया जाना चाहिए। उनकी जगह चौराहों से दूर, कम जगह घेरने वाले फाइबर या स्टील के प्रीफैब्रिकेटेड कियोस्क स्थापित किए जाएं। थानों के बाहर कबाड़ बन रही गाड़ियों को तुरंत हटाने के लिए शहर के बाहरी हिस्से (जैसे मुख्य रिंग रोड के पास) एक विशाल केन्द्रीय डंपिंग यार्ड बनाया जाए। शहर के अंदरूनी व व्यस्त व्यापारिक इलाकों में माल ढोने वाले भारी और मध्यम कमर्शियल वाहनों का प्रवेश दिन के समय पूरी तरह प्रतिबंधित हो। बाजारों में माल की लोडिंग और अनलोडिंग केवल रात ११:०० बजे से सुबह ६:०० बजे के बीच ही सुनिश्चित की जाए। फोटो आटो को निश्चित मात्रा मे परमिट देकर उन्हे क्षेत्रवार विभाजित व वर्गीकृत किया जाय। शहर मे वाहनों के भारी भीड़ को कम करने के लिये सार्वजनिक समयबद्ध नगर बसें संचालित हों। तब शायद हम बनारस के सड़कों पर अनायास भीड़ धक्का मुक्की और जाम की समस्या से हम कुछ हदलतक निजात पा सकेगें।
विकास की इस तीव्र दौड़ में काशी की प्राचीनता, उसके हेरिटेज और उसकी आत्मा को बचाते हुए उसे एक आधुनिक, सुगम और प्रदूषण-मुक्त बुनियादी ढांचा प्रदान करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी पुकार है। यातायात और जाम की इस वीभत्स समस्या का समाधान केवल सिविल इंजीनियरिंग से नहीं होगा। इसके लिए सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, न्यायपालिका के आदेशों का बिना किसी तुष्टिकरण या पद-रसूख के कड़ाई से जमीनी क्रियान्वयन, फुटपाथों की पूर्ण बहाली और नागरिकों के भीतर एक जिम्मेदार नागरिक बोध का जाग्रत होना अनिवार्य है। जब कानून के रक्षक (पुलिस), कानून के पैरोकार (अधिवक्ता) और आस्था के साधक (जनता) तीनों मिलकर सड़कों और फुटपाथों का सम्मान करेंगे, तभी इस 'आनंद कानन' की वास्तविक सुंदरता और उसका वैश्विक गौरव अक्षुण्ण रह सकेगा।
काशी, 13सितंबर 2026, http://chitravansh.blogspot.com

रविवार, 31 अगस्त 2025

बनारस बाढ़ में.....(बनारस पर कविताएँ-6)

बनारस पर कविताएँ(6)

बनारस बाढ़ में,
अखबारों में छपी है ढेर सारी तस्वीरें
खबरों सहित
घुटने और कमर तक पानी में,
नाव से बस्ती राहत सामग्री
बाढ़ शिविरों में मुस्कराते
समाजसेवी व राजनेता
टूट गये है गंगाघाटें के
आपस के संपर्क और संबंध
ऊपर की ओर सरक औ सिमट गये है
सुबहे बनारस और गंगा आरती स्थल
पहुंच गई है वरुणा उन इलाकों में
जिन्हे वह बहुत पहले छोड़ आई थी
बहुत सी आँखों मे सवाल दिखते है
डूब क्षेत्र में घर बनाने को किसने कहा था
तब नगर निगम और विकास प्राधिकरण कहाँ थे
क्यों परेशान होते हैं लोग हर साल
सब कुछ जान बूझ कर भी
पर मै देख रहा हूं
घर के आंगन मे आये बाढ़ के पानी में
अपनी देहरी पर आरती करती
घाट के ठीक ऊपर रहने वाली
मां गंगा और काशी की आस्थावान
बुढी माई को
जिसके लिये बाढ़ विभिषिका नही
गंगा मैया का शुभागमन है
उसके छोटे से पुराने घर में
बाढ़ के इन दोनो दृश्यों को देख
मै हैरान परेशान हूं
सच और सत के मध्य
रेखा परिभाषित करने में
आस्था और विभिषिका
दो रुप है सोच के
शिव के उग्र व कल्याण के
प्रश्न हम से है
उत्तर भी हमी से
काशी के विविध रंग में
हमारी समस्याओ और
हमारी आस्था के.....

-व्योमेश चित्रवंश; ३०अगस्त २०२५

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

काशी विश्वनाथधाम का स्थापना संघर्ष

ये कहानी है अहल्या बाई होल्कर और श्रीकाशी विश्वनाथ की….. इसी कहानी में मोदी और श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के विरोध का रहस्य छिपा है……..

विरोध केवल मोदी का ही नहीं हो रहा है और विरोध पहली बार ही हो रहा है ऐसा भी नहीं है।विरोध तो श्रीमंत मल्हार राव होल्कर और मातोश्री अहल्याबाई होल्कर का भी हुआ था। 

बुरा लग सकता है लेकिन आज लिखना आवश्यक है: 1735 में बाजीराव पेशवा की माँ राधाबाई तीर्थयात्रा पर काशी आईं।उनके लौटने के पश्चात ‘काशी के कलंक’ को मिटा देने के संकल्प के साथ पेशवा बाज़ीराव के सेनापति मल्हार राव होल्कर 1742 में गंगा के मैदानों में आगे बढ़ रहे थे। उस समय पेशवाओं की विजय पताका चहुँओर लहरा रही थी।काशी विश्वनाथ के मन्दिर की मुक्ति सुनिश्चित थी। 27 जून 1742 को मल्हार राव होल्कर जौनपुर तक आ चुके थे। उस समय काशी के कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोग उनके पास पहुँच गए और कहा कि “आप तो मस्जिद को तोड़ देंगे लेकिन आप के चले जाने के बाद मुसलमानों से हमारी रक्षा कौन करेगा।” इस तरह बाबा की मुक्ति के बजाय स्वयं की सुरक्षा को ऊपर रखने वाले काशी के कुछ धूर्तों ने उन्हें वापस लौटा दिया। बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की पुनर्स्थापना होती होती रह गई। मल्हार राव होल्कर लौट तो गए लेकिन उनके मन में कसक बनी रही। वही कसक और पीड़ा श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर से उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर को स्थानान्तरित हुई।

अहल्याबाई के लिए उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ही प्रेरणा थे क्योंकि अहल्याबाई का जन्म किसी राजघराने में नहीं हुआ था। उनके पिता एक गाँव के सरपंच मात्र थे। एक दिन कुमारिका अहल्या मंदिर में सेवा कर रही थी। भजन गाती और गरीबों को भोजन कराती अहल्याबाई के उच्च कोटि के संस्कारों को मालवा के अधिपति मल्हारराव होल्कर ने देखा। उसी समय उन्होंने तय कर लिया कि अहल्य ही उनके बेटे खाण्डेराव की पत्नी बनेंगी। वर्ष 1733 में अहल्याबाई का विवाह खाण्डेराव होल्कर से हो गया। अहल्याबाई की आयु 8 वर्ष थी। खाण्डेराव अहल्याबाई से 2 साल बड़े थे।

सन 1754 में एक युद्ध के दौरान खाण्डेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। अहल्याबाई के जीवन में अंधेरा छा गया। अहल्याबाई सती हो जाना चाहती थी किन्तु मल्हार राव ने अहल्याबाई को न केवल सती होने से रोका बल्कि मानसिक तौर पर उन्हें मजबूत भी किया। शासन सञ्चालन के सूत्रों का प्रशिक्षण देकर मालवा का शासन सम्भालने के लिए तैयार किया। 1766 में मल्हार राव के मृत्योपरांत अहल्याबाई होल्कर ने मालवा का शासन अपने हाथों में ले लिया।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर महारानी अहल्याबाई होल्कर की अमूल्य कीर्ति है। काशी के लिए अहल्याबाई होल्कर का क्या योगदान है। इसे इतिहास का अवलोकन किए बिना नहीं समझा जा सकता।

आनन्दवन काशी को पहला आघात 1194 में लगा था। जब मोहम्मद गोरी के सिपहसलार क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ समेत यहाँ के प्रमुख मंदिरों को तोड़ दिया। बाद के कालखण्डों में हुसैन शाह सिरकी (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) ने काशी विश्वनाथ और काशी के अन्य प्रमुख मंदिरों को तोड़ा। बार-बार काशी पर इस्लामिक हमलावर आघात करते रहे लेकिन शिवनगरी काशी पुनः पुनः हिन्दुत्व के अमृततत्व से सँवरती रही।

अकबर के कालखण्ड में काशी के जगतप्रसिद्ध धर्मगुरु पण्डित नारायण भट्ट की प्रेरणा से राजा टोडरमल ने 1585 में पुनः काशी विश्वनाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। हालाँकि इसमें अकबर का कोई योगदान नहीं था। यह बात इसलिए लिखनी पड़ रही है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने एक लेख में लिखा था और अभी फिर से लिखा है कि विश्वनाथ मंदिर के लिए अकबर ने धन दिया था।यह सच नहीं है। इसी मन्दिर को औरंगज़ेब के 18 अप्रेल 1669 के फ़रमान से तोड़ दिया गया। मन्दिर के ध्वस्त अवशेषों से ही उसी स्थान पर वर्तमान मस्जिद खड़ी कर दी गयी। पीछे की तरफ मन्दिर का कुछ हिस्सा छोड़ दिया गया ताकि इसे देख कर ग्लानि से हिन्दु रोते रहें।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर ध्वस्त कर दिया गया था लेकिन 1669 से ही भग्नावशेष एवं स्थान की पूजा चलती रही। मुक्ति के विभिन्न प्रयास भी चलते रहे। 

मंदिर का पुनर्निर्माण और भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा करना समस्त राजा महाराजाओं और संतों के सामने प्रश्नचिह्न बना हुआ था। काशी के तीर्थपुरोहितों की बहियों से ऐसा ज्ञात होता है कि 1676 ई. में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी आए थे। इन दोनों राजाओं ने मंदिर निर्माण की पहल तो की लेकिन सफल नहीं हो पाये। उन्होंने विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित अवश्य किया। इसी क्रम में मराठों के मंत्री नाना फड़नवीस के प्रयास भी असफल रहे। 1750 में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह ने परिसर की पूरी ज़मीन ख़रीद कर विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की योजना बनायी जो कि परवान नहीं चढ़ सकी। 7 अगस्त 1770 को महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था।यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

इतने असफल प्रयासों के पश्चात अहल्याबाई होलकर को सफलता प्राप्त हुई। अहल्याबाई ने वह करके दिखा दिया जिसे समस्त हिन्दू राजा 111 वर्षों में नहीं कर सके थे। अहल्याबाई के प्रयासों से 1777 से प्रारंभ होकर 1781 ई. में वर्तमान मंदिर का निर्माण मूल स्थान से दक्षिण की दिशा में थोड़ा हटकर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ।

महारानी अहल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के साथ-साथ जो भी धार्मिक स्थल भग्नावस्था में थे, उन सभी को शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ पुर्नस्थापित करवाया। वहाँ पूजा-पाठ नित्य होता रहे, इसकी व्यवस्था भी राजकीय कोष से करवायी।

किन्तु काशी ने उस समय भी महारानी का साथ नहीं दिया था। शिवलिंग की प्रतिष्ठा के लिए महारानी को माहेश्वर से पण्डितों बुलवाना पड़ा था। मन्दिर के लिए नित्य पुजारी को लेकर भी समस्या आयी। काशी का कोई ब्राह्मण पुजारी के पद पर कार्य करने को तैयार नहीं था। इसलिए काशी विश्वनाथ का पहला पुजारी तारापुर के एक भूमिहार ब्राह्मण को बनाया गया। ये प्रमाण आज भी इन्दौर के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं। 

मल्हार राव को मार्ग से भटकाने वाले और अहल्याबाई का साथ न देने वालों धूर्तों के वंशज आज भी काशी में ही हैं। यही लोग वर्तमान में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का विरोध कर रहे हैं। 

294 वर्षों के बाद नरेन्द्र मोदी ने अहल्याबाईके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ा कर उन्हें सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है। नए परिसर में मातोश्री की प्रतिमा स्थापित कर उनकी कीर्ति को सदैव के लिए अक्षय कर दिया है। तीन हज़ार वर्गफीट में सिमटा मन्दिर आज पाँच लाख वर्ग फ़ीट के भव्य परिसर में विस्तार ले चुका है। काशी की छाती पर खड़ा हुआ ‘कलंक’ एक कोने में सिमट चुका है। विश्व के नाथ को गलियों में सिमटा देख कर हृदय में ग्लानि लिए सदियों से रोता हिन्दू आज धाम के विस्तारीकरण से प्रफुल्लित है।गजवा-ए-हिंद का सपना देखने वाले मुग़लों के वंशजों को भी अब विश्वनाथ धाम के दरवाज़े से ही प्रवेश लेना होगा। नरेन्द्र मोदी अपना कार्य कर चुके। अब बचे हुए कार्य को पूरा करने की ज़िम्मेदारी हिन्दू समाज के कन्धों पर है।
(बनारस, 16दिसंबर 2021, गुरूवार)
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गुरुवार, 26 मार्च 2020

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन

व्योमवार्ता/ नवरात्रि का दूसरा दिन और दशराजन : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020 गुरूवार

                       नवरात्रि के दूसरे दिन व कोरोनावाईरस के लाकडाऊन के तीसरे दिन  घर मे पड़े पड़े हमने अशोक के. बैंकर की लिखी किताब “दशराजन” पढ़ा। इस किताब ने मुझे उतना प्रभावित नही किया,हॉलाकि रोचक लेखन,कहानी और पात्र.अशोक के. बैंकर ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस पूरी कहानी को पेश किया है. इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमारे प्राचीन इतिहास का अंश है,ये कहानी ऋगवेद से ली गयी है.
      ये कहानी है ३४०० ई. पू. की,जहां एक कबीले के राजा ने अपनी प्रजा और कबीले की रक्षा के लिए अपनी छोटी सी सेना के साथ दस राजाओं और उनकी विशाल सेना का सामना किया था. उस वक़्त कबीले के मुखिया सुदास के पास कोई बाहरी मदद नहीं थी बल्कि उसे एक योजनाबद्ध तरीके से घेरा गया था.अपने पांच नदियों वाले कबीले की रक्षा के लिए सुदास ने हर संभव रणनीति का प्रयोग किया और अपने कबीले की रक्षा की. ये पांच नदियों वाला कबीला आज पंजाब के नाम से जाना जाता है.

केवल एक दिन में सभी आक्रमणकारियों के अंत के साथ ख़त्म हुए इस युद्ध को अशोक के. बैंकर ने बखूबी उतारा है.अघोषित युद्ध,एक साथ आक्रमण और सुदास की रणनीति,उसके सहायकों का साथ,गुरु का साथ से लेकर युद्ध की एक-एक घटना का इतना अच्छा वर्णन है कि आपके सामने पूरा चित्र उतर आता है.नायक सुदास अपने कबीले के हर इंसान यहाँ तक की पशु से भी प्रेम करता है,अपमान की स्थिति में भी संयम बनाये रखता है..शायद यही कारण हो सकता है कि खुद को विशाल शत्रु सेना से घिरा हुआ पाने के बाद भी वो समर्पण की बजाय सामना करने का निर्णय लेता है.
      ललस संभवतः प्राच्य इतिहास के बारे मे ज्यादा जानकारी न होने व रोचक अनुवाद न होने के कारण कथानक थोड़ा  धीमा व ऊबाऊ लगी। इतिहास मे कल्पना को शामिल करते हुये आजकल पुरा संस्कृति व इतिहास पर जो उपन्यास लेखन किया जा रहा है उनके लेखकों मे  अशोक के बैंकर का प्रमुख स्थान है उन्होंने प्रयास भी किया है कि ऐतिहासिक उपन्यासों की भॉति संवाद वर्णन और विवरणात्मक संबंध से वह ऐतिहासिक कालखण्ड व पात्र पाठक के मन मानस मे सजीव हो सके। संभवतः बहुत से पाठकों के लिये लेखक का यह प्रयास अद्वितीय व अद्भुत रहा हो और उनको बांधने मे सक्षम रहा हो । हमारे भारत का इतिहास न जाने ऐसी कितनी कही और कितनी अनकही कहानियों को समेटे खड़ा है, जो हमारे लिये ढेर सारी कल्पनाये , मिथक,  व संबंधों के तालमेल का मिश्रण लिये लेखन का बढ़िया मसाला व गारा चूना बन सकता है। दशराजन इसी तालमेल का सुंदर उदाहरण कहा जा सकता है। जो समय बिताने के लिये उपयोगी माना जा सकता है।
        बहरहाल, एक बार पुन: धन्यवाद मित्र राजीव अष्ठाना Rajeeva Kumar Asthana को, इस लाकडाऊन के वर्तमान कालखण्ड मे सोशल डिस्टेंशिंग आईसोलेशन के तीसरे दिन के लिये अपने लाईब्रेरी से पुस्तक भेंजने के लिये।
(बनारस,२६मार्च २०२०, गुरूवार)
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व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

व्योमवार्ता/नवरात्रि का पहला दिन और भगवान परशुराम : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 26मार्च 2020, गुरूवार

           बासंतिक नवरात्रि संवत २०७७ वि० के पहले दिन 25मार्च 2020 बुधवार, विश्वव्यापी महामारी कोरोना के चलते देशव्यापी लाकडाऊन मे आज कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की सुप्रसिद्ध कृति भगवान परशुराम को पढ़ कर बस अभी समाप्त किया। ईषा से लगभग १५५० वर्ष पूर्व के कथानक मे आर्यावर्त मे आर्य धर्म के संस्थापन संवर्धन , शुद्धिकरण ,व्यापकता और संस्कार-संस्थापन के पृष्ठभूमि मे हमारे पौराणिक युगपुरूष कालजयी महानायक भगवान परशुराम के व्यक्तित्व पर आधारित यह उपन्यास पौराणिक इतिहास का बोध कराता है। आर्य संस्कृति के ऊषाकाल मे सरस्वती और हपद्वति नदियों के बीच फैले आर्यावर्त मे यदु और पुरू, भरत औरतुत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थी और वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरूषों के आश्रमों मे गुंजरित दिव्य ऋचाये, आर्यधर्म का नियमन व संस्थापन कर रही थी परन्तु दूसरी ओर संपूर्ण आर्यावर्त, नर्मदा से लेकर मथुरा तक अनूप प्रदेश मे शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोहममर्षक अत्याचारों से त्रस्त था।ऐसे मे युवा भार्गव परशुराम हैहयराज  की प्रचंडता को चुनौती देते हुये अपनी आर्यनिष्ठ तेजस्विता, संगठन क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के द्वारा  आर्य संस्कृति के ध्वस्त करने के उसके सपनों को ध्वस्त करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के एक वर्ष पूर्व अप्रैल १९४६ मे प्रकाशित प्रशिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद श्री के एम मुंशी की यह पुस्तक पढ़ते हुये आज भी अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती है।
हमे तो इस कोरोना लाकडाऊन पीरियेड मे इस पुस्तक को पढ़ते हुये धर्म, कर्तव्य, साहस और रणनीति के संदर्भ मे कई कई बार आजकल के दौर मे सड़क पर न निकलने, स्वयं को नियंत्रित करने व अदृश्य कोरोना वाइरस से प्रतिरोध करने की अपनी सरकार की नीतियों को समीचीन व्याख्या व नई परिभाषा मिल रही थी। धन्यवाद मित्र राजीव अस्थाना Rajeeva Kumar Asthana जी को एक अच्छी पुस्तक पढवाने के लिये।
(बनारस,26मार्च 2020,गुरूवार,12.37पूर्वाह्न)
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष ।

व्योमवार्ता/कोविड 19 के खौफ से लाकडाऊन का सकारात्मक पक्ष । व्योमेश चित्रवंश की डायरी,2४ मार्च २०२०, मंगलवार

अपनी मनपसंद दो किताबो को कल देर रात दुबारा पढ कर समाप्त किया। डेल कार्नेगी की किताब पिछली सदी मे 1993 मे खरीद कर पढ़ने के बाद आलमारी में रखी शोभायमान बन गई थी, हालॉकि उसके सिद्धान्त आज भी मेरे व्यवहार मे है। जबकि स्यालकोट सागा 2016 मे आते ही खरीद कर दो दिन तक लगातार पढ़ते हुये मिले रोमांच भरे एहसास के बाद कई लोगों को पढ़वाने के बाद रख दिया था।
जब सब कुछ लाकडाऊन है ऐसे मे खुद को व्यस्त रहने  का मेरे लिये एकमात्र तरीका किताबें पढ़ना ही है। आज  बड़े भाई मित्र राजीवअस्थाना Rajeeva Kumar Asthana वकील साहब ने के एम मुंशी की भगवान परशुराम और अशोक के बैंकर की दशाराजम भेजवाया है। उम्मीद है कि दो दिन की टाईम की खुराकी इससे पूरी हो जायेगी। और कल से नवरात्रि का व्रत प्रारंभ हो जायेगा तो सोशल मीडिया से कट कर थोड़ा और समय मिलने पर यह खुराकी बढ़ भी सकती है।
कोरोना को भगाना है, कहीं नही जाना है।
घर मे रहना है, किताबें पढ़ना है।😊😊
(बनारस, 24मार्च2020, मंगलवार, 8.00बजे प्रात:)
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शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी,

व्योमवार्ता /प्रतिभा श्रीवास्तव की The Peaceful Chaos, निस्वार्थ प्यार पर उम्दा उपन्यासिका : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 21 फरवरी 2020
       बहुमुखी प्रतिभा की धनी , भरतनाट्यम  कलाकार अपनी छोटी बहन जैसी प्रतिभा श्रीवास्तव की उपन्यासिका The Peaceful Chaos पढ़ने को मिली। आज के भौतिकवादी भागते दौड़ते माहौल और तुरत फुरत रिश्तो को कैश करा लेने वाले माहौल मे कालेज जीवन के रूमानी प्यार पर बेहद मर्मस्पर्शी लिहाज से कहानी को पिरोया है प्रतिभा ने। यह उनकी पहली किताब है, पर स्टोरी प्लाट का चयन, साफ सुथरे शब्दों का प्रयोग और प्रेमकहानी मे निस्वार्थ भावनात्मक दोस्ती को आधार पर लिखी कहानी प्रतिभा के अंदर छुपे गंभीर लेखक का परिचय कराती है। हालॉकि एक झूठे बहाने को ले कर शुरू हुये कहानी जो अंत मे उसे दूसरे पक्ष के सच मे बदल देती है पर थोड़ी और मेहनत की जरूरत थी, मुझे लगता है कि यदि लेखिका ने इसे उपन्यासिका बनाने के बजाय घटनाओं को विस्तार देते हुये उसे उपन्यास का रूप दिया होती तो संभवतः ज्यादा सफल होती। जतिन और आशी के दोस्ती की यह कहानी उनके आपसी मोहब्बत के एहसास के साथ ही परिस्थितिवश समाप्त हो जाती है, बल्कि मै कहूँ कि समाप्त कर दी गई तो गलत नही होगा। पर जिन बुनियादी सवालातों को लेकर इस प्रेमकहानी का अंत बताया गया वह मेरे गले के नीचे सामान्यत: नही उतरती। एक कालेज मे पढ़ने वाले आज के मोबाईल जमाने मे जाति को न जानने का सवाल, फिर कहानी के पीक प्वाइंट पर आशी के बाबा दादी के महत्वपूर्ण भूमिका के बाद उनका एकाएक कहानी से ओझल हो जाना, रेल भगदड़ मे गुम होने वाली पढ़ी लिखी कालेज गर्ल का बलात्कार के पश्चात अस्पताल मे रहने के दौरान कोई पहचान नही होना, गुमशुदगी की एफआईआर के बावजूद पूरी कहानी से पुलिस कीकोई भूमिका मही होना,आशी का गुमनामी मे  गॉव जा कर वापस आ जाना और अस्पताल मे कहानी का अंत कहीं न कहीं मन मे  सवाल खड़े करते है। लगता है कि जल्दबाजी और पहली बार के लेखकीय उत्साह में सब कुछ बड़ी तेजी से समेट दिया है लेखिका ने।
उपन्यासिका के अंत मे प्रतिभा ने कुछ वाजिब सवाल उठाये है आज के समाज यानि हमसे और आपसे, जो मौजूं ही नही जरूरी है जिन पर हमे सौचना होगा, अगर अभी तक नही सोचा तो सोचना पड़ेगा नही तो यूँ ही जतिन और आशी जैसे सरल और साफगोई से जीने वाले लोग सामाजिक बंधनों के इस अबूझ आत्मघाती चक्की मे पीसे जाते रहेगें।
नवोदित लेखिका के रूप मे प्रतिभा सराहना व बधाई की पात्र है, मनोवैज्ञानिक व भावनात्मक तरीके से उनकी उपन्यासिका पठनीय व प्रशंसनीय है।
(बनारस, शिवरात्रि, 21 फरवरी 2020, शुक्रवार)
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

व्योमवार्ता/ काशी टेल, बनारस के छात्रजीवन की आईना  ओम प्रकाश राय यायावर की किताब : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 18फरवरी 2020

                  पिछले सप्ताह अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के मित्र ओम प्रकाश राय यायावर का उपन्यास काशी टेल पढ़ा। इस किताब को पढ़ने की काफी दिनों से ईच्छा रहने के बावजूद किन्ही न किन्ही कारणों से यह पढ़ने से छूट जा रही थी। हालॉकि ओम प्रकाश जी ने भी इसके लिये एक बार उलाहना दे डाला, सो अबकी बार किताब उठाई तो पूरा पढ़ने के बाद ही दूसरे काम हाथ मे लिया। फिर किताब के बारे मे सोचते हुये लिखने मे देर हो गई। बहरहाल आज इस काम को भी पूरा करने का मन मिजाज बना के बैठा हूँ। ओम प्रकाश राय बिहार से बनारस काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने आये तो औरों की तरह हमारी सर्व विद्या की राजधानी ने दोनो बॉहें फैलाये इन्हे स्वीकार कर लिया अभी वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे ही उच्च अध्ययनरत हैं।बनारस टेल इसी बीएचयू के शिक्षा संकाय की कथा है जिसमे बड़े बेबाकी से आज कल बीएड करने वाले छात्रों के मनस्थिति व परिस्थिति को दिखाते हुये यात्रा करती है, बिहार से  आये निहाल पाणे के साथ, तो रामनगर की आईपीएस मुस्लिम पिता व हिन्दू मॉ की पुत्री सदफ के साथ कमच्छा से गोदौलिया तक, रामनगर सामनेघाट से लंका तक, रेवड़ी तालाब के जय नारायण इंटर कालेज के खाली बीरान मैदान से दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर  चढ़ते उतरते ,बीएचयू की अमराईयों मे टहलते हुये सेण्ट्रल आफिस तक।
कभी सिविलसर्विस और पीसीएस के रिजल्ट मे अपना बड़ा सा घेरा बनाने वाले आक्सफोर्ड आफ ईस्ट के शहर कहे जाने वाले ईलाहाबाद अब प्रयागराज मे पीसीएस की तैयारी करने वाला बिहारी निम्न मध्यवर्गीय आय वाले परिवार का लड़का निहाल पाण्डेय, अपने पिता की उलाहनाओं से अाजिज आकर एक सिक्योर्ड नैकरी मास्टरी के  लिये बीएड करने  बीएचयू  आ जाता है। वहॉ उसकी मुलाकात उच्च आयवर्गीय मुस्लिम परिवार की सदफ से होती है। पहली मुलाकात के बाद दोनो के बीच दोस्ती से थोड़ा बढ़ कर मधुर रिश्ता बन जाता है। चंचल शोख सदफ के संगत मे अपने मे सिमटे रहने वाला निहाल भरपूर कालेज जीवन के दोस्ती का लुत्फ उठाने लगते है। इस दोस्ती ईश्क मोहब्बत के साथ साथ हास्टल जीवन की चुहलबाजिया, बदमासियॉ और बिन्दास अंदाज किताब की रोचकता को जीवन्त करते हैं। कहानी मे ठहराव आता है तो कहानी हाथ से फिसलती जान पड़ती है पर फिर से बिहार के अपने गॉव मे स्कूली शिक्षा मे अलख जगाने की कोशिश कर रहे निहाल पाणे बाबा कहानी के छोर को थाम लेते है।
कुल मिला कर ओम प्रकाश राय ने कथा को रोचक बनाने मे कोई कसर नही छोड़ा है और जो लोग बनारस, पश्चिम बिहार के भूगोल, और संस्कृति से परिचित है उनके लिये कहानी से जुड़ाव व अपनापन लगना स्वाभाविक है। बनारस टेल बेहतरीन कोशिश है इधर आये बनारस , बीएचयू, बिहार से जुड़े उपन्यासों की कड़ी में।
(बनारस, 18फरवरी,2020, मंगलवार)
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