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शनिवार, 23 जुलाई 2016

बदहाल बीएचयू ट्रौमा सेण्टर :व्योमेश चित्रवंश की डायरी

बीएचयू ट्रौमा सेण्टर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 18 सितंबर 2015 को किया था यह वही समय था जब मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत जोर शोर से हो चुकी थी। देश मे स्वच्छ भारत का असर दिखने भी लगा है पर मोदी जी द्वारा उद्घाटित ट्रौमा सेण्टर की सफाई व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ज्यादातर वाटर वेसिन गंदगी से पटे और जाम पड़े हैं। ज्यादातर लैट्रीन के कमोड्स व सीट बदरंग व गंदे है। वाटर कूलर पर धूल व गंदगी का अंबार लगा है।कुछ सर्विस मास्टर क्लीनर की वर्दी वाले सफाईकर्मी साफसफाई करते नजर आते रहते है पर उनके कामो की देख रेख करने वाला कोई नही। स्थिति यह है कि चौथे मंजिल पर आर्थोपेडिक वार्ड में वेसिन की टोटियॉ रस्सी से बॉधी गई है और बाथरूम की हालत यह है कि आप उसका प्रयोग करना तो दूर वहॉ खड़े तक नही हो सकते। हमने इस संबन्ध मे जब आन ड्यूटी नर्सेज से बात किया तो उनका सीधा जबाब था कि यह देखना उनकी ड्यूटी मे नही हैं। मौजूदा डाक्टर्स तो ज्यादातर प्रथम वर्ष के रेजिडेण्ट है जो स्वयं अपने सीनियर्स के व्यवहार व थोपे गये कार्यो से त्रस्त है वे बेचारे इस संबन्ध मे क्या बता पायेगें।
    हमने इस संबन्ध मे ट्रौमा सेण्टर के विशेष कार्याधिकारी व उप चिकित्सा अधीक्षक से मिल कर शिकायत करने की कोशिश की पर वे दोनो अधिकारी हमे अपने कमरे मे नही मिले।
   पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के साथ साथ छत्तीसगढ व झारखण्ड के लिये एम्स जैसा एकमात्र जीवनदायी माने जाने वाले बीएचयू के अत्याधुनिक ट्रौमासेण्टर की बदहाली को बढ़ाने मे कुछ निहित शक्तियॉ अपने स्वार्थवश बदनाम व ध्वस्त करने मे लगी है क्या उनके मायाजाल से आमजन के बनाये ट्रौमासेण्टर मुक्त हो सकेगा?

गुरुवार, 19 मई 2016

वरूणा गीत

मॉ वरूणा को समर्पित इस गीत की रचना प्रख्यात कवि पं० हरि राम द्विवेदी जी ने हमारी वरूणा अभियान के आग्रह पर वर्ष २००७ मे किया था।यह गीत वरूणा के महत्व के साथ काशी के संस्कृति को भी संप्रेषित करता है।

है जुड़ी वरूणा हमारी आस्था के गीत से
और काशी की संजोई साधना की रीति से
लोक के अनुराग की शुभरागिनी के प्रण सी
पीढीयो से गा रहा यह शहर वाराणसी।
राग रंजित कामनायें,रास रस की प्रीति से।
है जुड़ी........
पंचक्रोसी की परिधि मे जो तुम्हारा नाम है
है वही महिमा सनातन  लोक का सम्मान है
प्रकृति को तुमने सँवारा है नरम नवनीत से
है बसी.....
गति तुम्हारी देख ऑखे आज डबडब हो रही
देख अवजल का मिलन निष्ठा बिचारी को रही
यह समय सहमा हुआ कुछ कह न सके अतीत से
है जुड़ी.....

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

हमारी वरूणा अभियान, एक आवाज दिल मे उठी थी कभी (१) : व्योमेश चित्रवंश की डायरी, 08मई 2016, रविवार

                     वो शायद सन२००३ का रक्षा बंधन था, जब मै अपनी पौने चार साल की बिटिया को लेकरअपने चाचा जी के मकान पर मानस नगर दुर्गाकुण्ड जा रहा था.बाईक पर उसे नींद ना आये  इसलिये उससे बाते भी करता जा रहा था, वह बचपन से बेहद जिग्यासु व बातूनी होने के साथ किसी भी विषय के बारे मे ढेर सारे सवाल पूछना उसकी आदत रही है, मैने उसे वरूणा पुल से गुजरते हुये वाराणसी के नामकरण के बारे मे बताया तो उसने  वाराणसी नाम के दूसरे भाग अस्सी नदी के बारे मे पूछा, इसलिये मै उसे दिखाने के गरजसे दुर्गाकुण्ड से अपनी बाईक अस्सी लंका वाले रास्ते पर पुराने पुल की ओर बढ़ा दिया, तब रविन्द्रपुरी पुल नही बना था. वहॉ जा के मैने बेटी को बीएचयू मे पढ़ने के दौरान रोज आने जाने का रास्ता व अस्सी नदी दिखाया, अस्सी  नदी उसी समय धीरे धीरे नाले से नाली का रूप लेने लगी थी, बिटिया को पुल के नीचे दूर दूर तक नदी के बजाय नाली दिखने पर जिग्यासा होना स्वाभाविक था, उसने पलटते ही मुझसे सवाल किया कि लेकिन यहॉ नदी कहॉ है? उसके सवाल के जबाब मे जब मैने कनु के बाल मन को बताया कि अगल बगल रहने वालो ने नदी पाट कर उसे समाप्त कर दिया, आदतन दूसरा सवाल हाजिर था कि जब नदी पाटी जा रही थी तो आप लोगो ने उसे रोका क्यों नही ? बात उस समय आयी गयी हो गई, कार्यक्रम से लौटते समय वरूणा पुल पर कनु का एक दूसरा सवाल कि" वरूणा को कब पाटा जायेगा?'' बेहद मासूमियत से पूछे गये इन दोनो सवालो का जबाब मेरे पास वाकई नही था. लेकिन इन दोनो बेहद मासूम सवालो ने मुझे झकझोर डाला. कई कई राते ये दोनो सवाल मुझे परेशान करते रहे. बहुत सोच विचार कर मैने अपने दिल की बात और विचारो को अपने मित्र सूर्यभान सिंह के साथ बॉटा. फिर हम दोनो मित्रो की शाामे वहीं वरूणाकिनारे शास्त्री घाट पर बितने लगी. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री बनारस के सपूत  स्व० लाल  बहादुर शास्त्री के नाम पर नया नया शास्त्री घाट बना था, उक्त  घाट को बनवाने मे तत्कालीन मंत्री व क्षेत्रीय विधायक वीरेन्द्र सिंह  जी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.वीरेन्द्र सिंह के प्रयासो से ही घाट पर वरूणा महोत्सव की शुरूआत हुई थी . जिसके दो आयोजन हो चुके थे. हम दोनो  लोग नये विचार करते और उनके कार्यान्यवन के संभावनाओ पर सोचते . सबसे पहले वरूणा को जानने व समझने की बात उठी, फिर हम लोगो ने बाईक उठाया और वरूणा की भौगोलिक रचना समझने के लिये हम लोग फूलपुर इलाहाबाद वरूणा ताल तक गये.वहॉ फैले विशाल पर लगभग तीन चौधाई से अधिक सूख चुका वरूणा ताल काे देख कर लगा कि किसी तरह हमने प्राकृतिक अविरल व संचरण व्यवस्था मे हस्तक्षेप कर अपनी खुद की समस्यायो बढ़ा रखा है। बाईक से वरूणा के संग यात्रा के दौरान हमने यह महसूस किया कि इस तरह वरूणा किनारे सड़को पर चलने से हम अपने उद्देश्य के प्रतिष्ठित सही न्याय नही कर पायेगें लिहाजा यह तय हुआकि वरूणा तट पर पदयात्रा कर के ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठी करनी पड़ेगी। मित्र सूर्यभान जी  की लंबी टॉगो ने यह काम बखूबी से किया । हम लोगो के पास सूर्यभान जी के दो बार के पदयात्रा के बाद वरूणा के संबध मे काफी व्यवहारिक जानकारियॉ थी। वरूणा की पीड़ा, उसके तटवासियो की पीड़ा, समस्या व उसकी संभावित समाधान की एक सूची थी।  पर  समस्या यह था कि इन व्यवहारिक समाघान को किसी तरह धरातल पर लाया जाय। क्योकि हम लोगो के पास न तो सामर्थ्य था न ही अधिकार ।
कुछ और मित्रों को हम लोगो ने अपने सरकारो मे शामिल किया तो उनके इनुभव, संबंधो व विचारो का लाभ मिलने के साथ ही हमारे सामर्थ्य का विस्तार हुआ।तय हुआ कि वरूणा के भौगोलिक अध्ययन के साथ वरूणा का सांस्कृतिकर्मी पौराणिक व ऐतहासिक महत्व व वानस्पतिक प्रभाव के साथ पारिस्थितिकी अध्ययन भी किया जाये।
अगली रणनीति इस संबंध मे बनने लगी ।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

व्योमेश चित्रवंश की डायरी : बुढ़वा मंगल , 5 अप्रैल 2015 मंगलवार

                     आज बुढ़वा मंगल है। बनारस मे बुढ़वा मंगल के त्यौहार से ही होली का समापन माना जाता है। वैसे तो देश में प्रत्येक स्थान पर होली अलग-अलग तरह से मनाई जाती है, किंतु  बनारस में इसे मनाने का अपना एक निराला ही अन्दाज़ है। बनारस मे कायदे से होली रंगभरी एकादसी से शुरू होकर आज के दिन तक मनायी जाती है।बुढ़वा मंगल होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है, 'वृद्ध अंगारक' पर्व भी कहते हैं। नवान्नेष्टि यज्ञ माघ मास की पूर्णिमा पर प्राय: "होली का डांडा" रोप दिया जाता है और इसी दिन से लोग इसके समीप लकड़ियाँ और गाय के गोबर से कण्डे इकट्ठा करने लगते हैं। लकड़ियों को इकट्ठा करने का यह काम फाल्गुन की पूर्णिमा तक चलता है। इसके बाद उसमें आग लगाई जाती है। यह भी एक प्रकार का यज्ञ है। इसे नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता है। एक महत्त्वपूर्ण कथन यह भी है कि इस दिन खेत से उपजे नये अन्न को लेकर इस यज्ञ में आहुति दी जाती है और उसके बाद प्रसाद वितरण किया जाता है।होलिका के पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चरण किया जाता है-

असृक्याभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।।

होलिका के दिन खेत में उगने वाले नये अन्न को लेकर यज्ञ में हवन करने की परंपरा है। इस अन्न को 'होला' कहा जाता है। इसीलिए इस पर्व को भी लोग 'होलिकोत्सव' कहते हैं। बनारस की परंपरा में यह पर्व होली के बाद पड़ने वाले मंगलवार तक मनाया जाता है।इस मंगल को 'बुढ़वा मंगल' इसलिए भी कहते हैं कि यह वर्ष के आखिरी मंगल के पूर्व का मंगल होता है। मंगल का अभिप्राय मंगल कामना से है, इसलिए बनारस में इस उत्सव को मंगलवार को पूर्ण माना जाता है। होली को प्राय: उत्सव समाप्त हो जाता है, परंतु वाराणसी में इसके बाद मिलने-जुलने का पर्व प्रारम्भ होता है। लोग घर-घर जाकर अपने से बड़ों के चरणों में श्रद्धा से अबीर और गुलाल लगाते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं तथा छोटों को आशीर्वाद देते हैं। विभिन्न कार्यक्रम 'बुढ़वा मंगल' पर्व के बाद वाराणसी में नृत्य, संगीत, कवि सम्मेलन एवं महामूर्ख सम्मेलन चलते रहते हैं। लोग बड़े उत्साह से इन सभी सम्मेलनों में जाते हैं। भारत की पवित्र नदियों में से एक गंगा नदी में लोग नौका विहार भी करते हैं और साथ ही गंगाजी की पूजा भी करते हैं। इसी उल्लास के साथ आने वाले नूतन वर्ष की मंगल कामना करते हुए वाराणसी में यह पर्व मंगलवार को होली के बाद समाप्त समझा जाता है। मेले का आयोजन होली के अगले मंगलवार को आयोजित होने वाला 'बुढ़वा मंगल' का मेला बनारसी मस्ती और जिन्दादिली की एक नायाब मिसाल है। ऐसी मान्यता है कि होली, जिसमें मुख्यतः युवाओं का ही प्रभुत्व रहता है, को बुजुर्गों द्वारा अब भी अपने जोश और उत्साह से परिचित कराने का प्रयास है- 'बुढ़वा मंगल' का मेला। बनारस के इस पारम्पिक लोक मेले से हिन्दी साहित्य के शिरोमणि भारतेंदु हरिश्चंद्र का भी जुड़ाव रहा है। बनारस के राजपरिवार ने भी इस परंपरा को अपना समर्थन दिया। मेले के आयोजन को कई उतार-चढाव से भी गुजरना पड़ा, किन्तु आम लोगों की सहभागिता और दबाव ने प्रशासन को भी इस समारोह के आयोजन में तत्परता से जुड़ने को बाध्य किया। गंगा की लहरों पर सफेद लकदक कुर्ता पजामा या धोती पहने सर पर बनारसी टोपी सजाए छोटी-बड़ी नौकाओं तथा घाटों पर बैठे संस्कृतिप्रेमी व सुधि दर्शकगण इस सांस्कृतिक नगरी की पारम्परिकता को एक नया आयाम देते हैं। पान की गिलौरियो के बीच गुलाब जल की हल्की बौछारे व गुलाब की पंखुड़ियॉ के साथ चैता व होरी की तान का आनन्द सन १७३०-३१ से लगातार चली आ रही है। बीत मे एक दो अवरोधो के चलते कार्यक्रम स्थगित हुआ पर बनारस के संस्कृतिप्रेमियो ने फिर जीवन्तता दी।
      तीन वार तेरह त्योहार वाले इस शहर के लोग जिन्दगी जीना और मस्ती के साथ जीना अपनेवआराध्य महादेव शंकर से सीखा है और उसी फक्कड़पन से जी रहे है।
कहावत है पाथर पड़े चाहे बज्जर
हमरे ठेंगे से।
(बनारस को जानने वाले मित्र सही शब्द का चयन स्वयं कर लेगें)
बनारस मे हर शख्स आज जीता है। आने वाले कल की न उसे चिन्ता है न फिकर, तभी तो वह आने वााले तल को भी अपने उसी पुरूषॉग पर ही रखता है।